150. पारंपरिक संस्कृति के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) पारंपरिक संस्कृति का बड़ा हिस्सा शैतान और बुरी आत्माओं की भ्रष्टता से लिया गया है। यह शैतान का ज़हर है, जो सत्य से वैर रखता है, और नकारात्मक चीज़ों में गिना जाता है;

(2) पारंपरिक संस्कृति एक अदृश्य बेड़ी है जो लोगों को बांधती है और रोकती है; यह एक उपकरण है, जिसका इस्तेमाल दुष्टों का राजा शैतान लोगों को भटकाने, नियंत्रित करने और उनका उपभोग करने के लिए, करता है;

(3) पारंपरिक संस्कृति मानव जाति को निरंतर अधिक भ्रष्ट, ख़राब और पतित बनाती है, और उसे परमेश्वर से अधिकाधिक दूर ले जाती है। इसने सभी लोगों को परमेश्वर के शत्रु बना दिया है;

(4) परम्परागत संस्कृति के सार को पहचानने और विश्लेषित करने के लिए परमेश्वर के वचन सत्य का एक आधार के रूप में उपयोग करो। इस (संस्कृति) के भ्रष्ट, प्रतिक्रियावादी सार को अच्छी तरह से देखने में सक्षम बनो; इसका तिरस्कार और त्याग करो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

ऐसी गन्दी जगह में जन्म लेकर, मनुष्य समाज के द्वारा बुरी तरह संक्रमित किया गया है, वह सामंती नैतिकता से प्रभावित किया गया है, और उसे "उच्च शिक्षा के संस्थानों" में सिखाया गया है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन पर मतलबी दृष्टिकोण, जीने के लिए तिरस्कार-योग्य दर्शन, बिल्कुल बेकार अस्तित्व, पतित जीवन शैली और रिवाज—इन सभी चीज़ों ने मनुष्य के हृदय में गंभीर रूप से घुसपैठ कर ली है, और उसकी अंतरात्मा को बुरी तरह खोखला कर दिया है और उस पर गंभीर प्रहार किया है। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से और अधिक दूर हो गया है, और परमेश्वर का और अधिक विरोधी हो गया है। दिन-प्रतिदिन मनुष्य का स्वभाव और अधिक शातिर बन रहा है, और एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग करे, एक भी व्यक्ति नहीं जो स्वेच्छा से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करे, इसके अलावा, न ही एक भी व्यक्ति ऐसा है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रकटन की खोज करे। इसकी बजाय, इंसान शैतान की प्रभुता में रहकर, कीचड़ की धरती पर बस सुख-सुविधा में लगा रहता है और खुद को देह के भ्रष्टाचार को सौंप देता है। सत्य को सुनने के बाद भी, जो लोग अन्धकार में जीते हैं, इसे अभ्यास में लाने का कोई विचार नहीं करते, यदि वे परमेश्वर के प्रकटन को देख लेते हैं तो इसके बावजूद उसे खोजने की ओर उन्मुख नहीं होते हैं। इतनी पथभ्रष्ट मानवजाति को उद्धार का मौका कैसे मिल सकता है? इतनी पतित मानवजाति प्रकाश में कैसे जी सकती है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

वे घातक प्रभाव, जो हज़ारों वर्षो की "राष्ट्रवाद की बुलंद भावना" ने मनुष्य के हृदय में गहरे छोड़े हैं, और साथ ही सामंती सोच, जिसके द्वारा लोग बिना किसी स्वतंत्रता के, बिना महत्वाकांक्षा या आगे बढ़ने की इच्छा के, बिना प्रगति की अभिलाषा के, बल्कि निष्क्रिय और प्रतिगामी रहने और गुलाम मानसिकता से घिरे होने के कारण बँधे और जकड़े हुए हैं, इत्यादि—इन वस्तुगत कारकों ने मनुष्यजाति के वैचारिक दृष्टिकोण, आदर्शों, नैतिकता और स्वभाव पर अमिट रूप से गंदा और भद्दा प्रभाव छोड़ा है। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे मनुष्य आतंक की अँधेरी दुनिया में जी रहे हैं, और उनमें से कोई भी इस दुनिया के पार नहीं जाना चाहता, और उनमें से कोई भी किसी आदर्श दुनिया में जाने के बारे में नहीं सोचता; बल्कि, वे अपने जीवन की सामान्य स्थिति से संतुष्ट हैं, बच्चे पैदा करने और पालने-पोसने, उद्यम करने, पसीना बहाने, अपना रोजमर्रा का काम करने; एक आरामदायक और खुशहाल परिवार के सपने देखने, और दांपत्य प्रेम, नाती-पोतों, अपने अंतिम समय में आनंद के सपने देखने में दिन बिताते हैं और शांति से जीवन जीते हैं...। सैकड़ों-हजारों साल से अब तक लोग इसी तरह से अपना समय व्यर्थ गँवा रहे हैं, कोई पूर्ण जीवन का सृजन नहीं करता, सभी इस अँधेरी दुनिया में केवल एक-दूसरे की हत्या करने के लिए तत्पर हैं, प्रतिष्ठा और संपत्ति की दौड़ में और एक-दूसरे के प्रति षड्यंत्र करने में संलग्न हैं। किसने कब परमेश्वर की इच्छा जानने की कोशिश की है? क्या किसी ने कभी परमेश्वर के कार्य पर ध्यान दिया है? एक लंबे अरसे से मानवता के सभी अंगों पर अंधकार के प्रभाव ने कब्ज़ा जमा लिया है और वही मानव-प्रकृति बन गए हैं, और इसलिए परमेश्वर के कार्य को करना काफी कठिन हो गया है, यहाँ तक कि जो परमेश्वर ने लोगों को आज सौंपा है, उस पर वे ध्यान भी देना नहीं चाहते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (3)' से उद्धृत

