152. ज्ञान और विज्ञान के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) न तो ज्ञान और न ही विज्ञान सत्य है; वे ऐसे उपकरण हैं जिसका उपयोग शैतान और राक्षस मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए करते हैं। ज्ञान और विज्ञान की तलाश का मार्ग विनाश की ओर ले जाता है;

(2) न तो ज्ञान और न ही विज्ञान मानव जाति को बचा सकता है। वे उसे केवल भ्रष्ट कर सकते हैं, जिससे वह परमेश्वर को दूर करे और सच्चाई को नकारे, और वे उस पर विपत्ति का दौर ले आते हैं;

(3) जितना अधिक किसी का ज्ञान होता है, उतना ही अधिक वह अभिमानी और दंभी होता है, और परमेश्वर के प्रति उसका प्रतिरोध उतना ही मजबूत होता है। जितना अधिक किसी का ज्ञान होता है, उतने ही अधिक भ्रांत और बेतुके उसके विचार और दृष्टिकोण होते हैं। ज्ञान व्यक्ति को सत्य से घृणा करवाता है;

(4) न तो ज्ञान और न ही विज्ञान मनुष्य की भ्रष्टता की समस्या को हल कर सकता है; वे केवल उसके विनाश में तेजी ला सकते हैं। केवल सत्य से ही मानव जाति का उद्धार हो सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

मानवजाति द्वारा सामाजिक विज्ञानों के आविष्कार के बाद से मनुष्य का मन विज्ञान और ज्ञान से भर गया है। तब से विज्ञान और ज्ञान मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए हैं, और अब मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश और अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं रही हैं। मनुष्य के हृदय में परमेश्वर की स्थिति सबसे नीचे हो गई है। हृदय में परमेश्वर के बिना मनुष्य की आंतरिक दुनिया अंधकारमय, आशारहित और खोखली है। बाद में मनुष्य के हृदय और मन को भरने के लिए कई समाज-वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों ने सामने आकर सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत, मानव-विकास के सिद्धांत और अन्य कई सिद्धांत व्यक्त किए, जो इस सच्चाई का खंडन करते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की है, और इस तरह, यह विश्वास करने वाले बहुत कम रह गए हैं कि परमेश्वर ने सब-कुछ बनाया है, और विकास के सिद्धांत पर विश्वास करने वालों की संख्या और अधिक बढ़ गई है। अधिकाधिक लोग पुराने विधान के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों और उसके वचनों को मिथक और किंवदंतियाँ समझते हैं। अपने हृदयों में लोग परमेश्वर की गरिमा और महानता के प्रति, और इस सिद्धांत के प्रति भी कि परमेश्वर का अस्तित्व है और वह सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है, उदासीन हो जाते हैं। मानवजाति का अस्तित्व और देशों एवं राष्ट्रों का भाग्य उनके लिए अब और महत्वपूर्ण नहीं रहे, और मनुष्य केवल खाने-पीने और भोग-विलासिता की खोज में चिंतित, एक खोखले संसार में रहता है। ... कुछ लोग स्वयं इस बात की खोज करने का उत्तरदायित्व लेते हैं कि आज परमेश्वर अपना कार्य कहाँ करता है, या यह तलाशने का उत्तरदायित्व कि वह किस प्रकार मनुष्य के गंतव्य पर नियंत्रण और उसकी व्यवस्था करता है। और इस तरह, मनुष्य के बिना जाने ही मानव-सभ्यता मनुष्य की इच्छाओं के अनुसार चलने में और भी अधिक अक्षम हो गई है, और कई ऐसे लोग भी हैं, जो यह महसूस करते हैं कि इस प्रकार के संसार में रहकर वे, उन लोगों के बजाय जो चले गए हैं, कम खुश हैं। यहाँ तक कि उन देशों के लोग भी, जो अत्यधिक सभ्य हुआ करते थे, इस तरह की शिकायतें व्यक्त करते हैं। क्योंकि परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना शासक और समाजशास्त्री मानवजाति की सभ्यता को सुरक्षित रखने के लिए अपना कितना भी दिमाग क्यों न ख़पा लें, कोई फायदा नहीं होगा। मनुष्य के हृदय का खालीपन कोई नहीं भर सकता, क्योंकि कोई मनुष्य का जीवन नहीं बन सकता, और कोई सामाजिक सिद्धांत मनुष्य को उस खालीपन से मुक्ति नहीं दिला सकता, जिससे वह व्यथित है। विज्ञान, ज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, फुरसत, आराम : ये मनुष्य को केवल अस्थायी सांत्वना देते हैं। यहाँ तक कि इन बातों के साथ मनुष्य निश्चित रूप से पाप करेगा और समाज के अन्याय का रोना रोएगा। ये चीज़ें मनुष्य की अन्वेषण की लालसा और इच्छा को दबा नहीं सकतीं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा बनाया गया था और मनुष्यों के बेतुके त्याग और अन्वेषण केवल और अधिक कष्ट की ओर ही ले जा सकते हैं और मनुष्य को एक निरंतर भय की स्थिति में रख सकते हैं, और वह यह नहीं जान सकता कि मानवजाति के भविष्य या आगे आने वाले मार्ग का सामना किस प्रकार किया जाए। यहाँ तक कि मनुष्य विज्ञान और ज्ञान से भी डरने लगेगा, और खालीपन के एहसास से और भी भय खाने लगेगा। इस संसार में, चाहे तुम किसी स्वंतत्र देश में रहते हो या बिना मानवाधिकारों वाले देश में, तुम मानवजाति के भाग्य से बचकर भागने में सर्वथा असमर्थ हो। तुम चाहे शासक हो या शासित, तुम भाग्य, रहस्यों और मानवजाति के गंतव्य की खोज करने की इच्छा से बचकर भागने में सर्वथा अक्षम हो, और खालीपन के व्याकुल करने वाले बोध से बचकर भागने में तो और भी ज्यादा अक्षम हो। इस प्रकार की घटनाएँ, जो समस्त मानवजाति के लिए सामान्य हैं, समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक घटनाएँ कही जाती हैं, फिर भी कोई महान व्यक्ति इस समस्या का समाधान करने के लिए सामने नहीं आ सकता। मनुष्य आखिरकार मनुष्य है, और परमेश्वर का स्थान और जीवन किसी मनुष्य द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। मानवजाति को केवल एक निष्पक्ष समाज की ही आवश्यकता नहीं है, जिसमें हर व्यक्ति को नियमित रूप से अच्छा भोजन मिलता हो और जिसमें सभी समान और स्वतंत्र हों, बल्कि मानवजाति को आवश्यकता है परमेश्वर के उद्धार और अपने लिए जीवन की आपूर्ति की। केवल जब मनुष्य परमेश्वर का उद्धार और जीवन की आपूर्ति प्राप्त करता है, तभी उसकी आवश्यकताओं, अन्वेषण की लालसा और आध्यात्मिक रिक्तता का समाधान हो सकता है। यदि किसी देश या राष्ट्र के लोग परमेश्वर के उद्धार और उसकी देखभाल प्राप्त करने में अक्षम हैं, तो वह देश या राष्ट्र विनाश के मार्ग पर, अंधकार की ओर चला जाएगा, और परमेश्वर द्वारा जड़ से मिटा दिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है' से उद्धृत

