153. धर्म की धर्मशास्त्रीय धारणाओं के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) धर्म की धर्मशास्त्रीय धारणाएँ सत्य का झूठा दावा करती हैं। वे नकली होती हैं, सब की सब विशिष्ट सिद्धांत होती हैं, जिनसे मनुष्य परमेश्वर को सीमित करता और उसका विरोध करता है;

(2) धर्म की धर्मशास्त्रीय धारणाएँ पवित्र आत्मा के प्रबोधन से नहीं आती हैं, बल्कि मनुष्य की धारणाओं, कल्पनाओं, दलील और आगमनात्मक तर्क से आती हैं। वे चालबाजों की बनावटें होती हैं;

(3) धर्म की धर्मशास्त्रीय धारणाएँ सत्य नहीं होती हैं और लोगों को बचा नहीं सकती हैं। कोई व्यक्ति जितना अधिक धर्मशास्त्रीय ज्ञान की तलाश करता है, वह उतना ही अधिक अभिमानी और दंभी बन जाता है, और उतना ही अधिक वह सत्य का खंडन और परमेश्वर का विरोध करता है;

(4) धर्म की धर्मशास्त्रीय धारणाएँ अत्यंत कपटपूर्ण होती हैं, और जो व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास तो करता है, लेकिन सत्य की तलाश नहीं करता है, वह उनके द्वारा मोहित और नियंत्रित होने के लिए अत्यंत संभावित होता है, और वह इस प्रकार विनाश की ओर चल पड़ता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

ईसाइयत में वे सभी जो धर्मशास्त्र, पवित्र ग्रंथ और यहाँ तक कि परमेश्वर के कार्य का इतिहास भी पढ़ते हैं—क्या वे सच्चे विश्वासी हैं? क्या वे उन विश्वासियों और अनुयायियों से भिन्न हैं, जिनके बारे में परमेश्वर बात करता है? क्या परमेश्वर की दृष्टि में वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं? (नहीं।) वे धर्मशास्त्र का अध्ययन करते हैं, वे परमेश्वर का अध्ययन करते हैं। क्या उनमें कोई अंतर है, जो परमेश्वर का अध्ययन करते हैं और जो अन्य चीजों का अध्ययन करते हैं? कोई अंतर नहीं है। वे बिलकुल उन्हीं लोगों के समान हैं जो इतिहास पढ़ते हैं, जो दर्शन-शास्त्र पढ़ते हैं, जो कानून पढ़ते हैं, जो जीव विज्ञान पढ़ते हैं, जो खगोल विज्ञान पढ़ते हैं—वे बस विज्ञान या जीव विज्ञान या अन्य विषयों को पसंद नहीं करते; वे सिर्फ धर्मशास्त्र पसंद करते हैं। ये लोग परमेश्वर के कार्य में सुरागों और सूत्रों की खोज करते हुए परमेश्वर का अध्ययन करते हैं—और इनकी शोध से क्या निकलता है? क्या वे यह तय कर पाते हैं कि क्या परमेश्वर का अस्तित्व है? वे ऐसा कभी नहीं कर पाएंगे। क्या वे परमेश्वर की इच्छा को तय कर पाते हैं? (नहीं।) क्यों? क्योंकि वे शब्दों और वाक्यांशों में जीते हैं, वे ज्ञान में जीते हैं, वे दर्शन-शास्त्र में जीते हैं, वे मनुष्यों के मस्तिष्कों और विचारों में जीते हैं। वे कभी भी परमेश्वर को नहीं देख पाएंगे, वे कभी भी पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त नहीं कर पाएंगे। परमेश्वर उन्हें किस तरह परिभाषित करता है? अविश्वासियों के रूप में, गैर-विश्वासियों के रूप में। ये अविश्वासी और गैर-विश्वासी तथाकथित ईसाई समुदाय में घुलमिल जाते हैं, परमेश्वर में विश्वास करने वालों की तरह व्यवहार करते हुए, ईसाइयों की तरह व्यवहार करते हुए—पर क्या वे सचमुच परमेश्वर की आराधना करते हैं? क्या वे सचमुच उसकी आज्ञा का पालन करते हैं? नहीं। क्यों? एक बात निश्चित है : ऐसा इसलिए है क्योंकि अपने हृदयों में वे यह विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर ने दुनिया बनाई है, कि वह सभी चीजों पर शासन करता है, कि वह देहधारण कर सकता है, और इससे भी कम वे यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व है। यह अविश्वास क्या दर्शाता है? संदेह, नकार, और यह उम्मीद करने का रवैया भी कि परमेश्वर की भविष्यवाणियाँ—खासकर आपदाओं के बारे में—सच साबित नहीं होंगी और पूरी नहीं होंगी। यह वह रवैया है जो वे परमेश्वर में विश्वास के प्रति अपनाते हैं और यह उनकी तथाकथित आस्था का सार और असली चेहरा भी है। ये लोग परमेश्वर का अध्ययन करते हैं क्योंकि उनकी विद्वत्ता और धर्मशास्त्र के ज्ञान में विशेष रुचि है और उन्हें परमेश्वर के कार्यों के ऐतिहासिक तथ्यों में भी दिलचस्पी है। वे धर्मशास्त्र पढ़ने वाले बुद्धिजीवियों के एक झुंड से ज्यादा और कुछ भी नहीं हैं। ये "बुद्धजीवी" परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते, तो जब परमेश्वर अपने काम पर आता है और उसके वचन साकार होते हैं तो ये लोग क्या करते हैं? जब वे सुनते हैं कि परमेश्वर देहधारी बन गया है और नया कार्य कर रहा है तो उनकी पहली प्रतिक्रिया क्या होती है? "असंभव!" वे परमेश्वर के नए कार्य का उपदेश देने वाले की निंदा करते हैं, और ऐसे लोगों को मार देना तक चाहते है। यह किस चीज की अभिव्यक्ति है? क्या यह इस बात की अभिव्यक्ति नहीं है कि वे पक्के मसीह-विरोधी हैं? वे परमेश्वर के कार्य और उसके वचनों के पूरे होने के प्रति शत्रुता का भाव रखते हैं, उसके देहधारी अस्तित्व की तो बात ही क्या: "अगर तुमने देहधारण नहीं किया था और तुम्हारे वचन पूरे नहीं हुए हैं, तो तुम परमेश्वर हो। अगर तुम्हारे वचन पूरे हुए हैं और तुमने देहधारण किया था, तो तुम नहीं हो।" इसका दूसरा पहलू क्या है? यह कि जब तक उनका अपना अस्तित्व है, वे परमेश्वर के देहधारण की अनुमति नहीं देंगे। क्या यह एक प्रामाणिक मसीह-विरोधी होना नहीं है? यह असली मसीह-विरोध है। क्या धर्मपरायण समुदाय में ऐसे दावे मौजूद हैं? ऐसे दावे बड़े जोर-शोर से और पूरी दृढ़ता से किए जाते हैं : "यह गलत है कि परमेश्वर ने देहधारण किया है, यह असंभव है! कोई भी देहधारण एक ढोंग है।" कुछ लोग पूछते हैं, "क्या इन लोगों को गुमराह किया गया है?" बिलकुल नहीं। उनकी बस परमेश्वर में सच्ची आस्था ही नहीं है। वे परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते, वे परमेश्वर के देहधारण में विश्वास नहीं करते, वे दुनिया को बनाने के परमेश्वर के कार्य में विश्वास नहीं करते, और इससे भी कम वे परमेश्वर के क्रूस पर चढ़ने और समूची मानवजाति को पाप से मुक्ति दिलाने के कार्य में विश्वास करते हैं। उनके लिए वह धर्मशास्त्र, जिसका वे अध्ययन करते हैं, ऐतिहासिक घटनाओं की एक शृंखला है, यह एक तरह का सिद्धांत या मत है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (7)' से उद्धृत