इस "पारंपरिक संस्कृति" का अर्थ क्या है? कुछ लोग कहते हैं कि यह पूर्वजों से चली आती है—यह एक पहलू है। आरंभ से ही परिवारों, जातीय समूहों, यहाँ तक कि पूरी मानवजाति में जीवन के तरीके, रीति-रिवाज, कहावतें और नियम आगे बढ़ाए गए हैं, और वे लोगों के विचारों में बैठ गए हैं। लोग उन्हें अपने जीवन का अविभाज्य अंग समझते हैं और उन्हें नियमों की तरह मानते हैं, और उनका इस तरह पालन करते हैं, जैसे वे स्वयं जीवन हों। दरअसल, वे कभी भी इन चीज़ों को बदलना या इनका परित्याग करना नहीं चाहते, क्योंकि ये उनके पूर्वजों से आई हैं। पारंपरिक संस्कृति के अन्य पहलू भी हैं, जो लोगों की हड्डियों तक में जम गए हैं, जैसे कि वे चीज़ें, जो कन्फ्यूशियस या मेंसियस से आई हैं, और वे चीज़ें, जो चीनी ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद द्वारा लोगों को सिखाई गई हैं। क्या यह सही नहीं है? पारंपरिक संस्कृति में क्या चीज़ें शामिल हैं? क्या इसमें वे त्योहार शामिल हैं, जिन्हें लोग मनाते हैं? उदाहरण के लिए : वसंत महोत्सव, दीप-महोत्सव, चिंगमिंग दिवस, ड्रैगन नौका महोत्सव, और साथ ही, भूत महोत्सव और मध्य-हेमंत महोत्सव। कुछ परिवार तब भी उत्सव मनाते हैं, जब वरिष्ठ लोग एक निश्चित उम्र पर पहुँच जाते हैं, या जब बच्चे एक माह या सौ दिन की उम्र के हो जाते हैं। और इसी तरह चलता रहता है। ये सब पारंपरिक त्योहार हैं। क्या इन त्योहारों में पारंपरिक संस्कृति अंतर्निहित नहीं है? पारंपरिक संस्कृति का मूल क्या है? क्या इनका परमेश्वर की उपासना से कुछ लेना-देना है? क्या इनका लोगों को सत्य का अभ्यास करने के लिए कहने से कुछ लेना-देना है? क्या परमेश्वर को भेंट चढ़ाने, परमेश्वर की वेदी पर जाने और उसकी शिक्षाएँ प्राप्त करने के लिए भी लोगों के कोई त्योहार हैं? क्या इस तरह के कोई त्योहार हैं? (नहीं।) इन सभी त्योहारों में लोग क्या करते हैं? आधुनिक युग में इन्हें खाने, पीने और मज़े करने के अवसरों के रूप में देखा जाता है। पारंपरिक संस्कृति का अंतर्निहित स्रोत क्या है? पारंपरिक संस्कृति किससे आती है? (शैतान से।) यह शैतान से आती है। इन पारंपरिक त्योहारों के दृश्यों के पीछे शैतान मनुष्यों में कुछ खास चीजें भर देता है। वे चीज़ें क्या हैं? यह सुनिश्चित करना कि लोग अपने पूर्वजों को याद रखें—क्या यह उनमें से एक है? उदाहरण के लिए, चिंगमिंग महोत्सव के दौरान लोग कब्रों की सफ़ाई करते हैं और अपने पूर्वर्जों को भेंट चढ़ाते हैं, ताकि वे अपने पूर्वजों को भूलें नहीं। साथ ही, शैतान सुनिश्चित करता है कि लोग देशभक्त होना याद रखें, जिसका एक उदाहरण ड्रैगन नौका महोत्सव है। मध्य-हेमंत उत्सव किसलिए मनाया जाता है? (पारिवारिक पुनर्मिलन के लिए।) पारिवारिक पुनर्मिलनों की पृष्ठभूमि क्या है? इसका क्या कारण है? यह भावनात्मक रूप से संवाद करने और जुड़ने के लिए है। निस्संदेह, चाहे वह चांद्र नववर्ष की पूर्व संध्या मनाना हो या दीप-महोत्सव, उन्हें मनाने के पीछे के कारणों का वर्णन करने के कई तरीके हैं। लेकिन कोई उन कारणों का वर्णन कैसे भी करे, उनमें से प्रत्येक कारण शैतान द्वारा लोगों में अपना फ़लसफ़ा और सोच भरने का तरीका है, ताकि वे परमेश्वर से भटक जाएँ और यह न जानें कि परमेश्वर है, और वे भेंटें या तो अपने पूर्वजों को चढ़ाएँ या फिर शैतान को, या देह-सुख की इच्छाओं के वास्ते खाएँ, पीएँ और मज़ा करें। जब भी ये त्योहार मनाए जाते हैं, तो इनमें से हर त्योहार में लोगों के जाने बिना ही उनके मन में शैतान के विचार और दृष्टिकोण गहरे जम जाते हैं। जब लोग अपनी उम्र के पचासवें या साठवें दशक में या उससे भी बड़ी उम्र में पहुँचते हैं, तो शैतान के ये विचार और दृष्टिकोण पहले से ही उनके मन में गहरे जम चुके होते हैं। इतना ही नहीं, लोग इन विचारों को, चाहे वे सही हों या गलत, अविवेकपूर्ण ढंग से और बिना दुराव-छिपाव के, अगली पीढ़ी में संचारित करने का भरसक प्रयास करते हैं। क्या ऐसा नहीं है? (है।) पारंपरिक संस्कृति और ये त्योहार लोगों को कैसे भ्रष्ट करते हैं? क्या तुम जानते हो? (लोग इन परंपराओं के नियमों से इतना विवश और बाध्य हो जाते हैं कि उनमें परमेश्वर को खोजने का समय और ऊर्जा नहीं बचती।) यह एक पहलू है। उदाहरण के लिए, चांद्र नव वर्ष के दौरान हर कोई उत्सव मनाता है—अगर तुमने नहीं मनाया, तो क्या तुम दुःखी महसूस नहीं करोगे? क्या तुम अपने दिल में कोई अंधविश्वास रखते हो? शायद तुम ऐसा महसूस करो : "मैंने नववर्ष का उत्सव नहीं मनाया, और चूँकि चांद्र नव वर्ष का दिन एक खराब दिन था; तो कहीं बाकी पूरा वर्ष भी खराब ही न बीते"? क्या तुम बुरा और थोड़ा डरा हुआ महसूस नहीं करोगे? ऐसे भी कुछ लोग हैं, जिन्होंने वर्षों से अपने पुरखों को भेंट नहीं चढ़ाई है और वे अचानक स्वप्न देखते हैं, जिसमें कोई मृत व्यक्ति उनसे पैसा माँगता है। वे कैसा महसूस करेंगे? "कितने दुःख की बात है कि इस मृत व्यक्ति को खर्च करने के लिए पैसा चाहिए! मैं उसके लिए कुछ कागज़ी मुद्रा जला दूँगा। अगर मैं ऐसा नहीं करता हूँ, तो यह बिलकुल भी सही नहीं होगा। इससे हम जीवित लोग किसी मुसीबत में पड़ सकते हैं—कौन कह सकता है, दुर्भाग्य कब आ पड़ेगा?" उनके मन में डर और चिंता का यह छोटा-सा बादल हमेशा मँडराता रहेगा। उन्हें यह चिंता कौन देता है? (शैतान।) शैतान इस चिंता का स्रोत है। क्या यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने का एक तरीका नहीं है? वह तुम्हें भ्रष्ट करने, तुम्हें धमकाने और तुम्हें बाँधने के लिए विभिन्न तरीके और बहाने इस्तेमाल करता है, ताकि तुम स्तब्ध रह जाओ और झुक जाओ और उसके सामने समर्पण कर दो; शैतान इसी तरह मनुष्य को भ्रष्ट करता है। प्रायः जब लोग कमज़ोर होते हैं या परिस्थितियों से पूर्णतः अवगत नहीं होते, तब वे असावधानीवश, भ्रमित तरीके से कुछ कर सकते हैं; अर्थात्, वे अनजाने में शैतान के चंगुल में फँस जाते हैं और वे बेइरादा कुछ कर सकते हैं, कुछ ऐसी चीज़ें कर सकते हैं, जिनके बारे में वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। शैतान इसी तरह से मनुष्य को भ्रष्ट करता है। यहाँ तक कि अब कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो गहरे जड़ जमाई हुई पारंपरिक संस्कृति से अलग होने के अनिच्छुक हैं, और उसे नहीं छोड़ सकते हैं। विशेष रूप से जब वे कमज़ोर और निष्क्रिय होते हैं, तब वे इस प्रकार के उत्सव मनाना चाहते हैं और वे फिर से शैतान से मिलना और उसे संतुष्ट करना चाहते हैं, ताकि उनके दिलों को सुकून मिल जाए। पारंपरिक संस्कृति की पृष्ठभूमि क्या है? क्या पर्दे के पीछे से शैतान का काला हाथ डोर खींच रहा है? क्या शैतान की दुष्ट प्रकृति जोड़-तोड़ और नियंत्रण कर रही है? क्या शैतान इन सभी चीज़ों को नियंत्रित कर रहा है? (हाँ।) जब लोग इस पारंपरिक संस्कृति में जीते हैं और इस प्रकार के पारंपरिक त्योहार मनाते हैं, तो क्या हम कह सकते हैं कि यह एक ऐसा परिवेश है, जिसमें वे शैतान द्वारा मूर्ख बनाए और भ्रष्ट किए जा रहे हैं, और इतना ही नहीं, वे शैतान द्वारा मूर्ख बनाए जाने और भ्रष्ट किए जाने से खुश हैं? (हाँ।) यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे तुम सब स्वीकार करते हो, जिसके बारे में तुम जानते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

