151. व्यावहारिक संस्कृति और ज्ञान के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) व्यावहारिक संस्कृति और ज्ञान परमेश्वर से आते हैं। वे किसी व्यक्ति के लिए उसकी योग्यता को बढ़ाने में लाभदायक होते हैं, और व्यक्ति को उनसे लैस होना चाहिए। उनका ठीक से सम्मान और अध्ययन किया जाना चाहिए, और उनमें कौशल हासिल किया जाना चाहिए।

(2) संस्कृति और ज्ञान सत्य नहीं हैं और वे किसी व्यक्ति के जीवन के रूप में काम नहीं कर सकते हैं; वे केवल उपकरण हैं जो मनुष्य के अस्तित्व के लिए अपरिहार्य होते हैं। उन पर अंधा विश्वास न करो और न ही उनकी आराधना करो।

(3) केवल सत्य को समझने से ही कोई उचित रूप से संस्कृति और ज्ञान का आदर और सही उपयोग कर सकता है। जिसने सत्य के बिना ही केवल कुछ ज्ञान प्राप्त किया है, वह शैतान की भ्रष्टता से खुद को छुटकारा नहीं दिला सकता है।

(4) कर्तव्य के निष्पादन के अनुकूल व्यावहारिक ज्ञान का अध्ययन करना और उसमें कौशल हासिल करना चाहिए, ताकि परमेश्वर के वचनों और कार्य का बेहतर ढंग से प्रचार हो सके और इनकी गवाही दी जा सके।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

लोगों की क्षमता बढ़ाने का अर्थ है, तुम लोगों से यह अपेक्षा करना कि तुम अपनी बोध शक्ति को बेहतर बनाओ ताकि तुम लोग परमेश्वर के वचनों को समझ सको और यह जान सको कि उनके अनुसार कार्यकैसे करना है। यह सबसे बुनियादी अपेक्षा है। यदि तुम यह समझे बिना कि मैं क्या कहता हूँ, मेरा अनुसरण करते हो, तो क्या यह उलझा हुआ विश्वास नहीं है? चाहे मैं कितने भी वचन कहूँ, लेकिन अगर वे तुम्हारी पहुँच से बाहर हों, मैं चाहे जो भी कहूँ अगर तुम उन्हें न समझ पाओ, तो इसका अर्थ है कि तुम लोगों की क्षमता निकृष्ट है। बोध शक्ति के बगैर, मैं जो कहता हूँ, उसमें से तुम कुछ नहीं समझते, जिससे इच्छित परिणाम हासिल करना बहुत मुश्किल हो जाता है; बहुत सी बातें हैं जो मैं तुम लोगों से सीधे नहीं कह सकता, और अभीष्ट प्रभाव प्राप्त नहीं किया जा सकता है, इस तरह, यह अतिरिक्त कार्यों को आवश्यक बना देता है। चूँकि, तुम लोगों की बोध शक्ति, चीजों को देखने की क्षमता, और जीवन जीने के मानक अत्यंत न्यूनहैं, तुम लोगों में "क्षमता को बढ़ाने" का काम किया ही जाना चाहिए। यह अपरिहार्य है, और इसकाकोई विकल्प नहीं है। केवल इस तरह से ही कुछ परिणामों को प्राप्त किया जा सकता है, अन्यथा, वे सभी वचन जो मैं कहता हूँ व्यर्थ हो जाएँगे। और क्या तुम लोग इतिहास में पापियों के रूप में याद नहीं किए जाओगे? क्या तुम सब दुनिया के सबसे नीच लोग नहीं बन जाओगे? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम पर यह कौन सा कार्य किया जा रहा है और तुम लोगों से क्या अपेक्षित है? तुम लोगों को अपनी क्षमता का अवश्य पता होना चाहिए : यह मेरी अपेक्षा पर बिलकुल खरी नहीं उतरती है। और क्या इससे मेरे कार्य में देरी नहीं होती है? तुम लोगों की वर्तमान क्षमता और चरित्र की स्थिति के आधार पर, तुम लोगों में से एक भी ऐसा नहीं है जो मेरे लिए गवाही देने के उपयुक्त हो, और कोई भी ऐसा नहीं है जो मेरे भविष्य के कार्य के भारी उत्तरदायित्वों को सँभालने में समर्थ हो। क्या तुम लोग इसे लेकर बहुत शर्मिंदा महसूस नहीं करते हो? अगर तुम ऐसे ही चलते रहे, तो तुम मेरी इच्छाओं को कैसे संतुष्ट कर सकोगे? तुम्हें अपना जीवन पूरी तरह से जीना चाहिए। समय व्यर्थ मत व्यतीत होनेदो। ऐसा करने का कोई फ़ायदा नहीं। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हें कौन-सी चीज़ों से सज्जित होना ही चाहिए। अपने आप को हरफ़नमौला न समझो, तुम्हें अभी भी बहुत काम करना है! यदि तुम्हें मानवता का न्यूनतम बुनियादी ज्ञान भी नहीं है, तो फिर कहनेके लिए बचा ही क्या? क्या यह सब व्यर्थ नहीं है? जहाँ तक उस मानवता और क्षमता की बात है जिसकी मुझे अपेक्षा है, तुम लोगों में से एक भी इसके लिए पूरी तरह से योग्य नहीं है। किसी ऐसे को ढूँढ़ना बहुत कठिन है जो उपयोग के लिए उपयुक्त हो। तुम लोग मानते हो कि तुम लोग मेरे लिए अधिक बड़ा कार्य करने और मुझसे कोई बड़ा उत्तरदायित्व पाने में सक्षम हो; वास्तव में, तुम लोगों को यह भी पता नहीं है कि तुम लोगों की आँखों के सामने जो अनेकों सबक हैं, उनमें प्रवेश कैसे किया जाए, तो तुम लोग अधिक गहरे सत्यों में प्रवेश कैसे कर सकते हो? तुम लोगों का प्रवेश चरण-दर-चरण और धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहिए। यह अव्यवस्थित नहीं होना चाहिए—यह किसी काम का नहीं होगा। सबसे उथले प्रवेश से शुरुआत करो : इन वचनों को तब तक पंक्ति दर पंक्ति पढ़ो जब तक तुम लोगों को ये स्पष्ट रूप से समझ न आ जाएँ। जब तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हो, तो उन पर उड़ती नज़र मत डालो मानो कि तुम घुड़सवारी करते हुए नज़ारों का आनन्द ले रहे हो, और सिर्फ लापरवाही मत करो। तुम अपने ज्ञान में सुधार लाने के लिए नियमित रूप से कुछ संदर्भ पुस्तकों को भी पढ़ सकते हो (जैसे कि व्याकरण या साहित्य शास्त्र की पुस्तकें)। ऐसी पुस्तकें जैसे कि रोमांस उपन्यास, महान व्यक्तियों की आत्मकथाएँ, या ऐसी पुस्तकें जो सामाजिक विज्ञान के बारे में हों न पढ़ो; इनसे कोई लाभ नहीं होता, केवल नुकसान ही होता है। तुम्हें उन सभी चीजों में निपुण अवश्य होना चाहिए जिनमें तुम्हें प्रवेश करना और समझना चाहिए। लोगों की क्षमता को बढ़ाने का प्रयोजन, उन्हें उनके सार, उनकी पहचान, हैसियत या मूल्य के बारे में जानने में सहायता करना है। तुम्हें यह समझना चाहिए कि परमेश्वर पर विश्वास करने में लोगों को सच्चाई का अनुसरण क्यों करना होगा, और क्या लोगों का अपनी क्षमता नहीं बढ़ाना स्वीकार्यहै। यह अत्यावश्यक है कि तुम अपने आप को शिक्षित रखो; तुम्हें इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए! तुम लोगों को यह अवश्य समझना चाहिए कि लोगों की क्षमता को बढ़ाना क्यों आवश्यक है, क्षमता को कैसे बढ़ाना चाहिए, और किन पहलुओं में प्रवेश करना है। तुम लोगों को सामान्य मानवता जीने का महत्त्व, यह कार्य क्यों किया जाना है और मनुष्य को जो भूमिका निभानी है, इन सबको अवश्य समझना चाहिए। उदाहरण के लिए, शिक्षित होने में, तुम लोगों को समझना चाहिए कि कौन से पहलुओं काअध्ययन करना चाहिए, और किसी व्यक्ति को उनमें कैसे प्रवेश