147. पत्नी, पति और बच्चों के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) अगर कोई पत्नी, पति, और उनके बच्चे, सभी परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो उन्हें अक्सर उसके वचनों को पढ़ना चाहिए, सत्य पर सहभागिता करनी चाहिए, एक दूसरे की सहायता करनी चाहिए, और प्रभु के रूप में मसीह का सम्मान करना चाहिए;

(2) यदि कोई पत्नी, पति, या बच्चे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, फिर भी वे विश्वास के विरोध में नहीं होते, तो उन्हें परमेश्वर की गवाही और सच्चाई पर सहभागिता दी जानी चाहिए, जब तक कि ऐसा करना सुसमाचार फैलाने के सिद्धांतों के साथ मेल खाता हो;

(3) एक पत्नी, पति, या बच्चा जो परमेश्वर में विश्वास का विरोध करता हो और सत्य से नफ़रत करता हो, उसके साथ समझदारी से पेश आना चाहिए। बुरे लोगों को परमेश्वर में विश्वास करने में शामिल नहीं करना चाहिए;

(4) किसी के द्वारा परिवार को त्याग देने का निर्णय, क्या उसके परिवार के अविश्वासी सदस्य उसका विरोध करते या उसे सताते हैं, इस आधार पर, और साथ ही इस तरह के उत्पीड़न की मात्रा के आधार पर, किया जाना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर के वचनों में, लोगों को एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए इसके संबंध में कौन से सिद्धांत का उल्लेख किया गया है? उससे प्रेम करो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, और उससे नफ़रत करो जिससे परमेश्वर नफ़रत करता है। अर्थात्, परमेश्वर जिन्हें प्यार करता है, लोग जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित करते हैं, ये वही लोग हैं जिनसे तुम्हें प्रेम करना चाहिए। जो लोग परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित नहीं करते हैं, परमेश्वर से घृणा करते हैं, उसकी अवज्ञा करते हैं, और जिनसे वो नफरत करता है, ये ही वे लोग हैं जिन्हें हमें भी तिरस्कृत और अस्वीकार करना चाहिए। यही है वह जो परमेश्वर के वचन द्वारा अपेक्षित है। यदि तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, तो वे उससे नफ़रत करते हैं; और अगर वे उससे नफरत करते हैं, तो परमेश्वर निश्चित रूप से उनसे घृणा करता है। इसलिए, यदि तुम्हें अपने माता-पिता से नफ़रत करने के लिए कहा जाए, तो क्या तुम ऐसा कर सकोगे? यदि वे परमेश्वर का विरोध करते और उसे बुरा-भला कहते हैं, तो वे निश्चित रूप से ऐसे लोग हैं जिनसे वह घृणा करता है और शाप देता है। इन परिस्थितियों में, तुम्हें अपने माता-पिता के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, यदि वे परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास में बाधा डालते हैं, या यदि वे नहीं डालते हैं? अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु ने कहा, "कौन है मेरी माता? और कौन हैं मेरे भाई? ... क्योंकि जो कोई मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और मेरी बहिन, और मेरी माता है।" यह कहावत अनुग्रह के युग में पहले से मौजूद थी, और अब परमेश्वर के वचन और भी अधिक उपयुक्त हैं : "उससे प्रेम करो, जिससे परमेश्वर प्रेम करता है और उससे घृणा करो, जिससे परमेश्वर घृणा करता है।" ये वचन बिलकुल सीधे हैं, फिर भी लोग अकसर इनका वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाते।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

सगे-संबंधी जो विश्वास नहीं रखते (तुम्हारे बच्चे, तुम्हारे पति या पत्नी, तुम्हारी बहनें या तुम्हारे माता-पिता इत्यादि) उन्हें कलीसिया में आने को बाध्य नहीं करना चाहिए। परमेश्वर के घर में सदस्यों की कमी नहीं है और ऐसे लोगों से इसकी संख्या बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं, जिनका कोई उपयोग नहीं है। वे सभी जो ख़ुशी-ख़ुशी विश्वास नहीं करते, उन्हें कलीसिया में बिल्कुल नहीं ले जाना चाहिए। यह आदेश सब लोगों पर निर्देशित है। इस मामले में तुम लोगों को एक दूसरे की जाँच, निगरानी करनी चाहिए और याद दिलाना चाहिए; कोई भी इसका उल्लंघन नहीं कर सकता। यहाँ तक कि जब ऐसे सगे-संबंधी जो विश्वास नहीं करते, अनिच्छा से कलीसिया में प्रवेश करते हैं, उन्हें किताबें जारी नहीं की जानी चाहिए या नया नाम नहीं देना चाहिए; ऐसे लोग परमेश्वर के घर के नहीं हैं और कलीसिया में उनके प्रवेश पर जैसे भी ज़रूरी हो, रोक लगाई जानी चाहिए। यदि दुष्टात्माओं के आक्रमण के कारण कलीसिया पर समस्या आती है, तो तुम निर्वासित कर दिए जाओगे या तुम पर प्रतिबंध लगा दिये जाएँगे। संक्षेप में, इस मामले में हरेक का उत्तरदायित्व है, हालांकि तुम्हें असावधान नहीं होना चाहिए, न ही इसका इस्तेमाल निजी बदला लेने के लिए करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दस प्रशासनिक आदेश जो राज्य के युग में परमेश्वर के चुने लोगों द्वारा पालन किए जाने चाहिए' से उद्धृत

