141. अपने भविष्य और भाग्य के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर ने सबको बनाया और उसकी प्रभुता सभी पर है, और मनुष्य का भाग्य उसके हाथों में है। उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना स्वर्ग का आदेश है और इसे पृथ्वी द्वारा स्वीकार किया जाता है।

(2) परमेश्वर के वचनों के आधार पर अपना मार्ग चुनो, और विश्वास रखो कि वह जो भी करता है, वह धार्मिक होता है। परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति जीवन भर या मृत्यु पर्यंत समर्पण करो।

(3) परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार स्वयं को उसके लिए सच्चाई से खपाओ। चाहे तुम्हें आनंद मिले या संताप, तुम्हें सत्य और आत्म-ज्ञान की तलाश करनी चाहिए। केवल इसी तरह तुम स्वयं को जानोगे।

(4) जब कोई परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को जान जाता है, तो वह वास्तव में उसके प्रति समर्पण करने में और मनुष्य के कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने में सक्षम हो जाता है। ऐसा करने से, व्यक्ति स्वाभाविक रूप से अपने व्यक्तिगत भविष्य और भाग्य को एक तरफ रखने में सक्षम हो जाता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर ही एकमात्र है जो सभी चीज़ों पर शासन करता है, और सभी चीज़ों को चलाता है। जो कुछ है वह उसी ने रचा है, जो कुछ है वही उसे चलाता है, जो कुछ है उस सब पर वही शासन करता है और जो कुछ है उस सब का वही भरण-पोषण करता है। यह परमेश्वर की प्रतिष्ठा और यही उसकी पहचान है। सभी चीजों के लिए और जो कुछ भी है उस सब के लिए, परमेश्वर की असली पहचान, सृजनकर्ता, और सम्पूर्ण सृष्टि के शासक की है। परमेश्वर की ऐसी पहचान है और वह सभी चीज़ों में अद्वितीय है। परमेश्वर का कोई भी प्राणी—चाहे वह मनुष्य के बीच हो या आध्यात्मिक दुनिया में हो—परमेश्वर की पहचान और प्रतिष्ठा का का रूप लेने या उसका स्थान लेने के लिए किसी भी साधन या बहाने का उपयोग नहीं कर सकता है, क्योंकि सभी चीज़ों में वही एक है जो इस पहचान, सामर्थ्य, अधिकार, और सृष्टि पर शासन करने की क्षमता से सम्पन्न है: हमारा अद्वितीय परमेश्वर स्वयं। वह सभी चीज़ों के बीच रहता और चलता है; वह सभी चीज़ों से ऊपर, सर्वोच्च स्थान तक उठ सकता है। वह मनुष्य बनकर, जो मांस और लहू के हैं, उनमें से एक बन कर, लोगों के साथ आमने-सामने होकर और उनके सुख—दुःख बाँट कर, अपने आप को विनम्र बना सकता है, जबकि वहीं दूसरी तरफ, जो कुछ भी है वह सब को नियंत्रित करता है, और जो कुछ भी है उस का भाग्य और उसे किस दिशा में जाना है यह तय करता है। इसके अलावा, वह संपूर्ण मानवजाति के भाग्य और मानवजाति की दिशा का पथप्रदर्शन करता है। इस तरह के परमेश्वर की सभी जीवित प्राणियों के द्वारा आराधना की जानी चाहिए, उसका आज्ञापालन किया जाना चाहिए और उसे जानना चाहिए। इस प्रकार, इस बात की परवाह किए बिना कि तुम मानवजाति में से किस समूह या किस प्रकार सम्बन्धित हो, परमेश्वर में विश्वास करना, परमेश्वर का अनुसरण करना, परमेश्वर का आदर करना, उसके शासन को स्वीकार करना, और अपने भाग्य के लिए उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करना ही किसी भी व्यक्ति के लिए, किसी जीवित प्राणी के लिए एकमात्र विकल्प—आवश्यक विकल्प—है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X' से उद्धृत

मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के हाथों से नियंत्रित होता है। तुम स्वयं को नियंत्रित करने में असमर्थ हो : हमेशा अपनी ओर से भाग-दौड़ करते रहने और व्यस्त रहने के बावजूद मनुष्य स्वयं को नियंत्रित करने में अक्षम रहता है। यदि तुम अपने भविष्य की संभावनाओं को जान सकते, यदि तुम अपने भाग्य को नियंत्रित कर सकते, तो क्या तुम तब भी एक सृजित प्राणी होते? संक्षेप में, परमेश्वर चाहे जैसे भी कार्य करे, उसका समस्त कार्य केवल मनुष्य के वास्ते होता है। उदाहरण के लिए, स्वर्ग और पृथ्वी और उन सभी चीज़ों को लो, जिन्हें परमेश्वर ने मनुष्य की सेवा करने के लिए सृजित किया : चंद्रमा, सूर्य और तारे, जिन्हें उसने मनुष्य के लिए बनाया, जानवर और पेड़-पौधे, बसंत, ग्रीष्म, शरद और शीत ऋतु इत्यादि—ये सब मनुष्य के अस्तित्व के वास्ते ही बनाए गए हैं। और इसलिए, परमेश्वर मनुष्य को चाहे जैसे भी ताड़ित करता हो या चाहे जैसे भी उसका न्याय करता हो, यह सब मनुष्य के उद्धार के वास्ते ही है। यद्यपि वह मनुष्य को उसकी दैहिक आशाओं से वंचित कर देता है, पर यह मनुष्य को शुद्ध करने के वास्ते है, और मनुष्य का शुद्धिकरण इसलिए किया जाता है, ताकि वह जीवित रह सके। मनुष्य की मंज़िल सृजनकर्ता के हाथ में है, तो मनुष्य स्वयं को नियंत्रित कैसे कर सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