पारम्परिक संस्कृति एवं अंधविश्वास के बीच अनेक समानताएँ हैं, लेकिन अंतर यह है कि पारम्परिक संस्कृति में कुछ निश्चित कहानियाँ, संकेत, एवं स्रोत होते हैं। शैतान ने, लोगों पर पारम्परिक संस्कृति या मिथ्याधर्मी प्रसिद्ध व्यक्तियों के बारे में गहरा प्रभाव डालते हुए, कई लोक कथाओं या कहानियों को गढ़ा और बनाया है जो इतिहास की पुस्तकों में मिलती हैं। उदाहरण के लिए, चीन में, "आठ अमर हस्तियों का समुद्र पार करना," "पश्चिम की ओर यात्रा," जेड सम्राट, "नेज़्हा की अजगर राजा पर विजय," और "ईश्वरों का अधिष्ठापन।" क्या ये मनुष्य के मनों में गहराई से जड़ नहीं पकड़ चुकी हैं? भले ही तुम में से कुछ लोग पूरी कहानी विस्तार से न जानें, फिर भी तुम मोटे तौर पर कहानियों को तो जानते ही हो, और मोटे तौर की यही जानकारी है जो तुम्हारे हृदय और मन में बैठ जाती है, ताकि तुम इसे भुला न सको। ये ही वे विभिन्न विचार या किंवदंतियाँ हैं जिन्हें शैतान ने बहुत समय पहले मनुष्य के लिए तैयार किया था जिन्हें विभिन्न समयों पर को फैलाया गया है। ये चीज़ें प्रत्यक्ष रूप से लोगों की आत्माओं को हानि पहुँचाती हैं और नष्ट करती हैं और लोगों को एक के बाद एक मायाजाल में डालती हैं। कहने का तात्पर्य है कि जब एक बार तुम ऐसी पारम्परिक संस्कृति, कथाओं या अंधविश्वासी चीज़ों को स्वीकार कर लेते हो, जब एक बार ये तुम्हारे मन में बैठ जाती हैं, और जब एक बार वे तुम्हारे हृदय में अटक जाती हैं, तो यह तुम्हारे सम्मोहित हो जाने जैसा है—तुम इन सांस्कृतिक जालों में, इन विचारों एवं पारम्परिक कथाओं में उलझ जाते हो और प्रभावित हो जाते हो। वे तुम्हारे जीवन, जीवन को देखने के तुम्हारे नज़रिये, चीज़ों के बारे में तुम्हारे फैसले को प्रभावित करती हैं। इससे भी बढ़कर, वे जीवन के सच्चे मार्ग के तुम्हारे अनुसरण को भी प्रभावित करती हैं : यह वास्तव में एक दुष्टतापूर्ण मायाजाल है। तुम जितनी भी कोशिश कर लो, परन्तु उन्हें झटक कर दूर नहीं कर सकते; तुम उन पर चोट तो करते हो किन्तु उन्हें काटकर नीचे नहीं गिरा सकते हो; तुम उन पर प्रहार तो करते हो किन्तु उन पर प्रहार करके उन्हें दूर नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त, जब लोगों की जानकारी के बिना उन पर इस प्रकार का मायाजाल डाल दिया जाता है, तो वे अनजाने में, अपने हृदय में शैतान की छवि को बढ़ावा देते हुए, शैतान की आराधना करना आरम्भ कर देते हैं। दूसरे शब्दों में, वे शैतान को अपने आदर्श के रूप में, अपने लिए एक आराधना करने और आदर करने की वस्तु के रूप में स्थापित कर लेते हैं, यहाँ तक कि वे उसे परमेश्वर मानने की हद तक भी चले जाते हैं। अनजाने में ही, ये चीज़ें लोगों के हृदय में हैं, उनके वचनों एवं कर्मों को नियन्त्रित कर रही हैं। इसके अलावा, तुम पहले तो इन कहानियों और किंवदंतियों को झूठा मानते हो, और फिर तुम अनजाने में इनके अस्तित्व को मान लेते हो, उन्हें वास्तविक व्यक्ति, वास्तविक, विद्यमान वस्तु बना देते हो। अपनी अनभिज्ञता में, तुम अवचेतन रूप से इन विचारों को और इन चीज़ों के अस्तित्व को ग्रहण कर लेते हो। तुम अवचेतन रूप से दुष्टात्माओं, शैतान एवं मूर्तियों को भी अपने घर में और अपने हृदय में ग्रहण कर लेते हो—यह वास्तव में एक मायाजाल है। क्या तुम लोग इन बातों से खुद को जोड़ पा रहे हो? (हाँ।) क्या तुम लोगों के बीच में ऐसे लोग हैं जिन्होंने बुद्ध के सामने धूप जलायी है और उसकी आराधना की है? (हाँ।) तो धूप जलाने और बुद्ध की आराधना करने का उद्देश्य क्या था? (शान्ति के लिए प्रार्थना करना।) इसके बारे में अब सोचो तो, क्या शांति के लिए शैतान से प्रार्थना करना बेतुका नहीं है? क्या शैतान शान्ति लाता है? (नहीं।) क्या तुम लोग नहीं देख पा रहे कि पहले तुम कितने अज्ञानी थे? इस प्रकार का आचरण बहुत ही बेतुका, अज्ञानता एवं बेवकूफी भरा है, है कि नहीं? शैतान सिर्फ इससे मतलब रखता है कि किस प्रकार तुम्हें भ्रष्ट किया जाए। शैतान तुम्हें शान्ति नहीं दे सकता, वह तुम्हें केवल अस्थायी राहत ही दे सकता है। परन्तु यह राहत पाने के लिए तुम्हें अवश्य एक प्रतिज्ञा लेनी होगी और यदि तुम अपने वादे या उस प्रतिज्ञा को तोड़ते हो जो तुमने शैतान से किया है, तो तुम देखोगे कि वह तुम्हें किस प्रकार कष्ट देता है। तुमसे एक प्रतिज्ञा दिलवा कर, वह वास्तव में तुम्हें नियंत्रित करना चाहता है। जब तुम लोगों ने शान्ति के लिए प्रार्थना की थी, तो क्या तुम लोगों ने शान्ति पाई? (नहीं।) तुम लोगों ने शान्ति नहीं पाई, इसके विपरीत तुम्हारे प्रयास केवल दुर्भाग्य, अंतहीन आपदाएँ लाये, सच में कड़वाहट का असीम महासागर लाये। शान्ति शैतान के अधिकार क्षेत्र में नहीं है, और यह सत्य है। यह वह परिणाम है जो सामंती अन्धविश्वास और पारम्परिक संस्कृति मानवजाति के लिए लाये हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

