86. परमेश्वर को दिए गए चढ़ावों के प्रति व्यवहार के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के घर का धन और सामान, जिसमें उसकी सारी संपत्ति शामिल है, परमेश्वर को उसके चुने हुए लोगों द्वारा दिया गया चढ़ावा है, और यह किसी कलीसिया या व्यक्ति का नहीं होता है।

(2) परमेश्वर और याजक को छोड़कर किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह परमेश्वर को दिए गए चढ़ावे में से कुछ ले सके। जो भी व्यक्ति उसकी चोरी करता है, वह एक यहूदा है और उसे दंडित किया जाना चाहिए।

(3) परमेश्वर को अर्पित किए गए चढ़ावे को स्वयं परमेश्वर के द्वारा, और पवित्र आत्मा द्वारा काम में लाए गए मनुष्य द्वारा, व्यवस्थित, हस्तांतरित और नियंत्रित किया जाना है, और कोई भी उनमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता या उन्हें अपनी इच्छानुसार स्थानांतरित नहीं कर सकता है।

(4) जो लोग अपने कर्तव्य के असावधान, लापरवाह प्रदर्शन के द्वारा, या सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करने में अपनी विफलता के कारण, चढ़ावों का नुकसान कर बैठते हैं, उन्हें सत्य-सिद्धांत के अनुसार विवेकपूर्ण क्षतिपूर्ति अर्पित करनी चाहिए।

(5) जो चढ़ावों का घोर दुरुपयोग करता या उनकी चोरी करता है, उसे जो कुछ उसने लिया है उसका भुगतान करना चाहिए; यदि वह ऐसा करने से इनकार कर देता है, तो दंडात्मक सजा लागू की जा सकती है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर के घर में धन, भौतिक पदार्थ और समस्त संपत्ति ऐसी भेंट हैं, जो मनुष्य द्वारा दी जानी चाहिए। इन भेंटों का आनंद याजक और परमेश्वर के अलावा अन्य कोई नहीं ले सकता, क्योंकि मनुष्य की भेंटें परमेश्वर के आनंद के लिए हैं। परमेश्वर इन भेंटों को केवल याजकों के साथ साझा करता है; और उनके किसी भी अंश का आनंद उठाने के लिए अन्य कोई योग्य और पात्र नहीं है। मनुष्य की समस्त भेंटें (धन और आनंद लिए जा सकने योग्य भौतिक चीज़ों सहित) परमेश्वर को दी जाती हैं, मनुष्य को नहीं और इसलिए, इन चीज़ों का मनुष्य द्वारा आनंद नहीं लिया जाना चाहिए; यदि मनुष्य उनका आनंद उठाता है, तो वह इन भेंटों को चुरा रहा होगा। जो कोई भी ऐसा करता है वह यहूदा है, क्योंकि, एक ग़द्दार होने के अलावा, यहूदा ने बिना इजाज़त थैली में रखा धन भी लिया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दस प्रशासनिक आदेश जो राज्य के युग में परमेश्वर के चुने लोगों द्वारा पालन किए जाने चाहिए' से उद्धृत

भेंट क्या है? भेंट वह चीज है जिसे इंसान परमेश्वर को अर्पित करता है; उसके बाद वह चीज इंसान की न रहकर परमेश्वर की हो जाती है। परमेश्वर को जो कुछ भी अर्पित किया जाता है—चाहे वह धन हो या भौतिक वस्तुएँ, और उसका कुछ भी मूल्य हो—वह पूरी तरह से परमेश्वर का हो जाता है, उस पर इंसान का अधिकार नहीं रहता, न ही वह उसके उपयोग का रहता है। परमेश्वर की भेंट के बारे में क्या अवधारणा होनी चाहिए? जो चीज परमेश्वर की है, उसका उपयोग परमेश्वर ही कर सकता है, और परमेश्वर के अनुमोदन से पूर्व न तो कोई उन चीजों का उपयोग कर सकता है और न ही उनके बारे में कोई योजना बना सकता है। कुछ लोगों का कहना है, "यदि परमेश्वर किसी चीज का उपयोग नहीं कर रहा, तो वह हमें उसका उपयोग क्यों नहीं करने देता? अगर कुछ समय के बाद वह चीज खराब हो जाती है, तो क्या यह शर्म की बात नहीं होगी?" नहीं, तब भी नहीं; यह सिद्धांत है। अर्पित चीजें परमेश्वर की होती हैं, इंसान की नहीं; चीजें चाहे बड़ी हों या छोटी, वे मूल्यवान हों या न हों, जब कोई व्यक्ति उन्हें परमेश्वर को अर्पित कर देता है, तो उनका सार बदल जाता है, भले ही परमेश्वर को उनकी आवश्यकता हो या न हो। एक बार जब कोई चीज भेंट बन जाती है, तो वह सृष्टिकर्ता की धरोहर हो जाती है और उसके उपयोग का अधिकार भी उसी को होता है। भेंट के प्रति इंसान के दृष्टिकोण में क्या शामिल होता हैं? उसमें परमेश्वर के प्रति इंसान का दृष्टिकोण शामिल होता है। यदि परमेश्वर के प्रति किसी व्यक्ति का रवैया धृष्टता, अवहेलना और लापरवाही का है, तो परमेश्वर की सभी चीजों के प्रति भी उस व्यक्ति का रवैया निश्चित रूप से वैसा ही होगा। कुछ लोग कहते हैं, "कुछ भेंटों की देख-रेख करने वाला कोई नहीं होता। तो क्या इसका मतलब यह नहीं हुआ कि वे सारी चीजें उसी व्यक्ति की हो गईं, जिसके कब्जे में वे चीजें हैं? चाहे कोई जाने या न जाने, यह 'जिसे मिली, वही मालिक' वाला मामला है; जो भी उन चीजों को हथिया लेता है, वही उनका मालिक हो जाता है।" इस सोच के बारे में तुम्हारा क्या विचार है? नहीं, यह एकदम गलत है। भेंट के बारे में परमेश्वर का रवैया क्या है? भेंट के रूप में चाहे कुछ भी चढ़ाया जाए, चाहे परमेश्वर उसे स्वीकार करे या न करे, एक बार जब किसी वस्तु को भेंट मान लिया जाता है, तो फिर उस वस्तु पर आँख गड़ाने का मतलब है "बारूदी सुरंग पर कदम" रखना। इसका क्या मतलब है? (इसका मतलब है परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचाना।) तुम सभी लोग इस धारणा से सहमत हो। इस प्रकार, यह मामला लोगों को क्या बताता है? यह उन्हें बताता है कि परमेश्वर का स्वभाव मनुष्यों द्वारा किया गया कोई भी अपमान सहन नहीं करता, इसलिए उन्हें उसकी चीजों के साथ छेड़खानी नहीं करनी चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर की भेंटों को अपनी मान लेता है या उन्हें नष्ट करता है और उनका दुरुपयोग करता है, तो वह परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करने के कारण दंड का भागी होगा। हालाँकि, परमेश्वर के कोप के अपने सिद्धांत हैं; वह वैसा नहीं है, जैसी लोग कल्पना करते हैं, कि परमेश्वर गलती करने वाले हर किसी पर प्रहार कर देता है। लोगों को परमेश्वर की भेंटों के साथ सावधानी से पेश आना चाहिए, और परमेश्वर के स्वभाव को ठेस न पहुँचाने का एकमात्र तरीका उसके प्रति श्रद्धा रखना है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (3)' से उद्धृत

