23. परमेश्वर की इच्छा को समझने के प्रयास के सिद्धांत

(1) मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं के सत्य की तलाश करने लिए के, व्यक्ति को उसके वचनों का उपयोग करना चाहिए। एक विश्वसनीय नींव खोजो, और कभी भी मानवीय धारणाओं या कल्पनाओं को अपना मार्गदर्शन करने न दो।

(2) जब मन में परमेश्वर के बारे में धारणाएँ और गलतफहमियाँ होती हैं, तो व्यक्ति को उनका हल करने के लिए सत्य की तलाश करनी चाहिए, न कि उसे दंभी और आत्म-तुष्ट होना चाहिए। मनुष्य के पास सत्य नहीं होता, केवल भ्रष्टता होती है।

(3) सत्य-सिद्धांत से और कर्तव्य निभाने से जुड़े मामलों में सत्य समझने की कोशिश करो, और मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं को सुधारो। केवल इसी प्रकार व्यक्ति परमेश्वर की इच्छा ठीक से समझ सकता है।

(4) परीक्षण और शोधन के बीच, व्यक्ति को परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर की इच्छा और उसकी अपेक्षाओं को समझना चाहिए। सत्य का अभ्यास करो, परमेश्वर के प्रति समर्पण करो और अपनी गवाही में दृढ़ रहो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

आज परमेश्वर तुम लोगों का न्याय करता है, तुम लोगों को ताड़ना देता है, और तुम्हारी निंदा करता है, लेकिन तुम्हें यह अवश्य जानना चाहिए कि तुम्हारी निंदा इसलिए की जाती है, ताकि तुम स्वयं को जान सको। वह इसलिए निंदा करता है, शाप देता है, न्याय करता और ताड़ना देता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको, ताकि तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हो सके, और, इसके अलावा, तुम अपनी कीमत जान सको, और यह देख सको कि परमेश्वर के सभी कार्य धार्मिक और उसके स्वभाव और उसके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं, और वह मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है, और कि वह धार्मिक परमेश्वर है, जो मनुष्य को प्यार करता है, उसे बचाता है, उसका न्याय करता है और उसे ताड़ना देता है। यदि तुम केवल यह जानते हो कि तुम निम्न हैसियत के हो, कि तुम भ्रष्ट और अवज्ञाकारी हो, परंतु यह नहीं जानते कि परमेश्वर आज तुममें जो न्याय और ताड़ना का कार्य कर रहा है, उसके माध्यम से वह अपने उद्धार के कार्य को स्पष्ट करना चाहता है, तो तुम्हारे पास अनुभव प्राप्त करने का कोई मार्ग नहीं है, और तुम आगे जारी रखने में सक्षम तो बिल्कुल भी नहीं हो। परमेश्वर मारने या नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि न्याय करने, शाप देने, ताड़ना देने और बचाने के लिए आया है। उसकी 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना के समापन से पहले—इससे पहले कि वह मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी का परिणाम स्पष्ट करे—पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य उद्धार के लिए होगा; इसका प्रयोजन विशुद्ध रूप से उन लोगों को पूर्ण बनाना—पूरी तरह से—और उन्हें अपने प्रभुत्व की अधीनता में लाना है, जो उससे प्रेम करते हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर लोगों को कैसे बचाता है, यह सब उन्हें उनके पुराने शैतानी स्वभाव से अलग करके किया जाता है; अर्थात्, वह उनसे जीवन की तलाश करवाकर उन्हें बचाता है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो उनके पास परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का कोई रास्ता नहीं होगा। उद्धार स्वयं परमेश्वर का कार्य है, और जीवन की तलाश करना ऐसी चीज़ है, जिसे उद्धार स्वीकार करने के लिए मनुष्य को करना ही चाहिए। मनुष्य की निगाह में, उद्धार परमेश्वर का प्रेम है, और परमेश्वर का प्रेम ताड़ना, न्याय और शाप नहीं हो सकता; उद्धार में प्रेम, करुणा और, इनके अलावा, सांत्वना के वचनों के साथ-साथ परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए असीम आशीष समाविष्ट होने चाहिए। लोगों का मानना है कि जब परमेश्वर मनुष्य को बचाता है, तो ऐसा वह उन्हें अपने आशीषों और अनुग्रह से प्रेरित करके करता है, ताकि वे अपने हृदय परमेश्वर को दे सकें। दूसरे शब्दों में, उसका मनुष्य को स्पर्श करना उसे बचाना है। इस तरह का उद्धार एक सौदा करके किया जाता है। केवल जब परमेश्वर मनुष्य को सौ गुना प्रदान करता है, तभी मनुष्य परमेश्वर के नाम के प्रति समर्पित होता है और उसके लिए अच्छा करने और उसे महिमामंडित करने का प्रयत्न करता है। यह मानवजाति के लिए परमेश्वर की अभिलाषा नहीं है। परमेश्वर पृथ्वी पर भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए कार्य करने आया है—इसमें कोई झूठ नहीं है। यदि होता, तो वह अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित ही नहीं आता। अतीत में, उद्धार के उसके