क्या ज्ञान ऐसी चीज़ है, जिसे हर कोई सकारात्मक चीज़ मानता है? लोग कम से कम यह तो सोचते ही हैं कि "ज्ञान" शब्द का संकेतार्थ नकारात्मक के बजाय सकारात्मक है। तो हम यहाँ क्यों उल्लेख कर रहे हैं कि शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है? क्या विकास का सिद्धांत ज्ञान का एक पहलू नहीं है? क्या न्यूटन के वैज्ञानिक नियम ज्ञान का भाग नहीं हैं? पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण भी ज्ञान का ही एक भाग है, है न? (हाँ।) तो फिर ज्ञान क्यों उन चीज़ों में सूचीबद्ध है, जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है? तुम लोगों का इस बारे में क्या विचार है? क्या ज्ञान में सत्य का लेश मात्र भी होता है? (नहीं।) तो ज्ञान का सार क्या है? मनुष्य द्वारा प्राप्त किए जाने वाले समस्त ज्ञान का आधार क्या है? क्या यह विकास के सिद्धांत पर आधारित है? क्या मनुष्य द्वारा खोज और संकलन के माध्यम से प्राप्त ज्ञान नास्तिकता पर आधारित नहीं है? क्या ऐसे किसी ज्ञान का परमेश्वर के साथ कोई संबंध है? क्या यह परमेश्वर की उपासना करने के साथ जुड़ा है? क्या यह सत्य के साथ जुड़ा है? (नहीं।) तो शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग कैसे करता है? मैंने अभी-अभी कहा कि इसमें से कोई भी ज्ञान परमेश्वर की उपासना करने या सत्य के साथ नहीं जुड़ा है। कुछ लोग इस बारे में इस तरह सोचते हैं : "हो सकता है, ज्ञान का सत्य से कोई लेना-देना न हो, किंतु फिर भी, यह लोगों को भ्रष्ट नहीं करता।" तुम लोगों का इस बारे में क्या विचार है? क्या तुम्हें ज्ञान के द्वारा यह सिखाया गया है कि व्यक्ति की खुशी उसके अपने दो हाथों द्वारा सृजित होनी चाहिए? क्या ज्ञान ने तुम्हें यह सिखाया कि मनुष्य का भाग्य उसके अपने हाथों में है? (हाँ।) यह कैसी बात है? (यह शैतानी बात है।) बिलकुल सही! यह शैतानी बात है! ज्ञान चर्चा का एक जटिल विषय है। तुम बस यह कह सकते हो कि ज्ञान का क्षेत्र ज्ञान से अधिक कुछ नहीं है। ज्ञान का यह क्षेत्र ऐसा है, जिसे परमेश्वर की उपासना न करने और परमेश्वर द्वारा सब चीज़ों का निर्माण किए जाने की बात न समझने के आधार पर सीखा जाता है। जब लोग इस प्रकार के ज्ञान का अध्ययन करते हैं, तो वे यह नहीं देखते कि सभी चीज़ों पर परमेश्वर का प्रभुत्व है; वे नहीं देखते कि परमेश्वर सभी चीज़ों का प्रभारी है या सभी चीज़ों का प्रबंधन करता है। इसके बजाय, वे जो कुछ भी करते हैं, वह है ज्ञान के क्षेत्र का अंतहीन अनुसंधान और खोज, और वे ज्ञान के आधार पर उत्तर खोजते हैं। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि अगर लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करेंगे और इसके बजाय केवल अनुसंधान करेंगे, तो वे कभी भी सही उत्तर नहीं पाएँगे? वह सब ज्ञान तुम्हें केवल जीविकोपार्जन, एक नौकरी, आमदनी दे सकता है, ताकि तुम भूखे न रहो; किंतु वह तुम्हें कभी भी परमेश्वर की आराधना नहीं करने देगा, और वह कभी भी तुम्हें बुराई से दूर नहीं रखेगा। जितना अधिक तुम ज्ञान का अध्ययन करोगे, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने, परमेश्वर को अपने अध्ययन के अधीन करने, परमेश्वर को प्रलोभित करने और परमेश्वर का विरोध करने की इच्छा करोगे। तो अब हम क्या देखते हैं कि ज्ञान लोगों को क्या सिखा रहा है? यह सब शैतान का फ़लसफ़ा है। क्या शैतान द्वारा भ्रष्ट मनुष्यों के बीच फैलाए गए फ़लसफ़ों और जीवित रहने के नियमों का सत्य से कोई संबंध है? उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, और वास्तव में, वे सत्य के विपरीत हैं। लोग प्रायः कहते हैं, "जीवन गति है" और "मनुष्य लोहा है, चावल इस्पात है, अगर मनुष्य एक बार का भोजन छोड़ता है, तो वह भूख से बेज़ार महसूस करता है"; ये क्या कहावतें हैं? ये भुलावे हैं और इन्हें सुनने से घृणा की भावना पैदा होती है। मनुष्य के तथाकथित ज्ञान में शैतान ने अपने जीवन का फ़लसफ़ा और अपनी सोच काफी कुछ भर दी है। और जब शैतान ऐसा करता है, तो वह मनुष्य को अपनी सोच, फ़लसफ़ा और दृष्टिकोण अपनाने देता है, ताकि मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व को नकार सके, सभी चीज़ों और मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर के प्रभुत्व को नकार सके। तो जब मनुष्य का अध्ययन आगे बढ़ता है और वह अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह परमेश्वर के अस्तित्व को धुँधला होता महसूस करता है, और फिर वह यह भी महसूस कर सकता है कि परमेश्वर का अस्तित्व ही नहीं है। चूँकि शैतान ने अपने दृष्टिकोण, अवधारणाएँ और विचार मनुष्य के मन में भर दिए हैं, तो क्या इस प्रक्रिया में मनुष्य भ्रष्ट नहीं होता? (हाँ।) अब मनुष्य अपना जीवन किस पर आधारित कर लेता है? क्या वह सचमुच इस ज्ञान पर जी रहा है? नहीं; मनुष्य अपने जीवन को शैतान के उन विचारों, दृष्टिकोणों और फ़लसफ़ों पर आधारित कर रहा है, जो इस ज्ञान के भीतर छिपे हैं। यहीं पर शैतान द्वारा मनुष्य की भ्रष्टता का अनिवार्य अंश घटित होता है; यह शैतान का लक्ष्य और मनुष्य को भ्रष्ट करने की विधि दोनों है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