जो अपने सर्वथा अविश्वासी बच्चों और रिश्तेदारों को कलीसिया में खींचकर लाते हैं, वे बेहद स्वार्थी हैं और सिर्फ़ अपनी दयालुता का प्रदर्शन कर रहे हैं। ये लोग इसकी परवाह किए बिना कि उनका विश्वास है भी या नहीं और यह परमेश्वर की इच्छा है या नहीं, केवल प्रेमपूर्ण बने रहने पर ध्यान देते हैं। कुछ लोग अपनी पत्नी को परमेश्वर के सामने लाते हैं या अपने माता-पिता को परमेश्वर के सामने खींचकर लाते हैं और इसकी परवाह किए बिना कि क्या पवित्र आत्मा सहमत है या उनमें कार्य कर रहा है, वे आँखें बंद कर परमेश्वर के लिए "प्रतिभाशाली लोगों को अपनाते रहते हैं"। इन गैर-विश्वासियों के प्रति दयालुता दिखाने से आखिर क्या लाभ मिल सकता है? यहाँ तक कि अगर वे जिनमें पवित्र आत्मा उपस्थित नहीं है, परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए संघर्ष भी करते हैं, तब भी उन्हें बचाया नहीं जा सकता। जो लोग उद्धार प्राप्त कर सकते हैं, उनके लिए वास्तव में इसे प्राप्त करना उतना आसान नहीं है। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य और परीक्षणों से नहीं गुज़रे हैं और देहधारी परमेश्वर के द्वारा पूर्ण नहीं बनाए गए हैं, वे पूर्ण बनाए जाने में सर्वथा असमर्थ हैं। इसलिए जिस क्षण से वे नाममात्र के लिए परमेश्वर का अनुसरण आरंभ करते हैं, उन लोगों में पवित्र आत्मा मौजूद नहीं होता। उनकी स्थिति और वास्तविक अवस्थाओं के प्रकाश में, उन्हें पूर्ण बनाया ही नहीं जा सकता। इसलिए, पवित्र आत्मा उन पर अधिक ऊर्जा व्यय न करने का निर्णय लेता है, न ही वह उन्हें किसी प्रकार का प्रबोधन प्रदान करता है, न उनका मार्गदर्शन करता है; वह उन्हें केवल साथ चलने की अनुमति देता है और अंततः उनके परिणाम प्रकट करेगा—यही पर्याप्त है। मानवता का उत्साह और इच्छाएँ शैतान से आते हैं और किसी भी तरह ये चीज़ें पवित्र आत्मा का कार्य पूर्ण नहीं कर सकतीं। चाहे लोग किसी भी प्रकार के हों, उनमें पवित्र आत्मा का कार्य अवश्य होना चाहिए। क्या मनुष्य दूसरे मनुष्यों को पूरा कर सकते हैं? पति अपनी पत्नी से क्यों प्रेम करता है? पत्नी अपने पति से क्यों प्रेम करती है? बच्चे क्यों माता-पिता के प्रति कर्तव्यशील रहते हैं? और माता-पिता क्यों अपने बच्चों से अतिशय स्नेह करते हैं? लोग वास्तव में किस प्रकार की इच्छाएँ पालते हैं? क्या उनकी मंशा उनकी खुद की योजनाओं और स्वार्थी आकांक्षाओं को पूरा करने की नहीं है? क्या उनका इरादा वास्तव में परमेश्वर की प्रबंधन योजना के लिए कार्य करने का है? क्या वे परमेश्वर के कार्य के लिए कार्य कर रहे हैं? क्या उनकी मंशा सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा करने की है? वे जो परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू करने के समय से पवित्र आत्मा की उपस्थिति को नहीं पा सके हैं, वे कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं पा सकते; ये लोग विनाश की वस्तुओं के रूप में नामित किए गए हैं। इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि कोई उनसे कितना प्रेम करता है, यह पवित्र आत्मा के कार्य का स्थान नहीं ले सकता। लोगों का उत्साह और प्रेम, मानवीय इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करता है, पर परमेश्वर की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता और न ही वे परमेश्वर के कार्य का स्थान ले सकते हैं। यहाँ तक कि अगर कोई उन लोगों के प्रति अत्यधिक प्रेम या दया दिखा भी दे, जो नाममात्र के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उसके अनुसरण का दिखावा करते हैं, बिना यह जाने कि वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करने का क्या मतलब है, फिर भी वे परमेश्वर की सहानुभूति प्राप्त नहीं करेंगे, न ही वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करेंगे। भले ही जो लोग ईमानदारी से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं कमज़ोर काबिलियत वाले हों, और बहुत सी सच्चाइयाँ न समझते हों, वे तब भी कभी-कभी पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हैं; लेकिन जो अपेक्षाकृत अच्छी काबिलियत वाले हैं, मगर ईमानदारी से विश्वास नहीं करते, वे पवित्र आत्मा की उपस्थिति प्राप्त कर ही नहीं सकते। ऐसे लोगों के उद्धार की कोई संभावना नहीं है। यदि वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ें या कभी-कभी उपदेश सुनें, या परमेश्वर की स्तुति गाएं, तब भी वे अंतत: विश्राम के समय तक बच नहीं पाएंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