इतने वर्षों तक परमेश्वर का अनुयायी रहने के पश्चात्, क्या भाग्य के बारे में तुम लोगों के ज्ञान और सांसारिक लोगों के ज्ञान के बीच कोई आधारभूत अंतर है? क्या तुम लोग सही मायनों में सृजनकर्ता की पूर्वनियति को समझ गए हो, और सही मायनों में सृजनकर्ता की संप्रभुता को जान गए हो? कुछ लोगों में, "यह भाग्य है" इस वाक्यांश की गहन, एवं गहराई से महसूस गई समझ होती है, फिर भी वे परमेश्वर की संप्रभुता पर जरा-सा भी विश्वास नहीं करते हैं, वे यह नहीं मानते हैं कि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित और आयोजित किया जाता है, और वे परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। इस प्रकार के लोग मानो महासागर में इधर-उधर भटकते रहते हैं, लहरों के द्वारा उछाले जाते हैं, जलधारा के साथ-साथ बहते रहते हैं। उनके पास निष्क्रियता से इंतज़ार करने और अपने आप को भाग्य पर छोड़ देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता है। फिर भी वे नहीं पहचानते हैं कि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है; वे स्वयं की पहल से परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझ सकते हैं, और इसके फलस्वरूप परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण नहीं कर सकते हैं, भाग्य का प्रतिरोध करना बन्द नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर की देखभाल, सुरक्षा और मार्गदर्शन के अधीन जी नहीं सकते हैं। दूसरे शब्दों में, भाग्य को स्वीकार करना और सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन होना एक ही बात नहीं है; भाग्य में विश्वास करने का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करता है, पहचानता और जानता है; भाग्य में विश्वास करना मात्र उसकी सच्चाई और उसकी सतही प्रकटीकरण की पहचान है। यह इस बात को जानने से भिन्न है कि किस प्रकार सृजनकर्ता मनुष्य के भाग्य पर शासन करता है, और सभी चीज़ों के भाग्य पर प्रभुत्व का स्रोत सृजनकर्ता ही है, और निश्चित रूप से मानवजाति के भाग्य के लिए सृजनकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण से एकदम अलग है। यदि कोई व्यक्ति केवल भाग्य पर ही विश्वास करता है—यदि इसके बारे में गहराई से महसूस भी करता है—किन्तु फलस्वरूप मानवजाति के भाग्य पर सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानने, पहचानने, उसके प्रति समर्पण करने, और उसे स्वीकार करने में समर्थ नहीं है, तो उसका जीवन एक त्रासदी, व्यर्थ में बिताया गया जीवन, एक खालीपन के सिवाय कुछ नहीं होगा; वह तब भी सृजनकर्ता के प्रभुत्व के अधीन नहीं आ पायेगा, सच्चे अर्थ में सृजित किया गया मनुष्य नहीं बन पायेगा, और सृजनकर्ता के अनुमोदन का आनन्द उठाने में असमर्थ होगा। जो व्यक्ति वास्तव में सृजनकर्ता की संप्रभुता को जानता और अनुभव करता है उसे एक क्रियाशील स्थिति में होना चाहिए, न कि ऐसी स्थिति में जो निष्क्रिय या असहाय हो। जबकि ऐसा व्यक्ति यह स्वीकार कर लेगा कि सभी चीज़ें भाग्य के द्वारा निर्धारित होती हैं, लेकिन जीवन और भाग्य के बारे में उसकी एक सटीक परिभाषा होनी चाहिए : प्रत्येक जीवन सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन है। जब कोई व्यक्ति पीछे मुड़कर उस मार्ग को देखता है जिस पर वह चला था, जब कोई व्यक्ति अपनी यात्रा की हर अवस्था को याद करता है, तो वह देखता है कि हर कदम पर, चाहे उसकी यात्रा कठिन रही हो या आसान, परमेश्वर उसका मार्गदर्शन कर रहा था, योजना बना रहा था। ये परमेश्वर की कुशल व्यवस्थाएँ थीं, और उसकी सावधानीपूर्वक की गयी योजनाएँ थीं, जिन्होंने आज तक, व्यक्ति की जानकारी के बिना उसकी अगुवाई की है। सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करने, उसके उद्धार को प्राप्त करने में समर्थ होना—कितना बड़ा सौभाग्य है! यदि भाग्य के प्रति किसी व्यक्ति का दृष्टिकोण नकारात्मक है, तो इससे साबित होता है कि वह हर उस चीज़ का विरोध कर रहा है जो परमेश्वर ने उसके लिए व्यवस्थित की है, और उसमें समर्पित होने की प्रवृत्ति नहीं है। यदि मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति किसी व्यक्ति का दृष्टिकोण सकारात्मक है, तो जब वह पीछे मुड़कर अपनी जीवनयात्रा को देखता है, जब वह सही मायनों में परमेश्वर की संप्रभुता को आत्मसात करने लगता है, तो वह और भी अधिक ईमानदारी से हर उस चीज़ के प्रति समर्पण करना चाहेगा जिसकी परमेश्वर ने व्यवस्था की है, परमेश्वर को उसके भाग्य का आयोजन करने देने और परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह न करने के लिए उसमें अधिक दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास होगा। क्योंकि जब कोई यह देखता है कि जब वह भाग्य नहीं समझ पाता है, जब वह परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझ पाता है, जब वह जानबूझकर अँधेरे में टटोलते हुए आगे बढ़ता है, कोहरे के बीच लड़खड़ाता और डगमगाता है, तो यात्रा बहुत ही कठिन, और बहुत ही हृदयविदारक होती है। इसलिए जब लोग मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता को पहचान जाते हैं, तो चतुर मनुष्य परमेश्वर की संप्रभुता को जानना और स्वीकार करना चुनते हैं, उन दर्द भरे दिनों को अलविदा कहते हैं जब उन्होंने अपने दोनों हाथों से एक अच्छा जीवन निर्मित करने की कोशिश की थी, और वे स्वयं के तरीके से भाग्य के विरुद्ध लगातार संघर्ष करने और जीवन के अपने "तथाकथित लक्ष्यों" की खोज करना बंद कर देते हैं। जब किसी व्यक्ति का कोई परमेश्वर नहीं होता है, जब वह उसे नहीं देख सकता है, जब वह स्पष्टता से परमेश्वर की संप्रभुता को समझ नहीं सकता है, तो उसका हर दिन निरर्थक, बेकार, और हताशा से भरा होगा। कोई व्यक्ति जहाँ कहीं भी हो, उसका कार्य जो कुछ भी हो, उसके आजीविका के साधन और उसके लक्ष्यों की खोज उसके लिए बिना किसी राहत के, अंतहीन निराशा और असहनीय पीड़ा के सिवाय और कुछ लेकर नहीं आती है, ऐसी पीड़ा कि वह पीछे अपने अतीत को मुड़कर देखना भी बर्दाश्त नहीं कर पाता है। केवल तभी जब वह सृजनकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करेगा, उसके आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करेगा, और एक सच्चे मानव जीवन को खोजेगा, केवल तभी वह धीरे-धीरे सभी निराशाओं और पीड़ाओं मुक्त होगा, और जीवन की सम्पूर्ण रिक्तता से छुटकारा पाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता से संबंधित इन सत्यों का स्पष्ट और सटीक ज्ञान और समझ प्राप्त करना सभी के लिए एक अनिवार्य सबक है; मानव जीवन को जानने और सत्य को प्राप्त करने की एक कुंजी है, परमेश्वर को जानने वाला जीवन, इसके अध्ययन का मूल क्रम ऐसा ही है, इसका सभी को हर दिन सामना करना होगा, और इससे कोई बच नहीं सकता है। यदि तुममें से कोई इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए छोटा मार्ग लेना चाहता है, तो मैं अब तुमसे कहता हूँ, कि यह असंभव है! यदि तुम परमेश्वर की संप्रभुता से बच निकलना चाहते हो, तो यह और भी अधिक असंभव है! परमेश्वर ही मनुष्य का एकमात्र प्रभु है, परमेश्वर ही मनुष्य के भाग्य का एकमात्र स्वामी है, और इसलिए मनुष्य के लिए अपने भाग्य पर नियंत्रण करना असंभव है, और उससे बाहर निकलना असंभव है। किसी व्यक्ति की योग्यताएँ चाहे कितनी ही असाधारण क्यों न हों, वह दूसरों के भाग्य को प्रभावित नहीं कर सकता है, दूसरों के भाग्य को आयोजित, व्यवस्थित, नियंत्रित, या परिवर्तित तो बिलकुल नहीं कर सकता है। केवल स्वयं अद्वितीय परमेश्वर ही मनुष्य के लिए सभी चीज़ों को निर्धारित करता है, क्योंकि केवल वही अद्वितीय अधिकार धारण करता है जो मनुष्य के भाग्य पर संप्रभुता रखता है; और इसलिए केवल सृजनकर्ता ही मनुष्य का अद्वितीय स्वामी है। परमेश्वर का अधिकार न केवल सृजित की गई मानवजाति के ऊपर, बल्कि मनुष्यों को दिखाई न देने वाले अनसृजे प्राणियों, के ऊपर तारों के ऊपर, और ब्रह्माण्ड के ऊपर संप्रभुता रखता है। यह एक निर्विवाद सच है, ऐसा सच जो वास्तव में विद्यमान है, जिसे कोई मनुष्य या चीज़ बदल नहीं सकती है। यह मानते हुए कि तुम्हारे पास कुछ विशेष कौशल या योग्यता है, और अभी भी यह सोचते हुए कि आकस्मिक भाग्योदय से तुम अपनी वर्तमान परिस्थितियों को बदल सकते हो या उनसे बच निकल सकते हो; चीज़ें जैसी हैं, उनसे तुममें से कोई अभी भी असंतुष्ट है; यदि तुम मानवीय प्रयासों के माध्यम से अपने भाग्य को बदलने का, और उसके द्वारा दूसरों से विशिष्ट दिखाई देने, और परिणामस्वरूप प्रसिद्धि और सौभाग्य अर्जित करने का प्रयास करते हो; तो मैं तुमसे कहता हूँ, कि तुम अपने लिए चीज़ों को कठिन बना रहे हो, तुम केवल समस्याओं को आमंत्रित कर रहे हो, तुम अपनी ही कब्र खोद रहे हो! देर-सवेर, एक दिन, तुम यह जान जाओगे कि तुमने ग़लत चुनाव किया है, और तुम्हारे प्रयास व्यर्थ हो गए हैं। तुम्हारी महत्वाकांक्षाएँ, भाग्य के विरुद्ध लड़ने की तुम्हारी इच्छाएँ, और तुम्हारा स्वयं का बेहद खराब आचरण, तुम्हें ऐसे मार्ग में ले जाएगा जहाँ से कोई वापसी नहीं है, और इसके लिए तुम्हें एक भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। हालाँकि, इस समय तुम्हें परिणाम की गंभीरता दिखाई नहीं देती, किन्तु जैसे-जैसे तुम और भी अधिक गहराई से उस सत्य का अनुभव और सराहना करोगे कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य का स्वामी है, तो जिसके बारे में आज मैं बात कर रहा हूँ उसके बारे में और उसके वास्तविक निहितार्थों को तुम धीरे-धीरे समझने लगोगे। तुम्हारे पास सचमुच में हृदय और आत्मा है या नहीं, तुम सत्य से प्रेम करने वाले व्यक्ति हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति और सत्य के प्रति किस प्रकार का दृष्टिकोण अपनाते हो। स्वाभाविक रूप से, यह निर्धारित करता है कि तुम वास्तव में परमेश्वर के अधिकार को जान और समझ सकते हो या नहीं। यदि तुमने अपने जीवन में परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को कभी-भी महसूस नहीं किया है, और परमेश्वर के अधिकार को तो बिलकुल नहीं पहचाते और स्वीकार करते हो, तो उस मार्ग के कारण जिसे तुमने अपनाया है और अपने चुनावों के कारण, तुम बिलकुल बेकार हो जाओगे, और बिना किसी संशय के परमेश्वर की घृणा और तिरस्कार के पात्र बन जाओगे। परन्तु वे लोग जो, परमेश्वर के कार्य में, उसके परीक्षणों को स्वीकार कर सकते हैं, उसकी संप्रभुता को स्वीकार कर सकते हैं, उसके अधिकार के प्रति समर्पण कर सकते हैं, और धीरे-धीरे उसके वचनों का वास्तविक अनुभव प्राप्त कर सकते हैं, वे परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक ज्ञान को, उसकी संप्रभुता की वास्तविक समझ को प्राप्त कर चुके होंगे, और वे सचमुच में सृजनकर्ता के अधीन आ गए होंगे। केवल ऐसे लोगों को ही सचमुच में बचाया गया होगा। क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की संप्रभुता को जान लिया है, क्योंकि उन्होंने इसे स्वीकार लिया है, इसलिए मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य की उनकी समझ और उसके प्रति उनका समर्पण वास्तविक और परिशुद्ध है। जब वे मृत्यु का सामना करेंगे, तो अय्यूब के समान, उनका मन भी मृत्यु के द्वारा विचलित नहीं होगा, और बिना किसी व्यक्तिगत पसंद के, बिना किसी व्यक्तिगत इच्छा के, सभी चीज़ों में परमेश्वर के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने में समर्थ होंगे। केवल ऐसा व्यक्ति ही एक सृजित किए गए सच्चे मनुष्य के रूप सृजनकर्ता की तरफ़ लौटने में समर्थ होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

