157. पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति समर्पण करने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के सामने अक्सर मौन रहना और उसके वचनों को खाना और पीना, सत्य की तलाश करना और उसके वचनों को सभी मामलों का आधार बनाना आवश्यक है। केवल इसी प्रकार कोई पवित्र आत्मा के प्रबोधन और प्रकाश को प्राप्त कर सकता है;

(2) परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करना आवश्यक है, और समस्त काट-छाँट और निपटने को, सारे अनुशासन और दण्ड को, और पवित्र आत्मा से आने वाले सभी परीक्षणों और शोधन को, स्वीकार करना और उनके प्रति समर्पण करना आवश्यक है;

(3) पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए व्यक्ति की कार्य व्यवस्था को, साथ ही साथ उसकी सहभागिता और धर्मोपदेश को, स्वीकार करना और उसके प्रति समर्पण करना आवश्यक है, क्योंकि ये पवित्र आत्मा के कार्य के अंश होते हैं;

(4) किसी भी स्तर के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं की, तथा अपने भाई-बहनों की, सहभागिता के प्रति समर्पण करना आवश्यक है, जब तक कि वह सहभागिता पवित्र आत्मा के प्रबोधन और प्रकाश से आती हो और सत्य के अनुरूप हो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

"पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण" करने का मतलब है आज परमेश्वर की इच्छा को समझना, परमेश्वर की वर्तमान अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने में सक्षम होना, आज के परमेश्वर का अनुसरण और आज्ञापालन करने में सक्षम होना और परमेश्वर के नवीनतम कथनों के अनुसार प्रवेश करना। केवल यही ऐसा है, जो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करता है और पवित्र आत्मा के प्रवाहमें है। ऐसे लोग न केवल परमेश्वर की सराहना प्राप्त करने और परमेश्वर को देखने में सक्षम हैं बल्कि परमेश्वर के नवीनतम कार्य से परमेश्वर के स्वभाव को भी जान सकते हैं और परमेश्वर के नवीनतम कार्य से मनुष्य की अवधारणाओं और अवज्ञा को, मनुष्य की प्रकृति और सार को जान सकते हैं; इसके अलावा, वो अपनी सेवा के दौरान धीरे-धीरे अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने में सक्षम होते हैं। केवल ऐसे लोग ही हैं, जो परमेश्वर को प्राप्त करने में सक्षम हैं और जो सचमुच में सच्चा मार्ग पा चुके हैं। जिन लोगों को पवित्र आत्मा के कार्य से हटा दिया गया है, वो लोग हैं, जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य का अनुसरण करने में असमर्थ हैं और जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य के विरुद्ध विद्रोह करते हैं। ऐसे लोग खुलेआम परमेश्वर का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि परमेश्वर ने नया कार्य किया है और क्योंकि परमेश्वर की छवि उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं है—जिसके परिणामस्वरूप वो परमेश्वर का खुलेआम विरोध करते हैं और परमेश्वर पर निर्णय देते हैं, जिसके नतीजे में परमेश्वर उनसे घृणा करता है और उन्हें अस्वीकार कर देता है। परमेश्वर के नवीनतम कार्य का ज्ञान रखना कोई आसान बात नहीं है, लेकिन अगर लोगों में परमेश्वर के कार्य का अनुसरण करने और परमेश्वर के कार्य की तलाश करने का ज्ञान है, तो उन्हें परमेश्वर को देखने का मौका मिलेगा, और उन्हें पवित्र आत्मा का नवीनतम मार्गदर्शन प्राप्त करने का मौका मिलेगा। जो जानबूझकर परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रबोधन या परमेश्वर के मार्गदर्शन को प्राप्त नहीं कर सकते; इस प्रकार, लोग परमेश्वर का नवीनतम कार्य प्राप्त कर पाते हैं या नहीं, यह परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर करता है, यह उनके अनुसरण पर निर्भर करता है और यह उनके इरादोंपर निर्भर करता है।

