142. प्राकृतिक और मानव-निर्मित आपदाओं के साथ पेश आने के सिद्धांत

(1) जो भी प्राकृतिक या मानव-निर्मित आपदा घटित होती है, वह परमेश्वर की अनुमति से होती है। ये सब परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ हैं। व्यक्ति को आत्म-चिंतन करना चाहिए और सच्चाई से पश्चाताप करना चाहिए।

(2) सारी भ्रष्ट मानवजाति का एक शैतानी स्वभाव होता है, जो अक्सर परमेश्वर का विरोध करता है और उसके क्रोध को भड़काता है। यह स्वाभाविक ही है कि लोग अक्सर प्राकृतिक और मानव-निर्मित दोनों आपदाओं का सामना करें।

(3) आपदाओं और परीक्षणों के बीच, व्यक्ति को परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उस पर भरोसा करना चाहिए। अय्यूब के उदाहरण का अनुसरण करो, न तो परमेश्वर को दोष दो, और न ही उसे त्याग दो। बल्कि, व्यक्ति को सत्य की तलाश करनी चाहिए और अपनी गवाही में दृढ़ रहना चाहिए।

(4) परमेश्वर शैतानी, दुष्ट मानवजाति का विनाश करने के लिए आपदा को भेजता है। यदि किसी को दुष्ट शैतान से सहानुभूति है, तो वह परमेश्वर का विरोध और उससे विश्वासघात कर रहा है, और अगर उसके पूरे परिवार को नष्ट भी कर दिया जाए, तो भी उसे परमेश्वर की प्रशंसा करनी चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मेरा अंतिम कार्य न केवल मनुष्यों को दण्ड देने के लिए है बल्कि मनुष्य की मंज़िल की व्यवस्था करने के लिए भी है। इससे भी अधिक, यह इसलिए है कि सभी लोग मेरे कर्मों और कार्यों को अभिस्वीकार करें। मैं चाहता हूँ कि हर एक मनुष्य देखे कि जो कुछ मैंने किया है, वह सही है, और जो कुछ मैंने किया है वह मेरे स्वभाव की अभिव्यक्ति है। यह मनुष्य का कार्य नहीं है, और उसकी प्रकृति तो बिल्कुल भी नहीं है, जिसने मानवजाति की रचना की है, यह तो मैं हूँ जो सृष्टि में हर जीव का पोषण करता है। मेरे अस्तित्व के बिना, मानवजाति केवल नष्ट होगी और विपत्तियों के दंड को भोगेगी। कोई भी मानव सुन्दर सूर्य और चंद्रमा या हरे-भरे संसार को फिर कभी नहीं देखेगा; मानवजाति केवल शीत रात्रि और मृत्यु की छाया की निर्मम घाटी को देखेगी। मैं ही मनुष्यजाति का एकमात्र उद्धार हूँ। मैं ही मनुष्यजाति की एकमात्र आशा हूँ और, इससे भी बढ़कर, मैं ही वह हूँ जिस पर संपूर्ण मानवजाति का अस्तित्व निर्भर करता है। मेरे बिना, मानवजाति तुरंत रुक जाएगी। मेरे बिना मानवजाति तबाही झेलेगी और सभी प्रकार के भूतों द्वारा कुचली जाएगी, इसके बावजूद कोई भी मुझ पर ध्यान नहीं देता है। मैंने वह काम किया है जो किसी दूसरे के द्वारा नहीं किया जा सकता है, मेरी एकमात्र आशा है कि मनुष्य कुछ अच्छे कर्मों के साथ मेरा कर्ज़ा चुका सके। यद्यपि कुछ ही लोग मेरा कर्ज़ा चुका पाये हैं, तब भी मैं मनुष्यों के संसार में अपनी यात्रा पूर्ण करूँगा और विकास के अपने कार्य के अगले चरण को आरंभ करूंगा, क्योंकि इन अनेक वर्षों में मनुष्यों के बीच मेरे आने और जाने की सारी भागदौड़ फलदायक रही है, और मैं अति प्रसन्न हूँ। मैं जिस चीज़ की परवाह करता हूँ वह मनुष्यों की संख्या नहीं, बल्कि उनके अच्छे कर्म हैं। किसी भी स्थिति में, मुझे आशा है कि तुम लोग अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्म तैयार करोगे। तब मुझे संतुष्टि होगी; अन्यथा तुम लोगों में से कोई भी उस आपदा से नहीं बचेगा जो तुम लोगों पर पड़ेगी। आपदा मेरे द्वारा उत्पन्न की जाती है और निश्चित रूप से मेरे द्वारा ही आयोजित की जाती है। यदि तुम लोग मेरी नज़रों में अच्छे इंसान के रूप में नहीं दिखाई दे सकते हो, तो तुम लोग आपदा भुगतने से नहीं बच सकते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