कई हजार वर्षों की प्राचीन संस्कृति और इतिहास के ज्ञान ने मनुष्य की सोच और धारणाओं तथा उसके मानसिक दृष्टिकोण को इतना कसकर बंद कर दिया है कि वे अभेद्य और प्राकृतिक रूप से नष्ट न होने वाले[1] बन गए हैं। लोग नरक के अठारहवें घेरे में रहते हैं, मानो उन्हें परमेश्वर द्वारा काल-कोठरियों में निर्वासित कर दिया गया हो, जहाँ प्रकाश कभी दिखाई नहीं दे सकता। सामंती सोच ने लोगों का इस तरह उत्पीड़न किया है कि वे मुश्किल से साँस ले पाते हैं और उनका दम घुट रहा है। उनमें प्रतिरोध करने की थोड़ी-सी भी ताकत नहीं है; वे बस सहते हैं और चुपचाप सहते हैं...। कभी किसी ने धार्मिकता और न्याय के लिए संघर्ष करने या खड़े होने का साहस नहीं किया; लोग बस दिन-ब-दिन और साल-दर-साल सामंती नीति-शास्त्र के प्रहारों और दुर्व्यवहारों तले जानवर से भी बदतर जीवन जीते हैं। उन्होंने कभी मानव-जगत में खुशी पाने के लिए परमेश्वर की तलाश करने के बारे में नहीं सोचा। ऐसा लगता है, मानो लोगों को पीट-पीटकर इस हद तक तोड़ डाला गया है कि वे पतझड़ में गिरे पत्तों की तरह हो गए हैं, मुरझाए हुए, सूखे और पीले-भूरे रंग के। लोग लंबे समय से अपनी याददाश्त खो चुके हैं; वे असहाय-से उस नरक में रहते हैं, जिसका नाम है मानव-जगत, अंत के दिन आने का इंतज़ार करते हुए, ताकि वे इस नरक के साथ ही नष्ट हो जाएँ, मानो वह अंत का दिन, जिसके लिए वे लालायित रहते हैं, वह दिन हो, जब मनुष्य आरामदायक शांति का आनंद लेगा। सामंती नैतिकता ने मनुष्य का जीवन "अधोलोक" में पहुँचा दिया है, जिससे उसकी प्रतिरोध करने की शक्ति और भी कम हो गई है। सभी प्रकार के उत्पीड़न मनुष्य को धीरे-धीरे अधोलोक में धकेल रहे हैं, जिससे वह अधोलोक की और अधिक गहराई में पहुँच रहा है और परमेश्वर से अधिकाधिक दूर होता गया है, आज तो परमेश्वर उसके लिए पूर्णत: अजनबी बन गया है, और जब वे मिलते हैं, तो वह उससे बचने के लिए जल्दी से निकल जाता है। मनुष्य उस पर ध्यान नहीं देता और उसे एक तरफ अकेला खड़ा छोड़ देता है, जैसे कि उसने उसे कभी जाना ही न हो या उसने उसे पहले कभी देखा ही न हो। फिर भी परमेश्वर अपना अदम्य रोष उस पर प्रकट न करते हुए मानव-जीवन की लंबी यात्रा के दौरान लगातार मनुष्य की प्रतीक्षा करता रहा है और इस दौरान बिना एक भी शब्द बोले, केवल मनुष्य के पश्चात्ताप करने और नए सिरे से शुरुआत करने की मौन प्रतीक्षा करता रहा है। मनुष्य के साथ मानव-जगत की पीड़ाएँ साझा करने के लिए परमेश्वर बहुत पहले मानव-जगत में आया था। मनुष्य के साथ गुज़ारे इन तमाम वर्षों में कोई भी उसके अस्तित्व को खोज नहीं पाया है। परमेश्वर स्वयं द्वारा लाया गया कार्य पूरा करते हुए मानव-जगत की दुर्दशा का कष्ट चुपचाप सहन करता रहता है। ऐसे कष्टों से गुजरते हुए, जिनका अनुभव मनुष्य ने पहले कभी नहीं किया, वह पिता परमेश्वर की इच्छा और मानवजाति की ज़रूरतों की खातिर कष्ट सहना जारी रखता है। पिता परमेश्वर की इच्छा की खातिर, और मानवजाति की ज़रूरतों की खातिर भी, मनुष्य की उपस्थिति में वह चुपचाप उसकी सेवा में खड़ा रहा है, और मनुष्य की उपस्थिति में उसने खुद को नम्र किया है। प्राचीन संस्कृति के ज्ञान ने मनुष्य को चुपके से परमेश्वर की उपस्थिति से चुरा लिया है और मनुष्य को शैतानों के राजा और उसकी संतानों को सौंप दिया है। चार पुस्तकों और पाँच क्लासिक्स[क] ने मनुष्य की सोच और धारणाओं को विद्रोह के एक अलग युग में पहुँचा दिया है, जिससे वह उन पुस्तकों और क्लासिक्स के संकलनकर्ताओं की पहले से भी ज्यादा खुशामदी करने लगा है, और परिणामस्वरूप परमेश्वर के बारे में उसकी धारणाएँ और ज्यादा ख़राब हो गई हैं। शैतानों के राजा ने बिना मनुष्य के जाने ही उसके दृदय से निर्दयतापूर्वक परमेश्वर को बाहर निकाल दिया और फिर विजयी उल्लास के साथ खुद उस पर कब्ज़ा जमा लिया। तब से मनुष्य एक कुरूप और दुष्ट आत्मा तथा शैतानों के राजा के चेहरे के अधीन हो गया। उसके सीने में परमेश्वर के प्रति घृणा भर गई, और शैतानों के राजा की द्रोहपूर्ण दुर्भावना दिन-ब-दिन तब तक मनुष्य के भीतर फैलती गई, जब तक कि वह पूरी तरह से बरबाद नहीं हो गया। उसके पास ज़रा-भी स्वतंत्रता नहीं रह गयी और उसके पास शैतानों के राजा के चंगुल से छूटने का कोई उपाय नहीं था। उसके पास वहीं के वहीं उसकी उपस्थिति में बंदी बनने, आत्मसमर्पण करने और उसकी अधीनता में घुटने टेक देने के सिवा कोई चारा नहीं था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (7)' से उद्धृत