साधन में परम प्रेम और करुणा दिखाना शामिल था, यहाँ तक कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। वर्तमान अतीत जैसा नहीं है : आज तुम लोगों को दिया गया उद्धार अंतिम दिनों के समय में प्रत्येक व्यक्ति का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण किए जाने के दौरान घटित होता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन प्रेम या करुणा नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है, ताकि मनुष्य को अधिक अच्छी तरह से बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है, वह ताड़ना, न्याय और निर्दय मार है, लेकिन यह जान लो : इस निर्मम मार में थोड़ा-सा भी दंड नहीं है। मेरे वचन कितने भी कठोर हों, तुम लोगों पर जो पड़ता है, वे कुछ वचन ही हैं, जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत हो सकते हैं, और मैं कितना भी क्रोधित क्यों न हूँ, तुम लोगों पर जो पड़ता है, वे फिर भी कुछ शिक्षाप्रद वचन ही हैं, और मेरा आशय तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना या तुम लोगों को मार डालना नहीं है। क्या यह सब तथ्य नहीं है? जान लो कि आजकल हर चीज़ उद्धार के लिए है, चाहे वह धार्मिक न्याय हो या निर्मम शुद्धिकरण और ताड़ना। भले ही आज प्रत्येक व्यक्ति का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण किया जा रहा हो या मनुष्य की श्रेणियाँ प्रकट की जा रही हों, परमेश्वर के समस्त वचनों और कार्य का प्रयोजन उन लोगों को बचाना है, जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं। धार्मिक न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से लाया जाता है, और निर्मम शुद्धिकरण उन्हें निर्मल बनाने के लिए किया जाता है; कठोर वचन या ताड़ना, दोनों शुद्ध करने के लिए किए जाते हैं और वे उद्धार के लिए हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए' से उद्धृत

क्या तुम लोगों की सत्य की समझ तुम्हारी अपनी अवस्थाओं के साथ एकीकृत है? वास्तविक जीवन में तुम्हें पहले यह सोचना होगा कि कौन-से सत्य तुम्हारे सामने आए लोगों, घटनाओं और चीज़ों से संबंध रखते हैं; इन्हीं सत्यों के बीच तुम परमेश्वर की इच्छा तलाश सकते हो और अपने सामने आने वाली चीज़ों को उसकी इच्छा के साथ जोड़ सकते हो। यदि तुम नहीं जानते कि सत्य के कौन-से पहलू तुम्हारे सामने आई चीज़ों से संबंध रखते हैं, और सीधे परमेश्वर की इच्छा खोजने चल देते हो, तो यह एक अंधा दृष्टिकोण है और परिणाम हासिल नहीं कर सकता। यदि तुम सत्य की खोज करना और परमेश्वर की इच्छा समझना चाहते हो, तो पहले तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि तुम्हारे साथ किस प्रकार की चीज़ें घटित हुई हैं, वे सत्य के किन पहलुओ से संबंध रखती हैं, और परमेश्वर के वचन में उस विशिष्ट सत्य को देखो, जो तुम्हारे अनुभव से संबंध रखता है। तब तुम उस सत्य में अभ्यास का वह मार्ग खोजो, जो तुम्हारे लिए सही है; इस तरह से तुम परमेश्वर की इच्छा की अप्रत्यक्ष समझ प्राप्त कर सकते हो। सत्य की खोज करना और उसका अभ्यास करना यांत्रिक रूप से किसी सिद्धांत को लागू करना या किसी सूत्र का अनुसरण करना नहीं है। सत्य सूत्रबद्ध नहीं होता, न ही वह कोई विधि है। वह मृत नहीं है—वह स्वयं जीवन है, वह एक जीवित चीज़ है, और वह वो नियम है, जिसका अनुसरण प्राणी को अपने जीवन में अवश्य करना चाहिए और वह वो नियम है, जो मनुष्य के पास अपने जीवन में अवश्य होना चाहिए। यह ऐसी चीज़ है, जिसे तुम्हें जितना संभव हो, अनुभव के माध्यम से समझना चाहिए। तुम अपने अनुभव की किसी भी अवस्था पर क्यों न पहुँच चुके हो, तुम परमेश्वर के वचन या सत्य से अविभाज्य हो, और जो कुछ तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में समझते हो और जो कुछ तुम परमेश्वर के स्वरूप के बारे में जानते हो, वह सब परमेश्वर के वचनों में व्यक्त होता है; वह सत्य से अटूट रूप से जुड़ा है। परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप की एक प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। वह परमेश्वर के स्वरूप को ठोस बनाता है और उसका स्पष्ट विवरण देता है; वह तुम्हें और अधिक सीधी तरह से बताता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है और वह क्या पसंद नहीं करता, वह तुमसे क्या कराना चाहता है और वह तुम्हें क्या करने की अनुमति नहीं देता, वह किन लोगों से घृणा करता है और वह किन लोगों से प्रसन्न होता है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्यों के पीछे लोग उसके आनंद, क्रोध, दुःख और खुशी, और साथ ही उसके सार को देख सकते हैं—यह उसके स्वभाव का प्रकट होना है। परमेश्वर के स्वरूप को जानने और उसके वचन से उसके स्वभाव को समझने के अतिरिक्त जो सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है, वह है व्यावहारिक अनुभव के द्वारा इस समझ तक पहुँचने की आवश्यकता। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को जानने के लिए अपने आप को वास्तविक जीवन से हटा लेता है, तो वह उसे प्राप्त नहीं कर पाएगा। भले ही कुछ लोग हों, जो परमेश्वर के वचन से कुछ समझ प्राप्त कर सकते हों, किंतु उनकी समझ सिद्धांतों और वचनों तक ही सीमित रहती है, और परमेश्वर वास्तव में जैसा है, वह उससे भिन्न रहती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

