147. अपने दैहिक संबंधियों के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) अगर कोई पत्नी, पति, और उनके बच्चे, सभी परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो उन्हें अक्सर उसके वचनों को पढ़ना चाहिए, सत्य पर सहभागिता करनी चाहिए, एक-दूसरे की सहायता करनी चाहिए, और प्रभु के रूप में मसीह में श्रद्धा रखनी चाहिए।

(2) यदि कोई पत्नी, पति, या बच्चे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, फिर भी वे विश्वास के विरोध में नहीं हैं, तो उन्हें परमेश्वर की गवाही और सत्य पर सहभागिता का प्रस्ताव दिया जाना चाहिए, बशर्ते कि ऐसा करना सुसमाचार फैलाने के सिद्धांतों के साथ मेल खाता हो।

(3) कोई पत्नी, पति, या बच्चा जो परमेश्वर में विश्वास का विरोध करता हो और सत्य से घृणा करता हो, उसके साथ समझदारी से पेश आना चाहिए। बुरे लोगों को परमेश्वर में विश्वास करने में शामिल नहीं करना चाहिए।

(4) किसी के द्वारा परिवार को त्याग देने का निर्णय इस आधार पर होना चाहिए कि क्या उसके परिवार के अविश्वासी सदस्य उसका विरोध करते या उसे सताते हैं, और इस आधार पर भी कि इस उत्पीड़न की मात्रा कितनी है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर के वचनों में, लोगों को एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए इसके संबंध में कौन से सिद्धांत का उल्लेख किया गया है? उससे प्रेम करो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, और उससे नफ़रत करो जिससे परमेश्वर नफ़रत करता है। अर्थात्, परमेश्वर जिन्हें प्यार करता है, लोग जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित करते हैं, ये वही लोग हैं जिनसे तुम्हें प्रेम करना चाहिए। जो लोग परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित नहीं करते हैं, परमेश्वर से घृणा करते हैं, उसकी अवज्ञा करते हैं, और जिनसे वो नफरत करता है, ये ही वे लोग हैं जिन्हें हमें भी तिरस्कृत और अस्वीकार करना चाहिए। यही है वह जो परमेश्वर के वचन द्वारा अपेक्षित है। यदि तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, तो वे उससे नफरत करते हैं; और अगर वे उससे नफरत करते हैं, तो परमेश्वर निश्चित रूप से उनसे घृणा करता है। इसलिए, यदि तुम्हें अपने माता-पिता से नफरत करने के लिए कहा जाए, तो क्या तुम ऐसा कर सकोगे? यदि वे परमेश्वर का विरोध करते और उसे बुरा-भला कहते हैं, तो वे निश्चित रूप से ऐसे लोग हैं जिनसे वह घृणा करता है और शाप देता है। इन परिस्थितियों में, तुम्हें अपने माता-पिता के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, यदि वे परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास में बाधा डालते हैं या बाधा नहीं डालते? अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु ने कहा, "कौन है मेरी माता? और कौन हैं मेरे भाई? ... क्योंकि जो कोई मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और मेरी बहिन, और मेरी माता है।" यह कहावत अनुग्रह के युग में पहले से मौजूद थी, और अब परमेश्वर के वचन और भी अधिक उपयुक्त हैं : "उससे प्रेम करो, जिससे परमेश्वर प्रेम करता है और उससे घृणा करो, जिससे परमेश्वर घृणा करता है।" ये वचन बिलकुल सीधे हैं, फिर भी लोग अकसर इनका वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाते। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर द्वारा शापित है, लेकिन बाहर से देखने पर वह काफी अच्छा लगता है, या वह तुम्हारी माता या पिता या कोई संबंधी है, तो संभवत: तुम उस व्यक्ति से घृणा न कर पाओ, और संभवत: तुम दोनों में बड़ी घनिष्ठता और नजदीकी संबंध भी हो। जब तुम परमेश्वर से ऐसे वचन सुनते हो, तो बेचैन हो जाते हो और उस व्यक्ति के प्रति अपना दिल कठोर नहीं कर पाते या उसका त्याग नहीं कर पाते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि एक पारंपरिक धारणा है, जो तुम्हें बाँधती है। तुम सोचते हो कि यदि तुम ऐसा करोगे, तो स्वर्ग के कोप के भागीदार होगे, स्वर्ग द्वारा दंडित किए जाओगे, यहाँ तक कि समाज द्वारा त्याग दिए जाओगे, और जनमत द्वारा ख़ारिज कर दिए जाओगे। इतना ही नहीं, एक इससे भी अधिक व्यावहारिक समस्या यह होगी कि यह तुम्हारे अंत:करण पर बोझ बन जाएगा। यह अंत:करण तुम्हारे माता-पिता द्वारा तुम्हें बचपन से सिखाई गई बातों से बनता है, या फिर सामाजिक संस्कृति के प्रभाव या संक्रमण से, जिनमें से कोई भी तुम्हारे भीतर सोच के ऐसे तरीके की जड़ रोप देता है, कि तुम परमेश्वर के वचन का अभ्यास नहीं कर पाते और उससे प्यार नहीं कर पाते, जिससे वह प्यार करता है और उससे घृणा नहीं कर पाते, जिससे वह घृणा करता है। हालाँकि अंदर से तुम जानते हो कि तुम्हें उनसे घृणा करनी चाहिए और उन्हें नामंज़ूर कर देना चाहिए, क्योंकि जीवन तुम्हें परमेश्वर से मिला है, तुम्हारे माता-पिता ने नहीं दिया। इंसान को परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और स्वयं को उसे लौटा देना चाहिए। हालाँकि तुम दोनों ऐसा कहते और सोचते हो, लेकिन तुम बस अपना मन बदलकर इसे अभ्यास में नहीं ला सकते। क्या तुम लोग जानते हो कि यहाँ क्या चल रहा है? ऐसा है कि इन चीजों ने तुम्हें कसकर और पूरी तरह से बाँध रखा है। शैतान इन चीजों का इस्तेमाल तुम्हारे विचारों, तुम्हारे दिमाग और तुम्हारे दिल को बाँधने के लिए करता है, ताकि तुम परमेश्वर के वचनों को स्वीकार न कर सको। ऐसी चीजों ने तुम्हें पूरी तरह से भर दिया है, इस बिंदु तक कि तुम्हारे भीतर परमेश्वर के वचनों