154. अविश्वासियों के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) अविश्वासियों के बीच अच्छे व्यक्तियों के साथ, जो विवेक से तर्क के प्रति ग्रहणशील हों, समझदारी से बातचीत हो सकती है। कोई उनके लिए सुसमाचार का प्रचार भी कर सकता है;

(2) अविश्वासियों के बीच बुरे व्यक्तियों को, उन लोगों को जो अपने हितों की थोड़ी-सी भी हानि का सामना करने पर कुछ भी कर डालने में सक्षम होते हैं, दूरी पर रखना चाहिए। किसी को कभी भी उनके संपर्क में नहीं रहना चाहिए;

(3) व्यक्ति को उनके प्रति जिनके साथ काम के कारण संपर्क में रहना पड़ता हो, अपनी बोलचाल में सतर्क रहना चाहिए। केवल बाहरी चीज़ों की बातें करो; उनसे अपना दिल मत खोलो;

(4) व्यक्ति को अपने मालिक या अगुवा का सम्मान करना और उनका अनुपालन करना चाहिए। बहरहाल, कोई भी पाप-कर्म न करो, और उनके साथ ज़्यादा न उलझो, बल्कि दूर से ही उनका सम्मान करो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

अविश्वासी और परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों में क्या अंतर है? क्या यह केवल आस्था का अंतर है? उदाहरण के लिए "मनुष्य को परमेश्वर ने बनाया," इस बात को लो : यह सत्य है। परमेश्वर पर विश्वास करने वाले लोग जब यह सुनते हैं, तो उनका क्या रवैया होता है? वे इसे स्वीकार करते हैं और इस पर पूर्ण रूप से विश्वास करते हैं। वे इस तथ्य, इस सत्य को परमेश्वर में अपनी आस्था की बुनियाद के रूप में स्वीकार करते हैं—यही सत्य को स्वीकार करना है। इसका अर्थ है, अपने हृदय की गहराई से परमेश्वर द्वारा मनुष्य की रचना के तथ्य को स्वीकार करना, प्रसन्नतापूर्वक परमेश्वर का प्राणी होना, स्वेच्छा से परमेश्वर के मार्गदर्शन और संप्रभुता को स्वीकार करना, और यह स्वीकार करना कि परमेश्वर ही हमारा परमेश्वर है। और वे लोग जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, जब यह सुनते हैं कि "मनुष्य को परमेश्वर ने बनाया" तो उनका क्या रवैया रहता है? न केवल वे इसे अस्वीकृत करेंगे, बल्कि वे तुम पर हँसेंगे, तुम्हारा मजाक उड़ायेंगे, तुम्हें निंदा की दृष्टि से देखेंगे; इस तथ्य के बारे में तिरस्कारपूर्वक बोलेंगे; वे इसका तुम्हारे खिलाफ प्रयोग करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे, यहां तक कि इन शब्दों को स्वीकार करने वालों के प्रति उपहास, कटाक्ष, निंदा और शत्रुता का रवैया भी अपना सकते हैं। क्या यह सत्य के प्रति नफरत नहीं है? जब तुम ऐसे लोगों को देखते हो तो तुम क्या सोचतेहो? क्या तुम उनसे नफरत करते हो? "मनुष्य को परमेश्वर ने बनाया–इसमें क्या गलत है? तुम इसे स्वीकार नहीं करते हो, तुम नहीं जानते कि तुम कहां से आए हो, तो तुम आप वास्तव में कृतघ्न हो, तुम निर्लज्ज और विश्वासघाती हो। तुम सच में शैतान की किस्म के हो!" क्या तुम ऐसा सोचते हो? और किस चीज़ से तुममें ऐसी प्रतिकूल मानसिकता पैदा होती है? क्या यह केवल इसलिए है क्योंकि वे उन शब्दों को पसंद नहीं करते हैं? क्या यह उनके रवैये के कारण है : वे सत्य को स्वीकार नहीं करते। यदि वे इन वचनों का साधारण शब्दों के रूप में, या एक सिद्धांत या विश्वास के रूप में सम्मान करते तो तुम्हारा क्रोध इतना