128. अपने भाई-बहनों के साथ कैसा व्यवहार करें, इसके सिद्धांत

(1) जो परमेश्वर के वचनों को अक्सर पढ़ते हैं, जो सत्य को स्वीकार कर सकते हैं, और अपनी सर्वोच्च क्षमता के अनुसार अपना कर्तव्य निभा सकते हैं, वे सभी भाई-बहन हैं, और उनके साथ इसके अनुसार व्यवहार करना चाहिए;

(2) जब भी भाइयों या बहनों को कठिनाइयाँ हों या उन्हें नकारात्मकता और कमज़ोरी का अनुभव हो, तो उनके पास जाना चाहिए और उनकी सहायता करनी चाहिए। उनके साथ सत्य पर प्रेमपूर्वक सहभागिता करनी चाहिए, और उनकी समस्याओं को हल करने में यथाशक्ति उनकी मदद करनी चाहिए;

(3) जो भाई-बहन परीक्षणों और कष्टों में हैं, उनसे मिलना चाहिए और उनके साथ और भी अधिक बार सत्य पर सहभागिता करनी चाहिए। एक-दूसरे का समर्थन करो, और परमेश्वर के प्रेम का स्वाद पाने में दूसरे की मदद करो;

(4) जिन भाइयों और बहनों ने उल्लंघन किए हैं और जो अपेक्षाकृत कम मानवता वाले हैं, उनके सामने आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों के बारे में उदासीनता से पेश नहीं आना चाहिए, बल्कि उन्हें अपनी कठिनाइयों को हल करने में मदद करने के लिए यथासंभव सब कुछ करना चाहिए;

(5) अपने भाइयों और बहनों से संपर्क करना केवल जीवन-प्रवेश के उनके मुद्दों को हल करने के लिए नहीं है; जब वे अपनी घर-गृहस्थी में कठिनाई का सामना कर रहे हों, तब भी उन्हें सहायता दी जानी चाहिए। वास्तव में प्रेम करने वाला दिल होने का अर्थ यही है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

"सभी सत्य प्रेमी लोग भाई-बहन हैं।" केवल जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं बस वे ही परमेश्वर के परिवार के हैं; वे ही सच्चे भाई-बहन हैं। क्या तुम ऐसा सोचते हो कि परमेश्वर के भवन में रहने वाले सभी लोग और जो परमेश्वर में विश्वास कर सकते हैं, वे सभी भाई-बहन हैं? कौन-से लोग भाई-बहन नहीं हैं? वे जो स्वीकार नहीं करते और जो सत्य से परेशान हैं, जो दुष्ट हैं, और कुछ लोग जो बुरे मनुष्य हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सतही तौर पर भली मानवता वाले प्रतीत होते हैं, लेकिन वे जीवनयापन के लिए दर्शनशास्त्रों से खेलने में महारती होते हैं; ऐसे लोग चालाक तिकड़में लगायेंगे, चापलूसी करेंगे और लोगों को धोखा देंगे। जैसे ही कोई सत्य का उल्लेख करता है, उनकी रुचि ख़त्म हो जाती है, वे इससे परेशान हो जाते हैं, वे इसे सुनना बर्दाश्त नहीं कर सकते, उन्हें यह उबाऊ लगता है और वे बैठे नहीं रह पाते हैं। इस तरह के लोग अविश्वासी होते हैं और तुम्हें इन्हें वास्तव में भाई बहन बिलकुल नहीं समझना चाहिए। वे तुम्हें शायद किसी तरह के फायदे की रिश्वत दें, या तुम पर कुछ छोटी-मोटी कृपा कर दें। लेकिन जिस पल से तुम उनके साथ सत्य पर बातचीत करना शुरू करते हो तो वे साधारण चीज़ों के बारे में बात करने लगते हैं। वे हमेशा देह से जुड़े विषयों, काम के विषयों, सांसरिक विषयों, अविश्वासियों के प्रचलनों से जुड़े मुद्दों, लगाव और परिवार से जुड़े विषयों के बारे में ही गपशप करते हैं। वे हमेशा इन बाहरी चीज़ों के बारे में बात करते हैं; वे जो भी कहते हैं उसका सत्य, परमेश्वर में विश्वास, या सत्य को अभ्यास में लाने से कोई संबंध नहीं होता है। ये किस प्रकार के व्यक्ति होते हैं? (ये अविश्वासी और गैर-विश्वासी