के लिए कोई स्थान नहीं है। इतना ही नहीं, यदि तुम उसके वचनों का अभ्यास करने का प्रयास करते हो, तो ये चीज़ें तुम्हें भीतर से प्रभावित करती हैं और तुम्हें उसके वचनों और अपेक्षाओं के साथ संघर्षरत कर देती हैं, और तुम्हें इन ग्रंथियों से खुद को छुड़ाने और इस बंधन से आज़ाद होने में अक्षम बना देती हैं। यह निराशाजनक होगा और संघर्ष करने की ताक़त के बिना, तुम कुछ समय बाद हार मान लोगे। कुछ लोग संघर्ष करके आज़ाद हो जाते हैं, जबकि दूसरे लोग हार मान लेते हैं। "पारंपरिक धारणाएँ और नैतिक मानक मायने रखते हैं", वे सोचते हैं, "हम परमेश्वर के वचनों को अलग रखें। आखिरकार, हम इस दुनिया में रह रहे हैं, और हमें इन लोगों पर भरोसा करना होगा।" नकारात्मक सार्वजनिक राय और निंदा पाने के बजाय, जिसे वे सहन नहीं कर पाएँगे, वे परमेश्वर को अपमानित करने, सत्य और परमेश्वर के वचनों का त्याग करने, और आम राय या पारंपरिक धारणाओं के बंधन के आगे आत्मसमर्पण करने का विकल्प चुनते हैं। क्या मनुष्य दयनीय नहीं है? क्या उसे परमेश्वर के उद्धार की आवश्यकता नहीं है?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

हमारे वर्तमान समाज में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति, चाहे उसने कितनी भी शिक्षा प्राप्त की हो, अपनी सोच और विचारों के भीतर कई चीजें रखता है। विशेष रूप से, पारंपरिक चीनी महिलाएँ यह मानती हैं कि एक महिला का स्थान घर में होता है, कि महिलाओं को अच्छी पत्नियाँ और माताएँ बनना चाहिए, जो अपना पूरा जीवन अपने पति और बच्चों के लिए व्यतीत और समर्पित कर दें। अपने परिवार के लिए प्रतिदिन तीन बार भोजन बनाना, साफ-सफाई करना, कपड़े धोना—उन्हें घर में यह सब करना चाहिए, और बेहद अच्छी तरह से करना चाहिए। यह निश्चित रूप से "अच्छी पत्नी और माँ" के लिए हमारे समाज का मानक है। हर महिला का मानना है कि उसे इसी तरह से काम करना चाहिए, और अगर वह ऐसा नहीं करती, तो वह एक अच्छी महिला नहीं है, और वह अपने विवेक के खिलाफ गई होगी, और उसने नैतिकता के मानकों का उल्लंघन किया होगा। कुछ ऐसी भी हैं, जो इस भूमिका को खराब तरीके से या समाज के मानकों के प्रतिकूल तरीके से निभाकर अपनी अंतरात्मा द्वारा कुतरी जा रही हैं, और महसूस करती हैं कि उन्होंने अपने बच्चों और अपने पति को निराश किया है। क्या परमेश्वर में विश्वास करना और अपने कर्तव्य को निभाने के लिए बुलाया जाना तुम्हारे द्वारा एक अच्छी पत्नी और माँ, एक आदर्श माँ, मानकों पर खरी उतरने वाली महिला बनने के साथ टकराव पैदा करता है? यदि तुम एक अच्छी पत्नी और माँ बनने की इच्छा रखती हो, तो तुम अपना सौ प्रतिशत समय अपने कर्तव्य को ही निभाने पर नहीं लगा सकती। जब एक पत्नी और माँ की तुम्हारी भूमिका और तुम्हारे कर्तव्य के बीच टकराव पैदा होता है, तो तुम किसे चुनती हो? यदि तुम अपना कर्तव्य पूरा करने और परमेश्वर के घर के कार्य की जिम्मेदारी लेने, परमेश्वर के प्रति पूरे समर्पण के साथ जो तुम कर सकती हो वह करने, और ऐसा करते हुए पत्नीत्व और मातृत्व के दायित्वों को दरकिनार करने के लिए बाध्य हुई, तो तुम कैसा महसूस करोगी? तुम्हारे मन में क्या गूँजेगा? क्या तुम्हें ऐसा लगेगा कि तुमने अपने बच्चों को निराश किया है? असफलता की यह भावना, यह बेचैनी कहाँ से आती है? क्या तुम तब बेचैन महसूस करती हो, जब तुमने सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छी तरह पूरा नहीं किया होता? तुम न तो बेचैन होती हो, न ही दोषी महसूस करती हो, क्योंकि यह सकारात्मक चीज तुम्हारे विचारों, दृष्टिकोणों और विवेक में नहीं डाली गई है। तो फिर, उनमें क्या डाला गया है? एक अच्छी पत्नी और माँ होना। यदि तुम एक अच्छी पत्नी और माँ नहीं हो, तो तुम एक अच्छी महिला, एक "सभ्य" महिला, नहीं हो। क्या यह तुम्हारा मानक नहीं है? यह मानक तुम्हें बाँधता है; परमेश्वर में विश्वास करते और अपना कर्तव्य निभाते समय तुम इसे अपने साथ ढोने के लिए बाध्य होती हो। जब तुम्हारे कर्तव्य निभाने और एक अच्छी पत्नी और एक स्नेही माँ होने के बीच टकराव पैदा होता है, तब भले ही तुमने अनिच्छापूर्वक अपना कर्तव्य निभाने या परमेश्वर के प्रति वफादार बने रहने का विकल्प चुन लिया हो, तुम्हारे दिल में कुछ बेचैनी होगी, और उससे भी अधिक एक अपराध-बोध होगा। जब तुम अपना कर्तव्य नहीं निभा रही होती, तो तुम घर जाती हो और अपनी अनुपस्थिति की क्षतिपूर्ति करते हुए अपने बच्चों या अपने पति की अच्छी तरह देखभाल करती हो, भले ही ऐसा करने में तुम्हें अधिक दैहिक कष्ट हो। यह एक मानसिक आदेश है, जो तुमसे ऐसा कराता है। लेकिन क्या हमने परमेश्वर के सामने अपनी जिम्मेदारी, अपना दायित्व और अपना कर्तव्य निभाया है? जब हम अपने कर्तव्य में असावधान और बेपरवाह होते हैं, या जब हम उसे नहीं करना चाहते, तो क्या हमारे दिल में कोई अपराध-बोध, या धिक्कार की कोई भावना होती है? हमें जरा-सा भी धिक्कार महसूस नहीं होता, क्योंकि लोगों की मानवता में ऐसी कोई चीज मौजूद ही नहीं है। इसलिए, भले ही तुम अपने कर्तव्य थोड़े-से निभा दो, तुम सत्य और परमेश्वर के मानकों से काफी दूर बने रहते हो। परमेश्वर ने कहा था, "परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है।" इन वचनों का क्या अर्थ है? इनका उद्देश्य सभी लोगों को यह बताना है : हमारा जीवन और हमारी आत्माएँ परमेश्वर से आती हैं, न कि हमारे माता-पिता से, और मानवजाति या हमारे इस समाज या प्रकृति से तो निश्चित रूप से नहीं। ये चीजें हमें परमेश्वर द्वारा दी गईं थीं, और भले ही हमारे