परमेश्वर के प्रति किसी व्यक्ति के रवैये की सबसे प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति भेंटों के प्रति उसका रवैया है। भेंटों के प्रति तुम्हारा जो रवैया होता है, वही रवैया तुम्हारा परमेश्वर के प्रति होता है। अगर तुम भेंटों के साथ उसी तरह पेश आते हो, जैसे तुम अपने बैंक-खाते के साथ पेश आते हो, सावधानी, परिश्रम, दृढ़ता, जिम्मेदारी और उद्यम के साथ, तो तुम्हारा परमेश्वर के प्रति बहुत अच्छा रवैया है। अगर तुम भेंटों को सार्वजनिक परिसंपत्ति की तरह मानते हो, जैसे कि सब्जी-बाजार में उपज, उन चीजों की तरफदारी करते हो जिन्हें तुम चाहते हो, जिन्हें तुम लेना चाहते हो, और जो कुछ तुम्हारा नहीं है उसकी उपेक्षा करते हो, इस बात की परवाह नहीं करते कि वह कहाँ रखा या पटक दिया गया है, इस बात का ध्यान नहीं रखते कि उसे कौन लेता है, न देखने का दिखावा करते हो—मानो उसका तुमसे कोई लेना-देना न हो—जब वह चीज जमीन पर गिरती है और कोई उस पर पैर रख देता है, तभी तुम्हें परेशानी होती है। अगर तुम भेंटों के प्रति इस तरह का रवैया रखते हो, तो क्या तुम जिम्मेदारी की भावना रखने वाले व्यक्ति हो? क्या ऐसे लोग अपना कर्तव्य ठीक से निभा सकते हैं? यह कल्पना करना कठिन नहीं है कि तुम्हारी मानवता कैसी है। संक्षेप में, भेंटों को सुरक्षित रखने के अलावा, जब इस कार्य और भेंटों के साथ पेश आने की बात आती है, तो अगुआओं और कार्यकर्ताओं की मुख्य जिम्मेदारी अनुवर्ती कार्य करना होता है, जो और भी अधिक महत्वपूर्ण है। भेंटों को सुरक्षित रखने के दौरान, तुम्हें बहियों की लेखापरीक्षा करनी चाहिए, उन पर ध्यान रखना चाहिए, उनकी जाँच करनी चाहिए, खर्च की जाँच करनी चाहिए, उस पर कड़ी नजर रखनी चाहिए, अपव्यय या बरबादी होने से पहले अनुचित खर्चों पर रोक लगानी चाहिए, बरबादी या अपव्यय हो ही जाए तो लोगों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, यहाँ तक कि चेतावनियाँ भी जारी करनी चाहिए और मुआवजे की माँग करनी चाहिए। अगर तुम यह कार्य भी ठीक से नहीं कर सकते, तो आगे बढ़ो और पद छोड़ दो—तुम्हें अगुआ की भूमिका में नहीं होना चाहिए, क्योंकि तुम यह कार्य नहीं कर सकते। ... अगर तुम इतना सरल कार्य भी नहीं कर सकते, तो अगुआ के रूप में, परमेश्वर के घर के रखवाले के रूप में, तुम कर ही क्या सकते हो? कुल मिलाकर, भेंटें बरबाद हो जाती हैं और उड़ा दी जाती हैं—लेकिन तुम, एक अगुआ, कुछ महसूस नहीं करते, इससे तुम्हें जरा-भी दर्द नहीं होता। क्या तुम्हारे दिल में परमेश्वर है? क्या तुम्हारे दिल में परमेश्वर के लिए जगह है? इसमें शक है। तुम कहते हो कि तुम्हें परमेश्वर से बहुत प्यार है, कि तुम परमेश्वर से डरते हो, लेकिन जब लोग परमेश्वर की भेंटों की बरबादी और अपव्यय करते हैं, तो तुम्हें कुछ भी महसूस नहीं होता, इससे तुम्हें जरा-भी दर्द नहीं होता—तो क्या परमेश्वर से तुम्हारा प्रेम और भय संदेहास्पद नहीं है? यहाँ तक कि तुम्हारा विश्वास भी संदेहास्पद है, परमेश्वर से तुम्हारे प्रेम और भय के बारे में तो कहना ही क्या, जो एकदम निर्मूल, निराधार हैं। क्या यह कार्य वह जिम्मेदारी है, जो अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा निभाई जानी चाहिए? (हाँ।) इस कार्य को अच्छी तरह से करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है—यह अगुआओं और कार्यकर्ताओं की अनिवार्य जिम्मेदारी है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (12)' से उद्धृत

