81. सुसमाचार को फैलाने और परमेश्वर की गवाही देने के सिद्धांत

(1) यह समझना आवश्यक है कि, सभी विश्वासियों का एक कर्तव्य है कि वे सुसमाचार का प्रचार करें और परमेश्वर के लिए गवाही दें, और यह कि उनका ऐसा करना स्वर्ग के आदेश द्वारा नियत और पृथ्वी द्वारा स्वीकृत किया गया है। उन्हें इसके प्रति समर्पित होना चाहिए, और इसे स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने के लिए वे अपने आत्म-सम्मान से बाध्य हैं;

(2) अंतिम दिनों में परमेश्‍वर के कार्य को उसके वचनों के अनुसार गवाही देना आवश्यक है, एक ऐसी गवाही जो उस कार्य को स्पष्ट और पारदर्शी बनाए, जिसमें प्रमुख सच्चाईयों पर संवाद करने के साथ-साथ उन प्रमुख धारणाओं और कठिनाइयों को दूर करने पर ध्यान दिया जाए जो मनुष्य को परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने से रोकती हैं।

(3) प्रत्येक संभावित नवधर्मी का सावधानीपूर्वक विश्लेषण और अनुसंधान किया जाना चाहिए, और व्यवहार्य योजनाएँ निर्धारित की जानी चाहिए। यथासंभव प्रभावी रूप से नई सफलताओं के लिए प्रयास करो;

(4) सुसमाचार प्रचार के लिए सही लक्ष्यों को चुनना आवश्यक है। लचीले ढंग से कई प्रकार के बुद्धिमान तरीके अपनाओ और जब तक कि यह अवैध या पापपूर्ण न हो, तब तक जो कुछ भी अधिक लोगों को हासिल करने के लिए ज़रूरी लगे, वह करो;

(5) पवित्र आत्मा के कार्य को सम्मानपूर्वक देखना और उसके मार्गदर्शन का पालन करना आवश्यक है। प्रत्येक देश में, स्थानीय प्रणालियों, कानूनों और नियमों के अनुरूप तरीके अपनाओ, जिनमें प्रत्यक्ष सुसमाचार-प्रचार, सहज सुसमाचार- प्रचार, या "समूह इंजीलवाद" शामिल हो सकते हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

मानवजाति के एक सदस्य और एक सच्चे ईसाई होने के नाते अपने मन और शरीर परमेश्वर के आदेश की पूर्ति करने के लिए समर्पित करना हम सभी का उत्तरदायित्व और कर्तव्य है, क्योंकि हमारा संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर से आया है, और वह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण अस्तित्व में है। यदि हमारे मन और शरीर परमेश्वर के आदेश और मानवजाति के धार्मिक कार्य के लिए नहीं हैं, तो हमारी आत्माएँ उन लोगों के योग्य नहीं होंगी, जो परमेश्वर के आदेश के लिए शहीद हुए थे, और परमेश्वर के लिए तो और भी अधिक अयोग्य होंगी, जिसने हमें सब-कुछ प्रदान किया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है' से उद्धृत

अब जो कुछ मैं तुम लोगों को देता हूँ, वह मूसा से बढ़कर और दाऊद से बड़ा है, अतः उसी प्रकार मैं कहता हूँ कि तुम्हारी गवाही मूसा से बढ़कर और तुम्हारे वचन दाऊद के वचनों से बड़े हों। मैं तुम लोगों को सौ गुना देता हूँ—अत: उसी प्रकार मैं तुम लोगों से कहता हूँ मुझे उतना ही वापस करो। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि वह मैं ही हूँ, जो मनुष्य को जीवन देता है, और तुम्हीं लोग हो, जो मुझसे जीवन प्राप्त करते हो और तुम्हें मेरी गवाही अवश्य देनी चाहिए। यह तुम लोगों का वह कर्तव्य है, जिसे मैं नीचे तुम लोगों के लिए भेजता हूँ और जिसे तुम लोगों को मेरे लिए अवश्य निभाना चाहिए। मैंने अपनी सारी महिमा तुम लोगों को दे दी है, मैंने तुम लोगों को वह जीवन दिया है, जो चुने हुए लोगों, इजरायलियों को भी कभी नहीं मिला। उचित तो यही है कि तुम लोग मेरे लिए गवाही दो, अपनी युवावस्था मुझे समर्पित कर दो और अपना जीवन मुझ पर कुर्बान कर दो। जिस किसी को मैं अपनी महिमा दूँगा, वह मेरा गवाह बनेगा और मेरे लिए अपना जीवन देगा। इसे मैंने पहले से नियत किया हुआ है। यह तुम लोगों का सौभाग्य है कि मैं अपनी महिमा तुम्हें देता हूँ, और तुम लोगों का कर्तव्य है कि तुम लोग मेरी महिमा की गवाही दो। अगर तुम लोग केवल आशीष प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हो, तो मेरे कार्य का ज़्यादा महत्व नहीं रह जाएगा, और तुम लोग अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रहे होगे। इजराइलियों ने केवल मेरी दया, प्रेम और महानता को देखा था, और यहूदी केवल मेरे धीरज और छुटकारे के गवाह बने थे। उन्होंने मेरे आत्मा के कार्य का एक बहुत ही छोटा भाग देखा था; इतना कि तुम लोगों ने जो देखा और सुना है, वह उसका दस हज़ारवाँ हिस्सा ही था। जो कुछ तुम लोगों ने देखा है, वह उससे भी बढ़कर है, जो उनके बीच के महायाजकों ने देखा था। आज तुम लोग जिन सत्यों को समझते हो, वह उनके द्वारा समझे गए सत्यों से बढ़कर है; जो कुछ तुम लोगों ने आज देखा है, वह उससे बढ़कर है जो व्यवस्था के युग में देखा गया था, साथ ही अनुग्रह के युग में भी, और जो कुछ तुम लोगों ने अनुभव किया है, वह मूसा और एलियाह के अनुभवों से कहीं बढ़कर है। क्योंकि जो कुछ इजरायलियों ने समझा था, वह केवल यहोवा की व्यवस्था थी, और जो कुछ उन्होंने देखा था, वह केवल यहोवा की पीठ की झलक थी; जो कुछ यहूदियों ने समझा था, वह केवल यीशु का छुटकारा था, जो कुछ उन्होंने प्राप्त किया था, वह केवल यीशु द्वारा दिया गया अनुग्रह था, और जो कुछ उन्होंने देखा था, वह केवल यहूदियों के घर के भीतर यीशु की तसवीर थी। आज तुम लोग यहोवा की महिमा, यीशु का छुटकारा और आज के मेरे सभी कार्य देख रहे हो। तुम लोगों ने मेरे आत्मा के वचनों को भी सुना है, मेरी बुद्धिमत्ता की तारीफ की है, मेरे चमत्कार देखे हैं, और मेरे स्वभाव के बारे में जाना है। मैंने तुम लोगों को अपनी संपूर्ण प्रबंधन योजना के बारे में भी बताया है। तुम लोगों ने मात्र एक प्यारा और दयालु परमेश्वर ही नहीं, बल्कि धार्मिकता से भरा हुआ परमेश्वर देखा है। तुम लोगों ने मेरे आश्चर्यजनक कामों को देखा है और जान गए हो कि मैं प्रताप और क्रोध से भरपूर हूँ। इतना ही नहीं, तुम लोग जानते हो कि मैंने एक बार इजराइल के घराने पर अपने क्रोध का प्रकोप उड़ेला था, और आज यह तुम लोगों पर आ गया है। तुम लोग यशायाह और यूहन्ना की अपेक्षा स्वर्ग के मेरे रहस्यों को कहीं ज़्यादा समझते हो; पिछली पीढ़ियों के सभी संतों की अपेक्षा तुम लोग मेरी मनोरमता और पूजनीयता को कहीं ज़्यादा जानते हो। तुम लोगों ने केवल मेरे सत्य, मेरे मार्ग और मेरे जीवन को ही प्राप्त नहीं किया है, अपितु मेरी उस दृष्टि और प्रकटीकरण को भी प्राप्त किया है, जो यूहन्ना को प्राप्त दृष्टि और प्रकटीकरण से भी बड़ा है। तुम लोग कई और रहस्य समझते हो, और तुमने मेरा सच्चा चेहरा भी देख लिया है; तुम लोगों ने मेरे न्याय को अधिक स्वीकार किया है और मेरे धर्मी स्वभाव को अधिक जाना है। और इसलिए, यद्यपि तुम लोग इन अंत के दिनों में जन्मे हो, फिर भी तुम लोग पूर्व की और पिछली बातों की भी समझ रखते हो, और तुम लोगों ने आज की चीजों का भी अनुभव किया है, और यह सब मेरे द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था। जो मैं तुम लोगों से माँगता हूँ, वह बहुत ज्यादा नहीं है, क्योंकि मैंने तुम लोगों को इतना ज़्यादा दिया है और तुम लोगों ने मुझमें बहुत-कुछ देखा है। इसलिए, मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि सभी युगों के संतों के लिए मेरी गवाही दो, और यह मेरे हृदय की एकमात्र इच्छा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विश्वास के बारे में क्या जानते हो?' से उद्धृत