न केवल अय्यूब स्वयं परमेश्वर का भय मानता था, बल्कि वह यह आशा भी करता था कि उसके बच्चे भी उसी प्रकार परमेश्वर का भय मानेंगे और परमेश्वर के विरुद्ध पाप नहीं करेंगे। अय्यूब की भौतिक संपदा का उसके हृदय में कोई स्थान नहीं था, न ही उसने परमेश्वर द्वारा ग्रहित स्थान लिया था; चाहे वे स्वयं अपने लिए हों या अपने बच्चों के लिए, अय्यूब के सभी दैनिक कार्यकलाप परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने से जुड़े थे। यहोवा परमेश्वर का उसका भय उसके मुँह तक ही नहीं रुका, बल्कि वह कुछ ऐसा था जिसे उसने क्रियान्वित किया था और जो उसके दैनिक जीवन के प्रत्येक और सभी भागों में प्रतिबिंबित होता था। अय्यूब का यह वास्तविक आचरण हमें दिखाता है कि वह ईमानदार था, और उस सार से युक्त था जो न्याय और उन चीज़ो से जो सकारात्मक थीं प्रेम करता था। अय्यूब अपने पुत्रों और पुत्रियों को प्रायः भेजता और पवित्र करता था, इसका अर्थ है कि उसने अपने बच्चों के व्यवहार को स्वीकृति नहीं दी थी या अनुमोदित नहीं किया था; इसके बजाय, अपने हृदय में वह उनके व्यवहार से असंतुष्ट था, और उनकी भर्त्सना करता था। उसने निष्कर्ष निकाला कि उसके पुत्र और पुत्रियों का व्यवहार यहोवा परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला नहीं था, और इसलिए वह प्रायः उनसे यहोवा परमेश्वर के सामने जाने और अपने पाप स्वीकार करने के लिए कहता था। अय्यूब के कार्यकलाप हमें उसकी मानवता का दूसरा पक्ष दिखाते हैं, वह पक्ष जिसमें वह कभी उनके साथ नहीं चलता था जो अक्सर पाप करते थे और परमेश्वर को नाराज़ करते थे, बल्कि इसके बजाय वह उनसे दूर रहता था और उनसे बचता था। यद्यपि ये लोग उसके पुत्र और पुत्रियाँ थे, फिर भी उसने अपने सिद्धांत इसलिए नहीं छोड़े कि वे उसके अपने सगे-संबंधी थे, न ही वह अपने मनोभावों के कारण उनके पापों में लिप्त हुआ। अपितु, उसने उनसे स्वीकार करने और यहोवा परमेश्वर की क्षमा प्राप्त करने का आग्रह किया, और उसने उन्हें चेताया कि वे अपने लोभी आनंद के वास्ते परमेश्वर को न तजें। दूसरों के साथ अय्यूब के व्यवहार के सिद्धांत उसके परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के सिद्धांतों से अलग नहीं किए जा सकते हैं। वह उससे प्रेम करता था जो परमेश्वर द्वारा स्वीकृत था, और उनसे घृणा करता था जो परमेश्वर के लिए घृणास्पद थे; और वह उनसे प्रेम करता था जो अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानते थे, और उनसे घृणा करता था जो परमेश्वर के विरुद्ध बुराई या पाप करते थे। ऐसा प्रेम और ऐसी घृणा उसके दैनिक जीवन में प्रदर्शित होती थी, और यह अय्यूब का वही खरापन था जिसे परमेश्वर की नज़रों से देखा गया था। स्वाभाविक रूप से, यह उसके दिन-प्रतिदिन के जीवन में दूसरों के साथ उसके रिश्तों में अय्यूब की सच्ची मानवता की अभिव्यक्ति और जीवन यापन भी है, जिसके बारे में हमें अवश्य सीखना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

अय्यूब द्वारा प्रेम और घृणा का विभाजन

अय्यूब की मानवता का एक और पहलू उसके और उसकी पत्नी के बीच इस संवाद में प्रदर्शित होता है : "तब उसकी स्त्री उससे कहने लगी, 'क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा।' उसने उससे कहा, 'तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दु:ख न लें?'" (अय्यूब 2:9-10)। वह जो यंत्रणा भुगत रहा था उसे देखकर, अय्यूब की पत्नी ने उसे इस यंत्रणा से बच निकलने में सहायता करने के लिए सलाह देने की कोशिश की, तो भी उसके "भले इरादों" को अय्यूब की स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई; इसके बजाय, उन्होंने उसका क्रोध भड़का दिया, क्योंकि उसने यहोवा परमेश्वर में उसके विश्वास और उसके प्रति उसकी आज्ञाकारिता को नकारा था, और यहोवा परमेश्वर के अस्तित्व को भी नकारा था। यह अय्यूब के लिए असहनीय था, क्योंकि उसने, दूसरों की तो बात ही छोड़ दें, स्वयं अपने को भी कभी ऐसा कुछ नहीं करने दिया था जो परमेश्वर का विरोध करता हो या उसे ठेस पहुँचाता हो। उस समय वह कैसे चुपचाप रह सकता था जब उसने दूसरों को ऐसे वचन बोलते देखा जो परमेश्वर की निंदा और उसका अपमान करते थे? इस प्रकार उसने अपनी पत्नी को "मूढ़ स्त्री" कहा। अपनी पत्नी के प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति क्रोध और घृणा, और साथ ही भर्त्सना और फटकार की थी। यह अय्यूब की मानवता की—प्रेम और घृणा के बीच अंतर करने की—स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी, और उसकी खरी मानवता का सच्चा निरूपण था। अय्यूब में न्याय की एक समझ थी—ऐसी समझ जिसकी बदौलत वह दुष्टता की हवाओं और ज्वारों से नफ़रत करता था, और अनर्गल मतांतरों, बेतुके तर्कों, और हास्यास्पद दावों से घृणा, उनकी भर्त्सना और उन्हें अस्वीकार करता था, और वह स्वयं अपने, सही सिद्धांतों और रवैये को उस समय सच्चाई से थामे रह सका जब उसे भीड़ के द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था और उन लोगों द्वारा छोड़ दिया गया था जो उसके क़रीबी थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

हालाँकि अनेक लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे बाहर से बेहद आध्यात्मिक भी दिख सकते हैं, लेकिन बच्चों के प्रति माता-पिता और माता-पिता के प्रति बच्चों के विचारों और रवैये के मामले में, वे अनजान होते हैं कि सत्य के इस पहलू को अभ्यास में कैसे लाया जाए, और इन मसलों से निपटने और इन्हें हल करने में किन सिद्धांतों को लागू किया जाना चाहिए। एक अभिभावक की दृष्टि में, अभिभावक हमेशा अभिभावक रहता है और बच्चा हमेशा बच्चा रहता है; इस तरह, अभिभावक और बच्चे के बीच के रिश्ता को संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है। वास्तव में, बहुत-से मामलों में, माता-पिता अपने माता-पिता होने के दर्जे पर अड़े रहते हैं। वे हमेशा खुद को बड़ों के रूप में देखते हैं, और वे सोचते हैं कि बच्चों को हर समय अपने माता-पिता की बात सुननी चाहिए और यह तथ्य कभी नहीं बदलेगा। परिणाम यह होता है कि उनके बच्चे लगातार विरोध करते रहते हैं। इस तरह के दृष्टिकोण से दोनों पक्ष उदास, अत्यंत दुःखी, और थका-हारा महसूस करते हैं। क्या यह सत्य को न समझने की अभिव्यक्ति नहीं है? जब लोग सत्य को नहीं समझते, तो वे हमेशा ओहदे से बँधे रहते हैं। इसके परिणामस्वरूप उन्हें पीड़ा न मिले, ये कैसे हो सकता है? तो फिर, ऐसे मामलों में, सत्य का अभ्यास कैसे किया जाना चाहिए? वास्तव में यह बहुत सरल है। तुम्हें एक साधारण व्यक्ति होना चाहिए, और किसी ओहदे से नहीं बँधना चाहिए। अपने बच्चों और अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम सामान्य भाइयों या बहनों से करते हो। हालाँकि उनके प्रति तुम्हारी एक जिम्मेदारी है, और तुम्हारा उनके साथ खून का संबंध है, मगर फिर भी, तुम्हारी स्थिति और तुम्हारा दृष्टिकोण वैसा ही होना चाहिए जैसा दोस्तों या सामान्य भाई-बहनों के साथ होना चाहिए। तुम्हें एक अभिभावक की स्थिति में बिल्कुल नहीं होना चाहिए, और अपने बच्चों को ज़बरन रोककर नहीं रखना चाहिए, बाँधना नहीं चाहिए, या उनकी हर बात को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। तुम्हें उनसे एक बराबर के व्यक्ति के जैसा व्यव्हार करना चाहिए। तुम्हें उन्हें गलतियाँ करने, गलत बातें कहने, बचकानी और अपरिपक्व और मूर्खतापूर्ण हरकतें करने देनी चाहिए। चाहे कुछ भी हो जाए, तुम्हें उनके साथ बैठकर शांति से बात करनी चाहिए, और सच्चाई का पता लगाना चाहिए। इस तरह, तुम उनसे सही रवैये से बात कर रहे होगे, और समस्या हल हो जाएगी। यहाँ तुम क्या छोड़ रहे हो? तुम एक अभिभावक की स्थिति और ओहदे, अभिभावक होने के अहंकार, और उस सारी ज़िम्मेदारी को छोड़ रहे हो जो तुम्हें लगता है कि एक अभिभावक होने के नाते तुम्हें उठानी चाहिए। इसके बजाय, यह पर्याप्त है कि ज़िम्मेदारी के मामले में तुम एक साधारण भाई या बहन की तरह अपनी ओर से पूरी कोशिश करो। ... इसके अलावा, कई माता-पिता सोचते हैं कि अगर वे अपने बच्चों के भले के लिए कर रहे हैं, तो वे जो भी करेंगे वह सही होगा। वे सच में ऐसे विचार और दृष्टिकोण रखते हैं। तुम गलतियाँ कैसे नहीं कर सकते? तुम भी एक भ्रष्ट मनुष्य हो, इसलिए तुम यह कैसे तय कर सकते हो कि तुममें कोई दोष नहीं है? अगर तुम स्वीकार करते हो कि तुम्हें सत्य का ज्ञान नहीं है और तुम एक भ्रष्ट मनुष्य हो, तो तुममें दोष हैं और तुमसे गलतियाँ हो सकती हैं। तुम गलतियाँ कर सकते हो—फिर भी ऐसा क्यों होता है कि हर बार, तुम अपने बच्चों को नियंत्रित करने की कोशिश करते हो और उनसे लगातार अपनी बात मनवाते हो? क्या यह घमंडी स्वभाव नहीं है? यह घमंडी स्वभाव है, और साथ ही कठोर भी है।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