हैं।) इनमें से कुछ लोग फिर भी अपने कर्तव्य पूरे कर रहे हैं, और कुछ लोग जो अपना कर्तव्य निभाते हैं, वे चुपचाप थोड़ा-बहुत शारीरिक प्रयास करने से अधिक कुछ नहीं करते हैं; वे कभी भी परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ते, न सत्य पर सहभागिता करते हैं। क्या ऐसे लोग भाई और बहनें हैं? वे बिलकुल भी भाई और बहन नहीं हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई वास्तव में ख़ुश हो सकता है' से उद्धृत

यदि तुम लोगों के लिए एक संत होने की भावना और सिद्धांतों को पाना अभी तक बाकी है, तो यह साबित करता है कि तुम लोगों का जीवन-प्रवेश बहुत उथला है, और यह कि तुम अभी तक सत्य को समझ नहीं पाए हो। तुम्हारे आचरण और उस वातावरण में जिसमें तुम प्रत्येक दिन रहते हो, तुम्हें आनंद उठाना और चिंतन करना होगा, एक-दूसरे से संगति करनी होगी, एक-दूसरे को प्रोत्साहित करना होगा, एक-दूसरे को सचेत रखना होगा, एक-दूसरे की मदद और देखभाल करनी होगी, और एक-दूसरे का समर्थन और संपोषण करना होगा। हमेशा दूसरों के दोषों पर ध्यान केंद्रित न करो, बल्कि स्वयं पर बार-बार चिंतन करो, और दूसरे के सामने उसे स्वीकार करने में सक्रिय रूप से आगे बढ़ो जो तुमने किया हो और जिसमें उस व्यक्ति के प्रति हस्तक्षेप या नुकसान निहित हो। अपने आप को उघाड़ना, और संगति करना, सीखो और अक्सर मिलकर इस पर चर्चा करो कि परमेश्वर के वचनों के आधार पर व्यावहारिक रूप से संगति कैसे की जाए। जब तुम्हारे जीवन का वातावरण अक्सर इसी तरह का हो, तो भाइयों और बहनों के बीच रिश्ते सामान्य हो जाते हैं—न कि अविश्वासी लोगों के रिश्तों की तरह जटिल, उदासीन, ठंडे या क्रूर। क्रमशः तुम अपने आप को इस तरह के रिश्तों से मुक्त कर लोगे। भाई-बहन एक-दूसरे के साथ अधिक क़रीब और घनिष्ठ हो जाते हैं; तुम एक दूसरे को सहारा दे पाते हो, और आपस में प्रेम कर सकते हो; तुम्हारे दिलों में सद्भावना होती है, या तुम्हारी एक ऐसी मानसिकता होती है जिसके साथ तुम एक-दूसरे के प्रति सहिष्णुता और करुणा रखने में सक्षम होते हो, और तुम एक-दूसरे का समर्थन और देखभाल कर पाते हो, बजाय उस स्थिति और रवैये के जिसमें कि तुम एक दूसरे के साथ लड़ते हो, एक दूसरे को कुचलते हो, एक दूसरे से ईर्ष्या करते हो, गुप्त प्रतिस्पर्धा में लगे रहते हो, एक दूसरे के लिए छिपे तिरस्कार या घृणा को आश्रय देते हो, या जिसमें कोई भी अगले की बात नहीं मानता है। ऐसी स्थितियों और परिवेशों में रहना लोगों के बीच भयानक रिश्ते बनाता है। यह न केवल तुम्हारे पर सभी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव डालता है और तुम्हें नुकसान पहुँचाता है, बल्कि दूसरों को भी अलग-अलग हद तक नकारात्मक रूप से प्रभावित करता और हानि पहुँचाता है। सामान्य तौर पर, लोगों के लिए इससे उबरना बहुत मुश्किल होता है—जब लोग तुम्हें ग़लत तरीके से देखते हैं तो तुम्हें गुस्सा आ जाता है, या जब वे कुछ ऐसा कहते हैं जो तुम्हारी की इच्छा के अनुरूप नहीं होता, और जब कोई ऐसा कुछ करता है जो तुम्हें एक नज़र देखने से रोकता है, तो तुम उन्हें नापसंद करते हो, और असहज और दुखी महसूस करते हो, और तुम केवल यह सोच सकते हो कि अपनी प्रतिष्ठा को कैसे बहाल करो। महिलाएँ और युवा विशेष रूप से इस पर काबू पाने में असमर्थ होते हैं। वे हमेशा इन ओछे