145. प्रेम और विवाह के प्रति व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) लोगों को यह स्वतंत्रता होती है कि वे विवाह करने के लिए किसे चुनें, और किसी को भी इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है—परंतु इसका परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास पर या तुम्हारे कर्तव्य को निभाने पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।

(2) सत्य का अनुसरण करने और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने के लिए विवाह को त्याग देना एक विशेष गवाही होती है जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। ऐसा करने वाले लोग प्रतिभाशाली होते हैं, और वे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करते हैं।

(3) यदि कोई विवाह करना चाहता है, तो उसे एक उपयुक्त व्यक्ति का चयन करना चाहिए। इस संबंध को, कम से कम, किसी के विश्वास और जीवन के लिए लाभकारी होना चाहिए, और इसका मतलब परमेश्वर में विश्वास करने के नेक कार्य के लिए हानिकारक सिद्ध होने वाली देह-तुष्टि नहीं होनी चाहिए।

(4) उचित प्रेम और विवाह का सम्मान करो। एकाधिक विवाह सत्य और नैतिकता का उल्लंघन है, और जिनके लिए शादी एक खेल है, वे बुरी आत्माएँ और घृणित दानव होते हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

किसी भी व्यक्ति के जीवन में विवाह एक महत्वपूर्ण घटना होती है; यह वह समय होता है जब कोई विभिन्न प्रकार के उत्तरदायित्वों को वहन करना और धीरे-धीरे विभिन्न प्रकार के ध्येयों को पूरा करना आरम्भ करता है। स्वयं अनुभव करने से पहले, लोगों के मन में विवाह के बारे में बहुत से भ्रम होते हैं, और ये सभी भ्रम बहुत ही खूबसूरत होते हैं। महिलाएँ कल्पना करती हैं कि उनका होने वाला पति सुन्दर राजकुमार होगा, और पुरुष कल्पना करते हैं कि वे दूध जैसी सफेद, गोरी कन्या से विवाह करेंगे। इन कल्पनाओं से पता चलता है कि विवाह को लेकर प्रत्येक व्यक्ति की कुछ निश्चित अपेक्षाएँ होती हैं, उनकी स्वयं की माँगें और मानक होते हैं। यद्यपि इस बुराई से भरे युग में लोगों के पास विवाह के बारे में विकृत संदेशों की भरमार हो जाती है, जो और भी अधिक अतिरिक्त अपेक्षाओं को जन्म देते हैं और लोगों को तमाम तरह के बोझ एवं अजीब-सी सोच से लाद देते हैं। जिसने विवाह किया है, वह जानता है कि कोई इसे किसी भी तरह से क्यों न समझे, उसका दृष्टिकोण इसके प्रति कुछ भी क्यों न हो, विवाह व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं है।

व्यक्ति अपने जीवन में कई लोगों के संपर्क में आता है, किन्तु कोई नहीं जानता है कि उसका जीवनसाथी कौन बनेगा। हालाँकि विवाह के बारे में प्रत्येक की अपनी सोच और अपने व्यक्तिगत उद्देश्य होते हैं, फिर भी कोई पूर्वानुमान नहीं लगा सकता कि अंततः कौन उसका सच्चा जीवनसाथी बनेगा, इस विषय पर उसकी अपनी अवधारणाएँ ज्यादा मायने नहीं रखतीं। तुम जिस व्यक्ति को पसंद करते हो उससे मिलने के बाद, उसे पाने का प्रयास कर सकते हो; किन्तु वह तुममें रुचि रखता है या नहीं, वह तुम्हारा जीवन साथी बनने योग्य है या नहीं, यह तय करना तुम्हारा काम नहीं है। तुम जिसे चाहते हो ज़रूरी नहीं कि वह वही व्यक्ति हो जिसके साथ तुम अपना जीवन साझा कर पाओगे; और इसी बीच कोई ऐसा व्यक्ति जिसकी तुमने कभी अपेक्षा भी नहीं की थी, वह चुपके से तुम्हारे जीवन में प्रवेश कर जाता है और तुम्हारा साथी बन जाता है, तुम्हारा जीवनसाथी तुम्हारे भाग्य का सबसे महत्वपूर्ण अंग बन जाता है, जिसके साथ तुम्हारा भाग्य अभिन्न रूप से बँधा हुआ है। इसलिए, यद्यपि संसार में लाखों विवाह होते हैं, फिर भी हर एक भिन्न है: कितने विवाह असंतोषजनक होते हैं, कितने सुखद होते हैं; कितने परिपूर्ण जोड़े होते हैं, कितने समकक्ष श्रेणी के होते हैं; कितने सुखद और सामंजस्यपूर्ण होते हैं, कितने दुःखदाई और कष्टपूर्ण होते हैं; कितने दूसरों के मन में ईर्ष्या जगाते हैं, कितनों को गलत समझा जाता है और उन पर नाक-भौं सिकोड़ी जाती है; कितने आनन्द से भरे होते हैं, कितने आँसूओं से भरे हैं और मायूसी पैदा करते हैं...। इन अनगिनत तरह के विवाहों में, मनुष्य विवाह के प्रति वफादारी और आजीवन प्रतिबद्धता दर्शाता है, प्रेम, आसक्ति, एवं कभी अलग न होने, या परित्याग और न समझ पाने की भावना को प्रकट करता है। कुछ लोग विवाह में अपने साथी के साथ विश्वासघात करते हैं, यहाँ तक कि घृणा करते हैं। चाहे विवाह से खुशी मिले या पीड़ा, विवाह में हर एक व्यक्ति का ध्येय सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनिर्धारित होता है और यह कभी बदलता नहीं; यह ध्येय ऐसा है जिसे हर एक को पूरा करना होता है। प्रत्येक विवाह के पीछे निहित हर व्यक्ति का भाग्य अपविर्तनीय होता है; इसे बहुत पहले ही सृजनकर्ता द्वारा निर्धारित किया जा चुका होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

