43. पूर्ण किए जाने की तलाश के सिद्धांत

(1) परमेश्वर को अपना दिल सौंप देना, स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित कर देना और उसके लिए स्वयं को खपाना, उसके वचनों को निष्ठा से पढ़ना और उसके वचनों में उसके साथ संवाद करना आवश्यक है।

(2) निष्ठापूर्वक अपने आप को परमेश्वर के लिए खपाओ और अपना कर्तव्य निभाते हुए अपने भ्रष्ट स्वभाव का समाधान करने के लिए सत्य की तलाश करो। सद्भाव में दूसरों के साथ सहयोग करो, और अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से निभाओ।

(3) परमेश्वर के वचनों के माध्यम से न्याय, ताड़ना, काट-छाँट और निपटारे को स्वीकार करो, और झूठ, मिथ्यात्व, छल और लापरवाह, ढीले-ढाले कर्म को पूरी तरह से बंद करो। एक ईमानदार व्यक्ति बनो।

(4) हर प्रकार के परीक्षण में, सत्य की तलाश करो, धारणाओं और भ्रष्टता का समाधान करो, परमेश्वर की इच्छा पर विचार करना सीखो, और परमेश्वर के प्रति वास्तव में समर्पित हो जाओ।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

राज्य के युग में मनुष्य को पूरी तरह से पूर्ण किया जाएगा। विजय के कार्य के पश्चात् मनुष्य को शुद्धिकरण और क्लेश का भागी बनाया जाएगा। जो लोग विजय प्राप्त कर सकते हैं और इस क्लेश के दौरान गवाही दे सकते हैं, वे वो लोग हैं जिन्हें अंततः पूर्ण बनाया जाएगा; वे विजेता हैं। इस क्लेश के दौरान मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह इस शुद्धिकरण को स्वीकार करे, और यह शुद्धिकरण परमेश्वर के कार्य की अंतिम घटना है। यह अंतिम बार है कि परमेश्वर के प्रबंधन के समस्त कार्य के समापन से पहले मनुष्य को शुद्ध किया जाएगा, और जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, उन सभी को यह अंतिम परीक्षा स्वीकार करनी चाहिए, और उन्हें यह अंतिम शुद्धिकरण स्वीकार करना चाहिए। जो लोग क्लेश से व्याकुल हैं, वे पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर के मार्गदर्शन से रहित हैं, किंतु जिन्हें सच में जीत लिया गया है और जो सच में परमेश्वर की खोज करते हैं, वे अंततः डटे रहेंगे; ये वे लोग हैं, जिनमें मानवता है, और जो सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं। परमेश्वर चाहे कुछ भी क्यों न करे, इन विजयी लोगों को दर्शनों से वंचित नहीं किया जाएगा, और ये फिर भी अपनी गवाही में असफल हुए बिना सत्य को अभ्यास में लाएँगे। ये वे लोग हैं, जो अंततः बड़े क्लेश से उभरेंगे। भले ही आपदा को अवसर में बदलने वाले आज भी मुफ़्तख़ोरी कर सकते हों, किंतु अंतिम क्लेश से बच निकलने में कोई सक्षम नहीं है, और अंतिम परीक्षा से कोई नहीं बच सकता। जो लोग विजय प्राप्त करते हैं, उनके लिए ऐसा क्लेश जबरदस्त शुद्धिकरण हैं; किंतु आपदा को अवसर में बदलने वालों के लिए यह पूरी तरह से उनके उन्मूलन का कार्य है। ... विजय के कार्य के समापन के बाद मनुष्य को बचाने का कार्य हासिल नहीं किया जाता। यद्यपि विजय का कार्य समाप्ति पर आ गया है, किंतु मनुष्य को शुद्ध करने का कार्य नहीं; वह कार्य केवल तभी समाप्त होगा, जब मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध कर दिया जाएगा, जब परमेश्वर के प्रति वास्तव में समर्पण करने वाले लोगों को पूर्ण कर दिया जाएगा, और जब अपने हृदय में परमेश्वर से रहित छद्मवेशियों को शुद्ध कर दिया जाएगा। जो लोग परमेश्वर के कार्य के अंतिम चरण में उसे संतुष्ट नहीं करते, उन्हें पूरी तरह से निष्कासित कर दिया जाएगा, और जिन्हें निष्कासित कर दिया जाता है, वे शैतान के हो जाते हैं। चूँकि वे परमेश्वर को संतुष्ट करने में अक्षम हैं, इसलिए वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं, और भले ही वे लोग आज परमेश्वर का अनुसरण करते हों, फिर भी इससे यह साबित नहीं होता कि ये वो लोग हैं, जो अंततः बने रहेंगे। "जो लोग अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करेंगे, वे उद्धार प्राप्त करेंगे," इन वचनों में "अनुसरण" का अर्थ क्लेश के बीच डटे रहना है। आज बहुत-से लोग मानते हैं कि परमेश्वर का अनुसरण करना आसान है, किंतु जब परमेश्वर का कार्य समाप्त होने वाला होगा, तब तुम "अनुसरण करने" का असली अर्थ जानोगे। सिर्फ इस बात से कि जीत लिए जाने के पश्चात् तुम आज भी परमेश्वर का अनुसरण करने में समर्थ हो, यह प्रमाणित नहीं होता कि तुम उन लोगों में से एक हो, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा। जो लोग परीक्षणों को सहने में असमर्थ हैं, जो क्लेशों के बीच विजयी होने में अक्षम हैं, वे अंततः डटे रहने में अक्षम होंगे, और इसलिए वे बिलकुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ होंगे। जो लोग सच में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे अपने कार्य की परीक्षा का सामना करने में समर्थ हैं, जबकि जो लोग सच में परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते, वे परमेश्वर के किसी भी परीक्षण का सामना करने में अक्षम हैं। देर-सवेर उन्हें निर्वासित कर दिया जाएगा, जबकि विजेता राज्य में बने रहेंगे। मनुष्य वास्तव में परमेश्वर को खोजता है या नहीं, इसका निर्धारण उसके कार्य की परीक्षा द्वारा किया जाता है, अर्थात्, परमेश्वर के परीक्षणों द्वारा, और इसका स्वयं मनुष्य द्वारा लिए गए निर्णय से कोई लेना-देना नहीं है। परमेश्वर सनक के आधार पर किसी मनुष्य को अस्वीकार नहीं करता; वह जो कुछ भी करता है, वह मनुष्य को पूर्ण रूप से आश्वस्त कर सकता है। वह ऐसा कुछ नहीं करता, जो मनुष्य के लिए अदृश्य हो, या कोई ऐसा कार्य जो मनुष्य को आश्वस्त न कर सके। मनुष्य का विश्वास सही है या नहीं, यह तथ्यों द्वारा साबित होता है, और इसे मनुष्य द्वारा तय नहीं किया जा सकता। इसमें कोई संदेह नहीं कि "गेहूँ को जंगली दाने नहीं बनाया जा सकता, और जंगली दानों को गेहूँ नहीं बनाया जा सकता"। जो सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे सभी अंततः राज्य में बने रहेंगे, और परमेश्वर किसी ऐसे व्यक्ति के साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा, जो वास्तव में उससे प्रेम करता है। अपने विभिन्न कार्यों और गवाहियों के आधार पर राज्य के भीतर विजेता लोग याजकों और अनुयायियों के रूप में सेवा करेंगे, और जो क्लेश के बीच विजेता होंगे, वे राज्य के भीतर याजकों का एक निकाय बन जाएँगे। याजकों का निकाय तब बनाया जाएगा, जब संपूर्ण विश्व में सुसमाचार का कार्य समाप्ति पर आ जाएगा। जब वह समय आएगा, तब जो मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए, वह परमेश्वर के राज्य के भीतर अपने