मनुष्य आज के कार्य और भविष्य के कार्य को तो थोड़ा समझता है, किंतु वह उस मंज़िल को नहीं समझता, जिसमें मानव-जाति प्रवेश करेगी। एक प्राणी के रूप में मनुष्य को प्राणी का कर्तव्य निभाना चाहिए : जो कुछ भी परमेश्वर करता है, उसमें मनुष्य को उसका अनुसरण करना चाहिए; जैसे मैं तुम लोगों को बताता हूँ, वैसे ही तुम्हें आगे बढ़ना चाहिए। तुम्हारे पास अपने लिए चीज़ों का प्रबंधन करने का कोई तरीका नहीं है, और तुम्हारा स्वयं पर कोई अधिकार नहीं है; सब-कुछ परमेश्वर के आयोजन पर छोड़ दिया जाना चाहिए, और हर चीज़ उसके हाथों में है। यदि परमेश्वर के कार्य ने मनुष्य को एक अंत, एक अद्भुत मंज़िल समय से पहले प्रदान कर दिए होते, और यदि परमेश्वर ने इसका उपयोग मनुष्य को लुभाने और उससे अपना अनुसरण करवाने के लिए किया होता—यदि उसने मनुष्य के साथ कोई सौदा किया होता—तो यह विजय न होती, न ही यह मनुष्य के जीवन को आकार देने के लिए होता। यदि परमेश्वर को मनुष्य के अंत का उपयोग उसे नियंत्रित करने और उसके हृदय को पाने के लिए करना होता, तो इसमें वह मनुष्य को पूर्ण नहीं कर रहा होता, न ही वह मनुष्य को पाने में सक्षम होता, बल्कि इसके बजाय वह मंज़िल का उपयोग मनुष्य को नियंत्रित करने के लिए कर रहा होता। मनुष्य भावी अंत, अंतिम मंज़िल, और आशा करने के लिए कोई अच्छी चीज़ है या नहीं, इससे अधिक और किसी चीज़ की परवाह नहीं करता। यदि विजय के कार्य के दौरान मनुष्य को एक खूबसूरत आशा दे दी जाती, और यदि मनुष्य पर विजय से पहले उसे पाने के लिए उपयुक्त मंज़िल दे दी जाती, तो न केवल मनुष्य पर विजय ने अपना परिणाम प्राप्त न किया होता, बल्कि विजय के कार्य का परिणाम भी प्रभावित हो गया होता। अर्थात्, विजय का कार्य मनुष्य के भाग्य और उसके भविष्य की संभावनाओं को छीनने और मनुष्य के विद्रोही स्वभाव का न्याय और उसकी ताड़ना करने से अपना परिणाम प्राप्त करता है। इसे मनुष्य के साथ सौदा करके, अर्थात् मनुष्य को आशीष और अनुग्रह देकर प्राप्त नहीं किया जाता, बल्कि मनुष्य को उसकी "स्वतंत्रता" से वंचित करके और उसकी भविष्य की संभावनाओं को जड़ से उखाड़कर उसकी वफादारी प्रकट करके प्राप्त किया जाता है। यह विजय के कार्य का सार है। यदि मनुष्य को बिलकुल आरंभ में ही एक खूबसूरत आशा दे दी गई होती, और ताड़ना और न्याय का कार्य बाद में किया जाता, तो मनुष्य इस ताड़ना और न्याय को इस आधार पर स्वीकार कर लेता कि उसके पास भविष्य की संभावनाएँ हैं, और अंत में, सभी प्राणियों द्वारा सृजनकर्ता की शर्त-रहित आज्ञाकारिता और आराधना प्राप्त नहीं होती; वहाँ केवल अंधी, ज्ञान से रहित आज्ञाकारिता ही होती, या फिर मनुष्य परमेश्वर से आँख मूँदकर माँगें करता, और मनुष्य के हृदय पर पूरी तरह से विजय प्राप्त करना असंभव होता। इसके परिणामस्वरूप, विजय के ऐसे कार्य के लिए मनुष्य को प्राप्त करना, या, इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के लिए गवाही देना असंभव होता। ऐसे प्राणी अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ होते, और वे परमेश्वर के साथ केवल मोल-भाव ही करते; यह विजय न होती, बल्कि करुणा और आशीष होता। मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि वह अपने भाग्य और भविष्य की संभावनाओं के सिवाय और कुछ नहीं सोचता, और उनसे बहुत प्रेम करता है। मनुष्य अपने भाग्य और भविष्य की संभावनाओं के वास्ते परमेश्वर का अनुसरण करता है; वह परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम की वजह से उसकी आराधना नहीं करता। और इसलिए, मनुष्य पर विजय में, मनुष्य के स्वार्थ, लोभ और ऐसी सभी चीज़ों से निपटकर उन्हें मिटा दिया जाना चाहिए, जो उसके द्वारा परमेश्वर की आराधना में सबसे अधिक व्यवधान डालती हैं। ऐसा करने से मनुष्य पर विजय के परिणाम प्राप्त कर लिए जाएँगे। परिणामस्वरूप, मनुष्य पर विजय के पहले चरणों में यह ज़रूरी है कि मनुष्य की अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं और सबसे घातक कमज़ोरियों को शुद्ध किया जाए, और इसके माध्यम से परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रेम को प्रकट किया जाए, और मानव-जीवन के बारे में उसके ज्ञान को, परमेश्वर के बारे में उसके दृष्टिकोण को, और उसके अस्तित्व के अर्थ को बदल दिया जाए। इस तरह से, परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रेम की शुद्धि होती है, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य के हृदय को जीत लिया जाता है। किंतु सभी प्राणियों के प्रति अपने दृष्टिकोण में परमेश्वर केवल जीतने के वास्ते विजय प्राप्त नहीं करता; बल्कि वह मनुष्य को पाने के लिए, अपनी स्वयं की महिमा के लिए, और मनुष्य की आदिम, मूल सदृशता पुन: हासिल करने के लिए विजय प्राप्त करता है। यदि उसे केवल विजय पाने के वास्ते ही विजय पानी होती, तो विजय के कार्य का महत्व खो गया होता। कहने का तात्पर्य है कि यदि मनुष्य पर विजय पाने के बाद परमेश्वर मनुष्य से पीछा छुड़ा लेता, और उसके जीवन और मृत्यु पर कोई ध्यान नहीं देता, तो यह मानव-जाति का प्रबंधन न होता, न ही मनुष्य पर विजय उसके उद्धार के वास्ते होती। मनुष्य पर विजय पाने के बाद उसे प्राप्त करना, और अंततः एक अद्भुत मंज़िल पर उसका आगमन ही उद्धार के समस्त कार्य के केंद्र में है, और केवल यही मनुष्य के उद्धार का लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। दूसरे शब्दों में, केवल एक खूबसूरत मंज़िल पर मनुष्य का आगमन और विश्राम में उसका प्रवेश ही भविष्य की वे संभावनाएँ हैं, जो सभी प्राणियों