ऊपर से नीचे तक और शुरू से अंत तक शैतान परमेश्वर के कार्य को बाधित करता रहा है और उसके विरोध में काम करता रहा है। "प्राचीन सांस्कृतिक विरासत", मूल्यवान "प्राचीन संस्कृति के ज्ञान", "ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद की शिक्षाओं" और "कन्फ्यूशियन क्लासिक्स और सामंती संस्कारों" की इस सारी चर्चा ने मनुष्य को नरक में पहुँचा दिया है। उन्नत आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ-साथ अत्यधिक विकसित उद्योग, कृषि और व्यवसाय कहीं नज़र नहीं आते। इसके बजाय, यह सिर्फ़ प्राचीन काल के "वानरों" द्वारा प्रचारित सामंती संस्कारों पर जोर देता है, ताकि परमेश्वर के कार्य को जानबूझकर बाधित कर सके, उसका विरोध कर सके और उसे नष्ट कर सके। न केवल इसने आज तक मनुष्य को सताना जारी रखा है, बल्कि वह उसे पूरे का पूरा निगल[2] भी जाना चाहता है। सामंतवाद की नैतिक और आचार-विचार विषयक शिक्षाओं के प्रसारण और प्राचीन संस्कृति के ज्ञान की विरासत ने लंबे समय से मनुष्य को संक्रमित किया है और उन्हें छोटे-बड़े शैतानों में बदल दिया है। कुछ ही लोग हैं, जो ख़ुशी से परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, और कुछ ही लोग हैं, जो उसके आगमन का उल्लासपूर्वक स्वागत करते हैं। समस्त मानवजाति का चेहरा हत्या के इरादे से भर गया है, और हर जगह हत्यारी साँस हवा में व्याप्त है। वे परमेश्वर को इस भूमि से निष्कासित करना चाहते हैं; हाथों में चाकू और तलवारें लिए वे परमेश्वर का "विनाश" करने के लिए खुद को युद्ध के विन्यास में व्यवस्थित करते हैं। शैतान की इस सारी भूमि पर, जहाँ मनुष्य को लगातार सिखाया जाता है कि कहीं कोई परमेश्वर नहीं है, मूर्तियाँ फैली हुई हैं, और ऊपर हवा जलते हुए कागज और धूप की वमनकारी गंध से तर है, इतनी घनी कि दम घुटता है। यह उस कीचड़ की बदबू की तरह है, जो जहरीले सर्प के कुलबुलाते समय ऊपर उठती है, जिससे व्यक्ति उलटी किए बिना नहीं रह सकता। इसके अलावा, वहाँ अस्पष्ट रूप से दुष्ट दानवों के मंत्रोच्चार की ध्वनि सुनी जा सकती है, जो दूर नरक से आती हुई प्रतीत होती है, जिसे सुनकर आदमी काँपे बिना नहीं रह सकता। इस देश में हर जगह इंद्रधनुष के सभी रंगों वाली मूर्तियाँ रखी हैं, जिन्होंने इस देश को कामुक आनंद की दुनिया में बदल दिया है, और शैतानों का राजा दुष्टतापूर्वक हँसता रहता है, मानो उसका नीचतापूर्ण षड्यंत्र सफल हो गया हो। इस बीच, मनुष्य पूरी तरह से बेखबर रहता है, और उसे यह भी पता नहीं कि शैतान ने उसे पहले ही इस हद तक भ्रष्ट कर दिया है कि वह बेसुध हो गया है और उसने हार में अपना सिर लटका दिया है। शैतान चाहता है कि एक ही झपट्टे में परमेश्वर से संबंधित सब-कुछ साफ़ कर दे, और एक बार फिर उसे अपवित्र कर उसका हनन कर दे; वह उसके कार्य को टुकड़े-टुकड़े करने और उसे बाधित करने का इरादा रखता है। वह कैसे परमेश्वर को समान दर्जा दे सकता है? कैसे वह पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच अपने काम में परमेश्वर का "हस्तक्षेप" बरदाश्त कर सकता है? कैसे वह परमेश्वर को उसके घिनौने चेहरे को उजागर करने दे सकता है? शैतान कैसे परमेश्वर को अपने काम को अव्यवस्थित करने की अनुमति दे सकता है? क्रोध के साथ भभकता यह शैतान कैसे परमेश्वर को पृथ्वी पर अपने शाही दरबार पर नियंत्रण करने दे सकता है? कैसे वह स्वेच्छा से परमेश्वर के श्रेष्ठतर सामर्थ्य के आगे झुक सकता है? इसके कुत्सित चेहरे की असलियत उजागर की जा चुकी है, इसलिए किसी को पता नहीं है कि वह हँसे या रोए, और यह बताना वास्तव में कठिन है। क्या यही इसका सार नहीं है? अपनी कुरूप आत्मा के बावजूद वह यह मानता है कि वह अविश्वसनीय रूप से सुंदर है। यह सहअपराधियों का गिरोह![3] वे भोग में लिप्त होने के लिए मनुष्यों के देश में उतरते हैं और हंगामा करते हैं, और चीज़ों में इतनी हलचल पैदा कर देते हैं कि दुनिया एक चंचल और अस्थिर जगह बन जाती है और मनुष्य का दिल घबराहट और बेचैनी से भर जाता है, और उन्होंने मनुष्य के साथ इतना खिलवाड़ किया है कि उसका रूप उस क्षेत्र के एक अमानवीय जानवर जैसा अत्यंत कुरूप हो गया है, जिससे मूल पवित्र मनुष्य का आखिरी निशान भी खो गया है। इतना ही नहीं, वे धरती पर संप्रभु सत्ता ग्रहण करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के कार्य को इतना बाधित करते हैं कि वह मुश्किल से बहुत धीरे आगे बढ़ पाता है, और वे मनुष्य को इतना कसकर बंद कर देते हैं, जैसे कि तांबे और इस्पात की दीवारें हों। इतने सारे गंभीर पाप करने और इतनी आपदाओं का कारण बनने के बाद भी क्या वे ताड़ना के अलावा किसी अन्य चीज़ की उम्मीद कर रहे हैं? राक्षस और बुरी आत्माएँ काफी समय से पृथ्वी पर अंधाधुंध विचरण कर रही हैं, और उन्होंने परमेश्वर की इच्छा और कष्टसाध्य प्रयास दोनों को इतना कसकर बंद कर दिया है कि वे अभेद्य बन गए हैं। सचमुच, यह एक घातक पाप है! ऐसा कैसे हो सकता है कि परमेश्वर चिंतित महसूस न करे? परमेश्वर कैसे क्रोधित महसूस न करे? उन्होंने परमेश्वर के कार्य में गंभीर बाधा पहुँचाई है और उसका घोर विरोध किया है : कितने विद्रोही हैं वे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (7)' से उद्धृत