भले ही तू किसी भी कर्तव्य को पूरा करे, तुझे हमेशा परमेश्वर की इच्छा को समझने की और यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि तेरे कर्तव्य को लेकर उसकी क्या अपेक्षा है; केवल तभी तू सैद्धान्तिक तरीके से मामलों को सँभाल पाएगा। अपने कर्तव्य को निभाने में, तू अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार बिल्कुल नहीं जा सकता है या तू जो चाहे मात्र वह नहीं कर सकता है, जिसे भी करने में तू खुश और सहज हो, वह नहीं कर सकता है, या ऐसा काम नहीं कर सकता जो तुझे अच्छे व्यक्ति के रूप में दिखाये। यदि तू परमेश्वर पर अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को बलपूर्वक लागू करता है या उन का अभ्यास ऐसे करता है मानो कि वे सत्य हों, उनका ऐसे पालन करता है मानो कि वे सत्य के सिद्धांत हों, तो यह कर्तव्य पूरा करना नहीं है, और इस तरह से तेरा कर्तव्य निभाना परमेश्वर के द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। कुछ लोग सत्य को नहीं समझते हैं, और वे नहीं जानते कि अपने कर्तव्यों को ठीक से पूरा करने का क्या अर्थ है। उन्हें लगता है कि चूँकि उन्होंने अपना दिल और अपना प्रयास इसमें लगाया है, और देहासक्ति का त्याग किया है और कष्ट उठाया है, इसलिए उनके कर्तव्य की पूर्ति मानकों पर खरी उतरेगी—पर फिर क्यों परमेश्वर हमेशा असंतुष्ट रहता है? इन लोगों ने कहाँ भूल की है? उनकी भूल यह थी कि उन्होंने परमेश्वर की अपेक्षाओं की तलाश नहीं की थी, बल्कि अपने ही विचारों के अनुसार काम किया था; उन्होंने अपनी ही इच्छाओं, पसंदों और स्वार्थी उद्देश्यों को सत्य मान लिया था और उन्होंने इनको वो मान लिया जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, मानो कि वे परमेश्वर के मानक और अपेक्षाएँ प हों। जिन बातों को वे सही, अच्छी और सुन्दर मानते थे, उन्हें सत्य के रूप में देखते थे; यह गलत है। वास्तव में, भले ही लोगों को कभी कोई बात सही लगे, लगे कि यह सत्य के अनुरूप है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि यह आवश्यक रूप से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। लोग जितना अधिक यह सोचते हैं कि कोई बात सही है, उन्हें उतना ही अधिक सावधान होना चाहिए और उतना ही अधिक सत्य को खोजना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उनकी सोच परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप है या नहीं। यदि यह उसकी अपेक्षाओं के विरुद्ध है और उसके वचनों के विरुद्ध है, तो तुम्हारा यह सोचना गलत है कि यह बात सही है, क्योंकि यह बस एक मानवीय विचार है और यह आवश्यक रूप से सत्य के अनुरूप नहीं होगा भले ही तुम्हें यह कितना भी सही लगे। सही और गलत का तुम्हारा निर्णय सिर्फ़ परमेश्वर के वचनों पर आधारित होना चाहिए, और तुम्हें कोई बात चाहे जितनी भी सही लगे, जबतक इसका आधार परमेश्वर के वचन न हों, तुम्हें इसे हटा देना चाहिए। कर्तव्य क्या है? यह परमेश्वर द्वारा लोगों को सौंपा गया एक आदेश है। तो तुम्हें अपना कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? व्यक्तिपरक मानवीय इच्छाओं के आधार पर नहीं बल्कि परमेश्वर की अपेक्षाओं और मानकों के अनुसार काम कर तथा सत्य के सिद्धांतों पर अपना व्यवहार आधारित कर। इस तरह तुम्हारा अपने कर्तव्य को करना मानकों के स्तर का होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाया जा सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर और मनुष्य की बराबरी पर बात नहीं की जा सकती। परमेश्वर का सार और कार्य मनुष्य के लिए सर्वाधिक अथाह और समझ से परे है। यदि परमेश्वर मनुष्य के संसार में व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य न करे और अपने वचन न कहे, तो मनुष्य कभी भी परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ पाएगा। और इसलिए वे लोग भी, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन परमेश्वर को समर्पित कर दिया है, उसका अनुमोदन प्राप्त करने में सक्षम नहीं होंगे। यदि परमेश्वर कार्य करने के लिए तैयार न हो, तो मनुष्य चाहे कितना भी अच्छा क्यों न करे, वह