वो सभी धन्य हैं जो पवित्र आत्मा के वर्तमान कथनों का पालन करने में सक्षम हैं। इस बात से कोई फ़र्कनहीं पड़ता कि वो कैसे हुआ करते थे या उनके भीतर पवित्र आत्मा कैसे कार्य कियाकरती थी—जिन्होंने परमेश्वर का नवीनतम कार्य प्राप्त किया है, वो सबसे अधिक धन्य हैं और जो लोग आज नवीनतम कार्य का अनुसरण नहीं कर पाते, हटा दिए जाते हैं। परमेश्वर उन्हें चाहता है जो नई रोशनी स्वीकार करने में सक्षम हैं और वह उन्हें चाहता है जो उसके नवीनतम कार्य को स्वीकार करते और जान लेते हैं। ऐसा क्यों कहा गया है कि तुम लोगों को पवित्र कुँवारी होना चाहिए? एक पवित्र कुँवारी पवित्र आत्मा के कार्य की तलाश करने में और नई चीज़ों को समझने में सक्षम होती है, और इसके अलावा, पुरानी धारणाओं को भुलाकर परमेश्वर के आज के कार्य का अनुसरण करने में सक्षम होती है। इस समूह के लोग, जो आज के नवीनतम कार्य को स्वीकार करते हैं, परमेश्वर द्वारा युगों पहले ही पूर्वनिर्धारित किए जा चुके थे और वो सभी लोगों में सबसे अधिक धन्य हैं। तुम लोग सीधे परमेश्वर की आवाज़ सुनते हो और परमेश्वर की उपस्थिति का दर्शन करते हो और इस तरह समस्त स्वर्ग और पृथ्वी परऔर सारे युगों में, कोई भी तुम लोगों, लोगों के इस समूह से अधिक धन्य नहीं रहा है। यह सब परमेश्वर के कार्य के कारण है, परमेश्वर के पूर्व-निर्धारण और चयन के कारण और परमेश्वर के अनुग्रह के कारण है; अगर परमेश्वर ने बात न की होती और अपने वचन नहीं कहे होते, तो क्या तुम लोगों की परिस्थितियाँ वैसी होतीं जैसी आज हैं? इस प्रकार, सभी महिमा और प्रशंसा परमेश्वर की हो क्योंकि यह सब इसलिए है क्योंकि परमेश्वर तुम्हेंऊपर उठाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

यदि मनुष्य परमेश्वर के वचनों में रहता है, तो पवित्र आत्मा उनके साथ रहेगा और उन पर काम करेगा; अगर मनुष्य परमेश्वर के वचनों में नहीं रहता, तो वह शैतान के बंधन में रहता है। यदि इंसान भ्रष्ट स्वभाव के साथ जीता है, तो उसमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति या पवित्र आत्मा का काम नहीं होता। यदि तुम परमेश्वर के वचनों की सीमाओं में रह रहे हो, यदि तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित परिस्थिति में जी रहे हो, तो तुम परमेश्वर के हो, और उसका काम तुम पर किया जाएगा; अगर तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के दायरे में नहीं जी रहे, बल्कि शैतान के अधीन रह रहे हो, तो निश्चित रूप से तुम शैतान के भ्रष्टाचार के अधीन जी रहे हो। केवल परमेश्वर के वचनों में रहकर अपना हृदय परमेश्वर को समर्पित करके, तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हो; तुम्हें वैसा ही करना चाहिए जैसा परमेश्वर कहता है, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की बुनियाद और अपने जीवन की वास्तविकता बनाना चाहिए; तभी तुम परमेश्वर के होगे। यदि तुम सचमुच परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ईमानदारी से अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर तुम में काम करेगा, और फिर तुम उसके आशीष में रहोगे, उसके मुखमंडल की रोशनी में रहोगे; तुम पवित्र आत्मा द्वारा किए जाने वाले कार्य को समझोगे, और तुम परमेश्वर की उपस्थिति का आनंद महसूस करोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे' से उद्धृत