चीनियों की एक पारंपरिक धारणा है जो यह मानती है कि लोगों को अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा का व्यवहार करना चाहिए। कन्फ्यूशियस ने यही सिखाया है। जो भी संतानोचित निष्ठा का पालन नहीं करता है वह एक असंतानीय संतान है। यह विचार बचपन से ही लोगों के मन में बिठाया गया है, और यह लगभग हर घर में, साथ ही हर स्कूल में और बड़े पैमाने पर पूरे समाज में, सिखाया जाता है। जब किसी व्यक्ति का दिमाग़ इस तरह की चीज़ों से भर गया हो, तो वह सोचता है, "संतानोचित निष्ठा किसी भी चीज़ से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। अगर मैं इसका पालन नहीं करता, तो मैं एक अच्छा इंसान नहीं हूँ—मैं एक असंतानीय बच्चा हूँ, और मेरे पास कोई जमीर न होने के कारण मेरी भर्त्सना की जाएगी।" तुम ऐसा ही सोचते हो, है ना? परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद, तुमने पाया है कि सत्य और परमेश्वर के वचनों में इन बातों का कोई उल्लेख नहीं है। परमेश्वर के वचनों में, लोगों को एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए इसके संबंध में कौन से सिद्धांत का उल्लेख किया गया है? उससे प्रेम करो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, और उससे नफ़रत करो जिससे परमेश्वर नफ़रत करता है। अर्थात्, परमेश्वर जिन्हें प्यार करता है, लोग जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित करते हैं, ये वही लोग हैं जिनसे तुम्हें प्रेम करना चाहिए। जो लोग परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित नहीं करते हैं, परमेश्वर से घृणा करते हैं, उसकी अवज्ञा करते हैं, और जिनसे वो नफरत करता है, ये ही वे लोग हैं जिन्हें हमें भी तिरस्कृत और अस्वीकार करना चाहिए। यही है वह जो परमेश्वर के वचन द्वारा अपेक्षित है। यदि तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, तो वे उससे नफ़रत करते हैं; और अगर वे उससे नफरत करते हैं, तो परमेश्वर निश्चित रूप से उनसे घृणा करता है। इसलिए, यदि तुम्हें अपने माता-पिता से नफ़रत करने के लिए कहा जाए, तो क्या तुम ऐसा कर सकोगे? यदि वे परमेश्वर का विरोध करते और उसे बुरा-भला कहते हैं, तो वे निश्चित रूप से ऐसे लोग हैं जिनसे वह घृणा करता है और शाप देता है। इन परिस्थितियों में, तुम्हें अपने माता-पिता के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, यदि वे परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास में बाधा डालते हैं, या यदि वे नहीं डालते हैं? अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु ने कहा, "कौन है मेरी माता? और कौन हैं मेरे भाई? ... क्योंकि जो कोई मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और मेरी बहिन, और मेरी माता है।" यह कहावत अनुग्रह के युग में पहले से मौजूद थी, और अब परमेश्वर के वचन और भी अधिक उपयुक्त हैं : "उससे प्रेम करो, जिससे परमेश्वर प्रेम करता है और उससे घृणा करो, जिससे परमेश्वर घृणा करता है।" ये वचन बिलकुल सीधे हैं, फिर भी लोग अकसर इनका वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाते। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर द्वारा शापित है, लेकिन बाहर से देखने पर वह काफी अच्छा लगता है, या वह तुम्हारी माता या पिता या कोई संबंधी है, तो संभवत: तुम उस व्यक्ति से घृणा न कर पाओ, और संभवत: तुम दोनों में बड़ी घनिष्ठता और नज़दीकी संबंध भी हो। जब तुम परमेश्वर से ऐसे वचन सुनते हो, तो बेचैन हो जाते हो और उस व्यक्ति के प्रति अपना दिल कठोर नहीं कर पाते या उसका त्याग नहीं कर पाते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि एक पारंपरिक धारणा है, जो तुम्हें बाँधती है। तुम सोचते हो कि यदि तुम ऐसा करोगे, तो स्वर्ग के कोप के भागीदार होगे, स्वर्ग द्वारा दंडित किए जाओगे, यहाँ तक कि समाज द्वारा त्याग दिए जाओगे, और जनमत द्वारा ख़ारिज कर दिए जाओगे। इतना ही नहीं, एक इससे भी अधिक व्यावहारिक समस्या यह होगी कि यह तुम्हारे अंत:करण पर बोझ बन जाएगा। यह अंत:करण तुम्हारे माता-पिता द्वारा तुम्हें बचपन से सिखाई गई बातों से बनता है, या फिर सामाजिक संस्कृति के प्रभाव या संक्रमण से, जिनमें से कोई भी तुम्हारे भीतर सोच के ऐसे तरीके की जड़ रोप देता है, कि तुम परमेश्वर के वचन का अभ्यास नहीं कर पाते और उससे प्यार नहीं कर पाते, जिससे वह प्यार करता है और उससे घृणा नहीं कर पाते, जिससे वह घृणा करता है। हालाँकि अंदर से तुम जानते हो कि तुम्हें उनसे घृणा करनी चाहिए और उन्हें नामंज़ूर कर देना चाहिए, क्योंकि जीवन तुम्हें परमेश्वर से मिला है, तुम्हारे माता-पिता ने नहीं दिया। इंसान को परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और स्वयं को उसे लौटा देना चाहिए। हालाँकि तुम दोनों ऐसा कहते और सोचते हो, लेकिन तुम बस अपना मन बदलकर इसे अभ्यास में नहीं ला सकते। क्या तुम लोग जानते हो कि यहाँ क्या चल रहा है? ऐसा है कि इन चीज़ों ने तुम्हें कसकर और पूरी तरह से बाँध रखा है। शैतान इन चीज़ों का इस्तेमाल तुम्हारे विचारों, तुम्हारे दिमाग और तुम्हारे दिल को बाँधने के लिए करता है, ताकि तुम परमेश्वर के वचनों को स्वीकार न कर सको। ऐसी चीज़ों ने तुम्हें पूरी तरह से भर दिया है, इस बिंदु तक कि तुम्हारे भीतर परमेश्वर के वचनों के लिए कोई स्थान नहीं है। इतना ही नहीं, यदि तुम उसके वचनों का अभ्यास करने का प्रयास करते हो, तो ये चीज़ें तुम्हें भीतर से प्रभावित करती हैं और तुम्हें उसके वचनों और अपेक्षाओं के साथ संघर्षरत कर देती हैं, और तुम्हें इन ग्रंथियों से खुद को छुड़ाने और इस बंधन से आज़ाद होने में अक्षम बना देती हैं। यह निराशाजनक होगा, और, संघर्ष करने की ताक़त के बिना, तुम थोड़ी देर के बाद ही हार मान लोगे। कुछ लोग संघर्ष करके आज़ाद हो जाते हैं, जबकि दूसरे लोग हार मान लेते हैं। "पारंपरिक धारणाएँ और नैतिक मानक निर्णायक होते हैं", वे तो ऐसा सोचते हैं। "हम परमेश्वर के वचनों को अलग रखें। आखिरकार, हम इस दुनिया में रह रहे हैं, और हमें इन लोगों पर भरोसा करना होगा”। नकारात्मक सार्वजनिक राय और निंदा पाने के बजाय, जिसे वे सहन नहीं कर पाएँगे, वे परमेश्वर को अपमानित करना, सच्चाई और परमेश्वर के वचनों का त्याग करना, और खुद को आम राय या पारंपरिक धारणाओं के बंधन के प्रति आत्म-समर्पित कर देना, चुनते हैं। क्या मनुष्य दयनीय नहीं है? क्या उसे परमेश्वर के उद्धार की आवश्यकता नहीं है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