कर्तव्य का निष्पादन होगा, और राज्य के भीतर परमेश्वर के साथ उसका जीना होगा। याजकों के निकाय में महायाजक और याजक होंगे, और शेष लोग परमेश्वर के पुत्र और उसके लोग होंगे। यह सब क्लेश के दौरान परमेश्वर के प्रति उनकी गवाहियों से निर्धारित होता है, ये ऐसी उपाधियाँ नहीं हैं जो सनक के आधार पर दी जाती हैं। जब मनुष्य की हैसियत स्थापित कर दी जाएगी, तो परमेश्वर का कार्य रुक जाएगा, क्योंकि प्रत्येक को उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत कर दिया जाएगा और उसकी मूल स्थिति में लौटा दिया जाएगा, और यह परमेश्वर के कार्य के समापन का चिह्न है, यह परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के अभ्यास का अंतिम परिणाम है, और यह परमेश्वर के कार्य के दर्शनों और मनुष्य के सहयोग का स्फटिकवत् ठोस रूप है। अंत में, मनुष्य परमेश्वर के राज्य में विश्राम पाएगा, और परमेश्वर भी विश्राम करने के लिए अपने निवास-स्थान में लौट जाएगा। यह परमेश्वर और मनुष्य के बीच 6,000 वर्षों के सहयोग का अंतिम परिणाम होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सके और उसकी गवाही दे सके। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का परमेश्वर द्वारा न्याय के बिना, संभवतः मनुष्य अपने धार्मिक स्वभाव को नहीं जान सकता था, जो कोई अपराध नहीं करता और न वह परमेश्वर के अपने पुराने ज्ञान को एक नए रूप में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है, इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के ज़रिए, मनुष्य को परमेश्वर के ज्ञान तक पहुँचने, उसको स्वभाव में रूपांतरित होने और परमेश्वर की ज़बर्दस्त गवाही देने लायक बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का रूपांतरण परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके पास जाने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में रूपांतरण दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के दिल के क़रीब है। आज देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए आया है और वह अपेक्षा रखता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति आज्ञाकारी हो, उसके लिए उसकी गवाही दे—उसके व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जाने, उसके उन सभी वचनों और कार्य का पालन करे, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और उस समस्त कार्य की गवाही दे, जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और साथ ही सभी कर्मों की जिन्हें वह मनुष्य को जीतने के लिए कार्यान्वित करता है। जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही अचूक और वास्तविक होती है और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्‍वर अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने उसके न्याय और उसकी ताड़ना, व्यवहार और काट-छाँट से गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है और इसी तरह वह अपनी गवाही देने के लिए उन लोगों का भी उपयोग करता है, जिनका स्वभाव बदल गया है और जिन्होंने इस प्रकार उसके आशीर्वाद प्राप्त कर लिए हैं। उसे मनुष्य की आवश्यकता नहीं, जो अपने मुँह से उसकी स्तुति करे, न ही उसे शैतान की किस्म के लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जिन्हें उसने नहीं बचाया है। केवल वो जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही देने योग्य हैं और केवल वो जिनके स्वभाव को रूपांतरित कर दिया गया है, उसकी गवाही देने योग्य हैं। परमेश्वर जानबूझकर मनुष्य को अपने नाम को शर्मिंदा नहीं करने देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से उद्धृत

जो सच्चे अर्थों में परमेश्वर की गवाही देते हैं, वे उसकी शानदार गवाही इसलिए दे पाते हैं क्योंकि उनकी गवाही परमेश्वर के सच्चे ज्ञान और उसके लिए सच्ची तड़प की नींव पर टिकी होती है। ऐसी गवाही किसी भावनात्मक आवेग के अनुसार नहीं, बल्कि परमेश्वर और उसके स्वभाव के उनके ज्ञान के अनुसार दी जाती है। चूँकि वे परमेश्वर को जानने लगे हैं, इसलिए उन्हें लगता है कि उन्हें परमेश्वर की गवाही निश्चित रूप से देनी चाहिए, और उन सबको जो परमेश्वर के लिए तड़पते हैं, परमेश्वर को जानने, और परमेश्वर की सुंदरता एवं उसकी वास्तविकता से अवगत होने का अवसर मिलना चाहिए। परमेश्वर के प्रति लोगों के प्रेम की तरह उनकी गवाही भी स्वतः स्फूर्त होती है, वह वास्तविक होती है और उसका महत्व एवं मूल्य वास्तविक होता है। वह निष्क्रिय या खोखली और अर्थहीन नहीं होती। जो परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हैं केवल उन्हीं के जीवन में सर्वाधिक मूल्य और अर्थ होता है, और केवल वही लोग क्यों परमेश्वर में सचमुच विश्वास करते हैं, इसका कारण यह है कि ये लोग परमेश्वर के प्रकाश में रह पाते हैं और परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन के लिए जी पाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अंधकार में नहीं जीते, बल्कि प्रकाश में जीते हैं; वे अर्थहीन जीवन नहीं जीते, बल्कि परमेश्वर द्वारा धन्य किया गया जीवन जीते हैं। केवल वे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं, केवल वे ही परमेश्वर के गवाह हैं, केवल वे ही परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाते हैं, और केवल वे ही परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ प्राप्त कर पाते हैं। वे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, परमेश्वर के अंतरंग हैं; वे परमेश्वर के प्रिय लोग हैं, और वे परमेश्वर के साथ आशीषों का आनंद ले सकते हैं। केवल ऐसे लोग ही अनंत काल तक जीवित रहेंगे, और केवल वे ही हमेशा के लिए परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहेंगे। परमेश्वर लोगों द्वारा प्रेम किए जाने के लिए है, और वह सभी लोगों द्वारा प्रेम किए जाने योग्य है, परंतु सभी लोग परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम नहीं हैं, और न ही सभी लोग परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं और परमेश्वर के सामर्थ्य में सहभागी हो सकते हैं। चूँकि परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने वाले लोग ही परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं और परमेश्वर के कार्य के लिए अपने सभी प्रयास समर्पित कर पाते हैं, इसलिए वे स्वर्ग के नीचे कहीं भी घूम सकते हैं और कोई उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं कर सकता, और वे पृथ्वी पर शक्ति का प्रयोग और परमेश्वर के सभी लोगों पर शासन कर सकते हैं। ये लोग दुनिया भर से एक-साथ आए हैं। वे अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं और उनकी त्वचा के रंग भिन्न-भिन्न हैं, परंतु उनके अस्तित्व का समान अर्थ है; उन सबके पास परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय है, वे सब एक ही गवाही देते हैं, और उनका एक ही संकल्प और एक ही इच्छा है। जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे समूचे संसार में कहीं भी स्वतंत्रता से घूम सकते हैं; और जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, वे संपूर्ण ब्रह्मांड में यात्रा कर सकते हैं। वे लोग परमेश्वर के प्रिय लोग हैं, वे परमेश्वर द्वारा धन्य किए गए लोग हैं, और वे सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