स्वभावों, इन नखरों, इन क्षुद्र भावनाओं में बंधे रहते हैं, और उनके लिए परमेश्वर के सामने आना मुश्किल होता है। इन जटिल, जालनुमा रिश्तों में फँसकर, उनमें उलझ कर, लोगों के लिए खुद को परमेश्वर के सामने शांत करना और खुद को परमेश्वर के वचनों में शांत करना मुश्किल होता है। इसलिए, तुम्हें पहले यह सीखना चाहिए कि अपने भाइयों और बहनों के साथ कैसे निभाएँ। तुम्हें एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु होना चाहिए, एक-दूसरे के साथ उदार होना चाहिए, यह देखने में सक्षम होना चाहिए कि एक-दूसरे के बारे में कौन-सी बात असाधारण है, एक-दूसरे की ताक़तें क्या हैं—और तुम्हें दूसरों की राय को स्वीकार करना सीखना होगा, और चिंतन तथा आत्म-ज्ञान में संलग्न होने के लिए स्वयं में गहराई से वापस लौटना होगा। तुम्हें अपने आप में लिप्त नहीं होना चाहिए, न ही अपनी महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं, या अपनी तुच्छ शक्तिओं को खुली लगाम देनी चाहिए, जिससे कि दूसरों को तुम्हारी बात सुनने के लिए मजबूर होना पड़े, जैसा तुम कहते हो वैसा ही करना पड़े, तुम्हारे बारे में ऊँचा सोचना पड़े, और तुम्हें बड़ा मानना पड़े, फिर भी तुम दूसरों की ताक़तों से अनजान होकर उनकी कमियों को बेहिसाब बढ़ा-चढ़ाकर और बड़ा बनाकर, हर मोड़ पर उनकी कमियों को सार्वजनिक बनाओ, उन लोगों को अपमानित और तिरस्कृत करो, या ऐसे शब्दों और अन्य माध्यमों का उपयोग कर दूसरों को चोट पहुँचाओ और उन्हें बदतर बनाओ, ताकि उन्हें तुम्हारी बात मानने, तुम्हें सुनने, तुम्हारा भय मानने, और तुमसे छिपने के लिए बाध्य होना पड़े। क्या तुम सब, लोगों के बीच एक ऐसे रिश्ते को बनते या अस्तित्व में रहते, देखना चाहोगे? क्या तुम लोग ये कैसा लगता है, यह महसूस करना चाहोगे?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-वास्तविकता में प्रवेश के अभ्यास के लिए सबसे मौलिक सिद्धांत' से उद्धृत

ये संबंध शरीर के स्तर पर स्थापित नहीं होते, बल्कि परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर स्थापित होते हैं। इनमें शरीर के स्तर पर लगभग कोई अंत:क्रिया नहीं होती, लेकिन आत्मा में संगति, आपसी प्रेम, आपसी सुविधा और एक-दूसरे के लिए प्रावधान की भावना रहती है। यह सब ऐसे हृदय की बुनियाद पर होता है, जो परमेश्वर को संतुष्ट करता हो। ये संबंध मानव जीवन-दर्शन के आधार पर नहीं बनाए रखे जाते, बल्कि परमेश्वर के लिए दायित्व वहन करने के माध्यम से बहुत ही स्वाभाविक रूप से बनते हैं। इसके लिए मानव-निर्मित प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। तुम्हें बस परमेश्वर के वचन के सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है। क्या तुम परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के समक्ष "तर्कहीन" व्यक्ति बनने के लिए तैयार हो? क्या तुम अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को देने और लोगों के बीच अपनी स्थिति की परवाह न करने के लिए तैयार हो? उन सभी लोगों में से, जिनके साथ तुम्हारा संबध है, किनके साथ तुम्हारे सबसे अच्छे संबंध हैं? किनके साथ तुम्हारे सबसे खराब संबंध हैं? क्या लोगों के साथ तुम्हारे संबंध उचित हैं? क्या तुम सभी लोगों से समान व्यवहार करते हो? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध तुम्हारे जीवन-दर्शन पर आधारित हैं, या वे परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर बने हैं? ... लोगों के बीच उचित संबंध परमेश्वर को अपना हृदय सौंपने की नींव पर स्थापित होता है; मनुष्य के प्रयासों से नहीं। अपने दिलों में परमेश्वर को रखे बिना लोगों के अंत:संबंध केवल शरीर के संबंध होते हैं। वे उचित नहीं होते, बल्कि वासना से युक्त होते हैं। वे ऐसे संबंध होते हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, जिन्हें वह नापसंद करता है। यदि तुम कहते हो कि तुम्हारी आत्मा प्रेरित हुई है, लेकिन तुम हमेशा उन लोगों के साथ साहचर्य चाहते हो, जिन्हें तुम पसंद करते हो, जिन्हें तुम उत्कृष्ट समझते हो, और यदि कोई दूसरा खोज कर रहा है लेकिन तुम उसे पसंद नहीं करते, यहाँ तक कि तुम उसके प्रति पूर्वाग्रह रखते हो और उसके साथ मेलजोल नहीं रखते, तो यह इस बात का अधिक प्रमाण है कि तुम भावनाओं के अधीन हो और परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध बिलकुल भी उचित नहीं हैं। तुम परमेश्वर को धोखा देने और अपनी कुरूपता छिपाने का प्रयास कर रहे हो। यहाँ तक कि अगर तुम कुछ समझ साझा कर भी पाते हो, तो भी तुम गलत इरादे रखते हो, तब तुम जो कुछ भी करते हो, वह केवल मानव-मानकों से ही अच्छा होता है। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा—तुम शरीर के अनुसार काम कर रहे हो, परमेश्वर के दायित्व के अनुसार नहीं। यदि तुम परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करने में सक्षम हो और उन सभी लोगों के साथ तुम्हारे उचित संबंध हैं, जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, तो केवल तभी तुम परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त होते हो। इस तरह, तुम दूसरों के साथ चाहे जैसे भी जुड़े हो, यह किसी जीवन-दर्शन के अनुसार नहीं होगा, बल्कि यह परमेश्वर के सामने उस तरह से जीना होगा, जो उसके दायित्व के प्रति विचारशील हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करने में खासतौर से क्या-क्या शामिल है? उदाहरण के लिए, अगर दूसरों के साथ व्यवहार की बात करें, तो इसके पीछे क्या सिद्धांत हैं कि तुम हैसियत वालों के साथ और बिना हैसियत वालों के साथ किस तरह व्यवहार करोगे, और आम भाइयों और बहनों और विभिन्न स्तरों के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं के साथ? तुम अपने भाइयों और बहनों के साथ वैसा व्यवहार नहीं कर सकते जैसाकि अविश्वासी लोग दूसरे लोगों के साथ करते हैं; तुम्हें निष्पक्ष और तर्कसंगत होना चाहिए। तुम इसके नजदीक और उससे दूर नहीं हो सकते; न ही तुम कोई गुट या गिरोह बना सकते हो। तुम लोगों पर सिर्फ इसलिए धौंस नहीं जमा सकते क्योंकि तुम उन्हें पसंद नहीं करते, या उन लोगों की खुशामद नहीं कर सकते जो मजबूत स्थिति में हैं। सिद्धांतों का यही मतलब है। तुम्हें दूसरों के साथ अपने व्यवहार में सिद्धांतवादी होना चाहिए; तुम्हें उन सबसे निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए। अगर तुम अच्छे लगने वाले लोगों को लुभाकर अपनी तरफ कर लेते हो और मुश्किल लगने वाले लोगों को बाहर रखते हो, तो क्या तुममें सिद्धांतों की कमी नहीं है? यह दुनिया में जीने के लिए अविश्वासियों का दर्शन है, और लोगों के साथ उनके व्यवहार के अंदाज के पीछे यही सिद्धांत है। यह एक शैतानी स्वभाव भी है और शैतानी तर्कशास्त्र भी। तुम्हें परमेश्वर के परिवार के लोगों के साथ किस सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करना चाहिए? (हर एक भाई-बहन के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए।) तुम उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार कैसे करोगे? हर किसी में छोटे-मोटे दोष और कमियां होती हैं, साथ ही उनमें कुछ विलक्षणताएं भी होती हैं; सभी लोगों में दंभ, कमज़ोरी और ऐसी बातें होती हैं जिनकी उनमें कमी होती है। तुम्हें प्यार से उनकी सहायता करनी चाहिए, सहनशील और धैर्यवान होना चाहिए, तुम्हें बहुत कठोर नहीं बनना चाहिए या हर छोटी सी बात का बखेड़ा नहीं खड़ा करना चाहिए। ऐसे लोगों के साथ, जिनकी उम्र कम है या जिन लोगों ने ज़्यादा समय से परमेश्वर पर विश्वास नहीं किया है, या जिन लोगों ने हाल ही में अपना कर्तव्य निभाना शुरू किया है या जिन लोगों के कुछ ख़ास अनुरोध हैं, अगर तुम उन्हें चोटी से पकड़ लेते हो और छोड़ते नहीं हो, तो इसे ही कठोर होना कहा जाता है। तुम उन झूठे अगुवाओं और मसीह विरोधियों द्वारा किये गये बुरे कर्मों को अनदेखा कर देते हो, और फिर भी अपने भाई-बहनों में छोटी-मोटी कमियां देखने पर उनकी मदद करने से इनकार कर देते हो, इसके बजाय उन बातों का बखेड़ा खड़ा करने की कोशिश करते हो और पीठ पीछे उनकी आलोचना करते हो, जिसके कारण और भी लोग उनका विरोध करने लगते हैं, उनका बहिष्कार करके निष्कासित कर देते हैं। यह किस तरह का व्यवहार है? यह सिर्फ़ अपनी निजी प्राथमिकताओं के आधार पर काम करना, और लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने में सक्षम नहीं होना है; यह एक भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दर्शाता है! यह एक उल्लंघन है! जब लोग कोई काम करते हैं, तो परमेश्वर उन्हें देख रहा होता है; तुम जो भी करते हो और जैसा भी सोचते हो, वह सब देखता है! अगर तुम सिद्धांतों को ग्रहण करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले सत्य को समझना होगा। एक बात जब तुम सत्य को समझ जाते हो, तब तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हो; अगर तुम सत्य को नहीं समझते हो, तो तुम निश्चित ही परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ पाओगे। सत्य यह बताता है कि तुम्हें लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, और एक बार जब तुम इस बात को समझ जाते हो, तो तुम यह जान जाओगे कि लोगों से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कैसे व्यवहार करना चाहिए। तुम्हें दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए, यह परमेश्वर के वचनों में साफ़ तौर पर दिखाया और बताया गया है। परमेश्वर मनुष्यों के साथ जिस रवैये से व्यवहार करता है, वही रवैया लोगों को एक-दूसरे के साथ अपने व्यवहार में अपनाना चाहिए। परमेश्वर हर एक व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है? कुछ लोग अपरिपक्व अवस्था वाले या कम उम्र के होते हैं, या उन्होंने सिर्फ़ कुछ समय के लिए परमेश्वर में विश्वास किया होता है। कुछ लोगों की प्रकृति और सार बुरे या दुर्भावनापूर्ण नहीं होते हैं, बात बस इतनी है कि वे लोग कुछ हद तक अज्ञानी