भेटों का मनमाना उपयोग, भेटों का अनुचित उपभोग और व्यय, निरपवाद रूप से प्रशासनिक आदेशों से संबंधित है, और उनके खिलाफ अपराध-प्रकृति का है। कलीसिया की संपत्ति का प्रबंधन करने वाले कुछ लोग कह सकते हैं : "कलीसिया की संपत्ति यूँ ही तो पड़ी है। आजकल बैंकों के पास सभी प्रकार की निवेश योजनाएँ होती हैं, जैसे उच्च-ब्याज ऋण, शेयर और निधि। ये सभी अच्छी ब्याज दर देते हैं। अगर हम कलीसिया का यह पैसा निकालकर इनमें निवेश करें, तो हम थोड़ा-बहुत ब्याज कमा सकते हैं। क्या इससे परमेश्वर के घर को लाभ नहीं होगा?" किसी से चर्चा किए बिना, कलीसिया में किसी की सहमति लिए बिना, वे पैसे उधार देने का दायित्व अपने ऊपर ले लेते हैं। ऐसा करने का क्या उद्देश्य है? इसे अच्छे शब्दों में कहें तो यह परमेश्वर के घर के लिए कुछ ब्याज कमाना है, परमेश्वर के घर के लिए सोचना है; लेकिन सच्चाई यह है कि वे स्वार्थपूर्ण मंशा पाल रहे हैं। वे बिना किसी की जानकारी के पैसे उधार देना चाहते हैं और फिर ब्याज अपने पास रखकर मूलधन परमेश्वर के घर को वापस कर देना चाहते हैं। क्या यह एक निष्ठाहीन इरादे को पनाह देने का मामला नहीं होगा? इसे पैसे उधार देना कहते हैं। क्या पैसे उधार देना भेंटों का उचित उपयोग माना जा सकता है? (नहीं माना जा सकता।) कुछ लोग ऐसा कहते हैं: "परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करता है, परमेश्वर के घर में स्नेह होता है। कभी-कभी, जब हमारे भाई-बहनों को पैसे की कमी होती है, तो क्या हम उन्हें परमेश्वर की भेंट उधार नहीं दे सकते?" कुछ लोग तब निर्णय लेने का दायित्व अपने ऊपर ले ले लेते हैं, और कुछ तो मसीह-विरोधी भी हो सकते हैं जो भाई-बहनों से अपील करके उन्हें यह कहकर उकसाते हैं : "परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करता है, परमेश्वर ही जीवन देता है, इंसान को सब-कुछ देता है, तो कुछ पैसे उधार देना कौनसी बड़ी बात है, है न? बहुत आवश्यक होने पर पैसे उधार देकर भाई-बहनों की मदद करना, मुसीबत के समय उनकी सहायता करना, क्या यह परमेश्वर की इच्छा नहीं है? अगर परमेश्वर इंसान से प्रेम करता है, तो इंसान एक-दूसरे से प्रेम क्यों न करेगा? इसलिए उन्हें कुछ पैसे उधार दे दो!" अधिकांश अज्ञानी लोग इस बात को सुनकर कहेंगे : "बिल्कुल, यदि तुम ऐसा कहते हो तो। वैसे भी, पैसा तो सभी लोगों ने मिलकर दिया है, तो इसे सभी का मिलकर एक की मदद करना कहें।" और इस तरह, जब एक तरफ व्यक्ति अच्छी-अच्छी बातें बोलता है और दूसरी तरफ चापलूसों का झुंड उसकी वाह-वाही करता है, तो पैसा अंत में चला ही जाता है। अब क्या तुम ईमानदारी से कह सकते हो कि यह पैसा परमेश्वर को अर्पित किया गया है? यदि इसे अर्पित किया माना जा सकता है, तो पैसा पहले ही परमेश्वर का हो चुका है और पवित्र हो चुका है, इसलिए इसका उपयोग केवल परमेश्वर द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार ही करना उचित होगा। यदि तुम कहते हो कि उस पैसे की गिनती उसमें नहीं होती, यदि तुम्हारे द्वारा अर्पित की गयी भेंट की गिनती उसमें नहीं होती, तो तुमने क्या चीज भेंट की है? यह कोई मजाक है क्या? क्या तुम परमेश्वर के साथ कोई मजाक कर रहे हो और उसे धोखा दे रहे हो? भेंट की वस्तु को वेदी पर रखने के बाद, क्या तुम्हारे मन में यह सोचकर उस वस्तु के प्रति लालच आ रहा है : ये चीजें तो बेकार ही पड़ी हुई हैं और परमेश्वर उसका उपयोग भी नहीं कर रहा है, लगता है उसके लिए इन चीजों का कोई उपयोग नहीं है। लेकिन अब तुम्हें उनकी जरूरत है, इसलिए तुम इन्हें लेकर इनका इस्तेमाल कर रहे हो। या शायद तुमने बहुत अधिक भेंट दे दी और अब पछता रहे हो, इसलिए तुम उसमें से कुछ वापस ले ली। या शायद जब तुमने भेंट दी थी तब तुमने स्पष्ट रूप से सोचा नहीं था, और अब तुम्हें उसके उपयोग का पता चल गया है, इसलिए तुम उसे वापस ले रहे हो। यह किस तरह का व्यवहार है? यह पैसा और ये चीजें : एक बार कोई व्यक्ति जब इन्हें परमेश्वर को अर्पित कर देता है, तो यह उन्हें वेदी पर अर्पित करने के समान ही है, और जो चीजें वेदी पर अर्पित कर दी जाती हैं तो वे भेंट ही होती हैं। फिर चाहे वह कोई पत्थर हो या रेत का कण, पकी हुई रोटी हो या एक कप पानी, अगर तुमने उसे वेदी पर चढ़ा दिया, तो वह वस्तु परमेश्वर की हो जाती है, फिर वह इंसान की नहीं रहती, और अब किसी इंसान को इसे नहीं छूना, चाहे तुम्हें उसका लालच आए या तुम्हें लगे कि तुम उसका सही उपयोग कर सकते हो; उस पर अब किसी इंसान का अधिकार नहीं रहा। कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं : "क्या परमेश्वर इंसान से प्रेम नहीं करता? अगर इंसान उसमें से एक हिस्सा ले लेगा तो उसका क्या जाएगा? इस समय तुम प्यासे नहीं हो और तुम्हें पानी की आवश्यकता नहीं है, लेकिन मैं प्यासा हूँ, तो मैं पानी क्यों नहीं पी सकता?" लेकिन तुम्हें यह देखना होगा कि इसमें परमेश्वर की सहमति है या नहीं। यदि परमेश्वर सहमत है, तो इससे साबित होता है कि उसने तुम्हें अधिकार दे दिया और तुम उसका उपयोग कर सकते हो; लेकिन अगर परमेश्वर सहमत नहीं है, तो तुम्हें उसका इस्तेमाल करने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसी स्थिति में जहाँ तुम्हारे पास अधिकार नहीं है, जहाँ परमेश्वर ने तुम्हें अधिकार नहीं दिया है, वहाँ परमेश्वर की किसी भी चीज का उपयोग करना उस वर्जना का उल्लंघन करना होगा, जिससे परमेश्वर सबसे ज्यादा घृणा करता है।