मेरी दया उन पर होती है जो मुझसे प्रेम करते हैं और स्वयं को नकारते हैं। दुष्टों को मिला दण्ड निश्चित रूप से मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण है, और उससे भी बढ़कर, मेरे क्रोध का प्रमाण है। जब आपदा आएगी, तो उन सभी पर अकाल और महामारी आ पड़ेगी जो मेरा विरोध करते हैं और वे विलाप करेंगे। जो लोग सभी तरह के दुष्टतापूर्ण कर्म कर चुके हैं, किन्तु कई वर्षों तक मेरा अनुसरण किया है, वे अपने पापों का फल भुगतने से नहीं बचेंगे; वे भी लाखों वर्षों में शायद ही देखी गयी आपदा में डुबा दिये जाएँगे, और वे लगातार आंतक और भय की स्थिति में जीते रहेंगे। और केवल मेरे ऐसे अनुयायी जिन्होंने मेरे प्रति निष्ठा दर्शायी है, मेरी शक्ति का आनंद लेंगे और गुणगान करेंगे। वे अवर्णनीय तृप्ति का अनुभव करेंगे और ऐसे आनंद में रहेंगे जो मैंने मानवजाति को पहले कभी प्रदान नहीं किया है। क्योंकि मैं मनुष्यों के अच्छे कर्मों को सँजोकर रखता हूँ और उनके बुरे कर्मों से घृणा करता हूँ। जबसे मैंने सबसे पहले मानवजाति की अगुवाई करनी आरंभ की, तबसे मैं उत्सुकतापूर्वक मनुष्यों के ऐसे समूह को पाने की आशा करता रहा हूँ जो मेरे साथ एक मन वाले हों। इस बीच मैं उन लोगों को कभी नहीं भूलता हूँ जो मेरे साथ एक मन वाले नहीं हैं; अपने हृदय में मैं हमेशा उनसे घृणा करता हूँ, उन्हें प्रतिफल देने के अवसर की प्रतीक्षा करता हूँ, जिसे देखना मुझे आनंद देगा। अंततः आज मेरा दिन आ गया है, और मुझे अब और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

दुनिया के विशाल विस्तार में, बार-बार गाद भरने से महासागर मैदानों में बदल रहे हैं, खेत बाढ़ से महासागरों में बदल रहे हैं। सिवाय उसके जो सभी चीज़ों में सर्वस्व पर शासन करता है, कोई भी इस मानव-जाति की अगुआई और मार्गदर्शन करने में समर्थ नहीं है। कोई ऐसा पराक्रमी नहीं है, जो इस मानव-जाति के लिए श्रम या तैयारी कर सकता हो, और ऐसा तो कोई भी नहीं है, जो इस मानव-जाति को प्रकाश की मंजिल की ओर ले जा सके और इसे सांसारिक अन्यायों से मुक्त कर सके। परमेश्वर मनुष्य-जाति के भविष्य पर विलाप करता है, वह मनुष्य-जाति के पतन पर शोक करता है, और उसे पीड़ा होती है कि मनुष्य-जाति, कदम-दर-कदम, क्षय और ऐसे मार्ग की ओर बढ़ रही है, जहाँ से वापसी संभव नहीं है। किसी ने कभी नहीं सोचा है कि ऐसी मनुष्य-जाति जिसने परमेश्वर का हृदय तोड़ दिया है और दुष्ट की तलाश करने के लिए उसका त्याग कर दिया है, किस ओर जा रही है। ठीक इसी कारण से कोई परमेश्वर के कोप को महसूस नहीं करता, कोई परमेश्वर को खुश करने का तरीका नहीं खोजता या परमेश्वर के करीब आने की कोशिश नहीं करता, और इससे भी अधिक, कोई परमेश्वर के दुःख और दर्द को समझने की कोशिश नहीं करता। परमेश्वर की वाणी सुनने के बाद भी मनुष्य अपने रास्ते पर चलता रहता है, परमेश्वर से दूर जाने, परमेश्वर के अनुग्रह और देखभाल से बचने, उसके सत्य से कतराने में लगा रहता है, अपने आप को परमेश्वर के दुश्मन, शैतान को बेचना पसंद करता है। और किसने इस बात पर कोई विचार किया है—क्या मनुष्य को अपनी जिदपर अड़े रहना चाहिए—कि परमेश्वर इस मानव-जाति के साथ कैसा व्यवहार करेगा, जिसने उसे मुड़कर एक नज़र देखे बिना ही खारिज कर दिया? कोई नहीं जानता कि परमेश्वर के बार-बार के अनुस्मारकों और आग्रहों का कारण यह है कि उसने अपने हाथों में एक अभूतपूर्व आपदा तैयार की है, एक ऐसी आपदा, जो मनुष्य की देह और आत्मा के लिए असहनीय होगी। यह आपदा केवल देह का ही नहीं, बल्कि आत्मा का भी दंड है। तुम्हें यह जानने की आवश्यकता है : जब परमेश्वर की योजना निष्फल होती है और जब उसके अनुस्मारकों और आग्रहों का कोई प्रतिदान नहीं मिलता, तो वह किस प्रकार का क्रोध प्रकट करेगा? यह ऐसा होगा, जिसे पहले किसी सृजित प्राणी ने कभी अनुभव किया या सुना नहीं होगा। और इसलिए मैं कहता हूँ, यह आपदा बेमिसाल है और कभी दोहराई नहीं जाएगी। क्योंकि परमेश्वर की योजना मनुष्य-जाति का केवल एक बार सृजन करने और उसे केवल एक बार बचाने की है। यह पहली बार है, और यही अंतिम बार भी है। इसलिए, जिन श्रमसाध्य इरादों और उत्साहपूर्ण प्रत्याशा से परमेश्वर इस बार इंसान को बचाता है, उसे कोई नहीं समझ सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है' से उद्धृत

