158. परमेश्वर के वचन सत्य को समर्पित करने के सिद्धांत

(1) यह जानना आवश्यक है कि परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं और उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए, चाहे वे मानवीय धारणाओं के अनुरूप हों या न हों। किसी को उन्हें चुन-चुनकर स्वीकार नहीं करना चाहिए।

(2) व्यक्ति को परमेश्वर के वचन सत्य में से जो कुछ भी समझ में आया हो, उसे अभ्यास में लाना चाहिए और उसका अनुभव करना चाहिए। सत्य की समझ चाहे उथली हो या गहरी, व्यक्ति को अभ्यास और अनुभव के माध्यम से उसकी एक स्पष्ट समझ हासिल कर लेनी चाहिए।

(3) परमेश्वर के वचनों के न्याय और उनकी ताड़ना के साथ-साथ उनकी काट-छाँट और उनके निपटने के प्रति समर्पित होना आवश्यक है। केवल तभी जब किसी को अपने स्वयं के भ्रष्ट सार का पता चला हो, तो वह वास्तव में पश्चाताप करेगा।

(4) परमेश्वर के वचनों के अधिकार के प्रति समर्पण करना आवश्यक है। किसी को भी परमेश्वर के वचन सत्य के अनुसार बोलने वाले व्यक्ति के वचनों को स्वीकार करना और मानना चाहिए, फिर चाहे वह व्यक्ति कोई भी हो। परमेश्वर के वचनों का अधिकार सर्वोच्च होता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

हर युग में, जब परमेश्वर संसार में कार्य करता है तब वह मनुष्य को कुछ वचन प्रदान करता है, और उन्हें कुछ सत्य बताता है। ये सत्य ऐसे मार्ग के रूप में कार्य करते हैं जिसके मुताबिक मनुष्य को चलना चाहिए, जिस पर मनुष्य को चलना चाहिए, ऐसा मार्ग जो मनुष्य को परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में सक्षम बनाता है, ऐसा मार्ग जिसे मनुष्य को अभ्यास में लाना चाहिए और अपने जीवन में और अपनी जीवन यात्राओं के दौरान उसके मुताबिक चलना चाहिए। इन्हीं कारणों से परमेश्वर इन वचनों को मनुष्य को प्रदान करता है। ये वचन जो परमेश्वर से आते हैं उनके मुताबिक ही मनुष्य को चलना चाहिए, और उनके मुताबिक चलना ही जीवन पाना है। यदि कोई व्यक्ति उनके मुताबिक नहीं चलता, उन्हें अभ्यास में नहीं लाता, और अपने जीवन में परमेश्वर के वचनों को नहीं जीता, तो वह व्यक्ति सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहा है। यदि लोग सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहे हैं, तो वे परमेश्वर का भय नहीं मान रहे हैं और बुराई से दूर नहीं रह रहे हैं, और न ही वे परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं। यदि कोई परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर पाता, तो वह परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकता, ऐसे लोगों का कोई परिणाम नहीं होता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

