128. अपने भाई-बहनों के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत

(1) जो परमेश्वर के वचनों को अक्सर पढ़ते हैं, जो सत्य को स्वीकार कर सकते हैं, और अपनी सर्वोच्च क्षमता के अनुसार अपना कर्तव्य निभा सकते हैं, वे सभी भाई-बहन हैं, और उनके साथ इसके अनुसार व्यवहार करना चाहिए।

(2) जब भी भाइयों या बहनों को कठिनाइयाँ हों या उन्हें नकारात्मकता और कमजोरी का अनुभव हो, तो उनके पास जाना चाहिए और उनकी सहायता करनी चाहिए। उनके साथ सत्य पर प्रेमपूर्वक सहभागिता करनी चाहिए, और उनकी समस्याओं को हल करने में यथाशक्ति उनकी मदद करनी चाहिए।

(3) जो भाई-बहन परीक्षणों और कष्टों में हैं, उनसे मिलना चाहिए और उनके साथ और भी अधिक बार सत्य पर सहभागिता करनी चाहिए। एक-दूसरे को सहारा दो, और परमेश्वर के प्रेम का स्वाद पाने में दूसरे की मदद करो।

(4) जिन भाई-बहनों ने अपराध किए हैं और जो अपेक्षाकृत कम मानवता वाले हैं, उनके सामने आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों के बारे में व्यक्ति को उदासीनता से पेश नहीं आना चाहिए, बल्कि उसे उनकी कठिनाइयों को हल करने में मदद करने के लिए यथासंभव सब कुछ करना चाहिए।

(5) अपने भाई-बहनों से मिलना केवल जीवन-प्रवेश के उनके मुद्दों को हल करने के लिए नहीं है; जब वे अपनी घर-गृहस्थी में कठिनाई का सामना कर रहे हों, तब भी उन्हें सहायता दी जानी चाहिए। वास्तव में प्रेम करने वाला दिल होने का अर्थ यही है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

"सभी सत्य प्रेमी लोग भाई-बहन हैं।" केवल जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं बस वे ही परमेश्वर के परिवार के हैं; वे ही सच्चे भाई-बहन हैं। क्या तुम ऐसा सोचते हो कि परमेश्वर के भवन में रहने वाले सभी लोग और जो परमेश्वर में विश्वास कर सकते हैं, वे सभी भाई-बहन हैं? कौन-से लोग भाई-बहन नहीं हैं? वे जो स्वीकार नहीं करते और जो सत्य से घृणा करते हैं, जो दुष्ट हैं, और कुछ लोग जिनकी मानवता बुरी है। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सतही तौर पर भली मानवता वाले प्रतीत होते हैं, लेकिन वे जीवनयापन के लिए दर्शनशास्त्रों से खेलने में महारती होते हैं; ऐसे लोग चालाक तिकड़में लगायेंगे, चापलूसी करेंगे और लोगों को धोखा देंगे। जैसे ही कोई सत्य का उल्लेख करता है, उनकी रुचि खत्म हो जाती है, वे इससे घृणा करते हैं, वे इसे सुनना बर्दाश्त नहीं कर सकते, उन्हें यह उबाऊ लगता है और वे बैठे नहीं रह पाते हैं। इस तरह के लोग अविश्वासी होते हैं और तुम्हें इन्हें वास्तव में भाई-बहन बिलकुल नहीं समझना चाहिए। वे तुम्हें शायद किसी तरह के फायदे की रिश्वत दें, या तुम पर कुछ छोटी-मोटी कृपा कर सकते हैं। लेकिन जिस पल से तुम उनके साथ सत्य पर बातचीत करना शुरू करते हो तो वे साधारण चीजों के बारे में बात करने लगते हैं। वे हमेशा देह से जुड़े विषयों, काम के विषयों, सांसरिक विषयों, अविश्वासियों के प्रचलनों से जुड़े मुद्दों, लगाव और परिवार से जुड़े विषयों के बारे में ही गपशप करते हैं। वे हमेशा इन बाहरी चीजों के बारे में बात करते हैं; वे जो भी कहते हैं उसका सत्य, परमेश्वर में विश्वास, या सत्य को अभ्यास में लाने से कोई संबंध नहीं होता है। ये किस प्रकार के व्यक्ति होते हैं? (ये अविश्वासी और गैर-विश्वासी हैं।) इनमें से कुछ लोग फिर भी अपने कर्तव्य पूरे कर रहे हैं, और कुछ लोग जो अपना कर्तव्य निभाते हैं, वे चुपचाप थोड़ा-बहुत शारीरिक प्रयास करने से अधिक कुछ नहीं करते हैं; वे कभी भी परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ते, न सत्य पर सहभागिता करते हैं। क्या ऐसे लोग भाई और बहनें हैं? वे बिलकुल भी भाई और बहन नहीं हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल ईमानदार बनकर ही लोग वास्तव में खुश हो सकते हैं' से उद्धृत