प्रत्येक व्यक्ति जो हमारे वर्तमान समाज में रहता है, चाहे उसने कितनी भी शिक्षा प्राप्त की हो, अपनी सोच और अपने नज़रिए के भीतर कई चीज़ें रखता है। विशेष रूप से, पारंपरिक चीनी महिलाएँ यह मानती हैं कि एक महिला का स्थान घर में होता है, कि महिलाओं को अच्छी पत्नियाँ और माताएँ बनना चाहिए जो अपना पूरा जीवन अपने पति और बच्चों के लिए व्यतीत और समर्पित कर दें। अपने परिवार के लिए एक दिन में तीन बार भोजन बनाना, साफ़-सफाई करना, कपड़े धोना—उन्हें घर में यह सब कुछ करना चाहिए, और इसे असाधारण रूप से अच्छी तरह से करना चाहिए। यह निश्चित रूप से, "अच्छी पत्नी और माँ" बनने के लिए हमारे समाज का मानक है। हर महिला का मानना है कि उसे इसी तरह से काम करना चाहिए, और अगर वह नहीं करती है, तो वह एक अच्छी महिला नहीं होगी, और वह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ के खिलाफ़ चली गई होगी, और नैतिकता के मानकों का उल्लंघन कर लेगी। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने इस भूमिका को खराब तरीके से निभाया है या समाज के मानकों की परवाह नहीं की है, और अब वे अंतरात्मा की आवाज़ से तिलमिला उठे हैं, और महसूस करते हैं कि उन्होंने अपने बच्चों और अपने पति के साथ अन्याय किया है। क्या परमेश्वर में विश्वास करना और अपने कर्तव्य को निभाने के लिए बुलाया जाना तुम्हारे द्वारा एक अच्छी पत्नी और माँ, एक आदर्श माँ, एक महिला जो मानकों के अनुरूप हो, बनने के साथ संघर्ष पैदा करता है? यदि तुम एक अच्छी पत्नी और माँ बनने की इच्छा रखती हो, तो तुम अपना सौ प्रतिशत समय अपने कर्तव्य को ही निभाने पर नहीं लगा सकती हो। जब एक पत्नी और माँ होने की भूमिका और तुम्हारे कर्तव्य के बीच संघर्ष पैदा होता है, तो तुम किसे चुनती हो? यदि तुमने अपने कर्तव्य को पूरा करना चुना और परमेश्वर के घर के कार्य की ज़िम्मेदारी ली, परमेश्वर के प्रति पूरे समर्पण के साथ अपना भरसक प्रयास किया, और ऐसा करने में, एक पत्नी और माँ होने के दायित्वों को दरकिनार करने के लिए तुम बाध्य बनी, तो तुम क्या महसूस करोगी? तुम्हारे मन में क्या गुंजायमान होगा? क्या तुम्हें ऐसा लगेगा कि तुमने अपने बच्चों को निराश किया है? असफलता की यह भावना, यह बेचैनी कहाँ से आती है? क्या तुम तब असहज महसूस करती हो जब तुमने किसी सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा न किया हो? तुम न तो बेचैन होती हो, न ही तुम दोषी महसूस करती हो, क्योंकि यह सकारात्मक बात तुम्हारे विचारों, दृष्टिकोणों और विवेक में उतरी हुई ही नहीं है। तो फिर, उनमें क्या उतरा हुआ है? एक अच्छी पत्नी और माँ होना। यदि तुम एक अच्छी पत्नी और माँ नहीं हो, तो तुम एक अच्छी महिला, एक "सभ्य" महिला, नहीं हो। क्या यह तुम्हारा मानक नहीं है? यह मानक तुम्हें बाँध देता है; परमेश्वर में विश्वास करते और अपना कर्तव्य को निभाते समय, तुम इसे अपने साथ ढ़ोने के लिए बाध्य होती हो। जब तुम्हारे कर्तव्य को निभाने और एक अच्छी पत्नी और एक स्नेही माँ होने के बीच टकराव पैदा होता है, तब हालाँकि तुम अनिच्छापूर्वक अपना कर्तव्य निभाने या परमेश्वर के प्रति वफ़ादार बने रहने को चुन सकती हो, तुम्हारे दिल में (फिर भी) कुछ बेचैनी होगी, और उससे भी अधिक एक अपराध-बोध होगा। जब तुम अपना कर्तव्य नहीं निभा रही होती हो, तो तुम घर जाती हो और अपने बच्चों या अपने पति की अच्छी देखभाल करती हो, अपनी अनुपस्थिति के लिए क्षतिपूर्ति करती हो, भले ही ऐसा करने में तुम देह का अधिक कष्ट झेलती हो। यह एक मानसिक निषेधाज्ञा है जो तुमसे ऐसा कराती है। फिर भी, क्या हमने परमेश्वर के सामने अपनी ज़िम्मेदारी को, अपने दायित्व और अपने कर्तव्य को, निभाया है? जब हम अपने कर्तव्य में असावधान और बेपरवाह होते हैं, या जब हम इसे करने की इच्छा नहीं रखते हैं, तो क्या हमारे दिल में एक अपराध-बोध, या तिरस्कार की कोई भावना होती है? हमें ज़रा-सा भी धिक्कार महसूस नहीं होता है, क्योंकि लोगों की मानवता में ऐसी कोई चीज़ मौजूद ही नहीं है। इसलिए, यद्यपि तुम अपने कर्तव्यों को थोड़ा-सा निभा सकते हो, तुम सत्य और परमेश्वर के मानकों से काफ़ी दूर बने रहते हो। परमेश्वर ने कहा था, "परमेश्वर ही मनुष्य के जीवन का स्रोत है।" इन वचनों का क्या अर्थ है? ये सब लोगों को यह बताने के लिए होते हैं: हमारा जीवन और हमारी आत्माएँ परमेश्वर से आती हैं, न कि हमारे माता-पिता से, और निश्चित रूप से मानव जाति, या हमारे इस समाज से, या प्रकृति से तो बिल्कुल नहीं। वे चीज़ें हमें परमेश्वर द्वारा दी गईं थीं, और, हालाँकि हमारे शरीरों को हमारे माता-पिता द्वारा जन्म दिया गया था, यह परमेश्वर ही है जो हमारे भाग्य को नियंत्रित करता है। परमेश्वर