सारी मानवजाति शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी है, और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना मनुष्य का स्वभाव है। किंतु, शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए सभी मनुष्यों में कुछ ऐसे भी हैं, जो परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित हो सकते हैं और सत्य को स्वीकार कर सकते हैं; ये वे हैं जो सत्य को प्राप्त कर सकते हैं और अपने स्वभाव में परिवर्तन कर सकते हैं। ऐसे लोग भी हैं, जो सत्य की तलाश पर ध्यान केंद्रित नहीं करते। वे केवल सिद्धांतों को समझने से संतुष्ट हैं; वे अच्छे सिद्धांत को सुनते हैं और उसे रख लेते हैं, और उसे समझने के बाद, वे अपने कर्तव्य निभा सकते हैं—एक बिंदु तक। ये लोग वही करते हैं, जो उन्हें बताया जाता है और उनमें औसत दर्जे की मानवता होती है। वे एक निश्चित सीमा तक स्वयं को खपाने, सांसारिकता को त्यागने और दुख सहने के लिए तैयार होते हैं। किंतु वे सत्य के बारे में ईमानदार नहीं होते; वे मानते हैं कि यही काफ़ी है कि वे कोई पाप नहीं करते, और वे कभी भी सत्य के सार को समझ पाने में समर्थ नहीं होते। यदि ऐसे लोग अंत में स्थिर खड़े हो सकते हैं, तो उन्हें भी बख्शा जा सकता है, लेकिन वे अपने स्वभाव को रूपांतरित नहीं कर सकते। अगर तुम भ्रष्टता से शुद्ध होना चाहते हो और अपने जीवन-स्वभाव में बदलाव से गुज़रते हो, तो तुममें सत्य के लिए प्रेम करने और सत्य को स्वीकार करने की योग्यता होनी ही चाहिए। सत्य को स्वीकार करने का क्या अर्थ है? सत्य को स्वीकार करना यह इंगित करता है कि चाहे तुममें किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचारी स्वभाव हो या बड़े लाल अजगर के जो भी विष तुम्हारी प्रकृति में हों, तुम उसे तब स्वीकार कर लेते हो जब यह परमेश्वर के वचन द्वारा प्रकट किया जाता है और इन वचनों के प्रति समर्पित होते हो; तुम इसे बेशर्त स्वीकार करते हो, तुम बहाने नहीं बनाते या चुनने की कोशिश नहीं करते और खुद को इस आधार पर जान जाते हो कि परमेश्वर क्या कहता है। परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने का यही अर्थ है। चाहे वह कुछ भी कहे, चाहे उसके कथन तुम्हारे दिल को कितना भी भेद दें, चाहे वह किन्हीं भी वचनों का उपयोग करे, तुम इन्हें तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि वह जो भी कहता है वह सत्य है, और तुम इन्हें तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि वे वास्तविकता के अनुरूप हैं। इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम परमेश्वर के वचनों को कितनी गहराई से समझते हो, तुम इनके प्रति समर्पित हो सकते हो, तुम उस रोशनी को स्वीकार कर सकते हो और उसके प्रति समर्पित हो सकते हो जो पवित्र आत्मा द्वारा प्रकट की गयी है और जिसकी तुम्हारे भाई-बहनों द्वारा सहभागिता की गयी है। जब ऐसा व्यक्ति सत्य का अनुसरण एक निश्चित बिंदु तक कर लेता है, तो वह सत्य को प्राप्त कर सकता है और अपने स्वभाव के रूपान्तरण को प्राप्त कर सकता है। यद्यपि सत्य से प्रेम न करने वाले लोगों में शिष्ट इंसानियत हो, लेकिन जब सत्य की बात आती है, वे भ्रमित होते हैं और इसे गंभीरता से नहीं लेते। भले ही वे कुछ अच्छे कर्म करने में समर्थ हों, खुद को परमेश्वर के लिए खपा सकते हों, और त्याग करने में समर्थ हों, पर वे स्वभाव में बदलाव नहीं ला सकते।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों के न्याय को प्राप्त करते समय, हमें कष्टों से नहीं घबराना चाहिये, न ही पीड़ा से डरना चाहिये; और इस बात से तो बिल्कुल भी ख़ौफ़ नहीं खाना चाहिये कि परमेश्वर के वचन हमारे हृदय को बेध देंगे। हमें उसके वचनों को और अधिक पढ़ना चाहिये कि कैसे परमेश्वर न्याय करता है, ताड़ना देता है और कैसे हमारे भ्रष्ट सार को उजागर करता है, हमें उन्हें पढ़ना चाहिए और खुद को और अधिक उनके अनुसार बनाना चाहिए। उनसे दूसरों की तुलना मत करो—हमें उनसे अपनी तुलना करनी चाहिए। हमारे अंदर इनमें से किसी भी चीज़ का अभाव नहीं है; हम सभी उनसे सहमत हो सकते हैं। अगर तुम्हें इसका विश्वास न हो, तो खुद अनुभव करके देख लो। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, कुछ लोग उन्हें खुद पर लागू करने में असमर्थ होते हैं; उन्हें लगता है कि इन वचनों के कुछ हिस्से उनके बारे में नहीं, बल्कि अन्य लोगों के बारे में हैं। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर लोगों को कुलटाओं और वेश्याओं के रूप में उजागर करता है, तो कुछ बहनों को लगता है कि चूँकि वे अपने पति के प्रति पूरी तरह से वफ़ादार हैं, अत: ऐसे वचन उनके संदर्भ में नहीं होने चाहिए; कुछ बहनों को लगता है कि चूँकि वे अविवाहित हैं और उन्होंने कभी सेक्स नहीं किया है, इसलिए ऐसे वचन उनके बारे में भी नहीं होने चाहिए। कुछ भाइयों को लगता है कि ये वचन केवल महिलाओं के लिए कहे गए हैं, और इनका उनसे कोई लेना-देना नहीं है; कुछ लोगों का मानना है कि परमेश्वर के ऐसे वचन सुनने में बहुत अप्रिय लगते हैं और वे उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं। ऐसे लोग भी हैं, जो कहते हैं कि कुछ मामलों में परमेश्वर के वचन गलत हैं। क्या परमेश्वर के वचनों के प्रति यह रवैया सही है? लोग परमेश्वर के वचनों के आधार पर आत्मचिंतन करने में असमर्थ हैं। यहाँ "कुलटा" और "वेश्या" लोगों के व्यभिचार की भ्रष्टता को संदर्भित करते हैं। चाहे पुरुष हो या महिला, विवाहित हो या अविवाहित, हर कोई व्यभिचार की भ्रष्टता से ग्रस्त है—तो इसका तुमसे कोई लेना-देना कैसे नहीं हो सकता है? परमेश्वर के वचन लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करते हैं; चाहे पुरुष हो या स्त्री, भ्रष्टाचार का उनका स्तर समान है। क्या यह तथ्य नहीं है? कुछ और करने से पहले, हमें यह समझना होगा कि हमें परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों में से हर एक वचन को स्वीकार करना चाहिए, चाहे वे सुनने में अच्‍छे लगते हों या नहीं, और चाहे वे हमें कड़वाहट का एहसास कराते हों या मिठास का। यही वह दृष्टिकोण है, जिसे हमें परमेश्‍वर के वचनों के प्रति अपनाना चाहिए। यह किस प्रकार का दृष्टिकोण है? क्‍या यह भक्ति का दृष्टिकोण है, सहिष्‍णुता का दृष्टिकोण है, या कष्‍ट सहने का दृष्टिकोण है? मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि यह इनमें से कोई नहीं है। हमारी आस्‍था में, हमें दृढ़ता से यह बनाए रखना चाहिए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं। चूँकि वे सचमुच सत्य हैं, हमें उन्हें तर्कसंगत ढंग से स्वीकार कर लेना चाहिये। हम इस बात को भले ही न पहचानें या स्वीकार न करें, लेकिन परमेश्वर के वचनों के प्रति हमारा पहला रुख़ पूर्ण स्वीकृति का होना चाहिये। परमेश्वर के वचनों की प्रत्येक पंक्ति एक स्थिति-विशेष से जुड़ी है। यानी, परमेश्वर के कथनों की कोई भी पंक्ति बाह्य रूपों के बारे में नहीं है, बाह्य नियमों के बारे में या लोगों के व्यवहार के किसी सरल रूप के बारे में तो बिल्कुल भी नहीं हैं। वे ऐसी नहीं हैं। अगर तुम परमेश्वर द्वारा कही गई हर पंक्ति को एक सामान्य प्रकार के इंसानी व्यवहार या बाह्य रूप की तरह देखते हो, तो फिर तुम्हारे अंदर आध्यात्मिक समझ नहीं है, तुम नहीं समझते कि सत्य क्या होता है। परमेश्‍वर के वचन गहन होते हैं। वे कैसे गहन होते हैं? परमेश्वर द्वारा कही गयी हर चीज़, प्रकट की गयी हर चीज़ लोगों के भ्रष्ट स्वभावों और उन चीजों के बारे में है जो उसके जीवन के भीतर गहरी जड़ें जमाये हुए और मौलिक हैं। वे आवश्यक चीज़ें होती हैं, वे बाह्य रूप नहीं, विशेषकर बाह्य व्यवहार नहीं होते। लोगों को उनके बाहरी रूप से देखने पर, वे सभी ठीक लग सकते हैं। लेकिन फिर परमेश्वर क्यों कहता है कि कुछ लोग बुरी आत्माएं हैं और कुछ अशुद्ध आत्माएं हैं? यह एक ऐसा मामला है जो तुम्हें दिखाई नहीं देता है। इस प्रकार, तुम परमेश्वर के वचनों पर बने रहने के लिए रूप-रंग या जो बाहर से दिखता है उस पर निर्भर नहीं रह सकते। इस तरह से सहभागिता करने के बाद, क्या तुम लोगों ने परमेश्वर के वचनों के प्रति अपने रवैये में बदलाव का अनुभव किया है? बदलाव चाहे जितना भी छोटा या बड़ा हो, अगली बार जब तुम लोग ऐसे वचन पढ़ोगे, तो कम से कम परमेश्वर के साथ तर्क करने की कोशिश नहीं करोगे। तुम यह नहीं कहोगे, "परमेश्वर के वचनों को सुनना वास्तव में कठिन है; मैं इस पृष्ठ को नहीं पढ़ने वाला। मैं बस इसे पलट दूँगा! मुझे आशीषों और वादों के बारे में पढ़ने के लिए कुछ खोजना चाहिए, ताकि कुछ आराम मिल सके।" तुम्हें इस तरह से छाँट-छाँटकर नहीं पढ़ना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग' से उद्धृत