सभी लोगों को पृथ्वी पर मेरे कार्य के उद्देश्यों को समझने की आवश्यकता है, अर्थात् मैं अंतत: क्या प्राप्त करना कहता हूँ, और इस कार्य को पूरा करने से पहले मुझे इसमें कौन-सा स्तर प्राप्त कर लेना चाहिए। यदि आज तक मेरे साथ चलते रहने के बाद भी लोग यह नहीं समझते कि मेरा कार्य क्या है, तो क्या वे मेरे साथ व्यर्थ में नहीं चले? यदि लोग मेरा अनुसरण करते हैं, तो उन्हें मेरी इच्छा जाननी चाहिए। मैं पृथ्वी पर हज़ारों सालों से कार्य कर रहा हूँ और आज भी मैं अपना कार्य इसी तरह से जारी रखे हुए हूँ। यद्यपि मेरे कार्य में कई परियोजनाएँ शामिल हैं, किंतु इसका उद्देश्य अपरिवर्तित है; यद्यपि, उदाहरण के लिए, मैं मनुष्य के प्रति न्याय और ताड़ना से भरा हुआ हूँ, फिर भी मैं जो करता हूँ, वह उसे बचाने के वास्ते, और अपने सुसमाचार को बेहतर ढंग से फैलाने और मुनष्य को पूर्ण बना दिए जाने पर अन्यजाति देशों के बीच अपने कार्य को आगे बढ़ाने के वास्ते है। इसलिए आज, एक ऐसे वक्त, जब कई लोग लंबे समय से निराशा में गहरे डूब चुके हैं, मैं अभी भी अपना कार्य जारी रखे हुए हूँ, मैं वह कार्य जारी रखे हुए हूँ जो मनुष्य को न्याय और ताड़ना देने के लिए मुझे करना चाहिए। इस तथ्य के बावजूद कि जो कुछ मैं कहता हूँ, मनुष्य उससे उकता गया है और मेरे कार्य से जुड़ने की उसकी कोई इच्छा नहीं है, मैं फिर भी अपना कर्तव्य कर रहा हूँ, क्योंकि मेरे कार्य का उद्देश्य अपरिवर्तित है और मेरी मूल योजना भंग नहीं होगी। मेरे न्याय का कार्य मनुष्य को मेरी आज्ञाओं का बेहतर ढंग से पालन करने में सक्षम बनाना है, और मेरी ताड़ना का कार्य मनुष्य को अधिक प्रभावी ढंग से बदलने देना है। यद्यपि मैं जो करता हूँ, वह मेरे प्रबंधन के वास्ते है, फिर भी मैंने कभी ऐसा कुछ नहीं किया है, जो मनुष्य के लाभ के लिए न हो, क्योंकि मैं इस्राएल से बाहर के सभी देशों को इस्राएलियों के समान ही आज्ञाकारी बनाना चाहता हूँ, उन्हें वास्तविक मनुष्य बनाना चाहता हूँ, ताकि इस्राएल के बाहर के देशों में मेरे लिए पैर रखने की जगह हो सके। यही मेरा प्रबंधन है; यही वह कार्य है जिसे मैं अन्यजाति देशों के बीच पूरा कर रहा हूँ। अभी भी, बहुत-से लोग मेरे प्रबंधन को नहीं समझते, क्योंकि उन्हें ऐसी चीज़ों में कोई रुचि नहीं है, और वे केवल अपने स्वयं के भविष्य और मंज़िल की परवाह करते हैं। मैं चाहे कुछ भी कहता रहूँ, लोग उस कार्य के प्रति उदासीन हैं जो मैं करता हूँ, इसके बजाय वे अनन्य रूप से अपनी कल की मंज़िलों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। अगर चीज़ें इसी तरह से चलती रहीं, तो मेरा कार्य कैसे फैल सकता है? मेरा सुसमाचार पूरे संसार में कैसे फैल सकता है? जान लो, कि जब मेरा कार्य फैलेगा, तो मैं तुम्हें तितर-बितर कर दूँगा और उसी तरह मारूँगा, जैसे यहोवा ने इस्राएल के प्रत्येक कबीले को मारा था। यह सब इसलिए किया जाएगा, ताकि मेरा सुसमाचार समस्त पृथ्वी पर फैल सके और अन्यजाति देशों तक पहुँच सके, ताकि मेरा नाम वयस्कों और बच्चों द्वारा समान रूप से बढ़ाया जा सके, और मेरा पवित्र नाम सभी कबीलों और देशों के लोगों के मुँह से गूँजता रहे। ऐसा इसलिए है, ताकि इस अंतिम युग में, मेरा नाम अन्यजाति देशों के बीच गौरवान्वित हो सके, मेरे कर्म अन्यजातियों द्वारा देखे जा सकें और वे मुझे मेरे कर्मों के आधार पर सर्वशक्तिमान कह सकें, और मेरे वचन शीघ्र ही साकार हो सकें। मैं सभी लोगों को ज्ञात करवाऊँगा कि मैं केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर नहीं हूँ, बल्कि अन्यजातियों के समस्त देशों का भी परमेश्वर हूँ, यहाँ तक कि उनका भी परमेश्वर हूँ जिन्हें मैंने शाप दिया है। मैं सभी लोगों को यह देखने दूँगा कि मैं समस्त सृष्टि का परमेश्वर हूँ। यह मेरा सबसे बड़ा कार्य है, अंत के दिनों के लिए मेरी कार्य-योजना का उद्देश्य है, और अंत के दिनों में पूरा किया जाने वाला एकमात्र कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है' से उद्धृत