होते हैं या उनमें क्षमता की कमी होती है, या वे लोग समाज के द्वारा बहुत अधिक संदूषित किए गए हैं। उन लोगों ने सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, इसी वजह से उनके लिए कुछ मूर्खतापूर्ण चीज़ें करने या कुछ नादानी वाले काम करने से खुद को रोक पाना मुश्किल है। हालांकि, परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से, ऐसी बातें महत्वपूर्ण नहीं हैं; वह सिर्फ़ लोगों के दिलों को देखता है। अगर वे सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए कृतसंकल्प हैं, तो वे सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, और यही उनका उद्देश्य है, फिर परमेश्वर उन्हें देख रहा है, उनकी प्रतीक्षा कर रहा है, परमेश्वर उन्हें वह समय और अवसर दे रहा है जो उन्हें प्रवेश करने की अनुमति देता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर उन्हें एक झटके से गिरा देता है या सिर बाहर निकालते ही उन्हें मारने लगता है; परमेश्वर ने कभी भी लोगों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया है। इसे देखते हुए, अगर लोग एक दूसरे के साथ इस तरह का व्यवहार करते हैं, तो क्या यह उनके भ्रष्ट स्वभाव को नहीं दर्शाता है? यह निश्चित तौर पर उनका भ्रष्ट स्वभाव है। तुम्हें यह देखना होगा कि परमेश्वर अज्ञानी और मूर्ख लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, वह अपरिपक्व अवस्था वाले लोगों के साथ कैसे पेश आता है, वह मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के सामान्य प्रकटीकरण से कैसे पेश आता है, और वह दुर्भावनापूर्ण लोगों के साथ किस तरह का व्यवहार करता है। परमेश्वर के पास अलग-अलग तरह के लोगों के साथ व्यवहार करने के कई तरीके हैं, और उसके पास विभिन्न लोगों की बहुत सी परिस्थितियों को प्रबंधित करने के भी कई तरीके हैं। तुम्हें इन चीज़ों के सत्य को समझना होगा। एक बार जब तुम इन सत्यों को समझ जाओगे, तब तुम उन्हें अनुभव करने का तरीका जान जाओगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने आसपास के लोगों, विषयों और चीज़ों से सीखना ही चाहिए' से उद्धृत

अगर दो व्यक्ति आपसी सद्भाव के साथ रहना चाहते हैं तो दोनों को एक-दूसरे के सामने अपना दिल खुला रखना होगा; यह उन लोगों के बीच और भी जरूरी है जो एक साथ सामंजस्य में काम करते हैं। कभी-कभी दो लोगों के आपसी व्यवहार के दौरान, उनके व्यक्तित्व टकराते हैं, या उनके पारिवारिक परिवेश, पृष्ठभूमि या उनकी आर्थिक स्थितियां मेल नहीं खातीं। लेकिन अगर वे दो लोग एक-दूसरे के सामने अपने दिल खोल कर रख सकते हैं, और अपने मुद्दों के प्रति बिल्कुल स्पष्ट हो सकें, तथा बिना झूठ और धोखे के अपनी बात रख सकें, तो इस तरह वे सच्चे मित्र बन सकेंगे, जिसका मतलब है अंतरंग मित्र बनना। संभवतः, जब दूसरा व्यक्ति किसी परेशानी में होगा तो वह किसी और की नहीं, तुम्हारी तलाश करेगा। तुम अगर उसे फटकार देते हो तो भी उसे पता होगा कि तुम सच्चे हो, क्योंकि वो जानता है कि तुम एक सच्चे हृदय वाले ईमानदार व्यक्ति हो। क्या तुम ऐसा व्यक्ति बन सकते हो? क्या तुम ऐसे हो? अगर नहीं, तो तुम ईमानदार नहीं हो। जब तुम दूसरों के साथ बातचीत करते हो तब सबसे पहले तुम्हें अपना दिल और अपनी सच्चाई उन्हें दिखानी होगी। यदि बातचीत या संपर्क करने में