पवित्र आत्मा का कार्य दिन-ब-दिन बदलता रहता है। वह हर एक कदम के साथ ऊँचा उठता जाता है, आने वाले कल का प्रकाशन आज से कहीं ज़्यादा ऊँचा होता है। कदम-दर-कदम ऊपर चढ़ता जाता है। ऐसे ही कार्य के द्वारा परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण करता है। यदि मनुष्य कदम से कदम न मिला पाए, तो उसे किसी भी समय बाहर किया जा सकता है। यदि उसका हृदय आज्ञाकारी न हो, तो वह बिलकल अंत तक अनुसरण नहीं कर सकेगा। पहले का युग गुज़र चुका है; यह एक नया युग है। और नए युग में, नया कार्य करना चाहिए। विशेषकर अंतिम युग में, जिसमें लोगों को पूर्ण बनाया जाता है, परमेश्वर ज़्यादा तेजी से नया कार्य करेगा, इसलिए, हृदय में आज्ञाकारिता के भाव के बिना, मनुष्य के लिए परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करना कठिन होगा। परमेश्वर किसी भी नियम का पालन नहीं करता, न ही वह अपने कार्य के किसी चरण को अपरिवर्तनीय मानता है। वह जो भी कार्य करता है, वह हमेशा नया और ऊँचा होता है। हर चरण के साथ उसका कार्य और भी व्यावहारिक होता जाता है, और मनुष्य की वास्तविक ज़रूरतों के अनुरूप होता जाता है। इस प्रकार के कार्य का अनुभव करने पर ही मनुष्य अपने स्वभाव का अंतिम रूपांतरण कर पाता है। जीवन के बारे में मनुष्य का ज्ञान उच्च स्तरों तक पहुँचता जाता है, और उसी तरह परमेश्वर का कार्य भी सर्वाधिक उच्च स्तरों तक पहुँचता जाता है। इसी तरह से मनुष्य को पूर्ण बनाया जा सकता है और वह परमेश्वर के उपयोग के योग्य हो सकता है। परमेश्वर एक ओर, मनुष्य की अवधारणाओं का मुकाबला करने तथा उन्हें पलटने के लिए इस तरह से कार्य करता है, और दूसरी ओर, मनुष्य की उच्चतर तथा और अधिक वास्तविक स्थिति में, परमेश्वर में आस्था के उच्चतम आयाम में अगुवाई करने के लिए इस तरह कार्य करता है, ताकि अंत में, परमेश्वर की इच्छा पूरी हो सके। जो लोग अवज्ञाकारी प्रकृति के होते हैं और जानबूझ कर विरोध करते हैं, उन्हें परमेश्वर के द्रुतगामी और मजबूती से आगे बढ़ते हुए कार्य के इस चरण द्वारा बाहर कर दिया जाएगा; जो लोग स्वेच्छा से आज्ञापालन करते हैं और अपने आप को प्रसन्नतापूर्वक दीन बनाते हैं, केवल वही मार्ग के अंत तक प्रगति कर सकते हैं। इस प्रकार के कार्य में, तुम सभी लोगों को सीखना चाहिए कि समर्पण कैसे करें और अपनी धारणाओं को कैसे अलग रखें। तुम लोगों को हर कदम पर सतर्क रहना चाहिए। यदि तुम लोग लापरवाह बनोगे, तो तुम्हें निश्चित रूप से पवित्र आत्मा द्वारा ठुकरा दिया जाएगा, और तुम परमेश्वर के कार्य में रुकावट डालोगे। कार्य के इस चरण से गुज़रने से पहले, मनुष्य के पुराने नियम-कानून इतने ज़्यादा थे कि वह भटक गया, परिणामस्वरूप, वह अहंकारी होकर स्वयं को भूल गया। ये सारी ऐसी बाधाएँ हैं जो मनुष्य को परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने से रोकती हैं; ये मनुष्य के परमेश्वर-ज्ञान की शत्रु हैं। मनुष्य के हृदय में आज्ञाकारिता और सत्य के लिए लालसा न होना खतरनाक है। यदि तुम केवल सरल कार्यों और वचनों के प्रति ही समर्पित होते हो, और गहन कार्यों या वचनों को स्वीकार नहीं कर पाते हो, तो तुम पुराने मार्गों से चिपके रहने वाले व्यक्ति हो और पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल सकते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य अलग-अलग अवधियों में अलग-अलग होता है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य के एक चरण में पूरी आज्ञाकारिता दिखाते हो, मगर अगले ही चरण में तुम्हारी आज्ञाकारिता कम हो जाती है या तुम कोई आज्ञाकारिता दिखा ही नहीं पाते, तो परमेश्वर तुम्हें त्याग देगा। जब परमेश्वर यह कदम उठाता है तब यदि तुम परमेश्वर के साथ समान गति से चलते हो, तो जब वह अगला कदम उठाए तब भी तुम्हें उसके कदम से कदम मिलाना चाहिए; तभी तुम पवित्र आत्मा के प्रति आज्ञाकारी बनोगे। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें अपनी आज्ञाकारिता में अटल रहना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि तुम जब चाहे आज्ञाकारी बन जाओ, जब चाहे उसकी अवज्ञा कर दो। परमेश्वर इस प्रकार की आज्ञाकारिता पसंद नहीं करता। मैं जिस नए कार्य पर संगति कर रहा हूँ, यदि तुम उसके साथ तालमेल नहीं बनाए रख सकते, और पुरानी बातों से ही चिपके रहते हो, तो तुम्हारे जीवन में प्रगति कैसे हो सकती है? परमेश्वर का कार्य, अपने वचनों से तुम्हें पोषण देना है। यदि तुम उसके वचनों का पालन करोगे, उन्हें स्वीकारोगे, तो पवित्र आत्मा निश्चित रूप से तुम में कार्य करेगा। पवित्र आत्मा बिलकुल उसी तरह कार्य करता है जिस तरह से मैं बता रहा हूँ; जैसा मैंने कहा है वैसा ही करो और पवित्र आत्मा शीघ्रता से तुम में कार्य करेगा। मैं तुम लोगों के अवलोकन के लिए नया प्रकाश देता हूँ और तुम लोगों को आज के प्रकाश में लाता हूँ, और जब तुम इस प्रकाश में चलोगे, तो पवित्र आत्मा तुरन्त ही तुममें कार्य करेगा। कुछ लोग हैं जो अड़ियल हो सकते हैं, वे कहेंगे, "तुम जैसा कहते हो मैं वैसा बिलकुल नहीं करूँगा।" ऐसी स्थिति में, मैं कहूँगा कि तुम्हारा खेल खत्म हो चुका है; तुम पूरी तरह से सूख गए हो, और तुममें जीवन नहीं बचा है। इसलिए, अपने स्वभाव के रूपांतरण का अनुभव करने के लिए, आज के प्रकाश के साथ तालमेल बिठाए रखना बहुत आवश्यक है। पवित्र आत्मा न केवल उन खास लोगों में कार्य करता है जो परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त किए जाते हैं, बल्कि कलीसिया में भी कार्य करता है। वह किसी में भी कार्य कर रहा हो सकता है। शायद वह वर्तमान समय में, तुममें कार्य करे, और तुम इस कार्य का अनुभव करोगे। किसी अन्य समय शायद वह किसी और में कार्य करे, और ऐसी स्थिति में तुम्हें शीघ्र अनुसरण करना चाहिए; तुम वर्तमान प्रकाश का अनुसरण जितना करीब से करोगे, तुम्हारा जीवन उतना ही अधिक विकसित होकर उन्नति कर सकता है। कोई व्यक्ति कैसा भी क्यों न हो, यदि पवित्र आत्मा उसमें कार्य करता है, तो तुम्हें अनुसरण करना चाहिए। उसी प्रकार अनुभव करो जैसा उसने किया है, तो तुम्हें उच्चतर चीजें प्राप्त होंगी। ऐसा करने से तुम तेजी से प्रगति करोगे। यह मनुष्य के लिए पूर्णता का ऐसा मार्ग है जिससे जीवन विकसित होता है। पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति तुम्हारी आज्ञाकारिता से पूर्ण बनाए जाने के मार्ग तक पहुँचा जाता है। तुम्हें पता नहीं होता कि तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति के जरिए कार्य करेगा, न ही यह पता होता है कि किस व्यक्ति, घटना, चीज़ के जरिए वह तुम्हें पाने या देखने देगा। यदि तुम सही पथ पर चल पाओ, तो इससे सिद्ध होता है कि परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाए जाने की काफी आशा है। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो इससे ज़ाहिर होता है कि तुम्हारा भविष्य धुँधला और प्रकाशहीन है। एक बार जब तुम सही पथ पर आ जाओगे, तो तुम्हें सभी चीज़ों में प्रकाशन प्राप्त होगा। पवित्र आत्मा दूसरों पर कुछ भी प्रकट करे, यदि तुम उनके ज्ञान के आधार पर अपने दम पर चीज़ों का अनुभव करते हो, तो यह अनुभव तुम्हारे जीवन का हिस्सा बन जाएगा, और इस अनुभव से तुम दूसरों को भी पोषण दे पाओगे। तोते की तरह वचनों को रटकर दूसरों को पोषण देने वाले लोगों के पास अपना कोई अनुभव नहीं होता; तुम्हें अपने वास्तविक अनुभव और ज्ञान के बारे में बोलना शुरू करने से पहले, दूसरों की प्रबुद्धता और रोशनी के माध्यम से, अभ्यास करने का तरीका ढूँढ़ना सीखना होगा। यह तुम्हारे अपने जीवन के लिए अधिक लाभकारी होगा। जो कुछ भी परमेश्वर से आता है उसका पालन करते हुए, तुम्हें इस तरह से अनुभव करना चाहिए। सभी चीज़ों में तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को खोजना चाहिए और हर चीज़ से सीखना चाहिए, ताकि तुम्हारा जीवन विकसित हो सके। ऐसे अभ्यास से सबसे जल्दी प्रगति होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

पवित्र आत्मा का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है, और जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं, उन्हें भी अधिक गहरे जाना और कदम-दर-कदम बदलना चाहिए। उन्हें एक ही चरण पर रुक नहीं जाना चाहिए। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते, केवल वे ही परमेश्वर के मूल कार्य के बीच बने रहेंगे और पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं करेंगे। जो लोग अवज्ञाकारी हैं, केवल वे ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में अक्षम होंगे। यदि मनुष्य का अभ्यास पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ गति बनाए नहीं रखता, तो मनुष्य का अभ्यास निश्चित रूप से आज के कार्य से कटा हुआ है, और वह निश्चित रूप से आज के कार्य के साथ असंगत है। ऐसे पुराने लोग परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में एकदम अक्षम होते हैं, और वे ऐसे लोग तो बिलकुल भी नहीं बन सकते, जो अंततः परमेश्वर की गवाही देंगे। इतना ही नहीं, संपूर्ण प्रबंधन-कार्य ऐसे लोगों के समूह के बीच समाप्त नहीं किया जा सकता। क्योंकि जिन लोगों ने किसी समय यहोवा की व्यवस्था थामी थी, और जिन्होंने कभी सलीब का दुःख सहा था, यदि वे अंत के दिनों के कार्य के चरण को स्वीकार नहीं कर सकते, तो जो कुछ भी उन्होंने किया, वह सब व्यर्थ और निष्फल होगा। पवित्र आत्मा के कार्य की स्पष्टतम अभिव्यक्ति अभी वर्तमान को गले लगाने में है, अतीत से चिपके रहने में नहीं। जो लोग आज के कार्य के साथ बने नहीं रहे हैं, और जो आज के अभ्यास से अलग हो गए हैं, वे वो लोग हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं और उसे स्वीकार नहीं करते। ऐसे लोग परमेश्वर के वर्तमान कार्य की अवहेलना करते हैं। यद्यपि वे अतीत के प्रकाश को पकड़े रहते हैं, किंतु इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते। मनुष्य के अभ्यास में परिवर्तनों के बारे में, अतीत और वर्तमान के बीच के अभ्यास की भिन्नताओं के बारे में, पूर्ववर्ती युग के दौरान किस प्रकार अभ्यास किया जाता था और आज किस प्रकार किया जाता है इस बारे में, यह सब बातचीत क्यों की गई है? मनुष्य के अभ्यास में ऐसे विभाजनों के बारे में हमेशा बात की जाती है, क्योंकि पवित्र आत्मा का कार्य लगातार आगे बढ़ रहा है, इसलिए मनुष्य के अभ्यास का निरंतर बदलना आवश्यक है। यदि मनुष्य एक ही चरण में अटका रहता है, तो यह प्रमाणित करता है कि वह परमेश्वर के नए कार्य और नए प्रकाश के साथ बने रहने में असमर्थ है; इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि परमेश्वर की प्रबंधन-योजना नहीं बदली है। जो पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हैं, वे