करना चाहिए। तुम सभी लोगों को यह जानना चाहिए कि शिक्षित होने का लक्ष्य क्या है। क्या यह परमेश्वर के वचनों को समझना और सत्य में प्रवेश करना नहीं है? आज कलीसियाओं में क्या प्रचलित है? लोगों को शिक्षित करने के कारण वे परमेश्वर के वचनों के आनंद के बारे में भूल जाते हैं। वे दिन भर शिक्षित होने के अलावा और कुछ नहीं करते हैं। यदि तुम चाहते हो कि वे सामान्य मानवता को जियें, तो वेकेवल अपना घर स्वच्छ रखने, खाना पकाने, और खाना पकाने के बर्तन खरीदने पर ध्यान देंगे। ये चीज़ें उनके ध्यान का एकमात्र विषय होंगी; यहाँ तक कि वे यह भी नहीं जानेंगे कि सामान्य कलीसियाई जीवन कैसे जीना है। यदि तुम स्वयं को वर्तमान परिस्थितियों में पाते हो तो तुम अपने अभ्यास से भटक गए हो। तो तुम्हें आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने के लिए क्यों कहा जाता है? केवल उन चीजों को सीखने से तुम उसे हासिल करने में अक्षमहो जाओगे जो तुमसे अपेक्षित है। अब भी सबसे महत्वपूर्ण बात, जीवन में प्रवेश है; इस बीच, उस कार्य को करने का कारण उन समस्याओं का समाधान करना है जिनका लोग अपने अनुभवों में सामना करते हैं। क्षमता को बढ़ाना तुम्हें मानवीय प्रकृति और मनुष्य के सार का ज्ञान देता है, जिसका प्रमुख प्रयोजन यहहै कि लोगों का आध्यात्मिक जीवन विकसित हो सके और उनका स्वभाव बदल सके। हो सकता है कि तुम्हें पता हो कि कैसे तैयार होना है और अच्छा दिखाई देना है, तुम्हारे पास अंतर्दृष्टि औरचातुर्य हो सकता है, फिर भी अंततः, जब तुम्हारे कार्य पर जाने का दिन आता है, तो तुम ऐसा करने में असमर्थ होते हो। इसलिए, तुम्हें पता होना चाहिए कि अपनी क्षमता बढ़ाने के दौरान भी तुम्हें क्या करना चाहिए। तुम्हें बदलना लक्ष्य है; क्षमता बढ़ाना अनुपूरक है। यदि तुम्हारी क्षमता बेहतर नहीं होती है तो इससे काम नहीं चलेगा। यदि तुम्हारा स्वभाव नहीं बदलता तो यह और भी बदतर है। किसी को भी छोड़ा नहीं जा सकता। एक सामान्य मानवता धारण करने का यह अर्थ नहीं है कि तुमने एक शानदार गवाही दी है—तुमसे जो अपेक्षित है वह इतना आसान नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्षमता को बढ़ाना परमेश्वर द्वारा उद्धार पाने के लिए है' से उद्धृत

हम ज्ञान के सबसे सतही पहलू पर चर्चा से शुरुआत करेंगे। क्या भाषाओं का व्याकरण और शब्द लोगों को भ्रष्ट करने में समर्थ हैं? क्या शब्द लोगों को भ्रष्ट कर सकते हैं? (नहीं।) शब्द लोगों को भ्रष्ट नहीं करते; वे एक उपकरण हैं, जिसका लोग बोलने के लिए इस्तेमाल करते हैं, और वे वह उपकरण भी हैं, जिसका लोग परमेश्वर के साथ संवाद करने के लिए इस्तेमाल करते हैं, और इतना ही नहीं, वर्तमान समय में भाषा और शब्द ही हैं, जिनसे परमेश्वर लोगों के साथ संवाद करता है। वे उपकरण हैं, और वे एक आवश्यकता हैं। एक और एक दो होते हैं, और दो गुणा दो चार होते हैं; क्या यह ज्ञान नहीं है? पर क्या यह तुम्हें भ्रष्ट कर सकता है? यह सामान्य ज्ञान है—यह एक निश्चित प्रतिमान है—और इसलिए यह लोगों को भ्रष्ट नहीं कर सकता। तो किस तरह का ज्ञान लोगों को भ्रष्ट करता है? भ्रष्ट करने वाला ज्ञान वह ज्ञान