क्या तू "हर युग में परमेश्वर द्वारा व्यक्त स्वभाव" को ठोस ढंग से ऐसी भाषा में बता सकता है जो उपयुक्त तरीके से युग की सार्थकता को व्यक्त करे? क्या तू, जो अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है, परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का वर्णन विस्तार से कर सकता है? क्या तू स्पष्ट एवं सटीक ढंग से परमेश्वर के स्वभाव की गवाही दे सकता है? तू उन दयनीय, बेचारे और धार्मिकता के भूखे-प्यासे धर्मनिष्ठ विश्वासियों के साथ, जो तेरी देखरेख की आस लगाए बैठे हैं, अपने दर्शनों और अनुभवों को कैसे बांटेगा? किस प्रकार के लोग तेरी देखरेख की प्रतीक्षा कर रहे हैं? क्या तू सोच सकता है? क्या तू अपने कधों के बोझ, अपने आदेश और अपने उत्तरदायित्व से अवगत है? ऐतिहासिक मिशन का तेरा बोध कहाँ है? तू अगले युग में प्रधान के रूप में सही ढंग से काम कैसे करेगा? क्या तुझमें प्रधानता का प्रबल बोध है? तू समस्त पृथ्वी के प्रधान का वर्णन कैसे करेगा? क्या वास्तव में संसार के समस्त सजीव प्राणियों और सभी भौतिक वस्तुओं का कोई प्रधान है? कार्य के अगले चरण के विकास हेतु तेरे पास क्या योजनाएं हैं? तुझे चरवाहे के रूप में पाने हेतु कितने लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं? क्या तेरा कार्य काफी कठिन है? वे लोग दीन-दुखी, दयनीय, अंधे, भ्रमित, अंधकार में विलाप कर रहे हैं—मार्ग कहाँ है? उनमें टूटते तारे जैसी रोशनी के लिए कितनी ललक है जो अचानक नीचे आकर उन अंधकार की शक्तियों को तितर-बितर कर दे, जिन्होंने वर्षों से मनुष्यों का दमन किया है। कौन जान सकता है कि वे किस हद तक उत्सुकतापूर्वक आस लगाए बैठे हैं और कैसे दिन-रात इसके लिए लालायित रहते हैं? उस दिन भी जब रोशनी चमकती है, भयंकर कष्ट सहते, रिहाई से नाउम्मीद ये लोग, अंधकार में कैद रहते हैं; वे कब रोना बंद करेंगे? ये दुर्बल आत्माएँ बेहद बदकिस्मत हैं, जिन्हें कभी विश्राम नहीं मिला है। सदियों से ये इसी स्थिति में क्रूर बधंनों और अवरुद्ध इतिहास में जकड़े हुए हैं। उनकी कराहने की आवाज किसने सुनी है? किसने उनकी दयनीय दशा को देखा है? क्या तूने कभी सोचा है कि परमेश्वर का हृदय कितना व्याकुल और चिंतित है? जिस मानवजाति को उसने अपने हाथों से रचा, उस निर्दोष मानवजाति को ऐसी पीड़ा में दु:ख उठाते देखना वह कैसे सह सकता है? आखिरकार मानवजाति को विष देकर पीड़ित किया गया है। यद्यपि मनुष्य आज तक जीवित है, लेकिन कौन यह जान सकता था कि उसे लंबे समय से दुष्टात्मा द्वारा विष दिया गया है? क्या तू भूल चुका है कि शिकार हुए लोगों में से तू भी एक है? परमेश्वर के लिए अपने प्रेम की खातिर, क्या तू उन जीवित बचे लोगों को बचाने का इच्छुक नहीं है? क्या तू उस परमेश्वर को प्रतिफल देने के लिए अपना सारा ज़ोर लगाने को तैयार नहीं है जो मनुष्य को अपने शरीर और लहू के समान प्रेम करता है? सभी बातों को नज़र में रखते हुए, तू एक असाधारण जीवन व्यतीत करने के लिए परमेश्वर द्वारा प्रयोग में लाए जाने की व्याख्या कैसे करेगा? क्या सच में तुझमें एक धर्म-परायण, परमेश्वर-सेवी जैसा अर्थपूर्ण जीवन जीने का संकल्प और विश्वास है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुझे अपने भविष्य के मिशन पर कैसे ध्यान देना चाहिए?' से

सुसमाचार के विस्तृत प्रसार का क्या उद्देश्य है? जैसा कि काम के इस चरण के शुरू होने के बाद से ही लगातार कहा जा गया है, परमेश्वर इस बार एक नए युग का शुभारंभ करने का अपना कार्य करने के लिए आया है, एक नए युग को लाने और पुराने को समाप्त करने के लिए आया है, यह एक ऐसा तथ्य जिसे इस समय यहाँ पर मौजूद हम सभी लोगों में देखा जा सकता है और जिसे पहले ही पूरा किया जा चुका है। यानी, परमेश्वर नया कार्य कर रहा है, और यहाँ मौजूद लोगों ने इसे पहले ही स्वीकार कर लिया है और पहले ही व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग से बाहर निकल आए हैं, अब बाइबल नहीं पढ़ रहे हैं, अब क्रूस के अधीन नहीं रह रहे है, अब उद्धार करने वाले प्रभु यीशु का नाम नहीं पुकार रहे हैं, बल्कि इसके साथ ही आज के परमेश्वर का नाम लेकर प्रार्थना कर रहे हैं और उन वचनों को स्वीकार कर रहे हैं जो परमेश्वर अब व्यक्त करता है और उन्हें जीवित रहने के सिद्धांतों, मानव जीवन के उद्देश्यों और तरीकों के तौर पर लेते हैं। इस मायने में, क्या यहाँ मौजूद लोग पहले ही एक नए युग में प्रवेश नहीं कर चुके हैं? तब, अधिसंख्य लोग जिन्होंने इस सुसमाचार और इन वचनों को स्वीकार नहीं किया है, वे किस युग में जी रहे हैं? वे अभी भी अनुग्रह के युग में जी रहे हैं। अब इन लोगों को अनुग्रह के युग से निकालने और उन्हें इस नए युग में प्रवेश कराने का काम तुम लोगों का है। क्या तुम इस आदेश को केवल प्रार्थना के द्वारा और परमेश्वर का नाम पुकार कर पूरा कर सकते हो? क्या केवल थोड़े-से परमेश्वर के वचन का प्रवचन दे लेना पर्याप्त है? ऐसा बिल्कुल भी नहीं है; इसके लिए तुम सभी लोगों को सुसमाचार के प्रसार का कर्तव्य निभाने, परमेश्वर के वचन को प्रचारित करने, उन्हें आगे प्रसारित करने और उनकी पहुँच को बढ़ाने की ज़िम्मेदारी लेने की ज़रूरत है। "उनकी पहुँच को बढ़ाने" का क्या मतलब है? इसका मतलब है परमेश्वर के सुसमाचार को यहाँ पर मौजूद लोगों से भी आगे प्रसारित करना; इसका मतलब है और अधिक लोगों को परमेश्वर के नए कार्य से अवगत कराना, और तब उन्हें परमेश्वर के वचन का उपदेश देना। इसका मतलब है परमेश्वर के कार्य की गवाही देने के लिए अपने अनुभव का इस्तेमाल करना और उन लोगों को भी नए युग में ले आना। फिर, वे वैसे ही हो जाएंगे जैसे कि तुम लोग हो। परमेश्वर की मंशा बिल्कुल स्पष्ट है—उसके पास केवल तुम लोग ही नहीं होगे जिन्होंने उसके वचन को सुना और स्वीकार किया है और नए युग में प्रवेश करने के लिए उसका अनुसरण करना शुरू किया है; वह संपूर्ण मानव जाति को नए युग में ले जाना चाहता है। यही परमेश्वर की मंशा है, और यह एक सत्य है जिसे प्रत्येक व्यक्ति को, जो इस समय परमेश्वर का अनुसरण कर रहा है, समझना चाहिए। परमेश्वर नए युग में ले जाने के लिए किसी एक टुकड़ी या लोगों के किसी छोटे समूह की अगुवाई नहीं कर रहा है, बल्कि पूरी मानवता को नए युग में ले जा रहा है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए सुसमाचार का प्रचार करना ज़रूरी है, और ऐसा करने के लिए बहुत सी विधियों और माध्यमों का उपयोग करना ज़रूरी है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (1)' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर द्वारा उपयोग के लिए उपयुक्त होने की कामना करते हो तो तुम्हें परमेश्वर के कार्य के बारे में अवश्य जानना चाहिए, तुम्हें उस कार्य को अवश्य जानना चाहिए जो उसने पहले किया था (नए और पुराने नियमों में); और, इसके अतिरिक्त, तुम्हें उसके वर्तमान कार्य को भी अवश्य जानना चाहिए जिसका तात्पर्य है, तुम्हें 6,000 वर्षों में परमेश्वर द्वारा सम्पन्न कार्य के तीनों चरणों को अवश्य जानना चाहिए। यदि तुम्हें सुसमाचार फैलाने के लिए कहा जाता है, तो तुम परमेश्वर के कार्य को जाने बिना ऐसा करने में समर्थ नहीं होंगे। कोई तुमसे इस बारे में पूछ सकता है कि बाइबल, पुराने नियम और उस समय यीशु के कार्य और वचनों के बारे में तुम लोगों के परमेश्वर ने क्या कहा है। यदि तुम बाइबल की अंदरूनी कहानी नहीं बता सकते, तो वे आश्वस्त नहीं होंगे। उस समय, यीशु ने अपने चेलों के साथ पुराने नियम के बारे में काफ़ी बात की थी। उनके द्वारा पढ़ी गई हर एक चीज़, पुराने नियम में से ही थी; नया नियम तो यीशु को सलीब पर चढ़ाये जाने के अनेक दशकों बाद लिखा गया था। सुसमाचार फैलाने के लिए, सैद्धान्तिक रूप से तुम लोगों को बाइबल के भीतर की सच्चाई को और इस्राएल में परमेश्वर के कार्य को, यानि यहोवा द्वारा किये गए कार्य को समझना चाहिए और तुम लोगों को यीशु द्वारा किए गए कार्य को भी समझना है। ये ऐसे मामले हैं जिनके बारे में सभी लोग सर्वाधिक चिन्तित रहते हैं, और कार्य के उन दो चरणों की कहानी वह है जिसे उन्होंने नहीं सुना है। सुसमाचार को फैलाते समय, पहले पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य की बात को एक तरफ रख दो। कार्य का यह चरण उनकी पहुँच से परे है, क्योंकि जिसकी तुम लोग खोज करते हो, वह सर्वोच्च है—परमेश्वर का ज्ञान, और पवित्र आत्मा के कार्य का ज्ञान—और इन दोनों की तुलना में कोई भी चीज़ अधिक उत्कृष्ट नहीं है। यदि तुम पहले उसके बारे में बात करो जो सर्वोच्च है, तो यह उनके लिए बहुत ज्यादा होगा, क्योंकि किसी ने भी पवित्र आत्मा द्वारा किये गए ऐसे कार्य का अनुभव नहीं किया है; इसकी कोई मिसाल नहीं है, और इसे स्वीकार करना मनुष्य के लिए आसान नहीं है। उनके अनुभव, पवित्र आत्मा के द्वारा कभी-कभार किये गये कुछ कार्य के साथ, अतीत की पुरानी बातें हैं। जो वे अनुभव करते हैं वह पवित्र आत्मा का आज का कार्य, या आज परमेश्वर की इच्छा नहीं है। वे अभी भी, किसी नई रोशनी, या नई चीज़ों के बिना, पुराने अभ्यासों के अनुसार कार्य करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पदवियों और पहचान के सम्बन्ध में' से उद्धृत