मनुष्य के द्वारा ज्ञान सीखने की प्रक्रिया के दौरान, शैतान किसी भी तरीके का उपयोग कर सकता है, चाहे यह कहानियों की व्याख्या करना हो, ज्ञान का मात्र एक अंश देना हो, या उन्हें अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करने देना हो या अपनी महत्‍वाकांक्षाओं को पूरा करने देना हो। शैतान तुम्हें किस मार्ग पर ले जाना चाहता है? लोग सोचते हैं कि ज्ञान को सीखने में कुछ भी ग़लत नहीं है, कि यह तो पूरी तरह स्वाभाविक है। इसे आकर्षक ढंग से प्रस्‍तुत करना, ऊँचे आदर्शों को बढ़ावा देना और महत्वाकांक्षाओं का होना कर्मों की प्रेरणा को रखना है, और यही जीवन में सही मार्ग होना चाहिए। यदि लोग अपने स्वयं के आदर्शों को साकार कर सकें, या सफलतापूर्वक करियर बना सकें—तो क्या इस तरह से जीवन बिताना और भी अधिक गौरवशाली नहीं है? उस प्रकार से न केवल कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों का सम्मान कर सकता है बल्कि संभवतः इतिहास पर अपनी छाप छोड़ सकता है—क्या यह एक अच्छी बात नहीं है? यह सांसारिक लोगों की दृष्टि में एक अच्छी बात है, और उनके लिए यह उचित और सकारात्मक होनी चाहिए। हालाँकि, क्या शैतान अपनी भयावह मंशाओं के साथ, लोगों को इस प्रकार के मार्ग पर ले चलता है और बस इतना ही होता है? कदापि नहीं। वास्तव में, मनुष्य के आदर्श चाहे कितने ही ऊँचे क्यों न हों, चाहे मनुष्य की इच्छाएँ कितनी ही वास्तविक क्यों न हों या वे कितनी ही उचित क्यों न हों, वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है, और वह सब जिसे मनुष्य खोजता है वह जटिल रूप से दो शब्दों से जुड़ा हुआ है। ये दो शब्द हर व्यक्ति के जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर बिठाने का इरादा करता है। ये दो शब्द कौन से हैं? वे हैं "प्रसिद्धि" और "लाभ"। शैतान बहुत ही धूर्त किस्म का तरीका चुनता है, ऐसा तरीका जो मनुष्य की धारणाओं से बहुत अधिक मिलता जुलता है; यह किसी प्रकार का अतिवादी मार्ग नहीं है, जिसके जरिए वह लोगों से अनजाने में जीवन जीने के उसके रास्‍ते को, जीने के उसके नियमों को स्वीकार करवाता है, और जीवन के लक्ष्यों और जीवन में अपनी दिशा को स्थापित करवाता है, और ऐसा करने से वे अनजाने में ही जीवन में महत्‍वाकांक्षाएं पालने लगते हैं। चाहे जीवन में ये महत्‍वाकांक्षाएं कितनी ही ऊँची प्रतीत क्यों न होती हों, वे "प्रसिद्धि" और "लाभ" से अविभाज्‍य रूप से जुडी होती हैं। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति, वास्तव में सभी लोग, वे जीवन में जिस किसी चीज़ का अनुसरण करते हैं वह केवल इन दो शब्दों से ही जुड़ा होता हैः "प्रसिद्धि" एवं "लाभ"। लोग सोचते हैं कि जब एक बार उनके पास प्रसिद्धि एवं लाभ आ जाए, तो वे ऊँचे रुतबे एवं अपार धन-सम्पत्ति का आनन्द लेने के लिए, और जीवन का आनन्द लेने के लिए इन चीजों का लाभ उठा सकते हैं। वे सोचते हैं कि प्रसिद्धि एवं लाभ एक प्रकार की पूंजी है, जिसका उपयोग करके वे मौजमस्‍ती और देहसुख का आनंद लेने का जीवन हासिल कर सकते हैं। इस प्रसिद्धि और लाभ, जो मनुष्‍य को इतना प्‍यारा है, के लिए लोग स्वेच्छा से, यद्यपि अनजाने में, अपने शरीरों, मनों, वह सब जो उनके पास है, अपने भविष्य एवं अपनी नियतियों को ले जा कर शैतान के हाथों में सौंप देते हैं। लोग वास्तव में इसे एक पल की हिचकिचाहट के बगैर सदैव करते हैं, और इस सब कुछ को पुनः प्राप्त करने की आवश्यकता के प्रति सदैव अनजान होकर ऐसा करते हैं। क्या लोगों के पास तब भी स्वयं पर कोई नियन्त्रण हो सकता है जब एक बार वे इस प्रकार से शैतान की शरण ले लेते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं? कदापि नहीं। उन्हें पूरी तरह से और सर्वथा शैतान के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। साथ ही वे पूरी तरह से और सर्वथा दलदल में धंस गए हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ हैं। एक बार जब कोई प्रसिद्धि एवं लाभ के दलदल में पड़ जाता है, तो वह आगे से उसकी खोज नहीं करता है जो उजला है, जो धार्मिक है या उन चीज़ों को नहीं खोजता है जो खूबसूरत एवं अच्छी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रसिद्धि एवं लाभ की जो मोहक शक्ति लोगों के ऊपर है वह बहुत बड़ी है, वे लोगों के लिए उनके पूरे जीवन भर और यहाँ तक कि पूरे अनंतकाल तक अनवरत अनुसरण करने की चीज़ें बन जाती हैं। क्या यह सत्य नहीं है? कुछ लोग कहेंगे कि ज्ञान को सीखना पुस्तकों को पढ़ने या कुछ चीज़ों को सीखने से अधिक और कुछ नहीं है जिन्हें वे पहले से नहीं जानते हैं, ताकि समय से पीछे न रह जाएँ या संसार के द्वारा पीछे न छोड़ दिए जाएँ। ज्ञान को सिर्फ इसलिए सीखा जाता है ताकि वे अपने स्वयं के भविष्य के लिए या मूलभूत आवश्यकताओं हेतु बुनियादी आवश्यकताएं प्रदान करने के लिए पर्याप्त धन कमा सकें। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो मात्र मूलभूत आवश्यकताओं के लिए, और मात्र भोजन के मुद्दे का समाधान करने के लिए एक दशक के कठिन अध्ययन को सहेगा? नहीं, ऐसा कोई नहीं है। तो कोई व्‍यक्ति इतने वर्षों तक इन कठिनाइयों एवं कष्टों को क्‍यों सहन करता है? प्रसिद्धि और लाभ के लिए। प्रसिद्धि एवं लाभ आगे उसका इंतज़ार कर रहे हैं, उसे पुकार रहे हैं, और वह विश्वास करता है कि केवल उसके स्वयं के परिश्रम, कठिनाइयों और संघर्ष के माध्यम से ही वह उस मार्ग का अनुसरण कर सकता है और इसके द्वारा प्रसिद्धि एवं लाभ प्राप्त कर सकता है। उसे अपने स्वयं के भविष्य के पथ के लिए, अपने भविष्य के आनन्द और एक बेहतर ज़िन्दगी के लिए इन कठिनाइयों को सहना ही होगा। क्या तुम लोग मुझे बता सकते हो कि इस पृथ्वी पर यह ज्ञान क्या है? क्या यह जीवन जीने के नियम नहीं हैं जिन्हें शैतान के द्वारा लोगों के भीतर डाला गया है, जिन्हें उनके ज्ञान सीखने के दौरान शैतान के द्वारा उन्हें सिखाया गया है? क्या यह जीवन के "ऊँचे आदर्श" नहीं हैं जिन्हें शैतान के द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया था? उदाहरण के लिए, महान लोगों के विचारों, प्रसिद्ध लोगों की ईमानदारी या वीरोचित लोगों की बहादुरी के जोश को लें, या नायकों और सामरिक उपन्यासों में तलवारबाज़ों के शौर्य एवं उदारता को लें—क्‍या इन रास्‍तों से शैतान इन आदर्शों को नहीं बैठाता है? (हाँ, ऐसा है।) ये विचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पर अपना प्रभाव डाल रहे हैं, और प्रत्येक पीढ़ी के लोगों को इन विचारों को स्वीकार करने, इन विचारों के लिए जीने और इनका अनवरत अनुसरण के लिए तैयार किया जाता है। यही वह मार्ग है, वह माध्यम है, जिसके जरिए शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