सब कुछ जो परमेश्वर करता है, उसकी योजना सटीकता के साथ बनाई जाती है। जब वह किसी चीज़ या परिस्थिति को घटित होते देखता है, तो उसकी दृष्टि में इसे नापने के लिए एक मापदंड होता है और यह मापदंड निर्धारित करता है कि इससे निपटने के लिए वह किसी योजना की शुरुआत करता है या नहीं या उसे इस चीज़ एवं परिस्थिति के साथ किस प्रकार निपटना है। वह उदासीन नहीं है या उसमें सभी चीज़ों के प्रति भावनाओं की कमी नहीं है। असल में इसका पूर्णत: विपरीत है। यहाँ एक पद है, जिसे परमेश्वर ने नूह से कहा था : "सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मैं उनको पृथ्वी समेत नष्‍ट कर डालूँगा।" जब परमेश्वर ने यह कहा तो क्या उसका मतलब था वह सिर्फ मनुष्यों का विनाश कर रहा था? नहीं! परमेश्वर ने कहा कि वह देह वाले सभी जीवित प्राणियों का विनाश करने जा रहा था। परमेश्वर ने विनाश क्यों चाहा? यहाँ परमेश्वर के स्वभाव का एक और प्रकाशन है; परमेश्वर की दृष्टि में, मनुष्य की भ्रष्टता के प्रति, सभी देहधारियों की अशुद्धता, उपद्रव एवं अवज्ञा के प्रति उसके धीरज की एक सीमा है। उसकी सीमा क्या है? यह ऐसा है जैसा परमेश्वर ने कहा था : "और परमेश्‍वर ने पृथ्वी पर जो दृष्‍टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था।" इस वाक्यांश "क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था" का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कोई भी जीवित प्राणी, इनमें परमेश्वर का अनुसरण करने वाले, वे जो परमेश्वर का नाम पुकारते थे, ऐसे लोग जो किसी समय परमेश्वर को होमबलि चढ़ाते थे, ऐसे लोग जो मौखिक रूप से परमेश्वर को स्वीकार करते थे और यहाँ तक कि परमेश्वर की स्तुति भी करते थे—जब एक बार उनका व्यवहार भ्रष्टता से भर गया और परमेश्वर की दृष्टि में आ गया, तो उसे उनका नाश करना होगा। यह परमेश्वर की सीमा थी। अतः परमेश्वर किस हद तक मनुष्य एवं सभी देहधारियों की भ्रष्टता के प्रति सहनशील बना रहा? उस हद तक जब सभी लोग, चाहे वे परमेश्वर के अनुयायी हों या अविश्वासी, सही मार्ग पर नहीं चल रहे थे। उस हद तक जब मनुष्य केवल नैतिक रूप से भ्रष्ट और बुराई से भरा हुआ नहीं था, बल्कि जहाँ कोई व्यक्ति नहीं था, जो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करता था, किसी ऐसे व्यक्ति के होने की तो बात ही छोड़ दीजिए जो विश्वास करता हो कि परमेश्वर द्वारा इस संसार पर शासन किया जाता है और यह कि परमेश्वर लोगों के लिए प्रकाश का और सही मार्ग ला सकता है। उस हद तक जहाँ मनुष्य ने परमेश्वर के अस्तित्व से घृणा की और परमेश्वर को अस्तित्व में रहने की अनुमति नहीं दी। जब एक बार मनुष्य का भ्रष्टाचार इस बिंदु पर पहुँच गया, तो परमेश्वर इसे और अधिक नहीं सह सका। उसका स्थान कौन लेता? परमेश्वर के क्रोध और परमेश्वर के दंड का आगमन।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

बाइबल के उस दृश्य का स्मरण करो, जब परमेश्वर ने सदोम पर तबाही बरपाई थी, और यह भी सोचो कि किस प्रकार लूत की पत्नी नमक का खंभा बन गई थी। वापस सोचो कि किस प्रकार नीनवे के लोगों ने टाट और राख में अपने पापों का पश्चात्ताप किया था, और याद करो कि 2,000 वर्ष पहले यहूदियों द्वारा यीशु को सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद क्या हुआ था। यहूदी इजराइल से निर्वासित कर दिए गए थे और वे दुनिया भर के देशों में भाग गए थे। बहुत लोग मारे गए थे, और संपूर्ण यहूदी राष्ट्र, किसी देश के विनाश की अभूतपूर्व पीड़ा का भागी हो गया था। उन्होंने परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया था—जघन्य पाप किया था—और परमेश्वर के स्वभाव को भड़काया था। उनसे उनके किए का भुगतान करवाया गया था, और उन्हें उनके कार्यों के परिणाम भुगतने के लिए मजबूर किया गया था। उन्होंने परमेश्वर की निंदा की थी, परमेश्वर को अस्वीकार किया था, और इसलिए उनकी केवल एक ही नियति थी : परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना। यही वह कड़वा परिणाम और आपदा थी, जो उनके शासक उनके देश और राष्ट्र पर लाए थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है' से उद्धृत

यदि मानवजाति अच्छा भाग्य पाना चाहती है, यदि कोई देश अच्छा भाग्य पाना चाहता है, तो मनुष्य को परमेश्वर की आराधना में झुकना होगा, पश्चात्ताप करना होगा और परमेश्वर के सामने अपने पाप स्वीकार करने होंगे, अन्यथा मनुष्य का भाग्य और गंतव्य एक अपरिहार्य विभीषिका बन जाएँगे।

पीछे मुड़कर उस समय को देखो, जब नूह ने नाव बनाई थी : मानवजाति पूरी तरह से भ्रष्ट थी, लोग परमेश्वर के आशीषों से भटक गए थे, परमेश्वर द्वारा अब और उनकी देखभाल नहीं की जा रही थी, और वे परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ खो चुके थे। वे परमेश्वर की रोशनी के बिना अंधकार में रहते थे। फिर वे स्वभाव से व्यभिचारी बन गए, और उन्होंने स्वयं को घृणित चरित्रहीनता में झोंक दिया। ऐसे लोग अब और परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ प्राप्त नहीं कर सकते थे; वे परमेश्वर के चेहरे की गवाही देने या परमेश्वर की वाणी सुनने के अयोग्य थे, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया था, उन सब चीजों को बेक़ार समझकर छोड़ दिया था, जो परमेश्वर ने उन्हें प्रदान की थीं, और वे परमेश्वर की शिक्षाओं को भूल गए थे। उनका हृदय परमेश्वर से अधिकाधिक दूर भटक गया था, जिसका परिणाम यह हुआ कि वे विवेक और मानवता से वंचित होकर पथभ्रष्ट हो गए और अधिक से अधिक दुष्ट होते गए। फिर वे मृत्यु के और भी निकट पहुँच गए, और परमेश्वर के कोप और दंड के भागी हो गए। केवल नूह ने परमेश्वर की आराधना की और बुराई से दूर रहा, और इसलिए वह परमेश्वर की वाणी और निर्देशों को सुनने में सक्षम था। उसने परमेश्वर के वचन के अनुसार नाव बनाई, और सभी प्रकार के जीवित प्राणियों को उसमें एकत्र किया। और इस तरह, जब एक बार सब-कुछ तैयार हो गया, तो परमेश्वर ने संसार पर अपनी विनाशलीला शुरू कर दी। केवल नूह और उसके परिवार के सात अन्य लोग इस विनाशलीला में जीवित बचे, क्योंकि नूह ने यहोवा की आराधना की थी और बुराई से दूर रहा था।