फरीसियों के पाखंड की मुख्य अभिव्यक्ति क्या थी? उन्होंने केवल पवित्र ग्रंथ को डूबकर पढ़ा और सत्य को तलाश नहीं किया। उन्होंने जब परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, तो प्रार्थना या तलाश नहीं की; इसके बजाय, उन्होंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, परमेश्वर ने क्या कहा और क्या किया था उसे पढ़ा, और इस तरह उसके वचनों को एक प्रकार के मत, एक सिद्धांत में बदल दिया जिसे उन्होंने दूसरों को पढ़ाया। यही है परमेश्वर के वचनों को डूबकर पढ़ना। तो उन्होंने ऐसा क्यों किया? ऐसी क्या चीज़ थी जिसे उन्होंने डूबकर पढ़ा? उनकी दृष्टि में, ये परमेश्वर के वचन नहीं थे, परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं थे, सत्य तो और भी कम थे, बल्कि वे विद्या का एक रूप थे। ऐसी विद्या को, उनकी दृष्टि में, आगे बढ़ाया जाना चाहिए था, इसका प्रसार किया जाना चाहिए था, और यही परमेश्वर और सुसमाचार के मार्ग का प्रसार भी था। इसी को उन्होंने "प्रवचन" कहा, और जिस धर्मोपदेश का उन्होंने प्रवचन दिया वह धर्मशास्त्र था।