सुसमाचार फैलाने के लिए, ताकि सच्चे हृदय से खोजने वाले सभी लोग आज किए गए कार्य का ज्ञान प्राप्त कर सकें और पूरी तरह से आश्वस्त हो सकें, तुम्हें प्रत्येक चरण में किए गए कार्य की अंदरूनी कहानी, उसके सार और महत्व की स्पष्ट समझ प्राप्त करनी चाहिए। इसे ऐसा बनाओ कि तुम्हारी संगति सुनकर अन्य लोग यहोवा के कार्य, यीशु के कार्य और, इससे भी बढ़कर, परमेश्वर के आज के समस्त कार्य को, और साथ ही कार्य के तीनों चरणों के बीच के संबंध और अंतर को समझ जाएँ। इसे ऐसा बनाओ कि इसे सुनने के बाद अन्य लोग देख लें कि तीनों चरण एक-दूसरे को बाधित नहीं करते, बल्कि वे सब एक ही पवित्रात्मा के कार्य हैं। यद्यपि वे अलग-अलग युग में कार्य करते हैं, उनके द्वारा किए गए कार्य की विषयवस्तु अलग है, और उनके द्वारा कहे गए वचन अलग हैं, किंतु जिन सिद्धांतों से वे कार्य करते हैं, वे एक-समान हैं। ये वे सबसे बड़े दर्शन हैं, जिन्हें परमेश्वर का अनुसरण करने वाले सभी लोगों को समझना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