में हमारा विश्वास कर सकना एक अवसर है जो उसने हमें दिया है; यह उसके द्वारा विहित है, और यह उसका अनुग्रह है। इसलिए, तुम दायित्वों को पूरा करने या किसी अन्य व्यक्ति की ज़िम्मेदारी लेने के लिए बाध्य नहीं हो; तुम्हारा एकमात्र दायित्व परमेश्वर के लिए उस कर्तव्य को निभाना है जो एक सृजित प्राणी को करना चाहिए। यही वो है जो इंसान से सबसे अधिक अपेक्षित है, और किसी व्यक्ति के जीवन के सभी महत्वपूर्ण मामलों के बीच, यह वो है जिसे पूरा करना सबसे अधिक आवश्यक होता है—यह किसी के जीवन का प्रमुख मामला है। यदि तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह नहीं निभाती हो, तो तुम एक ईमानदार सृजित प्राणी नहीं हो। इंसान की नज़रों में, तुम एक अच्छी पत्नी और माँ हो सकती हो, एक अद्भुत गृहिणी, एक कर्तव्यनिष्ठ बेटी, और सभ्य समाज की एक प्रतिष्ठित सदस्या, लेकिन, परमेश्वर के सामने, तुम एक वो इंसान हो जो उसके खिलाफ़ विद्रोह करता है, जो अपने दायित्वों या कर्तव्यों में से कुछ भी नहीं निभाता है, और जो परमेश्वर से स्वीकृत आदेश को पूरा नहीं करता है। क्या ऐसे व्यक्ति का अब भी परमेश्वर के सामने कोई स्थान होगा? ऐसा व्यक्ति तांबे की एक कौड़ी के बराबर भी नहीं है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा: क्या यह सत्य है? (नहीं) अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा गलत नहीं होती है, यह एक सकारात्मक बात है—तो फिर मैं यह क्यों कहता हूँ कि यह सत्य नहीं है? यदि तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में विश्वास करते हैं और तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं, तो क्या तुम संतानोचित हो? (हाँ)। तुम संतानोचित कैसे हो? तुम उनके साथ अपने भाइयों और बहनों से अलग व्यवहार करते हो। तुम उन्हें माता-पिता के रूप में सम्मान देते हो, तुम उनके द्वारा बताए गए हर काम को करते हो, और यदि वे बूढ़े हों, तो तुम उनकी देखभाल के लिए उनके पास रहते हो, जो तुम्हें अपना कर्तव्य निभाने के लिए बाहर जाने से रोकता है। क्या ऐसा करना सही है? ऐसे समय में तुम्हें क्या करना चाहिए? यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है। यदि तुम अब भी आस-पास ही कहीं अपना कर्तव्य निभाते हुए उनकी देखभाल कर पा रहे हो, और तुम्हारे माता-पिता को परमेश्वर के प्रति तुम्हारी आस्था पर आपत्ति नहीं है, तो तुम्हें एक पुत्र या पुत्री के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए और अपने माता-पिता की मदद करनी चाहिए। यदि वे बीमार हों, तो उनकी देखभाल करो; अगर कुछ उन्हें परेशान कर रहा है, तो उन्हें आराम दो; यदि तुम्हारी आर्थिक परिस्थितियाँ अनुमति दें, तो उन्हें उचित पूरक तत्व और पोषण खरीद कर दो। बहरहाल, यदि तुम अपने कर्तव्य में व्यस्त रहते हो, यदि तुम्हारे माता-पिता की देखभाल करने वाला कोई न हो, और वे भी परमेश्वर में विश्वास करते हों, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें कौन-सी सच्चाई का अभ्यास करना चाहिए? यह देखते हुए कि माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा एक सच्चाई नहीं, बल्कि केवल एक व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी और दायित्व होती है, तो जब तुम्हारे दायित्वों और तुम्हारे कर्तव्य के बीच संघर्ष हो, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? (हमारा कर्तव्य वरीयता लेता है, यह पहले आना चाहिए)। तुम्हारे दायित्व तुम्हारे कर्तव्य नहीं हैं। अपने कर्तव्य को निभाना सत्य का अभ्यास करना है; अपने दायित्वों को पूरा करना सत्य का अभ्यास नहीं है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह सत्य का अभ्यास नहीं है? यदि परिस्थितियाँ अनुमति देती हों और तुम पर कोई ज़िम्मेदारी या दायित्व हो, तो तुम्हें जाकर इसे करना चाहिए—लेकिन अगर परिस्थिति तुम्हें अनुमति नहीं देती है तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें यह कहना चाहिए, "मुझे जाकर अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। यह वह सच्चाई है जिसका मुझे अभ्यास करना होगा; मेरे माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा वो (सच्चाई) नहीं है।" यदि तुम्हारे पास इस समय कोई कर्तव्य नहीं है, और तुम घर से दूर काम नहीं कर रहे हो, और तुम अपने माता-पिता के साथ ही रहते हो, तो उनकी देखभाल करने का एक तरीका खोजो, उनके जीवन को बेहतर, कुछ कम मुश्किल, बनाने के लिए जो भी कर सकते हो, सो करो। लेकिन यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि तुम्हारे माता-पिता