... फरीसियों को जिस धर्मशास्त्र और मत में एक प्रकार के ज्ञान के रूप में महारत हासिल थी उसका उपयोग उन्होंने लोगों की निंदा करने और उन्हें सही या गलत आँकने के औज़ार के रूप में किया। इसका उपयोग उन्होंने प्रभु यीशु पर भी किया—और इस तरह प्रभु यीशु की निंदा की गई। उनके द्वारा लोगों का मूल्यांकन, और उनके साथ उनका व्यवहार कभी भी उनके सार पर या इस बात पर आधारित नहीं था कि उन्होंने जो कुछ कहा वह सही था या गलत, उनके वचनों का स्रोत या उत्पत्ति तो दूर की बात थी। उन्होंने केवल उन्ही कड़े शब्दों और सिद्धांतों के आधार पर लोगों की निंदा की और उन्हें आँका, जिसमें उन्हें महारत हासिल थी। और इसीलिए, इन फरीसियों ने यह जानते हुए भी कि प्रभु यीशु ने जो कुछ किया वह पाप नहीं था, और कानून का उल्लंघन नहीं था, उसकी निंदा की, क्योंकि प्रभु यीशु ने जो कहा वह उनकी महारत वाले ज्ञान और विद्या तथा उनके द्वारा प्रतिपादित धर्मशास्त्र के मत के विपरीत लग रहा था। और फरीसी इन शब्दों और वाक्यांशों के ऊपर अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाहते थे, वे इस ज्ञान से चिपट गए थे और इसे छोडना नहीं चाहते थे। अंत में एकमात्र संभावित परिणाम क्या रहा? उन्होंने इस बात को स्वीकार नहीं किया कि प्रभु यीशु मसीहा हैं जो आएंगे, या प्रभु यीशु ने जो कहा उसमें सत्य था, यह मानना तो दूर की बात थी कि प्रभु यीशु ने जो किया वह सत्य के अनुरूप था। उन्होंने प्रभु यीशु की निंदा करने के लिए कुछ निराधार आरोप ढूँढ निकाले—लेकिन वास्तव में, क्या वे अपने हृदय में इस बात को जानते थे कि उन्होंने जिन पापों के लिए उसकी निंदा की, क्या वे जायज़ थे? वे जानते थे। फिर भी उन्होंने इस तरह उसकी निंदा क्यों की? (वे इस बात पर विश्वास नहीं करना चाहते थे कि उनके मन में जो उच्च और शक्तिशाली परमेश्वर है वह प्रभु यीशु हो सकता है, एक साधारण मनुष्य के पुत्र की इस छवि वाला।) वे इस तथ्य को स्वीकार नहीं करना चाहते थे। और इसे स्वीकार करने से इनकार की उनकी प्रकृति क्या थी? क्या इसमें परमेश्वर से तर्क करने की कोशिश नहीं की गई थी? उनका मतलब यह था, "क्या परमेश्वर ऐसा कर सकता है? यदि परमेश्वर देहधारण करता, तो उसने निश्चित रूप से किसी प्रतिश्ठित वंश में जन्म लिया होता। इसके अलावा, उसे शास्त्रियों और फरीसियों का संरक्षण स्वीकार करना चाहिए, इस ज्ञान को सीखना चाहिए, और पवित्र ग्रंथ को खूब पढ़ना चाहिए। इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद ही वह ‘देहधारी’ की उपाधि ग्रहण कर सकता है।" उनका विश्वास था कि, सबसे पहले, तुम इस प्रकार योग्य नहीं हो, इसलिए तुम परमेश्वर नहीं हो; दूसरे, इस ज्ञान के बिना तुम परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते, तुम्हारा परमेश्वर होना तो दूर की बात रही; तीसरे, तुम मंदिर के बाहर काम नहीं कर सकते—तुम अब मंदिर में नहीं हो, तुम हमेशा पापियों के बीच रहते हो, इसलिए तुम जो काम करते हो वह परमेश्वर के कार्य क्षेत्र से परे है। उनकी निंदा का आधार कहाँ से आया? पवित्र ग्रंथ से, मनुष्य के मन से, और उस धर्मशास्त्रीय शिक्षा से जो उन्होंने प्राप्त की थी। क्योंकि वे धारणाओं, कल्पनाओं, और ज्ञान के घमंड में डूबे हुए थे, इसलिए वे इस ज्ञान को सही, सत्य और मूल आधार मान रहे थे, और यह कि परमेश्वर कभी भी इन चीज़ों के विरुद्ध नहीं जा सकता। क्या उन्होंने सत्य की तलाश की? नहीं की। उन्होंने केवल खुद की धारणाओं और कल्पनाओं, और ख़ुद के अनुभवों को खंगाला, और इनका उपयोग उन्होंने परमेश्वर को परिभाषित करने और यह निर्धारित करने के लिए किया कि वह सही है या गलत। इसका अंतिम परिणाम क्या निकला? उन्होंने परमेश्वर के कार्य की निंदा की और उसे क्रूस पर चढ़ा दिया।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (7)' से उद्धृत

यह कैसे है कि धर्म के लोग जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, "ईसाइयत" में सिमट लिए गए हैं? ऐसा क्यों है कि आज उन्हें परमेश्वर के घर, परमेश्वर की कलीसिया, परमेश्वर के कार्य की विषय-वस्तु की बजाय, एक धार्मिक समूह के रूप में वर्गीकृत किया जाता है? उनके पास एक हठधर्मिता है, वे परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों को, और उन्होंने जो वचन बोले उनको, एक पुस्तक में, शिक्षण सामग्री में, संकलित करते हैं, और फिर सभी प्रकार के धर्मशास्त्रियों को भर्ती करके प्रशिक्षित करने के लिए वे स्कूल खोलते हैं। क्या ये धर्मशास्त्री, सत्य का अध्ययन कर रहे हैं? (नहीं)। तो वे क्या पढ़ रहे हैं? वे धर्मशास्त्रीय ज्ञान का अध्ययन कर रहे हैं, जिसका परमेश्वर के कार्य से, या परमेश्वर द्वारा कही गईं सच्चाइयों से, कोई सरोकार नहीं होता। और ऐसा करके, वे खुद को ईसाइयत में सिमट रहे हैं। ईसाइयत किसकी हिमायत करती है? यदि तुम किसी कलीसिया में जाते हो, तो लोग तुमसे पूछेंगे कि तुमने परमेश्वर में कब से विश्वास किया है, और जब तुम कहते हो कि तुमने अभी ही शुरू किया है, तो वे तुम्हारी उपेक्षा करेंगे। लेकिन अगर तुम एक बाइबल को सीने से लगाकर भीतर जाते हो, और यह कहते हो कि "मैं फलां-फलां धर्मशास्त्रीय मदरसे का स्नातक हूँ," तो वे तुम्हें आकर एक सम्मान का स्थान लेने के लिए कहेंगे। यह ईसाइयत है। उन सभी लोगों ने जो मंच पर खड़े होते हैं, धर्मशास्त्र का अध्ययन किया होता है, वे मदरसा-प्रशिक्षित होते हैं, धर्मशास्त्रीय ज्ञान और सिद्धांत से युक्त होते हैं—वे मूल रूप से ईसाई धर्म के आधार-स्तंभ होते हैं। ईसाइयत ऐसे लोगों को मंच पर उपदेश देने, घूम-घूमकर प्रचार करने और काम करने के लिए प्रशिक्षित करती है। वे लोग सोचते हैं कि ईसाइयत का मूल्य धर्मशास्त्र के इन विद्यार्थियों, इन पादरियों और धर्मशास्त्रियों में निहित है जो उपदेश देते हैं; वे उनकी पूंजी होते हैं। यदि किसी कलीसिया का पादरी एक मदरसा का स्नातक हो, पवित्रशास्त्र को उजागर करने में कुशल हो, उसने कुछ आध्यात्मिक पुस्तकों को पढ़ा हो, और उसके पास थोड़ा ज्ञान और शब्दों का एक कौशल हो, तो वह कलीसिया पनपती है, और अन्य कलीसियाओं की तुलना में उसकी प्रतिष्ठा बहुत बेहतर होती है। ईसाइयत में ये लोग किसकी हिमायत करते हैं? ज्ञान की। और यह ज्ञान कहाँ से आता है? इसे प्राचीन काल से सौंपा गया है। प्राचीन काल में पवित्रशास्त्र था, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी पारित किया गया था, प्रत्येक पीढ़ी इसे पढ़ती और सीखती आई है, आज तक। इंसान ने बाइबल को अलग-अलग वर्गों में विभाजित किया और लोगों के पढ़ने और सीखने के लिए अलग-अलग संस्करण तैयार किए। लेकिन जो कुछ वे सीखते हैं, वह सत्य को समझने और परमेश्वर को जानने का, या परमेश्वर की इच्छा को समझने और परमेश्वर का भय हासिल करने और बुराई को दूर करने का, तरीका नहीं होता है; इसके बजाय, वे उसमें निहित ज्ञान को ऊपर से ताकते हैं। ज़्यादा से ज़्यादा, वे उसमें निहित रहस्यों को देखते हैं, वे यह जाँचने के लिए इसमें देखते हैं कि ‘प्रकाशित वाक्य’ पुस्तक की कौन-सी भविष्यवाणियाँ एक निश्चित अवधि में पूरी हुईं, कब महान आपदाएँ आएँगी, कब सहस्राब्दी आएगी—ये वो चीज़ें हैं जिन्हें वे पढ़ते हैं। और क्या वे जिसका अध्ययन करते हैं वह सत्य से जुड़ा होता है? नहीं। वे उन चीज़ों का अध्ययन क्यों करते हैं जिनका सत्य से कोई संबंध नहीं? जितना अधिक वे उनका अध्ययन करते हैं, उतना ही अधिक वे सोचते हैं कि वे समझते हैं, और उतना ही अधिक वे खुद को पत्रों और सिद्धांत से लैस करते हैं। उनकी पूंजी भी बढ़ती है। उनकी विशिष्टताएँ जितनी अधिक होती हैं, उन्हें लगता है कि वे उतने ही अधिक सक्षम हैं, कि परमेश्वर में उनका विश्वास उतना ही अधिक मुक़म्मल है, और उनके बचाए जाने और स्वर्गीय राज्य में प्रवेश की संभावना को वे उतना ही अधिक मानते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (7)' से उद्धृत