मुझे पतरस जैसे लोग चाहिए, ऐसे लोग जो पूर्ण बनाए जाने का प्रयास करते हैं। आज का सत्य उन्हें दिया जाता है जो उसकी कामना और खोज करते हैं। यह उद्धार उन्हें दिया जाता है जो परमेश्वर द्वारा बचाए जाने की कामना करते हैं, यह सिर्फ तुम लोगों द्वारा प्राप्त करने के लिए नहीं है। इसका उद्देश्य यह है कि तुम लोग परमेश्वर द्वारा ग्रहण किए जाओ; तुम लोग परमेश्वर को ग्रहण करते हो ताकि परमेश्वर तुम्हें ग्रहण कर सके। आज मैंने ये वचन तुम लोगों से कहे हैं, और तुमने इन्हें सुना है, तुम्हें इन वचनों के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। अंत में, जब तुम लोग इन वचनों को व्यवहार में लाओगे, तो उस समय मैं इन वचनों द्वारा तुम्हें ग्रहण कर लूँगा; उसी समय, तुम भी इन वचनों को ग्रहण कर लोगे, यानी तुम लोग यह सर्वोच्च उद्धार पा लोगे। एक बार शुद्ध हो जाने के बाद तुम सच्चे मानव बन जाओगे। यदि तुम सत्य को जीने में असमर्थ हो, या उस व्यक्ति के समान जीवन बिताने में असमर्थ हो, जिसे पूर्ण बना दिया गया है, तो यह कहा जा सकता है कि तुम एक मानव नहीं, एक चलती-फिरती लाश हो, पशु हो, क्योंकि तुममें सत्य नहीं है, दूसरे शब्दों में, तुममें यहोवा की श्वास नहीं है, और इस प्रकार तुम एक मरे हुए इंसान हो जिसमें कोई आत्मा नहीं है! यद्यपि जीत लिए जाने के बाद गवाही देना संभव है, लेकिन इससे तुम्हें थोड़ा-सा ही उद्धार प्राप्त होता है, और तुम ऐसे जीवित प्राणी नहीं बन पाते जिसमें आत्मा है। हालाँकि तुमने ताड़ना और न्याय का अनुभव कर लिया होता है, फिर भी तुम्हारा स्वभाव नहीं बदलता या नवीनीकृत नहीं हुआ होता; तुम अभी भी पुराने बने रहते हो, तुम अभी भी शैतान के अधिकार में होते हो, और तुम एक शुद्ध किए गए इंसान नहीं होते। केवल उन्हीं का मूल्य है जिन्हें पूर्ण बनाया जा चुका है, और केवल ऐसे ही लोगों ने एक सच्चा जीवन प्राप्त किया होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की कोशिश करने के लिए, व्यक्ति को पहले यह समझना होगा कि परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अर्थ क्या होता है, साथ ही, परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए किन शर्तों को पूरा करना होता है। एक बार जब इंसान ऐसे मामलों को समझ लेता है, तब उसे अभ्यास के पथ को खोजना चाहिए। परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए व्यक्ति को एक विशेष गुणवत्ता वाला होना चाहिए। बहुत से लोग स्वाभाविक रूप से उच्च गुणवत्ता वाले नहीं होते, ऐसी स्थिति में तुम्हें कीमत चुकानी चाहिए और अपने स्तर पर मेहनत करनी चाहिए। तुम्हारी गुणवत्ता जितनी कम होगी, तुम्हें उतना ही अधिक प्रयास करना पड़ेगा। परमेश्वर के वचनों की तुम्हारी समझ जितनी अधिक होगी और जितना अधिक तुम उन्हें अभ्यास में लाओगे, उतनी ही जल्दी तुम पूर्ण बनाए जाने के पथ में प्रवेश कर सकते हो। प्रार्थना करने से, तुम प्रार्थना के क्षेत्र में पूर्ण बनाए जा सकते हो; परमेश्वर के वचनों को खाने एवं पीने से, उनके सार को समझने और उनकी वास्तविकता को जीने से भी तुम्हें पूर्ण बनाया जा सकता है। दैनिक आधार पर परमेश्वर के वचनों का अनुभव करके, तुम्हें यह जान लेना चाहिए कि तुममें किस बात की कमी है, इसके अतिरिक्त, तुम्हें अपने घातक दोष एवं कमज़ोरियों को पहचान लेना चाहिए और परमेश्वर से प्रार्थना और विनती करनी चाहिए। ऐसा करके, तुम्हें धीरे-धीरे पूर्ण बनाया जाएगा। पूर्ण बनाए जाने का रास्ता है : प्रार्थना करना, परमेश्वर के वचनों को खाना एवं पीना, परमेश्वर के वचनों के सार को समझना; परमेश्वर के वचनों के अनुभव में प्रवेश करना; तुममें जिस बात की कमी है उसे जानना; परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित होना; परमेश्वर के बोझ को ध्यान में रखना एवं परमेश्वर के लिए अपने प्रेम के द्वारा देह की इच्छाओं का त्याग करना; और अपने भाई-बहनों के साथ निरन्तर सहभागिता में शामिल होना, जो तुम्हारे अनुभवों को समृद्ध करता है। चाहे तुम्हारा सामुदायिक जीवन हो या व्यक्तिगत जीवन, और चाहे बड़ी सभाएँ हों या छोटी हों, तुम सभी से अनुभव एवं प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हो, ताकि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने शांत रहे और परमेश्वर के पास वापस आ जाए। यह सब कुछ पूर्ण बनाए जाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। जैसा कि पहले कहा गया है, परमेश्वर के बोले गए वचनों का अनुभव करने का अर्थ वास्तव में उनका स्वाद ले पाना है और तुम्हें उनके अनुसार जीने देना है ताकि तुम परमेश्वर के प्रति कहीं अधिक बड़ा विश्वास एवं प्रेम पा सकोगे। इस तरीके से, तुम धीरे-धीरे अपना भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव त्याग दोगे; तुम स्वयं को अनुचित इरादों से मुक्त कर लोगे; और एक सामान्य मनुष्य के समान जीवन जियोगे। तुम्हारे भीतर परमेश्वर का प्रेम जितना ज़्यादा होता है—अर्थात, परमेश्वर के द्वारा तुम्हें जितना अधिक पूर्ण बनाया गया है—तुम शैतान के द्वारा उतने ही कम भ्रष्ट किए जाओगे। अपने व्यवहारिक अनुभवों के द्वारा, तुम धीरे धीरे पूर्ण बनाए जाने के पथ में प्रवेश करोगे। इसलिए, यदि तुम पूर्ण बनाए जाना चाहते हो, तो परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखना एवं उसके वचनों का अनुभव करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखो' से उद्धृत