शरीरों को हमारे माता-पिता द्वारा जन्म दिया गया हो, लेकिन वह परमेश्वर ही है जो हमारे भाग्य को नियंत्रित करता है। परमेश्वर में हमारा विश्वास कर सकना एक अवसर है, जो उसने हमें दिया है; यह उसके द्वारा विहित है, और यह उसका अनुग्रह है। इसलिए, तुम किसी अन्य व्यक्ति के लिए दायित्व उठाने या जिम्मेदारी लेने के लिए बाध्य नहीं हो; तुम्हारा एकमात्र दायित्व परमेश्वर के प्रति उस कर्तव्य को निभाना है, जो एक सृजित प्राणी को निभाना चाहिए। इंसान के लिए सबसे अधिक यही करना अपेक्षित है, और व्यक्ति के जीवन के सभी महत्वपूर्ण मामलों के बीच, इसे पूरा करना सबसे अधिक आवश्यक है—यह व्यक्ति के जीवन का प्रमुख मामला है। यदि तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह नहीं निभाती, तो तुम एक सच्ची सृजित प्राणी नहीं हो। इंसान की नजरों में तुम एक अच्छी पत्नी और माँ हो सकती हो, एक अद्भुत गृहिणी, एक कर्तव्यनिष्ठ बेटी, और सभ्य समाज की एक प्रतिष्ठित सदस्या, लेकिन परमेश्वर के सामने तुम वह इंसान हो, जो उसके खिलाफ विद्रोह करता है, जो अपने दायित्वों या कर्तव्यों में से कुछ भी नहीं निभाता, और जिसने परमेश्वर से प्राप्त आदेश पूरा नहीं किया। क्या ऐसे व्यक्ति का अब भी परमेश्वर के सामने कोई स्थान होगा? ऐसे व्यक्ति का मोल एक कौड़ी जितना भी नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा: क्या यह सत्य है? (नहीं) अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा गलत नहीं होती है, यह एक सकारात्मक बात है—तो फिर मैं यह क्यों कहता हूँ कि यह सत्य नहीं है? यदि तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में विश्वास करते हैं और तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं, तो क्या तुम संतानोचित हो? (हाँ)। तुम संतानोचित कैसे हो? तुम उनके साथ अपने भाई-बहनों से अलग व्यवहार करते हो। तुम उन्हें माता-पिता के रूप में सम्मान देते हो, तुम उनके द्वारा बताए गए हर काम को करते हो, और यदि वे बूढ़े हों, तो तुम उनकी देखभाल के लिए उनके पास रहते हो, जो तुम्हें अपना कर्तव्य निभाने के लिए बाहर जाने से रोकता है। क्या ऐसा करना सही है? ऐसे समय में तुम्हें क्या करना चाहिए? यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है। यदि तुम अब भी आस-पास ही कहीं अपना कर्तव्य निभाते हुए उनकी देखभाल कर पा रहे हो, और तुम्हारे माता-पिता को परमेश्वर के प्रति तुम्हारी आस्था पर आपत्ति नहीं है, तो तुम्हें एक पुत्र या पुत्री के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए और अपने माता-पिता की मदद करनी चाहिए। यदि वे बीमार हों, तो उनकी देखभाल करो; अगर उन्हें कोई परेशानी हो, तो उन्हें आराम दो; यदि तुम्हारी आर्थिक परिस्थितियाँ अनुमति दें, तो उन्हें पोषक आहार दो। बहरहाल, यदि तुम अपने कर्तव्य में व्यस्त रहते हो, यदि तुम्हारे माता-पिता की देखभाल करने वाला और कोई न हो, और वे भी परमेश्वर में विश्वास करते हों, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें कौन-से सत्य का अभ्यास करना चाहिए? यह देखते हुए कि माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा एक सच्चाई नहीं है, बल्कि केवल एक व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी और दायित्व होती है, तो जब तुम्हारे दायित्वों और तुम्हारे कर्तव्य के बीच संघर्ष हो, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? (हमारा कर्तव्य वरीयता लेता है, यह पहले आना चाहिए)। तुम्हारे दायित्व तुम्हारे कर्तव्य नहीं हैं। अपने कर्तव्य को निभाना सत्य का अभ्यास करना है; अपने दायित्वों को पूरा करना सत्य का अभ्यास करना नहीं है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह सत्य का अभ्यास करना नहीं है? यदि परिस्थितियाँ अनुमति देती हों और तुम पर कोई ज़िम्मेदारी या दायित्व हो, तो तुम्हें जाकर इसे करना चाहिए—लेकिन अगर परिस्थिति तुम्हें अनुमति नहीं देती है तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें यह कहना चाहिए, "मुझे जाकर अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। यह वह सत्य है जिसका मुझे अभ्यास करना चाहिए; मेरे माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा वो सत्य नहीं है।" यदि तुम्हारे पास इस समय कोई कर्तव्य नहीं है, और तुम घर से दूर काम नहीं कर रहे हो, और तुम अपने माता-पिता के साथ ही रहते हो, तो उनकी देखभाल करने का एक तरीका खोजो, उनके जीवन को बेहतर, कुछ कम मुश्किल, बनाने के लिए जो भी कर सकते हो, सो करो। लेकिन यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि तुम्हारे माता-पिता किस तरह के लोग हैं। यदि वे तुच्छ मानवता के हों, तुम्हारी आस्था और तुम्हारे कर्तव्य के निष्पादन में एक निरंतर रोड़े हों, परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास को बाधित करते हों, तब तुम्हें किसका अभ्यास करना चाहिए? (अस्वीकृति का)। ऐसे समय में, तुम्हें उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए। तुमने अपना दायित्व पूरा कर लिया है; वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, इसलिए उनकी देखभाल करने का तुम्हारा कोई दायित्व नहीं बनता है। यदि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो तुम सब एक परिवार हो, वे तुम्हारे माता-पिता हैं। यदि वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, तो फिर तुम दोनों के रास्ते अलग हैं, तुम दो अलग प्रकार के लोग हो। वे शैतान को गले लगाते हैं। वे