धर्म से जुड़े लोग, जो प्रभु में विश्वास रखते हैं, बाइबल के कुछ जाने-पहचाने अंशों को याद कर लेने पर ही ज्यादा ध्यान देते हैं; जो जितना ज्यादा याद कर लेता है वह उतना ही आध्यात्मिक और दूसरों की प्रशंसा का पात्र बन जाता है। वे प्रतिष्ठित और ऊंचे पदों पर आसीन व्यक्ति होते हैं। पर दरअसल, असली जिंदगी में दुनिया, मनुष्य जाति और सभी तरह के लोगों के प्रति उनका दृष्टिकोण सांसारिक लोगों के जैसा ही होता है—इसमें कोई बदलाव नहीं आता है। इससे एक बात साबित होती है : वे अंश जो उन्होंने याद कर लिए हैं उनकी जिंदगी का हिस्सा नहीं बने हैं; यह बिल्कुल साफ दिखाई देता है कि वे सिद्धांतों और धर्म-सिद्धांतों का एक पुलिंदा भर हैं, और उन्होंने अपने जीवन को नहीं बदला है। अगर जिस पथ का तुम लोग अनुसरण करते हो वह बिल्कुल वही है जिसका धर्मनिष्ठ लोग अनुसरण करते हैं तो वह तुम लोगों को ईसाई धर्म में विश्वास करने वाले बना देता है; तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हो और तुम उसके कार्य का अनुभव नहीं कर रहे हो। कुछ लोग जो लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास नहीं करते उन विश्वासियों की प्रशंसा करते हैं जिनके वक्तव्य एक ठोस आधार पर आधारित होते हैं। वे ऐसे लोगों को वहाँ बैठे देखते हैं जो दो-तीन घंटे तक आसानी से बोल सकते हैं। वे उनसे सीखने लगते हैं—आध्यात्मिक शब्दावली और हाव-भाव, और यह भी कि ऐसे व्यक्ति कैसे बोलते और व्यवहार करते हैं। तब वे खुद भी आध्यात्मिक शब्दों के कुछ अंश याद करने का बीड़ा उठाते हैं, और तब तक लगे रहते हैं जब तक कि उनके विश्वास के वर्ष इतने हो जाएँ कि वे कहीं बैठकर और धाराप्रवाह बोलते हुए विस्तार से अपना अंतहीन व्याख्यान दे सकें। लेकिन अगर कोई इसे ध्यान से सुने, तो यह बकवास के अलावा कुछ नहीं होता, सब खोखले शब्द, मात्र अक्षर और धर्म-सिद्धांत; और ये लोग सीधे-सीधे धार्मिक ठग होते हैं, जो अपने-आपको और दूसरों को धोखा देते हैं। कितने दुख की बात है! तुम लोगों को इस रास्ते पर नहीं चलना चाहिए, जिस पर चलने के बाद सिर्फ बर्बादी हाथ में आती है और लौटना भी मुश्किल होता है। इस तरह की चीजों का चाव रखना, उन्हें अपनी जिंदगी समझना, और जहाँ भी जाओ वहाँ इसी पैमाने पर दूसरों की तुलना में अपना मूल्यांकन करना; एक भ्रष्ट और शैतानी स्वभाव से भी आगे बढ़कर कुछ आध्यात्मिक सिद्धांतों और पाखंड के तत्वों को अपना लेना—ऐसा व्यक्ति सिर्फ घृणित ही नहीं होता, बल्कि चरम स्तर तक घृणित, विक्षिप्त और निर्लज्ज होता है, और दूसरों के लिए उसे देखना भी असहनीय होता है। इसलिए, कभी प्रभु यीशु का अनुसरण करने वालों के संप्रदाय को अब ईसाइयत कहा जाता है। यह एक संप्रदाय है, और परमेश्वर में अपने विश्वास में वे सख्ती से औपचारिकता से चिपके रहने के अलावा और कुछ नहीं करते हैं। उनके जीवन स्वभाव में कुछ भी बदलाव नहीं आता है, और वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं हैं; उनकी खोज वह सत्य, वह मार्ग और वह जीवन नहीं है जो परमेश्वर से आता है, बल्कि वे फरीसी बनने की चाह रखते हैं, और परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं—यह लोगों का वह समूह है जिसे अब ईसाइयत के रूप में परिभाषित किया जाता है। उनके समूह को "ईसाइयत" कैसे कहा जाने लगा? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वे स्वयं को पवित्र, आध्यात्मिक और दयालु दिखाने में, और परमेश्वर के सच्चे अनुयायी दिखाने में सफल रहे, फिर भी वे समूचे सत्य को नकारते हैं और परमेश्वर से आने वाली सभी सकारात्मक चीजों की सच्चाई को नकारते हैं। अपने-आपको छिपाने के लिए, और एक नकली चोला धारण करने के लिए, वे परमेश्वर द्वारा पूर्व में कहे गए वचनों का प्रयोग करते हैं, और अंतत: वे हर जगह लोगों से उनका खान और पान ठगने के लिए इन वचनों को अपनी पूंजी की तरह प्रयोग करते हैं। वे परमेश्वर में विश्वास रखने का छद्म भेस धारण करते हैं और इस तरह इठलाते और डींगें मारते हुए दूसरों को ठगते हैं; वे दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा और होड़ करते हैं—जो उनके लिए महिमा और पूंजी की चीजें हैं। वे परमेश्वर के आशीष और पुरस्कार भी धोखे से प्राप्त करना चाहते हैं। तो यह वह रास्ता है जिसका वे अनुसरण करते हैं। उनके द्वारा इस तरह के रास्ते का अनुसरण किए जाने के कारण ही उनके समूह को अंतत: ईसाइयत के रूप में परिभाषित कर दिया जाता है। अगर हम इस पर अब नजर दौड़ाएँ तो क्या "ईसाइयत" नाम अच्छा है या बुरा? यह एक अशोभनीय संज्ञा है, और इसमें कुछ भी महिमामय या भव्य नहीं है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं' से उद्धृत