होता है, जिसमें शैतान के दृष्टिकोणों और विचारों की मिलावट होती है। शैतान इन दृष्टिकोणों और विचारों को ज्ञान के माध्यम से मानवजाति में भरने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए, किसी लेख में, लिखित शब्दों में अपने आप में कुछ ग़लत नहीं होता। जब लेखक लेख लिखता है तो समस्या उसके दृष्टिकोण और अभिप्राय के साथ ही उसके विचारों की विषयवस्तु में होती है। ये आत्मा की चीज़ें हैं, और ये लोगों को भ्रष्ट करने में सक्षम हैं। उदाहरण के लिए, अगर तुम टेलीविज़न पर कोई कार्यक्रम देख रहे हो, तो उसमें किस प्रकार की चीज़ें लोगों का दृष्टिकोण बदल सकती हैं? क्या कलाकारों द्वारा कहे गए शब्द खुद लोगों को भ्रष्ट करने में सक्षम होंगे? (नहीं।) किस प्रकार की चीज़ें लोगों को भ्रष्ट करेंगी? ये कार्यक्रम के मुख्य विचार और विषय-वस्तु होंगे, जो निर्देशक के विचारों का प्रतिनिधित्व करेंगे। इन विचारों द्वारा वहन की गई सूचना लोगों के मन और मस्तिष्क को प्रभावित कर सकती है। क्या ऐसा नहीं है? अब तुम लोग जानते हो कि मैं अपनी चर्चा में शैतान द्वारा लोगों को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करने के संदर्भ में क्या कह रहा हूँ। तुम ग़लत नहीं समझोगे, है न? तो अगली बार जब तुम कोई उपन्यास या लेख पढ़ोगे, तो क्या तुम आकलन कर सकोगे कि लिखित शब्दों में व्यक्त किए गए विचार मनुष्य को भ्रष्ट करते हैं या मानवजाति के लिए योगदान करते हैं? (हाँ, कुछ हद तक।) यह ऐसी चीज़ है, जिसे धीमी गति से पढ़ा और अनुभव किया जाना चाहिए, और यह ऐसी चीज़ नहीं है, जिसे तुरंत आसानी से समझ लिया जाए। उदाहरण के लिए, ज्ञान के किसी क्षेत्र में शोध या अध्ययन करते समय, उस ज्ञान के कुछ सकारात्मक पहलू उस क्षेत्र के बारे में कुछ सामान्य ज्ञान पाने में सहायता कर सकते हैं, साथ ही यह जानने में भी सक्षम बना सकते हैं कि किन चीज़ों से लोगों को बचना चाहिए। उदाहरण के लिए "बिजली" को लो—यह ज्ञान का एक क्षेत्र है, है न? अगर तुम्हें यह पता न होता कि बिजली लोगों को झटका मार सकती है और चोट पहुँचा सकती है, तो क्या तुम अनभिज्ञ न होते? किंतु एक बार ज्ञान के इस क्षेत्र को समझ लेने पर तुम बिजली के करेंट वाली चीज़ों को छूने में लापरवाही नहीं बरतोगे, और तुम जान जाओगे कि बिजली का उपयोग कैसे करना है। ये दोनों सकारात्मक बातें हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

लोगों में निश्चित रूप से परमेश्वर में विश्वास को लेकर कई तरह की कल्पनाएँ और अवधारणाएँ होती हैं। कुछ लोग यह भी सोचते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने के बाद अब और कुछ नहीं सीखना है। उन्हें लगता है कि समय आने पर परमेश्वर जरूरी कार्रवाई करेगा, और जब परमेश्वर संकेत और चमत्कार दिखाएगा, तो लोग कुछ भी कर पाएंगे। ये मनुष्य की कल्पनाएँ और अवधारणाएँ हैं। लोगों को अपने कर्तव्य से संबंधित उपयुक्त कौशल और ज्ञान सीखना चाहिए और उसका अध्ययन करना चाहिए; बेकार बैठकर सपने मत देखो और अपनी कल्पना पर भरोसा मत करो—परमेश्वर लोगों से वही करने को कहता है जो उन्हें हासिल करना है, इसलिए, वह कार्य चाहे