मानवीय ज्ञान अपने साथ क्या लेकर आता है? जब लोग अधिक जानते हैं, तो क्या वे परमेश्वर के प्रति अधिक पवित्र और भय मानने वाले हो जाते हैं, या वे अधिक ढीठ हो जाते हैं? (वे और अधिक ढीठ हो जाते हैं)। बहुत कुछ सीख लेने पर, लोग जटिल, हठधर्मी, ढीठ हो जाते हैं—लेकिन कुछ और भी है जो हो सकता है कि उन्हें महसूस न हुआ हो: जब वे बहुत ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, तो लोग अंदर से अव्यवस्थित हो जाते हैं, और उनके पास कोई सिद्धांत नहीं रह पाते हैं, और वे जितना अधिक ज्ञान प्राप्त करते हैं, उतने ही अस्त-व्यस्त हो जाते हैं। (ऐसे) ज्ञान में, लोग क्यों जीते हैं इसका जवाब, और मानव जीवन के मूल्य और अर्थ के सवालों के जवाब, क्या मिल सकते हैं? क्या यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि लोग कहाँ से आते हैं और कहाँ जाते हैं? क्या यह ज्ञान तुम्हें बता सकता है कि तुम परमेश्वर से आए हो और परमेश्वर द्वारा बनाए गए हो? (नहीं)। तो, वास्तव में, ज्ञान प्राप्त करने में, जब कोई शोध करता है या अपने मन में वह कुछ बिठाता है, तो वो सब क्या होता है? भौतिक चीज़ें, नास्तिक चीज़ें, ऐसी चीज़ें जिन्हें लोग देख सकते हैं और पहचान सकते हैं, जिनमें से कई तो लोगों की कल्पनाओं से उत्पन्न होती हैं और बिल्कुल वास्तविक नहीं होती हैं। ज्ञान लोगों में दर्शन, विचारधाराओं, सिद्धांतों, प्राकृतिक कानूनों, इत्यादि को भी पैदा करता है, फिर भी ऐसी कई बातें होती हैं जिन्हें यह सब स्पष्ट नहीं कर सकता है। उदाहरण के लिए बिजली कैसे बनती है, या मौसम क्यों बदलते हैं। क्या ज्ञान तुम्हें उन जवाबों को दे सकता है? वर्तमान में जलवायु क्यों बदल रही और असामान्य हो रही है? क्या ज्ञान इसे सुलझा सकता है? क्या यह इस समस्या को हल कर सकता है? (नहीं)। यह तुम्हें सभी चीज़ों के स्रोत से संबंधित मुद्दों के बारे में नहीं बता सकता है, इसलिए यह उन समस्याओं को हल नहीं कर सकता है। ऐसे लोग भी हैं जो पूछते हैं, "मरने के बाद कोई फिर से कैसे जी सकता है?" क्या ज्ञान ने तुम्हें इसका उत्तर दिया है? (नहीं)। तो वो क्या है, जो ज्ञान लोगों को बताता है? यह लोगों को कई रीति-रिवाज़ों और नियमों के बारे में बताता है। उदाहरण के लिए, संतानोचित निष्ठा भी एक तरह का ज्ञान है। यह ज्ञान कहाँ से आया? यह पारंपरिक संस्कृति द्वारा सिखाया जाता है। तो समस्त ज्ञान अपने साथ क्या लाता है? ज्ञान का सार क्या है? इस दुनिया में, कई लोग हैं जिन्होंने साहित्यिक सिद्धांत को पढ़ा है, उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त की है, और वे जानकार हैं, या जिन्होंने एक विशेष क्षेत्र में ज्ञान प्राप्त किया है। तो क्या जीवन के पथ पर, ऐसे लोगों के पास सही दिशा और उद्देश्य होते हैं? क्या उनके पास अपने आचरण के लिए एक आधार-रेखा और सिद्धांत हैं? उस पर निर्माण करने के लिए, क्या वे परमेश्वर की उपासना करना जानते हैं? और भी, उस पर निर्माण करने के लिए, क्या वे किसी भी सच्चाई को समझते हैं? (वे नहीं समझते।) तो, ज्ञान क्या है? ज्ञान लोगों को क्या देता है? इस दुनिया में, ज्ञान प्राप्त करने से पहले लोगों के बीच के संबंध सरल होते हैं, या बाद में? (इससे पहले)। यह क्या दिखाता है? ज्ञान लोगों को अधिक जटिल बनाता है, और उनकी सामान्य मानवता की कमी को बढ़ा देता है। वो उनके लिए यही करता है। और इसका परिणाम क्या होता है? लोग जितना अधिक सीखते हैं, उतना ही अधिक वे परमेश्वर से दूर भटक जाते हैं और सच्चाई को नकारते हैं, और वे उतने ही अधिक कट्टर और बेतुके बन जाते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन जीने के लिए लोग ठीक-ठीक किस पर भरोसा करते रहे हैं' से उद्धृत

क्या तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर ज्ञान को क्या मानता है? कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर चाहता है कि मनुष्य वैज्ञानिक रूप से उन्नत हो और अधिक समझे। यह सच है कि परमेश्वर मनुष्य के लिए सर्वोत्तम चाहता है। परमेश्वर यह नहीं चाहता कि मनुष्य कुछ भी न समझे, हर चीज से अनभिज्ञ रहे, लेकिन परमेश्वर इन चीज़ों का उपयोग उसकी सेवा के लिए करता है, और वह उन्हें अनुमोदित नहीं करता है। वह उनका उपयोग सत्य के स्थान पर नहीं करता है, न ही वह उनका उपयोग उन चीज़ों की क्षतिपूर्ति के लिए जिनकी लोगों की मानवीयता में कमी होती है, या उनके स्वभाव को बदलने के लिए, करता है। परमेश्वर के वचन कभी-कभी ज्ञान की ओर नज़रियों की और उसे देखने के तरीकों की बात करते हैं। ये वचन कन्फ्यूशीवाद या सामाजिक विज्ञान जैसे कुछ विशिष्ट उदाहरणों के बारे में थोड़ा-सा बोलते हैं, और परमेश्वर के वचनों से यह स्पष्ट होना चाहिए कि परमेश्वर मानव ज्ञान का तिरस्कार करता है। मानवीय ज्ञान में केवल सरल वाक्य और सिद्धांत नहीं होते हैं। ज्ञान के भीतर कुछ विचारधाराएँ और विचार के साथ-साथ लोगों की बेतुकी धारणाएँ और शैतान का ज़हर मौज़ूद होता है। कुछ ज्ञान तो यहाँ तक कि लोगों को धोखा भी दे सकता है और भ्रष्ट भी कर सकता है, और इस तरह का ज्ञान शैतान का विष और कैंसर-कारी फोड़ा है। जब लोग इसे स्वीकार करते हैं, तो यह उनके दिमाग में प्रवेश कर जाता है और वे इस ज्ञान के द्वारा भ्रष्ट और बंदी बना लिए जाते हैं। इसलिए, लोग जितना अधिक ज्ञान प्राप्त करते हैं और जितना अधिक वे समझते हैं, उनके लिए परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करना उतना ही अधिक कठिन होता है। इसके बजाय, वे परमेश्वर का इनकार करते हैं और विरोध करते हैं, क्योंकि ज्ञान प्रत्यक्ष और भौतिकवादी है, और यह