सदैव सोचते हैं कि वे सही हैं, किंतु वास्तव में उनके भीतर परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही रुक गया है, और पवित्र आत्मा का कार्य उनमें अनुपस्थित है। परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही लोगों के एक अन्य समूह को हस्तांतरित हो गया था, ऐसे लोगों के समूह को, जिन पर वह अपने नए कार्य को पूरा करने का इरादा रखता है। चूँकि धर्म में मौजूद लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने में अक्षम हैं और केवल अतीत के पुराने कार्य को ही पकड़े रहते हैं, इसलिए परमेश्वर ने इन लोगों को छोड़ दिया है, और वह अपना कार्य उन लोगों पर करता है जो इस नए कार्य को स्वीकार करते हैं। ये वे लोग हैं, जो उसके नए कार्य में सहयोग करते हैं, और केवल इसी तरह से उसका प्रबंधन पूरा हो सकता है। परमेश्वर का प्रबंधन सदैव आगे बढ़ रहा है, और मनुष्य का अभ्यास हमेशा ऊँचा हो रहा है। परमेश्वर सदैव कार्य कर रहा है, और मनुष्य हमेशा जरूरतमंद है, इस तरह से दोनों अपने चरम बिंदु पर पहुँच गए हैं, और परमेश्वर और मनुष्य का पूर्ण मिलन हो गया है। यह परमेश्वर के कार्य की पूर्णता की अभिव्यक्ति है, और यह परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन का अंतिम परिणाम है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

कलीसिया के कार्यों और मामलों में, परमेश्वर की आज्ञाकारिता के अलावा, उस व्यक्ति के निर्देशों का पालन करो, जिसे पवित्र आत्मा हर चीज़ में उपयोग करता है। ज़रा-सा भी उल्लंघन अस्वीकार्य है। अपने अनुपालन में एकदम सही रहो और सही या ग़लत का विश्लेषण न करो; क्या सही या ग़लत है, इससे तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं। तुम्हें ख़ुद केवल संपूर्ण आज्ञाकारिता की चिंता करनी चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दस प्रशासनिक आदेश जो राज्य के युग में परमेश्वर के चुने लोगों द्वारा पालन किए जाने चाहिए' से उद्धृत

अपने कार्य में, कलीसिया के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं को दो चीज़ों पर ध्यान अवश्य देना चाहिए : एक यह कि उन्हें ठीक कार्य प्रबंधनों के द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, उन सिद्धांतों का कभी भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए, और अपने कार्य को अपने विचारों या ऐसी किसी भी चीज़ के आधार पर नहीं करना चाहिए जिसकी वे कल्पना कर सकते हैं। जो कुछ भी वे करें, उन्हें परमेश्वर के घर के कार्य के लिए परवाह दिखानी चाहिए, और हमेशा इसके हित को सबसे पहले रखना चाहिए। दूसरी बात, जो बेहद अहम है, वह यह है कि जो कुछ भी वे करें उसमें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करने के लिए ध्यान अवश्य केन्द्रित करना चाहिए, और हर काम परमेश्वर के वचनों का कड़ाई से पालन करते हुए करना चाहिए। यदि तुम तब भी पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के विरुद्ध जा सकते हो, या तुम जिद्दी बनकर अपने विचारों का पालन करते हो और अपनी कल्पना के अनुसार कार्य करते हो, तो तुम्हारे कृत्य को परमेश्वर के प्रति एक अति गंभीर विरोध माना जाएगा। प्रबुद्धता और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन से निरंतर मुँह फेरना तुम्हें केवल बंद गली की ओर ले जाएगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हो, तो तुम कार्य नहीं कर पाओगे, और यदि तुम कार्य करने का प्रबंध कर भी लेते हो, तो तुम कुछ संपूर्ण नहीं कर पाओगे। कार्य करते समय पालन करने