किस तरह के लोग हैं। यदि वे तुच्छ मानवता के हों, तुम्हारी आस्था और तुम्हारे कर्तव्य के निष्पादन में एक निरंतर रोड़े हों, परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास को बाधित करते हों, तब तुम्हें किसका अभ्यास करना चाहिए? (अस्वीकृति का)। ऐसे समय में, तुम्हें उन्हें अस्वीकार करना होगा। तुमने अपना दायित्व पूरा कर लिया है; वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, इसलिए उनकी देखभाल करने का तुम्हारा कोई दायित्व नहीं बनता है। यदि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो तुम सब एक परिवार हो, वे तुम्हारे माता-पिता हैं। यदि वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, तो तुम अलग-अलग राहों पर चलते हो, तुम दो अलग प्रकार के लोग हो। वे शैतान को गले लगाते हैं। वे शैतान का सम्मान करते हैं। वे शैतान के मार्ग पर चलते हैं, शैतान की उपासना के मार्ग पर, एक ऐसा मार्ग जो परमेश्वर के प्रति तुम्हारी आस्था से अलग है। तुम लोग दो अलग-अलग प्रकार के लोग हो, और इसलिए इस पर कोई प्रश्न ही नहीं उठता है कि वे तो तुम्हारे दुश्मन हैं; तुम एक ही परिवार के नहीं हो, और इसलिए तुम उनकी देखभाल करने के लिए बाध्य नहीं हो। कौन-सी बात सत्य है? अपना कर्तव्य पूरा करना ही सत्य है। परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य पूरा करना केवल कुछ दायित्वों को पूरा करना या कुछ ऐसा करना नहीं है जो तुझे करना चाहिए। यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच रहने वाले एक सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा करना है! यह तेरा दायित्व और तेरी जिम्मेदारी है, और यह जिम्मेदारी तेरी सच्ची जिम्मेदारी है। यही वह दायित्व और जिम्मेदारी है जिसे तू सृष्टिकर्ता के समक्ष पूरी करता है। ये जिम्मेदारियाँ ही तेरी सच्ची जिम्मेदारियाँ हैं। सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा करने की अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित होने के साथ तुलना कर—कौन सा सत्य है? सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा करना ही सत्य है; यह तेरा बाध्यकारी कर्तव्य है। माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा इंसानों के प्रति संतानोचित निष्ठा होती है, यह सत्य का अभ्यास नहीं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य की वास्तविकता क्या है?' से उद्धृत

हर व्‍यक्ति की एक नियति है, और वह परमेश्‍वर द्वारा तय की गयी है। कोई भी किसी दूसरे की नियति को नियन्त्रित नहीं कर सकता, इसलिए जब तुम्‍हारे परिवार का सवाल पैदा हो, तो अपने को ढीला छोड़ दो और इस तरह की चीज़ों से मुक्ति पाने और उनकी उपेक्षा करना सीखो। यह तुम कैसे करते हो? आंशिक रूप से यह परमेश्‍वर की प्रार्थना के माध्‍यम से किया जाता है। तुम्‍हें इस पर भी विचार करना चाहिए : तुम्‍हारे परिवार के अविश्‍वासी सदस्‍य संसार के पीछे भागते रहते हैं, वे भौतिक सन्‍तुष्टि की खोज में लगे रहते हैं, वे सम्‍पत्ति की खोज में लगे रहते हैं—यह उन्‍होंने किस तरह का मार्ग अपनाया हुआ है? अगर तुम अपने कर्तव्‍य का पालन नहीं करते, और उनके साथ रहते हो, तो क्‍या इससे तुम्‍हें पीड़ा और यातना नहीं भोगनी पड़ सकती? अगर तुम उनके साथ रहते हो, तो क्‍या उनके साथ निभा पाओगे? क्‍या तुम उनकी तरह सोचते हो? क्‍या एक-दूसरे के प्रति तुम्‍हारे लगाव के अलावा उन रिश्‍तों में और कुछ है? नहीं। तब फिर इस लगाव में क्‍या गहराई है? तुम उनकी इतनी ज्‍़यादा चिन्‍ता करते हो, लेकिन वे तुम्‍हारे बारे में क्‍या महसूस करते हैं? क्‍या तुम उनके साथ रहते हुए सचमुच शान्ति और सुख हासिल कर सकते हो? इससे दुख और ख़ालीपन ही तुम्‍हारे हाथ लग सकता है। तुम्‍हारा मार्ग वह नहीं है जो उनका है; दुनिया के प्रति, जीवन के प्रति, अपने जीवन की रा‍ह के प्रति, अपनी खोज के लक्ष्‍य के प्रति तुम्‍हारे दृष्टिकोण उनसे भिन्‍न हैं। आज, अपने परिवार से अलग होते हुए भी तुम अपने रक्‍त-सम्‍बन्‍धों की वजह से हमेशा उनके प्रति अपनापा महसूस करते हो, और तुम्‍हें लगता है कि वे तुम्‍हारा परिवार हैं। लेकिन जब तुम सचमुच उनके साथ होते हो, तो यह साथ पूरे साल-भर भी नहीं निभ पाता—महीने-भर के बाद ही तुम्‍हें लगने लगता है कि बहुत हो गया। उनके विचार, लोगों के साथ बरतने का उनका ढंग, जीवन को लेकर उनके फ़लसफ़े, उनके मुँह में भरे हुए झूठ, काम करने के उनके तौर तरीक़े और साधन, उनकी जीवन-दृष्टि, या मूल्‍य—सब कुछ तुम्‍हारे बरदाश्‍त के बाहर होता है, और तुम मन-ही-मन सोचते लगते हो, ‘‘मुझे सारे समय इनकी कमी खलती रहती थी, और हर वक्‍़त लगता रहता था कि इनके जीवन मुश्किल में हैं। लेकिन अब जब मैं इनके साथ हूँ, तो मेरा जीवन असहनीय हो गया है!’’ तुम उनसे नफ़रत करने लगते हो। ठीक इस समय, चूँकि तुम्‍हारे मन में यह स्‍पष्‍ट नहीं है कि वे किस तरह के लोग हैं, इसलिए तुम्‍हें अब भी लगता है कि रक्‍त-सम्‍बन्‍ध किसी भी चीज़ से ज्‍़यादा महत्त्वपूर्ण, ज्‍़यादा वास्‍तविक होते हैं। तुम अभी भी भावनाओं के वश में हो। अगर तुम भावनात्‍मक मसलों को एक तरफ़ रख सकते हो, तो यह पूरी तरह से करो; अगर तुम यह नहीं कर सकते, तो अपने कर्तव्‍य को प्राथमिकता दो, तुम्‍हारा लक्ष्‍य और दायित्‍व ज्‍़यादा महत्त्वपूर्ण हैं; पहले अपने दायित्‍व और लक्ष्‍य और कर्तव्‍य को पूरा करो, और बाक़ी सारी चीज़ों को फ़ि‍लहाल नज़रअन्‍दाज़ कर दो। जैसे ही लोग अपना दायित्‍व और कर्तव्‍य भली-भाँति पूरा कर लेते हैं, उनके समक्ष सत्‍य उत्तरोत्तर स्‍पष्‍ट होता जाता है, परमेश्‍वर के साथ उनका सम्‍बन्‍ध उत्तरोत्तर सामान्‍य होता जाता है, परमेश्‍वर की आज्ञा का पालन करने की उनकी आकांक्षा बढ़ती चली जाती है, परमेश्‍वर में उनकी श्रद्धा बढ़ती जाती है और वह ज्‍़यादा स्‍पष्‍ट होती जाती है, और उनकी आन्‍तरिक अवस्‍था बदल जाती है। जैसे ही तुम्‍हारी अवस्‍था में बदलाव घटित होगा, तुम्‍हारे सांसारिक दृष्टिकोणों और लगावों का क्षरण होने लगेगा, और फिर तुम इस तरह की चीज़ों की खोज करना बन्‍द दोगे। तुम्‍हारे हृदय में यह उत्‍कंण्‍ठा पैदा होगी कि परमेश्‍वर को प्रेम कैसे किया जाए, परमेश्‍वर को सन्‍तुष्‍ट कैसे किया जाए, किस तरह वैसा जीवन जिया जाए जो परमेश्‍वर को सन्‍तुष्‍ट कर सके, और किस तरह एक सत्‍यनिष्‍ठ जीवन जिया जाए। और जब तुम्‍हारा हृदय उद्यम करने लगेगा, तो वे दूसरी चीज़ें धीरे-धीरे लुप्‍त होती जाएँगी, और फिर वे तुम्‍हें आगे से बाधित या नियन्त्रित नहीं करेंगी।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के समक्ष समर्पण से संबंधित अभ्यास के सिद्धांत' से उद्धृत

एक विश्वास करने वाले पति और विश्वास न करने वाली पत्नी के बीच कोई संबंध नहीं होता और विश्वास करने वाले बच्चों और विश्वास न करने वाले माता-पिता के बीच कोई संबंध नहीं होता; ये दोनों तरह के लोग पूरी तरह असंगत हैं। विश्राम में प्रवेश से पहले एक व्यक्ति के रक्त-संबंधी होते हैं, किंतु एक बार जब उसने विश्राम में प्रवेश कर लिया, तो उसके कोई रक्त-संबंधी नहीं होंगे। जो अपना कर्तव्य करते हैं, उनके शत्रु हैं जो कर्तव्य नहीं करते हैं; जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं और जो उससे घृणा करते हैं, एक दूसरे के उलट हैं। जो विश्राम में प्रवेश करेंगे और जो नष्ट किए जा चुके होंगे, दो अलग-अलग असंगत प्रकार के प्राणी हैं। जो प्राणी अपने कर्तव्य निभाते हैं, बचने में समर्थ होंगे, जबकि वे जो अपने कर्तव्य नहीं निभाते, विनाश की वस्तु बनेंगे; इसके अलावा, यह सब अनंत काल के लिए होगा। क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए अपने पति से प्रेम करती हो? क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपने कर्तव्य पूरा करने के लिए अपनी पत्नी से प्रेम करते हो? क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपने नास्तिक माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ हो? परमेश्वर पर विश्वास करने के मामले में मनुष्य का दृष्टिकोण सही या ग़लत है? तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? तुम क्या पाना चाहते हो? तुम परमेश्वर से कैसे प्रेम करते हो? जो लोग पैदा हुए प्राणियों के रूप में अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर सकते और जो पूरा प्रयास नहीं कर सकते, वे विनाश की वस्तु बनेंगे। आज लोगों में एक दूसरे के बीच भौतिक संबंध होते हैं, उनके बीच खून के रिश्ते होते हैं, किंतु भविष्य में, यह सब ध्वस्त हो जाएगा। विश्वासी और अविश्वासी संगत नहीं हैं, बल्कि वे एक दूसरे के विरोधी हैं। वे जो विश्राम में हैं, विश्वास करेंगे कि कोई परमेश्वर है और उसके प्रति समर्पित होंगे, जबकि वे जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं, वे सब नष्ट कर दिए गए होंगे। पृथ्वी पर परिवारों का अब और अस्तित्व नहीं होगा; तो माता-पिता या संतानें या पतियों और पत्नियों के बीच के रिश्ते कैसे हो सकते हैं? विश्वास और अविश्वास की अत्यंत असंगतता से ये संबंध पूरी तरह टूट चुके होंगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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