तुम अपने भाई-बहनों के साथ वैसा व्यवहार नहीं कर सकते जैसाकि अविश्वासी लोग दूसरे लोगों के साथ करते हैं; तुम्हें निष्पक्ष और तर्कसंगत होना चाहिए। तुम इस व्यक्ति के नजदीक और उस व्यक्ति से दूर नहीं हो सकते; न ही तुम कोई गुट या गिरोह बना सकते हो। तुम लोगों पर सिर्फ इसलिए धौंस नहीं जमा सकते क्योंकि तुम उन्हें पसंद नहीं करते, या उन लोगों की खुशामद नहीं कर सकते जो मजबूत स्थिति में हैं। सिद्धांतों का यही मतलब है। तुम्हें दूसरों के साथ अपने व्यवहार में सिद्धांतवादी होना चाहिए; तुम्हें उन सबसे निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए। अगर तुम अच्छे लगने वाले लोगों को लुभाकर अपनी तरफ कर लेते हो और जिनसे बात करना मुश्किल लगता हो, उन्हें छोड़ देते हो, तो क्या तुममें सिद्धांतों की कमी नहीं है? यह दुनिया में जीने का अविश्वासियों का दर्शन है, और लोगों के साथ उनके व्यवहार के अंदाज के पीछे यही सिद्धांत है। यह एक शैतानी स्वभाव भी है और शैतानी तर्क भी। तुम्हें परमेश्वर के परिवार के लोगों के साथ किस सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करना चाहिए? (हर एक भाई-बहन के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए।) तुम उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार कैसे करोगे? हर किसी में छोटे-मोटे दोष और कमियां होती हैं, साथ ही उनमें कुछ विलक्षणताएं भी होती हैं; सभी लोगों में दंभ, कमज़ोरी और ऐसी बातें होती हैं जिनकी उनमें कमी होती है। तुम्हें प्यार से उनकी सहायता करनी चाहिए, सहनशील और धैर्यवान होना चाहिए, तुम्हें बहुत कठोर नहीं बनना चाहिए या हर छोटी सी बात का बखेड़ा नहीं खड़ा करना चाहिए। ऐसे लोगों के साथ, जिनकी उम्र कम है या जिन लोगों ने ज़्यादा समय से परमेश्वर पर विश्वास नहीं किया है, या जिन लोगों ने हाल ही में अपना कर्तव्य निभाना शुरू किया है, उन लोगों के कुछ ख़ास अनुरोध हैं, अगर तुम इन चीज़ों पर कब्ज़ा करके इन्हें उनके विरुद्ध इस्तेमाल करो, तो फिर तुम कठोर हो रहे हो। तुम उन झूठे अगुवाओं और मसीह विरोधियों द्वारा किये गये बुरे कर्मों को अनदेखा कर देते हो, और फिर भी अपने भाई-बहनों में छोटी-मोटी कमियां देखने पर उनकी मदद करने से इनकार कर देते हो, इसके बजाय उन बातों का बखेड़ा खड़ा करने की कोशिश करते हो और पीठ पीछे उनकी आलोचना करते हो, जिसके कारण और भी लोग उनका विरोध करने लगते हैं, उनका बहिष्कार करके निष्कासित कर देते हैं। यह किस तरह का व्यवहार है? यह तुम्हारा सिर्फ़ अपनी निजी प्राथमिकताओं के आधार पर काम करना, और लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने में सक्षम नहीं होना है। यह एक भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दर्शाता है और यह एक अपराध है! जब लोग कोई काम करते हैं, तो परमेश्वर उन्हें देख रहा होता है; तुम जो भी करते हो और जैसा भी सोचते हो, वह सब