कुछ भी हो, उसे अपना कर्तव्य मानकर स्वीकार करो और उसे गंभीरता से लो। अपने कर्तव्य के प्रति लोगों का यही परिप्रेक्ष्य होना चाहिए। यह कोई अवधारणा नहीं है, सच्चाई है और यही परमेश्वर की अपेक्षा भी है। अधिकांशत:, परमेश्वर जो करता है वह लोगों की कल्पनाओं से मेल नहीं खाता। यदि लोग अपनी अवधारणाओं को अलग रखें, परमेश्वर की इच्छा और सत्य सिद्धांतों की खोज करें, तो वे इसे स्वीकार कर पाएँगे। यदि तुम जिद्दी हो और अपनी अवधारणाओं को छोड़ने से इंकार करते हो, तो यह सत्य को स्वीकार न करना ही हुआ, सही चीजों को स्वीकार न करना हुआ। यदि तुम सत्य और सही चीजों को स्वीकार नहीं करते हो, तो क्या यह कहा जा सकता है कि तुम परमेश्वर के विरोधी हो? सत्य और सकारात्मक बातें परमेश्वर से आती हैं। यदि तुम उन्हें स्वीकार करने के बजाय, अपनी ही अवधारणाओं से चिपके रहते हो, तो यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि तुम सत्य के विरोधी हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

उपदेश के प्रचार कार्य में विभिन्न परियोजनाएँ हैं, और उन परियोजनाओं के लिए आवश्यकता है कि लोग विभिन्न कौशल व पेशों के अध्ययन में विशेषज्ञता हासिल करें। कुछ व्यक्ति परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं और यहाँ-वहाँ भटकने को उद्यत हैं। वे किसी पेशे या कौशल को सीखते भर हैं पर सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं। वे किस प्रकार के व्यक्ति होते हैं? (वे मसीह विरोधी स्वभाव की किस्म वाले व्यक्ति हैं जिनका ध्यान गुणों पर होता है।) सही—प्रकट हुआ व्यक्ति मसीह विरोधी स्वभाव का है, और गंभीर प्रकरणों में, वे वास्तव में मसीह विरोधी ही हैं। वे इन चीज़ों को सीखने के लिए इस मौके का उपयोग करना चाहते हैं और फिर उन लोगों में श्रेष्ठ बनना चाहते हैं, जिनके पास समान कौशल और पेशा है, ऐसा व्यक्ति बनना चाहते हैं जिसने कौशल सर्वोत्तम ढंग से सीखा है और जिसकी कार्यकुशलता सबसे अधिक है, जिन पर दूसरे लोगों को अपने समस्त कामों के लिए निर्भर रहना होगा। जब वे अपने क्षेत्र में नेता बनते हैं तो वे दूसरे लोगों को अपनी और ध्यान देने की ओर प्रवृत्त करते हैं, और वे इसका उपयोग सत्य को अभ्यास मे लाने के एक विकल्प के रूप में करते हैं। समस्या इसमें है। ऐसे लोग कौन हैं? वे व्यक्ति जो केवल अध्ययन करना चाहते हैं और स्वयं को विविध प्रकार के ज्ञान, विद्या, और अनुभवों से लैस करना चाहते हैं, जो अपनी क्षमता, प्रतिभा और गुणों पर सब कुछ करने के लिए निर्भर होते हैं, वे देर-सवेर, इसी प्रकार के मार्ग का अनुसरण करेंगे। यह अपरिहार्य है, और यह पौलुस का मार्ग है। किसी भी क्षेत्र में, किसी भी कार्यक्षेत्र में या, हो सकता है कि तुमने दूसरे लोगों के मुकाबले अधिक अनुभव या ज्ञान अर्जित कर लिया हो, अथवा दूसरे लोगों की तुलना में अनुभव के माध्यम से अधिक सीखा हो, यह इस बात को प्रकट करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि तुमने सत्य को समझ लिया है, अथवा तुम सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर गए हो, अथवा यह कि तुम सत्य से युक्त हो गए