के पास होनी चाहिए, और वह कार्य है जिसे सृजनकर्ता द्वारा किया जाना चाहिए। यदि मनुष्य को यह कार्य करना पड़ता, तो यह बहुत ही सीमित होता : यह मनुष्य को एक निश्चित बिंदु तक ले जा सकता था, किंतु यह मनुष्य को शाश्वत मंज़िल पर ले जाने में सक्षम न होता। मनुष्य की नियति निर्धारित करने में मनुष्य सक्षम नहीं है, इसके अलावा, वह मनुष्य की भविष्य की संभावनाओं और भविष्य की मंज़िल सुनिश्चित करने में भी सक्षम नहीं है। किंतु परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य भिन्न है। चूँकि उसने मनुष्य को सृजा है, इसलिए वह उसकी अगुआई करता है; चूँकि वह मनुष्य को बचाता है, इसलिए वह उसे पूरी तरह से बचाएगा और उसे पूरी तरह से प्राप्त करेगा; चूँकि वह मनुष्य की अगुआई करता है, इसलिए वह उसे उस उपयुक्त मंज़िल पर ले जाएगा, और चूँकि उसने मनुष्य का सृजन किया है और उसका प्रबंध करता है, इसलिए उसे मनुष्य के भाग्य और उसकी भविष्य की संभावनाओं की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। यही वह कार्य है, जिसे सृजनकर्ता द्वारा किया जाता है। यद्यपि विजय का कार्य मनुष्य को भविष्य की संभावनाओं से वंचित करके प्राप्त किया जाता है, फिर भी अंततः मनुष्य को उस उपयुक्त मंज़िल पर अवश्य लाया जाना चाहिए, जिसे परमेश्वर द्वारा उसके लिए तैयार किया गया है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य को आकार देने के कारण ही मनुष्य के पास एक मंज़िल है और उसका भाग्य सुनिश्चित है। यहाँ उल्लिखित उपयुक्त मंज़िल, अतीत में शुद्ध की गईं मनुष्य की आशाएँ और भविष्य की संभावनाएँ नहीं हैं; ये दोनों भिन्न हैं। जिन चीज़ों की मनुष्य आशा और खोज करता है, वे मनुष्य की नियत मंज़िल के बजाय, देह की फिज़ूल अभिलाषाओं के अनुसरण से उत्पन्न लालसाएँ हैं। इस बीच, जो कुछ परमेश्वर ने मनुष्य के लिए तैयार किया है, वह उसे शुद्ध किए जाने के बाद देय ऐसे आशीष और प्रतिज्ञाएँ हैं, जिन्हें परमेश्वर ने संसार के सृजन के बाद मनुष्य के लिए तैयार किया था, और जो मनुष्य की पसंद, धारणाओं, कल्पनाओं या देह के द्वारा दूषित नहीं हैं। यह मंज़िल किसी व्यक्ति-विशेष के लिए तैयार नहीं की गई है, बल्कि यह संपूर्ण मानव-जाति के लिए विश्राम का स्थल है। और इसलिए, यह मंज़िल मानव-जाति के लिए सबसे उपयुक्त मंज़िल है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

जब भी गंतव्य का जिक्र होता है, तुम लोग उसे विशेष गंभीरता से लेते हो; इतना ही नहीं, यह एक ऐसी चीज़ है, जिसके बारे में तुम सभी विशेष रूप से संवेदनशील हो। कुछ लोग तो एक अच्छा गंतव्य पाने के लिए परमेश्वर के सामने दंडवत करते हुए अपने सिर जमीन से लगने का भी इंतज़ार नहीं करते। मैं तुम्हारी उत्सुकता समझता हूँ, जिसे शब्दों में व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। यह इससे अधिक कुछ नहीं है कि तुम लोग अपनी देह विपत्ति में नहीं डालना चाहते, और भविष्य में चिरस्थायी सजा तो बिलकुल भी नहीं भुगतना चाहते। तुम लोग केवल स्वयं को थोड़ा और उन्मुक्त, थोड़ा और आसान जीवन जीने देने की आशा करते हो। इसलिए जब भी गंतव्य का जिक्र होता है, तुम लोग खास तौर से बेचैन महसूस करते हो और अत्यधिक डर जाते हो कि अगर तुम लोग पर्याप्त सतर्क नहीं रहे, तो तुम परमेश्वर को नाराज़ कर सकते हो और इस प्रकार उस दंड के भागी हो सकते हो, जिसके तुम पात्र हो। अपने गंतव्य की खातिर तुम लोग समझौते करने से भी नहीं हिचकेहो, यहाँ तक कि तुममें से कई लोग, जो कभी कुटिल और चंचल थे, अचानक विशेष रूप से विनम्र और ईमानदार बन गए हैं; तुम्हारी ईमानदारी का दिखावा लोगों की मज्जा तक को कँपा देता है। फिर भी, तुम सभी के पास "ईमानदार" दिल हैं, और तुम लोगों ने लगातार बिना कोई बात छिपाए अपने दिलों के राज़ मेरे सामने खोले हैं, चाहे वह शिकायत हो, धोखा हो या भक्ति हो। कुल मिलाकर, तुम लोगों ने अपने अस्तित्व के गहनतम कोनों में पड़ी महत्वपूर्ण चीज़ें मेरे सामने खुलकर "कबूल" की हैं। बेशक, मैंने कभी इन चीज़ों पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वे सब मेरे लिए बहुत आम हो गई हैं। लेकिन अपने अंतिम गंतव्य के लिए तुम लोग परमेश्वर का अनुमोदन पाने के लिए अपने सिर के बाल का एक रेशा भी गँवाने के बजाय आग के दरिया में कूद जाओगे। ऐसा नहीं है कि मैं तुम लोगों के साथ बहुत कट्टर हो रहा हूँ; बात यह है कि मैं जो कुछ भी करता हूँ, उसके रूबरू आने के लिए तुम्हारे हृदय के भक्ति-भाव में बहुत कमी है। तुम लोग शायद न समझ पाओ कि मैंने अभी क्या कहा है, इसलिए मैं तुम्हें एक आसान स्पष्टीकरण देता हूँ : तुम लोगों को सत्य और जीवन की ज़रूरत नहीं है; न ही तुम्हें अपने आचरण के सिद्धांतों की ज़रूरत है, मेरे श्रमसाध्य कार्य की तो निश्चित रूप से ज़रूरतनहीं है। इसके बजाय तुम लोगों को उन चीज़ों की ज़रूरत है, जो तुम्हारी देह से जुड़ी हैं—धन-संपत्ति, हैसियत, परिवार, विवाह आदि। तुम लोग मेरे वचनों और कार्य को पूरी तरह से ख़ारिज करते हो, इसलिए मैं तुम्हारे विश्वास को एक शब्द में समेट सकता हूँ : उथला। जिन चीज़ों के प्रति तुम लोग पूर्णत: समर्पित हो, उन्हें हासिल करने के लिए तुम किसी भी हद तक जा सकते हो, लेकिन मैंने पाया है कि तुम लोग परमेश्वर में अपने विश्वास से संबंधित मामलों में ऐसा नहीं करते। इसके बजाय, तुम सापेक्ष रूप से समर्पित हो, सापेक्ष रूप से ईमानदार हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि जिनके दिल में पूर्ण निष्ठा का अभाव है, वे परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में असफल हैं। ध्यान से सोचो—क्या तुम लोगों के बीच कई लोग असफल हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'गंतव्य के बारे में' से उद्धृत