के दो मुख्य सिद्धांत यह हैं : एक है कार्य को ऊपर से प्राप्त प्रबंधनों के अनुसार सटीकता से करना, और साथ ही ऊपर से तय किये गए सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना। और दूसरा सिद्धांत है, पवित्र आत्मा द्वारा अंतर में दिये गए मार्गदर्शन का पालन करना। जब एक बार इन दोनों बिन्दुओं को अच्छी तरह से समझ लोगे, तो तुम आसानी से गलतियाँ नहीं करोगे। तुम सभी जिनका अनुभव इस क्षेत्र में अभी तक सीमित है, तुम्हारे विचार तुम्हारे कार्य को और अधिक दूषित करेंगे। कभी-कभी, हो सकता है कि तुम पवित्र आत्मा से आए, अपने भीतर के प्रबोधन और मार्गदर्शन को न समझ पाओ; और कभी, ऐसा लगता है कि तुम इसे समझ गये हो परन्तु संभव है कि तुम इसकी अनदेखी कर दो। तुम हमेशा मानवीय रीति से सोचते या निष्कर्ष निकालते हो, जैसा तुम्हें उचित लगता है वैसा करते हो और पवित्र आत्मा के इरादों की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते हो। तुम अपने विचारों के अनुसार अपना कार्य करते हो, और पवित्र आत्मा के प्रबोधन को एक किनारे कर देते हो। ऐसी स्थितियां अक्सर होती हैं। पवित्र आत्मा का आन्तरिक मार्गदर्शन बिल्कुल भी लोकोत्तर नहीं है; वास्तव में यह बिल्कुल ही सामान्य है। यानी, अपने दिल की गहराई में तुम जानते हो कि कार्य करने का यही उपयुक्त और सर्वोत्तम तरीका है। ऐसा विचार वास्तव में बहुत ही स्पष्ट है; यह तुम्हारी गंभीर सोच का परिणाम नहीं है, बल्कि एक तरह की भावना है जो तुम्हारे भीतर से निकली है, और कभी-कभी तुम पूरी तरह से नहीं समझ पाते कि तुम इस तरह से कार्य क्यों करते हो। यह पवित्र आत्मा का प्रबोधन ही होता है, अधिकांश लोगों में आम तौर पर यह ऐसे ही घटित होता है। इंसान के अपने विचार अक्सर सोच और चिंतन का परिणाम होते हैं और उनमें उनकी मनमानी और उन विचारों की मिलावट होती है जो इससे जुड़े होते हैं कि ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जिनमें आत्म-लाभ ढूँढा जा सकता है, और कौन-से निजी फायदे प्राप्त किए जा सकते हैं; हर इंसानी निर्णय में इन बातों का समावेश होता है। लेकिन पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में ऐसी कोई मिलावट नहीं होती। पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और प्रबोधन पर सावधानीपूर्वक ध्यान देना बहुत आवश्यक है; विशेषकर तुम्हें मुख्य विषयों में बहुत सावधान रहना होगा ताकि इन्हें समझा जा सके। ऐसे लोग जो अपना दिमाग लगाना पसंद करते हैं, जो अपने विचारों पर ही कार्य करना पसंद करते हैं, बहुत संभव है कि वे ऐसे मार्गदर्शन और प्रबोधन में चूक जाएँ। उपयुक्त अगुआ और कर्मी पवित्र आत्मा के कार्य पर ध्यान देते हैं। ऐसे लोग जो लोग पवित्र आत्मा की आज्ञा का पालन करते हैं, वे परमेश्वर का भय मानते हैं और बिना थके सत्य खोजते हैं। परमेश्वर को सन्तुष्ट करने के लिये और सही ढंग से उसकी गवाही देने के लिये व्यक्ति को अपने कार्य में मिलावटी तत्वों व इरादों की जाँच करनी चाहिये, और फिर यह देखने का प्रयास करना चाहिये कि कार्य इंसानी विचारों से कितना प्रेरित है, और कितना पवित्र आत्मा के प्रबोधन से उत्पन्न हुआ है, और कितना परमेश्वर के वचन के अनुसार है। तुम्हें निरन्तर और सभी परिस्थितियों में अपनी कथनी और करनी की जाँच करते रहना चाहिये। अक्सर इस तरह का अभ्यास करना तुम्हें परमेश्वर की सेवा के लिये सही रास्ते पर ले जाएगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कार्य के मुख्य सिद्धांत' से उद्धृत

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