तुझे उन चीज़ों का अध्ययन करना और उन्हें समझना सिखाता है जिन्हें दुनिया में देखा और छुआ जा सकता है। ज्ञान तुझे किसी भी समस्या की जड़ को समझने में सक्षम नहीं बना सकता है या इस बात की समझ नहीं दे सकता है कि यह आध्यात्मिक दुनिया से कैसे संबंधित है। लोग जिस ज्ञान को प्राप्त करते हैं, वह परमेश्वर के वचन के विरोध में है और यह परमेश्वर के वचन के सत्य के सामने पूरी तरह से उड़ जाता है। मान लो कि तुम इतिहास की किताबें, प्रसिद्ध लेखकों की रचनाएँ, महान विभूतियों की आत्मकथाएँ पढ़ते हो, या तुम विज्ञान के एक निश्चित पहलू का अध्ययन करते हो। तुम्हें क्या हासिल होता है? उदाहरण के लिए, जो लोग भौतिक विज्ञान का अध्ययन करते हैं, कुछ भौतिक सिद्धांतों को समझ लेते हैं—न्यूटन का सिद्धांत, या कोई अन्य सिद्धांत—और एक बार जब तुम इन चीज़ों का अध्ययन कर लेते हो, तो वे तुम्हारे दिमाग़ को नियंत्रित करते हैं, वे तुम्हारे विचारों को निर्देशित करते हैं, और फिर, जब तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हो, तो तुम अपने आप से कहोगे, "परमेश्वर के वचन क्यों गुरुत्वाकर्षण के बारे में कुछ नहीं कहते हैं? या अंतरिक्ष के बारे में? क्या चंद्रमा पर वातावरण होता है? पृथ्वी पर कितनी ऑक्सीजन है? यह कैसी बात है कि परमेश्वर इसके बारे में कुछ नहीं कहता है? परमेश्वर को ऐसी बातों का खुलासा करना चाहिए। ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें उजागर करने की आवश्यकता है, यह वो है जो परमेश्वर को मानव जाति को बताना चाहिए।” क्या तुम ऐसी राय नहीं बनाते हो? तुम सत्य को, परमेश्वर के वचनों को, दूसरे दर्जे पर रखते हो, और जब तुम परमेश्वर के वचनों की ओर जाते हो, तो तुमने जिस ज्ञान और सिद्धांत का अध्ययन किया है, उसे पहले स्थान पर रखते हो। कुछ भी हो, इस प्रकार के ज्ञान लोगों को ग़लत भावनाएँ दे सकते हैं और परमेश्वर से उन्हें दूर कर सकते हैं। चाहे तू इसे माने या नहीं, चाहे तू इसे आज स्वीकार कर सके या नहीं, एक दिन तू इस तथ्य को स्वीकार करेगा। ज्ञान लोगों को उनकी बर्बादी में ला सकता है और यह उन्हें नरक में ले जा सकता है। क्या तू इसे अच्छी तरह से समझ पा रहा है? हो सकता है कि कुछ लोग इन बातों को स्वीकार करने के लिए तैयार न हों, क्योंकि तुम सब के बीच वे लोग हैं जो बहुत ज्ञान रखते हैं, जो खुद को बहुत शिक्षित समझते हैं। मैं तुम लोगों पर व्यंग्य नहीं कस रहा या मज़ाक नहीं कर रहा हूँ; यह तथ्य है। और मैं यह माँग नहीं कर रहा हूँ कि तुम लोग इसे तुरंत स्वीकार करो। मैं तो केवल यह चाह रहा हूँ कि तुम लोग धीरे-धीरे इन चीजों को पहचानने लगो। ज्ञान एक दीवार बन सकता है जो तुझे परमेश्वर को जानने और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने से रोकता है। यह परमेश्वर के करीब आना तेरे लिए मुश्किल बना सकता है, यह तुझे परमेश्वर से अलग रख सकता है, और यह परमेश्वर द्वारा किये जाने वाले हर कार्य को समझने और उसका विश्लेषण करने के लिए तुझे अपने दिमाग और अपने ज्ञान का उपयोग करने को मजबूर कर सकता है। तो अभी अगर तुम्हारे पास ज्ञान है तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें उन चीज़ों को पहचानने और विश्लेषित करने का प्रयास करना चाहिए जिन्हें ज्ञान के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, और यह समझ लेना चाहिए कि वे किस तरह से परमेश्वर के साथ तुम्हारे सामान्य संबंध में बाधा डालती हैं और उसे अस्त-व्यस्त करती हैं, और परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास में तुम्हारी सामान्य प्रविष्टि को बाधित करती हैं। यही वो तरीका है जिससे तुम्हें ज्ञान को समझना चाहिए। तुम्हें इस विषय की सही समझ होनी चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या होते हैं स्वभाव में परिवर्तन, और स्वभाव में परिवर्तनों का मार्ग' से उद्धृत

विज्ञान क्या है? स्पष्ट रूप से कहूँ तो, विज्ञान उन चीज़ों से संबंधित विचार और सिद्धांत हैं, जिनके बारे में मनुष्य जिज्ञासु है, जो अज्ञात चीज़ें हैं, और जो उन्हें परमेश्वर द्वारा नहीं बताई गई हैं; विज्ञान उन रहस्यों से संबंधित विचार और सिद्धांत हैं, जिन्हें मनुष्य खोजना चाहता है। विज्ञान का दायरा क्या है? तुम कह सकते हो कि बल्कि यह बृहद है; उस हल चीज़ में शोध और अध्ययन करता है जिसमें उसकी रुचि होती है। विज्ञान में इन चीज़ों के विवरण और नियमों का शोध करना और फिर वे संभावित सिद्धांत सामने लाना शामिल है, जो हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देते हैं : "ये वैज्ञानिक सचमुच ज़बर्दस्त हैं। वे इतना अधिक जानते हैं, इन चीज़ों को समझने के लिए इनमें बहुत ज्ञान है!" उनके मन में वैज्ञानिकों के लिए बहुत सराहना होती है, है न? जो लोग विज्ञान संबंधी शोध करते हैं, वे किस तरह के विचार रखते हैं? क्या वे ब्रहमांड का शोध नहीं करना चाहते, अपनी रुचि के क्षेत्र में रहस्यमयी चीज़ों पर शोध नहीं करना चाहते? इसका अंतिम परिणाम क्या है? कुछ विज्ञानों में लोग अनुमानों के आधार पर अपने निष्कर्ष निकालते हैं, और अन्य विज्ञानों में वे निष्कर्ष निकालने के लिए मानव-अनुभव पर भरोसा करते हैं। विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में लोग ऐतिहासिक और पृष्ठभूमिगत अवलोकनों के आधार पर अपने निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। क्या ऐसा नहीं है? तो विज्ञान लोगों के लिए क्या करता है? विज्ञान सिर्फ इतना करता है कि लोगों को भौतिक जगत में चीज़ों को देखने देता है और मनुष्य की जिज्ञासा शांत करता है, पर यह मनुष्य को उन नियमों को देखने में सक्षम नहीं बनाता, जिनके द्वारा परमेश्वर सब चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है। मनुष्य विज्ञान में उत्तर पाता प्रतीत होता है, किंतु वे उत्तर उलझन में डालने वाले होते हैं और केवल अस्थायी संतुष्टि लाते हैं, ऐसी संतुष्टि, जो मनुष्य के मन को केवल भौतिक