और दूसरों के साथ कार्य करने में, किसी के शब्द लापरवाह, आडंबरपूर्ण, मजाकिया, चापलूसी करने वाले, गैर-जिम्मेदाराना, और मनगढंत हैं, या उसकी बातें केवल सामने वाले से अपना काम निकालने के लिए हैं, तो उसके शब्द विश्वसनीय नहीं हैं, और वह थोड़ा भी ईमानदार नहीं है। दूसरे किसी भी व्यक्ति के साथ उनके पेश आने का यही तरीका है, चाहे वो व्यक्ति जो भी हो। क्या ऐसे व्यक्ति का दिल सच्चा है? यह व्यक्ति ईमानदार नहीं है। मान लो किसी व्यक्ति में कमियां हैं, और वह सच्चाई और ईमानदारी से तुमसे कहता है : "सही में बताओ मैं क्यों इतना नकारात्मक हूँ। मैं बिल्कुल समझ नहीं पाता।" और मान लो तुम उसकी समस्या को वास्तव में जानते हो, लेकिन उसे बताते नहीं हो, बल्कि उससे कहते हो : "कोई बात नहीं। मैं भी अक्सर नकारात्मक हो जाता हूँ।" ये शब्द सुनने वाले के लिए बहुत बड़ी सांत्वना हैं, लेकिन क्या तुम्हारा रवैया सच्चा है? नहीं, यह सच्चा नहीं है। तुम दूसरे व्यक्ति के साथ लापरवाह हो रहे, तुम उसे सांत्वना दे रहे कि वह अच्छा और मानसिक रूप से सहज महसूस करे, और वह तुमसे अलग नहीं महसूस करे, कोई विवाद न हो, इसके लिए तुमने उसके साथ ईमानदारी नहीं बरती। तुम उसकी सहायता करना नहीं चाहते, और उसकी सहायता के लिए तुम अपनी ईमानदारी का उपयोग नहीं करते हो, जिससे कि वह अपनी नकारात्मकता को छोड़ सके। तुमने वह नहीं किया है जो एक ईमानदार व्यक्ति को करना चाहिए। एक ईमानदार व्यक्ति होना ऐसा नहीं होता। अतः, इस तरह की परिस्थिति का सामना होने पर एक ईमानदार व्यक्ति को क्या करना चाहिए? तुम्हें सच्चे हृदय से बताना चाहिए कि तुमने सचमुच क्या देखा है : "मैं तुम्हें बताऊंगा कि मैंने क्या देखा और अनुभव किया है। यह तुम फैसला करो कि मैं जो कह रहा वह सही है या गलत। अगर गलत है, तो तुम्हें इसे स्वीकार करने की जरूरत नहीं है। अगर सही है तो मैं आशा करता हूँ कि तुम इसे स्वीकार करोगे। अगर मेरी बातों को सुनना तुम्हारे लिए कठिन है और तुम उससे आहत होते हो, तो मुझे उम्मीद है तुम परमेश्वर से स्वीकार कर पाओगे। मेरा इरादा और उद्देश्य तुम्हारी सहायता करना है। मुझे तुम्हारी समस्या स्पष्ट दिखती है : तुम्हारी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा आहत हुई है। तुम्हारे अहम को कोई बढ़ावा नहीं देता, और तुम सोचते हो कि सभी लोग तुम्हें तुच्छ समझते हैं, तुम पर प्रहार किया जा रहा, कि तुम्हारे साथ इतना गलत कभी नहीं हुआ। तुम इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते और नकारात्मक हो जाते हो। तुम्हें क्या लगता—क्या वास्तव में यही बात है?" यह सुन कर वह महसूस करता है कि वास्तव में मामला यही है। यही बात वास्तव में तुम्हारे दिल में है, लेकिन तुम अगर ईमानदार नहीं हो, तो यह बात कहोगे नहीं। तुम कहोगे, "मैं भी अक्सर नकारात्मक हो जाता हूँ," और जब दूसरा व्यक्ति यह सुनता है कि सभी लोग नकारात्मक हो जाते हैं, उसे लगता है कि यह सामान्य बात है, और अंततः, वह अपनी नकारात्मकता नहीं छोड़ता है। यदि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो और सच्चे भाव और हृदय से उसकी सहायता करते हो, तो तुम सच्चाई को समझने में उसकी मदद कर सकते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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