शैतान का सम्मान करते हैं। वे शैतान के मार्ग पर चलते हैं, शैतान की उपासना के मार्ग पर, एक ऐसा मार्ग जो परमेश्वर के प्रति तुम्हारी आस्था से अलग है। तुम लोग दो अलग-अलग प्रकार के लोग हो, और इसलिए इस पर कोई प्रश्न ही नहीं उठता है कि वे तुम्हारे दुश्मन हैं; तुम एक ही परिवार के नहीं हो, और इसलिए तुम उनकी देखभाल करने के लिए बाध्य नहीं हो। कौन-सी बात सत्य है? अपना कर्तव्य पालन करना ही सत्य है। परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य का पालन करना केवल छोटा-सा दायित्व पूरा कर लेना नहीं है, कुछ ऐसा कर लेना नहीं है जो तुम्हें करना चाहिए—यह परमेश्वर के, धरती पर रहने वाले एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य का पालन करना है! यह तुम्हारा दायित्व और जिम्मेदारी है, और यही जिम्मेदारी तुम्हारी सच्ची जिम्मेदारी है। यही वह दायित्व और जिम्मेदारी है जिसे तुम सृजन के प्रभु के समक्ष पूरी करते हो। परमेश्वर के सृजित प्राणी और अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा के बीच, सत्य क्या है? परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में कर्तव्य पालन सत्य है, यह परमेश्वर-प्रेरित कार्य है। माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा लोगों के प्रति संतानोचित निष्ठा है, यह सत्य का अभ्यास करना नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-वास्तविकता क्या है?' से उद्धृत

सगे-संबंधी जो विश्वास नहीं रखते (तुम्हारे बच्चे, तुम्हारे पति या पत्नी, तुम्हारी बहनें या तुम्हारे माता-पिता इत्यादि) उन्हें कलीसिया में आने को बाध्य नहीं करना चाहिए। परमेश्वर के घर में सदस्यों की कमी नहीं है और ऐसे लोगों से इसकी संख्या बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं, जिनका कोई उपयोग नहीं है। वे सभी जो ख़ुशी-ख़ुशी विश्वास नहीं करते, उन्हें कलीसिया में बिल्कुल नहीं ले जाना चाहिए। यह आदेश सब लोगों पर निर्देशित है। इस मामले में तुम लोगों को एक दूसरे की जाँच, निगरानी करनी चाहिए और याद दिलाना चाहिए; कोई भी इसका उल्लंघन नहीं कर सकता। यहाँ तक कि जब ऐसे सगे-संबंधी जो विश्वास नहीं करते, अनिच्छा से कलीसिया में प्रवेश करते हैं, उन्हें किताबें जारी नहीं की जानी चाहिए या नया नाम नहीं देना चाहिए; ऐसे लोग परमेश्वर के घर के नहीं हैं और कलीसिया में उनके प्रवेश पर जैसे भी ज़रूरी हो, रोक लगाई जानी चाहिए। यदि दुष्टात्माओं के आक्रमण के कारण कलीसिया पर समस्या आती है, तो तुम निर्वासित कर दिए जाओगे या तुम पर प्रतिबंध लगा दिये जाएँगे। संक्षेप में, इस मामले में हरेक का उत्तरदायित्व है, हालांकि तुम्हें असावधान नहीं होना चाहिए, न ही इसका इस्तेमाल निजी बदला लेने के लिए करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दस प्रशासनिक आदेश जो राज्य के युग में परमेश्वर के चुने लोगों द्वारा पालन किए जाने चाहिए' से उद्धृत

जो अपने सर्वथा अविश्वासी बच्चों और रिश्तेदारों को कलीसिया में खींचकर लाते हैं, वे बेहद स्वार्थी हैं और सिर्फ़ अपनी दयालुता का प्रदर्शन कर रहे हैं। ये लोग इसकी परवाह किए बिना कि उनका विश्वास है भी या नहीं और यह परमेश्वर की इच्छा है या नहीं, केवल प्रेमपूर्ण बने रहने पर ध्यान देते हैं। कुछ लोग अपनी पत्नी को परमेश्वर के सामने लाते हैं या अपने माता-पिता को परमेश्वर के सामने खींचकर लाते हैं और इसकी परवाह किए बिना कि क्या पवित्र आत्मा सहमत है या उनमें कार्य कर रहा है, वे आँखें बंद कर परमेश्वर के लिए "प्रतिभाशाली लोगों को अपनाते रहते हैं"। इन गैर-विश्वासियों के प्रति दयालुता दिखाने से आखिर क्या लाभ मिल सकता है? यहाँ तक कि अगर वे जिनमें पवित्र आत्मा उपस्थित नहीं है, परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए संघर्ष भी करते हैं, तब भी उन्हें बचाया नहीं जा सकता। जो लोग उद्धार प्राप्त कर सकते हैं, उनके लिए वास्तव में इसे प्राप्त करना उतना आसान नहीं है। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य और परीक्षणों से नहीं गुज़रे हैं और देहधारी परमेश्वर के द्वारा पूर्ण नहीं बनाए गए हैं, वे पूर्ण बनाए जाने में सर्वथा असमर्थ हैं। इसलिए जिस क्षण से वे नाममात्र के लिए परमेश्वर का अनुसरण आरंभ करते हैं, उन लोगों में पवित्र आत्मा मौजूद नहीं होता। उनकी स्थिति और वास्तविक अवस्थाओं के प्रकाश में, उन्हें पूर्ण बनाया ही नहीं जा सकता। इसलिए, पवित्र आत्मा उन पर अधिक ऊर्जा व्यय न करने का निर्णय लेता है, न ही वह उन्हें किसी प्रकार का प्रबोधन प्रदान करता है, न उनका मार्गदर्शन करता है; वह उन्हें केवल साथ चलने की अनुमति देता है और अंततः उनके परिणाम प्रकट करेगा—यही पर्याप्त है। मानवता का उत्साह और इच्छाएँ शैतान से आते हैं और किसी भी तरह ये चीज़ें पवित्र आत्मा का कार्य पूर्ण नहीं कर सकतीं। चाहे लोग किसी भी प्रकार के हों, उनमें पवित्र आत्मा का कार्य अवश्य होना चाहिए। क्या मनुष्य दूसरे मनुष्यों को पूरा कर सकते हैं? पति अपनी पत्नी से क्यों प्रेम करता है? पत्नी अपने पति से क्यों प्रेम करती है? बच्चे क्यों माता-पिता के प्रति कर्तव्यशील रहते हैं? और माता-पिता क्यों अपने बच्चों से अतिशय स्नेह करते हैं? लोग वास्तव में किस प्रकार की इच्छाएँ पालते हैं? क्या उनकी मंशा उनकी खुद की योजनाओं और स्वार्थी आकांक्षाओं को पूरा करने की नहीं है? क्या उनका इरादा वास्तव में परमेश्वर की प्रबंधन योजना के लिए कार्य करने का है? क्या वे परमेश्वर के कार्य के लिए कार्य कर रहे