तुम्हारा गंतव्य और तुम्हारी नियति तुम लोगों के लिए बहुत अहम हैं—वे गंभीर चिंता के विषय हैं। तुम मानते हो कि अगर तुम अत्यंत सावधानी से कार्य नहीं करते, तो इसका अर्थ यह होगा कि तुम्हारा कोई गंतव्य नहीं होगा, कि तुमने अपना भाग्य बिगाड़ लिया है। लेकिन क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि अगर कोई मात्र अपने गंतव्य के लिए प्रयास करता है, तो वह व्यर्थ ही परिश्रम करता है? ऐसे प्रयास सच्चे नहीं हैं—वे नकली और कपटपूर्ण हैं। यदि ऐसा है, तो जो लोग केवल अपने गंतव्य के लिए कार्य करते हैं, वे अपनी अंतिम पराजय की दहलीज पर हैं, क्योंकि परमेश्वर में व्यक्ति के विश्वास की विफलता धोखे के कारण होती है। मैं पहले कह चुका हूँ कि मुझे चाटुकारिता या खुशामद या अपने साथ उत्साह के साथ व्यवहार किया जाना पसंद नहीं है। मुझे ऐसे ईमानदार लोग पसंद हैं, जो मेरे सत्य और अपेक्षाओं का सामना कर सकें। इससे भी अधिक मुझे तब अच्छा लगता है, जब लोग मेरे हृदय के प्रति अत्यधिक चिंता या आदर का भाव दिखाते हैं, और जब वे मेरी खातिर सब-कुछ छोड़ देने में सक्षम होते हैं। केवल इसी तरह से मेरे हृदय को सुकून मिल सकता है। इस समय, तुम लोगों के विषय में ऐसी कितनी चीज़ें हैं, जो मुझे नापसंद हैं? तुम लोगों के विषय में ऐसी कितनी चीज़ें हैं, जो मुझे पसंद हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम लोगों में से किसी ने भी कुरूपता की वे सभी विभिन्न अभिव्यक्तियाँ महसूस न की हों, जो तुम लोगों ने अपने गंतव्य की खातिर प्रदर्शित की हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'गंतव्य के बारे में' से उद्धृत

यदि लोग वास्तव में मानव-जीवन के सही मार्ग को और साथ ही परमेश्वर के मानव-जाति के प्रबंधन के उद्देश्य को पूरी तरह से समझ सकें, तो वे अपने व्यक्तिगत भविष्य और भाग्य को एक खजाने के रूप में अपने दिल में थामे नहीं रहेंगे। तब वे अपने उन माता-पिता की सेवा करने में और दिलचस्पी नहीं रखेंगे, जो सूअरों और कुत्तों से भी बदतर हैं। क्या मनुष्य का भविष्य और भाग्य ठीक वर्तमान समय के पतरस के तथाकथित "माता-पिता" नहीं हैं? वे मनुष्य के मांस और रक्त की तरह हैं। देह का गंतव्य और भविष्य भला क्या होगा? क्या वह जीते-जी परमेश्वर का दर्शन करना होगा, या मृत्यु के बाद आत्मा का परमेश्वर से मिलना? क्या कल देह क्लेशों की एक बड़ी भट्ठी में नष्ट होगी, या अग्निकांड में? क्या इस तरह के प्रश्न इससे संबंधित नहीं हैं कि क्या मनुष्य की देह दुर्भाग्य सहन करेगी, या उस सबसे बड़ी खबर से पीड़ित होगी, जिससे इस वर्तमान धारा में कोई भी व्यक्ति, जिसके पास दिमाग है और जो समझदार है, सबसे ज्यादा चिंतित है? (यहाँ पीड़ा आशीर्वाद पाने से संबंध रखती है; इसका अर्थ है कि भविष्य के परीक्षण मनुष्य के गंतव्य के लिए लाभदायक हैं। दुर्भाग्य का मतलब है दृढ़ता से खड़ा न रह पाना या धोखा खाना; या इसका मतलब है व्यक्ति को दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियाँ मिलेंगी और वह आपदाओं के बीच अपना जीवन गँवा देगा, और कि व्यक्ति की आत्मा के लिए कोई उपयुक्त गंतव्य नहीं है।) यद्यपि मनुष्यों के पास ठोस विवेक है, लेकिन संभवतः वे जो सोचते हैं, वह उससे पूरी तरह मेल नहीं खाता, जिससे उनका विवेक सुसज्जित होना चाहिए। इसका कारण यह है कि वे सब अपेक्षाकृत भ्रमित हैं और आँख मूँदकर चीज़ों का अनुसरण करते हैं। उन सभी को इस बात की पूरी समझ होनी चाहिए कि उन्हें किस चीज़ में प्रवेश करना चाहिए, और विशेष रूप से, उन्हें यह पता लगाना चाहिए कि क्लेश के दौरान किस चीज़ में प्रवेश किया जाना चाहिए (यानी, भट्ठी में शुद्धिकरण के दौरान), और साथ ही, उन्हें अग्नि-परीक्षाओं के दौरान किस-किस चीज़ से लैस होना चाहिए। हमेशा अपने माता-पिता (अर्थात देह) की सेवा न करो, जो सूअरों और कुत्तों की तरह हैं, और चींटियों और कीड़ों से भी बदतर हैं। इस पर दुखी होने, इतना सोच-विचार करने और अपने दिमाग को परेशान करने से क्या फायदा? यह देह तेरी अपनी नहीं है, बल्कि यह परमेश्वर के हाथों में है, जो न केवल तुझे नियंत्रित करता है, बल्कि शैतान को भी आज्ञा देता है। (मूलतः इसका अर्थ है कि यह देह मूलत: शैतान की है। चूँकि शैतान भी परमेश्वर के हाथों में है, इसलिए इसे केवल इसी तरह से कहा जा सकता है। इसका कारण यह है कि इसे इस तरह से कहना अधिक प्रेरणास्पद है; यह बताता है कि मानव पूरी तरह से शैतान के अधिकार-क्षेत्र में नहीं, बल्कि परमेश्वर के हाथों में हैं।) तू देह के उत्पीड़न तले जी रहा है, लेकिन क्या देह तेरी है? क्या यह तेरे नियंत्रण में है? इस पर परेशान होकर क्यों अपना दिमाग ख़राब करता है? क्यों पागलों की तरह अपनी बदबूदार देह के लिए, जो लंबे समय से निंदित, शापित और अशुद्ध आत्माओं द्वारा मलिन की गई है, परमेश्वर से आग्रह करने की परेशानी उठाता है? शैतान के सहयोगियों को हमेशा अपने दिल के इतने करीब रखने की क्या ज़रूरत है? क्या तुझे चिंता नहीं है कि देह तेरे वास्तविक भविष्य को, तेरी अद्भुत आशाओं को और तेरे जीवन के वास्तविक गंतव्य को बरबाद कर सकती है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मानव-जाति के प्रबंधन का उद्देश्य' से उद्धृत