तुम चाहे जो करो, लेकिन उसमें सत्य तलाशने और सत्य का पालन करने का प्रयास करो। यदि तुम सत्य के अनुसार कार्य कर रहे हो, तो तुम्हारी कार्यशैली सही है। अगर किसी बच्चे ने कोई बात कही है या किसी बेहद सीधे-सादे भाई-बहन ने भी कोई विचार रखा है और वह सत्य के अनुरूप है, तो तुम जो कुछ करोगे, उसका परिणाम अच्छा ही होगा और वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप भी होगा। किसी मामले का संचालन तुम्हारे सहज आवेग और उसके संचालन के तुम्हारे सिद्धांतों पर आधारित होता है। अगर तुम्हारे सिद्धांत इंसानी इच्छा से पैदा हुए हैं, यदि वे मानवीय विचारों, धारणाओं और कल्पनाओं से उत्पन्न हुए हैं; या फिर वे मानवीय भावनाओं और दृष्टिकोण से जन्मे हैं, तो तुम्हारा मामले का संचालन गलत होगा, क्योंकि उसका स्रोत ही गलत होगा। जब तुम्हारे विचार सत्य के सिद्धांतों पर आधारित होते हैं और जब तुम मामलों का संचालन सत्य-सिद्धांतों के अनुसार करते हो, तो फिर जो मामला तुम्हारे हाथ में है, तुम उसका संचालन यकीनन सही ढंग से करोगे। कभी-कभी लोग तुम्हारे द्वारा संचालित मामले को उस समय स्वीकार नहीं कर पाएँगे और उस समय ऐसा लग सकता है कि उनकी अपनी धारणाएँ हैं या उनका दिल बेचैन हो जाएगा। हालाँकि कुछ समय के बाद तुम सही साबित होगे। जो मामले परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होते हैं, वे कालांतर में सही लगते हैं; लेकिन जो मामले परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं होते—जो मामले मानवीय इच्छा के अनुरूप होते हैं और मानव-निर्मित होते हैं—वे कालांतर में खराब ही सिद्ध होते हैं। जब तुम कुछ करते हो, तो उस समय तुम्हें इस बात से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए कि तुम्हारा मार्गदर्शन किस तरीके से होना चाहिए या किस तरीके से नहीं होना चाहिए और पूर्वानुमान न लगाओ। पहली बात तो यह है कि तुम्हें खोज और प्रार्थना करनी चाहिए, तब तुम्हें आगे के मार्ग पर चलना चाहिए और सबके साथ संगति करनी चाहिए। संगति का प्रयोजन क्या है? इससे तुम ठीक परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य और उसकी इच्छा के अनुरूप बर्ताव कर पाओगे। यह बात को कहने का थोड़ा भव्य अंदाज़ है; चलो इसे इस ढंग से कहते हैं कि इससे इंसान मामलों का संचालन ठीक सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कर पाता है—यह तरीका थोड़ा ज़्यादा व्यावहारिक है। यदि तुम ऐसा कर पाओ, तो इतना पर्याप्त है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रष्‍ट स्‍वभाव को दूर करने का मार्ग' से उद्धृत