हैं? क्या उनकी मंशा सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा करने की है? वे जो परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू करने के समय से पवित्र आत्मा की उपस्थिति को नहीं पा सके हैं, वे कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं पा सकते; ये लोग विनाश की वस्तुओं के रूप में नामित किए गए हैं। इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि कोई उनसे कितना प्रेम करता है, यह पवित्र आत्मा के कार्य का स्थान नहीं ले सकता। लोगों का उत्साह और प्रेम, मानवीय इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करता है, पर परमेश्वर की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता और न ही वे परमेश्वर के कार्य का स्थान ले सकते हैं। यहाँ तक कि अगर कोई उन लोगों के प्रति अत्यधिक प्रेम या दया दिखा भी दे, जो नाममात्र के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उसके अनुसरण का दिखावा करते हैं, बिना यह जाने कि वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करने का क्या मतलब है, फिर भी वे परमेश्वर की सहानुभूति प्राप्त नहीं करेंगे, न ही वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करेंगे। भले ही जो लोग ईमानदारी से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं कमज़ोर काबिलियत वाले हों, और बहुत सी सच्चाइयाँ न समझते हों, वे तब भी कभी-कभी पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हैं; लेकिन जो अपेक्षाकृत अच्छी काबिलियत वाले हैं, मगर ईमानदारी से विश्वास नहीं करते, वे पवित्र आत्मा की उपस्थिति प्राप्त कर ही नहीं सकते। ऐसे लोगों के उद्धार की कोई संभावना नहीं है। यदि वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ें या कभी-कभी उपदेश सुनें, या परमेश्वर की स्तुति गाएं, तब भी वे अंतत: विश्राम के समय तक बच नहीं पाएंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

अय्यूब अपनी जीवनशैली में अनुशासित था, और उसे मिले परमेश्वर के आशीषों के परिणामस्वरूप वह लोभी या सुखवादी नहीं था, और वह जीवन की गुणवत्ता में तल्लीन नहीं था। इसके बजाय, वह विनम्र और शालीन था, वह ठाठ-बाट का आदी नहीं था, और परमेश्वर के सामने वह सतर्क और सावधान था। वह परमेश्वर के अनुग्रहों और आशीषों पर बहुधा विचार करता था, और परमेश्वर से निरंतर भयभीत रहता था। अपने दैनिक जीवन में, अय्यूब अपने पुत्र और पुत्रियों के हेतु होमबलि चढ़ाने के लिए प्रायः जल्दी उठ जाता था। दूसरे शब्दों में, न केवल अय्यूब स्वयं परमेश्वर का भय मानता था, बल्कि वह यह आशा भी करता था कि उसके बच्चे भी उसी प्रकार परमेश्वर का भय मानेंगे और परमेश्वर के विरुद्ध पाप नहीं करेंगे। अय्यूब की भौतिक संपदा का उसके हृदय में कोई स्थान नहीं था, न ही उसने परमेश्वर द्वारा ग्रहित स्थान लिया था; चाहे वे स्वयं अपने लिए हों या अपने बच्चों के लिए, अय्यूब के सभी दैनिक कार्यकलाप परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने से जुड़े थे। यहोवा परमेश्वर का उसका भय उसके मुँह तक ही नहीं रुका, बल्कि वह कुछ ऐसा था जिसे उसने क्रियान्वित किया था और जो उसके दैनिक जीवन के प्रत्येक और सभी भागों में प्रतिबिंबित होता था। अय्यूब का यह वास्तविक आचरण हमें दिखाता है कि वह ईमानदार था, और उस सार से युक्त था जो न्याय और उन चीज़ो से जो सकारात्मक थीं प्रेम करता था। अय्यूब अपने पुत्रों और पुत्रियों को प्रायः भेजता और पवित्र करता था, इसका अर्थ है कि उसने अपने बच्चों के व्यवहार को स्वीकृति नहीं दी थी या अनुमोदित नहीं किया था; इसके बजाय, अपने हृदय में वह उनके व्यवहार से असंतुष्ट था, और उनकी भर्त्सना करता था। उसने निष्कर्ष निकाला कि उसके पुत्र और पुत्रियों का व्यवहार यहोवा परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला नहीं था, और इसलिए वह प्रायः उनसे यहोवा परमेश्वर के सामने जाने और अपने पाप स्वीकार करने के लिए कहता था। अय्यूब के कार्यकलाप हमें उसकी मानवता का दूसरा पक्ष दिखाते हैं, वह पक्ष जिसमें वह कभी उनके साथ नहीं चलता था जो अक्सर पाप करते थे और परमेश्वर को नाराज़ करते थे, बल्कि इसके बजाय वह उनसे दूर रहता था और उनसे बचता था। यद्यपि ये लोग उसके पुत्र और पुत्रियाँ थे, फिर भी उसने अपने सिद्धांत इसलिए नहीं छोड़े कि वे उसके अपने सगे-संबंधी थे, न ही वह अपने मनोभावों के कारण उनके पापों में लिप्त हुआ। अपितु, उसने उनसे स्वीकार करने और यहोवा परमेश्वर की क्षमा प्राप्त करने का आग्रह किया, और उसने उन्हें चेताया कि वे अपने लोभी आनंद के वास्ते परमेश्वर को न तजें। दूसरों के साथ अय्यूब के व्यवहार के सिद्धांत उसके परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के सिद्धांतों से अलग नहीं किए जा सकते हैं। वह उससे प्रेम करता था जो परमेश्वर द्वारा स्वीकृत था, और उनसे घृणा करता था जो परमेश्वर के लिए घृणास्पद थे; और वह उनसे प्रेम करता था जो अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानते थे, और उनसे घृणा करता था जो परमेश्वर के विरुद्ध बुराई या पाप करते थे। ऐसा प्रेम और ऐसी घृणा उसके दैनिक जीवन में प्रदर्शित होती थी, और यह अय्यूब का वही खरापन था जिसे परमेश्वर की नज़रों से देखा गया था। स्वाभाविक रूप से, यह उसके दिन-प्रतिदिन के जीवन में दूसरों के साथ उसके रिश्तों में अय्यूब की सच्ची मानवता की अभिव्यक्ति और जीवन यापन भी है, जिसके बारे में हमें अवश्य सीखना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