क्या तुम सचमुच पूर्ण बनना चाहते हो? यदि तुम सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण होना चाहते हो, तो तुम्हारे अंदर देह की इच्छाओं का त्याग करने का साहस होगा, तुम परमेश्वर के वचनों को कार्यांवित कर पाओगे और निष्क्रिय एवं कमज़ोर नहीं होगे। तुम परमेश्वर की हर बात का पालन कर पाओगे, तुम्हारे सभी सार्वजनिक और व्यक्तिगत कार्यकलाप, परमेश्वर के सामने लाने लायक होंगे। यदि तुम ईमानदार इंसान हो और सभी चीज़ों में सत्य का अभ्यास करते हो, तो तुम पूर्ण बनाए जाओगे। ऐसे धोखेबाज़ लोग जो दूसरों के सामने एक तरह से व्यवहार करते हैं और उनकी पीठ पीछे दूसरी तरह से कार्य करते हैं तो वे पूर्ण बनने के इच्छुक नहीं होते। वे सब बरबादी और विनाश के पुत्र होते हैं; वे परमेश्वर के नहीं, शैतान के होते हैं। ऐसे लोगों को परमेश्वर नहीं चुनता! यदि तुम्हारे कार्य और व्यवहार को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत नहीं किया जा सके या परमेश्वर के आत्मा द्वारा न देखा जा सके, तो यह इस बात का प्रमाण है कि तुम्हारे साथ कुछ गड़बड़ है। यदि तुम परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करो, और अपने स्वभाव के रूपांतरण पर ध्यान दो, तभी तुम पूर्ण बनाए जाने के पथ पर आ पाओगे। यदि तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने और परमेश्वर की इच्छा पूरी करना चाहते हो, तो तुम्हें, बिना किसी शिकायत के, बिना परमेश्वर के कार्य का मूल्यांकन या आलोचना करने का ख़्याल किए, परमेश्वर के सभी कार्यों का पालन करना चाहिए। परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की ये सबसे कम आवश्यकताएँ हैं। जो लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाना चाहते हैं उनके लिए अनिवार्य आवश्यकताएँ ये हैं : हर काम परमेश्वर से प्रेम करने वाले हृदय से करो। हर काम परमेश्वर से प्रेम करने वाले हृदय से करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुम्हारे सारे काम और आचरण को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत किया जा सकता है। चूँकि तुम्हारे इरादे सच्चे हैं, इसलिए चाहे तुम्हारे काम सही हों या गलत, तुम उन्हें परमेश्वर या भाई-बहनों को दिखाने से नहीं डरोगे; तुम परमेश्वर के सामने शपथ लेने का साहस रखोगे। तुम्हें अपना हर इरादा और सोच-विचार परमेश्वर के सामने जाँच के लिए प्रस्तुत करना चाहिए; यदि तुम इस प्रकार से अभ्यास और प्रवेश करोगे, तो जीवन में तुम्हारी प्रगति शीघ्र होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर के द्वारा उपयोग और पूर्ण किए जाना चाहते हो, तो तुम में हर चीज मौज़ूद अवश्य होनी चाहिए : पीड़ा सहने की इच्छाशक्ति, विश्वास, सहनशीलता, तथा आज्ञाकारिता और साथ ही परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने, परमेश्वर की इच्छा की समझ और उसके दुःख के बारे में विचारशीलता प्राप्त करने की योग्यता, इत्यादि। किसी व्यक्ति को पूर्ण बनाना आसान नहीं है, और तुम्हारे द्वारा अनुभव किए गए प्रत्येक शुद्धिकरण में तुम्हारे विश्वास और प्यार की आवश्यकता होती है। यदि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाना चाहते हो, तो केवल मार्ग पर दौड़ कर आगे चले जाना पर्याप्त नहीं है, न ही केवल स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना ही पर्याप्त है। तुम्हें एक ऐसा व्यक्ति बनने के लिए, जिसे परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जाता है, बहुत सी चीज़ों से सम्पन्न अवश्य होना चाहिए। जब तुम कष्टों का सामना करते हो तो तुम्हें देह पर विचार नहीं करने और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत नहीं करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। जब परमेश्वर अपने आप को तुमसे छिपाता है, तो तुम्हें उसका अनुसरण करने के लिए, अपने पिछले प्यार को लड़खड़ाने या मिटने न देते हुए उसे बनाए रखने के लिए, तुम्हें विश्वास रखने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर क्या करता है, तुम्हें उसके मंसूबे के प्रति समर्पण अवश्य करना चाहिए, और उसके विरूद्ध शिकायत करने की अपेक्षा अपनी स्वयं की देह को धिक्कारने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब तुम्हारा परीक्षणों से सामना होता है तो तुम्हें अपनी किसी प्यारी चीज़ से अलग होने की अनिच्छा, या बुरी तरह रोने के बावजूद तुम्हें अवश्य परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। केवल यही सच्चा प्यार और विश्वास है। तुम्हारी वास्तविक कद-काठी चाहे जो भी हो, तुममें सबसे पहले कठिनाई को भुगतने की इच्छा और सच्चा विश्वास, दोनों ही अवश्य होना चाहिए और तुममें देह-सुख को त्याग देने की इच्छा अवश्य होनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के उद्देश्य से व्यक्तिगत कठिनाइयों का सामना करने और अपने व्यक्तिगत हितों का नुकसान उठाने के लिए तैयार होना चाहिए। तुम्हें अपने हृदय में अपने बारे में पछतावा महसूस करने में भी अवश्य समर्थ होना चाहिए : अतीत में तुम परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर पाते थे, और अब तुम स्वयं पर पछतावा कर सकते हो। इनमें से किसी भी एक का अभाव तुममें बिलकुल नहीं होना चाहिए—परमेश्वर इन चीज़ों के द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाएगा। यदि तुम इन कसौटियों पर खरे नहीं उतरते हो, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

पतरस ने स्वयं को जानने का और यह देखने का प्रयत्न किया था कि परमेश्वर के वचनों के शुद्धिकरण से और परमेश्वर द्वारा उसके लिए उपलब्ध कराए गए विभिन्न परीक्षणों के भीतर उसमें क्या प्रकट हुआ था। जब वह वास्तव में खुद को समझने लगा, तो पतरस को एहसास हुआ कि मनुष्य कितनी गहराई तक भ्रष्ट हैं, वे परमेश्वर की सेवा करने की दृष्टि से कितने बेकार और अयोग्य हैं, और कि वे परमेश्वर के समक्ष जीने के लायक नहीं है। पतरस तब परमेश्वर के सामने दंडवत हो गया। अंतत:, उसने सोचा, "परमेश्वर को जानना सबसे मूल्यवान है! अगर मैं परमेश्वर को जानने से पहले मर गया, तो यह बहुत दयनीय होगा; मुझे लगता है कि परमेश्वर को जानना सबसे महत्त्वपूर्ण, सबसे अर्थपूर्ण बात है। यदि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता, तो वह जीने के योग्य नहीं है, और उसके पास कोई जीवन नहीं है।" जब तक पतरस का अनुभव इस बिंदु तक पहुँचा, तब तक वह अपनी प्रकृति को जान गया था और उसने उसकी अपेक्षाकृत अच्छी समझ हासिल कर ली थी। हालाँकि वह शायद इसे उतनी अच्छी तरह नहीं समझा पाता जितनी स्पष्टता के साथ आजकल लोग समझाने में सक्षम होंगे, लेकिन वह निस्संदेह इस स्थिति में पहुँच गया था। इसलिए, जीवन की खोज करने और परमेश्वर से पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के वचनों के भीतर से अपने स्वभाव की गहरी समझ प्राप्त करने, और साथ ही अपनी प्रकृति के पहलुओं