सब व्यर्थ हो जाएगा, क्योंकि परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचारों से सदैव ऊँचे रहेंगे और परमेश्वर की बुद्धि मनुष्य की समझ से परे है। और इसीलिए मैं कहता हूँ कि जो लोग परमेश्वर और उसके कार्य को "पूरी तरह से समझने" का दावा करते करते हैं, वे मूर्खों की जमात हैं; वे सभी अभिमानी और अज्ञानी हैं। मनुष्य को परमेश्वर के कार्य को परिभाषित नहीं करना चाहिए; बल्कि, मनुष्य परमेश्वर के कार्य को परिभाषित नहीं कर सकता। परमेश्वर की दृष्टि में मनुष्य एक चींटी जितना महत्वहीन है; तो फिर वह परमेश्वर के कार्य की थाह कैसे पा सकता है? जो लोग गंभीरतापूर्वक यह कहना पसंद करते हैं, "परमेश्वर इस तरह से या उस तरह से कार्य नहीं करता," या "परमेश्वर ऐसा है या वैसा है"—क्या वे अहंकारपूर्वक नहीं बोलते? हम सबको जानना चाहिए कि मनुष्य, जो कि देहधारी है, शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है। मानवजाति की प्रकृति ही है परमेश्वर का विरोध करना। मानवजाति परमेश्वर के समान नहीं हो सकती, परमेश्वर के कार्य के लिए परामर्श देने की उम्मीद तो वह बिलकुल भी नहीं कर सकती। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि परमेश्वर मनुष्य का मार्गदर्शन कैसे करता है, तो यह स्वयं परमेश्वर का कार्य है। यह उचित है कि इस या उस विचार की डींग हाँकने के बजाय मनुष्य को समर्पण करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य धूल मात्र है। चूँकि हमारा इरादा परमेश्वर की खोज करने का है, इसलिए हमें परमेश्वर के विचार के लिए उसके कार्य पर अपनी अवधारणाएँ नहीं थोपनी चाहिए, और जानबूझकर परमेश्वर के कार्य का विरोध करने के लिए अपने भ्रष्ट स्वभाव का भरसक उपयोग तो बिलकुल भी नहीं करना चाहिए। क्या ऐसा करना हमें मसीह-विरोधी नहीं बनाएगा? ऐसे लोग परमेश्वर में विश्वास कैसे कर सकते हैं? चूँकि हम विश्वास करते हैं कि परमेश्वर है, और चूँकि हम उसे संतुष्ट करना और उसे देखना चाहते हैं, इसलिए हमें सत्य के मार्ग की खोज करनी चाहिए, और परमेश्वर के अनुकूल रहने का मार्ग तलाशना चाहिए। हमें परमेश्वर के कड़े विरोध में खड़े नहीं होना चाहिए। ऐसे कार्यों से क्या भला हो सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना' से उद्धृत

जैसे ही लोग अपने कर्तव्यों को पूरा करने में जल्दबाजी हो जाते हैं, वे यह नहीं जान पाते कि कैसे इसका अनुभव किया जाए। जैसे ही वे मामलों में व्यस्त हो जाते हैं, उनकी आध्यात्मिक अवस्थाएँ भंग हो जाती हैं; और वे एक सामान्य स्थिति को बनए रखने की क्षमता खो बैठते हैं। ऐसा क्यों होता है? यदि तुम्हें थोड़ा कार्य करने को दिया जाए, तो तुम बेलगाम और स्वच्छंद हो जाते हो, परमेश्वर के निकट आने के इच्छुक होने की बजाय उससे दूर होते जाते हो। इससे पता चलता है कि लोग यह नहीं जानते कि अनुभव कैसे प्राप्त किया जाता है। चाहे तुम कुछ भी करो, तुम्हें सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि तुम इसे क्यों कर रहे हो, वह कौन सी मंशा है जो तुम्हें ऐसा करने के लिए निर्देशित करती है, तुम्हारे ऐसा करने का क्या महत्व है, मामले की प्रकृति क्या है, और क्या तुम जो कर रहे हो वह कोई सकारात्मक चीज़ है या कोई नकारात्मक चीज़ है। तुम्हें इन सभी मामलों की एक स्पष्ट समझ अवश्य होनी चाहिए; सिद्धान्त के साथ कार्य करने में समर्थ होने के लिए यह बहुत आवश्यक है। यदि तुम अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए कुछ कर रहे हो, तो तुम्हें यह विचार करना चाहिए: मुझे यह किस तरह करना चाहिए? मुझे किस तरह अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से करना चाहिए ताकि मैं इसे बस लापरवाही से न कर रहा हूँ? इस मामले में तुम्हें परमेश्वर के करीब आना चाहिए। परमेश्वर के करीब आने का मतलब है इस बात में सच्चाई को खोजना, अभ्यास करने के तरीके को खोजना, परमेश्वर की इच्छा को खोजना, और इस बात को खोजना है कि परमेश्वर को संतुष्ट कैसे करना है। इसी तरह तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर के करीब आया जाता है। इसमें कोई धार्मिक अनुष्ठान या बाहरी क्रिया-कलाप करना शामिल नहीं है। यह परमेश्वर की इच्छा को खोजने के बाद सत्य के अनुसार अभ्यास करने के उद्देश्य से किया जाता है। अगर तुम हमेशा ऐसा कहते हो कि "परमेश्वर का धन्यवाद," जबकि तुमने कुछ भी नहीं किया होता है, लेकिन तब जब तुम कुछ कर रहे होते हो, तो तुम जिस तरीके से चाहते हो वैसा करते रहते हो, तब इस तरह धन्यवाद देना केवल एक बाहरी कृत्य है। अपना कर्तव्य करते समय या किसी चीज़ पर कार्य करते समय, तुम्हें हमेशा सोचना चाहिए: मुझे यह कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? परमेश्वर की इच्छा क्या है? जो