संसार तक सीमित रखने का काम करती है। मनुष्यों को महसूस होता है कि उन्हें विज्ञान से उत्तर मिले हैं, इसलिए जो कोई भी मामला उठता है, वे उस मामले को साबित या स्वीकृत करने के लिए आधार के रूप में अपने वैज्ञानिक विचारों का ही इस्तेमाल करते हैं। मनुष्य का मन विज्ञान से आविष्ट हो जाता है और उससे इस हद तक बहक जाता है कि वह परमेश्वर को जानने, परमेश्वर की उपासना करने और यह मानने को तैयार नहीं होता कि सभी चीज़ें परमेश्वर से आती हैं, और उत्तर पाने के लिए मनुष्य को उसकी ओर देखना चाहिए। क्या यह सच नहीं है? लोग जितना अधिक विज्ञान में विश्वास करते हैं, उतने ही अधिक बेतुके हो जाते हैं और यह मानने लगते हैं कि हर चीज़ का एक वैज्ञानिक समाधान होता है, कि शोध किसी भी चीज़ का समाधान कर सकता है। वे परमेश्वर को नहीं खोजते और वे यह विश्वास नहीं करते कि उसका अस्तित्व है, यहाँ तक कि कई सालों तक परमेश्वर का अनुसरण करने वाले कुछ लोग भी सनक में आकर बैक्टीरिया की खोज करने चले जाते हैं या किसी मुद्दे के जवाब के लिए जानकारी खोजने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति मुद्दों को सत्य के परिप्रेक्ष्य से नहीं देखते और अधिकांश मामलों में वे समस्याओं का समाधान करने के लिए वैज्ञानिक विचारों या ज्ञान या वैज्ञानिक समाधानों पर भरोसा करना चाहते हैं; वे परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते, और वे परमेश्वर की खोज नहीं करते। क्या ऐसे लोगों के हृदय में परमेश्वर होता है? (नहीं।) कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो परमेश्वर की खोज भी उसी तरह से करना चाहते हैं, जैसे वे विज्ञान का अध्ययन करते हैं। उदाहरण के लिए, कई धर्म-विशेषज्ञ हैं, जो उस स्थान पर गए हैं, जहाँ महान जल-प्रलय के बाद जहाज़ रुका था, और इस प्रकार उन्होंने जहाज़ के अस्तित्व को प्रमाणित कर दिया है। किंतु जहाज के प्रकटन में वे परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं देखते। वे केवल कहानियों और इतिहास पर विश्वास करते हैं; यह उनके वैज्ञानिक शोध और भौतिक संसार के अध्ययन का परिणाम है। अगर तुम भौतिक चीजों पर शोध करोगे, चाहे वह सूक्ष्म जीवविज्ञान हो, खगोलशास्त्र हो या भूगोल हो, तो तुम कभी ऐसा परिणाम नहीं पाओगे, जो यह निर्धारित करता हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है या यह कि वह सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है। तो विज्ञान मनुष्य के लिए क्या करता है? क्या वह मनुष्य को परमेश्वर से दूर नहीं करता? क्या वह लोगों को परमेश्वर को अध्ययन के अधीन करने के लिए प्रेरित नहीं करता? क्या वह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व के बारे अधिक संशयात्मक नहीं बनाता? (हाँ।) तो शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग कैसे करना चाहता है? क्या शैतान लोगों को धोखा देने और संज्ञाहीन करने के लिए वैज्ञानिक निष्कर्षों का उपयोग नहीं करना चाहता, और उनके हृदयों पर पकड़ बनाने के लिए अस्पष्ट उत्तरों का उपयोग नहीं करता, ताकि वे परमेश्वर के अस्तित्व की खोज या उस पर विश्वास न करें? (हाँ।) इसीलिए मैं कहता हूँ कि विज्ञान उन तरीकों में से एक है, जिनसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

विज्ञान का अनुसंधान करने और रहस्यों की छानबीन करने की इंसानी जिज्ञासा और इच्छा को संतुष्ट करने के लिए, शैतान विज्ञान के नाम का उपयोग करता है। विज्ञान के नाम पर, शैतान, मनुष्य की उन भौतिक आवश्यकताओं और माँगों को संतुष्ट करता है जिनका उपयोग मनुष्य अपने जीवन की गुणवत्ता को निरन्तर बेहतर बनाने के लिए करता रहता है। इस तरह शैतान, इस बहाने से, मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग करता है। क्या यह सिर्फ मनुष्य की सोच है या मनुष्य का दिमाग है जिसे शैतान विज्ञान का इस तरीके से उपयोग करके भ्रष्ट करता है? हमारे पास-पड़ोस के लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों में, जिन्हें हम देख सकते हैं और जिनके सम्पर्क में हम आते हैं, और ऐसा क्या है जिसे शैतान विज्ञान से भ्रष्ट करता है? (प्राकृतिक पर्यावरण।) सही कहा। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों ने इसके कारण भारी नुकसान झेला है, और तुम लोग बहुत अधिक प्रभावित हुए हो। मनुष्य को धोखा देने के लिए विज्ञान की सब प्रकार की विभिन्न खोजों एवं निष्कर्षों का उपयोग करने के अलावा, शैतान विज्ञान का उपयोग एक ऐसे साधन के रूप में भी करता है जिससे जीवित रहने के उस पर्यावरण का मनमाने ढंग से विनाश एवं दोहन करे जिसे परमेश्वर ने मनुष्य को प्रदान किया था। वह इसे इस बहाने से करता है कि यदि मनुष्य वैज्ञानिक अनुसंधान को क्रियान्वित करता है, तो मनुष्य का रहने का वातावरण तथा जीवन की गुणवत्ता में निरन्तर सुधार होगा, और इसके अतिरिक्त वह यह बहाना करता है कि वैज्ञानिक विकास, लोगों की बढ़ती हुई दैनिक भौतिक आवश्यकताओं और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर करने की उनकी आवश्यकता को पूरा करने के लिए है। यह शैतान का विज्ञान के विकास का सैद्धान्तिक आधार है। हालाँकि, विज्ञान ने मानवजाति को क्या दिया है? हम जिस पर्यावरण से जुड़े हैं वह किन चीज़ों से मिलकर बना हुआ है? क्या जिस वायु में मनुष्यजाति साँस लेती है, वह प्रदूषित नहीं हो गयी है? क्या वह जल जिसे हम पीते हैं, अभी भी सचमुच शुद्ध है? (नहीं।) जो भोजन हम खाते हैं, क्या वो प्राकृतिक है? उसका अधिकांश भाग रासायनिक उर्वरक का उपयोग करके उगाया जाता है और आनुवांशिक संशोधन का उपयोग करके इसकी खेती की जाती है, और साथ ही विभिन्न वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग करने के कारण हुए उत्परिवर्तन भी हैं। यहाँ तक कि सब्जियाँ और फल जिन्हें हम खाते हैं, वे भी अब प्राकृतिक नहीं रह गए हैं। प्राकृतिक अण्डे पाना भी अब आसान नहीं है और शैतान के तथाकथित विज्ञान के