अय्यूब की मानवता का एक और पहलू उसके और उसकी पत्नी के बीच इस संवाद में प्रदर्शित होता है : "तब उसकी स्त्री उससे कहने लगी, 'क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा।' उसने उससे कहा, 'तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दु:ख न लें?'" (अय्यूब 2:9-10)। वह जो यंत्रणा भुगत रहा था उसे देखकर, अय्यूब की पत्नी ने उसे इस यंत्रणा से बच निकलने में सहायता करने के लिए सलाह देने की कोशिश की, तो भी उसके "भले इरादों" को अय्यूब की स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई; इसके बजाय, उन्होंने उसका क्रोध भड़का दिया, क्योंकि उसने यहोवा परमेश्वर में उसके विश्वास और उसके प्रति उसकी आज्ञाकारिता को नकारा था, और यहोवा परमेश्वर के अस्तित्व को भी नकारा था। यह अय्यूब के लिए असहनीय था, क्योंकि उसने, दूसरों की तो बात ही छोड़ दें, स्वयं अपने को भी कभी ऐसा कुछ नहीं करने दिया था जो परमेश्वर का विरोध करता हो या उसे ठेस पहुँचाता हो। उस समय वह कैसे चुपचाप रह सकता था जब उसने दूसरों को ऐसे वचन बोलते देखा जो परमेश्वर की निंदा और उसका अपमान करते थे? इस प्रकार उसने अपनी पत्नी को "मूढ़ स्त्री" कहा। अपनी पत्नी के प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति क्रोध और घृणा, और साथ ही भर्त्सना और फटकार की थी। यह अय्यूब की मानवता की—प्रेम और घृणा के बीच अंतर करने की—स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी, और उसकी खरी मानवता का सच्चा निरूपण था। अय्यूब में न्याय की एक समझ थी—ऐसी समझ जिसकी बदौलत वह दुष्टता की हवाओं और ज्वारों से नफ़रत करता था, और अनर्गल मतांतरों, बेतुके तर्कों, और हास्यास्पद दावों से घृणा, उनकी भर्त्सना और उन्हें अस्वीकार करता था, और वह स्वयं अपने, सही सिद्धांतों और रवैये को उस समय सच्चाई से थामे रह सका जब उसे भीड़ के द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था और उन लोगों द्वारा छोड़ दिया गया था जो उसके क़रीबी थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

हालाँकि अनेक लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे बाहर से बेहद आध्यात्मिक भी दिख सकते हैं, लेकिन बच्चों के प्रति माता-पिता और माता-पिता के प्रति बच्चों के विचारों और रवैये के मामले में, वे अनजान होते हैं कि सत्य के इस पहलू को अभ्यास में कैसे लाया जाए, और इन मसलों से निपटने और इन्हें हल करने में किन सिद्धांतों को लागू किया जाना चाहिए। एक अभिभावक की दृष्टि में, अभिभावक हमेशा अभिभावक रहता है और बच्चा हमेशा बच्चा रहता है; इस तरह, अभिभावक और बच्चे के बीच के रिश्ता को संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है। वास्तव में, बहुत-से मामलों में, माता-पिता अपने माता-पिता होने के दर्जे पर अड़े रहते हैं। वे हमेशा खुद को बड़ों के रूप में देखते हैं, और वे सोचते हैं कि बच्चों को हर समय अपने माता-पिता की बात सुननी चाहिए और यह तथ्य कभी नहीं बदलेगा। परिणाम यह होता है कि उनके बच्चे लगातार विरोध करते रहते हैं। इस तरह के दृष्टिकोण से दोनों पक्ष उदास, अत्यंत दुःखी, और थका-हारा महसूस करते हैं। क्या यह सत्य को न समझने की अभिव्यक्ति नहीं है? जब लोग सत्य को नहीं समझते, तो वे हमेशा ओहदे से बँधे रहते हैं। इसके परिणामस्वरूप उन्हें पीड़ा न मिले, ये कैसे हो सकता है? तो फिर, ऐसे मामलों में, सत्य का अभ्यास कैसे किया जाना चाहिए? (अपने आपको मुक्त कर देना।) मुक्त कर देने का क्या अर्थ है? वास्तव में मुक्त कर देने के लिए तुम्हें इस मामले के साथ किस प्रकार के दृष्टिकोण और रवैये से पेश आना चाहिए? इस मुक्त कर देने को तुम कार्यान्वित कैसे करोगे? वास्तव में यह बहुत सरल है। तुम्हें एक साधारण व्यक्ति होना चाहिए, और किसी ओहदे से नहीं बँधना चाहिए। अपने बच्चों और अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम सामान्य भाइयों या बहनों से करते हो। हालाँकि उनके प्रति तुम्हारी एक जिम्मेदारी है, और तुम्हारा उनके साथ खून का संबंध है, मगर फिर भी, तुम्हारी स्थिति और तुम्हारा दृष्टिकोण वैसा ही होना चाहिए जैसा दोस्तों या सामान्य भाई-बहनों के साथ होना चाहिए। तुम्हें एक अभिभावक की स्थिति में बिल्कुल नहीं होना चाहिए, और अपने बच्चों को ज़बरन रोककर नहीं रखना चाहिए, बाँधना नहीं चाहिए, या उनकी हर बात को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। तुम्हें उनसे एक बराबर के व्यक्ति के जैसा व्यव्हार करना चाहिए। तुम्हें उन्हें गलतियाँ करने, गलत बातें कहने, बचकानी और अपरिपक्व और मूर्खतापूर्ण हरकतें करने देनी चाहिए। चाहे कुछ भी हो जाए, तुम्हें उनके साथ बैठकर शांति से बात करनी चाहिए, और सच्चाई का पता लगाना चाहिए। इस तरह, तुम उनसे सही रवैये से बात कर रहे होगे, और समस्या हल हो जाएगी। यहाँ तुम क्या छोड़ रहे हो? तुम एक अभिभावक की स्थिति और ओहदे, अभिभावक होने के अहंकार, और उस सारी ज़िम्मेदारी को छोड़ रहे हो जो तुम्हें लगता है कि एक अभिभावक होने के नाते तुम्हें उठानी चाहिए। इसके बजाय, यह पर्याप्त है कि ज़िम्मेदारी के मामले में तुम एक साधारण भाई या बहन की तरह अपनी ओर से पूरी कोशिश करो। ... कई माता-पिता सोचते हैं कि अगर वे अपने बच्चों के भले के लिए कर रहे हैं, तो वे जो भी करेंगे वह सही होगा। वे सच में ऐसे विचार और दृष्टिकोण रखते हैं। तुम गलतियाँ कैसे नहीं कर सकते? तुम भी एक भ्रष्ट मनुष्य हो, इसलिए तुम यह कैसे तय कर सकते हो कि तुममें कोई दोष नहीं है? अगर तुम स्वीकार करते हो कि तुम्हें सत्य का ज्ञान नहीं है और तुम एक भ्रष्ट मनुष्य हो, तो तुममें दोष हैं और तुमसे गलतियाँ हो सकती हैं। तुम गलतियाँ कर सकते हो—फिर भी ऐसा क्यों होता है कि हर बार, तुम अपने बच्चों को नियंत्रित करने की कोशिश करते हो और उनसे लगातार अपनी बात मनवाते हो? क्या यह घमंडी स्वभाव नहीं है? यह घमंडी स्वभाव है, और साथ ही कठोर भी है।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