भी तुम करते हो उसके द्वारा परमेश्वर के करीब जाना तुम पर है; और ऐसा करते हुए अपने कृत्यों और साथ ही परमेश्वर की इच्छा के पीछे के सिद्धान्तों और सत्य की खोज करना, और तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर से नहीं भटकना तुम पर है। केवल ऐसा व्यक्ति ही सचमुच परमेश्वर में विश्वास करता है। इन दिनों, जब लोगों के सामने चीज़ें आती हैं, तो चाहे वास्तविक स्थिति कुछ भी हो, उन्हें लगता है कि वे बहुत-कुछ कर सकते हैं, लेकिन परमेश्वर उनके दिल में नहीं होते, और वे अपनी इच्छा के अनुसार उसे करते हैं। भले ही उनके कार्य का तरीका उपयुक्त हो या नहीं, या वह सत्य के अनुरूप हो या नहीं, वे बस जिद पर अड़े रहते हैं और अपने व्यक्तिगत इरादों के अनुसार कार्य कर डालते हैं। आम तौर पर ऐसा लग सकता है कि परमेश्वर उनके दिल में हैं, लेकिन जब वे काम करते हैं, तो वस्तुतः परमेश्वर उनके दिल में नहीं होते। कुछ लोग कहते हैं : "मैं अपने कामों में परमेश्वर के निकट नहीं हो सकता। अतीत में मैं धार्मिक अनुष्ठान करने का आदी था, और मैंने परमेश्वर के करीब आने की कोशिश की, लेकिन इसका कुछ परिणाम नहीं हुआ। मैं उसके पास नहीं जा सका।" ऐसे लोगों के दिल में परमेश्वर नहीं होता; वे स्वयं ही अपने दिल में होते हैं, और अपने किसी भी काम में सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते। सत्य के अनुसार काम न करने का अर्थ है अपनी इच्छा के अनुसार काम करना, और अपनी इच्छा के अनुसार काम करने का अर्थ है परमेश्वर को छोड़ देना; अर्थात, उनके दिल में परमेश्वर नहीं हैं। मानवीय अभिप्राय आमतौर पर लोगों को अच्छे और सही लगते हैं, और वे ऐसे दिखते हैं मानो कि वे सत्य का बहुत अधिक उल्लंघन नहीं करते हैं। लोगों को लगता है कि चीज़ों को इस तरह से करना सत्य को अभ्यास में लाना है; उन्हें लगता है कि चीज़ों को उस तरह से करना परमेश्वर के प्रति समर्पण करना है। दरअसल, वे वास्तव में परमेश्वर की तलाश नहीं कर रहे हैं, और वे परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार, उसकी इच्छा को संतुष्ट करने के लिए, इसे अच्छी तरह से करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। उनके पास यह सच्ची अवस्था नहीं है, न ही उनकी ऐसी अभिलाषा है। यही वह सबसे बड़ी ग़लती है, जो लोग अपने अभ्यास में करते हैं। तुम परमेश्वर पर विश्वास तो करते हो, परन्तु तुम परमेश्वर को अपने दिल में नहीं रखते हो। यह पाप कैसे नहीं है? क्या तुम अपने आप को धोखा नहीं दे रहे हो? यदि तुम इसी तरीके से विश्वास करते रहो तो तुम किस प्रकार के प्रभावों को पाओगे? इसके अलावा, विश्वास के महत्व को कैसे अभिव्यक्त किया जा सकता है?

जब तुमने कुछ काम किया था, तो परमेश्वर बहुत असंतुष्ट हुआ था। जब तुम उसे करने जा रहे थे, तब क्या तुमने उससे प्रार्थना की थी? क्या तुमने कभी यह सोचा, "यदि यह बात परमेश्वर के सामने लाई जाएगी, तो उसे कैसी लगेगी? अगर उसे इसका पता चलेगा, तो वह खुश होगा या कुपित? क्या वह इससे घृणा करेगा?" तुमने यह जानने की कोशिश नहीं की, है ना? यहाँ तक कि अगर दूसरे लोगों ने तुम्हें याद भी दिलाया, तो तुम तब भी यही सोचोगे कि यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, और यह किसी भी सिद्धांत के खिलाफ नहीं जाता और न ही कोई पाप है। परिणामस्वरूप, इस बात ने परमेश्वर के स्वभाव को नाराज़ कर दिया और उसे बहुत क्रोध करने के लिए उकसाया, इस हद तक कि उसे तुमसे नफ़रत हो जाए। यदि तुमने जानने की कोशिश की होती और जाँच की होती, और करने से पहले मामले को स्पष्ट रूप से देखा होता, तो क्या तुम इसे सँभाल न पाते? भले ही लोग कभी अच्छी स्थिति में न हों, लेकिन अगर वे जो कुछ करने की योजना बना रहे हैं, उसे पहले निष्ठापूर्वक परमेश्वर के सामने जाँच और खोज के लिए ले आते हैं, तो वे कोई बड़ी भूल नहीं करेंगे। सत्य का अभ्यास करते समय लोगों के लिए भूल करने से बचना कठिन होता है, लेकिन अगर चीज़ों को करते समय तुम जानते हो कि उन्हें सत्य के अनुसार कैसे करना है, लेकिन फिर भी तुम उन्हें सत्य के अनुसार नहीं करते, तो फिर समस्या यह है कि तुम्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है। सत्य के प्रति प्रेम से रहित व्यक्ति का स्वभाव नहीं बदलेगा। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को ठीक से नहीं समझ पाते, और नहीं जानते कि अभ्यास कैसे करना है, तो तुम्हें दूसरों के साथ सहभागिता करनी चाहिए। यदि किसी को भी नहीं लगता कि वे इस मामले को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं, तो फिर तुम्हें सबसे तर्कसंगत समाधान लागू करना चाहिए। किंतु, यदि तुम्हें अंततः यह पता चले कि इसे इस तरह से करने में तुमने थोड़ी-सी भूल कर दी है, तो तुम्हें जल्दी से उसे सही कर लेना चाहिए, और तब परमेश्वर इस भूल को पाप के रूप में नहीं गिनेगा। चूँकि इस मामले को व्यवहार में लाते समय तुम्हारे इरादे सही थे, और तुम सत्य के अनुसार अभ्यास कर रहे थे और केवल इसे स्पष्ट रूप से देख नहीं पाए, और तुम्हारे कार्यों के परिणामस्वरूप कुछ भूलें हो गईं, तो यह एक अपराध घटाने वाली परिस्थिति थी। किंतु, आजकल बहुत-से लोग काम करने के लिए केवल अपने दो हाथों पर, और बहुत-कुछ करने के लिए केवल अपने मन पर भरोसा करते हैं, और वे शायद ही कभी इन सवालों पर कोई विचार करते हैं : क्या इस तरह से अभ्यास करना परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है? अगर मैं इसे इस तरह से करूँगा, तो क्या परमेश्वर खुश होगा? अगर मैं इसे इस तरह से करूँगा, तो क्या परमेश्वर मुझ पर भरोसा करेगा? अगर मैं इसे इस तरह से करूँगा, तो क्या मैं सत्य को अभ्यास में लाऊँगा? यदि परमेश्वर इसके बारे सुनेगा, तो क्या वह कह सकेगा, "तुमने यह सही तरह से और उपयुक्त तरीके से किया है। इसे जारी रखो"? क्या तुम अपने सामने आने वाले हर मामले की सावधानीपूर्वक जाँच करने में सक्षम हो? क्या तुम उनमें से प्रत्येक के बारे में गंभीर और सतर्क हो सकते हो? या क्या तुम यह सोच पाते हो कि तुम जिस तरीके से इसे कर रहे हो, परमेश्वर उसे घृणास्पद तो नहीं समझता, अन्य सभी लोग तुम्हारे तरीकों के बारे में कैसा महसूस करते हैं, और कहीं तुम इसे अपनी ही इच्छा के आधार पर या अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए तो नहीं कर रहे...? तुम्हें इसके बारे में अधिक विचार करना होगा और अधिक जानने की कोशिश करनी होगी, और तुम्हारी गलतियाँ छोटी से छोटी होती जाएँगी। चीज़ों को इस तरह करना यह साबित करेगा कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो वास्तव में सत्य की तलाश करता है और तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखता है, क्योंकि तुम चीज़ों को सत्य द्वारा अपेक्षित निर्देशन के अनुसार कर रहे हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा को खोजना सत्य के अभ्यास के लिए है' से उद्धृत

तुम चाहे जो करो, लेकिन उसमें सत्य तलाशने और सत्य का पालन करने का प्रयास करो। यदि तुम सत्य के अनुसार कार्य कर रहे हो, तो तुम्हारी कार्यशैली सही है। अगर किसी बच्चे ने कोई बात कही है या किसी बेहद सीधे-सादे भाई-बहन ने भी कोई विचार रखा है और वह सत्य के अनुरूप है, तो तुम जो कुछ करोगे, उसका परिणाम अच्छा ही होगा और वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप भी होगा। किसी मामले का संचालन तुम्हारे सहज आवेग और उसके संचालन के तुम्हारे सिद्धांतों पर आधारित होता है। अगर तुम्हारे सिद्धांत इंसानी इच्छा से पैदा हुए हैं, यदि वे मानवीय विचारों, धारणाओं और कल्पनाओं से उत्पन्न हुए हैं; या फिर वे मानवीय भावनाओं और दृष्टिकोण से जन्मे हैं, तो तुम्हारा मामले का संचालन गलत होगा, क्योंकि उसका स्रोत ही गलत होगा। जब तुम्हारे विचार सत्य के सिद्धांतों पर आधारित होते हैं और जब तुम मामलों का संचालन सत्य-सिद्धांतों के अनुसार करते हो, तो फिर जो मामला तुम्हारे हाथ में है, तुम उसका संचालन यकीनन सही ढंग से करोगे। कभी-कभी लोग तुम्हारे द्वारा संचालित मामले को उस समय स्वीकार नहीं कर पाएँगे और उस समय ऐसा लग सकता है कि उनकी अपनी धारणाएँ हैं या उनका दिल बेचैन हो जाएगा। हालाँकि कुछ समय के बाद तुम सही साबित होगे। जो मामले परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होते हैं, वे कालांतर में सही लगते हैं; लेकिन जो मामले परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं होते—जो मामले मानवीय इच्छा के अनुरूप होते हैं और मानव-निर्मित होते हैं—वे कालांतर में खराब ही सिद्ध होते हैं। जब तुम कुछ करते हो, तो उस समय तुम्हें इस बात से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए कि तुम्हारा मार्गदर्शन किस तरीके से होना चाहिए या किस तरीके से नहीं होना चाहिए और पूर्वानुमान न लगाओ। पहली बात तो यह है कि तुम्हें खोज और प्रार्थना करनी चाहिए, तब तुम्हें आगे के मार्ग पर चलना चाहिए और सबके साथ संगति करनी चाहिए। संगति का प्रयोजन क्या है? इससे तुम ठीक परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य और उसकी इच्छा के अनुरूप बर्ताव कर पाओगे। यह बात को कहने का थोड़ा भव्य अंदाज़ है; चलो इसे इस ढंग से कहते हैं कि इससे इंसान मामलों का संचालन ठीक सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कर पाता है—यह तरीका थोड़ा ज़्यादा व्यावहारिक है। यदि तुम ऐसा कर पाओ, तो इतना पर्याप्त है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रष्‍ट स्‍वभाव को दूर करने का मार्ग' से उद्धृत

सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले प्रभु यीशु ने एक प्रार्थना की थी। उसके ठीक-ठीक शब्द क्या थे? ("यदि हो सके तो यह कटोरा मुझ से टल जाए, तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो" "यदि यह मेरे पीए बिना नहीं हट सकता तो तेरी इच्छा पूरी हो" [मत्ती 26:39, 42]।) सृजित मानवजाति के सदस्यों के रूप में, लोगों को इस तरह की तलाश की प्रक्रिया से गु ज़रना चाहिए, क्योंकि वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। हालाँकि, चाहे तुम कैसे भी तलाश करो, और चाहे तलाश की यह प्रक्रिया कितनी भी लंबी, कष्टप्रद या कठिन क्यों न हो, परमेश्वर ने शुरुआत से ही जो कुछ भी करने की ठान ली है, वह कभी भी नहीं बदला है और न ही उसने कभी उसे बदलने का फैसला किया है। लोग तलाश और प्रतीक्षा कर सकते हैं, और परमेश्वर उन्हें उस प्रक्रिया की अनुमति देता है, जिसके द्वारा इस बात की समझ, ज्ञान और स्पष्टता प्राप्त की जा सकती है कि वास्तव में क्या सच है, लेकिन वह कभी एक भी निर्णय को नहीं बदलेगा। इसलिए, तुम्हें यह महसूस नहीं करना चाहिए कि तुम्हारे साथ चीजें यादृच्छिक रूप से घटित होती हैं, या यह कि जब तुम किसी तरह आपदा और निश्चित मौत से बच निकल ते हो, तो यह मात्र भाग्य और संयोग से होता है। ऐसा नहीं है। परमेश्वर के सबसे बड़े से लेकर सबसे छो टे तक, भीमकाय से लेकर कृशकाय तक, सृजित मनुष्य से लेकर सूक्ष्मजीवी तक, प्रत्येक सृजित प्राणी के लिए एक पूर्व-निर्धारित योजना और विशिष्ट व्यवस्थाएँ हैं। यह वही है, जो सृष्टिकर्ता ने किया है। बीमार पड़ ने वाले कुछ लोग कहते हैं कि उनकी बीमारी किसी गतिविधि की थका न से या भूलवश कोई ग़लत ची ज़ खाने से हुई थी। ऐसे कारणों की तलाश मत करो; वे सभी नकारात्मक और प्रतिरोधी दृष्टिकोण हैं। तुम्हें परिवशों, लोगों, घटनाओं और परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए व्यवस्थित की गई चीज़ों का सकारात्मकता के साथ सामना करना चाहिए। वस्तुगत कारणों की तलाश करने की ज़रूरत नहीं है; इसके बजाय, तुम्हें सकारात्मक पहलू से समझना चाहिए कि इस घटना को तुम्हारे सामने लाने में सृष्टिकर्ता की वास्तविक इच्छा और अभिवृत्ति क्या है, और इससे निपटते हुए तुम्हें एक सृजित प्राणी होने के नाते कैसा रवैया अपनाना चाहिए; यही मार्ग है जिसकी तुम्हें तलाश करनी चाहिए। जब कोई व्यक्ति बच जा ता है, तो यह कभी भी यादृच्छिक नहीं होता, न ही यह अपरिहार्य होता है; इसमें हमेशा सृष्टिकर्ता की व्यवस्था, मंशा, और संप्रभुता होती हैं। कुछ भी खोखला नहीं है। क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर के वचन, उ सकी इच्छा और सत्य सब खोखले हैं? वे खोखले नहीं हैं! जब लोगों ने परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझा होता है, तो वे कुछ धारणाओं और कल्पनाओं की ओर उन्मुख होते हैं, और उन्हें लगता है कि वे धारणाएँ और कल्पनाएँ बिलकुल सही हैं, और वे परमेश्वर की इच्छा होनी चाहिए। वास्तव में, परमेश्वर की नज़रों में, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। लोग सोचते हैं, "मेरे ये विचार सही हैं; मुझे बहुत विश्वास है, मैं परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखता हूँ। मैंने समर्पण किया है; मुझे उससे प्रेम है।" सच्चाई यह है कि परमेश्वर तुम्हारे इन विचारों और कार्यों पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दे ता। जब तुम्हें लगता है कि तुम सही हो, तो तुमने वास्तव में सत्य को बिल्कुल भी नहीं समझा है, न ही तुम उसे हासिल कर रहे हो। एक बार जब तुम इन सब की थाह पा लेते हो, और इस तथ्य से परिचित हो जाते हो कि अंतिम विश्लेषण में सब-कुछ परमेश्वर की संप्रभुता, व्यवस्था और उसके पूर्वनिर्धारण द्वारा ही किया जाता है, केवल तभी उस सबका प्रभाव हासिल किया जाता है, जिसका तुमने सामना किया है, केवल तभी तुम वास्तव में परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होगे, और केवल तभी तुम उसे वास्तव में समझोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही व्यक्ति परमेश्वर के कर्मों को जान सकता है' से उद्धृत