लोग हमेशा कहते हैं कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों को बर्दाश्त नहीं करता है, लेकिन उन्होंने यह कभी नहीं समझा कि परमेश्वर का स्वभाव वास्तव में है कैसा, और ऐसे कौनसे काम हैं जिन्हें करने से उसे ठेस पहुंचने की सबसे अधिक संभावना रहती है। परमेश्वर की भेंटों के मामले में, बहुत से लोगों के मन में लगातार वे चीजें बनी रहती हैं, वे मनमर्जी से उनका उपयोग या वितरण करना चाहते हैं, अपनी इच्छा के अनुसार उनका उपयोग करना चाहते हैं, उन्हें अपने पास रखना चाहते हैं या उन्हें उड़ा देना चाहते हैं; लेकिन मैं तुम्हें बता दूँ, ऐसा करके तुम समाप्त हो जाते हो, मृत्यु के भागी बन जाते हो! ऐसा परमेश्वर का स्वभाव है। ये चीजें परमेश्वर की होती हैं जिन्हें वह किसी को छूने नहीं देता। ऐसी है परमेश्वर की गरिमा। केवल एक ही स्थिति है जिसमें परमेश्वर लोगों को उन चीजों का उपयोग करने का अधिकार देता है, और वह है कलीसिया के नियमों और उनके उपयोग को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों के अनुसार उनका उचित इस्तेमाल करना। इन सीमाओं के भीतर रहना परमेश्वर को स्वीकार्य है, लेकिन इन सीमाओं से बाहर जाना परमेश्वर के स्वभाव और प्रशासनिक आदेशों के विरुद्ध अपराध होगा। यह इतना कठोर होता है, जिसमें सौदेबाजी की कोई गुँजाइश नहीं होती और इसमें कोई वैकल्पिक रास्ता भी नहीं होता। इसलिए, जो लोग उन चीजों का दुरुपयोग करते हैं, गबन करते हैं या उन्हें उधार देने जैसे काम करते हैं, उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में मसीह-विरोधी माना जाता है। उनके साथ इतना कठोर व्यवहार क्यों किया जाता है कि उन्हें मसीह-विरोधी समझा जाए? यदि कोई परमेश्वर का विश्वासी इस हद तक चला जाए कि वह परमेश्वर की उन चीजों को जो पवित्र हो चुकी हैं, मनमाने ढंग से स्पर्श करने, उनका दुरुपयोग उपयोग करने या उनका अपव्यय करने का दुस्साहस करता है, तो ऐसा व्यक्ति परमेश्वर का शत्रु ही होता है। परमेश्वर का शत्रु ही उसकी वस्तुओं के प्रति ऐसा रवैया रखेगा; कोई साधारण भ्रष्ट व्यक्ति ऐसा नहीं करेगा, ऐसा तो कोई जानवर भी नहीं करेगा, ऐसा तो केवल परमेश्वर का शत्रु, शैतान और बड़ा लाल अजगर ही करेगा। क्या ऐसा कहना कठोर शब्दों का प्रयोग करना है? नहीं, यह सिद्धांत है! ऐसी है परमेश्वर की महिमा!

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे कलीसिया के वित्त को नियंत्रित करने के साथ-साथ लोगों के दिलों को भी नियंत्रित करते हैं' से उद्धृत

जब कोई व्यक्ति परमेश्वर को कोई वस्तु चढ़ाता है, तो तुम्हारे दिमाग में किसी भी प्रकार का कोई विचार नहीं आना चाहिए। वस्तु चाहे कुछ भी हो, चाहे वह मूल्यवान हो या न हो, चाहे तुम्हारे लिए उसका कोई उपयोग हो या न हो, चाहे वह कीमती हो या न हो—तुम्हारे मन में उसे लेकर कोई विचार नहीं आना चाहिए। अगर तुम में योग्यता है तो जाकर पैसा कमाओ—जितना चाहो पैसा कमाओ, तुम्हें कोई नहीं रोकेगा, लेकिन परमेश्वर को अर्पित की जा रही वस्तु को लेकर कोई विचार मत करो। इतनी सतर्कता तो तुम्हारे अंदर होनी ही चाहिए; इतनी समझ तो तुम्हें होनी ही चाहिए। उपरोक्त एक सिद्धांत है। एक अन्य सिद्धांत यह है कि जो कोई भी भेंट का अपव्यय और दुरुपयोग करता है, उसे उधार देता है, छल करता है और भेंट की चोरी में लिप्त होता है, उसे यहूदा जैसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। जिन लोगों ने इस प्रकार के कृत्य और बर्ताव किए हैं, वे पहले ही परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचा चुके हैं, परमेश्वर उन्हें नहीं बचाएगा, और ऐसा बर्ताव करके तुम्हें कोई आशा भी नहीं रखनी चाहिए। जैसा मैंने कहा है, परमेश्वर वैसा ही करता है। यह पूर्वनिर्धारित होता है, और इसमें सौदेबाजी की कोई गुँजाइश नहीं होती। कुछ लोग कहेंगे : "मेरे गबन करने की एक पृष्ठभूमि है : जब मैं पैसे उड़ाता था तो मैं युवा और अज्ञानी था, लेकिन मैंने बहुत अधिक गबन नहीं किया, बस दस या बीस, तीस या पचास।" लेकिन सवाल यह नहीं है कि कितना किया; सच्चाई यह है कि जब तुम ये काम करते हो, तो तुम्हारे कृत्यों का लक्ष्य परमेश्वर होता है, तुमने परमेश्वर की चीजों को छुआ है, और तुम्हारा उन्हें छूना गलत है। परमेश्वर की चीजें सामान्य संपत्ति नहीं हैं, वे किसी की नहीं होतीं, वे न तो कलीसिया की होती हैं, न ही परमेश्वर के घर की होती हैं : वे केवल परमेश्वर की होती हैं, और तुम्हें इस अंतर का घालमेल नहीं करना चाहिए। न तो परमेश्वर ऐसा मानता है और न ही उसने तुमसे कहा है कि : "मेरी चीजें, मेरा चढ़ावा कलीसिया के कब्जे में हो, कलीसिया द्वारा ही उन्हें वितरित किया जाए। वह कलीसिया के भाई-और बहनों की सामूहिक संपत्ति है, जो कोई उसका उपयोग करना चाहता है, उसे बस एक अनुरोध प्रस्तुत करके उसका रिकॉर्ड रखना है।" परमेश्वर ने यह नहीं कहा। तो, परमेश्वर ने क्या कहा है? परमेश्वर को अर्पित की गयी कोई भी चीज परमेश्वर की वस्तु है, और एक बार यह वस्तु वेदी पर अर्पित कर दी जाती है, तो वह हमेशा के लिए परमेश्वर की हो जाती है, और उसके बाद किसी भी इंसान को उसका अनधिकृत उपयोग करने का अधिकार नहीं है। तुम्हारा हिसाब-किताब, विनियोग, धोखा देना, चोरी करना, उधार देना और अपव्यय करना—इन सभी कार्यों की, परमेश्वर के स्वभाव के खिलाफ अपराध और मसीह-विरोधियों के कृत्यों के रूप में निंदा की जाती है, तथा यह पवित्र आत्मा के खिलाफ ईशनिंदा के समान है, जिसके लिए परमेश्वर तुम्हें कभी भी क्षमा नहीं करेगा। ऐसी है परमेश्वर की गरिमा और इंसान को इसका सम्मान करना ही चाहिए। अगर तुम कोई बैंक लूटते हो, डाका डालते हो या चोरी-चकारी से कोई चीज हासिल करते हो, तो तुम्हें दो-तीन साल की या पांच साल की सजा हो सकती है, और सजा काट लेने के बाद फिर तुम उस अपराध के दोषी नहीं रहते। लेकिन जब तुम परमेश्वर की चीज़ों, परमेश्वर की भेंटों को हड़पकर उनका उपयोग करते हो, तो परमेश्वर की नज़र में यह एक स्थायी पाप है, एक ऐसा पाप है जिसे क्षमा नहीं किया जा सकता।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे कलीसिया के वित्त को नियंत्रित करने के साथ-साथ लोगों के दिलों को भी नियंत्रित करते हैं' से उद्धृत