को समझने और शब्दों में उसका सटीक रूप से वर्णन करने, स्पष्ट और सादे ढंग से बोलने की ज़रूरत है। सही मायने में खुद को जानना यही है और फिर तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित परिणाम प्राप्त कर लोगे। यदि तुम्हारा ज्ञान इस बिंदु तक नहीं पहुँचा है, फिर भी तुम खुद को समझने का दावा करते हो और कहते हो कि तुमने जीवन प्राप्त कर लिया है, तो क्या तुम केवल डींग नहीं मार रहे हो? तुम खुद को नहीं जानते, और न ही तुम यह जानते हो कि तुम परमेश्वर के सामने क्या हो, तुमने वास्तव में एक इंसान होने के मानक पूरे कर लिए हैं या नहीं, या तुम्हारे भीतर अभी भी कितने शैतानी तत्त्व हैं। तुम अभी भी इस बारे में अस्पष्ट हो कि तुम किससे संबंधित हो, और तुम्हारे पास कोई आत्म-ज्ञान नहीं है—फिर परमेश्वर के सामने तुम्हारे पास विवेक कैसे हो सकता है? जब पतरस जीवन की खोज कर रहा था, तो उसने खुद को समझने और अपने परीक्षणों के दौरान अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान केंद्रित किया, और उसने परमेश्वर को जानने का प्रयास किया, और अंत में उसने सोचा, "लोगों को जीवन में परमेश्वर की समझ पाने की कोशिश करनी चाहिए; उसे जानना सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। अगर मैं परमेश्वर को नहीं जानता, तो मरने पर मुझे शांति नहीं मिलेगी। परमेश्वर को जान लेने के बाद, अगर वह मुझे मरने देता है, तो भी मैं ऐसा करने में सर्वाधिक कृतज्ञ महसूस करूँगा; मैं ज़रा भी शिकायत नहीं करूँगा, और मेरा पूरा जीवन सफल हो चुका होगा।" पतरस समझ का यह स्तर हासिल करने या इस बिंदु पर पहुँचने में परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू करने के तुरंत बाद ही सक्षम नहीं हो गया था; पहले उसे बहुत परीक्षणों से गुज़रना पड़ा था। परमेश्वर को जानने का मूल्य समझ सकने से पहले उसके अनुभव को एक निश्चित मील-पत्थर तक पहुँचना पड़ा था, और उसे खुद को पूरी तरह से समझना पड़ा था। इसलिए, पतरस ने जो मार्ग अपनाया, वह जीवन पाने और पूर्ण किए जाने का मार्ग था; उसका विशिष्ट अभ्यास मुख्य रूप से इसी पहलू पर केंद्रित था।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

वर्तमान में, तुम लोगों को जो मुख्य रूप से कोशिश करनी चाहिए, वह है सब बातों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना, और उन सब लोगों, मामलों और चीजों के माध्यम से परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना, जिनसे तुम लोगों का सामना होता है, ताकि परमेश्वर जो है, वह और अधिक तुम्हारे अंदर गढ़ा जाए। तुम्हें पहले पृथ्वी पर परमेश्वर की विरासत को पाना है; केवल तभी तुम और अधिक विरासत पाने के पात्र बनोगे। ये सब ही वे चीज़ें हैं, जिन्हें तुम लोगों को खोजना चाहिए और अन्य सब चीजों से पहले समझना चाहिए। जितना अधिक तुम परमेश्वर द्वारा हर चीज़ में पूर्ण किए जाने की कोशिश करोगे, उतना अधिक तुम सभी चीज़ों में परमेश्वर का हाथ देख पाओगे, जिसके परिणामस्वरूप तुम, विभिन्न परिप्रेक्ष्यों और विभिन्न मामलों के माध्यम से, परमेश्वर के वचन की सत्ता और उसके वचन की वास्तविकता में प्रवेश करने की सक्रियता से कोशिश करोगे। तुम ऐसी निष्क्रिय स्थितियों से संतुष्ट नहीं हो सकते, जैसे कि मात्र पाप नहीं करना, या जीने के लिए कोई धारणा, कोई दर्शन नहीं रखना, या कोई मानवीय इच्छा नहीं होना। परमेश्वर मनुष्य को कई तरीकों से पूर्ण बनाता है; सभी मामलों में पूर्ण बनाए जाने की संभावना है, और वह तुम्हें न केवल सकारात्मक रूप में पूर्ण बना सकता है, बल्कि नकारात्मक रूप में भी बना सकता है, ताकि जो तुम प्राप्त करो, वह प्रचुर मात्रा में हो। हर एक दिन परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर और प्राप्त किए जाने के मौके होते हैं। कुछ समय तक ऐसा अनुभव करने के बाद तुम बहुत बदल जाओगे और स्वाभाविक रूप से ऐसी कई चीज़ें समझ जाओगे, जिनसे तुम पहले अनभिज्ञ थे। तुम्हें दूसरों से निर्देश पाने की कोई आवश्यकता नहीं होगी; तुम्हारे जाने बिना परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध बनाएगा, ताकि तुम सभी चीज़ों में प्रबोधन प्राप्त कर सको और अपने सभी अनुभवों में विस्तार से प्रवेश कर सको। परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, ताकि तुम दाएँ-बाएँ न भटक जाओ, और इस तरह तुम उसके द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर पैर रख दोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रतिज्ञाएँ उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के द्वारा पूर्णता तक सीमित नहीं किया सकता। इस प्रकार का अनुभव बहुत एकतरफा होगा, इसमें बहुत कम चीज़ शामिल होगी और यह लोगों को केवल बहुत छोटे दायरे में सीमित कर देगा। ऐसा होने से लोगों को उस आध्यात्मिक पोषण की बहुत कमी होगी, जिसकी उन्हें आवश्यकता है। यदि तुम लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो, तो तुम्हें यह सीखना कि सभी मामलों में कैसे अनुभव किया जाए, और अपने साथ घटित होने वाली हर चीज़ में प्रबोधन प्राप्त करने योग्य बनना आवश्यक है। वह चीज़ अच्छी हो या बुरी, तुम्हें वह लाभ ही पहुँचाए और तुम्हें नकारात्मक न बनाए। इस बात पर ध्यान दिए बिना, तुम्हें चीज़ों पर परमेश्वर के पक्ष में खड़े होकर विचार करने में सक्षम होना चाहिए और मानवीय दृष्टिकोण से उनका विश्लेषण या अध्ययन नहीं करना चाहिए (यह तुम्हारे अनुभव में भटकना होगा)। यदि तुम ऐसा अनुभव करते हो, तो तुम्हारा हृदय तुम्हारे जीवन के बोझ से भर जाएगा; तुम निरंतर परमेश्वर के मुखमंडल की रोशनी में जियोगे, और अपने अभ्यास में आसानी से विचलित नहीं होओगे। ऐसे लोगों का भविष्य उज्ज्वल होता है। परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के बहुत सारे अवसर हैं। यह सब इस बात पर निर्भर करता है क्या तुम लोग सच में परमेश्वर से प्यार करते हो और क्या तुम लोगों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने, परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने, और उसके आशीष और विरासत प्राप्त करने का संकल्प है। केवल संकल्प ही काफी नहीं है। तुम लोगों के पास बहुत ज्ञान होना चाहिए, अन्यथा तुम लोग अपने अभ्यास में हमेशा भटकते रहोगे। परमेश्वर तुम लोगों में से प्रत्येक को पूर्ण बनाने का इच्छुक है। वर्तमान में, लंबे समय से अधिकांश लोगों ने पहले ही परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है, लेकिन उन्होंने अपने आपको मात्र परमेश्वर के अनुग्रह में आनंद लेने तक सीमित कर लिया है, और वे केवल उससे