हर व्‍यक्ति की एक नियति है, और वह परमेश्‍वर द्वारा नियत किया गया है। कोई भी किसी दूसरे की नियति को नियंत्रित नहीं कर सकता, इसलिए जब तुम्‍हारे परिवार की बात आती है, तो आराम से सीखो कि सभी चीजों को कैसे छोड़ना और दरकिनार करना है। इसे तुम कैसे कर सकते हो? आंशिक रूप से, यह परमेश्‍वर की प्रार्थना करने के माध्‍यम से किया जाता है। तुम्‍हें इस पर भी विचार करना चाहिए : तुम्‍हारे परिवार के अविश्‍वासी सदस्‍य संसार के पीछे भागते रहते हैं, वे भौतिक संतुष्टि की खोज में लगे रहते हैं, वे संपत्ति की खोज में लगे रहते हैं—वे किस तरह के रास्ते पर चलते हैं? अगर तुम अपने कर्तव्‍य का पालन नहीं करते, और उनके साथ रहते हो, तो क्‍या इससे शायद तुम्‍हें पीड़ा और यातना नहीं भोगनी होगी? अगर तुम उनके साथ रहते हो, तो क्‍या उनके साथ निभा पाओगे? क्‍या तुम उनकी तरह सोचोगे? एक-दूसरे के प्रति स्नेह के अलावा क्या और कुछ है? नहीं। तो इस स्नेह की गहराई कितनी है? तुम उनकी इतनी ज्यादा चिंता करते हो, लेकिन वे तुम्‍हारे बारे में क्‍या महसूस करते हैं? क्‍या तुम उनके साथ रहते हुए सचमुच शांति और सुख पा सकते हो? यह तुम्हें केवल दुख और खालीपन ही दे सकता है। तुम उनके ही मार्ग पर नहीं चलते; दुनिया के प्रति, जीवन के प्रति, अपने जीवन के पथ के प्रति, जो तुम पाना चाहते हो, उसके प्रति तुम्‍हारा दृष्टिकोण—सब भिन्‍न हैं। आज, जब तुम अपने परिवार से अलग हो, तुम्हारे रक्‍त-संबंधों की वजह से हमेशा उनके प्रति एक अपनापन महसूस करते हो, और तुम्‍हें लगता है कि वे तुम्‍हारा परिवार हैं। लेकिन जब तुम सचमुच उनके साथ होते हो, तो एक साल भी नहीं बीतता है—एक महीने बाद, तुम्‍हें लगता है कि बहुत हो गया। तुम उनके विचारों को सुनना, लोगों के साथ व्यवहार करने का उनका तरीका, जीने के लिए उनके फलसफे, उनके मुँह में भरे झूठ, काम करने के उनके तौर-तरीके और साधन, जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण, या उनके मूल्‍य, तुम सहन नहीं कर सकते, और तुम मन-ही-मन सोचते हो, "हर समय मुझे इनकी कमी खलती थी, और लगातार डरता था कि उनका जीवन मुश्किल में है। लेकिन अब जब मैं इनके साथ रहता हूँ, मेरा जीवन असहनीय हो गया है!" तुम उनसे घृणा करने लगते हो। इस समय, तुम्हें स्‍पष्‍ट नहीं है कि वे किस तरह के लोग हैं, इसलिए तुम्‍हें अब भी लगता है कि रक्‍त-संबंध किसी भी अन्य चीज से ज्यादा महत्त्वपूर्ण, ज्यादा वास्‍तविक होते हैं। तुम अभी भी भावनाओं के वश में हो। अगर तुम भावनाओं के मामलों को एक तरफ़ रख सकते हो, तो ऐसा पूरी तरह से करो; अगर तुम यह नहीं कर सकते, तो अपने कर्तव्‍य को प्राथमिकता दो, तुम्‍हारा लक्ष्‍य और दायित्‍व ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं; पहले अपने दायित्‍व और लक्ष्‍य और कर्तव्‍य को पूरा करो, और बाकी चीजों को कुछ समय के लिए अनदेखा कर दो। जब लोग अपना दायित्‍व और कर्तव्‍य भली-भाँति पूरा कर लेते हैं, तो सत्य उनके लिए और स्‍पष्‍ट हो जाता है, परमेश्‍वर के साथ उनका संबंध लगातार सामान्‍य हो जाता है, परमेश्‍वर की आज्ञा का पालन करने की उनकी इच्छा बढ़ती चली जाती है, परमेश्‍वर में उनकी श्रद्धा और अधिक बढ़ती जाती है और ज्यादा स्‍पष्‍ट हो जाती है, और उनकी आंतरिक अवस्‍था में एक बदलाव आता है। एक बार जब तुम्‍हारी अवस्‍था बदल जाती है, तुम्‍हारे सांसारिक दृष्टिकोणो और लगाव धीरे-धीरे कम होते-होते गायब होने लगेंगे, और फिर तुम इस तरह की चीजों की खोज करना बंद कर दोगे। परमेश्वर को कैसे प्रेम करना है, परमेश्‍वर को कैसे संतुष्ट किया जाए, और कैसे सत्य के साथ जीवन जिया जाए, तुम्हारा हृदय इसकी खोज करेगा। जब तुम्‍हारा हृदय इस विषय में अथक प्रयास करेगा, तो वे चीजें जिनका संबंध देह के लगाव से है, धीरे-धीरे लुप्‍त हो जाएँगी, और फिर वे तुम्‍हें बंधन में जकड़ या नियंत्रित नहीं कर पाएँगी।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के समक्ष समर्पण से संबंधित अभ्यास के सिद्धांत' से उद्धृत

अतीत में बोले गए ये वचन, "जब कोई प्रभु पर विश्वास करता है, तो सौभाग्य उसके पूरे परिवार पर मुस्कराता है" अनुग्रह के युग के लिए उपयुक्त हैं, परंतु मानवता के गंतव्य से संबंधित नहीं हैं। ये केवल अनुग्रह के युग के दौरान एक चरण के लिए ही उपयुक्त थे। उन वचनों का अर्थ शांति और भौतिक आशीष पर आधारित था, जिनका लोगों ने आनंद लिया; उनका मतलब यह नहीं था कि प्रभु को मानने वाले का पूरा परिवार बच जाएगा, न ही उनका मतलब था कि जब कोई सौभाग्य पा लेता है, तो पूरे परिवार को भी विश्राम में लाया जा सकता है। किसी को आशीष मिलेगा या दुर्भाग्य सहना पड़ेगा, इसका निर्धारण व्यक्ति के सार के अनुसार होता है, न कि सामान्य सार के अनुसार, जो वह दूसरों के साथ साझा करता है। इस प्रकार की लोकोक्ति या नियम का राज्य में कोई स्थान है ही नहीं। यदि कोई अंत में बच पाता है, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि उसने परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा किया है और यदि कोई विश्राम के दिनों