बदबूदार छोटे कीड़ो, तुम लोग मुझ यहोवा की वेदी के चढ़ावे चुराते हो; ऐसा करके क्या तुम लोग अपनी बरबाद, असफल प्रतिष्ठा बचा सकते हो और इस्राएल के चुने हुए लोग बन सकते हो? तुम लोग बेशर्म कमीने हो! वेदी पर वे भेंटें लोगों द्वारा अपनी उन उदार भावनाओं की अभिव्यक्ति के रूप में मुझे चढ़ाई गई थीं, जिनसे वे मेरा आदर करते हैं। वे मेरे नियंत्रण और मेरे उपयोग के लिए होती हैं, तो लोगों द्वारा मुझे दिए गए छोटे जंगली कबूतर संभवतः तुम मुझसे कैसे लूट सकते हो? क्या तुम एक यहूदा बनने से नहीं डरते? क्या तुम इस बात से नहीं डरते कि तेरी भूमि रक्त का मैदान बन सकती है? बेशर्म चीज़! क्या तुम्हें लगता है कि लोगों द्वारा चढ़ाए गए जंगली कबूतर तुम भुनगों का पेट भरने के लिए हैं? मैंने तुम्हें जो दिया है, वह वही है जिससे मैं संतुष्ट हूँ और तुम्हें देने का इच्छुक हूँ; मैंने तुम्हें जो नहीं दिया है, वह मेरी इच्छा पर है। तुम बस मेरे चढ़ावे चुरा नहीं सकते। वह एक, जो कार्य करता है, वह मैं, यहोवा—सृष्टि का प्रभु—हूँ, और लोग मेरी वजह से भेंटें चढ़ाते हैं। क्या तुम्हे लगता है कि तुम जो दौड़-भाग करते हो, यह उसकी भरपाई है? तुम सच में बेशर्म हो! तुम किसके लिए दौड़-भाग करते हो? क्या यह तुम्हारे अपने लिए नहीं है? तुम मेरी भेंटें क्यों चुराते हो? तुम मेरे बटुए में से पैसे क्यों चुराते हो? क्या तुम यहूदा इस्करियोती के बेटे नहीं हो? मुझ यहोवा को चढ़ाई गई भेंटें याजकों द्वारा उपभोग किए जाने के लिए हैं। क्या तुम याजक हो? तुम मेरी भेंटें दंभ के साथ खाने की हिम्मत करते हो, यहाँ तक कि उन्हें मेज पर छोड़ देते हो; तुम किसी लायक नहीं हो! नालायक कमीने! मुझ यहोवा की आग तुम्हें भस्म कर देगी!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब झड़ते हुए पत्ते अपनी जड़ों की ओर लौटेंगे, तो तुम्हें अपनी की हुई सभी बुराइयों पर पछतावा होगा' से उद्धृत

मैंने इस तरह से तुम लोगों के बीच कार्य किया और बात की है, मैंने बहुत सारी ऊर्जा व्यय की और प्रयास किए हैं, फिर भी तुम लोगों ने कब वह सुना है, जो मैं तुम लोगों से सीधे तौर पर कहता हूँ? तुम लोग कहाँ मुझ सर्वशक्तिमान के सामने झुके हो? तुम लोग मुझसे ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं? क्यों जो तुम लोग कहते और करते हो, वह मेरा क्रोध भड़काता है? तुम्हारे हृदय इतने कठोर क्यों हैं? क्या मैंने कभी भी तुम्हें मार गिराया है? क्यों तुम लोग मुझे दुःखी और चिंतित करने के अलावा और कुछ नहीं करते? क्या तुम लोग अपने ऊपर मेरे, यहोवा के, कोप के दिन के आने की प्रतीक्षा में हो? क्या तुम लोग प्रतीक्षा कर रहे हो कि मैं तुम्हारी अवज्ञा से भड़का क्रोध भेजूँ? क्या मैं जो कुछ करता हूँ, वह तुम लोगों के लिए नहीं है? फिर भी तुम लोगों ने सदैव मुझ यहोवा के साथ ऐसा व्यवहार किया है : मेरे बलिदान को चुराना, मेरे घर की वेदी के चढ़ावों को भेड़ियों की माँद में ले जाकर शावकों और शावकों के शावकों को खिलाना; लोग मुझ सर्वशक्तिमान के वचनों को मलमूत्र के समान गंदा करने के लिए पाखाने में उछालते हुए एक दूसरे से लड़ाई करते हैं, गुस्से से घूरते हुए तलवारों और भालों के साथ एक दूसरे का सामना करते हैं। तुम लोगों की ईमानदारी कहाँ है? तुम लोगों की मानवता पाशविकता बन गई है! तुम लोगों के हृदय बहुत पहले पत्थरों में बदल गए हैं। क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि जब मेरे कोप का दिन आएगा, तब मुझ सर्वशक्तिमान के विरुद्ध आज की गई तुम लोगों की दुष्टता का मैं न्याय करूँगा? क्या तुम लोगों को लगता है कि मुझे इस प्रकार से बेवकूफ़ बनाकर, मेरे वचनों को कीचड़ में फेंककर और उन पर ध्यान न देकर—क्या तुम लोगों को लगता है कि मेरी पीठ पीछे ऐसा करके तुम लोग मेरी कुपित नज़रों से बच सकते हो? क्या तुम लोग नहीं जानते कि जब तुम लोगों ने मेरे बलिदानों को चुराया और मेरी चीज़ों के लिए लालायित हुए, तभी तुम लोग मुझ यहोवा की आँखों द्वारा पहले ही देखे जा चुके थे? क्या तुम लोग नहीं जानते कि जब तुम लोगों ने मेरे बलिदान चुराए, तो यह उस वेदी के सामने किया, जिस पर बलिदान चढ़ाए जाते हैं? तुमने कैसे मान लिया कि तुम इतने चालाक हो कि मुझे इस तरह से धोखा दे सकोगे? तुम लोगों की बुरी करतूतें मेरे प्रकोप से कैसे बच सकती हैं? मेरा प्रचंड क्रोध कैसे तुम लोगों के बुरे कामों को नज़रंदाज़ कर सकता है? आज तुम लोग जो बुराई करते हो, वह तुम लोगों के लिए कोई बचने का मार्ग नहीं खोलती, बल्कि तुम्हारे कल के लिए ताड़ना इकट्ठी करती है; यह तुम लोगों के प्रति मुझ सर्वशक्तिमान की ताड़ना को भड़काती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कोई भी जो देह में है, कोप के दिन से नहीं बच सकता' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