किसी व्यक्ति का अंत या गंतव्य उसकी अपनी इच्छा से तय नहीं होता, न ही वह उसकी अपनी पसंद या कल्पनाओं से निर्धारित होता है। इसमें सृष्टिकर्ता, परमेश्वर, का निर्णय अंतिम होता है। ऐसे मामलों में लोगों को कैसे सहयोग करना चाहिए? लोगों के पास केवल एक रास्ता है, जिसे वे चुन सकते हैं : अगर वे सत्य का अनुसरण करते हैं, सत्य को समझते हैं, परमेश्वर के वचनों का पालन करते हैं और उद्धार प्राप्त करते हैं, केवल तभी अंततः उनके पास अच्छा परिणाम और अच्छा भाग्य होगा। अगर लोग इसके विपरीत करते हैं, तो उनकी संभावनाओं और नियति की कल्पना करना मुश्किल नहीं है। और इसलिए, इस मामले में इस बात पर ध्यान केंद्रित न करो कि परमेश्वर ने तुमसे क्या वादा किया है, मानवजाति के लिए परमेश्वर का उद्देश्य क्या है, या परमेश्वर ने मानवजाति के लिए क्या कुछ तैयार किया है। इनका तुमसे कोई लेना-देना नहीं है, ये परमेश्वर के काम हैं, इन्हें तुम ले या माँग नहीं सकते और न ही इनकी अदला-बदली कर सकते हो। परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में तुम्हें बस अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, तुमसे जो कार्य अपेक्षित है उसे अपने पूरे दिलो-दिमाग और ताकत के साथ करना चाहिए। बाकी चीजें—संभावनाओं और भाग्य, और मानवजाति के भावी गंतव्य से संबंधित चीजें—ऐसी चीजें नहीं है जिन्हें तुम तय कर सको, वे परमेश्वर के हाथों में हैं, यह सब सृष्टिकर्ता द्वारा आदेशित और व्यवस्थित किया जाता है, और इसका परमेश्वर के किसी भी प्राणी के साथ कुछ लेना-देना नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, "अगर इसका हमसे कोई लेना-देना नहीं है, तो हमें यह क्यों बताते हो?" भले ही इसका तुम लोगों से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन परमेश्वर से है। केवल परमेश्वर ही इन चीजों को जानता है, केवल परमेश्वर ही इनके बारे में बात कर सकता है, और केवल परमेश्वर ही मानवजाति से इन चीजों का वादा करने का हकदार है। और अगर परमेश्वर इन्हें जानता है, तो क्या परमेश्वर को इनके बारे में बात नहीं करनी चाहिए? तुम्हारा अपनी संभावनाओं और भाग्य का अनुसरण करना एक गलती है, जब तुम नहीं जानते कि वे क्या हैं। परमेश्वर ने तुम्हें इनका अनुसरण करने के लिए नहीं कहा, वह सिर्फ तुम्हें ज्ञात करवा रहा था; अगर तुम गलत ढंग से यह मानते हो कि यही वह उद्देश्य है जिसका परमेश्वर तुमसे अनुसरण करने के लिए कहता है, तो तुम पूरी तरह से मूर्ख हो और तुम्हारे पास सामान्य मानव का दिमाग नहीं है। परमेश्वर जिन चीजों का वादा करता है, उन सबसे अवगत होना ही पर्याप्त है। तुम्हें एक तथ्य स्वीकार करना चाहिए : चाहे वह किसी भी तरह का वादा हो, चाहे वह अच्छा हो या साधारण, चाहे वह सुखद हो या अरुचिकर, सब सृष्टिकर्ता द्वारा आदेशित, व्यवस्थित और निर्धारित किया जाता है। केवल सृष्टिकर्ता द्वारा इंगित सही दिशा और मार्ग का अनुगमन और अनुसरण करना ही परमेश्वर के प्राणी का कर्तव्य और दायित्व है। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि अंततः तुम्हें क्या प्राप्त होता है, और परमेश्वर के किन वादों में से तुम्हें हिस्सा मिलता है, यह सब तुम्हारे अनुसरण पर, तुम्हारे द्वारा लिए जाने वाले मार्ग पर और सृष्टिकर्ता द्वारा आदेशित व्यवस्था पर आधारित है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग नौ)' से उद्धृत

आज तुम्हें पता होना चाहिए कि विजित कैसे हुआ जाए, और विजित होने के बाद लोग अपना आचरण कैसा रखें। तुम कह सकते हो कि तुम पर विजय पा ली गई है, पर क्या तुम मृत्युपर्यंत आज्ञाकारी रह सकते हो? इस बात की परवाह किए बिना कि इसमें कोई संभावना है या नहीं, तुम्हें बिलकुल अंत तक अनुसरण करने में सक्षम होना चाहिए, और कैसा भी परिवेश हो, तुम्हें परमेश्वर में विश्वास नहीं खोना चाहिए। अतंतः तुम्हें गवाही के दो पहलू प्राप्त करने चाहिए : अय्यूब की गवाही—मृत्युपर्यंत आज्ञाकारिता; और पतरस की गवाही—परमेश्वर से परम प्रेम। एक मामले में तुम्हें अय्यूब की तरह होना चाहिए : उसने समस्त भौतिक संपत्ति गँवा दी और शारीरिक पीड़ा से घिर गया, फिर भी उसने यहोवा का नाम नहीं त्यागा। यह अय्यूब की गवाही थी। पतरस मृत्युपर्यंत परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम रहा। जब उसे क्रूस पर चढ़ाया गया और उसने अपनी मृत्यु का सामना किया, तब भी उसने परमेश्वर से प्रेम किया, उसने अपनी संभावनाओं का विचार नहीं किया या सुंदर आशाओं अथवा अनावश्यक विचारों का अनुसरण नहीं किया, और केवल परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पूरी तरह से पालन करने की ही इच्छा की। इससे पहले कि यह माना जा सके कि तुमने गवाही दी है, इससे पहले कि तुम ऐसा व्यक्ति बन सको जिसे जीते जाने के बाद पूर्ण बना दिया गया है, तुम्हें यह स्तर हासिल करना होगा। आज यदि लोग वास्तव में अपने सार और स्थिति को जानते, तो क्या वे तब भी संभावनाएँ और आशाएँ खोजते? तुम्हें जो जानना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर मुझे पूर्ण करे या न करे, मुझे परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए; अभी वह जो कुछ करता है, वह अच्छा है और वह मेरे लिए करता है, ताकि हमारा स्वभाव परिवर्तित हो सके और हम शैतान के प्रभाव से छुटकारा पा सकें, मलिन धरती पर पैदा होने के बावजूद अशुद्धता से मुक्त हो सकें, और गंदगी और शैतान के प्रभाव को झटककर उसे पीछे छोड़ सकें। निश्चित रूप से तुमसे यही अपेक्षा है, किंतु परमेश्वर के लिए यह विजय मात्र है, जो इसलिए की जाती है कि लोग आज्ञाकारी होने का संकल्प करें और स्वयं को परमेश्वर के समस्त आयोजनों के प्रति समर्पित कर सकें। इस तरह से चीज़ें संपन्न होंगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई (2)' से उद्धृत

तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो और परमेश्वर का अनुसरण करते हो, और इसलिए अपने ह्रदय में तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करना ही चाहिए। तुम्हें अपना भ्रष्ट स्वभाव जरूर छोड़ देना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति की खोज अवश्य करनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना ही चाहिए। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास और परमेश्वर का अनुसरण करते हो, तुम्हें अपना सर्वस्व उसे अर्पित कर देना चाहिए, और व्यक्तिगत चुनाव या माँगें नहीं करनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति करनी चाहिए। चूँकि तुम्हें सृजित किया गया था, इसलिए तुम्हें उस प्रभु का आज्ञापालन करना चाहिए जिसने तुम्हें सृजित किया, क्योंकि तुम्हारा स्वयं अपने ऊपर स्वाभाविक कोई प्रभुत्व नहीं है, और स्वयं अपनी नियति को नियंत्रित करने की क्षमता नहीं है। चूँकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर में विश्वास करता है, इसलिए तुम्हें पवित्रता और परिवर्तन की खोज करनी चाहिए। चूँकि तुम परमेश्वर के सृजित प्राणी हो, इसलिए तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, और अपनी स्थिति के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए, और तुम्हें अपने कर्तव्य का अतिक्रमण कदापि नहीं करना चाहिए। यह तुम्हें सिद्धांत के माध्यम से बाध्य करने, या तुम्हें दबाने के लिए नहीं है, बल्कि इसके बजाय यह वह पथ है जिसके माध्यम तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकते हो, और यह उन सभी के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है—और प्राप्त किया जाना चाहिए—जो धार्मिकता का पालन करते हैं। ... परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की थी, और इसलिए वह समूची सृष्टि को अपने प्रभुत्व के अधीन लाता और अपने प्रभुत्व के प्रति समर्पित करवाता है; वह सभी चीज़ों पर अधिकार रखेगा, ताकि सभी चीज़ें उसके हाथों में हों। परमेश्वर की सारी सृष्टि, पशुओं, पेड़-पौधों, मानवजाति, पहाड़ तथा नदियों, और झीलों सहित—सभी को उसके प्रभुत्व के अधीन आना ही होगा। आकाश में और धरती पर सभी चीज़ों को उसके प्रभुत्व के अधीन आना ही होगा। उनके पास कोई विकल्प नहीं हो सकता है और सभी को उसके आयोजनों के समक्ष समर्पण करना ही होगा। इसकी आज्ञा परमेश्वर द्वारा दी गई थी, और यह परमेश्वर का अधिकार है। परमेश्वर सब कुछ पर अधिकार रखता है, और सभी चीज़ों का क्रम और उनकी श्रेणी निर्धारित करता है, जिसमें प्रत्येक को, परमेश्वर की इच्छानुसार, प्रकार के अनुरूप वर्गीकृत किया जाता है, और उनका अपना स्थान प्रदान किया जाता है। चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, कोई भी चीज़ परमेश्वर से बढ़कर नहीं हो सकती है, और सभी चीज़ें परमेश्वर द्वारा सृजित मानवजाति की सेवा करती हैं, और कोई भी चीज़ परमेश्वर की अवज्ञा करने या परमेश्वर से कोई भी माँग करने की हिम्मत नहीं करती है। इसलिए मनुष्य को भी, परमेश्वर का सृजित प्राणी होने के नाते, मनुष्य का कर्तव्य निभाना ही चाहिए। वह सभी चीज़ों का चाहे प्रभु हो या देख-रेख करने वाला हो, सभी चीजों के बीच मनुष्य का कद चाहे जितना ऊँचा हो, तो भी वह परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन एक अदना मानव भर है, और महत्वहीन मानव, परमेश्वर के सृजित प्राणी से अधिक कुछ नहीं है, और वह कभी परमेश्वर से ऊपर नहीं होगा। परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में, मनुष्य को परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने की कोशिश करनी चाहिए, और दूसरे विकल्पों को छोड़ कर परमेश्वर से प्रेम करने की तलाश करनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य के प्रेम के योग्य है। वे जो परमेश्वर से प्रेम करने की तलाश करते हैं, उन्हें कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं ढूँढने चाहिए या वह नहीं ढूँढना चाहिए जिसके लिए वे व्यक्तिगत रूप से लालायित हैं; यह अनुसरण का सबसे सही माध्यम है। यदि तुम जिसकी खोज करते हो वह सत्य है, तुम जिसे अभ्यास में लाते हो वह सत्य है, और यदि तुम जो प्राप्त करते हो वह तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन है, तो तुम जिस पथ पर क़दम रखते हो वह सही पथ है। यदि तुम जिसे खोजते हो वह देह के आशीष हैं, और तुम जिसे अभ्यास में लाते हो वह तुम्हारी अपनी अवधारणाओं का सत्य है, और यदि तुम्हारे स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता है, और तुम देहधारी परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी आज्ञाकारी नहीं हो, और तुम अभी भी अस्पष्टता में जीते हो, तो तुम जिसकी खोज कर रहे हो वह निश्चय ही तुम्हें नरक ले जाएगा, क्योंकि जिस पथ पर तुम चल रहे हो वह विफलता का पथ है। तुम्हें पूर्ण बनाया जाएगा या हटा दिया जाएगा यह तुम्हारे अपने अनुसरण पर निर्भर करता है, जिसका तात्पर्य यह भी है कि सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

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