देह के कुछ सुख पाने के लिए लालायित हैं, उससे अधिक और उच्चतर खुलासे प्राप्त करने के इच्छुक नहीं है। इससे पता चलता है कि मनुष्य का हृदय अभी भी हमेशा बाहरी बातों में लगा रहता है। भले ही मनुष्य के कार्य, उसकी सेवा और परमेश्वर के लिए उसके प्रेमी हृदय में कुछ अशुद्धताएँ कम हों, पर जहाँ तक उसके भीतरी सार और उसकी पिछड़ी सोच का संबंध है, मनुष्य अभी भी निरंतर देह की शांति और आनंद की खोज में लगा है और परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाए जाने की शर्तों और प्रयोजनों की जरा भी परवाह नहीं करता। और इसलिए, ज्यादातर लोगों का जीवन अभी भी असभ्य और पतनशील है। उनका जीवन जरा भी नहीं बदला है; वे स्पष्टत: परमेश्वर में विश्वास को कोई महत्वपूर्ण मामला नहीं मानते, बल्कि ऐसा लगता है जैसे वे बस दूसरों की खातिर परमेश्वर में विश्वास करते हैं, प्रेरणाओं से संचालित हैं, और निष्प्रयोजन अस्तित्व में भटकते हुए लापरवाही से जी रहे हैं। कुछ ही हैं, जो सब चीज़ों में परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने की कोशिश कर पाते हैं, अधिक और कीमती वस्तुएँ पाते हैं, परमेश्वर के घर में आज बड़े धनी बन गए हैं, और परमेश्वर के अधिक आशीष पा रहे हैं। यदि तुम सब चीज़ों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो, और पृथ्वी पर परमेश्वर ने जो देने का वादा किया है, उसे प्राप्त करने में समर्थ हो; यदि तुम सब चीज़ों में परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध होना चाहते हो और वर्षों को बेकार गुज़रने नहीं देते, तो सक्रियता से प्रवेश करने का यह आदर्श मार्ग है। केवल इसी तरह से तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य और पात्र बनोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रतिज्ञाएँ उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, प्रार्थना का अभ्यास करना, परमेश्वर के बोझ को स्वीकार करना, और उसे स्वीकार करना जो उसने तुम्हें सौंपा है—ये सब मार्ग को प्राप्त करने के उद्देश्य से हैं। परमेश्वर द्वारा सौंपा गया जितना अधिक बोझ तुम्हारे ऊपर होगा, तुम्हारे लिए उसके द्वारा पूर्ण बनाया जाना उतना ही आसान होगा। कुछ लोग परमेश्वर की सेवा में दूसरों के साथ समन्वय करने के इच्छुक नहीं होते, तब भी नहीं जबकि वे बुलाए जाते हैं; ये आलसी लोग केवल आराम का सुख उठाने के इच्छुक होते हैं। तुमसे जितना अधिक दूसरों के साथ समन्वय करने का आग्रह किया जाएगा, तुम उतना ही अधिक अनुभव प्राप्त करोगे। तुम्हारे पास अधिक बोझ होने के कारण, तुम अधिक अनुभव करोगे, तुम्हारे पास पूर्ण बनाए जाने का अधिक मौका होगा। इसलिए, यदि तुम सच्चे मन से परमेश्वर की सेवा कर सको, तो तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहोगे; और इस तरह तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाये जाने का अधिक अवसर होगा। ऐसे ही मनुष्यों के एक समूह को इस समय पूर्ण बनाया जा रहा है। पवित्र आत्मा जितना अधिक तुम्हें स्पर्श करेगा, तुम उतने ही अधिक परमेश्वर के बोझ के लिए विचारशील रहने के प्रति समर्पित होओगे, तुम्हें परमेश्वर द्वारा उतना अधिक पूर्ण बनाया जाएगा, तुम्हें उसके द्वारा उतना अधिक प्राप्त किया जाएगा, और अंत में, तुम ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जिसे परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त किया जाता है। वर्तमान में, कुछ ऐसे लोग हैं जो कलीसिया के लिए कोई बोझ नहीं उठाते। ये लोग सुस्त और ढीले-ढाले हैं, और वे केवल अपने शरीर की चिंता करते हैं। ऐसे लोग बहुत स्वार्थी होते हैं और अंधे भी होते हैं। यदि तुम इस मामले को स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम नहीं होते हो, तो तुम कोई बोझ नहीं उठा पाओगे। तुम जितना अधिक परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखोगे, तुम्हें परमेश्वर उतना ही अधिक बोझ सौंपेगा। स्वार्थी लोग ऐसी चीज़ें सहना नहीं चाहते; वे कीमत नहीं चुकाना चाहते, परिणामस्वरूप, वे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर से चूक जाते हैं। क्या वे अपना नुकसान नहीं कर रहे हैं? यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखता है, तो तुम कलीसिया के लिए वास्तविक बोझ विकसित करोगे। वास्तव में, इसे कलीसिया के लिए बोझ उठाना कहने की बजाय, यह कहना चाहिए कि तुम खुद अपने जीवन के लिए बोझ उठा रहे हो, क्योंकि कलीसिया के प्रति बोझ तुम इसलिए पैदा करते हो, ताकि तुम ऐसे अनुभवों का इस्तेमाल परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए कर सको। इसलिए, जो भी कलीसिया के लिए सबसे भारी बोझ उठाता है, जो भी जीवन में प्रवेश के लिए बोझ उठाता है, उसे ही परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाता है। क्या तुमने इस बात को स्पष्ट रूप से समझ लिया है? जिस कलीसिया के साथ तुम हो, यदि वह रेत की तरह बिखरी हुई है, लेकिन तुम न तो चिंतित हो और न ही व्याकुल, यहाँ तक कि जब तुम्हारे भाई-बहन परमेश्वर के वचनों को सामान्य ढंग से खाते-पीते नहीं हैं, तब भी तुम आँख मूंद लेते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम कोई जिम्मेदारी वहन नहीं कर रहे। ऐसे मनुष्य से परमेश्वर प्रसन्न नहीं होता। परमेश्वर जिनसे प्रसन्न होता है वे लोग धार्मिकता के भूखे और प्यासे होते हैं और वे परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होते हैं। इसलिए, तुम्हें परमेश्वर के बोझ के लिए अभी तुरंत विचारशील हो जाना चाहिए; परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील होने से पहले तुम्हें इंतजार नहीं करना चाहिए कि परमेश्वर सभी लोगों के सामने अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करे। क्या तब तक बहुत देर नहीं हो जाएगी? परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए अभी अच्छा अवसर है। यदि तुम अपने हाथ से इस अवसर को निकल जाने दोगे, तो तुम जीवन भर पछताओगे, जैसे मूसा कनान की अच्छी भूमि में प्रवेश नहीं कर पाया और जीवन भर पछताता रहा, पछतावे के साथ ही मरा। एक बार जब परमेश्वर अपना धार्मिक स्वभाव सभी लोगों पर प्रकट कर देगा, तो तुम पछतावे से भर जाओगे। यदि परमेश्वर तुम्हें ताड़ना नहीं भी देता है, तो भी तुम स्वयं ही अपने आपको अपने पछतावे के कारण ताड़ना दोगे। कुछ लोग इस बात से आश्वस्त नहीं हैं, यदि तुम्हें इस पर विश्वास नहीं है, तो इन्तजार करो और देखो। कुछ लोगों का उद्देश्य एकमात्र इन वचनों को साकार करना है। क्या तुम इन वचनों के लिए खुद को बलिदान करने को तैयार हो?