देखता है! अगर तुम सिद्धांतों को ग्रहण करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले सत्य को समझना होगा। एक बात जब तुम सत्य को समझ जाते हो, तब तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हो। सत्य यह बताता है कि तुम्हें लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, और एक बार जब तुम इस बात को समझ जाते हो, तो तुम यह जान जाओगे कि लोगों से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कैसे व्यवहार करना चाहिए। अगर तुम सत्य नहीं समझते, तो तुम निश्चित ही परमेश्वर की इच्छा नहीं समझ पाओगे। तुम्हें दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए, यह परमेश्वर के वचनों में साफ तौर पर दिखाया या इंगित किया गया है। परमेश्वर मनुष्यों के साथ जिस रवैये से व्यवहार करता है, वही रवैया लोगों को एक-दूसरे के साथ अपने व्यवहार में अपनाना चाहिए। परमेश्वर हर एक व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है? कुछ लोग अपरिपक्व अवस्था वाले या कम उम्र के होते हैं, या उन्होंने सिर्फ़ कुछ समय के लिए परमेश्वर में विश्वास किया होता है। परमेश्वर उन्हें इस ढंग से देख सकता है कि उनका प्रकृति-सार न तो बुरा है और न ही दुर्भावनापूर्ण है; बात बस इतनी है कि वे लोग कुछ हद तक अज्ञानी होते हैं या उनमें क्षमता की कमी होती है, या वे लोग समाज के द्वारा बहुत अधिक संदूषित किए गए हैं। उन लोगों ने सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, इसी वजह से उनके लिए कुछ मूर्खतापूर्ण चीजें करने या कुछ नादान हरकतें करने से खुद को रोक पाना मुश्किल है। हालांकि, परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से, ऐसी बातें महत्वपूर्ण नहीं हैं; वह सिर्फ़ इन लोगों के दिलों को देखता है। अगर वे सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए कृतसंकल्प हैं, तो वे सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, और यही उनका उद्देश्य है, फिर परमेश्वर उन्हें देख रहा है, उनकी प्रतीक्षा कर रहा है, परमेश्वर उन्हें वह समय और अवसर दे रहा है जो उन्हें प्रवेश करने की अनुमति देता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर उन्हें एक ही झटके में मार गिराता है, न ही ऐसा है कि किसी समय उन्होंने जो अपराध किया था, वह उसे पकड़ कर बैठ जाता है और उसे छोड़ता नहीं है; परमेश्वर ने कभी भी लोगों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया है। इसे देखते हुए, अगर लोग एक दूसरे के साथ इस तरह का व्यवहार करते हैं, तो क्या यह उनके भ्रष्ट स्वभाव को नहीं दर्शाता है? यह निश्चित तौर पर उनका भ्रष्ट स्वभाव है। तुम्हें यह देखना होगा कि परमेश्वर अज्ञानी और मूर्ख लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, वह अपरिपक्व अवस्था वाले लोगों के साथ कैसे पेश आता है, वह मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के सामान्य प्रकटीकरण से कैसे पेश आता है, और वह दुर्भावनापूर्ण लोगों के साथ किस तरह का व्यवहार करता है। परमेश्वर अलग-अलग तरह के लोगों के साथ अलग-अलग ढंग से पेश आता है, और उसके पास विभिन्न लोगों की बहुत सी परिस्थितियों को प्रबंधित करने के भी कई तरीके हैं। तुम्हें इन सत्यों को समझना होगा। एक बार जब तुम इन सत्यों को समझ जाओगे, तब तुम उन्हें अनुभव करने का तरीका जान जाओगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने आसपास के लोगों, विषयों और चीज़ों से सीखना ही चाहिए' से उद्धृत