तक बचने में सक्षम नहीं हो पाता, तो इसलिए क्योंकि वे परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी रहे हैं और उन्होंने परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया है। प्रत्येक के पास एक उचित गंतव्य है। ये गंतव्य प्रत्येक व्यक्ति के सार के अनुसार निर्धारित किए जाते हैं और दूसरे लोगों से इनका कोई संबंध नहीं होता। किसी बच्चे का दुष्ट व्यवहार उसके माता-पिता को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता और न ही किसी बच्चे की धार्मिकता को उसके माता-पिता के साथ साझा किया जा सकता है। माता-पिता का दुष्ट आचरण उनकी संतानों को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता, न ही माता-पिता की धार्मिकता उनके बच्चों के साथ साझा की जा सकती है। हर कोई अपने-अपने पाप ढोता है और हर कोई अपने-अपने सौभाग्य का आनंद लेता है। कोई भी दूसरे का स्थान नहीं ले सकता; यही धार्मिकता है। मनुष्य के नज़रिए से, यदि माता-पिता अच्छा सौभाग्य पाते हैं, तो उनके बच्चों को भी मिलना चाहिए, यदि बच्चे बुरा करते हैं, तो उनके पापों के लिए माता-पिता को प्रायश्चित करना चाहिए। यह मनुष्य का दृष्टिकोण है और कार्य करने का मनुष्य का तरीक़ा है; यह परमेश्वर का दृष्टिकोण नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम का निर्धारण उसके आचरण से पैदा होने वाले सार के अनुसार होता है और इसका निर्धारण सदैव उचित तरीक़े से होता है। कोई भी दूसरे के पापों को नहीं ढो सकता; यहाँ तक कि कोई भी दूसरे के बदले दंड नहीं पा सकता। यह सुनिश्चित है। माता-पिता द्वारा अपनी संतान की बहुत ज़्यादा देखभाल का अर्थ यह नहीं कि वे अपनी संतान के बदले धार्मिकता के कर्म कर सकते हैं, न ही किसी बच्चे के माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ स्नेह का यह अर्थ है कि वे अपने माता-पिता के लिए धार्मिकता के कर्म कर सकते हैं। यही इन वचनों का वास्तविक अर्थ है, "उस समय दो जन खेत में होंगे; एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। दो स्त्रियाँ चक्‍की पीसती रहेंगी; एक ले ली जाएगी और दूसरी छोड़ दी जाएगी।" लोग बुरा करने वाले बच्चों के प्रति गहरे प्रेम के आधार पर उन्हें विश्राम में नहीं ले जा सकते, न ही कोई अपनी पत्नी (या पति) को अपने धार्मिक आचरण के आधार पर विश्राम में ले जा सकता है। यह एक प्रशासनिक नियम है; किसी के लिए कोई अपवाद नहीं हो सकता। अंत में, धार्मिकता करने वाले धार्मिकता ही करते हैं और बुरा करने वाले, बुरा ही करते हैं। अंतत: धार्मिकों को बचने की अनुमति मिलेगी, जबकि बुरा करने वाले नष्ट हो जाएंगे। पवित्र, पवित्र हैं; वे गंदे नहीं हैं। गंदे, गंदे हैं और उनमें पवित्रता का एक भी अंश नहीं है। जो लोग नष्ट किए जाएँगे, वे सभी दुष्ट हैं और जो बचेंगे वे सभी धार्मिक हैं—भले ही बुरा कार्य करने वालों की संतानें धार्मिक कर्म करें और भले ही किसी धार्मिक व्यक्ति के माता-पिता दुष्टता के कर्म करें। एक विश्वास करने वाले पति और विश्वास न करने वाली पत्नी के बीच कोई संबंध नहीं होता और विश्वास करने वाले बच्चों और विश्वास न करने वाले माता-पिता के बीच कोई संबंध नहीं होता; ये दोनों तरह के लोग पूरी तरह असंगत हैं। विश्राम में प्रवेश से पहले एक व्यक्ति के रक्त-संबंधी होते हैं, किंतु एक बार जब उसने विश्राम में प्रवेश कर लिया, तो उसके कोई रक्त-संबंधी नहीं होंगे। जो अपना कर्तव्य करते हैं, उनके शत्रु हैं जो कर्तव्य नहीं करते हैं; जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं और जो उससे घृणा करते हैं, एक दूसरे के उलट हैं। जो विश्राम में प्रवेश करेंगे और जो नष्ट किए जा चुके होंगे, दो अलग-अलग असंगत प्रकार के प्राणी हैं। जो प्राणी अपने कर्तव्य निभाते हैं, बचने में समर्थ होंगे, जबकि वे जो अपने कर्तव्य नहीं निभाते, विनाश की वस्तु बनेंगे; इसके अलावा, यह सब अनंत काल के लिए होगा। क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए अपने पति से प्रेम करती हो? क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपने कर्तव्य पूरा करने के लिए अपनी पत्नी से प्रेम करते हो? क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपने नास्तिक माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ हो? परमेश्वर पर विश्वास करने के मामले में मनुष्य का दृष्टिकोण सही या ग़लत है? तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? तुम क्या पाना चाहते हो? तुम परमेश्वर से कैसे प्रेम करते हो? जो लोग पैदा हुए प्राणियों के रूप में अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर सकते और जो पूरा प्रयास नहीं कर सकते, वे विनाश की वस्तु बनेंगे। आज लोगों में एक दूसरे के बीच भौतिक संबंध होते हैं, उनके बीच खून के रिश्ते होते हैं, किंतु भविष्य में, यह सब ध्वस्त हो जाएगा। विश्वासी और अविश्वासी संगत नहीं हैं, बल्कि वे एक दूसरे के विरोधी हैं। वे जो विश्राम में हैं, विश्वास करेंगे कि कोई परमेश्वर है और उसके प्रति समर्पित होंगे, जबकि वे जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं, वे सब नष्ट कर दिए गए होंगे। पृथ्वी पर परिवारों का अब और अस्तित्व नहीं होगा; तो माता-पिता या संतानें या पतियों और पत्नियों के बीच के रिश्ते कैसे हो सकते हैं? विश्वास और अविश्वास की अत्यंत असंगतता से ये संबंध पूरी तरह टूट चुके होंगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

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