मनुष्य के स्वभाव को बदलने का सबसे अच्छा तरीका लोगों के अंतर्मन के उन हिस्सों को ठीक करना है, जिन्हें गहराई से विषैला कर दिया गया है, ताकि लोग अपनी सोच और नैतिकता को बदल सकें। सबसे पहले, लोगों को स्पष्ट रूप से यह देखने की ज़रूरत है कि परमेश्वर के लिए धार्मिक संस्कार, धार्मिक गतिविधियाँ, वर्ष और महीने, और त्योहार घृणास्पद हैं। उन्हें सामंती विचारधारा के इन बंधनों से मुक्त होना चाहिए और अंधविश्वास की गहरी जमी बैठी प्रवृत्ति के हर निशान को जड़ से उखाड़ देना चाहिए। ये सब मनुष्यजाति के प्रवेश में सम्मिलित हैं। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि क्यों परमेश्वर मनुष्यजाति को सांसारिक जगत से बाहर ले जाता है, और फिर क्यों वह मनुष्यजाति को नियमों और विनियमों से दूर ले जाता है। यही वह द्वार है, जिससे तुम लोग प्रवेश करोगे, और यद्यपि इन चीज़ों का तुम्हारे आध्यात्मिक अनुभव के साथ कोई संबंध नहीं है, फिर भी ये तुम लोगों का प्रवेश और परमेश्वर को जानने का मार्ग अवरुद्ध करने वाली सबसे बड़ी अड़चनें हैं। वे एक जाल बुनती हैं, जो लोगों को फँसा लेता है। कई लोग बाइबल को बहुत अधिक पढ़ते हैं, यहाँ तक कि अपनी स्मृति से बाइबिल के अनेक अंश सुना भी सकते हैं। आज अपने प्रवेश में लोग परमेश्वर के कार्य को मापने के लिए अनजाने में बाइबल का प्रयोग करते हैं, मानो परमेश्वर के कार्य में इस चरण का आधार बाइबल हो और उसका स्रोत भी बाइबल हो। जब परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप होता है, तब लोग परमेश्वर के कार्य का दृढ़ता से समर्थन करते हैं और नई श्रद्धा के साथ उसका आदर करते हैं; जब परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप नहीं होता, तब लोग इतने व्याकुल हो जाते हैं कि बाइबल में परमेश्वर के कार्य का आधार खोजते-खोजते उनके पसीने छूटने लगते हैं; यदि बाइबल में परमेश्वर के कार्य का कोई उल्लेख न मिले, तो लोग परमेश्वर को अनदेखा कर देंगे। यह कहा जा सकता है कि जहाँ तक परमेश्वर के आज के कार्य का संबंध है, ज्यादातर लोग उसे बहुत सतर्कतापूर्वक स्वीकार करते हैं, उसका चयनात्मक रूप से पालन करते हैं, और उसे जानने के बारे में उदासीन अनुभव करते हैं; जहाँ तक अतीत की बातों का प्रश्न है, वे उनके आधे भाग को पकड़े रहते हैं और बाकी आधे को त्याग देते हैं। क्या इसे प्रवेश कहा जा सकता है? दूसरों की पुस्तकें किसी खज़ाने की तरह थामकर और उन्हें स्वर्ग के द्वार की सुनहरी कुंजी समझकर लोग साफ़-साफ़ उस चीज़ में रुचि नहीं दर्शाते, जो परमेश्वर आज उनसे चाहता है। इतना ही नहीं, बहुत सारे "बुद्धिमान विशेषज्ञ" परमेश्वर के वचन अपने बाएँ हाथ में और दूसरों की "उत्कृष्ट कृतियाँ" अपने दाएँ हाथ में रखते हैं, मानो वे परमेश्वर के आज के वचनों का आधार इन उत्कृष्ट कृतियों में खोजना चाहते हों, ताकि पूर्ण रूप से यह सिद्ध कर सकें कि परमेश्वर के वचन सही हैं, यहाँ तक कि वे दूसरों के सामने परमेश्वर के वचनों की व्याख्या उत्कृष्ट कृतियों के साथ जोड़कर करते हैं, मानो बड़ा भारी काम कर रहे हों। सच कहा जाए, तो मनुष्यजाति में ऐसे बहुत सारे "वैज्ञानिक शोधकर्ता" हैं, जिन्होंने आज की वैज्ञानिक उपलब्धियों को कभी अधिक महत्व नहीं दिया, ऐसी वैज्ञानिक उपलब्धियों को, जिनकी कोई मिसाल नहीं है (अर्थात् परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर के वचन, और जीवन में प्रवेश का मार्ग), इसलिए लोग पूरी तरह से "आत्मनिर्भर" हैं, अपनी वाक्पटुता के बल पर बड़े और व्यापक "उपदेश" देते हैं और "परमेश्वर के अच्छे नाम" पर अकड़ते हैं। इस बीच, उनका स्वयं का प्रवेश संकट में होता है और वे परमेश्वर की अपेक्षाओं से उतनी ही दूर दिखते हैं, जितनी दूर इस क्षण सृष्टि दिखती है। कितना सरल है परमेश्वर का कार्य करना? ऐसा प्रतीत होता है कि लोगों ने पहले ही स्वयं को आधा बीते हुए कल में छोड़ देने और आधा आज में लाने, आधा शैतान को सौंपने और आधा परमेश्वर को प्रस्तुत करने का मन बना लिया है, मानो यही अपने अंत:करण को शांत करने तथा कुछ सुख की भावना अनुभव करने का मार्ग हो। लोगों की भीतरी दुनिया इतनी कपट से भरी है कि वे न सिर्फ आने वाले कल को, बल्कि बीते हुए कल को भी खोने से डरते हैं, वे आज शैतान और परमेश्वर, जो लगता है कि है भी और नहीं भी, दोनों को अप्रसन्न करने से गहराई से डरते हैं। चूँकि लोग अपनी सोच और नैतिकता को सही तरीके से विकसित करने में विफल रहे हैं, इसलिए उनमें विवेक की विशेष कमी है, और वे यह बता ही नहीं सकते कि आज का कार्य परमेश्वर का कार्य है या नहीं है। शायद ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोगों की सामंती और अंधविश्वासी सोच इतनी गहरी है कि उन्होंने बहुत पहले ही अंधविश्वास और सत्य, परमेश्वर और मूर्तियों में अंतर की परवाह न करते हुए उन्हें एक ही श्रेणी में रख दिया है और अपने दिमाग़ पर जोर देने के बावजूद वे उनमें स्पष्ट रूप से अंतर करने में असमर्थ प्रतीत होते हैं। इसलिए मनुष्य अपने मार्ग पर ठहर गए हैं और अब और आगे नहीं बढ़ते। यह सब समस्याएँ लोगों में सही वैचारिक शिक्षा की कमी के कारण उत्पन्न होती है, जो उनके प्रवेश में बहुत कठिनाइयाँ उत्पन्न करती है। परिणामस्वरूप, लोग सच्चे परमेश्वर के कार्य में कोई रुचि महसूस नहीं करते, बल्कि मनुष्य के (जैसे कि उनके, जिन्हें वे महापुरुष समझते हैं) कार्य से दृढ़ता से चिपके[1] रहते हैं, जैसे कि उन पर उसकी मुहर लग गई हो। क्या ये नवीनतम विषय नहीं हैं, जिनमें मनुष्यजाति को प्रवेश करना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (3)' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