लोगों की जीवन में प्रवेश की चेष्टा परमेश्वर के वचनों पर आधारित है। पहले, यह कहा गया था कि सब कुछ उसके वचनों के कारण ही पूरा होता है, मगर किसी ने भी इस तथ्य को नहीं देखा। अगर तू वर्तमान चरण को अनुभव करने में प्रवेश करेगा, तो तुझे सारी बातें स्पष्ट हो जाएंगी और तू भविष्य की परीक्षाओं के लिए एक अच्छी नींव खड़ी करेगा। परमेश्वर चाहे जो कहे, तुझे केवल उसके वचनों में प्रवेश करने पर ध्यान देना है। जब परमेश्वर कहता है कि वह लोगों को ताड़ना देना शुरू करेगा, तो उसकी ताड़ना को स्वीकार कर। जब परमेश्वर लोगों से प्राण त्यागने को कहे, तो यह परीक्षा स्वीकार कर। यदि तू सदा उसके नए कथनों के भीतर जीवन बिताता है, तो अंत में परमेश्वर के वचन तुझे पूर्ण कर देंगे। जितना अधिक तू परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करेगा, उतनी ही शीघ्रता से तुझे पूर्ण किया जाएगा। क्यों मैं हर संगति में तुम सबसे परमेश्वर के वचनों को जानने और उनमें प्रवेश करने को कहता हूँ? केवल जब तू परमेश्वर के वचनों में अनुसरण करता है और उसका अनुभव करता है, और उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करता है, तभी पवित्र आत्मा को तेरे अंदर कार्य करने का अवसर मिलेगा। इसलिए परमेश्वर के कार्य की हर पद्धति में तुम सब प्रतिभागी हो, और इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी पीड़ा कितनी अधिक है, अंत में तुम सबको "स्मारिका" मिलेगी। अपनी अंतिम पूर्णता प्राप्त करने के लिए, तुम्हें परमेश्वर के सारे वचनों में प्रवेश करना होगा। पवित्र आत्मा द्वारा लोगों की पूर्णता एकतरफा नहीं है; वह लोगों का सहयोग चाहता है। वह चाहता है कि हर कोई पूरी मर्ज़ी से उसके साथ सहयोग करे। परमेश्वर चाहे जो भी कहे, तुझे केवल उसके वचनों में प्रवेश करने पर ध्यान देना है, यह तुम्हारे जीवन के लिए अधिक लाभकारी होगा। सारी बातें तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने के लिए ही हैं। जब तू परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करेगा, तब तेरा हृदय परमेश्वर द्वारा द्रवित किया जाएगा और तू वह सारी बातें समझ पायेगा जो परमेश्वर अपने कार्य के इस चरण में प्राप्त करना चाहता है और तुझमें उसे प्राप्त करने का संकल्प होगा। ताड़ना के समय के दौरान, कुछ लोग थे जिनका मानना था कि यह कार्य करने का एक तरीका है और उन्होंने परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं किया। इसके फलस्वरूप, वे शुद्धिकरण से नहीं गुज़रे और बिना कुछ पाये या समझे वे ताड़ना की अवधि से बाहर आ गए। कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने बिना किसी संदेह के इन वचनों में प्रवेश किया; जिन्होंने कहा कि परमेश्वर का वचन अचूक सत्य है और मनुष्यों को ताड़ना मिलनी चाहिए। कुछ समय के लिए उन्होंने अपने भविष्य और गंतव्य को छोड़ने में संघर्ष किया, और जब वे इससे बाहर निकले, तो उनका स्वभाव थोड़ा-बहुत बदल गया था और उन्होंने परमेश्वर की गहरी समझ पा ली थी। जो लोग ताड़ना से निकल आये, उन सब ने परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव किया, और वे जानते थे कि परमेश्वर के कार्य का यह चरण उनमें परमेश्वर के महान प्रेम के अवतरित होने को मूर्त रूप देता है, यह चरण परमेश्वर के प्रेम का विजय और उद्धार है। उन्होंने यह भी कहा कि परमेश्वर के विचार सदैव अच्छे होते हैं, और जो कुछ परमेश्वर मनुष्य में करता है, वह प्रेम से उपजा है, द्वेष से नहीं। जिन लोगों ने परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं किया, जिन्होंने उन वचनों का सम्मान नहीं किया, जो ताड़ना के समय शुद्धिकरण से नहीं गुज़रे, परिणामस्वरूप उनके साथ पवित्र आत्मा नहीं था, और उन्होंने कुछ भी नहीं पाया। जिन लोगों ने ताड़ना के समय में प्रवेश किया, वे भले ही शुद्धिकरण से होकर गुज़रे, लेकिन पवित्र आत्मा उनके अंदर गुप्त तरीके से कार्य कर रहा था और उसके फलस्वरूप उनके स्वभाव में बदलाव हुआ। कुछ लोग बाहर से हर तरह से, बहुत सकारात्मक दिखते थे, वे सदा आनंदित रहते थे, लेकिन उन्होंने परमेश्वर के वचनों के द्वारा शुद्धिकरण की अवस्था में प्रवेश नहीं किया और इसलिए वे बिल्कुल नहीं बदले, जो कि परमेश्वर के वचनों में विश्वास नहीं करने का परिणाम था। यदि तू परमेश्वर के वचनों में विश्वास नहीं रखता है तो पवित्र आत्मा तेरे अंदर कार्य नहीं करेगा। परमेश्वर उन सबके सामने प्रकट होता है जो उसके वचनों पर विश्वास करते हैं। जो लोग उसके वचनों पर विश्वास रखते हैं और उन्हें स्वीकारते हैं, वे उसका प्रेम प्राप्त कर सकेंगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के वचन को सुनना और परमेश्वर की आवश्यकताओं को मानना इंसान का स्वर्ग-प्रदत्त कार्य है; परमेश्वर क्या कहता है, यह इंसान का काम नहीं है। चाहे परमेश्वर जो भी कहे, परमेश्वर इंसान से कुछ भी मांगे, परमेश्वर की पहचान, सार और स्थिति, ये नहीं बदलते—वह सदैव परमेश्वर ही है। जब तुम्हें कोई संदेह न हो कि वह परमेश्वर है, तो तुम्हारी एकमात्र ज़िम्मेदारी, केवल एक ही चीज़ जो तुम्हें करनी चाहिए, वह है उसे सुनना जो वह कहता है; अभ्यास का मार्ग यही है। परमेश्वर के एक सृजित प्राणी को परमेश्वर के वचनों की जाँच, उनका विश्लेषण, अन्वेषण, नामंजूरी, विरोध, अवज्ञा या उन्हें अस्वीकार नहीं करना चाहिए; परमेश्वर इससे घृणा करता है, और यह वो नहीं है जो वह इंसान में देखना चाहता है। तो आख़िर अभ्यास का मार्ग क्या है? यह वास्तव में बहुत सरल होता है : सुनना, अपने दिल से सुनना, अपने दिल से स्वीकार करना, अपने दिल से समझना और बूझना सीखो, और फिर जाओ और करो, उसे पूरा करो, अपने दिल से उसे कार्यान्वित करो। जो तुम सुनते और दिल में बूझते हो, वह उसके साथ निकटता से जुड़ा होता है जो तुम अमल में लाते हो। इन दोनों को अलग मत करो; तुम जो अमल में लाते हो, तुम जिसका पालन करते हो, जो तुम अपने हाथ से करते हो, हर वो चीज़ जिसके लिए तुम भागते-फिरते हो—वो सब उससे जुड़ा है जिसे तुम सुनते और अपने दिल में बूझते हो, और इसमें तुम सृष्टिकर्ता के वचनों के प्रति अज्ञाकारिता हासिल करोगे। यही अभ्यास का मार्ग है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'प्रकरण तीन : कैसे नूह और अब्राहम ने परमेश्वर के वचन सुने और उसकी आज्ञा का पालन किया (भाग दो)' से उद्धृत