परमेश्वर की गवाही देना मूलत: परमेश्वर के कार्य के बारे में तुम्हारा अपने ज्ञान को बताने का मामला है, और यह बताना है कि परमेश्वर कैसे लोगों को जीतता है, कैसे उन्हें बचाता है और कैसे उन्हें बदलता है; यह बताना है कि वह सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए कैसे लोगों का मार्गदर्शन करता है, उन्हें जीते जाने की, पूर्ण बनाए जाने की और बचाए जाने की अनुमति देता है। गवाही देने का अर्थ है उसके कार्य के बारे में बोलना, और उस सब के बारे में बोलना जिसका तुमने अनुभव किया है। केवल उसका कार्य ही उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है, उसका कार्य ही उसे सार्वजनिक रूप से उसकी समग्रता में प्रकट कर सकता है; उसका कार्य उसकी गवाही देता है। उसका कार्य और उसके कथन सीधे तौर पर पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं; वह जो कार्य करता है, उसे आत्मा द्वारा किया जाता है, और वह जो वचन बोलता है, वे आत्मा द्वारा बोले जाते हैं। ये बातें मात्र देहधारी परमेश्वर के ज़रिए व्यक्त की जाती हैं, फिर भी, असलियत में, वे आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। उसके द्वारा किए जाने वाले सारे कार्य और बोले जाने वाले सारे वचन उसके सार का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर, देहधारण करके और इंसान के बीच आकर, परमेश्वर न बोलता या कार्य न करता, और वह तुमसे उसकी वास्तविकता, उसकी सामान्यता और उसकी सर्वशक्तिमत्ता बताने के लिए कहता, तो क्या तुम ऐसा कर पाते? क्या तुम जान पाते कि आत्मा का सार क्या है? क्या तुम उसके देह के गुण जान पाते? चूँकि तुमने उसके कार्य के हर चरण का अनुभव कर लिया है, इसलिए उसने तुम लोगों को उसकी गवाही देने के लिए कहा। अगर तुम्हें ऐसा कोई अनुभव न होता, तो वो तुम लोगों को अपनी गवाही देने पर ज़ोर न देता। इस तरह, जब तुम परमेश्वर की गवाही देते हो, तो तुम न केवल उसकी सामान्य मानवीयता के बाह्य रूप की गवाही देते हो, बल्कि उसके कार्य की और उस मार्ग की भी गवाही देते हो जो वो दिखाता है; तुम्हें इस बात की गवाही देनी होती है कि तुम्हें उसने कैसे जीता है और तुम किन पहलुओं में पूर्ण बनाए गए हो। तुम्हें इस किस्म की गवाही देनी चाहिए। अगर, तुम कहीं भी जाकर चिल्लाओगे : "हमारा परमेश्वर कार्य करने आया है, और उसका कार्य सचमुच व्यवहारिक है! उसने हमें बिना अलौकिक कार्यों के, बिना चमत्कारों और करामातों के प्राप्त कर लिया है!" तो लोग पूछेंगे : "तुम्हारा यह कहने का क्या मतलब है कि वो चमत्कार और करामात नहीं दिखाता? बिना चमत्कार और करामात दिखाए उसने तुम्हें कैसे जीत लिया?" और तुम कहते हो : "वह बोलता है और उसने बिना चमत्कार और करामात दिखाए, हमें जीत लिया। उसके कामों ने हमें जीत लिया।" आखिरकार, अगर तुम्हारी बातों में सार नहीं है, अगर तुम कोई विशिष्ट बात न बता सको, तो क्या यह सच्ची गवाही है? देहधारी परमेश्वर जब लोगों को जीतता है, तो यह कार्य उसके दिव्य वचन करते हैं। मानवीयता इस कार्य को नहीं कर सकती; इसे कोई नश्वर इंसान नहीं कर सकता, उच्चतम क्षमता वाले लोग भी इस कार्य को नहीं कर सकते, क्योंकि उसकी दिव्यता किसी भी सृजित प्राणी से ऊँची है। यह लोगों के लिए असाधारण है; आखिरकार, सृष्टिकर्ता सृजित प्राणी से ऊँचा है; सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता से ऊँचा नहीं हो सकता; अगर तुम उससे ऊँचे होते, तो वो तुम्हें जीत नहीं पाता, वह तुम्हें इसलिए ही जीत पाता है क्योंकि वह तुमसे ऊँचा है। जो सारी मानवता को जीत सकता है वह सृष्टिकर्ता है, और अन्य कोई नहीं, केवल वही इस कार्य को कर सकता है। ये वचन "गवाही" हैं—ऐसी गवाही जो तुम्हें देनी चाहिए। तुमने धीरे-धीरे ताड़ना, न्याय, शुद्धिकरण, परीक्षण, विफलता और कष्टों का अनुभव किया है, और तुम्हें जीता गया है; तुमने देह की संभावनाओं का, निजी अभिप्रेरणाओं का, और देह के अंतरंग हितों का त्याग किया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के वचनों ने तुम्हें पूरी तरह से जीत लिया है। हालाँकि तुम उसकी अपेक्षाओं के अनुसार अपने जीवन में उतना आगे नहीं बढ़े हो, तुम ये सारी बातें जानते हो और तुम उसके काम से पूरी तरह से आश्वस्त हो। इस तरह, इसे वो गवाही कहा जा सकता है, जो असली और सच्ची है। परमेश्वर न्याय और ताड़ना का जो कार्य करने आया है, उसका उद्देश्य इंसान को जीतना है, लेकिन वह अपने कार्य को समाप्त भी कर रहा है, युग का अंत कर रहा है और समाप्ति का कार्य कर रहा है। वह पूरे युग का अंत कर रहा है, हर इंसान को बचा रहा है, इंसान को हमेशा के लिए पाप से मुक्त कर रहा है; वह पूरी तरह से अपने द्वारा सृजित मानव को हासिल कर रहा है। तुम्हें इस सब की गवाही देनी चाहिए। तुमने परमेश्वर के इतने सारे कार्य का अनुभव किया है, तुमने इसे अपनी आँखों से देखा है और व्यक्तिगत रुप से अनुभव किया है; एकदम अंत तक पहुँचकर तुम्हें सौंपे गए कर्तव्य को पूरा करने में असफल नहीं होना चाहिए। यह कितना दुखद होगा! भविष्य में, जब सुसमाचार फैलेगा, तो तुम्हें अपने ज्ञान के बारे में बताने में सक्षम होना चाहिए, अपने दिल में तुमने जो कुछ पाया है, उसकी गवाही देने में सक्षम होना चाहिए और कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए। एक सृजित प्राणी को यह सब हासिल करना चाहिए। परमेश्वर के कार्य के इस चरण के असली मायने क्या हैं? इसका प्रभाव क्या है? और इसका कितना हिस्सा इंसान पर किया जाता है? लोगों को क्या करना चाहिए? जब तुम लोग देहधारी परमेश्वर के धरती पर आने के बाद से उसके द्वारा किए सारे कार्य को साफ तौर पर बता सकोगे, तब तुम्हारी गवाही पूरी होगी। जब तुम लोग साफ तौर पर इन पाँच चीज़ों के बारे में बता सकोगे : उसके कार्य के मायने; उसकी विषय-वस्तु; उसका सार, वह स्वभाव जिसका प्रतिनिधित्व उसका कार्य करता है; उसके सिद्धांत, तब यह साबित होगा कि तुम परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम हो और तुम्हारे अंदर सच्चा ज्ञान है। मेरी तुमसे बहुत अधिक अपेक्षाएँ नहीं हैं, जो लोग सच्ची खोज में लगे हैं, वे उन्हें प्राप्त कर सकते हैं। अगर तुम परमेश्वर के गवाहों में से एक होने के लिए दृढ़संकल्प हो, तो तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर को किससे घृणा है और किससे प्रेम। तुमने उसके बहुत सारे कार्य का अनुभव किया है; उसके कार्य के ज़रिए, तुम्हें उसके स्वभाव का ज्ञान होना चाहिए, उसकी इच्छा को और इंसान से उसकी अपेक्षाओं को समझना चाहिए, और इस ज्ञान का उपयोग उसकी गवाही देने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

बहुत से लोग सुसमाचार के प्रसार को जिस तरह समझते हैं, उसमें अंतर हैं। कुछ लोग मानते हैं कि वे एक विशेष कर्तव्य को निभाने में लगे हुए हैं; वे सोचते हैं कि सुसमाचार के प्रसार का उनसे कोई संबंध नहीं है, और जिन सिद्धांतों, सत्यों, और परमेश्वर के इरादों को सुसमाचार के प्रसार का कर्तव्य निभाने के लिए समझना ज़रूरी है, उससे भी उनका कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए, जब सत्य के इस पहलू पर संगति की जाती है तो वे ध्यान से नहीं सुनते हैं। वे जो कुछ भी सुनते हैं वह एक कान से अंदर और दूसरे से बाहर निकल जाता है, और सुन लेने के बाद उन्हें पता ही नहीं होता कि क्या बताया गया था। उन्हें लगता है कि उन्हें इन सत्यों को समझने की ज़रूरत नहीं है। कुछ अन्य का मानना है कि जबसे उन्होंने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया तभी से एक अगुवा के रूप में काम करते आ रहे हैं; उनका मानना है कि वे गुणवत्ता और क्षमता वाले लोग हैं, उनका अगुवा बनना पहले से ही तय कर दिया गया है, और उन्हें परमेश्वर द्वारा दिया गया काम और उनके जीवन भर का मिशन अगुवा बनना है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सुसमाचार के प्रसार के काम से उनका कोई लेना-देना नहीं है। इसीलिए, जब सुसमाचार के प्रसार का सत्य बोला जाता है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि वे सुन रहे हैं, लेकिन वे लोग अपने हृदय में इसे कोई महत्व नहीं देते हैं। इसमें, सत्य के प्रति लोगों का रवैया देखा जासकता है। अतः, मैं सभी लोगों को चेतावनी देता हूँ और उन सभी को बता देना चाहता हूँ कि सुसमाचार का प्रसार करना, किसी एक प्रकार या समूह के लोगों का विशेष काम नहीं है; यह हर उस व्यक्ति का काम है जो परमेश्वर का अनुसरण करता है। मुझे लोगों को यह क्यों समझाना चाहिए? और उन्हें इसे समझने की ज़रूरत क्यों है? ये वह मिशन और काम है जिसे प्रत्येक सृजित प्राणी और परमेश्वर के प्रत्येक अनुयायी को स्वीकार करना चाहिए, चाहे वह बूढ़ा हो या जवान, पुरुष हो या महिला। यदि यह मिशन तुम्हें मिलता है और इसके लिए तुमसे अपेक्षा होती है कि तुम अपना शरीर अर्पित करो, अपने आपको खपाओ, और क़ीमत चुकाओ, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें उसे स्वीकार कर लेना चाहिए जिसका बीड़ा उठाने का नैतिक दायित्व तुम पर है। यही सत्य है, और इसे तुम्हें समझना चाहिए। यह खोखले सूत्रवाक्यों के बारे में नहीं है, न ही ये किसी आडंबरपूर्ण वाक्पटुता का कोई उदाहरण है, न ही कोई राय है; यह सत्य है। और क्या चीज़ इसे सत्य बनाती है? ऐसा इसलिए है क्योंकि, गुज़रते समय द्वारा लाए गए बदलाव के बावजूद, या युग कैसे बदलता है, भूगोल और अंतरिक्ष में कैसे परिवर्तन होता है, इन सब से परे सुसमाचार का प्रसार करना और परमेश्वर की गवाही देना शाश्वत रूप से सत्य है; इसका अर्थ, इसका मूल्य, और इसका संविन्यास अपरिवर्तनीय हैं। यह समय बीतने के साथ या भौगोलिक स्थान के बदलाव से नहीं बदलता है। यह शाश्वत रूप से मौजूद है, और यही वह चीज़ है जिसे तुम्हें स्वीकार करना है, अभ्यास में लाना है, और एक सृजित प्राणी के रूप में तुम जिस तरह से जीवन व्यतीत करते हो, उसमें प्रकट करना है। यही सत्य है। कुछ लोग कहते हैं कि इसकी संभावना है कि वे सत्य के इस पहलू के संपर्क में आए बिना ही अपना पूरा जीवन गुज़ार दें, फिर भी यह सत्य का वह पहलू है जिसे लोगों को ज़रूर समझना चाहिए। और ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि सुसमाचार का प्रसार करने के लिए कोई निश्चित समय, निश्चित भौगोलिक स्थान, या निश्चित कार्मिक नहीं हैं। इसलिए, तुम जब इस सत्य को समझ लेते हो, तो तुम अपने हृदय में जान जाओगे कि : "परमेश्वर के नए कार्य का प्रवचन देना और लोगों को बचाने के परमेश्वर के कार्य के सुसमाचार का उपदेश देना मेरा काम है; स्थान या समय की परवाह किए बिना, अपनी स्थिति या भूमिका या वर्तमान में जिस कर्तव्य को मैं निभा रहा हूँ उसकी परवाह किए बिना, मेरा दायित्व है कि मैं जाऊं और परमेश्वर के नए कार्य की ख़ुशख़बरी का प्रसार करूं। जब भी मुझे अवसर मिले या मेरे पास ख़ाली समय हो इसे आगे पहुँचाना मेरा अनुग्रहीत कर्तव्य है।" क्या ये वर्तमान में अधिकांश लोगों के विचार हैं? (नहीं।) अधिकांश लोग सोचते हैं : "मेरे पास फिलहाल एक नियत कार्य है; मैं आजकल अध्ययन करने में लगा हूँ और एक निश्चित पेशे और विशेषज्ञता पाने में तल्लीन हूँ, इसलिए सुसमाचार का प्रसार करने से मेरा कुछ भी लेना-देना नहीं है।" यह किस प्रकार का रवैया है? यह अपने कर्तव्य और अपने मिशन से जी चुराने वाला रवैया है, और यह सुसमाचार के प्रसार के कर्तव्य के प्रति नकारात्मक रवैया है। जब लोग मनुष्य के उद्धार के परमेश्वर के सुसमाचार, इस आदेश को प्रसारित करने का बोझ नहीं उठाते और उस पर विचार नहीं करते, तो क्या वे विवेक या मानवता प्रकट कर रहे होते हैं? यदि तुम सहयोग करने, अपनी विचारशीलता को बढ़ाने, या ज़िम्मेदारी लेने में फुरतीले और सक्रिय नहीं हो तो तुम केवल नकारात्मक और निष्क्रिय प्रतिक्रिया दे रहे हो यह एक नासमझी भरा रवैया है। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि तुम कहाँ हो या तुम किस कर्तव्य को निभा रहे हो, और इससे भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि तुम्हारे काम के साथ कौन सा पेशा या विशिष्टता जुड़ी हुई है, तुम्हारे कार्य के सबसे महत्वपूर्ण नतीजों में से एक है, मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के कार्य के सुसमाचार का प्रसार करने और उसकी गवाही देने में सक्षम होना। एक सृजित प्राणी को कम से कम इतना तो करना ही चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (1)' से उद्धृत