द्वारा पहले से ही संसाधित कर दिए जाने के कारण अण्डों का वैसा स्वाद भी नहीं रहा जैसा पहले हुआ करता था। पूरे मामले को समझें तो, समूचे वातावरण को नष्ट और प्रदूषित कर दिया गया है; पहाड़ों, झीलों, जंगलों, नदियों, महासागरों, और भूमि के ऊपर और नीचे की हर चीज़ को तथाकथित वैज्ञानिक उपलब्धियों के द्वारा नष्ट कर दिया गया है। संक्षेप में, सम्पूर्ण प्राकृतिक पर्यावरण एवं जीवन जीने के लिए परमेश्वर के द्वारा मनुष्यजाति को प्रदान किया गया सम्पूर्ण पर्यावरण, तथाकथित विज्ञान के द्वारा नष्ट एवं बर्बाद कर दिया गया है। यद्यपि ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने, अपनी इच्छाओं और अपने शरीर दोनों को संतुष्ट करते हुए, जीवन की गुणवत्ता के सन्दर्भ में वह प्राप्त कर लिया है जिसकी उन्होंने सदैव आशा की थी, लेकिन जिस पर्यावरण में मनुष्य रहता है, उसे विज्ञान द्वारा लाई गई विभिन्न "उपलब्धियों" के द्वारा मूल रूप से नष्ट एवं बर्बाद कर दिया गया है। अब हमें स्वच्छ हवा की एक साँस लेने का भी अधिकार नहीं रह गया है। क्या यह मनुष्यजाति का दुःख नहीं है? क्या मनुष्य के लिए अभी भी खुशी की कोई बात रह गयी है जबकि उसे ऐसी जगह में रहना पड़ रहा है? शुरुआत से ही, मनुष्य जिस जगह और जिस पर्यावरण में रहता है वह परमेश्वर के द्वारा मनुष्य के लिए सृजित किया गया था। वह जल जिसे लोग पीते हैं, वह वायु जिसमें लोग साँस लेते हैं, वह भोजन जिसे लोग खाते हैं, पौधे, पेड़, और महासागर—रहने के इस पर्यावरण का हर हिस्सा, परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया था; यह प्राकृतिक है, और परमेश्वर के द्वारा स्थापित प्राकृतिक व्यवस्था के अनुसार संचालित हो रहा है। यदि विज्ञान नहीं होता, तो लोग खुश होते और परमेश्वर के तरीके से हर चीज़ का उसके असल रूप में आनन्द उठा सकते थे और परमेश्वर ने उनके सुख के लिए उन्हें जो कुछ प्रदान किया है उसका आनन्द उठा सकते थे। लेकिन, अब यह सब-कुछ शैतान के द्वारा नष्ट और बर्बाद कर दिया गया है; मनुष्य के रहने की मूलभूत जगह अब अपने मूल स्वरूप में नहीं रह गयी है। परन्तु कोई भी यह समझ नहीं पाता कि यह किस कारण हुआ या यह कैसे हुआ है, अधिक से अधिक लोग शैतान के द्वारा उनमें डाले गए उन विचारों का उपयोग करके विज्ञान को समझते हैं और विज्ञान के नज़दीक आते हैं। क्या यह अत्यंत घृणास्पद एवं दयनीय नहीं है? अब जबकि शैतान ने उस जगह को ले लिया है जिसमें लोग जीते हैं, साथ ही उनके रहने के पर्यावरण को भी ले लिया है और उन्हें इस स्थिति तक भ्रष्ट कर दिया, और मानवजाति के निरन्तर इस तरह से विकसित होते रहने से, क्या परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से इन लोगों को नष्ट करने की कोई आवश्यकता है? यदि लोग निरन्तर इसी रीति से विकसित होते रहे, तो वे कौन-सी दिशा में जायेंगे? (वे पूर्णतया विनष्ट कर दिए जाएँगे।) वे कैसे पूर्णतया विनष्ट कर दिए जाएँगे? प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए लोग अपनी लालच-भरी खोज के अलावा, निरन्तर वैज्ञानिक अन्वेषण करते हैं एवं अनुसंधान की गहराई में उतरते रहते हैं, फिर वे लगातार अपनी भौतिक आवश्यकताओं और इच्छाओं को संतुष्ट करने के लिए कार्य करते रहते हैं; तो फिर मनुष्य के लिए इसके क्या नतीजे होते हैं? सबसे पहले, पर्यावरणीय संतुलन टूट जाता है, जब ये होता है, तो लोगों के शरीर, उनके आंतरिक अंग इस असंतुलित पर्यावरण से दूषित एवं क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, और दुनिया भर में विभिन्न संक्रामक रोग और महामारियाँ फैल जाती हैं। क्या यह सच नहीं है कि अब ऐसी स्थिति है जिस पर मनुष्य का कोई नियन्त्रण नहीं है? अब जबकि तुम लोग इसे समझते हो, यदि मनुष्यजाति परमेश्वर का अनुसरण न करे, बल्कि इस तरह से हमेशा शैतान का अनुसरण करे—अपने आपको लगातार समृद्ध करने के लिए ज्ञान का उपयोग करे, बिना रुके मानवीय जीवन के भविष्य की खोज करने के लिए विज्ञान का उपयोग करे, जीवन बिताते रहने के लिए इस प्रकार की पद्धति का उपयोग करे—तो क्या तुम समझ सकते हो कि मानवजाति के लिए इसका अन्त क्या होगा? (इसका अर्थ होगा विलोपन।) हाँ, इसका अंत विलोपन के रूप में होगा : एक-एक कदम बढ़ाते हुए, मानवजाति विलुप्त होने के कगार पर आ रही है! अब ऐसा लग रहा है मानो विज्ञान एक प्रकार का जादुई पेय है जिसे शैतान ने मनुष्य के लिए तैयार किया है, ताकि जब तुम लोग चीज़ों को समझने की कोशिश करो तो तुम लोग अस्पष्ट धुंध में ऐसा करो; चाहे तुम कितने ही ध्यान से क्यों न देखो, तुम चीज़ों को साफ-साफ नहीं देख सकते, और चाहे तुम लोग कितना ही प्रयास क्यों न करो, तुम उन्हें समझ नहीं सकते। क्योंकि, तुम्हारी भूख को बढ़ाने और कदम-कदम बढ़ाते हुए तुम्हें रसातल तथा मृत्यु की ओर ज़बरदस्ती ले जाने के लिए, शैतान विज्ञान के नाम का उपयोग करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

भौतिक संसार के ज्ञान, सिद्धांतों और विद्वत्ता की कितनी ही समझ भी सत्य की समझ की जगह नहीं ले सकती। सत्य को, परमेश्वर के वचनों को और सभी वस्तुओं पर परमेश्वर के प्रभुत्व के तथ्य और सच्चाई को समझकर ही कोई व्यक्ति सब कुछ समझ सकता है, और उसके मन में कोई पछतावा नहीं रहता। अगर ऐसा कोई व्यक्ति आज मर भी जाता है, तो भी उन्हें यह महसूस होगा कि उन्होंने सृष्टि के कर्ता-धर्ता की उपस्थिति में जीवन बिताया है, और उनकी मृत्यु भी परमेश्वर के हाथों में है। उन्हें लगेगा कि वे परमेश्वर की प्रभुसत्ता में प्राण त्याग रहे हैं, और उनके दिल को तसल्ली रहेगी और उन्हें कोई पछतावा या डर नहीं होगा, क्योंकि उनका जीना और मरना पूरी तरह से परमेश्वर के हाथों में है, इसलिए न किसी बात का डर है न किसी बात का पछतावा। वे लोग जो बहुत ज्यादा जानकारी रखते हैं, जो विज्ञान और रहस्यों का अध्ययन करते हैं, वे सत्य को नहीं समझते; ऐसे लोग सोचते हैं कि ये चीजें समझना और इन पर शोध करना बहुत उपयोगी है, और