विवाह किसी व्यक्ति के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह व्यक्ति के भाग्य का परिणाम है, और किसी के भाग्य में एक महत्वपूर्ण कड़ी है; यह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत इच्छा या प्राथमिकताओं पर आधारित नहीं होता है, और किसी भी बाहरी कारक द्वारा प्रभावित नहीं होता है, बल्कि यह पूर्णतः दो पक्षों के भाग्य, युगल के दोनों सदस्यों के भाग्य के लिए सृजनकर्ता की व्यवस्थाओं और उसके पूर्वनिर्धारणों द्वारा निर्धारित होता है। सतही तौर पर, विवाह का उद्देश्य मानवजाति को कायम रखना है, लेकिन वास्तव में, विवाह केवल एक रस्म है जिससे व्यक्ति अपने ध्येय को पूरा करने की प्रक्रिया में गुज़रता है। विवाह में, लोग मात्र अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करने की भूमिका नहीं निभाते हैं; वे ऐसी अनेक भूमिकाएँ अपनाते हैं जो विवाह को कायम रखने के लिए ज़रूरी होती हैं और उन उद्देश्यों को अपनाते हैं जिनकी पूर्ति की अपेक्षा ये भूमिकाएँ उनसे करती है। चूँकि व्यक्ति का जन्म आसपास की चीज़ों, घटनाओं, और उन परिवर्तनों को प्रभावित करता है जिनसे लोग गुज़रते हैं, इसलिए उसका विवाह भी अनिवार्य रूप से इन लोगों, घटनाओं और चीज़ों को प्रभावित करेगा, यही नहीं, कई तरीकों से उन सब को रूपान्तरित भी करेगा।