धार्मिक जगत के ऐसे पादरी और विद्वान एवं धर्मशास्त्र का अध्ययन करने वाले और धर्मशास्त्र से जुड़े शोध करने वाले लोग, जो परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ने के बाद, सत्य की खोज नहीं करते हैं या अपने वास्तविक अनुभवों में सचमुच परमेश्वर को जानने की कोशिश नहीं करते हैं, बल्कि शब्दों और अक्षरों का अध्ययन करते हैं, वे दरअसल सैद्धांतिक नज़रिये से उनका अध्ययन कर रहे हैं, जब तक वे आखिर में किसी न किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच जाते। वे जिस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं वह पूरा सिद्धांत होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अपने अनुभव के आधार पर नहीं, बल्कि विशिष्ट पाठ पर शोध करके और विचार-विमर्श करके इन निष्कर्षों पर पहुँचे हैं। किसी पाठ के शाब्दिक अर्थ और बाइबल में दर्ज तथ्यों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना और फिर किसी सिद्धांत को जन्म देना धर्मशास्त्रीय सिद्धांत कहलाता है। ऐसे सिद्धांत में कोई व्यावहारिक अनुभव और परमेश्वर के वचनों की समझ नहीं होती है, ना ही इसमें पवित्र आत्मा की कोई प्रबुद्धता या रोशनी होती है। पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी से मिली समझ वचनों के शाब्दिक अर्थ से ऊपर की चीज़ होती है; इसे किसी सतही भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह सबसे व्यावहारिक, सबसे सच्ची समझ है जो बाइबल से प्राप्त नहीं की जा सकती, चाहे उसका कितना भी अध्ययन किया जाये। पवित्र आत्मा लोगों को सिर्फ़ तभी प्रबुद्ध और रोशन करता है जब जब वे सत्य की खोज करते हैं और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और उनका अनुभव करते हैं। इसलिए, आज परमेश्वर हमें उसके वचनों का अनुभव करने के लिए कहता है और अगर हमारे अनुभव में पवित्र आत्मा का मार्गदर्शन, प्रबुद्धता और रोशनी मिलती है, तो हम परमेश्वर के वचनों की वास्तविक समझ हासिल कर सकते हैं। कोई व्यक्ति चाहे कितना भी किसी पुस्तक का या परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ का अध्ययन करे, यह वास्तविक समझ हासिल नहीं की जा सकती; यह ऐसी समझ है जो इंसानी विचारों से हासिल नहीं की जा सकती। यह ऐसी चीज़ है जिसकी कल्पना इंसान नहीं कर सकता; यह परमेश्वर की व्यावहारिक समझ है। वर्तमान में, हम परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर रहे हैं। यही कारण है कि अंत में हमें परमेश्वर की वास्तविक समझ हासिल होगी। उन धार्मिक विद्वानों और विशेषज्ञों के पास परमेश्वर की वास्तविक समझ कभी नहीं होगी। चाहे वे परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ का कितना भी अधिक अध्ययन करें, उसका कोई फ़ायदा नहीं होगा। आखिर में, परमेश्वर उनको दंडित करेगा। परमेश्वर में अपनी आस्था में, वे परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता हासिल करने के मार्ग पर नहीं चल रहे हैं। वे अपनी शोध, कल्पना और विचार-विमर्श के आधार पर अपने मस्तिष्क पर भरोसा करते हैं और अंत में वे किसी तरह का सिद्धांत प्रस्तुत कर देंगे। यह सिद्धांत बेतुका और अवास्तविक है जिसे परमेश्वर ने पाखंड बताया है। यही कारण है कि परमेश्वर उन्हें ऐसे लोग नहीं मानता जो परमेश्वर को समझते हों। वे सभी बड़े ही विवेकहीन और तर्कहीन लोग हैं।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