प्रत्येक व्यक्ति जो हमारे वर्तमान समाज में रहता है, चाहे उसने कितनी भी शिक्षा प्राप्त की हो, अपनी सोच और अपने नज़रिए के भीतर कई चीज़ें रखता है। विशेष रूप से, पारंपरिक चीनी महिलाएँ यह मानती हैं कि एक महिला का स्थान घर में होता है, कि महिलाओं को अच्छी पत्नियाँ और माताएँ बनना चाहिए जो अपना पूरा जीवन अपने पति और बच्चों के लिए व्यतीत और समर्पित कर दें। अपने परिवार के लिए एक दिन में तीन बार भोजन बनाना, साफ़-सफाई करना, कपड़े धोना—उन्हें घर में यह सब कुछ करना चाहिए, और इसे असाधारण रूप से अच्छी तरह से करना चाहिए। यह निश्चित रूप से, "अच्छी पत्नी और माँ" बनने के लिए हमारे समाज का मानक है। हर महिला का मानना है कि उसे इसी तरह से काम करना चाहिए, और अगर वह नहीं करती है, तो वह एक अच्छी महिला नहीं होगी, और वह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ के खिलाफ़ चली गई होगी, और नैतिकता के मानकों का उल्लंघन कर लेगी। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने इस भूमिका को खराब तरीके से निभाया है या समाज के मानकों की परवाह नहीं की है, और अब वे अंतरात्मा की आवाज़ से तिलमिला उठे हैं, और महसूस करते हैं कि उन्होंने अपने बच्चों और अपने पति के साथ अन्याय किया है। क्या परमेश्वर में विश्वास करना और अपने कर्तव्य को निभाने के लिए बुलाया जाना तुम्हारे द्वारा एक अच्छी पत्नी और माँ, एक आदर्श माँ, एक महिला जो मानकों के अनुरूप हो, बनने के साथ संघर्ष पैदा करता है? यदि तुम एक अच्छी पत्नी और माँ बनने की इच्छा रखती हो, तो तुम अपना सौ प्रतिशत समय अपने कर्तव्य को ही निभाने पर नहीं लगा सकती हो। जब एक पत्नी और माँ होने की भूमिका और तुम्हारे कर्तव्य के बीच संघर्ष पैदा होता है, तो तुम किसे चुनती हो? यदि तुमने अपने कर्तव्य को पूरा करना चुना और परमेश्वर के घर के कार्य की ज़िम्मेदारी ली, परमेश्वर के प्रति पूरे समर्पण के साथ अपना भरसक प्रयास किया, और ऐसा करने में, एक पत्नी और माँ होने के दायित्वों को दरकिनार करने के लिए तुम बाध्य बनी, तो तुम क्या महसूस करोगी? तुम्हारे मन में क्या गुंजायमान होगा? क्या तुम्हें ऐसा लगेगा कि तुमने अपने बच्चों को निराश किया है? असफलता की यह भावना, यह बेचैनी कहाँ से आती है? क्या तुम तब असहज महसूस करती हो जब तुमने किसी सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा न किया हो? तुम न तो बेचैन होती हो, न ही तुम दोषी महसूस करती हो, क्योंकि यह सकारात्मक बात तुम्हारे विचारों, दृष्टिकोणों और विवेक में उतरी हुई ही नहीं है। तो फिर, उनमें क्या उतरा हुआ है? एक अच्छी पत्नी और माँ होना। यदि तुम एक अच्छी पत्नी और माँ नहीं हो, तो तुम एक अच्छी महिला, एक "सभ्य" महिला, नहीं हो। क्या यह तुम्हारा मानक नहीं है? यह मानक तुम्हें बाँध देता है; परमेश्वर में विश्वास करते और अपना कर्तव्य को निभाते समय, तुम इसे अपने साथ ढ़ोने के लिए बाध्य होती हो। जब तुम्हारे कर्तव्य को निभाने और एक अच्छी पत्नी और एक स्नेही माँ होने के बीच टकराव पैदा होता है, तब हालाँकि तुम अनिच्छापूर्वक अपना कर्तव्य निभाने या परमेश्वर के प्रति वफ़ादार बने रहने को चुन सकती हो, तुम्हारे दिल में (फिर भी) कुछ बेचैनी होगी, और उससे भी अधिक एक अपराध-बोध होगा। जब तुम अपना कर्तव्य नहीं निभा रही होती हो, तो तुम घर जाती हो और अपने बच्चों या अपने पति की अच्छी देखभाल करती हो, अपनी अनुपस्थिति के लिए क्षतिपूर्ति करती हो, भले ही ऐसा करने में तुम देह का अधिक कष्ट झेलती हो। यह एक मानसिक निषेधाज्ञा है जो तुमसे ऐसा कराती है। फिर भी, क्या हमने परमेश्वर के सामने अपनी ज़िम्मेदारी को, अपने दायित्व और अपने कर्तव्य को, निभाया है? जब हम अपने कर्तव्य में असावधान और बेपरवाह होते हैं, या जब हम इसे करने की इच्छा नहीं रखते हैं, तो क्या हमारे दिल में एक अपराध-बोध, या तिरस्कार की कोई भावना होती है? हमें ज़रा-सा भी धिक्कार महसूस नहीं होता है, क्योंकि लोगों की मानवता में ऐसी कोई चीज़ मौजूद ही नहीं है। इसलिए, यद्यपि तुम अपने कर्तव्यों को थोड़ा-सा निभा सकते हो, तुम सत्य और परमेश्वर के मानकों से काफ़ी दूर बने रहते हो। परमेश्वर ने कहा था, "परमेश्वर ही मनुष्य के जीवन का स्रोत है।" इन वचनों का क्या अर्थ है? ये सब लोगों को यह बताने के लिए होते हैं: हमारा जीवन और हमारी आत्माएँ परमेश्वर से आती हैं, न कि हमारे माता-पिता से, और निश्चित रूप से मानव जाति, या हमारे इस समाज से, या प्रकृति से तो बिल्कुल नहीं। वे चीज़ें हमें परमेश्वर द्वारा दी गईं थीं, और, हालाँकि हमारे शरीरों को हमारे माता-पिता द्वारा जन्म दिया गया था, यह परमेश्वर ही है जो हमारे भाग्य को नियंत्रित करता है। परमेश्वर में हमारा विश्वास कर सकना एक अवसर है जो उसने हमें दिया है; यह उसके द्वारा विहित है, और यह उसका अनुग्रह है। इसलिए, तुम दायित्वों को पूरा करने या किसी अन्य व्यक्ति की ज़िम्मेदारी लेने के लिए बाध्य नहीं हो; तुम्हारा एकमात्र दायित्व परमेश्वर के लिए उस कर्तव्य को निभाना है जो एक सृजित प्राणी को करना चाहिए। यही वो है जो इंसान से सबसे अधिक अपेक्षित है, और किसी व्यक्ति के जीवन के सभी महत्वपूर्ण मामलों के बीच, यह वो है जिसे पूरा करना सबसे अधिक आवश्यक होता है—यह किसी के जीवन का प्रमुख मामला है। यदि तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह नहीं निभाती हो, तो तुम एक ईमानदार सृजित प्राणी नहीं हो। इंसान की नज़रों में, तुम एक अच्छी पत्नी और माँ हो सकती हो, एक अद्भुत गृहिणी, एक कर्तव्यनिष्ठ बेटी, और सभ्य समाज की एक प्रतिष्ठित सदस्या, लेकिन, परमेश्वर के सामने, तुम एक वो इंसान हो जो उसके खिलाफ़ विद्रोह करता है, जो अपने दायित्वों या कर्तव्यों में से कुछ भी नहीं निभाता है, और जो परमेश्वर से स्वीकृत आदेश को पूरा नहीं करता है। क्या ऐसे व्यक्ति का अब भी परमेश्वर के सामने कोई स्थान होगा? ऐसा व्यक्ति तांबे की एक कौड़ी के बराबर भी नहीं है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

यह बात तो निश्चित है कि पारंपरिक संस्कृति सत्य नहीं है, लेकिन क्या लोगों के लिए इतना ही जानना काफ़ी है कि यह सत्य नहीं है? यह तथ्य तो एक तरफ़ कि यह सत्य नहीं है; हमें इसका विश्लेषण करने की आवश्यकता क्यों है? इसका मूल कारण क्या है? समस्या का सार क्या है? लोग इस चीज़ को कैसे छोड़ सकते हैं? इसका विश्लेषण करने का उद्देश्य यह है कि इसके सिद्धांतों, विचारों और अवलोकनों की पूरी तरह से एक नई धारणा तुम्हारे दिल की गहराई में पैदा की जाए। तो, इस पूरी तरह से नई धारणा पर पहुंचने के लिए क्या करना चाहिए? सबसे पहले तो तुम्हें यह पता होना चाहिए कि पारंपरिक संस्कृति कहां से आती है—यह शैतान की तरफ़ से आती है। और क्या शैतान ने यह सीधे तौर पर कहा या किया है? नहीं, उसने ऐसा नहीं किया। शैतान ने अलग-अलग समय पर, विभिन्न प्रसिद्ध लोगों के माध्यम से, इन विचारों को जन्म दिया है। उसने इन तथाकथित व्याख्याओं और सिद्धांतों का निर्माण किया है और ये धीरे-धीरे व्यवस्थित हो गए हैं, ठोस हो गए हैं, और लोगों के जीवन में शामिल होकर एक प्रमुख अंग बन गए हैं; वे धीरे-धीरे मानवजाति में फैल गए हैं, और थोड़े-थोड़े करके, ये अवधारणाएं, ये स्पष्टीकरण और सिद्धांत लोगों की सोच में शामिल हो गए हैं। लोगों की सोच में शामिल होने के बाद से, लोग इन अवधारणाओं को उन सकारात्मक चीज़ों में सबसे बढ़कर मानने लगे हैं जिनका उन्हें अभ्यास और पालन करना चाहिए, और शैतान ने इन चीज़ों का उपयोग लोगों की सोच को जकड़ने और नियंत्रित करने के लिए किया है। इस तरह के वातावरण में ही मानवजाति लगातार शिक्षित, पोषित और नियंत्रित होती जा रही है, और यह सोच पीढ़ी दर पीढ़ी वर्तमान तक चली आ रही है। इन सभी पीढ़ियों का मानना है कि पारंपरिक संस्कृति सही और अच्छी है, और किसी ने भी इस तथाकथित अच्छी, सही बात का विश्लेषण करने का प्रयास नहीं किया है ताकि इसकी सही उत्पत्ति और स्रोत का पता लगाया जा सके। समस्या की गंभीरता इसी में निहित है। परमेश्वर के विश्वासी भी, जिन्होंने कई वर्षों तक उसके वचनों को पढ़ा है, अभी भी मानते हैं कि ये बातें सही और सकारात्मक हैं, और उन्हें लगता है कि सत्य के बदले इनका इस्तेमाल किया जा सकता है और ये परमेश्वर के वचन की जगह ले सकती हैं। इससे भी बदतर बात यह है कि कुछ लोगों को लगता है कि भले ही तुम परमेश्वर का वचन कितनी ही बार पढ़ लो, तुम इंसानों के बीच रहते हो, और तुम तथाकथित पारंपरिक अवधारणाओं और संस्कृति को नहीं छोड़ सकते हो, जैसे कि तीन आज्ञापालन और चार गुण या पांच नैतिकताएं, क्योंकि ये हमारे पूर्वजों से चले आ रहे हैं, और चूंकि हमारे पूर्वज ऋषि थे, हम, केवल परमेश्वर में विश्वास के कारण, उनकी शिक्षाओं के ख़िलाफ़ नहीं जा सकते, हम अपने आदरणीय पूर्वजों की इन शिक्षाओं के साथ न तो कोई छेड़छाड़ कर सकते हैं, न इन्हें त्याग सकते हैं। ये कुछ धारणाएं हैं जो लोगों के दिमाग में हैं, और लोग इन चीज़ों से अनजाने में नियंत्रित होते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (4)' से उद्धृत