जब कोई व्यक्ति स्वावलंबी बन जाता है, तो वह अपनी स्वयं की जीवन यात्रा आरंभ करता है, जो उसे धीरे-धीरे उन लोगों, घटनाओं, और चीज़ों की ओर ले जाती है, जिनका उसके विवाह से संबंध होता है। साथ ही, वह दूसरा व्यक्ति जो उस विवाह में होगा, धीरे-धीरे उन्हीं लोगों, घटनाओं एवं चीज़ों की ओर आ रहा होता है। सृजनकर्ता की संप्रभुता के अधीन, दो असंबंधित लोग जिनके भाग्य जुड़े हैं, धीरे-धीरे एक विवाह में प्रवेश करते हैं और, चमत्कारपूर्ण ढ़ंग से, एक परिवार बन जाते हैं : "एक ही रस्सी पर लटकी हुई दो टिड्डियाँ।" इसलिए जब कोई विवाह करता है, तो उसकी जीवन-यात्रा उसके जीवनसाथी को प्रभावित करेगी, और उसी तरह उसके साथी की जीवन-यात्रा भी जीवन में उसके भाग्य को प्रभावित और स्पर्श करेगी। दूसरे शब्दों में, मनुष्यों के भाग्य परस्पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, और कोई भी दूसरों से पूरी तरह से अलग होकर जीवन में अपना ध्येय पूरा नहीं कर सकता है या अपनी भूमिका नहीं निभा सकता है। व्यक्ति का जन्म संबंधों की एक बड़ी श्रृंखला पर प्रभाव डालता है; बड़े होने की प्रक्रिया में भी संबंधों की एक जटिल श्रृंखला शामिल होती है; और उसी प्रकार, विवाह अनिवार्य रूप से मानवीय संबंधों के एक विशाल और जटिल जाल के बीच विद्यमान होता आता है और इसी में कायम रहता है, विवाह में उस जाल का प्रत्येक सदस्य शामिल होता है और यह हर उस व्यक्ति के भाग्य को प्रभावित करता है जो उसका भाग है। विवाह दोनों सदस्यों के परिवारों का, उन परिस्थितियों का जिनमें वे बड़े हुए थे, उनके रंग-रूप, उनकी आयु, उनके गुणों, उनकी प्रतिभाओं, या अन्य कारकों का परिणाम नहीं है; बल्कि, यह साझा ध्येय और संबंधित भाग्य से उत्पन्न होता है। यह विवाह का मूल है, सृजनकर्ता द्वारा आयोजित और व्यवस्थित मनुष्य के भाग्य का एक परिणाम है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

मेरे बोले वचन लोगों से उनकी वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर अपेक्षा रखते हैं, और मैं उनकी आवश्यकताओं और उनमें निहित चीज़ों के अनुसार कार्य करता हूँ। व्यवहारिक परमेश्वर धरती पर व्यवहारिक कार्य करने के लिए आया है, लोगों की वास्तविक परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार कार्य करने के लिए आया है। वह अतर्कसंगत नहीं है। जब परमेश्वर कार्य करता है, तो वह लोगों को बाध्य नहीं करता। मिसाल के तौर पर, तुम्हारा विवाह करना या न करना, तुम्हारी परिस्थितियों की वास्तविकता पर निर्भर करता है; तुम्हें साफ तौर पर सत्य पहले ही बता दिया गया है, और मैं तुम्हें रोकता नहीं हूँ। कुछ लोगों का परिवार उन्हें परमेश्वर में आस्था रखने से रोकता है जिससे कि वे जब तक शादी न करें, परमेश्वर में आस्था न रख पाएँ। इस तरह, विवाह विपरीत तौर पर उनके लिए मददगार है। दूसरों के लिए, विवाह फायदेमंद नहीं है, बल्कि उसके कारण उन्हें वह भी गँवाना पड़ता है जो पहले उनके पास था। तुम्हारा अपना मामला तुम्हारी वास्तविक परिस्थितियों और तुम्हारे अपने संकल्प से तय होना चाहिए। मैं यहाँ तुम्हारे लिए नए नियम-कानून बनाने के लिए नहीं हूँ जिनके अनुसार मैं तुम लोगों से अपेक्षाएँ करूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