हो। फिर, यह प्रकट करने के लिए क्या पर्याप्त हो सकता है? इसे दर्शाने के लिए पर्याप्त हो सकता है उन सिद्धांतों को बेहतर समझदारी से प्राप्त करना जो कर्तव्य के संबद्ध कौशल एवं पेशे को सीखने की प्रक्रिया में कर्तव्य के निर्वहन में निहित है और परमेश्वर के घर में इस कर्तव्य के निर्वहन के लिए आवश्यक मानकों की बेहतर समझदारी पाना। कुछ लोगों में यह बात देखी जाती है कि उन्हें पेशे का जितना अधिक ज्ञान अर्जित करने के लिए कहो वे उतना ही प्रतिरोध करेंगे। वे अपने कर्तव्य के निर्वाह में स्वयं को सक्षम नहीं पाते हैं, और बहाना बनाते हुए वे पूछते हैं: क्योंकि परमेश्वर में आस्था को नास्तिकों के संसार से पृथक रखा जाना चाहिए, हमें नास्तिकों के कौशल और ज्ञान को सीखने की क्या आवश्यकता है? वे अध्ययन करना ही नहीं चाहते हैं। यह आलस्य है। वे एक अनुत्तरदायी रवैए वाला व्यवहार करते हैं, और वे निष्ठापूर्ण नहीं हैं और इस छोटी-सी बात के लिए भी वे कोई प्रयास नहीं करना चाहते हैं। किसी कौशल और पेशे को सीखने के लिए संवेग कर्तव्य की पूर्ति है, और चीज़ों की ऐसी बहुत अधिक निपुणता व आधारभूत ज्ञान है जिससे तुम पहले असम्बद्ध थे और तुम्हें उसे अवश्य ही अर्जित कर लेना चाहिए। परमेश्वर की मनुष्य से यही अपेक्षा है और यही वह कार्य है जिसे परमेश्वर मनुष्य को सौंपता है; ताकि तुम इन विषयों का अध्ययन व्यर्थ में न करो, बल्कि अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिए करो। कुछ लोग सोचते हैं कि ये कौशल सीखकर वे परमेश्वर के घर में पैर जमा सकते हैं। लेकिन ऐसी सोच उन्हें परेशानी में डाल सकती है, है ना? यह गलत नजरिया है। क्या किसी के इस रास्ते पर चलने की संभावना है? तुम उन्हें जितनी अधिक शक्ति दोगे, कार्य का जितना बड़ा दायरा दोगे, और जितनी अधिक जिम्मेदारियाँ दोगे, वे उतने ही अधिक खतरे में होंगे। यह खतरा पैदा कैसे होता है? स्वाभाविक रूप से, यह भ्रष्ट स्वभाव वाले, मसीह-विरोधी स्वभाव वाले, केवल विधियों पर ध्यान केंद्रित करने वाले, बेमन से काम करने वाले, और सिद्धांतों की खोज न करने वाले लोगों से आता है। वे अपने कर्तव्य निभाने का उपयोग परमेश्वर की इच्छा को समझने या सत्य-सिद्धांतों को बेहतर ढंग से समझने और ग्रहण करने के लिए नहीं करते। वे सिद्धांतों की तलाश नहीं करते, न ही वे इस बात की जाँच या समीक्षा करते हैं कि उनमें क्या भ्रष्टता उजागर हुई है, उन्होंने कौन-से गलत विचार बना लिए हैं, या अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए वे किन गलत स्थितियों में फँस गए हैं। वे केवल बाहरी तरीकों पर और अपने कर्तव्यों के लिए आवश्यक ज्ञान में महारत हासिल करने और उससे युक्त होने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। उनका मानना है कि हर पेशे में ज्ञान अन्य सभी चीजों से पहले आता है, और ज्ञान से वे शक्तिशाली बनकर समूह में पैर जमा सकते हैं। लोगों के किसी भी समूह में, चाहे कोई भी हो, जिनके पास सबसे अधिक ज्ञान होता है और जो सबसे अधिक शिक्षित होते हैं, उनकी हैसियत सर्वोच्च होती है। उदाहरण के लिए, किसी अस्पताल में महानिदेशक आम तौर पर पेशेवर