अधिक नहीं होता। लेकिन जब वे ऐसे शब्दों, रवैयों, और स्वभावों को दिखाते हैं जो घृणास्पद, विरोधी, तिरस्कारपूर्ण और अपमानजनक होते हैं, तो तुम क्रोधित हो जाते हो। क्या यह ऐसा ही है? हालांकि ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, लेकिन दूसरे लोगों की आस्था का सम्मान करते हैं, जो अन्य लोगों द्वारा कही गई हर बात की आलोचना करने की कोशिश नहीं करते हैं। तुम्हें उनके प्रति कोई अरुचि या नफरत नहीं है; तुम उनके साथ शांति से निभा सकते हो और उनके साथ बातचीत कर सकते हो। उन लोगों की प्रति, जो सत्य को बदनाम करने की कोशिश करते हैं–जो सत्य से नफरत करते हैं–तुम अपने हृदय में उनके लिए क्रोध अनुभव करते हो। क्या तुम उनसे मित्रता कर सकते हो? उनसे मित्रता न करने के अतिरिक्त, तुम उनके बारे में और क्या सोचते हो? अगर तुम कर सको तो उनके शब्दों पर किस तरह प्रतिक्रिया करना चाहोगे? तुम कहोगे, "मनुष्य को परमेश्वर ने बनाया, कितनी महान और पवित्र बात है यह। न सिर्फ़ तुम इसे अस्वीकार करते हो, बल्कि इसका खंडन करने की कोशिश भी करते हो– तुममें वास्तव में कोई विवेक नहीं है। यदि ईश्वर ने मुझे शक्ति दे, तो मैं तुम्हें श्राप दूंगा, मैं तुम पर वार करूंगा, मैं तुम्हें राख में बदल दूंगा!" क्या यह तुम्हारी भावना है? यह न्याय की भावना है। लेकिन जब तुम देखते हो कि वे एक राक्षस हैं, तो समझदारी की बात यह होगी कि उन्हें अनदेखा किया जाये, उनसे दूर रहा जाये, जब वे तुमसे बात करें तो उनसे सहमत होने का दिखावा किया जाये—यह करना समझदारी होगी। हालाँकि, हृदय की गहराई में तुम जानते हो कि तुममें और ऐसे लोगों में कोई समानता नहीं है। वे कभी भी परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर सकते, और यदि वे करते भी, तो परमेश्वर उन्हें नहीं चाहेगा। वे दरिन्दे हैं, राक्षस हैं। हम जिन चीजों से प्रेम करते हैं, हम जिन रास्तों पर चलते हैं, जीवन के विषय में हमारा दृष्टिकोण—वे सभी उनसे भिन्न हैं। इसलिए उनके साथ सत्य के मामलों पर फिर से चर्चा न करो, सूअर के आगे मोती न डालो। वे सत्य से घृणा करते हैं, तुम जानते हो कि वे किस तरह की चीज़ हैं, और उनके साथ सत्य के बारे में पुन: चर्चा करना स्पष्ट रूप से मूर्खता होगी, क्योंकि तुम्हारे बात समाप्त होने के बाद, वे मनमाने ढंग से सत्य का खंडन करने की कोशिश करेंगे, और फिर तुम परमेश्वर का सामना नहीं कर सकोगे और खुद को ईश्वर का ऋणी महसूस करोगे। यदि लोग सत्य से प्रेम ना करने वाले, सत्य से घृणा करने वाले, और सत्य को बदनाम करने की कोशिश करने वालों के प्रति ऐसा रवैया रख सकते हैं, तो परमेश्वर पर यह बात और भी ठीक बैठेगी। परमेश्वर का स्वभाव, परमेश्वर का सार, परमेश्वर का स्वरुप, परमेश्वर का जीवन, और परमेश्वर में जो कुछ भी प्रकट होता है, वह सब सत्य है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो व्यक्ति सत्य से घृणा करता है, वह परमेश्वर से द्वेष रखता है और वह परमेश्वर का शत्रु है। यह परमेश्वर से असंगत होने की समस्या से कहीं अधिक है, और ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर का कोप बहुत बड़ा है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