सुसमाचार को फैलाने में, तुम्हारा दायित्व हर उस व्यक्ति के साथ, जिस तक तुम इसे फैलाते हो, ईमानदारी से पेश आना है, जो तुम्हें पूरा करना चाहिए। तुम्हें किसी भी व्यक्ति को अपनी लापरवाही के कारण जाने नहीं देना है। इसका अर्थ है कि तुम्हें हर उस व्यक्ति को, जिसके साथ तुम सुसमाचार साझा करते हो, शुद्ध अंतःकरण से समझने की चेष्टा करनी है। यदि उनका मन सुसमाचार के प्रसार के सिद्धांतों के अनुरूप है, तो तुम्हें उन्हें इसे स्वीकार करने के लिए मनाने का प्रयास करना चाहिए। तुम उन्हें कैसे मनाओगे? तुम्हें अपना दायित्व पूरा करने के लिए हर संभव उपाय सोचना चाहिए, तुम्हें क़ीमत चुकानी चाहिए, तुम्हें कुछ तकनीक और तरीके खोजने होंगे। संक्षेप में, तुम्हारा सारा ज़ोर, पूरे दिल से, इस तरह से कि तुम्हारा अंतःकरण बेदाग़ रहे, अपना उत्तरदायित्व पूरा करने पर होना चाहिए। दस-बीस वर्षों के उपरान्त, जब तुम उस व्यक्ति को याद करोगे जिसके साथ तुमने सुसमाचार साझा किया था, तब तुम महसूस करोगे कि तुमने अपनी पूरी शक्ति का उपयोग किया था, और यद्यपि उसने इसे स्वीकार नहीं किया, किन्तु तुम्हारा अंतःकरण साफ़ होगा। यदि तुम अपने दिल में अब भी असहज महसूस करते हो और ऐसा लगता है कि तुम्हें उन्हें मना लेना चाहिए था, किन्तु तुम्हारी अपनी क्षणिक लापरवाही या आलस्य के कारण, या क्षणिक भावना या स्वछंदता के कारण, या इसलिए कि तुमने उस अवसर को झपटा नहीं, वह मत-परिवर्तन की संभावना वाला व्यक्ति हाथ से चला गया, तो यह तुम पर एक कलंक होगा। कलंकित होने पर, क्या तुम परमेश्वर की भर्त्सना के भागी होगे? अब इस छोटे से मसले के लिए परमेश्वर तुम्हारी भर्त्सना करने की हद तक नहीं जाएगा; वह तिल का ताड़ बनाने की हद तक नहीं जाएगा, परन्तु यदि इस मुद्दे को सत्य से तौलकर उसके सही परिप्रेक्ष्य में रखा जाए, तो इतना तो कहना ही होगा कि तुमने अपना दायित्व पूरा नहीं किया, और इसलिए तुम परमेश्वर के न्याय के भागी होगे। यह भर्त्सना के योग्य तो नहीं है, किन्तु इस प्रकार परमेश्वर तुम्हारे उल्लंघनों और दोषों का न्याय करेगा। अतएव, इस प्रकार की त्रुटियों को कम करने या उनसे बचने के उद्देश्य से लोगों को अपने संपर्क में आने वाले मत-परिवर्तन की संभावना वाले प्रत्येक व्यक्ति के साथ व्यवहार में अधिक सक्रिय तरीका अपनाना चाहिए। यदि मत-परिवर्तन हेतु संभावित व्यक्ति बार-बार कोई प्रश्न पूछता है, तो तुम्हें कैसे उत्तर देना चाहिए? तुम्हें उसका उत्तर देने में, उसके प्रश्न के समाधान के लिए हर संभव उपाय सोचने में लग रहे समय और परेशानियों का बुरा नहीं मानना चाहिए, जब तक कि वह समझ न जाए और आश्वस्त न हो जाए। तभी तुम्हारा दायित्व पूरा होगा, और तुम्हारा हृदय अपराध-बोध से मुक्त होगा। क्या इसका अर्थ उनकी ओर से अपराध-बोध से मुक्त होना है? नहीं, इसका यह अर्थ नहीं है। तुम परमेश्वर की ओर से अपराध-बोध से मुक्त होगे, क्योंकि यह कर्तव्य, यह उत्तरदायित्व तुम्हें परमेश्वर ने सौंपा था। तुम जो भी करते हो, जब वह परमेश्वर के समक्ष किया जाता है, परमेश्वर को साक्षी मानकर किया जाता है, जब सब कुछ परमेश्वर के वचनों के अनुसार, सत्य के सिद्धांतों के अनुसार किया जाता है, तब तुम्हारे मन के नियत भाव ऊँचे उठ जाएँगे। तुम्हारे मनोभाव एक बार ऊंचे उठ गए, तो तुम जो भी करोगे और जो भी कहोगे, उसे लोग मानेंगे और आसानी से स्वीकार कर लेंगे। यदि तुम्हारे शब्द रोशन करने वाले और व्यावहारिक हैं, तो तुम कहा-सुनी और टकराव से बच सकोगे, और दूसरों को सन्मार्ग पर लाओगे, जैसे तुम लाते हो। तुम गवाही और सुसमाचार के प्रसार पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों से भी बच पाओगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सुसमाचार का प्रसार करना सभी विश्वासियों का गौरवपूर्ण कर्तव्य है' से उद्धृत