यदि तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर को नहीं ढूँढते हो, और यदि तुम पूर्णता की अपनी खोज में बाकियों से आगे रहने का प्रयास नहीं करोगे, तो तुम अंततः पछताओगे। यह समय ही पूर्ण बनाए जाने का श्रेष्ठ अवसर है; यह बहुत ही अच्छा समय है। यदि तुम गंभीरतापूर्वक परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की कोशिश नहीं करोगे, तो उसका काम पूरा हो जाने पर, बहुत देर हो जाएगी—तुम अवसर से चूक जाओगे। तुम्हारी अभिलाषा कितनी भी बड़ी हो, यदि परमेश्वर ने काम करना बंद कर दिया है तो फिर तुम चाहे कितने भी प्रयास कर लो, तुम कभी भी पूर्णता हासिल नहीं कर पाओगे। जब पवित्र आत्मा अपना महान कार्य कर रहा हो तो तुम्हें इस अवसर को हथिया लेना चाहिए और सहयोग करना चाहिए। यदि तुम इस अवसर को गँवा दोगे, तो फिर चाहे कितने भी प्रयास कर लो, तुम्हें दूसरा अवसर नहीं दिया जाएगा। तुम में से कुछ लोग चिल्लाते हैं, "परमेश्वर, मैं तुम्हारे बोझ के प्रति विचारशील होने का इच्छुक हूँ, और मैं तुम्हारी इच्छा को संतुष्ट करने का इच्छुक हूँ!" लेकिन तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं है, इसलिए तुम्हारा बोझ अंत तक टिकेगा नहीं। यदि तुम्हारे सामने एक मार्ग है, तो तुम धीरे-धीरे अनुभव प्राप्त करोगे और तुम्हारा अनुभव संरचित और संयोजित होगा। एक बोझ पूरा हो जाने के बाद, तुम्हें दूसरा दिया जाएगा। जैसे-जैसे तुम्हारा जीवन अनुभव गहरा होगा, तुम्हारा बोझ भी गहन होता जाएगा। कुछ लोग तभी बोझ उठाते हैं जब वे पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श किए जाते हैं; कुछ समय के बाद, जब उनके पास अभ्यास के लिए कोई मार्ग नहीं होता, तो वे कोई भी बोझ उठाना बंद कर देते हैं। मात्र परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से तुम बोझ का विकास नहीं कर सकते। बहुत सारे सत्य को समझ कर, तुम विवेक हासिल कर पाओगे और तुम सत्य के उपयोग से समस्याओं को हल करने में सक्षम बन जाओगे, और तुम्हारे पास परमेश्वर के वचन और इच्छा की और भी सटीक समझ होगी। इन बातों के साथ, तुम बोझ विकसित करोगे, और तुम तभी सही ढंग से काम कर पाओगे। यदि तुम्हारे पास बोझ है, लेकिन तुम्हारे पास सत्य की स्पष्ट समझ नहीं है, तो यह भी काम नहीं करेगा; तुम्हें व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना चाहिए, और तुम्हें यह पता होना चाहिए कि उनका अभ्यास कैसे करना है। जब तुम वास्तविकता में प्रवेश कर लोगे, तभी तुम दूसरों को पोषण दे सकोगे, उनकी अगुवाई कर सकोगे, और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जा सकोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखो' से उद्धृत

पूर्ण बनाए गए लोगों में न केवल सामान्य मानवता होती है, बल्कि उनमें ऐसे सत्य होते हैं जो चेतना के मापदंडों से बढ़कर होते हैं, और जो चेतना के मानकों से ऊँचे हैं; वे परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल देने के लिए न केवल अपनी चेतना का इस्तेमाल करते हैं, बल्कि, वे परमेश्वर को जान चुके होते हैं, यह देख चुके होते हैं कि परमेश्वर प्रिय है, वह मनुष्य के प्रेम के योग्य है, परमेश्वर में प्रेम करने योग्य इतना कुछ है कि मनुष्य उसे प्रेम किए बिना नहीं रह सकता! वे लोग जिन्हें पूर्ण बनाया जा चुका है उनका परमेश्वर के लिए प्रेम उनकी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए है। उनका प्रेम स्वैच्छिक है, एक ऐसा प्रेम जो बदले में कुछ भी नहीं चाहता, और जो सौदेबाज़ी नहीं है। परमेश्वर से उनके प्रेम का कारण उसके बारे में उनके ज्ञान को छोड़कर और कुछ भी नहीं है। ऐसे लोग यह परवाह नहीं करते कि परमेश्वर उन पर अनुग्रह करेगा कि नहीं, और वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के सिवा और किसी भी चीज से तृप्त नहीं होते हैं। वे परमेश्वर से मोल-भाव नहीं करते, न ही वे परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को चेतना से मापते हैं : "तुमने मुझे दिया है, तो उसके बदले में मैं तुमसे प्रेम करता हूँ; यदि तुम मुझे कुछ नहीं देते, तो बदले में मेरे पास भी तुम्हेँ देने के लिए कुछ नहीं है।" जिन्हें पूर्ण बनाया गया है, वे हमेशा यह विश्वास करते हैं : "परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, और वह हम पर अपना कार्य करता है। चूँकि मेरे पास पूर्ण बनाए जाने का यह अवसर, परिस्थिति और योग्यता है, इसीलिए एक अर्थपूर्ण जीवन बिताना ही मेरा लक्ष्य होना चाहिए, और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए।" यह बिलकुल वैसा ही है जैसा पतरस ने अनुभव किया था : जब वह सबसे कमजोर स्थिति में था, तब उसने प्रार्थना की और कहा, "हे परमेश्वर! तू जानता है कि मैंने समय और स्थान की परवाह न करते हुए, हमेशा तुझे याद किया है। तू जानता है कि चाहे कोई भी समय और स्थान हो, मैं तुझसे प्रेम करना चाहता हूँ, परंतु मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, मैं बहुत कमजोर और शक्तिहीन हूँ, मेरा प्रेम बहुत सीमित है, और तेरे प्रति मेरी सत्यनिष्ठा