अब वर्तमान युग को देखो : नूह जैसे धर्मी मनुष्य, जो परमेश्वर की आराधना कर सके और बुराई से दूर रह सके, होने बंद हो गए हैं। फिर भी परमेश्वर इस मानवजाति के प्रति दयालु है, और इस अंतिम युग में अभी भी उन्हें दोषमुक्त करता है। परमेश्वर उनकी खोज कर रहा है, जो उसके प्रकट होने की लालसा करते हैं। वह उनकी खोज करता है, जो उसके वचनों को सुनने में सक्षम हैं, जो उसके आदेश को नहीं भूले और अपना तन-मन उसे समर्पित करते हैं। वह उनकी खोज करता है, जो उसके सामने बच्चों के समान आज्ञाकारी हैं, और उसका विरोध नहीं करते। यदि तुम किसी भी ताकत या बल से अबाधित होकर ईश्वर के प्रति समर्पित होते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे ऊपर अनुग्रह की दृष्टि डालेगा और तुम्हें अपने आशीष प्रदान करेगा। यदि तुम उच्च पद वाले, सम्मानजनक प्रतिष्ठा वाले, प्रचुर ज्ञान से संपन्न, विपुल संपत्तियों के मालिक हो, और तुम्हें बहुत लोगों का समर्थन प्राप्त है, तो भी ये चीज़ें तुम्हें परमेश्वर के आह्वान और आदेश को स्वीकार करने, और जो कुछ परमेश्वर तुमसे कहता है, उसे करने के लिए उसके सम्मुख आने से नहीं रोकतीं, तो फिर तुम जो कुछ भी करोगे, वह पृथ्वी पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगा और मनुष्य का सर्वाधिक धर्मी उपक्रम होगा। यदि तुम अपनी हैसियत और लक्ष्यों की खातिर परमेश्वर के आह्वान को अस्वीकार करोगे, तो जो कुछ भी तुम करोगे, वह परमेश्वर द्वारा श्रापित और यहाँ तक कि तिरस्कृत भी किया जाएगा। शायद तुम कोई अध्यक्ष, कोई वैज्ञानिक, कोई पादरी या कोई एल्डर हो, किंतु इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा पद कितना उच्च है, यदि तुम अपने ज्ञान और अपने उपक्रमों की योग्यता पर भरोसा रखते हो, तो तुम हमेशा असफल रहोगे, और हमेशा परमेश्वर के आशीषों से वंचित रहोगे, क्योंकि परमेश्वर ऐसा कुछ भी स्वीकार नहीं करता जो तुम करते हो, और वह नहीं मानता कि तुम्हारे उपक्रम धर्मी हैं, या यह स्वीकार नहीं करता कि तुम मानवजाति के भले के लिए कार्य कर रहे हो। वह कहेगा कि जो कुछ भी तुम करते हो, वह मानवजाति के ज्ञान और ताकत का इस्तेमाल कर इंसान से परमेश्वर की सुरक्षा छीनने और उसे आशीषों से वंचित करने के लिए किया जाता है। वह कहेगा कि तुम मानवजाति को अंधकार की ओर, मृत्यु की ओर, और एक ऐसे अंतहीन अस्तित्व के आरंभ की ओर ले जा रहे हो, जिसमें मनुष्य ने परमेश्वर और उसके आशीष खो दिए हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा शैतान से यह कहने के बाद कि "जो कुछ उसका है, वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना," शैतान चला गया, जिसके तुरंत बाद अय्यूब के ऊपर अचानक और भयंकर हमले होने लगे : पहले, उसके बैल और गधे लूट लिए गए और उसके कुछ सेवकों को मार दिया गया; फिर, उसकी भेड़-बकरियों और कुछ और सेवकों को आग में भस्म कर दिया गया; उसके पश्चात्, उसके ऊँट ले लिए गए और उसके कुछ और सेवकों की हत्या कर दी गई; अंत में, उसके पुत्र और पुत्रियों की जानें ले ली गईं। हमलों की यह श्रृंखला अय्यूब द्वारा अपने पहले प्रलोभन के दौरान झेली गई यातना थी। जैसा कि परमेश्वर द्वारा आदेशित था, इन हमलों के दौरान शैतान ने केवल अय्यूब की संपत्ति और उसके बच्चों को लक्ष्य बनाया था, और स्वयं अय्यूब को हानि नहीं पहुँचाई थी। तथापि, अय्यूब विशाल संपदा से संपन्न धनवान मनुष्य से तत्क्षण ऐसे व्यक्ति में बदल गया जिसके पास कुछ भी नहीं था। कोई भी व्यक्ति यह विस्मयकारी अप्रत्याशित झटका सहन नहीं कर सकता था या इसके प्रति समुचित प्रतिक्रिया नहीं कर सकता था, फिर भी अय्यूब ने अपने असाधारण पहलू का प्रदर्शन किया। पवित्र शास्त्र नीचे लिखा विवरण प्रदान करते हैं : "तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् किया।" यह सुनने के पश्चात् कि अय्यूब ने अपने बच्चे और अपनी सारी संपत्ति गँवा दी थी, यह अय्यूब की पहली प्रतिक्रिया थी। सबसे बढ़कर, वह आश्चर्यचकित, या घबराया हुआ नहीं दिखा, उसने क्रोध या नफ़रत तो और भी व्यक्त नहीं की। तो, तुम देखते हो कि वह अपने हृदय में पहले से ही पहचान गया था कि ये आपदाएँ आकस्मिक घटनाएँ नहीं थीं, या मनुष्य के हाथों से उत्पन्न नहीं हुई थीं, वे प्रतिफल या दण्ड का आगमन तो और भी नहीं थीं। इसके बजाय, यहोवा की परीक्षाएँ उसके ऊपर आ पड़ी थीं; वह यहोवा ही था जो उसकी संपत्ति और बच्चों को ले लेना चाहता था। उस समय अय्यूब बहुत शांत और सोच-विचार में स्पष्ट था। उसकी अचूक और खरी मानवता ने उसे अपने ऊपर आ पड़ी आपदाओं के बारे में तर्कसंगत और स्वाभाविक रूप से सटीक परख करने और निर्णय लेने में समर्थ बनाया, और इसके परिणामस्वरूप, उसने असामान्य शांत मन से व्यवहार किया : "तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् किया।" "बागा फाड़" का अर्थ है वह निर्वस्त्र था, और कुछ भी धारण नहीं किए था; "सिर मुँडाने" का अर्थ है वह नवजात शिशु के समान परमेश्वर के समक्ष लौट आया था; "भूमि पर गिरा, और दण्डवत् किया" का अर्थ है वह इस संसार में नग्न आया था, और आज भी उसके पास कुछ नहीं था, वह परमेश्वर के पास लौट आया था मानो नवजात शिशु हो। उस पर जो बीता था उस सबके प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति परमेश्वर के किसी प्राणी द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती थी। यहोवा में उसका विश्वास, विश्वास के क्षेत्र से आगे चला गया था; यह परमेश्वर के प्रति उसका भय, परमेश्वर के प्रति उसका आज्ञापालन था; वह न केवल उसे देने के लिए, बल्कि उससे लेने के लिए भी परमेश्वर को धन्यवाद दे पाने में समर्थ था। इतना ही नहीं, वह स्वयं आगे बढ़कर वह सब करने में समर्थ था, जो अपना सब कुछ, अपने जीवन सहित, परमेश्वर को लौटाने के लिए आवश्यक था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