संपूर्ण धार्मिक जगत में, ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके पास बाइबल और धर्मशास्त्र का ज्ञान है। ऐसे लोग परमेश्वर का कार्य क्यों नहीं कर सकते? इसका कारण यह है कि बाइबल और धर्मशास्त्र का उनका ज्ञान बिल्कुल बेतुका ज्ञान है; यह कभी भी सत्य की जगह नहीं ले सकता, परमेश्वर का कार्य या मानवजाति को बचाने का कार्य तो और भी नहीं कर सकता। आज, परमेश्वर के वचनों में हमने देखा है कि वे सत्य हैं, बाइबल और धर्मशास्त्र का सारा ज्ञान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किये गए सत्य के अनुरूप नहीं है। बाइबल और धर्मशास्त्र के ज्ञान को कोई व्यक्ति जितना अधिक समझता है उतना ही उसके द्वारा परमेश्वर का विरोध और निंदा करने की संभावना बढ़ जाती है। तो फिर सत्य क्या है? क्या धर्मशास्त्र के ज्ञान में सत्य है? क्या बाइबल के ज्ञान में कोई सत्य है? यह सत्य नहीं है। बाइबल का ज्ञान इंसान के द्वारा लिखा ज्ञान है, इसे इंसानी सोच से सारांशित किया गया है और यह परमेश्वर का वचन नहीं है; केवल परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं। बाइबल का ज्ञान और परमेश्वर के वचन, दो बिल्कुल ही अलग चीज़ें हैं और इसे बराबर नहीं माना जा सकता। जब किसी के पास धर्मशास्त्र और बाइबल का ज्ञान होता है, तो वह परमेश्वर का विरोध करने, परमेश्वर की आलोचना करने और एक मसीह विरोधी होने में कैसे सक्षम हो सकता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि बहुत ज़्यादा ज्ञान केवल व्यक्ति को भ्रष्ट कर सकता है, उसे अहंकारी और दंभी बना सकता है, इस कारण वह और भी ज़्यादा बुरी तरह से परमेश्वर का विरोध कर सकता है। जिन लोगों के पास धर्मशास्त्र और बाइबल का बहुत ज़्यादा ज्ञान होता है वे और भी ज़्यादा बुरी तरह से परमेश्वर का विरोध करते हैं। दो हज़ार साल पहले, यहूदी धर्म के मुख्य याजकों, शास्त्रियों और फ़रीसियों, और पौलुस जैसे लोगों ने कई पीढ़ियों तक यहोवा में विश्वास किया था और एक या दो हज़ार सालों तक बाइबल का अध्ययन किया था। बाइबल के बारे में उनका ज्ञान सबसे अधिक परिपूर्ण था, फिर भी अंत में वे परमेश्वर का विरोध करने वाले दोषी और देहधारी परमेश्वर के शत्रु बन गए—समूह-दर-समूह, वे बाइबल और धर्मशास्त्र के अपने ज्ञान से "शिक्षित" मसीह विरोधी बन गए। कुछ लोग कह सकते हैं, "बाइबल के गहन अध्ययन और धर्मशास्त्र पर शोध करने में गलत क्या है?" बाइबल और धर्मशास्त्र का अध्ययन करना परमेश्वर को जानने का मार्ग नहीं है। इन चीज़ों का अध्ययन करना परमेश्वर को अधिक से अधिक धोखा देने का कारण बन सकता है और यह सत्य से दूर, बहुत दूर भटका सकता है। परमेश्वर के कार्य और पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करके ही परमेश्वर को जानने का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। धर्मशास्त्र और बाइबल के ज्ञान का अध्ययन करके कोई भी पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल नहीं कर सकता—इन चीज़ों का अध्ययन करने का कोई फ़ायदा नहीं है। राज्य के युग में परमेश्वर जिन लोगों को पूर्ण करता है और जिनका इस्तेमाल करता है उनके पास बाइबल या धर्मशास्त्र का कोई ज्ञान नहीं होता, न ही वे बुद्धिजीवी लोग हैं, तो फिर परमेश्वर द्वारा उनका इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है? इसका क्या कारण है? इसका कारण यह है कि परमेश्वर उन लोगों को पूर्ण नहीं करता है जिनके पास ज्ञान है; परमेश्वर पतरस जैसे ईमानदार लोगों को पूर्ण करता है जो सत्य से प्रेम करते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