परिणामस्वरूप, वे इन चीजों को जितना ज्यादा समझते हैं उतने ही ज्यादा नासामझ होते जाते हैं। परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करने वाले लोग सबसे ज्यादा बुद्धिमान हैं। वर्षों तक न्याय और ताड़ना से गुजरने के बाद वे अचेतन रूप से परमेश्वर के मानवता प्रबंधन के उद्देश्य को समझने लगते हैं, और साथ ही परमेश्वर द्वारा मानवता के प्रबंधन और उद्धार का रहस्य भी उनकी समझ में आने लगता है। वे परमेश्वर की इच्छा को समझने लगते हैं और उन्हें उसकी प्रभुसत्ता का बोध हो जाता है। वे अपने जीवन में सहज महसूस करते हैं और उनका जीवन समृद्ध और अर्थपूर्ण हो जाता है। परमेश्वर तुम्हें जीने की अनुमति देता है, और अगर तुम परमेश्वर की खातिर और एक सृजित प्राणी के कर्तव्य निभाने की खातिर जी सकते हो तो तुम एक अर्थपूर्ण जीवन जी रहे हो। अगर तुम एक चलते-फिरते शव का जीवन जीते हो, जिसमें न आत्मा है, न सत्य की स्वीकृति या समझ, सिर्फ देह के लिए जीते हुए, तो तुम एक अर्थपूर्ण जीवन नहीं जी रहे हो, क्योंकि तुम्हारे जीवन का कोई मूल्य नहीं है।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

यदि लोगों को परमेश्वर के स्वभाव की वास्तविक समझ होती है, और वे उसकी पवित्रता और धार्मिकता की हृदयस्पर्शी प्रार्थना दे सकते हैं, तो इसका मतलब है कि वे सच में उसे जानते और सत्य को धारण करते हैं, और केवल तभी वे प्रकाश में जीते हैं। केवल जब दुनिया और जीवन के बारे में एक व्यक्ति का दृष्टिकोण बदलता है, तभी उसमें आधारभूत रूपान्तरण होता है। जब किसी का कोई जीवन लक्ष्य होता है और वह सत्य के अनुसार आचरण करता है, जब वह पूरी तरह से खुद को परमेश्वर के प्रति समर्पण कर देता है और उसके वचनों के अनुसार जीता है, जब वह अपनी आत्मा में गहराई से शान्त महसूस करता है और रोशन हो उठता है, जब उसका दिल अंधकार से मुक्त होता है, और जब वह पूरी तरह से स्वतंत्र और बाधा मुक्त होकर परमेश्वर की उपस्थिति में जी पाता है, केवल तभी वह एक सच्चा मानव जीवन व्यतीत करता है और सत्य धारण करने वाला व्यक्ति बन जाता है। इसके अलावा, जो भी सत्य तुम्हारे पास हैं वह परमेश्वर के वचनों से आए हैं और स्वयं परमेश्वर से आए है। समस्त ब्रह्मांड और सभी चीज़ों का शासक—परमेश्वर जो सबसे ऊँचा है—तुम्हें वास्तविक मानव जीवन जी रहे एक वास्तविक मनुष्य के रूप में अनुमोदित करता है। परमेश्वर के अनुमोदन से अधिक सार्थक और क्या हो सकता है? सत्य धारण करने का अर्थ यही है। शैतान के क्षेत्र में वर्तमान विश्व में, मानव इतिहास के हज़ारों वर्षों में, कौन है जिसने जीवन प्राप्त किया है? कोई भी नहीं। ऐसा क्यों है? वे सभी वे लोग हैं जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया है। जिन सब बातों के अनुसार उन्होंने अपना जीवन व्यतीत किया है और जीवित रहे हैं, वे सब शैतान से आती हैं, और शैतान द्वारा स्वीकार की गई हैं, और यह पूरी तरह परमेश्वर के वचन के विरुद्ध हैं। इसलिए, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, जो उसके अभिशाप को सहते हैं, और उनके पास ऐसा कोई जीवन नहीं जिसके बारे में वे बात कर सकें। हालांकि, वे "स्थायी प्रतिष्ठा चाहते हैं," "अपने नाम को सौ पीढ़ियों तक याद करवाना चाहते हैं," "अनन्त महिमा का आनंद लेना चाहते हैं," और "एक अनन्त नाम प्राप्त करना चाहते हैं," यह सब बकवास है। वास्तव में, उन्हें परमेश्वर ने जल्दी ही अभिशापित कर दिया था, ताकि वे कभी भी पुनर्जन्म न ले सकें। मशहूर लोगों के शब्द, वो जो भी हों, मूल रूप से परमेश्वर के सामने नहीं टिकते हैं, और मरने के बाद नरक के अठारहवें स्तर पर सभी को दंडित किया जाता है। केवल परमेश्वर ही सत्य है। परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी और उनकी हर चीज़ को नियंत्रित करता है और सभी पर उसका प्रभुत्व है। परमेश्वर पर विश्वास न करने, परमेश्वर के समक्ष स्वयं को अर्पित न करने का अर्थ है सत्य प्राप्त न कर पाना। यदि तुम परमेश्वर के वचन के अनुसार जीते हो, तो तुम अपने दिल की गहराई में स्पष्टता, स्थिरता और अतुलनीय मिठास महसूस करोगे; तुम वास्तव में जीवन प्राप्त कर लोगे। दुनिया में वैज्ञानिकों की वैज्ञानिक उपलब्धियां कितनी भी बड़ी हों, जब वे मौत के करीब आते हैं तो उन्हें अपना हाथ खाली महसूस होता है; उन्होंने कुछ नहीं प्राप्त किया होता है। यहां तक कि आइंस्टीन और न्यूटन ने, इतने ज्ञान के साथ, खाली महसूस किया, और यह केवल इसलिए क्योंकि उनके पास सत्य नहीं था। न्यूटन और गैलीलियो, विशेष रूप से, दोनों परमेश्वर में विश्वास करते थे और ईसाई थे; उन्हें कैथोलिकवाद ने सताया था, लेकिन उन्होंने सत्य की खोज नहीं की। वे केवल यही जानते थे कि परमेश्वर की आराधना करना अच्छा है। उन्होंने केवल विज्ञान का अध्ययन किया और उन्हें पता चला कि वास्तव में एक परमेश्वर है, और उन्होंने अंत तक परमेश्वर पर विश्वास किया, सौ प्रतिशत विश्वास के साथ कि परमेश्वर मौजूद है और एक सौ प्रतिशत विश्वास के साथ कि उसने स्वर्ग और पृथ्वी और सब कुछ बनाया है। उन्होंने केवल वैज्ञानिक ज्ञान की खोज की और परमेश्वर को जानने की नहीं। वे सत्य नहीं प्राप्त कर पाए, और वे सच्चा जीवन प्राप्त नहीं कर पाए। जिस मार्ग पर तुम लोग आज चल रहे हो, वह उनका रास्ता नहीं है। तुम परमेश्वर की खोज में हो, और इसकी खोज में हो कि स्वयं को परमेश्वर को कैसे अर्पित करना है, कैसे परमेश्वर की आराधना करनी है, कैसे एक सार्थक जीवन जीना है—वे जिसकी खोज कर रहे थे उससे बिल्कुल अलग। यद्यपि वे ऐसे लोग थे जो परमेश्वर पर विश्वास करते थे, वे सत्य प्राप्त नहीं कर पाए। अब, देहधारी परमेश्वर ने तुम लोगों को सत्य के हर पहलू के बारे में बताया है और तुम लोगों को सत्य और जीवन का मार्ग प्रदान किया है। यह तुम लोगों के लिए मूर्खतापूर्ण होगा यदि तुम सत्य की खोज न करो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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