यद्यपि अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था या स्वयं अपने कानों से परमेश्वर के वचन कभी नहीं सुने थे, फिर भी अय्यूब के हृदय में परमेश्वर का स्थान था। परमेश्वर के प्रति अय्यूब की प्रवृत्ति क्या थी? जैसा पहले उल्लेख किया गया है, यह थी, "यहोवा का नाम धन्य है।" उसके द्वारा परमेश्वर के नाम को धन्य कहना बेशर्त, संदर्भ से निरपेक्ष था, और किसी तर्क से बंधा नहीं था। हम देखते हैं कि अय्यूब ने अपना हृदय परमेश्वर को दे दिया था, उसे परमेश्वर द्वारा नियंत्रित होने दिया था; अपने हृदय में वह जो सोचता था, वह जो निर्णय लेता था, और वह जिसकी योजना बनाता था वह सब परमेश्वर के लिए खुला छोड़ दिया गया था और परमेश्वर से बंद नहीं रखा गया था। उसका हृदय परमेश्वर के विरोध में खड़ा नहीं हुआ था, और उसने परमेश्वर से कभी नहीं कहा कि वह उसके लिए कुछ करे या उसे कुछ दे, और उसने अंधाधुँध इच्छाएँ नहीं पालीं कि परमेश्वर की उसकी आराधना से उसे कुछ न कुछ प्राप्त जाए। उसने परमेश्वर से किन्हीं लेन-देनों की बात नहीं की, और परमेश्वर से कोई याचनाएँ या माँगें नहीं कीं। उसका परमेश्वर के नाम की स्तुति करना भी सभी चीज़ों पर शासन करने की परमेश्वर की महान सामर्थ्य और अधिकार के कारण था, और वह इस पर निर्भर नहीं था कि उसे आशीषें प्राप्त हुईं या उस पर आपदा टूटी। वह मानता था कि परमेश्वर लोगों को चाहे आशीष दे या उन पर आपदा लाए, परमेश्वर की सामर्थ्य और उसका अधिकार नहीं बदलेगा, और इस प्रकार, व्यक्ति की परिस्थितियाँ चाहे जो हों, परमेश्वर के नाम की स्तुति की जानी चाहिए। मनुष्य को धन्य किया जाता है तो परमेश्वर की संप्रभुता के कारण किया जाता है, और इसलिए जब मनुष्य पर आपदा टूटती है, तो वह भी परमेश्वर की संप्रभुता के कारण ही टूटती है। परमेश्वर की सामर्थ्य और अधिकार मनुष्य से संबंधित सब कुछ पर शासन करते हैं और उसे व्यवस्थित करते हैं; मनुष्य के सौभाग्य के उतार-चढ़ाव परमेश्वर की सामर्थ्य और उसके अधिकार की अभिव्यंजना हैं, और जिसका चाहे जो दृष्टिकोण हो, परमेश्वर के नाम की स्तुति की जानी चाहिए। यही वह है जो अय्यूब ने अपने जीवन के वर्षों के दौरान अनुभव किया था और जानने लगा था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