परमेश्वर के घर में दिए गए चढ़ावों की पर्यवेक्षण के सिद्धांत

विश्वासियों द्वारा परमेश्वर को दिए गए तमाम चढ़ावे परमेश्वर की अनन्य संपत्ति होते हैं और वे किसी कलीसिया या व्यक्ति के नहीं होते। कलीसियाओं के काम में उपयोग के लिए कुछ धन और संपत्ति प्रदान की जा सकती है, लेकिन वे अभी भी परमेश्वर के घर के ही हैं; और उन्हें परमेश्वर के घर द्वारा केंद्रीय रूप से आवंटित किया जाना चाहिए; उसे उस संपत्ति को, ऐसे किसी के द्वारा भी इस्तेमाल किया जा सकता है जिसे इसकी आवश्यकता हो, लेकिन उसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। मानवजाति की भ्रष्टता की व्यापकता के कारण, बहुत-से लोग धन के मोह में होते हैं और अपने हितों के अलावा बाकी हर चीज़ के प्रति अंधे होते हैं। इस तरह, परमेश्वर के घर में चढ़ावों की निगरानी के लिए एक सख्त व्यवस्था को स्थापित करना महत्वपूर्ण है। इसके लिए, यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है कि कलीसिया के चढ़ावों की देख-रेख के लिए तीन उपयुक्त व्यक्तियों को चुना जाना चाहिए। अगुवा, कार्यकर्ता और परमेश्वर के चुने हुए लोग, ये सभी कलीसिया के चढ़ावों की देख-रेख का अधिकार रखते हैं। चढ़ावों के बारे में किसी भी मुद्दे को संभालना, इसकी जाँच करना, कलीसिया के अगुवाओं की जिम्मेदारी है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा, उक्त जाँच में सहयोग प्रदान किया जाना चाहिए। कलीसिया के अगुवाओं को ऐसे मामलों को अनदेखा नहीं करना चाहिए, ऐसा करने पर उन्हें भी उतना ही दोषी माना जाएगा। कलीसिया के चढ़ावों की पर्यवेक्षण के सिद्धांतों का विशिष्ट विवरण नीचे दिया गया है:

1. प्रत्येक कलीसिया को चढ़ावों के लिए एक बॉक्स स्थापित करना चाहिए। समय या राशि जो भी हो, चढ़ावे किसी भी शर्त के अधीन नहीं होते और स्वतंत्र रूप से दिए जाते हैं। चढ़ावों के प्रबंधन के लिए तीन संरक्षकों को नियुक्त किया जाना चाहिए, जो उनके सुरक्षित रख-रखाव की संयुक्त जिम्मेदारी लेंगे और नियमित रूप से कलीसिया के अगुवाओं को रिपोर्ट करेंगे। धन की निकासी और उसका उपयोग लेखांकन के नियमों के अनुसार होना चाहिए, और तीनों संरक्षकों को खातों की स्पष्टता सुनिश्चित करनी चाहिए और नियमित रूप से कलीसिया के अगुआओं को सूचित करना चाहिए।

2. प्रत्येक कलीसिया में, चढ़ावों की देख-रेख तीन लोगों द्वारा की जानी चाहिए : उनमें से एक खजांची का काम करेगा, और दो हिसाब-किताब का। चढ़ावों और खातों का प्रबंधन केवल एक व्यक्ति द्वारा नहीं किया जाना चाहिए।

3. अगर किसी को चढ़ावों की सुरक्षा के लिए अनुपयुक्त पाया जाता है, तो उसे तुरंत बदल दिया जाना चाहिए। अनुपयुक्त व्यक्तियों की नियुक्ति के कारण कलीसिया के चढ़ावों के नुकसान के लिए, कलीसिया के अगुवाओं को जवाबदेह ठहराया जायेगा।

4. कलीसिया के वित्त का लेखांकन के सख़्त नियमों के अनुसार प्रबंधन और उपयोग किया जाना चाहिए। जब कलीसिया के अगुवा एक संरक्षक को चढ़ावे सौंपते हैं, तो संरक्षक को सौंपी गई वास्तविक राशि के प्रमाण के रूप में एक रसीद तीन प्रतियों में बनाई जानी चाहिए। संरक्षकों को केवल एक चिट नहीं लिखनी चाहिए, बल्कि दानकर्ता के लिए धन की प्राप्ति का एक प्रमाण देना चाहिए। किसी भी स्तर पर अगुवाओं द्वारा चढ़ावों के स्थानांतरण या हस्तांतरण के दो या तीन अगुवा और कार्यकर्ता गवाह होने चाहिए और इसके लिखित सबूत साथ होने चाहिए, ताकि झूठे अगुवाओं और मसीह-विरोधियों द्वारा चोरी को रोका जा सके। जब भी कलीसिया के किसी काम के लिए धन की आवश्यकता हो, तो दो या तीन लोगों द्वारा धन का निकास किया जाना चाहिए; यह अकेले किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। अगर संरक्षक निकास करने वालों में से कम से कम एक व्यक्ति के साथ परिचित नहीं है, तो निकासी रोक देनी चाहिए और यह आगे नहीं बढ़नी चाहिए। हर बार जब भी धनराशि निकाली जाती है, प्रत्येक निकास-कर्ता को व्यक्तिगत रूप से एक गारंटी लिखनी चाहिए जिसमें निकासी की तारीख, धन राशि, इच्छित उपयोग और निकास-कर्ता के हस्ताक्षर होने चाहिए। लेखा रिकॉर्ड के रूप में एक तीन प्रतियों वाली रसीद भी बनाई जाना चाहिए, जिसमें से एक-एक प्रत्येक व्यक्ति के पास जानी चाहिए।