नूह एक ऐसा व्यक्ति था, जो सभी मनुष्यों में अधिक अनुकरणीय था, जिसने परमेश्वर का भय माना, परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया, और जो कुछ परमेश्वर ने उसे सौंपा था, उसे पूरा किया; परमेश्वर ने उसकी प्रशंसा की थी, और आज परमेश्वर का अनुसरण करने वालों के लिए वह एक आदर्श होना चाहिए। और उसके बारे में सबसे अनमोल बात क्या थी? परमेश्वर के वचनों के प्रति उसका केवल एक ही दृष्टिकोण था : सुनना और स्वीकार करना, स्वीकार करना और पालन करना, और मृत्यु तक पालन करना। उसका यह रवैया ही था, जो सबसे अनमोल था, जिसने उसे परमेश्वर की प्रशंसा दिलाई। जब परमेश्वर के वचनों की बात आई, तो उसने केवल सांकेतिक प्रयास नहीं किया, उसने बेमन से प्रयास नहीं किया, और उसने अपने दिमाग में उनका अध्ययन, विश्लेषण, विरोध या उसे अस्वीकार कर उन्हें अपने दिमाग में पीछे नहीं धकेला; इसके बजाय, उसने उन्हें गंभीरता से सुना, धीरे-धीरे अपने हृदय में उन्हें स्वीकार किया, और फिर इस बात पर विचार किया कि परमेश्वर के वचनों को फलीभूत कैसे किया जाए, उन्हें अभ्यास में कैसे लाया जाए, उन्हें विकृत किए बिना उस तरह कैसे कार्यान्वित किया जाए, जैसा कि मूल रूप में अभीष्ट था। और जिस समय उसने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया, उसी समय उसने अपने तुम से अकेले में कहा, "ये परमेश्वर के वचन हैं, ये परमेश्वर के निर्देश हैं, परमेश्वर का आदेश हैं, मैं कर्तव्यबद्ध हूँ, मुझे इनका पालन करना ही चाहिए, मैं कुछ भी नहीं छोड़ सकता, मैं किसी भी तरह से परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध नहीं जा सकता, न ही मैं उसके द्वारा कही गई बातों में से किसी चीज को नजरअंदाज कर सकता हूँ, अन्यथा मैं मानव कहलाने के योग्य नहीं हूँगा, मैं परमेश्वर के आदेश के योग्य नहीं हूँगा, और उसके द्वारा उन्नत किए जाने के योग्य नहीं हूँगा। अगर मैं वह सब पूरा करने में असफल रहता हूँ, जो परमेश्वर ने मुझे बताया और सौंपा है, तो मुझे बहुत पछतावा होगा। इससे भी बढ़कर, मैं अपने तुम को परमेश्वर के आदेश और उसके द्वारा उन्नत किए जाने के योग्य नहीं जानूँगा, और सृष्टिकर्ता को दोबारा मुँह नहीं दिखा सकूँगा।" वह सब, जो नूह ने अपने दिल में सोचा और विचारा था, उसका हर दृष्टिकोण और रवैया, इन सभी ने निर्धारित किया कि कैसे वह परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने, और परमेश्वर के वचनों को वास्तविकता बनाने, परमेश्वर के वचनों को फलीभूत करने, हासिल करने में सक्षम हुआ ताकि वे उसके माध्यम से पूरे हो जाएँ और उसके माध्यम से वास्तविकता में बदल जाएँ, शून्य न हो जाएँ। नूह ने जो कुछ भी सोचा, उसके दिल में उठने वाले हर विचार और परमेश्वर के प्रति उसके रवैये को देखते हुए, नूह परमेश्वर के आदेश के योग्य था, वह परमेश्वर के भरोसे का व्यक्ति था, और परमेश्वर द्वारा अधिक पसंद किया जाने वाला व्यक्ति था। परमेश्वर लोगों के हर शब्द और कर्म को जाँचता है, वह उसके विचार और मत देखता है। परमेश्वर की दृष्टि में, नूह के लिए ऐसा सोचने में सक्षम होने का अर्थ था कि उसने गलत चुनाव नहीं किया था। नूह ने खुद को परमेश्वर की आज्ञा स्वीकार करने, परमेश्वर का भरोसा प्राप्त करने के योग्य दिखाया और वह परमेश्वर का आदेश पूरा करने में सक्षम था : वह पूरी मानवजाति के बीच एकमात्र विकल्प था।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'प्रकरण तीन : कैसे नूह और अब्राहम ने परमेश्वर के वचन सुने और उसकी आज्ञा का पालन किया (भाग दो)' से उद्धृत