मानवीय धारणाओं के अनुसार, अच्छे लोगों को पुरस्कृत किया जाता है और बुरे लोगों को दंडित किया जाता है, अच्छे लोगों को अच्छा प्रतिफल मिलता है और बुरे लोगों को बुरा प्रतिफल मिलता है, और जो लोग बुराई नहीं करते, उन सभी को अच्छा प्रतिफल और आशीष मिलने चाहिए; और वह इसलिए, क्योंकि परमेश्वर धार्मिक है। ऐसा प्रतीत होगा कि उन सभी मामलों में, जिनमें लोग बुरे नहीं हैं, उन्हें अच्छा प्रतिफल मिलना चाहिए; केवल यही परमेश्वर की धार्मिकता है। लेकिन अगर किसी को अच्छा प्रतिफल न मिल पाए तो? तब क्या तुम यह कहोगे कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? मान लो, इस युग में लोग एक बही में एक खाता देखें, जिसमें उल्लेख हो कि परमेश्वर ने पिछले युग में एक मानवजाति बनाई थी। हजारों साल बीत जाने के बाद परमेश्वर ने देखा कि मनुष्य इस हद तक भ्रष्ट हो गए हैं कि वे अब मनुष्य के रूप में भी नहीं पहचाने जा सकते, और उन्हें बचाने की मन:स्थिति में न होने के कारण उसने उन्हें नष्ट कर दिया। तुम इसे कैसे लोगे? क्या तुम कहोगे कि परमेश्वर में प्रेम नहीं है? मनुष्य की नजर में अगर परमेश्वर ने लोगों को नष्ट कर दिया है, तो इसका मतलब है कि उसमें प्रेम नहीं है। परमेश्वर संबंधी ज्ञान चीजों के बारे में मानवीय दृष्टिकोण के आधार पर यह बताना नहीं है कि वह कैसा है; मनुष्यों के चीजों को देखने के तरीके में कोई सत्य नहीं है। तुम्हें यह देखना चाहिए कि उसका सार क्या है, और साथ ही, उसका स्वभाव क्या है। लोगों को परमेश्वर के सार को उसके द्वारा किए गए किसी कार्य या व्यवहार के परिणामस्वरूप उत्पन्न किसी बाहरी घटना के आधार पर नहीं देखना चाहिए। मानवजाति स्वयं शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी है। मानवजाति यह भी नहीं जानती कि उसकी अपनी प्रकृति क्या है, और न ही यह कि भ्रष्ट मानवजाति परमेश्वर के सामने क्या है, और उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए। अय्यूब के बारे में सोचो, जो एक धार्मिक व्यक्ति था और जिसे परमेश्वर ने आशीष दिए थे। यह परमेश्वर की धार्मिकता थी। शैतान ने यहोवा के साथ एक दाँव लगाया : "अय्यूब के तुम्हारी आराधना करने का कारण यह है कि तुमने उसे बहुत अधिक दिया है। अगर तुम उससे वह सब छीन लो, तो देखते हैं कि वह फिर भी तुम्हारी आराधना करता है या नहीं?" यहोवा परमेश्वर ने कहा, "तुम उसकी जान लेने के सिवाय जो चाहो कर सकते हो।" तो शैतान अय्यूब के पास गया और बाद में अय्यूब को परीक्षणों का सामना करना पड़ा। उसके पास जो कुछ भी था, सब छीन लिया गया—उसने अपने बच्चे और संपत्ति खो दी। अब, क्या अय्यूब की परीक्षाओं में परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव था? तुम स्पष्ट रूप से नहीं कह सकते, है ना? अगर तुम एक धार्मिक व्यक्ति भी हो, तो भी परमेश्वर को तुम्हें परीक्षण का भागी बनाने और अपनी गवाही देने की अनुमति देने का अधिकार है। परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है; वह सबके साथ समान व्यवहार करता है। इसका मतलब यह नहीं है कि धार्मिक लोगों को फिर परीक्षणों से गुजरने की जरूरत नहीं है या फिर उनकी रक्षा की ही जानी चाहिए; यह बात नहीं है। परमेश्वर को तुम्हें परीक्षणों में डालने का अधिकार है। यह उसके धार्मिक स्वभाव का प्रकाशन है। अंत में, अय्यूब के परीक्षणों से गुजरने और यहोवा की गवाही देने के बाद, यहोवा ने उसे पहले से भी अधिक आशीष दिए, और पहले से दोगुने और बेहतर आशीष दिए। इतना ही नहीं, यहोवा ने उसे दर्शन दिए, और हवा में से उससे बातें कीं, और अय्यूब ने उसे आमने-सामने देखा। यह उसे दिया गया आशीष था। यह परमेश्वर की धार्मिकता थी। अगर इसके विपरीत हुआ होता, तो क्या होता? जब अय्यूब परीक्षण से गुजर चुका और यहोवा ने देखा कि कैसे अय्यूब ने शैतान की मौजूदगी में उसकी गवाही दी और शैतान को लज्जित किया, तब अगर यहोवा उसे अनदेखा कर मुड़कर चला जाता, और बाद में अय्यूब को आशीष न मिलते—तो क्या इसमें परमेश्वर की धार्मिकता होती? परीक्षणों के बाद अय्यूब को आशीष मिले या नहीं, या यहोवा ने उसे दर्शन दिए या नहीं, इन सब में परमेश्वर की सदिच्छा शामिल है। अय्यूब को दर्शन देना परमेश्वर की धार्मिकता थी, और उसे दर्शन न देना भी परमेश्वर की धार्मिकता होती। तुम—सृजित प्राणी—किस आधार पर परमेश्वर से माँग करते हो? लोग