यदि तुम्हारे स्वभाव में कोई परिवर्तन होता है और तुम सत्य को प्राप्त कर लेते हो, तो तुम्हारापरिप्रेक्ष्य परमेश्वर के साथ सुसंगत होगा। जब तुम्हारा परिप्रेक्ष्य परमेश्वर के साथ सुसंगत हो, तो क्या तुम तब भी उन लोगों के साथ सुसंगत होते हो जो किभ्रष्ट होते हैं? तुम उनका विरोध करते हो, तुम उनसे विकर्षित होते हो, उनसे घृणा करते हो—क्या यही वह प्रभाव नहीं है जो कि हासिल किया जाता है? उनका सार तुम्हारे लिए स्पष्ट हो जाता है। चूँकि तुमने पहले ही अपना सार देख लिया है, और तुम बदल चुके हो, तो क्या तुम भ्रष्ट मानव जाति केसार को भी नहीं देख सकते हो? और अब, जब कि तुम भ्रष्ट मानव जाति के सार को देख लेते हो, और परमेश्वर के साथ सुसंगत हो जाते हो, तो क्या तुम भ्रष्ट मानव जाति का तिरस्कार नहीं करते हो? क्या तुम उन लोगों से घृणा नहीं करते हो जो परमेश्वर को नहीं मानते हैं, जो परमेश्वर से शत्रुता रखते हैं, जिन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया है, परमेश्वर को अपनी पीठ दिखा दी है और परमेश्वर की अवज्ञा की है? तुम ऐसे लोगों के साथ कैसे सुसंगत हो सकते हो? इस प्रकार, यदि तुम्हारे स्वभाव में कोई परिवर्तन होता है, तो तुम निश्चित रूप से इन लोगों से घृणा करोगे और उनसे विकर्षित होगे। फिर भी, आज, चूँकि हम भ्रष्ट लोगों के बीच रहते हैं, हम इसे केवल सहन कर सकते हैं, और केवल अपनी बुद्धि से जी सकते हैं। हम अपने स्वभाव में परिवर्तन के कारण, उनकी ओर कोई ध्यान नहीं दे सकते, न ही उनसे लड़ाई-झगड़ा कर सकते हैं—हम ऐसा नहीं कर सकते, हमें बुद्धिमान होना चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या होते हैं स्वभाव में परिवर्तन, और स्वभाव में परिवर्तनों का मार्ग' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

हमें अविश्वासियों (नास्तिकों) के साथ कैसे पेश आना चाहिए? ज़्यादातर अविश्वासी सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, वे परमेश्वर को भी ठुकराते और उसका विरोध करते हैं, वे सभी शैतान के अधिकार क्षेत्र में रहते हैं। इस तरह, उनके साथ बर्ताव में हमें समझदारी से काम लेना चाहिए। आज, परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला उद्धार का कार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ है, अभी भी सुसमाचार का प्रचार करना और परमेश्वर के लिए गवाही देना अनिवार्य है। कुछ ऐसे गिने-चुने अविश्वासी हैं जो यह मानते हैं कि कोई परमेश्वर है और वे सही मार्ग की खोज करते हैं, इन लोगों को सुसमाचार का प्रचार किया जाना चाहिए जिन्हें बचाया जा सकता है। इस तरह, हमें अविश्वासियों में से ऐसे लोगों का पता लगाने और उनसे संपर्क करने की ज़्यादा कोशिश करनी चाहिए जो परमेश्वर की खोज करते हैं और ऐसे नेक लोग हैं जो हमारे लिए मददगार हो सकते हैं। हमें उनके साथ बातचीत करके उनके बारे में जानना चाहिए, उनके संपर्क में रहना चाहिए और अपने-आप सही अवसर आने पर उन्हें सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए और उन्हें परमेश्वर के सामने लाना चाहिए ताकि वे उसके कार्य को स्वीकार कर सकें। यह परमेश्वर की आज्ञा है और यह हर एक व्यक्ति का बाध्यकारी कर्तव्य है। जहां तक दुष्ट लोगों, नुकसान पहुँचाने वालों और उन सभी लोगों की बात है जो शैतान के साथी हैं, जो परमेश्वर को ठुकराते और उसका विरोध करते हैं, जो सही मार्ग को बदनाम करते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को तकलीफ़ देकर शैतान की सेवा करते हैं, उन्हें निर्विवाद रूप से अस्वीकार कर देना चाहिए और उनसे दूर ही रहना चाहिए; यही सही विकल्प है। इन दुष्ट शैतानों से संपर्क करना किसी के लिए भी खतरनाक है और अगर कोई ऐसा करता है तो कभी न कभी उसे दुर्भाग्य का सामना करना ही होगा। अविश्वासियों के रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ संबंध तभी बनाये रखना चाहिए जब वे नेक लोग हों और परमेश्वर में विश्वास करने वालों की सहायता कर सकते हों; अगर ये रिश्तेदार और दोस्त दुष्ट लोग हैं, तो उनके साथ सभी रिश्ते तोड़ लेना ही बेहतर है। संक्षेप में, सभी अविश्वासियों (नास्तिकों) के साथ हमारे संपर्क में, हमें बुद्धिमानी से काम लेना चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