5. कलीसिया के चढ़ावों संबंधी सभी आय और व्यय दो प्रतियों में दर्ज किए जाने चाहिए, जिसमें से एक-एक प्रति दोनों लेखाकारों को दी जानी चाहिए। लेखाकारों द्वारा संभाले गए सभी खातों को स्पष्ट रूप से रखा जाना चाहिए और उनकी अगुवाओं द्वारा एकाएक, या मासिक आधार पर, जाँच की जानी चाहिए, उन्हें यह सत्यापित करना चाहिए कि चढ़ावों की आय और उनके व्यय को सिद्धांतों के अनुसार नियंत्रित किया जाता है, ताकि समस्याओं को तुरंत पहचाना और हल किया जा सके। जब अगुवाओं और कार्यकर्ताओं को काम की तात्कालिकता के कारण बदल दिया जाता है, या पुन: नियुक्त किया जाता है, तो कार्यभार सौंपते समय खातों को स्पष्ट रूप से देख लेना चाहिए ताकि छिपे इरादे वाले लोगों को कलीसिया के चढ़ावों का गबन या गलत व्यवहार करने का अवसर न मिले।

6. परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा दिए गए चढ़ावों को चढ़ावे के बॉक्स में ही रखा जाना चाहिए। चढ़ावे का बॉक्स न होने पर, उन चढ़ावों को व्यक्तिगत रूप से कलीसिया के दो अगुवाओं को सौंपा जाना चाहिए। चढ़ावे केवल एक अगुवा को नहीं दिए जाने चाहिए। किसी भी अगुवा या कार्यकर्ता को अकेले में भाई या बहन से कोई चढ़ावा लेने की अनुमति नहीं है; न्यूनतम दो लोगों की आवश्यकता होती है। चढ़ावे को पाने के बाद, अगुवाओं और कार्यकर्ताओं को तीन प्रतियों में प्राप्ति का एक प्रमाण प्रस्तुत करना चाहिए, जिसमें धन राशि संख्याओं और अक्षरों, दोनों में लिखी गई हो, रसीद की तारीख, और चढ़ावे के प्राप्तकर्ताओं के आध्यात्मिक नाम भी दर्ज होने चाहिए। प्रत्येक प्राप्तकर्ता एक प्रति रखता है। भेंट करने वाले भाई या बहन को एक पर्ची प्रदान की जाती है जो यह साबित करती है कि भेंट परमेश्वर के घर को दी गई है।

7. कलीसिया में रखे गए, ऊपर के स्तर को सौंपे जाने वाले सभी चढ़ावे दो लोगों द्वारा संयुक्त रूप से संभाले जाने चाहिए। चढ़ावे केवल एक व्यक्ति द्वारा नहीं लिए जाने चाहिए। विशेष रूप से नियुक्त कर्मियों को निर्दिष्ट स्थान पर भेंट पहुँचानी चाहिए और संभावित खतरनाक स्थानों से होकर उन्हें गुज़रना या टहलना नहीं चाहिए। जो लोग लोभी, धन-लोलुप, और अनुचित लाभ उठाने में माहिर हैं, या जिनके परिवार का पैसा बकाया है, उन्हें चढ़ावे इकट्ठा करने या परमेश्वर के घर के लिए किसी भी ऐसे मामलों को संभालने की अनुमति नहीं देनी चाहिए, जिसमें चढ़ावे के खर्च भी शामिल हैं (जैसे कि कलीसिया के लिए खरीद, आदि)।

8. वे सभी जो चढ़ावे लेते और भेजते हैं या जिनके पास चढ़ावे के उपयोग का कारण होता है, उन्हें स्पष्ट रूप से एक साफ़ व्यय सूची और आइटम-दर-आइटम खातों को लिखना चाहिए और खातों को तुरंत सत्यापित करना चाहिए। जो कोई भी स्वेच्छा से खातों को सत्यापित करने के लिए तैयार न हो, उसे संदिग्ध माना जाना चाहिए। जिस किसी ने भी खातों से छेड़छाड़ की हो, उससे सख्ती से निपटना चाहिए और उसके बाद उसे चढ़ावों से दूर रखना चाहिए। गंभीर मामलों में, उन्हें परिशुद्ध या निष्कासित कर देना चाहिए।

9. चढ़ावों के संरक्षकों को सिद्धांतों का पालन करना चाहिए और चढ़ावों के मामलों में परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से वफ़ादार होना चाहिए। यदि धनराशि निकालते समय पता चलता है कि अगुवा सिद्धांतों से भटक गए हैं, तो संरक्षकों को उनसे अनुरोध करना चाहिए कि वे सिद्धांतों का पालन करें। यदि अगुवा इस सलाह को अनसुना कर देते हैं और चढ़ावों को लेने पर ज़ोर देते हैं, तो संरक्षकों को यह अधिकार है कि वे इसे तब तक संसाधित न करें जब तक कि ऊपर से सत्यापन न ले लिया जाए। यदि यह पता चलता है कि अगुवा और कार्यकर्ता चढ़ावों के निकास में सिद्धांतों से विचलित हो गए थे और संरक्षकों ने निकासी को संसाधित करने से इनकार नहीं किया था—अगर उन्होंने निर्विवाद रूप से अनुपालन किया, और आँखें मूँद कर धन सौंप दिया था—तो यह सिद्धांतों का एक गंभीर उल्लंघन और ज़िम्मेदारी का पूरा त्याग है। प्रकृति में, ऐसे संरक्षक यहूदा से अलग नहीं होते हैं, और उन्हें प्रतिस्थापित या परिशुद्ध किया जाना चाहिए। यदि संरक्षक सिद्धांतों का पालन नहीं करते हैं और शैतान को उनका लाभ उठाने की अनुमति देते हैं, जिससे कलीसिया को चढ़ावे का नुकसान होता है, तो उन्हें निशर्त क्षतिपूर्ति करनी चाहिए; अगर वे क्षतिपूर्ति करने से इनकार करते हैं, तो उन्हें परिशुद्ध या निष्कासित किया जा सकता है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

परमेश्वर के प्रति चुने हुए लोगों के चढ़ावे परमेश्वर की अनन्य संपत्ति हैं; वे किसी भी व्यक्ति या कलीसिया के नहीं होते हैं, और वे सब परमेश्वर के घर के लिए आवंटित किए जाते हैं, और उसी के द्वारा उपयोग में लाए जाते हैं। किसी भी प्रकार की हेराफ़ेरी, उधारी, या चढ़ावे का गबन करने को चोरी माना जाता है। परमेश्वर का स्वभाव कोई अपराध सहन नहीं करता है: वे सभी जो चोरी करते हैं, वे यहूदा ही हैं, वे घोर पापी हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना चाहिए। ऐसे लोगों का हटाया जाना तय है। उन्हें परमेश्वर के घर से दंडित किया जाना चाहिए और उनके कुकर्मों को दर्ज कर सार्वजनिक रूप से उन्हें सभी को ज्ञात कराना चाहिए। परमेश्वर के चढ़ावे की रक्षा करना प्राथमिक महत्व का होता है। कुकर्म के दंड के लिए सावधानी से तैयार किए गए सिद्धांतों के बिना, दुष्ट शैतान निश्चित रूप से खामियों का फायदा उठाएगा। इस दिशा में, चढ़ावों की चोरी करने, गबन करने या नुकसान पहुँचाने वालों के प्रति परमेश्वर के घर को सख्त कदम उठाने चाहिए। ऐसे लोगों से इस प्रकार पेश आना चाहिए :