परमेश्‍वर से माँग करने के उपयुक्त नहीं हैं। परमेश्‍वर से माँगें करने से ज्‍़यादा अनुपयुक्त कुछ नहीं है। वह वही करेगा जो उसे करना ही चाहिए, और उसका स्‍वभाव धार्मिक है। धार्मिकता किसी भी तरह से न्‍यासंगत या तर्कसंगत नहीं होती; यह समतावाद नहीं है, या तुम्‍हारे द्वारा पूरे किए गए काम के अनुसार तुम्‍हें तुम्‍हारे हक़ का हिस्‍सा आवंटित करने, या तुमने जो भी काम किया हो उसके बदले भुगतान करने, या तुम्‍हारे किए प्रयास के अनुसार तुम्‍हारा देय चुकाने का मामला नहीं है। यह धार्मिकता नहीं है। मान लो कि अय्यूब द्वारा उसकी गवाही देने के बाद परमेश्वर अय्यूब को ख़त्‍म देता : तब भी परमेश्‍वर धार्मिक होता। इसे धार्मिकता क्‍यों कहा जाता है? मानवीय दृष्टिकोण से, अगर कोई चीज़ लोगों की धारणाओं के अनुरूप होती है, तब उनके लिए यह कहना बहुत आसान हो जाता है कि परमेश्‍वर धार्मिक है; परंतु, अगर वे उस चीज़ को अपनी धारणाओं के अनुरूप नहीं पाते—अगर यह कुछ ऐसा है जिसे वे बूझ नहीं पाते—तो उनके लिए यह कहना मुश्किल होगा कि परमेश्‍वर धार्मिक है। अगर परमेश्‍वर ने पहले तभी अय्यूब को नष्‍ट कर दिया होता, तो लोगों ने यह न कहा होता कि वह धार्मिक है। हालाँकि, लोग भ्रष्‍ट कर दिए गए हों या नहीं, उन्हें नष्ट करते समय क्या परमेश्‍वर को अपना इसका औचित्य सिद्ध करना पड़ता है? क्‍या उसे लोगों को बतलाना चाहिए कि वह ऐसा किस आधार पर करता है? क्‍या उसका निर्णय इस बात पर आधारित होना चाहिए : "अगर वे उपयोगी हैं, तो मैं उन्‍हें नष्‍ट नहीं करूँगा; अगर वे उपयोगी नहीं हैं, तो मैं उन्‍हें नष्‍ट कर दूँगा"? इसकी आवश्यकता नहीं है। परमेश्‍वर की नज़रों में, किसी भी ऐसे व्‍यक्ति से जो भ्रष्‍ट है, वह जैसे भी चाहे निपटा जा सकता है; परमेश्‍वर जो कुछ भी करता है, वह उचित ही होगा, और सब परमेश्वर का ही विधान है। अगर तुम लोग परमेश्‍वर की निगाहों में अप्रिय होते, और अगर वह कहता कि तुम्‍हारी गवाही के बाद तुम उसके किसी काम के नहीं हो और इसलिए उसने तुम लोगों को नष्‍ट कर दिया होता, तब भी क्‍या यह उसकी धार्मिकता होती? हाँ, होती। तुम इसे तथ्यों से इस समय भले न पहचान सको, लेकिन तुम्‍हें सिद्धांत में इसे समझना ही चाहिए। तुम लोग क्‍या कहोगे—परमेश्‍वर द्वारा शैतान का विनाश क्‍या उसकी धार्मिकता की अभिव्‍यक्ति है? यह भी कि अगर उसने शैतान को बने रहने दिया होता, तब तुम क्‍या कहते? तुम हाँ कहने का दुस्‍साहस तो नहीं करते? परमेश्‍वर का सार धार्मिकता है। यद्यपि वह जो करता है उसे बूझना आसान नहीं है, तब भी वह जो कुछ भी करता है वह सब धार्मिक है; बात सिर्फ़ इतनी है कि लोग समझते नहीं हैं। जब परमेश्‍वर ने पतरस को शैतान के सुपुर्द कर दिया था, तब पतरस की प्रतिक्रिया क्‍या थी? "तुम जो भी करते हो उसकी थाह तो मनुष्‍य नहीं पा सकता, लेकिन तुम जो भी करते हो उस सब में तुम्‍हारी सदिच्छा समाई है; उस सब में धार्मिकता है। यह कैसे सम्‍भव है कि मैं तुम्‍हारे बुद्धिमान कर्मों की सराहना न करूँ?" आज, तुम्‍हें देखना चाहिए कि परमेश्वर शैतान को इसलिए नष्‍ट नहीं करता ताकि वह मनुष्‍यों को दिखा सके कि शैतान ने उन्‍हें किस तरह भ्रष्‍ट कर दिया है और परमेश्‍वर किस तरह उन्हें बचाता है; अंततः, शैतान ने जिस हद तक लोगों को भ्रष्‍ट कर दिया है उसकी वजह से, वे शैतान द्वारा उन्हें भ्रष्‍ट किए जाने का राक्षसी पाप देखेंगे, और जब परमेश्‍वर शैतान को नष्‍ट करता है, तब वे परमेश्‍वर की धार्मिकता देखेंगे और देखेंगे कि इसमें परमेश्‍वर का स्‍वभाव निहित है। वह सब जो परमेश्‍वर करता है धार्मिक है। हालाँकि वह तुम्‍हारे लिए अज्ञेय हो सकता है, तब भी तुम्‍हें मनमाने ढंग से फ़ैसले नहीं करने चाहिए। अगर तुम्‍हें उसका कोई कृत्‍य अतर्कसंगत प्रतीत होता है, या उसके बारे में तुम्हारी कोई धारणाएँ हैं, और उसकी वजह से तुम कहते हो कि वह धार्मिक नहीं है, तब तुम सर्वाधिक अतर्कसंगत हो रहे हो। तुम देखो कि पतरस ने पाया कि कुछ चीज़ें अबूझ थीं, लेकिन उसे पक्का विश्‍वास था कि परमेश्‍वर की बुद्धिमता विद्यमान थी और उन चीजों में उसकी इच्छा थी। मनुष्‍य हर चीज़ की थाह नहीं पा सकते; इतनी सारी चीज़ें हैं जिन्‍हें वे समझ नहीं सकते। इस तरह, परमेश्‍वर के स्‍वभाव को जानना आसान बात नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को कैसे जानें' से उद्धृत