अब्राहम एक ईमानदार व्यक्ति था। परमेश्वर के वचनों के प्रति उसका एक ही दृष्टिकोण था : सुनना, स्वीकार करना और पालन करना। परमेश्वर ने जो कुछ भी कहा उसने सुन लिया; अगर परमेश्वर ने कहा कि यह चीज काली है, तो भले ही वह चीज अब्राहम को काली न दिखी हो, फिर भी उसने बिना सवाल किए मान लिया कि वह काली है। अगर परमेश्वर ने कहा कि वह सफेद है, तो वह सफेद है। यह इतना सरल था। जब परमेश्वर ने कहा कि वह उसे एक बच्चा देगा, तो उसने मन ही मन सोचा, "मैं सौ वर्ष का हूँ। अगर परमेश्वर कहता है कि वह मुझे एक बच्चा देगा, तो मैं परमेश्वर को धन्यवाद देता हूँ, मैं अपने प्रभु को धन्यवाद देता हूँ।" वह बहुत ज्यादा नहीं सोचता था; उसे सिर्फ परमेश्वर में विश्वास था। और इस विश्वास का सार क्या था? उसे परमेश्वर के सार और पहचान में विश्वास था; सृष्टिकर्ता के बारे में उसका ज्ञान सच्चा था। वह उनमें से नहीं था, जो बोलते हैं कि उनका मानना है परमेश्वर के पास सभी चीजों को बनाने का सामर्थ्य है, परमेश्वर ने ही मानवजाति को बनाया है, फिर भी मन ही मन उस पर संदेह करते हैं : "क्या हम बंदर से विकसित होकर इंसान नहीं हुए हैं? परमेश्वर ने जब सब-कुछ बनाया तो मैंने क्यों नहीं देखा?" जब भी वे परमेश्वर को बोलते सुनते हैं, तो उनके दिल में बड़े सवालिया निशान होते हैं। परमेश्वर द्वारा बोले गए प्रत्येक तथ्य, बात और निर्देश का वे सूक्ष्मता से, ध्यान से, और सावधानी से अध्ययन और विश्लेषण करते हैं; अन्यथा, यदि वे सावधान न रहें, तो उन्हें बरगलाया जा सकता है, और उनका फायदा उठाया जा सकता है। लेकिन अब्राहम ऐसा नहीं था। उसका हृदय शुद्ध था, उसने शुद्ध हृदय से परमेश्वर के वचनों को सुना और यद्यपि, जब परमेश्वर ने इस बार बात की, तो उसे पीड़ा हुई, फिर भी उसने विश्वास रखकर आज्ञापालन किया; उसे विश्वास था कि परमेश्वर के वचन नहीं बदलेंगे, वे वास्तविकता बन जाएँगे, सृजित मानवजाति को उनका पालन और उन्हें कार्यान्वित करना चाहिए; परमेश्वर के वचनों को सुनकर, सृजित मानवजाति को चुनने का कोई अधिकार नहीं है, उनका अध्ययन या विश्लेषण करना तो दूर की बात है। परमेश्वर के वचनों के प्रति अब्राहम का रवैया ऐसा ही था। इसलिए, भले ही इससे उसे बहुत पीड़ा हुई, भले ही अपने बेटे के प्रति अपने लगाव, स्नेह और अति प्रेम के कारण, उसने अत्यधिक तनाव और पीड़ा महसूस की, फिर भी उसने अपना बेटा परमेश्वर को वापस देने का फैसला किया। उसे अपना बेटा परमेश्वर को क्यों लौटाना पड़ा? यदि परमेश्वर ने नहीं माँगा होता, तो उसे अपने पुत्र को वापस करने का दायित्व लेने की आवश्यकता नहीं होती—लेकिन एक बार जब परमेश्वर ने माँग लिया, तो उसे परमेश्वर को लौटाना ही था; उसके पास कोई बहाना नहीं था, लोगों को परमेश्वर के साथ तर्क करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए; यह अब्राहम का रवैया था। उसने शुद्ध हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया : यही परमेश्वर चाहता था और यही परमेश्वर देखना चाहता था। अब्राहम ने इसहाक को अर्पित करके क्या हासिल किया, और परमेश्वर के सामने उसमें क्या प्रदर्शित हुआ, यही परमेश्वर देखना चाहता था, और यही परमेश्वर द्वारा उसकी परीक्षा थी। फिर भी, परमेश्वर ने अब्राहम के साथ वैसा व्यवहार नहीं किया जैसा उसने नूह के साथ किया था। उसने अब्राहम को इस मामले के पीछे की पूरी कहानी, प्रक्रिया, कुछ नहीं बताया। अब्राहम केवल एक ही बात जानता था : परमेश्वर ने उसे इसहाक को लौटाने के लिए कहा है, बस। वह न तो यह जानता था कि ऐसा करके, परमेश्वर उसकी परीक्षा ले रहा है और न ही उसे इस बात की जानकारी थी कि यह परीक्षा लेने के बाद, परमेश्वर उसमें और उसके वंशजों में क्या संपन्न करना चाहता है। परमेश्वर ने उसे हर बात नहीं बताई, उसने उसे बस एक सरल निर्देश दिया, एक अनुरोध किया। यद्यपि परमेश्वर के ये वचन बहुत ही सरल और निर्मम थे, फिर भी अपेक्षा के अनुरूप, अब्राहम ने वही किया जो परमेश्वर की इच्छा थी और जो परमेश्वर चाहता था : उसने वेदी पर इसहाक की बलि चढ़ाने के लिए अर्पित किया। उसने जो कुछ भी किया उससे पता चलता है कि उसकी भेंट एक औपचारिकता मात्र नहीं थी, वह सिर्फ यूँ नहीं कर रहा था, बल्कि पूरे हृदय से, पूरी ईमानदारी से कर रहा था। हालाँकि सृष्टिकर्ता ने उससे जो कुछ माँगा था, वह उसकी सहनशक्ति से बाहर था, उसे पीड़ा हुई, फिर भी अब्राहम ने वह किया जो कोई इंसान नहीं करेगा : सृष्टिकर्ता के वचनों का एकनिष्ठ आज्ञापालन, बिना समझौता किए आज्ञापालन, बिना कोई बहाने बनाए, और बिना किसी शर्त के—उसमें ऐसी क्या बात थी जिस कारण वह वैसा कर सका जो परमेश्वर ने चाहा? एक तो उसमें परमेश्वर के प्रति सच्चा विश्वास था; उसे यकीन था कि सृष्टिकर्ता परमेश्वर है, उसका परमेश्वर, उसका प्रभु, जो सभी चीजों पर शासन करता है और जिसने इंसान को बनाया है। यह सच्चा विश्वास था। दूसरे, उसका हृदय शुद्ध था। वह सृष्टिकर्ता द्वारा कहे गए प्रत्येक वचन पर भरोसा करता था, और सृष्टिकर्ता द्वारा कहे गए प्रत्येक वचन को सरलता और सहजता से स्वीकार करने में सक्षम था। एक बात और, सृष्टिकर्ता ने उससे जो भी करने को कहा, वह कितना ही मुश्किल क्यों न हो, इससे उसे कितनी ही पीड़ा क्यों न हो, लेकिन उसका रवैया आज्ञाकारिता का था, उसने परमेश्वर से तर्क करने की कोशिश नहीं की, टालने या इंकार करने का प्रयास नहीं किया, बल्कि उसमें पूर्ण और एकनिष्ठ आज्ञाकारिता थी, उसमें परमेश्वर की अपेक्षा, उसके प्रत्येक वचन और आदेश के अनुसार कार्य करने और कार्यान्वित करने का भाव था। जैसी कि परमेश्वर की इच्छा थी और वह देखना चाहता था, वैसे ही अब्राहम ने इसहाक को वेदी पर अर्पित कर दिया, उसने उसे परमेश्वर को अर्पित किया—और उसने जो कुछ भी किया, उससे यह साबित होता है कि परमेश्वर ने सही व्यक्ति चुना था, परमेश्वर की दृष्टि में, वह धार्मिक था।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'प्रकरण तीन : कैसे नूह और अब्राहम ने परमेश्वर के वचन सुने और उसकी आज्ञा का पालन किया (भाग दो)' से उद्धृत