जीवन के सबसे बड़े मामले सिर्फ विवाह, काम-काज, भविष्य की संभावनाएं, जीवन में स्थापित होना और शांति से जीवन बिताना नहीं हैं। न ही यह समाज में अपना स्थान पाने के लिए संघर्ष करना है। ये सबसे महत्वपूर्ण बातें नहीं हैं। तो सबसे महत्वपूर्ण बातें क्या हैं? तुम लोग अब परमेश्वर में विश्वास करते हो और अपने कर्तव्यों का पालन करते हो, इसलिए तुम्हारा जीवन सही दिशा की ओर बढ़ना शुरू हो चुका है। अगली महत्वपूर्ण चीज सत्य की खोज के मार्ग की एक मजबूत नींव रखना, अपने जीवन के लक्ष्य और दिशा को सुनिश्चित करना, और अपने हृदय में सत्य को अपनी नींव बिठाने देना है—इस तरीके से तुम वह व्यक्ति बन जाओगे, जिसे परमेश्वर ने सचमुच चुना है, और जिसे परमेश्वर पूर्वनिर्धारित कर चुका है। तुम लोगों की नींवें अभी स्थिर नहीं हैं। किसी तूफान की तो बात छोड़ो, हवा का एक झोंका ही तुम्हें किसी भी क्षण हिला सकता है। इससे पता चलता है कि तुम लोगों ने अभी तक नींवें ही नहीं बिछाई हैं, और यह सचमुच बहुत खतरनाक है! अपने जीवन के लक्ष्य और उस दिशा को निर्धारित करो जिसमें तुम्हें खोज करनी है, और उस मार्ग का निर्धारण करो जिस पर इस जीवन में तुम्हें चलना है। एक बार अपना लक्ष्य और जीवन में जो सबसे महत्वपूर्ण है उसे निर्धारित कर लेने के बाद आने वाले वर्षों में इस लक्ष्य की खातिर और इस महत्वपूर्ण मामले की खातिर अपने-आपको जीवन में स्थापित कर लो। मेहनत करो, अपने-आपको खपाओ, प्रयास करो, और इनके लिए एक मूल्य चुकाओ। अभी किसी और बात के बारे में न सोचो। अगर तुम दूसरी बातों के बारे में सोचते रहोगे तो जो काम हाथ में है उसे पूरा करने में देर हो जाएगी। तुम्हारे मन में रोजगार ढूँढना, बहुत सारा धन कमाना, धनवान बनना, समाज में मजबूती से अपने पाँव जमाना, और कोई ओहदा प्राप्त करना जैसी बातें होंगी; तुम विवाह करने और भविष्य में नए कौशल और योग्यताएँ अर्जित करने, एक असाधारण व्यक्ति बनने, घर बसाने और परिवार का पालन-पोषण करने, और अपने माता-पिता को एक अच्छा जीवन देने के बारे में भी सोचोगे। क्या यह सब बहुत थका देने वाला नहीं है? तुम्हारा दिल कितना बड़ा है? अपने पूरे जीवनकाल में किसी व्यक्ति के पास कितनी ऊर्जा होती है? एक व्यक्ति के जीवन का सबसे भरा-पूरा और सरल समय—एक व्यक्ति के जीवन का सर्वोत्तम समय—बीस से शुरू होकर ज्यादा-से ज्यादा चालीस वर्ष की उम्र तक होता है। इस अवधि के दौरान तुम लोगों को उन सत्यों को समझ लेना चाहिए, जो परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास के लिए जरूरी हैं, और फिर तुम्हें सत्य वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को, और परमेश्वर के परीक्षणों और शुद्धिकरण को स्वीकार करना चाहिए—ताकि तुम किसी भी परिस्थिति में परमेश्वर को नकार न सको। यह सबसे मूलभूत बात है; इसके अलावा, चाहे तुम्हें कोई भी विवाह या रूमानी प्रेम के लिए प्रलोभन देने या लुभाने की कोशिश करे, चाहे वे तुम्हें कितनी ही प्रसिद्धि या प्रतिष्ठा क्यों न दे दें, या वे तुम्हें कितना ही लाभ क्यों न पहुंचाएँ, तुम अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना नहीं छोड़ोगे, न ही तुम किसी ऐसी चीज का त्याग करोगे जो एक सृजित प्राणी को करनी चाहिए। अगर भविष्य में किसी मोड पर परमेश्वर तुम्हें न चाहे, तब भी तुम सत्य की खोज करने और परमेश्वर का भय रखने और बुराई से दूर रहने वाले रास्ते पर चलने में सक्षम होगे। तुम्हें इस पर मेहनत करनी होगी, अगर तुम ऐसा करते हो तो परमेश्वर के लिए अपने-आपको खपाने के ये वर्ष व्यर्थ नहीं जाएंगे।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

तुम्हें सत्य के लिए कष्ट उठाने होंगे, तुम्हें सत्य के लिए समर्पित होना होगा, तुम्हें सत्य के लिए अपमान सहना होगा, और अधिक सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अधिक कष्ट उठाने होंगे। यही तुम्हें करना चाहिए। एक शांतिपूर्ण पारिवारिक जीवन के लिए तुम्हें सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए, और क्षणिक आनन्द के लिए तुम्हें अपने जीवन की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुम्हें उस सबका अनुसरण करना चाहिए जो खूबसूरत और अच्छा है, और तुम्हें अपने जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तुम एक घिनौना जीवन जीते हो और किसी भी उद्देश्य को पाने की कोशिश नहीं करते हो तो क्या तुम अपने जीवन को बर्बाद नहीं कर रहे हो? ऐसे जीवन से तुम क्या हासिल कर पाओगे? तुम्हें एक सत्य के लिए देह के सभी सुखों को छोड़ देना चाहिए, और थोड़े-से सुख के लिए सारे सत्यों का त्याग नहीं कर देना चाहिए। ऐसे लोगों में कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं होता!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

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