क्या धर्मशास्त्र का अध्ययन करने और ज्ञान की खोज करने से किसी को परमेश्वर की समझ हासिल करने में मदद मिल सकती है? इससे न केवल तुम परमेश्वर की समझ हासिल नहीं कर पाओगे, बल्कि तुम परमेश्वर से अधिक से अधिक दूर होते चले जाओगे और परमेश्वर का अधिक से अधिक विरोध करने लगोगे। धर्मशास्त्र के ज्ञान के साथ-साथ दूसरा बहुत ज़्यादा ज्ञान सत्य का दुश्मन है। इसलिए, धर्मशास्त्र के ज्ञान पर तुम जितना अधिक ध्यान केंद्रित करोगे, उतना ही ज़्यादा बुरी तरह से तुम परमेश्वर का विरोध करोगे। अंत में, तुम मसीह के दुश्मन बन जाओगे। आज, हम मसीह के कार्य को स्वीकार करते हैं और मसीह के उद्धार को स्वीकार करते हैं। हम परमेश्वर को समझने लगे हैं, हम दुनिया को समझ सकते हैं, हम ज्ञान को समझ सकते हैं, हम धर्मशास्त्र के सिद्धांतों को समझ सकते हैं और हम शैतान को छोड़ भी सकते हैं और इस ज्ञान को त्याग सकते हैं, जिसका मतलब है कि हम उद्धार के सही मार्ग पर चलना शुरू कर चुके हैं। अगर कोई वास्तव में सत्य को समझता है और शैतान के फलसफों, नियमों, ज्ञान और भ्रांतियों को समझ सकता है, उन्हें पहचान सकता है, उनका विश्लेषण कर सकता है, उन्हें अस्वीकार कर सकता है और छोड़ सकता है, तो उस व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से बचाया जाएगा। वर्तमान में, क्या हम इस अवस्था में पहुँच गए हैं? अगर तुम्हें शैतान के किसी एक फ़लसफ़े का विश्लेषण करने के लिए कहा जाये, तो क्या तुम इसका पूरी तरह से खंडन करने और इसकी आलोचना करने के लिए सत्य का इस्तेमाल करने में सक्षम होगे? अगर तुम दुनिया भर की किताबों वाली आलमारी से ऐसे ही कोई किताब निकाल लेते हो, तो क्या तुम उस किताब में उन भ्रांतियों को ढूंढ पाओगे जो सत्य के विरुद्ध हैं? अगर तुमने ऐसे ही किसी धार्मिक किताब को चुन लिया और तुम इसकी भ्रांतियों को साफ़ तौर पर समझ पाते हो, इसकी गलतियों को जान सकते हो, यह समझ सकते हो कि कहां यह सत्य के विरुद्ध जाता है और यह किन सत्यों के अनुरूप नहीं है; अगर तुम इस स्तर तक पहुंच सकते हो, तो इसका मतलब यह होगा कि तुम सत्य को समझते हो और तुम्हारे पास सत्य है। मान लो कि तुम किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आते हो जो परमेश्वर में विश्वास करता है, वह व्यक्ति चाहे जैसा भी हो, चाहे वह कोई पादरी हो या एल्डर, जब वह बात करना शुरू करेगा तो तुम उसकी बातों में बेतुकी चीज़ों को जान पाओगे, यह समझ पाओगे कि उसने कहां पर गलती की है और उसने किन सत्यों का उल्लंघन किया है। इससे यह साबित होगा कि तुम सचमुच सत्य को समझते हो। वर्तमान में, तुमने यह आध्यात्मिक कद हासिल नहीं किया है, जिससे पता चलता है कि तुम अभी भी सत्य को नहीं समझते हो। सत्य को नहीं समझने का परिणाम यह है कि तुम अभी भी शैतान से धोखा खा सकते हो, इंसान से धोखा खा सकते हो, झूठे चरवाहों और झूठे नबियों का अनुसरण कर सकते हो। अगर धार्मिक जगत का कोई व्यक्ति तुम्हें कोई किताब पढ़ने के लिए देता है और इसे पढ़ने के बाद, तुम सोचते हो कि यह भी तो लोगों को नेक बनना सिखाता है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है, तो इससे साबित होता है कि तुम्हारे अंदर समझ की कमी है और तुम्हारे पास सत्य नहीं है। जब तुम सभी तरह की धार्मिक भ्रांतियों का और मानवजाति के साथ-साथ परमेश्वर का विरोध करने वाले धार्मिक जगत की सभी भ्रांतियों का खंडन करने, इनका पूरी तरह से विश्लेषण करने और इनकी आलोचना करने में सक्षम होते हो, तो इससे यह साबित होगा कि तुम्हारे पास सचमुच आध्यात्मिक कद है और तुम परमेश्वर के लिए गवाही देने में सक्षम हो।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

फुटनोट :

1. "दृढ़ता से चिपके" का प्रयोग उपहास के रूप में किया गया है। यह वाक्यांश दर्शाता है कि लोग जिद्दी और अड़ियल हैं, जो पुरानी बातों को पकड़े रहते हैं और उन्हें त्यागने के लिए तैयार नहीं होते।

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