यदि तुम लोगों के लिए एक संत होने की भावना और सिद्धांतों को पाना अभी तक बाकी है, तो यह साबित करता है कि तुम लोगों का जीवन-प्रवेश बहुत उथला है, और यह कि तुम अभी तक सत्य को समझ नहीं पाए हो। अपने आचरण और उस वातावरण में जिसमें तुम प्रतिदिन रहते हो, तुम्हें रस लेना और चिंतन करना होगा, एक-दूसरे से संगति करनी होगी, एक-दूसरे को प्रोत्साहित करना होगा, एक-दूसरे को सचेत रखना होगा, एक-दूसरे की मदद और देखभाल करनी होगी, और एक-दूसरे का समर्थन और संपोषण करना होगा। हमेशा दूसरों के दोषों पर ध्यान केंद्रित न करो, बल्कि स्वयं पर बार-बार चिंतन करो, और दूसरे के सामने उसे स्वीकार करने में सक्रिय रूप से आगे बढ़ो जो तुमने किया हो और जिसमें उनके प्रति हस्तक्षेप या नुकसान निहित हो। अपने आपको खोलना और संगति करना सीखो और अक्सर मिलकर इस पर चर्चा करो कि परमेश्वर के वचनों के आधार पर व्यावहारिक रूप से संगति कैसे की जाए। जब तुम्हारे जीवन का वातावरण अक्सर इसी तरह का हो, तो भाइयों और बहनों के बीच रिश्ते सामान्य हो जाते हैं—न कि अविश्वासी लोगों के रिश्तों की तरह जटिल, उदासीन, ठंडे या क्रूर। तुम धीरे-धीरे अपने आपको इस तरह के रिश्तों से मुक्त कर लोगे। भाई-बहन एक-दूसरे के साथ अधिक आत्मीय और घनिष्ठ हो जाते हैं; तुम एक-दूसरे को सहारा दे पाते हो, और आपस में प्रेम कर पाते हो; तुम्हारे दिलों में सद्भावना होती है, या तुम्हारी ऐसी मानसिकता होती है जिसके कारण तुम एक-दूसरे के प्रति सहिष्णुता और करुणा बरतने में सक्षम होते हो, और तुम एक-दूसरे का समर्थन और देखभाल कर पाते हो, बजाय एक ऐसी स्थिति और रवैये के जिसमें तुम एक-दूसरे के साथ लड़ते हो, एक-दूसरे को कुचलते हो, एक-दूसरे से ईर्ष्या करते हो, गुप्त प्रतिस्पर्धा में लगे रहते हो, एक-दूसरे के लिए लुके-छिपे तिरस्कार या अवमानना को आश्रय देते हो, या जिसमें कोई भी दूसरे की बात नहीं मानता है। ऐसी स्थितियों और परिवेशों में रहना लोगों के बीच भयानक रिश्ते बना देता है। यह न केवल तुम पर सभी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव डालता है और तुम्हें नुकसान पहुँचाता है, बल्कि दूसरों को भी अलग-अलग हद तक नकारात्मक रूप से प्रभावित करता और हानि पहुँचाता है। सामान्य तौर पर, लोगों के लिए इससे उबरना बहुत मुश्किल होता है—जब लोग तुम्हें गलत तरीके से देखते हैं तो तुम्हें गुस्सा आ जाता है, या जब वे कुछ ऐसा कहते हैं जो तुम्हारी इच्छा के अनुरूप नहीं होता, और जब कोई ऐसा कुछ करता है जो तुम्हें किसी चीज़ को एक नज़र देखने से रोकता है, तो तुम्हें बुरा लगता है, और तुम असहज और अप्रसन्न महसूस करते हो, और तुम केवल यह सोचते रहते हो कि अपनी प्रतिष्ठा को कैसे बहाल करो। महिलाएँ और युवा विशेष रूप से इस पर काबू पाने में असमर्थ होते हैं। वे हमेशा इन ओछे स्वभावों, इन नख़रों, इन क्षुद्र भावनाओं में फंसे रहते हैं, और उनके लिए परमेश्वर के सामने आना मुश्किल होता है। इन जटिल, मकड़ी के जालनुमा रिश्तों में फँसकर, उनमें उलझ कर, लोगों के लिए खुद को परमेश्वर के सामने शांत करना और खुद को परमेश्वर के वचनों में शांत करना मुश्किल होता है। इसलिए, तुम्हें पहले यह सीखना चाहिए कि अपने भाइयों और बहनों के साथ कैसे निभाएँ। तुम्हें एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु होना चाहिए, एक-दूसरे के साथ उदार होना चाहिए, यह देखने में सक्षम होना चाहिए कि एक-दूसरे के बारे में कौन-सी बात असाधारण है, एक-दूसरे के गुण क्या हैं—और तुम्हें दूसरों की राय को स्वीकार करना सीखना होगा, और आत्म-चिंतन तथा आत्म-ज्ञान में संलग्न होने के लिए अपने भीतर गहराई में जाना होगा। तुम्हें अपने आपमें लिप्त नहीं होना चाहिए, न ही अपनी महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं, या अपनी तुच्छ शक्तिओं को खुली लगाम देनी चाहिए, जिससे कि दूसरों को तुम्हारी बात सुनने के लिए मजबूर होना पड़े, जैसा तुम कहते हो वैसा ही करना पड़े, तुम्हारे बारे में ऊँचा सोचना पड़े, और तुम्हें बड़ा मानना पड़े, जबकि तुम दूसरों की क्षमताओं से अनजान रहकर उनकी कमियों को बेहिसाब बढ़ा-चढ़ाकर और बड़ा बनाकर देखो, हर मोड़ पर उनकी कमियों को सार्वजनिक बनाओ, दूसरों को अपमानित और तिरस्कृत करो, या ऐसे शब्दों और अन्य माध्यमों का उपयोग करके दूसरों को चोट पहुँचाओ और नीचा दिखाओ, ताकि उन्हें तुम्हारी बात मानने, तुम्हें सुनने, तुम्हारा भय मानने, और तुमसे छिपने के लिए बाध्य होना पड़े। क्या तुम सब, लोगों के बीच ऐसे रिश्ते को बनते या अस्तित्व में रहते, देखना चाहोगे? क्या तुम यह महसूस करना चाहोगे कि यह कैसा लगता है?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-वास्तविकता में प्रवेश के अभ्यास के लिए सबसे मूलभूत सिद्धांत' से उद्धृत

अगर दो व्यक्ति आपसी सद्भाव के साथ रहना चाहते हैं तो दोनों को एक-दूसरे के सामने अपना दिल खुला रखना होगा; यह उन लोगों के बीच और भी जरूरी है जो एक साथ सामंजस्य में काम करते हैं। कभी-कभी दो लोगों के आपसी व्यवहार के दौरान, उनके व्यक्तित्व टकराते हैं, या उनके पारिवारिक परिवेश, पृष्ठभूमि या उनकी आर्थिक स्थितियां मेल नहीं खातीं। लेकिन अगर वे दो लोग एक-दूसरे के सामने अपने दिल खोल कर रख सकते हैं, और अपने मुद्दों के प्रति बिल्कुल स्पष्ट हो सकें, तथा बिना झूठ और धोखे के अपनी बात रख सकें, तो इस तरह वे सच्चे मित्र बन सकेंगे, जिसका मतलब है अंतरंग मित्र बनना। संभवतः, जब दूसरा व्यक्ति किसी परेशानी में होगा तो वह किसी और की नहीं, तुम्हारी तलाश करेगा। तुम अगर उसे फटकार देते हो तो भी उसे पता होगा कि तुम सच्चाई से बोलते हो, क्योंकि वो जानता है कि तुम एक सच्चे हृदय वाले व्यक्ति हो। क्या तुम ऐसा व्यक्ति बन सकते हो? क्या तुम ऐसे हो? अगर नहीं, तो तुम ईमानदार नहीं हो। जब तुम दूसरों के साथ बातचीत करते हो तब सबसे पहले तुम्हें अपना दिल और अपनी सच्चाई उन्हें दिखानी होगी। यदि बातचीत या संपर्क करने में और दूसरों के साथ कार्य करने में, किसी के शब्द लापरवाह, आडंबरपूर्ण, मजाकिया, चापलूसी करने वाले, गैर-जिम्मेदाराना, और मनगढंत हैं, या उसकी बातें केवल सामने वाले से अपना काम निकालने के लिए हैं, तो उसके शब्द विश्वसनीय नहीं हैं, और वह थोड़ा भी ईमानदार नहीं है। दूसरे किसी भी व्यक्ति के साथ उनके पेश आने का यही तरीका है, चाहे वो व्यक्ति जो भी हो। क्या ऐसे व्यक्ति का दिल सच्चा है? यह व्यक्ति ईमानदार नहीं है। मान लो किसी व्यक्ति में कमियां हैं, और वह सच्चाई और ईमानदारी से तुमसे कहता है : "सही में बताओ मैं क्यों इतना नकारात्मक हूँ। मैं बिल्कुल समझ नहीं पाता।" और मान लो तुम उसकी समस्या को वास्तव