अगर किसी विश्वासी के कर्म सत्य के अनुरूप नही हैं, तो वह किसी अविश्वासी के समान ही है। वह उस तरह का व्यक्ति है, जिसके दिल में परमेश्वर नहीं होता, और जो परमेश्वर को छोड़ देता है, और ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के परिवार में काम पर रखे गए उस कर्मचारी की तरह होता है, जो अपने मालिक के लिए कोई छोटे-मोटे कार्य कर देता है, कुछ मुआवज़ा पाता है और फिर चला जाता है। यह ऐसा व्यक्ति बिलकुल नहीं हो सकता, जो परमेश्वर में विश्वास करता है। पीछे इस बात का उल्लेख हुआ था कि तुम परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करने के लिए क्या कर सकते हो। परमेश्वर का अनुमोदन वह पहली चीज़ है, जिसके बारे में तुम्हें सोचना और जिसके लिए तुम्हें काम करना चाहिए; यह तुम्हारे अभ्यास का सिद्धांत और दायरा होना चाहिए। तुम जो कर रहे हो वह सत्य के अनुरूप है या नहीं, इसका निश्चय तुम्हें इसलिए करना चाहिए, क्योंकि यदि वह सत्य के अनुरूप है, तो वह निश्चित रूप से ईश्वर की इच्छा के अनुरूप है। ऐसा नहीं है कि तुम्हें यह मापना चाहिए कि यह बात सही है या गलत है, या क्या यह हर किसी की रुचि के अनुरूप है, या क्या यह तुम्हारी अपनी इच्छाओं के अनुसार है; बल्कि तुम्हें यह निश्चित करना चाहिए कि यह सत्य के अनुरूप है या नहीं, और यह कलीसिया के काम और हितों को लाभ पहुँचाता है या नहीं। यदि तुम इन बातों पर विचार करते हो, तो तुम चीज़ों को करते समय परमेश्वर की इच्छा के अधिकाधिक अनुरूप होते जाओगे। यदि तुम इन पहलुओं पर विचार नहीं करते, और चीज़ों को करते समय केवल अपनी इच्छा पर निर्भर रहते हो, तो तुम्हारा उन्हें गलत तरीके से करना गारंटीशुदा है, क्योंकि मनुष्य की इच्छा सत्य नहीं है और निश्चित रूप से, वह परमेश्वर के साथ असंगत होती है। यदि तुम ईश्वर द्वारा अनुमोदित होने की इच्छा रखते हो, तो तुम्हें सत्य के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, न कि अपनी इच्छा के अनुसार। कुछ लोग अपने कर्तव्य पूरे करने के नाम पर कुछ निजी मामलों में संलग्न रहते हैं। उनके भाई और बहन इसे अनुचित मानते हैं और इसके लिए उन्हें फटकारते हैं, लेकिन ये लोग भूल स्वीकार नहीं करते। उन्हें लगता है कि चूँकि यह एक व्यक्तिगत मामला है, जिसमें कलीसिया का कार्य, वित्त या उसके लोग शामिल नहीं हैं, इसलिए इसे सत्य के दायरे का उल्लंघन नहीं माना जा सकता, और परमेश्वर को इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कुछ चीज़ें तुम्हें निजी मामले लग सकती हैं, जिन पर कोई सिद्धांत या सत्य लागू नहीं होता। किंतु, तुम्हारे द्वारा किए गए कार्य को देखते हुए, तुम इस दृष्टि से बहुत स्वार्थी रहे कि तुमने परमेश्वर के परिवार के कार्य पर कोई ध्यान नहीं दिया, न ही यह सोचा कि तुमने जो किया, उसका इस पर क्या प्रभाव पड़ेगा; तुम केवल अपने फायदे पर विचार करते रहे। इसमें पहले ही संतों का औचित्य और साथ ही व्यक्ति की मानवता से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। भले ही तुम जो कर रहे थे, उससे चर्च के हित नहीं जुड़े थे, न ही उसमें सत्य शामिल था, फिर भी अपने कर्तव्य के पालन करने का दावा करते हुए एक निजी मामले में संलग्न होना सत्य के अनुरूप नहीं है। चाहे तुम कुछ भी कर रहे हो, चाहे मामला कितना भी बड़ा या छोटा हो, और चाहे तुम इसे परमेश्वर के परिवार में अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए या अपने निजी कारणों के लिए यह कर रहे हो, तुम्हें इस बात पर विचार करना ही चाहिए कि जो तुम कर रहे हो वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है या नहीं, साथ ही क्या यह ऐसा कुछ है जो किसी मानवता युक्त व्यक्ति को करना चाहिए। अगर तुम जो भी करते हो उसमें उस तरह सत्य की तलाश करते हो तो तुम ऐसे इंसान हो जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करता है। यदि तुम हर बात और हर सत्य को इस ढंग से लेते हो, तो तुम अपने स्वभाव में बदलाव हासिल करने में सक्षम होगे। कुछ लोगों को लगता है कि जब वे कुछ निजी कार्य कर रहे होते हैं, तो वे सत्य की उपेक्षा कर सकते हैं, इच्छानुसार काम कर सकते हैं और वैसे कर सकते हैं जैसे उन्हें खुशी मिले, और उस ढंग से जो उनके लिए फायदेमंद हो। वे इस तरफ ज़रा-सा भी ध्यान नहीं देते कि यह परमेश्वर के परिवार को कैसे प्रभावित करेगा और न ही वे यह सोचते हैं कि यह संतों के आचरण को शोभा देता है या नहीं। अंत में, जब मामला समाप्त हो जाता है, तो वे भीतर अंधकारमय और असहज हो जाते हैं; लेकिन उन्हें नहीं पता होता कि यह सब क्यों हो रहा है। क्या यह प्रतिशोध उचित नहीं है? यदि तुम ऐसी चीजें करते हो जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं हैं, तो तुमने परमेश्वर को नाराज़ किया है। यदि लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, और अक्सर अपनी इच्छा के आधार पर काम करते हैं, तो वे अक्सर परमेश्वर को रुष्ट या अपमानित करेंगे। ऐसे लोग आम तौर पर अपने कर्मों में परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं होते और अगर वे पश्चाताप नहीं करते हैं, तो वे सज़ा से ज़्यादा दूर नहीं होंगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा को खोजना सत्य के अभ्यास के लिए है' से उद्धृत

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