सुसमाचार फैलाना हर किसी का कर्तव्य और दायित्व है। किसी भी समय, चाहे हम जो कुछ भी सुनें या जो कुछ भी देखें, या चाहे जिस भी प्रकार के व्यवहार का सामना करें, हमें सुसमाचार फैलाने के इस दायित्व पर सदा अडिग रहना चाहिए। नकारात्मकता या दुर्बलता के कारण किसी भी परिस्थिति में हम इस कर्तव्य को तिलांजलि नहीं दे सकते। सुसमाचार फैलाने के कर्तव्य का निर्वहन सुचारु और आसान नहीं होता, अपितु खतरों से भरा होता है। जब तुम लोग सुसमाचार का प्रसार करोगे, तब तुम्हारा सामना देवदूतों या दूसरे ग्रहों के प्राणियों या रोबोटों से नहीं होगा। तुम लोगों का सामना केवल दुष्ट और भ्रष्ट मनुष्यों, जीवित दानवों, जानवरों से होगा—वे सब मनुष्य हैं जो इस बुरे स्थान पर रहते हैं और जिन्हें शैतान ने गहराई तक भ्रष्ट कर दिया है, और जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। इसलिए सुसमाचार के प्रसार की प्रक्रिया में निश्चित रूप से सभी प्रकार के खतरे हैं, क्षुद्र लांछन, उपहास और ग़लतफ़हमियों को तो छोड़ ही दें, जो और भी अधिक हैं। यदि तुम सुसमाचार फैलाने को सचमुच अपनी ज़िम्मेदारी, उत्तरदायित्व और कर्तव्य मानते हो, तो तुम इन चीज़ों पर सही ढंग से ध्यान दे पाओगे और इन्हें सही ढंग से सँभाल भी पाओगे, और तुम अपने दायित्व और अपने कर्तव्य को तिलांजलि नहीं दोगे, और न ही इन चीजों के कारण तुम सुसमाचार को फैलाने और परमेश्वर के बारे में गवाही देने के अपने मूल मंतव्य से भटकोगे, क्योंकि यह तुम्हारा कर्तव्य है। इस कर्तव्य को कैसे समझना चाहिए? तुम जो जीवन जी रहे हो, उसका महत्त्व और प्राथमिक उत्तरदायित्व अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य के अच्छे समाचार को फैलाना है और परमेश्वर के कार्य के सुसमाचार का प्रसार करना है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सुसमाचार का प्रसार करना सभी विश्वासियों का गौरवपूर्ण कर्तव्य है' से उद्धृत