परमेश्वर की अपेक्षा है कि हम सिद्धांत के साथ काम करें, सिद्धांत के अनुसार बात करें, सिद्धांत के साथ लोगों से संपर्क करें और विभिन्न लोगों के साथ हमारे बर्ताव में हम सिद्धांतों का उल्लंघन न करें। सिद्धांतों का उल्लंघन करना सत्य का उल्लंघन करना है। अगर तुम अनियंत्रित और मनमाने ढंग से काम करते हो या बात करते हो, तो इससे साबित होता है कि तुम परमेश्वर के वचनों में या उसके सामने नहीं रह रहे हो; इसका मतलब है कि तुम एक मनमौजी व्यक्ति हो, जो शैतान के स्वभाव में और शैतान के अधिकार क्षेत्र में रहता है। शैतान के साथ पेश आने का सिद्धांत क्या है? शैतान के साथ पेश आने का तरीका है हमेशा के लिए उससे नफ़रत करना, उसे हमेशा के लिए कोसना, हमेशा के लिए ठुकराना और अंत तक उसके ख़िलाफ़ दृढ़तापूर्वक लड़ते रहना। इस बुरी और अधर्मी दुनिया के साथ पेश आते समय तुम्हें किस सिद्धांत का उपयोग करना चाहिए? इसे हमेशा के लिए छोड़ देना चाहिए, इससे नफ़रत करना चाहिए, इसके और अपने बीच एक स्पष्ट लकीर खींचनी चाहिए। दुष्ट लोगों के साथ पेश आते समय तुम्हें किस सिद्धांत का उपयोग करना चाहिए? तुम्हें उनसे नफ़रत करना चाहिए और उन्हें हमेशा के लिए छोड़ देना चाहिए। इसके अलावा, तुम्हें उनसे सावधान रहना चाहिए और उनकी पहचान करने का तरीका सीखना चाहिए, उनकी चालों में नहीं फँसना चाहिए, उनके साथ बातचीत करने से बचना चाहिए, उनसे कोई भी मदद नहीं लेनी चाहिए, उनके और अपने बीच एक स्पष्ट लकीर खींचनी चाहिए। किसी भी अविश्वासी (नास्तिक) रिश्तेदार और दोस्त के संबंध में तुम्हें किस सिद्धांत का उपयोग करना चाहिए? जिन लोगों के पास कुछ इंसानियत है उनके साथ तुम बातचीत कर सकते हो, लेकिन सावधानी बरतना ज़रूरी है; उनके मामलों में ज़्यादा गहराई तक शामिल होना ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा करने का कोई फ़ायदा नहीं है। अविश्वासी लाभ के अलावा कुछ नहीं खोजते, वे जो भी कहते और करते हैं उसके पीछे कोई न कोई मंशा छिपी होती है। इसलिए, तुम्हें ऐसे लोगों के साथ बातचीत करने से इनकार कर देना चाहिए जिनके पास अच्छी इंसानियत नहीं है। ऐसे लोगों के साथ बातचीत करना ठीक है जिनके पास थोड़ी बेहतर इंसानियत है और जिनके इरादे अपेक्षाकृत नेक हैं, लेकिन तुम्हें बुद्धिमानी से काम लेना होगा। परमेश्वर में विश्वास करने वालों का सामना चाहे कैसे भी लोगों, घटनाओं या चीज़ों से हो, उन्हें हमेशा सिद्धांतों के अनुसार काम करना चाहिए। कोई सिद्धांत नहीं होने से यह साबित होता है कि तुम्हारे पास कोई सत्य नहीं है, तुम शैतान के फ़लसफ़े के अनुसार जीते हो और तुम्हारे काम अविश्वासियों जैसे ही हैं। तुम परमेश्वर में नाममात्र का विश्वास रखते हो, लेकिन वास्तव में तुम एक अविश्वासी (नास्तिक) हो।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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