हमारे दिल में मौजूद हर एक चीज़ परमेश्वर के विरोध में है। इसमें वे चीज़ें शामिल हैं जो हमें लगता है कि अच्छी हैं, और वे चीज़ें भी जिन्हें हम पहले से ही सकारात्मक मानते हैं। हमने इन चीज़ों को सत्यों के रूप में, सामान्य मानवता के हिस्से के रूप में और सकारात्मक चीज़ों के रूप में सूचीबद्ध किया है; हालाँकि, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, ये वे चीजें हैं जिनसे वह घृणा करता है। परमेश्वर द्वारा बोले गए सत्यऔर जो हम सोचते हैं, उसके बीच की खाई को नापा नहीं जा सकता। इसलिए, हमें स्वयं को जानना चाहिए। हमारे विचारों, दृष्टिकोणों और क्रियाओं से लेकर हमें जो सांस्कृतिक शिक्षा प्राप्त हुई है, उसमें से प्रत्येक चीज़ गहराई से समझने और विश्लेषण किए जाने के योग्य है। इनमें से कुछ चीज़ें सामाजिक परिवेश से आती हैं, कुछ परिवारों से आती हैं, कुछ स्कूली शिक्षा से आती हैं, और कुछ किताबों से आती हैं। कुछ हमारी कल्पनाओं और धारणाओं से भी आती हैं। इस प्रकार की चीज़ें सबसे अधिक भयावह होती हैं, क्योंकि वे हमारे वचनों और कार्यों को बांधती और नियंत्रित करती हैं, हमारे मन पर हावी होती हैं, और हम जो भी करते हैं, उसमें हमारे उद्देश्यों, इरादों और लक्ष्यों का मार्गदर्शन करती हैं। अगर हम इन चीजों को बाहर न निकालें तो हम स्वयं में कभी भी परमेश्वर के वचनों को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाएँ गे, और हम कभी भी परमेश्वर की अपेक्षाओं को बेझिझक स्वीकार कर उन्हें अभ्यास में नहीं ला पाएँ गे। जब तक तुम अपने स्वयं के विचारों और दृष्टिकोणों को, और जिन चीज़ों को तुम सही मानते हो, उन्हें मन में रखोगे, तब तक तुम परमेश्वर के वचनों को कभी भी पूरी तरह से या बेहिचक स्वीकार नहीं करोगे, न ही तुम उनका मूल रूप में अभ्यास करोगे; निश्चित रूप से पहले अपने मन में उन्हें संसाधित करने के बाद ही तुम उन्हें अभ्यास में डालोगे। तुम इसी तरीक़े से काम करोगे, और दूसरों की मदद करने में भी तुम्हारा यही तरीक़ा होगा : भले ही तुम परमेश्वर के वचनों पर सहभागिता भी करो, लेकिन इसमें सदैव तुम्हारी अशुद्धियाँ मिली होंगी, तुम्हें लगेगा कि सत्य को अभ्यास में लाने का यही अर्थ है, कि तुमने सत्य को समझ लिया है, और तुम्हारे पास सब कुछ है। क्या मानव जाति की स्थिति दयनीय नहीं है? क्या यह भयावह नहीं है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

मानव जाति की पारंपरिक संस्कृति और अस्तित्व का तरीका परिवर्तनों या समय के अंतराल के कारण सत्य नहीं बन जाएगा, और न ही परमेश्वर के वचन मानव जाति की निंदा या विस्मृति के कारण मनुष्य के शब्द बन जाएंगे। यह सार कभी नहीं बदलेगा; सत्य हमेशा सत्य होता है। यहाँ कौन-सा तथ्य मौजूद है? मानव जाति द्वारा संक्षेप में बताई गई वे सभी बातें जो शैतान से उत्पन्न होती हैं—वे सभी मानवीय कल्पनाएँ और धारणाएँ हैं, यहाँ तक कि मनुष्य के जोश से भी हैं, और सकारात्मक चीजों से उनका कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी ओर, परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के सार और हैसियत की अभिव्यक्ति हैं। वह इन वचनों को किस कारण से व्यक्त करता है? मैं क्यों कहता हूँ कि वे सत्य हैं? इसका कारण यह है कि परमेश्वर सभी चीजों के सभी नियमों, सिद्धांतों, जड़ों, सारों, वास्तविकताओं और रहस्यों पर शासन करता है, वे उसकी मुट्ठी में हैं, और एकमात्र परमेश्वर ही उनकी उत्पत्ति जानता है और जानता है कि वास्तव में उनकी जड़ें क्या हैं। इसलिए, परमेश्वर के वचनों में सभी चीजों की जो उल्लिखित परिभाषाएं हैं, बस वही सबसे सही हैं, और परमेश्वर के वचनों में मानव जाति से अपेक्षाएँ मानव जाति के लिए एकमात्र मानक हैं—एकमात्र मापदंड जिसके अनुसार मानव जाति को अस्तित्व में रहना चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में "'सत्य क्या है' पर" से उद्धृत

फुटनोट :

1. "प्राकृतिक रूप से नष्ट न होने वाले" का प्रयोग यहाँ व्यंग्य के रूप में किया गया है, जिसका अर्थ है कि लोग अपने ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिक दृष्टिकोण में कठोर हैं।

2. "निगल" जाना शैतानों के राजा के शातिर व्यवहार के बारे में बताता है, जो लोगों को पूरी तरह से मोह लेता है।

3. "सहअपराधियों का गिरोह" का वही अर्थ है, जो "गुंडों के गिरोह" का है।

क. चार पुस्तकें और पाँच क्लासिक्स चीन में कन्फ्यूशीवाद की प्रामाणिक किताबें हैं।

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