1. ऐसे लोगों के लिए जो परमेश्वर के चढ़ावे चुराते या गबन करते हैं, यदि इसकी राशि छोटी है, यदि वे पश्चाताप दिखाते हैं, और तुरंत भरपाई प्रदान करते हैं, तो उसे एक त्रुटि ही माना जाएगा। इसके बाद, हालाँकि, उन्हें केवल कलीसिया का जीवन जीने की अनुमति होगी, और उन्हें अगुवाओं या कार्यकर्ताओं के रूप में कार्य करने या महत्वपूर्ण कार्यभार लेने की अनुमति नहीं होगी।

2. वे सभी जो परमेश्वर के चढ़ावे चुराते और गबन करते हैं, लेकिन कोई पश्चाताप नहीं दिखाते और प्रतिपूर्ति प्रदान करने से इनकार करते हैं, कलीसिया को उनसे चढ़ावे को पुनर्प्राप्त करने के लिए सभी कदम उठाने चाहिए, जिसके बाद संबंधित व्यक्तियों को आवश्यक रूप से कलीसिया से बाहर निकाल देना चाहिए।

3. जहाँ किसी सरंक्षक द्वारा चढ़ावे खो दिए जाते हैं, वहाँ प्रतिपूर्ति एक सीमित कालावधि के भीतर प्रदान की जानी चाहिए। यदि खोई हुई राशि छोटी हो और वह व्यक्ति पश्चाताप दिखाता है, तो यह एक त्रुटि मानी जाएगी। यदि राशि बड़ी हो, तो उन्हें प्रतिपूर्ति प्रदान करनी ही होगी। यदि वे प्रतिपूर्ति प्रदान नहीं करते हैं, तो उन्हें कलीसिया से निष्कासित करना होगा।

4. आग या चोरी जैसी प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदाओं की स्थिति में, त्रुटि और प्रतिपूर्ति को केवल तभी माफ़ किया जाएगा जब कई लोग इसके गवाह हों कि वह घटना रोकी नहीं जा सकती थी। यदि संरक्षक व्यक्तिपरक निवारक उपायों का ध्यान नहीं रख पाता और चढ़ावे को ठीक से संगृहीत और सुरक्षित रखने में विफल रहता है, और आग या चोरी आदि हो जाती हैं, तो ऐसा नुकसान गैर-जिम्मेदारी के कारण होता है, और नुकसान की पूरी रकम की प्रतिपूर्ति की जानी चाहिए। संबंधित व्यक्तियों की भी यह एक त्रुटि मानी जाएगी और भविष्य में चढ़ावे की सुरक्षा करने से उन्हें प्रतिबंधित किया जाएगा।

5. यदि संरक्षकों का चयन सिद्धांत के अनुसार नहीं किया जाता है और इसका परिणाम चढ़ावे का गबन या नुकसान होता है, तो संबंधित अगुवाओं को ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। कम से कम, अगुवाओं की एक त्रुटि दर्ज की जायेगी; यदि चढ़ावा वापस नहीं पाया जा सकता, तो अगुवाओं को आधी राशि की प्रतिपूर्ति करनी होगी। यह न्यायपूर्ण और उचित है। सरंक्षकों द्वारा चढ़ावे के दुरुपयोग से अगुवा अलग नहीं होते हैं; अगुवाओं को ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। यदि अगुवा पूरी तरह से ज़िम्मेदारी लेने से इनकार करते हैं, तो उन्हें प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए। गंभीर मामलों में, जहाँ बड़ी मात्रा में चढ़ावे का नुकसान हुआ हो, उन्हें पूरी राशि चुकानी होगी और उन्हें निष्कासित किया जाना चाहिए।

6. यदि कोई भी अगुवा चढ़ावे की देखरेख में ढीला या लापरवाह है, या लेन-देन करने के लिए वह चढ़ावे का उपयोग करता है, और उन्हें अविश्वसनीय व्यक्तियों को सौंप देता है, तो उसे जवाबदेह ठहराया ही जाना चाहिए, अगुवा के रूप में उनके कर्तव्यों और दायित्वों को रद्द करना होगा, और चुनाव में उम्मीदवार के रूप में खड़े होने की उनकी पात्रता हटा दी जानी चाहिए। उन्हें किसी भी नुकसान को पूर्ण रूप से चुकाना होगा, और गंभीर मामलों में उन्हें कलीसिया से निष्कासित किया जाना चाहिए।

7. अगर कलीसिया में चढ़ावों के लिए किसी जोखिम का पता चलने पर अगुवा, उपयाजक या संरक्षक समय पर कार्रवाई नहीं करते हैं, और परिणामस्वरूप परमेश्वर के घर को काफ़ी आर्थिक नुकसान होता है, तो इसमें शामिल व्यक्तियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और संबंधित नुकसान की पूरी भरपाई की जानी चाहिए। ऐसे झूठे अगुवा, झूठे कार्यकर्ता और ऐसे अन्य लोग जो परमेश्वर के साथ विश्वासघात करते हैं, प्रतिस्थापित किए जाने चाहिए।

8. चढ़ावे की निगरानी करने वाले सभी अगुवाओं, उपयाजकों, और संरक्षकों को अपने कर्तव्यों में एकनिष्ठ होना चाहिए और परमेश्वर के प्रति वफ़ादार होना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में उन्हें चढ़ावे का गबन नहीं करना चाहिए, परमेश्वर के चढ़ावे को बेचना नहीं चाहिए, या उनका उपयोग लेनदेन करने के लिए नहीं करना चाहिए। जो कोई भी परमेश्वर के चढ़ावे को बेचता है, वह यहूदा जैसा ही दोषी है, और वह शापित होगा। उन्हें कलीसिया से भी निष्कासित किया जाना चाहिए।

कलीसिया के चढ़ावे से जुड़ी घटनाओं से निपटने के लिए ऊपर दिए गए आठ सिद्धांत हैं। अगुवाओं और कार्यकर्ताओं द्वारा उनका सभी स्तरों पर सख्ती से अनुपालन होना चाहिए और उन्हें कार्यान्वित किया जाना चाहिए। जो कोई भी कलीसिया के चढ़ावे के साथ जुड़ी किसी गंभीर घटना का कारण बनता है, चाहे वह व्यक्ति कोई भी हो, उससे गंभीर रूप से निपटना ही चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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