मैं तुम लोगों के जीवन में प्रकट होता हूँ, लेकिन तुम लोग इससे हमेशा अनजान रहते हो। यहाँ तक कि तुम लोग मुझे पहचानते भी नहीं। मेरे द्वारा कहे गए वचनों में से लगभग आधे वचन तुम लोगों का न्याय करते हैं, और वे उससे आधा प्रभाव ही हासिल कर पाते हैं, जितना कि उन्हें करना चाहिए, जो तुम्हारे भीतर गहरा भय पैदा करना है। शेष आधे वचन तुम लोगों को जीवन के बारे में सिखाने के लिए और स्वयं को संचालित कैसे करें, इस बारे में बताने के लिए हैं। लेकिन जहाँ तक तुम्हारा संबंध है, ऐसा लगता है, जैसे ये वचन तुम लोगों के लिए मौजूद ही नहीं हैं, या जैसे कि तुम लोग बच्चों की बातें सुन रहे थे, ऐसी बातें जिन्हें सुनकर तुम हमेशा दबे-ढके ढंग से मुसकरा देते हो, लेकिन उन पर कार्रवाई कुछ नहीं करते। तुम लोग इन चीज़ों के बारे में कभी चिंतित नहीं रहे हो; तुम लोगों ने हमेशा मेरे कार्यों को मुख्यत: जिज्ञासा के नाम पर ही देखा है, जिसका परिणाम यह हुआ है कि अब तुम लोग अँधेरों में घिर गए हो और प्रकाश को देख नहीं सकते, और इसलिए तुम लोग अँधेरे में दयनीय ढंग से रोते हो। मैं जो चाहता हूँ, वह तुम लोगों की आज्ञाकारिता है, तुम्हारी बेशर्त आज्ञाकारिता, और इससे भी बढ़कर, मेरी अपेक्षा है कि तुम लोग मेरी कही हर चीज़ के बारे में पूरी तरह से निश्चित रहो। तुम लोगों को उपेक्षा का रवैया नहीं अपनाना चाहिए और खास तौर से मेरी कही चीज़ों के बारे में चयनात्मक व्यवहार नहीं करना चाहिए, न ही मेरे वचनों और कार्य के प्रति उदासीन रहना चाहिए, जिसके कि तुम आदी हो। मेरा कार्य तुम लोगों के बीच किया जाता है और मैंने तुम लोगों के लिए बहुत सारे वचन प्रदान किए हैं, लेकिन यदि तुम लोग मेरे साथ ऐसा व्यवहार करोगे, तो जो कुछ तुमने न तो हासिल किया और न ही जिसे अभ्यास में लाए हो, उसे मैं केवल गैर-यहूदी परिवारों को दे सकता हूँ। समस्त सृजित प्राणियों में से कौन है, जिसे मैंने अपने हाथों में नहीं रखा हुआ है? तुम लोगों में से अधिकांश "पके बुढ़ापे" की उम्र के हो और तुम लोगों के पास इस तरह के कार्य को स्वीकार करने की ऊर्जा नहीं है, जो मेरे पास है। तुम लोग मुश्किल से गुज़ारा करने वाले हानहाओ पक्षी[क] की तरह हो और तुम ने कभी भी मेरे वचनों को गंभीरता से नहीं लिया है। युवा लोग अत्यंत व्यर्थ और अति-आसक्त हैं और मेरे कार्य पर और भी कम ध्यान देते हैं। वे मेरे भोज के व्यंजनों का आनंद लेने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते; वे उस छोटे-से पक्षी की तरह हैं, जो अपने पिंजरे से बाहर निकलकर बहुत दूर जाने के लिए उड़ गया है। इस तरह के युवा और वृद्ध लोग मेरे लिए कैसे उपयोगी हो सकते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन' से उद्धृत