में जानते हो, लेकिन उसे बताते नहीं हो, बल्कि उससे कहते हो : "कोई बात नहीं। मैं भी अक्सर नकारात्मक हो जाता हूँ।" ये शब्द सुनने वाले के लिए बहुत बड़ी सांत्वना हैं, लेकिन क्या तुम्हारा रवैया सच्चा है? नहीं, यह सच्चा नहीं है। तुम उस व्यक्ति के साथ अन्यमनस्क भाव से बात कर रहे हो, ताकि वह और अच्छा महसूस करे और उसे सांत्वना मिले, तुमने उसके साथ ईमानदारी से बात नहीं की। तुम सच्चाई से उसकी सहायता नहीं कर रहे जिससे कि वह अपनी नकारात्मकता को छोड़ सके। तुमने उस व्यक्ति को सांत्वना देने के प्रयास में और यह सुनिश्चित करने के लिए कि उसके साथ तुम्हारा कोई मन-मुटाव न हो या संबंधों में कोई खटास पैदा न हो, तुमने उसके लिए न्यूनतम किया है। यह कोई ईमानदार व्यक्ति होना नहीं होता। अतः, इस तरह की परिस्थिति का सामना होने पर एक ईमानदार व्यक्ति को क्या करना चाहिए? उसे बताओ कि तुमने क्या देखा और क्या पहचाना है : "मैं तुम्हें बताऊंगा कि मैंने क्या देखा और अनुभव किया है। यह तुम फैसला करो कि मैं जो कह रहा वह सही है या गलत। अगर गलत है, तो तुम्हें इसे स्वीकार करने की जरूरत नहीं है। अगर सही है तो मैं आशा करता हूँ कि तुम इसे स्वीकार करोगे। अगर मेरी बातों को सुनना तुम्हारे लिए कठिन है और तुम उससे आहत होते हो, तो मुझे उम्मीद है तुम परमेश्वर से स्वीकार कर पाओगे। मेरा इरादा और उद्देश्य तुम्हारी सहायता करना है। मुझे तुम्हारी समस्या स्पष्ट दिखती है : तुम्हारी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा आहत हुई है। तुम्हारे अहम को कोई बढ़ावा नहीं देता, और तुम सोचते हो कि सभी लोग तुम्हें तुच्छ समझते हैं, तुम पर प्रहार किया जा रहा, कि तुम्हारे साथ इतना गलत कभी नहीं हुआ। तुम इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते और नकारात्मक हो जाते हो। तुम्हें क्या लगता—क्या वास्तव में यही बात है?" यह सुन कर वह महसूस करता है कि वास्तव में मामला यही है। यही बात वास्तव में तुम्हारे दिल में है, लेकिन तुम अगर ईमानदार नहीं हो, तो यह बात कहोगे नहीं। तुम कहोगे, "मैं भी अक्सर नकारात्मक हो जाता हूँ," और जब दूसरा व्यक्ति यह सुनता है कि सभी लोग नकारात्मक हो जाते हैं, उसे लगता है कि यह सामान्य बात है, और अंततः, वह अपनी नकारात्मकता नहीं छोड़ता है। यदि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो और सच्चे भाव और हृदय से उसकी सहायता करते हो, तो तुम सत्य को समझने और अपनी नकारात्मकता पीछे छोड़ने में उसकी मदद कर सकते हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है' से उद्धृत

अपना कर्तव्य निभाते समय, तुम्हें अपने भाइयों और बहनों के साथ तालमेल बिठाकर काम करने में, उनके साथ खुले तौर पर सहभागिता करने में, सब कुछ खुलकर प्रकट करने में, खुले तौर पर, सार्वजनिक रूप से और ईमानदारी से संवाद करने में, और स्पष्ट रूप से बातचीत करने में, स्वयं को प्रशिक्षित करना चाहिए। तब हर कोई काम को बाँट लेता है और सहयोग करता है, सब मिल-झुलकर काम करते हैं। अगर कुछ ऐसा हो जो फिर भी समझ में न आता हो, तो सभी को आपस में मिलकर सहभागिता करनी चाहिए। जो समझ सकते हैं, उन्हें बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी समझ पर सहभागिता करनी चाहिए, और जिस किसी को प्रबोधन की रोशनी मिली है, उसे तुरंत इस बारे में दूसरों बताना चाहिए। जब अन्य लोग अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हों, तब यदि तुम उन्हें अधिक सहायता और समर्थन देने में सक्षम हो, तो तुम्हें ऐसा करने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए, और कोई संकोच नहीं करना चाहिए। तुच्छ लड़कियाँ क्या सोचने लगती हैं? "मुझे यह पता तो है, लेकिन मैं तुम्हें नहीं बताऊँगी।" "यदि तुम मुझे नहीं बताओगी, तो मैं भी तुम्हें नहीं बताऊँगी।" तुच्छ लड़कियाँ इस तरह सोचती हैं—वे ओछी होती हैं, और बहुत डरती हैं कि दूसरे उनसे बेहतर हो जाएँगे। सामान्य मानवता वाले किसी व्यक्ति के अंदर ऐसी सोच नहीं होनी चाहिए। यह सामान्य मानवता या सकारात्मक बात नहीं है; यह एक भ्रष्ट स्वभाव है। ये सभी चीज़ें जो स्वार्थी, ओछी, धोखेबाज, अस्पष्ट, गन्दी, और शर्मनाक होती हैं, सकारात्मक चीज़ें नहीं होती हैं; वे सभी नकारात्मक चीज़ें होती हैं। इसलिए तुम लोगों को इन चीज़ों को छोड़ना सीखना चाहिए। तुम्हें इन चीज़ों को तुम्हें नियंत्रित या विवश करने, या अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए; तुम्हें उन्हें तोड़कर उनसे परे जाना होगा और एक ऐसा व्यक्ति बनने का यत्न करना होगा जिसके अंदर सत्य हो, और जो प्रकाश में जीता हो। ईमानदारी, खुलापन, निष्ठा, (रखना और) सहिष्णु, धैर्यवान, और विनम्र होने की क्षमता (रखना); दूसरों की कद्र करना सीखना, दूसरों की मदद करने में खुशी पाना सीखना, अच्छे कर्म करना और एक अच्छा दिल रखना—ये सभी सकारात्मक बातें हैं। जहाँ तक उन नकारात्मक चीज़ों की बात है, एक बार जब तुम्हें पता चले कि तुम्हारे अंदर ऐसे विचार या ख़याल हैं, या तुम ऐसी स्थितियों में हो, तो तुम्हें उन्हें छोड़ देना और त्याग देना सीखना होगा। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो वे चीज़ें तुम्हें नियंत्रित करेंगी, और एक बार जब वे तुम्हें नियंत्रण में ले लेंगी, तो तुम ऐसे काम करने लगोगे—और फिर, तुम हमेशा के लिए एक कठपुतली बनकर रह जाओगे, अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के गुलाम और उसके द्वारा नियंत्रित होकर तुम कभी भी सत्य को हासिल नहीं कर पाओगे। यदि लोग सत्य को प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें पहले यह पहचानना होगा कि उनके अंदर किस तरह के भ्रष्ट स्वभाव हैं, वे उन भ्रष्ट स्वभावों को कैसे व्यक्त करते हैं, उनके विचार क्या हैं, उनके ख़याल क्या हैं, और वे कौन-सी ऐसी स्थितियों में हैं जो सत्य से मेल नहीं खाती हैं। उन्हें इन नकारात्मक, निष्क्रिय चीजों को खुले में लाकर उन्हें पहचानना चाहिए, और फिर उन्हें एक-एक कर कैसे त्याग दें यह सीख कर उन्हें हल करना चाहिए, उन्हें तोड़ना और छोड़ना चाहिए। उन्हें दूसरों के साथ अपने व्यवहार में, कर्तव्यों और अपने जीवन में होने वाली हर एक बात के प्रति अपने दृष्टिकोण में, सत्य का उपयोग करना सीखना चाहिए, और उन्हें सत्य के अनुसार बोलना और कार्य करना सीखना चाहिए। इस तरह, थोड़ा-थोड़ा करके, लोग मानवीय सदृशता के अधिकारी होने लगेंगे; वे अपने कर्तव्यों को निभाने में बेहतर, होते जाएँगे, और हर कोई ज्यादा से ज्यादा मिल-जुलकर काम करेगा और सभी निरंतर एकजुट होते जाएँगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्यों में परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करें' से उद्धृत

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