ज्ञान के मामले में सर्वश्रेष्ठ होता है, साथ ही तकनीकी कौशल के मामले में भी सबसे कुशल होता है। इन लोगों को लगता है कि परमेश्वर के घर में भी सब ऐसे ही चलता है। क्या यह एक सही समझ है? नहीं, यह सही समझ नहीं है, क्योंकि यह "परमेश्वर के घर में सत्य का शासन चलता है" सिद्धांत के विरुद्ध जाती है। ये लोग सोचते हैं कि परमेश्वर के घर में ज्ञान का शासन चलता है, कि जिसके पास सबसे अधिक ज्ञान या अनुभव होता है, या जो सबसे वरिष्ठ होता है या जिसके पास सबसे अधिक पूँजी होती है, उसे ही परमेश्वर के घर में उच्चतर पद पर बैठाया जाना चाहिए और सबको उसी की बात सुननी चाहिए। लेकिन यह दृष्टिकोण गलत है, है न? कुछ लोग इससे अवगत न होने के कारण इस तरह से सोच सकते हैं, और वे इस पर कार्य भी कर सकते हैं और इस तरह से खोज भी कर सकते हैं, लेकिन एक दिन, उनके सामने अड़चन आ जाएगी। उनके सामने अड़चन क्यों आ जाएगी? जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, सत्य की खोज नहीं करते, और सत्य को पूरी तरह से अनदेखा कर देते हैं, क्या वे कभी स्वयं को जान सकते हैं? (नहीं।) खुद को समझे बिना, वे खुद को बहुत सारे ज्ञान से युक्त कर लेते हैं, परमेश्वर के घर के लिए एक निश्चित कीमत चुका देते हैं, कुछ योग्यता संचित कर लेते हैं, और फिर इन चीजों को अपनी पूँजी बना लेते हैं। उनके लिए यह पूँजी क्या होती है? यह उनके सत्य के अभ्यास का एक अभिलेख होती है, और सत्य-वास्तविकता में उनके प्रवेश और सत्य की उनकी समझ का प्रमाण होती है; यह ऐसी ही हो गई है। जब कोई व्यक्ति सत्य को समझता है और उसकी वास्तविकताओं में प्रवेश करता है, तो यह सभी की दृष्टि में एक अच्छी और सकारात्मक बात होती है, और बेशक ये लोग भी ऐसा ही महसूस करते हैं। दुर्भाग्य से, वे गलती से ज्ञान को सत्य मान बैठते हैं और अपनी इस गलती पर खुश होते हैं, और यह खतरे का संकेत है। किस प्रकार का व्यक्ति ऐसा करता है? जिन लोगों में आध्यात्मिक समझ की कमी होती है, वही ऐसा करते हैं। वे ऐसा तब तक करते रहते हैं, जब तक कि वे इस रास्ते पर पैर नहीं जमा लेते, और फिर उन्हें वापस खींचना असंभव होता है। तुम उनके साथ संगति कर सकते हो, वे जिन अवस्थाओं में होते हैंउनकी ओर संकेत कर सकते हो, या उन्हें उजागर कर सकते हो, लेकिन वे इनमें से कुछ नहीं समझते। तुम जो कुछ भी उनसे कहते हो, उसे वे अपने जीवन में लागू करने में असमर्थ होते हैं, और यह आध्यात्मिक समझ की गंभीर कमी को दर्शाता है। वे बहुत स्वाभाविक रूप से स्वयं द्वारा प्राप्त ज्ञान, अनुभव और सबक को ही सत्य मानते हैं, और एक बार ऐसा कर लेने के बाद, अंत में हमेशा एक विशेष स्थितिसामने आती है। यह अपरिहार्य है। यदि परमेश्वर एक बात कहता है और वे दूसरी बात कहते हैं, तो उनके दृष्टिकोण अनिवार्य रूप से उससे भिन्न होते हैं, लेकिन ये लोग किसे सही कहते हैं? वे खुद को सही मानते हैं। तो, क्या वे परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम हैं? नहीं; वे अपने अलग विचार रखते हैं और जो कुछ परमेश्वर कहता है, उसका खंडन करते हैं। इस तरह, क्या ये लोग स्वयं को देहधारी सत्य नहीं मान रहे हैं?