यदि तुम स्वीकार करते हो कि तुम सृजित प्राणी हो, तो तुम्हें सुसमाचार प्रसारित करने का दायित्व पूरा करने और अपना कर्तव्य समुचित रूप से निभाने की ख़ातिर कष्ट भुगतने और क़ीमत चुकाने के लिए स्वयं को तैयार करना होगा। क़ीमत कोई शारीरिक व्याधि या कठिनाई, या तुम्हारे परिवेश से उत्पन्न होने वाला उत्पीड़न या सांसारिक लोगों की ग़लतफहमियाँ, साथ ही मत-परिवर्तन की संभावना वाले व्यक्तियों द्वारा पिटाई, डाँट-फटकार और त्याग दिया जाना; या सबसे कठोर परिस्थितियों में, तुम्हारे जीवन को ख़तरे में डाल दिया जाना भी हो सकती है। सुसमाचार फैलाने के दौरान, यह संभव है कि परमेश्वर का कार्य पूरा होने से पहले ही तुम्हारी मृत्यु हो जाए, और तुम परमेश्वर की महिमा का दिन देखने के लिए जीवित न बचो। तुम्हें इसके लिए तैयार रहना चाहिए। इसका उद्देश्य तुम लोगों को भयभीत करना नहीं है; यह सच्चाई है। तथापि, अब जब मैंने यह स्पष्ट कर दिया है, और तुमने इसे समझ लिया है, यदि अब भी तुम लोगों की यही आकांक्षा है, और यह अभी बदली नहीं है, तो यह सिद्ध करता है कि तुम्हारा एक निश्चित आध्यात्मिक कद है। यह मानकर मत चलो कि धार्मिक स्वतंत्रता और मानव अधिकारों वाले इन समुद्रपार राष्ट्रों में सुसमाचार का प्रसार खतरे से खाली होगा, या परमेश्वर के महान सामर्थ्य और अधिकार के बल पर, और परमेश्वर के संरक्षण में, परमेश्वर के आशीष से, सब कुछ सुचारू ढंग से होता जाएगा—यह मानव कल्पना की उड़ान है। बुद्धिमानी के बिना तुम सुसमाचार का प्रसार नहीं कर सकते, और विपत्तियाँ प्रायः अज्ञानी पर ही टूटती हैं। फरीसी भी परमेश्वर में विश्वास करते थे, फिर भी उन्होंने देहधारी परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाकर मार डाला। क्या तुम्हें लगता है कि आज का धर्मपरायण संसार इस प्रकार का काम नहीं करेगा? भूलो मत कि जिन्होंने प्रभु यीशु को सलीब पर चढ़ाकर मार डाला, वे विश्वासी थे। केवल उन्हीं के पास इस प्रकार का काम करने का मौक़ा था। अविश्वासी इन चीजों की परवाह नहीं करते थे। ये विश्वासी ही थे जिन्होंने प्रभु यीशु को सलीब पर चढ़ाकर मार डालने के लिए सरकार के साथ साँठ-गाँठ की थी। इतना ही नहीं, उन अनुयायियों की मौत कैसे हुई? उनमें ऐसे अनुयायी थे जिन्हें पत्थरों से मार डाला गया, घोड़े से बाँध कर घसीटा गया, सूली पर उलटा लटका दिया गया, पाँच घोड़ों से खिंचवाकर उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए—हर प्रकार की मौत उन पर टूटी। उनकी मृत्यु का कारण क्या था? क्या उन्हें उनके अपराधों के लिए कानूनी तौर पर फाँसी दी गई थी? उनकी भर्त्सना की गई, पीटा गया, डाँटा-फटकारा गया और मार डाला गया, क्योंकि उन्होंने प्रभु का सुसमाचार फैलाया था और उन्हें इस संसार के लोगों ने ठुकरा दिया था—इस तरह वे शहीद हुए। हम उन शहीदों के निर्णायक अंत की, या उनके व्यवहार की परमेश्वर की परिभाषा की बात न करें, बल्कि यह पूछें : जब उनका अंत आया, तब जिस तरह उनके जीवन का अंत हुआ, क्या वह मानव धारणाओं के अनुरूप था? मानव धारणाओं के दृष्टिकोण से, यदि उन्होंने परमेश्वर के कार्य का प्रसार करने की इस प्रकार की क़ीमत चुकाई, तो उन्हें कम से कम अच्छी मौत मिलनी चाहिए थी। किन्तु ये लोग दुखद ढंग से अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए। यह मानव धारणाओं से मेल नहीं खाता, किन्तु परमेश्वर ने ठीक यही किया—परमेश्वर ने यह होने दिया। परमेश्वर द्वारा यह होने देने में कौन-सा सत्य खोजा जा सकता है? क्या परमेश्वर द्वारा उन्हें इस प्रकार मरने देना उसका श्राप और भर्त्सना थी, या यह उसकी योजना और आशीष था? यह दोनों ही नहीं था। यह क्या था? अब लोग अत्यधिक मानसिक व्यथा के साथ उनकी मृत्यु पर विचार करते हैं, किन्तु चीज़ें इसी प्रकार थीं : परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग इसी तरीक़े से मारे गए, और यह लोगों के हृदय को व्यथित कर देता है। इसे कैसे समझाया जाए? जब हम इस विषय को छुएँ, तो तुम लोग स्वयं को उनकी स्थिति में रखो; क्या तब तुम लोगों के हृदय उदास होते हैं, और क्या तुम भीतर ही भीतर पीड़ा का अनुभव करते हो? तुम सोचते हो, "इन लोगों ने परमेश्वर का सुसमाचार फैलाने का अपना कर्तव्य निभाया, इन्हें अच्छा इंसान माना जाना चाहिए, तो फिर उनका अंत, उनका परिणाम ऐसा कैसे हो सकता है?" वास्तव में, उनके शरीर इसी तरह मृत्यु को प्राप्त हुए और चल बसे; यह मानव संसार से प्रस्थान का उनका अपना माध्यम था, तो भी इसका यह अर्थ नहीं है कि उनका परिणाम भी वैसा ही था। उनकी मृत्यु और प्रस्थान से, वो चाहे जैसा और जिस प्रकार भी घटित हुआ हो, उससे परमेश्वर उनके जीवन के, उन सृजित प्राणियों के अंतिम परिणाम को परिभाषित नहीं करता। तुम्हें यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए। इसके विपरीत, उन्होंने इस संसार की भर्त्सना करने और परमेश्वर के कर्मों की गवाही देने के लिए ठीक उन्हीं साधनों का उपयोग किया। सृजित प्राणियों ने अपने सर्वाधिक बहुमूल्य जीवन का उपयोग किया—उन्होंने परमेश्वर के कर्मों की गवाही देने के लिए अपने जीवन के अंतिम क्षण का उपयोग किया, परमेश्वर के महान सामर्थ्य की गवाही देने के लिए उपयोग किया, और शैतान तथा इस संसार के समक्ष यह घोषित करने के लिए किया कि परमेश्वर के कर्म सही हैं, प्रभु यीशु परमेश्वर है, वह प्रभु है, और परमेश्वर का देहधारी शरीर है; यहां तक कि अपने जीवन के बिल्कुल अंतिम क्षण तक उन्होंने प्रभु यीशु का नाम कभी नहीं छोड़ा। क्या यह इस संसार के ऊपर न्याय का एक रूप नहीं था? उन्होंने अपने जीवन का उपयोग किया, संसार के समक्ष यह घोषित करने के लिए, मानव प्राणियों के समक्ष यह पुष्टि करने के लिए कि प्रभु यीशु प्रभु है, प्रभु यीशु मसीह है, वह परमेश्वर का देहधारी शरीर है, समस्त मानवजाति के लिए उसने जो छुटकारे का कार्य गढ़ा, उसी के कारण मानवता जीवित है—यह सच्चाई कभी बदलने वाली नहीं है। उन्होंने किस सीमा तक अपने कर्तव्य का पालन किया? क्या यह अंतिम सीमा तक किया गया था? यह अंतिम सीमा कैसे परिलक्षित होती थी? उन्होंने अपने जीवन से क़ीमत चुकाई। परिवार, सम्पदा, और इस जीवन की भौतिक वस्तुएँ, सभी बाहरी उपादान हैं; अंतर्मन की एकमात्र चीज़ जीवन है। प्रत्येक जीवित व्यक्ति के लिए, जीवन सर्वाधिक सहजने योग्य है, सर्वाधिक बहुमूल्य है, और असल में कहा जाए तो ये लोग परमेश्वर के कार्य की सांसारिक लोगों द्वारा स्वीकृति के बदले, पुष्टि के रूप में, अपनी सर्वाधिक बहुमूल्य चीज़ अर्पित कर पाए, और वह चीज़ है—जीवन। अपनी मृत्यु के दिन तक उन्होंने परमेश्वर का नाम नहीं छोड़ा, न ही परमेश्वर के कार्य को नकारा, और उन्होंने जीवन के अपने अंतिम क्षण का उपयोग इस तथ्य के अस्तित्व की गवाही देने के लिए किया—क्या यह गवाही का सर्वोच्च रूप नहीं है? यह अपना कर्तव्य निभाने का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा है; अपना उत्तरदायित्व इसी तरह पूरा किया जाता है। जब शैतान ने उन्हें धमकाया और आतंकित किया, और अंत में, यहां तक कि जब उसने उनसे अपने जीवन की क़ीमत अदा करवाई, तब भी उन्होंने अपने उत्तरदायित्व से हाथ पीछे नहीं खींचे। यह उनके कर्तव्य-निर्वहन की पराकाष्ठा है। इससे मेरा क्या आशय है? क्या मेरा आशय यह है कि तुम लोग भी परमेश्वर की गवाही देने और सुसमाचार फैलाने के लिए इसी तरीक़े का उपयोग करो? तुम्हें हूबहू ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है, किन्तु तुम्हें समझना होगा कि यह तुम्हारा दायित्व है, यदि परमेश्वर ऐसा चाहे, तो तुम्हें इसे नैतिक कर्तव्य के रूप में स्वीकार करना चाहिए। आज लोगों के मन में भय और चिंता व्याप्त है, किंतु ये अनुभूतियां किस काम की हैं? यदि परमेश्वर तुमसे ऐसा करने के लिए न कहे, तो इसके बारे में चिंता करने का क्या लाभ है? यदि परमेश्वर को तुमसे ऐसा कराना है, तो तुम्हें इस उत्तरदायित्व से न तो मुँह मोड़ना चाहिए और न ही इसे ठुकराना चाहिए। तुम्हें आगे बढ़कर सहयोग करना और निश्चिंत होकर इसे स्वीकारना चाहिए। मृत्यु चाहे जैसे हो, किंतु उन्हें शैतान के सामने, उसके हाथों में नहीं मरना चाहिए। यदि मरना ही है, तो उन्हें परमेश्वर के हाथों में मरना चाहिए। लोग परमेश्वर से आए हैं, और उन्हें परमेश्वर के पास ही लौटना है—यही समझ और प्रवृत्ति सृजित प्राणियों की होनी चाहिए। यही अंतिम सत्य है, जिसे सुसमाचार को फैलाने के अपने कर्तव्य के निर्वहन में हर किसी को समझना चाहिए—देहधारी परमेश्वर द्वारा अपना कार्य करने और मानवजाति को बचाने के सुसमाचार को फैलाने और उसकी गवाही देने के लिए इंसान को अपने जीवन की क़ीमत चुकानी ही होगी। यदि तुम्हारे मन में यह अभिलाषा है, यदि तुम इसे पूरा कर सकते हो, तो बहुत अच्छी बात है। यदि तुम्हारे मन में अभी तक इस प्रकार की अभिलाषा नहीं है, तो तुम्हें कम से कम इतना तो करना ही चाहिए कि अपने सामने उपस्थित इस दायित्व और कर्तव्य को अच्छी तरह पूरा करो, और परमेश्वर को विश्राम दो। शायद तब, ज्यों-ज्यों महीने और वर्ष बीतेंगे और तुम्हारे अनुभव और आयु में बढ़ोतरी होगी, और सत्य की तुम्हारी समझ गहरी होती जाएगी, तो तुम्हें अहसास होगा कि तुम्हारे जीवन की अंतिम साँस तक भी, परमेश्वर के सुसमाचार को फैलाने के कार्य के लिए अपना जीवन न्योछावर कर देना तुम्हारा अनिवार्य कर्तव्य और उत्तरदायित्व है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सुसमाचार का प्रसार करना सभी विश्वासियों का गौरवपूर्ण कर्तव्य है' से उद्धृत

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