आजकल, वे जो खोज करते हैं और वे जो नहीं करते, दो पूरी तरह भिन्न प्रकार के लोग हैं, जिनके गंतव्य भी काफ़ी अलग हैं। वे जो सत्य के ज्ञान का अनुसरण करते हैं और सत्य का अभ्यास करते हैं, वे लोग हैं जिनका परमेश्वर उद्धार करेगा। वे जो सच्चे मार्ग को नहीं जानते, वे दुष्टात्माओं और शत्रुओं के समान हैं। वे प्रधान स्वर्गदूत के वंशज हैं और विनाश की वस्तु होंगे। यहाँ तक कि एक अज्ञात परमेश्वर के धर्मपरायण विश्वासीजन—क्या वे भी दुष्टात्मा नहीं हैं? जिन लोगों का अंत:करण साफ़ है, परंतु सच्चे मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे भी दुष्टात्मा हैं; उनका सार भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला है। वे जो सत्य के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और भले ही ऐसे लोग बहुत-सी कठिनाइयाँ सहते हैं, तब भी वे नष्ट किए जाएँगे। वे सभी जो संसार को छोड़ना नहीं चाहते, जो अपने माता-पिता से अलग होना नहीं सह सकते और जो स्वयं को देह के सुख से दूर रखना सहन नहीं कर सकते, परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं और वे सब विनाश की वस्तु बनेंगे। जो भी देहधारी परमेश्वर को नहीं मानता, दुष्ट है और इसके अलावा, वे नष्ट किए जाएँगे। वे सब जो विश्वास करते हैं, पर सत्य का अभ्यास नहीं करते, वे जो देहधारी परमेश्वर में विश्वास नहीं करते और वे जो परमेश्वर के अस्तित्व पर लेशमात्र भी विश्वास नहीं रखते, वे सब नष्ट होंगे। वे सभी जिन्हें रहने दिया जाएगा, वे लोग हैं, जो शोधन के दुख से गुज़रे हैं और डटे रहे हैं; ये वे लोग हैं, जो वास्तव में परीक्षणों से गुज़रे हैं। यदि कोई परमेश्वर को नहीं पहचानता, शत्रु है; यानी कोई भी जो देहधारी परमेश्वर को नहीं पहचानता—चाहे वह इस धारा के भीतर है या बाहर—एक मसीह-विरोधी है! शैतान कौन है, दुष्टात्माएँ कौन हैं और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं, क्या ये वे नहीं, जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते और परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते? क्या ये वे लोग नहीं, जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं? क्या ये वे नहीं, जो विश्वास करने का दावा तो करते हैं, परंतु उनमें सत्य नहीं है? क्या ये वे लोग नहीं, जो सिर्फ़ आशीष पाने की फ़िराक में रहते हैं जबकि परमेश्वर के लिए गवाही देने में असमर्थ हैं? तुम अभी भी इन दुष्टात्माओं के साथ घुलते-मिलते हो और उनके प्रति साफ़ अंत:करण और प्रेम रखते हो, लेकिन क्या इस मामले में तुम शैतान के प्रति सदिच्छाओं को प्रकट नहीं कर रहे? क्या तुम दुष्टात्माओं के साथ संबद्ध नहीं हो रहे? यदि आज कल भी लोग अच्छे और बुरे में भेद नहीं कर पाते और परमेश्वर की इच्छा जानने का कोई इरादा न रखते हुए या परमेश्वर की इच्छाओं को अपनी इच्छा की तरह मानने में असमर्थ रहते हुए, आँख मूँदकर प्रेम और दया दर्शाते रहते हैं, तो उनके अंत और भी अधिक ख़राब होंगे। यदि कोई देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता, तो वह परमेश्वर का शत्रु है। यदि तुम शत्रु के प्रति साफ़ अंत:करण और प्रेम रख सकते हो, तो क्या तुममें धार्मिकता की समझ का अभाव नहीं है? यदि तुम उनके साथ सहज हो, जिनसे मैं घृणा करता हूँ, और जिनसे मैं असहमत हूँ और तुम तब भी उनके प्रति प्रेम और निजी भावनाएँ रखते हो, तब क्या तुम अवज्ञाकारी नहीं हो? क्या तुम जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं कर रहे हो? क्या ऐसे व्यक्ति में सत्य होता है? यदि लोग शत्रुओं के प्रति साफ़ अंत:करण रखते हैं, दुष्टात्माओं से प्रेम करते हैं और शैतान पर दया दिखाते हैं, तो क्या वे जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में रुकावट नहीं डाल रहे हैं? वे लोग जो केवल यीशु पर विश्वास करते हैं और अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर को नहीं मानते, और जो ज़बानी तौर पर देहधारी परमेश्वर में विश्वास करने का दावा करते हैं, परंतु बुरे कार्य करते हैं, वे सब मसीह-विरोधी हैं, उनकी तो बात ही क्या जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते। ये सभी लोग विनाश की वस्तु बनेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

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