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दूसरों से केवल अपना आज्ञापालन करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर का नहीं (भाग तीन)' से उद्धृत

परमेश्वर ने प्रत्येक मनुष्य का सृजन उसकी अपनी विशेषता के साथ किया है। कुछ साहित्य में अच्छे हैं, कुछ गणित में अच्छे हैं, और कुछ किसी कौशल के गहन अध्ययन में अच्छे हैं, जैसे यंत्र विज्ञान, बढ़ईगीरी, या चिनाई। संभवतः कुछ व्यक्तियों में यह विशेषताएँ समाज में व्यवस्थित शिक्षा से आती हैं, अथवा, संभवतः, वे किसी व्यक्ति के स्वाभाविक रुझान से उत्पन्न होती हैं। जब कोई व्यक्ति एक कौशल में निपुण हो जाता है, चाहे वह निपुणता सीखी गई हो अथवा वह उसके रुझान का ही एक उत्पाद हो, वे यह सोचकर प्रसन्न व संतुष्ट अनुभव करते हैं कि उनके पास "जीवन पर्यंत साथ देने वाली नौकरी" है, वे अपने कौशल का मूल्य एक प्रकार की पूंजी के रूप में आँकते हैं, जो समस्याप्रद है। तो इस प्रकार की चीज़ों को कैसे देखा जाना चाहिए? यदि परमेश्वर के घर में उनकी कोई उपयोगिता है, तो वे ऐसे औज़ारों से अधिक कुछ नहीं हैं, जिनके द्वारा तुम अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सकते हो, और वे सत्य से असम्बद्ध हैं। फिर, सत्य से क्या संबंधित है? परमेश्वर के वचनों को सुनना और कर्तव्य निर्वहन की ख़ातिर अपने कौशल और पेशे का उपयोग करते समय सिद्धांतों के अनुसार आचरण करना; अपने कौशल और पेशे को कर्तव्य निर्वहन के औज़ार में बदलना, बेहतर ढंग से उस औज़ार को काम में लाना, अपने कर्तव्य को बेहतर ढंग से निर्वाह करना, उस औजार की मदद से अपने दायित्व की पूर्ति करना—यह काम का है। तथापि इस प्रकार की चीज़ें चाहे जितनी भी महत्वपूर्ण हों, वे कभी सत्य नहीं बन सकती हैं, भले ही अपने कौशल और पेशे में तुम्हारी निपुणता कितनी भी क्यों न हो, या अपनी इस प्रतिभा में तुम्हारी उपलब्धियां कितनी ही शानदार हों, वे कभी भी सत्य नहीं हो सकतीं, न ही वे कभी भी तुम्हारी पूर्णता के लिए पूंजी या विशेष लाभ का साधन हो सकती हैं। वे सदा के लिए मृत चीज़ें हैं जिनका सत्य से कोई संबंध नहीं है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दूसरों से केवल अपना आज्ञापालन करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर का नहीं (भाग तीन)' से उद्धृत

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