मूल रूप से मैं तुम लोगों को और अधिक सत्य प्रदान करना चाहता था, लेकिन मुझे इससे विरत होना पड़ा, क्योंकि सत्य के प्रति तुम्हारा रवैया बहुत ठंडा और उदासीन है; मैं नहीं चाहता कि मेरी कोशिशें व्यर्थ जाएँ, न ही मैं यह देखना चाहता हूँ कि लोग मेरे वचनों को तो थामे रहें, लेकिन काम हर लिहाज से ऐसे करें, जिनसे मेरा विरोध होता हो, जो मुझे कलंकित करते हों और मेरा तिरस्कार करते हों। तुम लोगों के रवैये और मानवीय स्वभाव के कारण, मैं तुम्हें अपने वचनों का एक छोटा-सा भाग ही प्रदान करता हूँ, जो तुम्हारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, और जो मनुष्यों के बीच मेरा परीक्षण-कार्य है। केवल अब मैंने वास्तव में पुष्टि की है कि जो निर्णय और योजनाएँ मैंने बनाई हैं, वे तुम लोगों की जरूरतों के अनुरूप हैं, और यह भी कि मानव-जाति के प्रति मेरा रवैया सही है। मेरे सामने तुम लोगों के कई वर्षों के व्यवहार ने मुझे बिना दृष्टांत के उत्तर दे दिया, और इस उत्तर का प्रश्न यह है कि : "सत्य और सच्चे परमेश्वर के सामने मनुष्य का रवैया क्या है?" मैंने मनुष्य के लिए जो प्रयास किए हैं, वे मनुष्य के लिए मेरे प्रेम के सार को प्रमाणित करते हैं, और मेरे सामने मनुष्य का हर कार्य सत्य से घृणा करने और मेरा विरोध करने के उसके सार को प्रमाणित करता है। मैं हर समय उन सबके लिए चिंतित रहता हूँ, जो मेरा अनुसरण करते हैं, लेकिन मेरा अनुसरण करने वाले कभी मेरे वचनों को ग्रहण करने में समर्थ नहीं होते; यहाँ तक कि वे मेरे सुझाव स्वीकार करने में भी सक्षम नहीं हैं। यह बात मुझे सबसे ज़्यादा उदास करती है। कोई भी मुझे कभी भी समझ नहीं पाया है, और इतना ही नहीं, कोई भी मुझे कभी भी स्वीकार नहीं कर पाया है, बावजूद इसके कि मेरा रवैया नेक और मेरे वचन सौम्य हैं। सभी लोग मेरे द्वारा उन्हें सौंपा गया कार्य अपने विचारों के अनुसार करने की कोशिश करते हैं; वे मेरे इरादे को जानने की कोशिश नहीं करते, मेरी अपेक्षाओं के बारे में पूछने की बात तो छोड़ ही दीजिए। वे अभी भी वफादारी के साथ मेरी सेवा करने का दावा करते हैं, जबकि वे मेरे खिलाफ विद्रोह करते हैं। बहुतों का यह मानना है कि जो सत्य उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं या जिनका वे अभ्यास नहीं कर पाते, वे सत्य ही नहीं हैं। ऐसे लोगों में सत्य ऐसी चीज़ बन जाते हैं, जिन्हें नकार दिया जाता है और दरकिनार कर दिया जाता है। उसी समय, लोग मुझे वचन में परमेश्वर के रूप में पहचानते हैं, परंतु साथ ही मुझे एक ऐसा बाहरी व्यक्ति मानते हैं, जो सत्य, मार्ग या जीवन नहीं है। कोई इस सत्य को नहीं जानता : मेरे वचन सदा-सर्वदा अपरिवर्तनीय सत्‍य हैं। मैं मनुष्य के लिए जीवन की आपूर्ति और मानव-जाति के लिए एकमात्र मार्गदर्शक हूँ। मेरे वचनों का मूल्य और अर्थ इससे निर्धारित नहीं होता कि उन्हें मानव-जाति द्वारा पहचाना या स्वीकारा जाता है या नहीं, बल्कि स्वयं वचनों के सार द्वारा निर्धारित होता है। भले ही इस पृथ्वी पर एक भी व्यक्ति मेरे वचनों को ग्रहण न कर पाए, मेरे वचनों का मूल्य और मानव-जाति के लिए उनकी सहायता किसी भी मनुष्य के लिए अपरिमेय है। इसलिए ऐसे अनेक लोगों से सामना होने पर, जो मेरे वचनों के खिलाफ विद्रोह करते हैं, उनका खंडन करते हैं, या उनका पूरी तरह से तिरस्कार करते हैं, मेरा रुख केवल यह रहता है : समय और तथ्यों को मेरी गवाही देने दो और यह दिखाने दो कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं। उन्हें यह दिखाने दो कि जो कुछ मैंने कहा है, वह सही है, और वह ऐसा है जिसकी आपूर्ति लोगों को की जानी चाहिए, और इतना ही नहीं, जिसे मनुष्य को स्वीकार करना चाहिए। मैं उन सबको, जो मेरा अनुसरण करते हैं, यह तथ्य ज्ञात करवाऊँगा : जो लोग पूरी तरह से मेरे वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों का अभ्यास नहीं कर सकते, जिन्हें मेरे वचनों में कोई लक्ष्य नहीं मिल पाता, और जो मेरे वचनों के कारण उद्धार प्राप्त नहीं कर पाते, वे लोग हैं जो मेरे वचनों के कारण निंदित हुए हैं और इतना ही नहीं, जिन्होंने मेरे उद्धार को खो दिया है, और मेरी लाठी उन पर से कभी नहीं हटेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए' से उद्धृत

फुटनोट :

क. हानहाओ पक्षी की कहानी ईसप की चींटी और टिड्डी की नीति-कथा से काफ़ी मिलती-जुलती है। जब मौसम गर्म होता है, तब हानहाओ पक्षी अपने पड़ोसी नीलकंठ द्वारा बार-बार चेताए जाने के बावजूद घोंसला बनाने के बजाय सोना पसंद करता है। जब सर्दी आती है, तो हानहाओ ठिठुरकर मर जाता है।

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