बहुत कम है। तेरे प्रेम की तुलना में, मैं जीने के योग्य भी नहीं हूँ। मैं केवल यही कामना करता हूँ कि मेरा जीवन व्यर्थ न हो, और मैं न केवल तेरे प्रेम का प्रतिफल दे सकूँ, बल्कि, इसके अतिरिक्त जो कुछ भी मेरे पास है वह सब तुझे समर्पित कर सकूँ। यदि मैं तुझे संतुष्ट कर सकूँ, तो एक प्राणी के नाते, मेरे मन में शांति होगी, और मैं कुछ और नहीं मांगूंगा। यद्यपि अभी मैं कमजोर और शक्तिहीन हूँ, फिर भी मैं तेरे उपदेशों को नहीं भूलूंगा, और मैं तेरे प्रेम को नहीं भूलूंगा। अभी तो मैं बस तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के सिवा कुछ और नहीं कर रहा हूँ। हे परमेश्वर, मुझे बहुत बुरा लग रहा है! मेरे हृदय में तेरे लिए जो प्रेम है उसे मैं तुझे वापस कैसे लौटा सकता हूँ, मेरी क्षमता में जो भी है उसे मैं कैसे कर सकता हूँ, मैं तेरी इच्छाओं को पूरा करने के योग्य कैसे बन सकता हूँ, और जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब कुछ तुझे भेंट चढ़ाने के योग्य कैसे बन सकता हूँ? तू मनुष्य की कमजोरी को जानता है; मैं तेरे प्रेम के काबिल कैसे हो सकता हूँ? हे परमेश्वर! तू जानता है कि मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, मेरा प्रेम बहुत थोड़ा-सा है। इस प्रकार की परिस्थितियों में मैं अपनी क्षमतानुसार सर्वोत्तम कार्य कैसे कर सकता हूँ? मैं जानता हूँ कि मुझे तेरे प्रेम का प्रतिफल देना चाहिए, मैं जानता हूँ कि मुझे वह सब कुछ देना चाहिए जो मेरे पास है, परंतु आज मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है। मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू मुझे सामर्थ्य और आत्मविश्वास दे, जिससे तुझे अर्पित करने के लिए मैं और अधिक शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने के काबिल हो जाऊँ, और जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब कुछ अर्पित कर पाऊँ; न केवल मैं तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के योग्य हो जाऊँगा, बल्कि तेरी ताड़ना, न्याय और परीक्षणों, यहाँ तक कि कठिन अभिशापों का भी अनुभव करने के योग्य हो जाऊँगा। तूने मुझे अपना प्रेम दिखा दिया, और मैं ऐसा नहीं कर सकता कि तुझसे प्रेम न करूँ। आज भले ही मैं कमजोर और शक्तिहीन हूँ, फिर भी मैं तुझे कैसे भूल सकता हूँ? तेरे प्रेम, ताड़ना और न्याय से मैंने तुझे जाना है, फिर भी तेरे प्रेम की पूर्ति करने में मैं खु़द को असमर्थ पा रहा हूँ, क्योंकि तू महान है। जो कुछ मेरे पास है, वह सब-कुछ मैं सृष्टिकर्ता को कैसे अर्पित कर सकता हूँ?" पतरस की विनती ऐसी थी, फिर भी उसका आध्यात्मिक कद बहुत मामूली था। उस क्षण, उसने ऐसा महसूस किया मानो एक कटार उसके हृदय के आर-पार हो गई हो। वह अत्यंत दुखी था; वह नहीं जानता था कि ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए। फिर भी वह लगातार प्रार्थना करता रहा : "हे परमेश्वर! मनुष्य का आध्यात्मिक कद एक बच्चे जैसा है, उसकी चेतना बहुत कमजोर है, और तेरा प्रेम ही एकमात्र ऐसी चीज है जिसका प्रतिफल मैं दे सकता हूँ। आज, मैं नहीं जानता कि तेरी इच्छाओं को कैसे संतुष्ट करूँ, और मैं बस वह सब करना चाहता हूँ जो मैं कर सकता हूँ, वह सब तुझे देना चाहता हूँ जो मेरे पास है और अपना सब-कुछ तुझे अर्पित कर देना चाहता हूँ। तेरे न्याय के बावजूद, तेरी ताड़नाओं के बावजूद, इसके बावजूद कि तू मुझे क्या देता है, इसके बावजूद कि तू मुझसे क्या ले लेता है, मुझे तेरे प्रति जरा-सी भी शिकायत से मुक्त कर दे। कई बार, जब तूने मुझे ताड़ना दी और मेरा न्याय किया, तो मैं मन ही मन भुनभुनाया करता था, और मैं शुद्ध नहीं हो पाता था या तेरी इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पाता था। मैंने मजबूरी में ही तेरे प्रेम का प्रतिफल दिया था, और इस क्षण मैं अपने-आपसे और भी अधिक नफरत कर रहा हूँ।" चूँकि पतरस परमेश्वर से अधिक शुद्ध प्रेम करने का प्रयास कर रहा था, इसलिए उसने ऐसी प्रार्थना की थी। वह खोज रहा था, और विनती कर रहा था, उससे भी बढ़कर, वह खुद को दोष दे रहा था, परमेश्वर के सामने अपने पापों को स्वीकार कर रहा था। उसने महसूस किया कि वह परमेश्वर का ऋणी है, उसे अपने-आपसे नफरत होने लगी, लेकिन वह थोड़ा उदास और निढाल भी था। उसे हमेशा ऐसा महसूस होता था, मानो वह परमेश्वर की इच्छाओं को पूरा करने लायक नहीं है, और वह अपना सर्वोत्तम देने में असमर्थ है। ऐसी स्थितियों में, पतरस ने अय्यूब के विश्वास का ही अनुसरण किया। उसने देखा था कि अय्यूब का विश्वास कितना बड़ा था, क्योंकि अय्यूब ने जान लिया था कि उसका सब कुछ परमेश्वर का दिया हुआ है, और अगर परमेश्वर सब कुछ वापस ले लेता है तो यह स्वभाविक ही है, परमेश्वर जिसको चाहेगा उसको देगा—ऐसा था परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव। अय्यूब ने कोई शिकायत नहीं की थी, और वह तब भी परमेश्वर की स्तुति कर रहा था। पतरस भी अपने-आपको जानता था, उसने मन ही मन प्रार्थना की, "आज अपनी चेतना का इस्तेमाल करके और तेरे प्रेम का बदला चुका कर मुझे संतुष्ट नहीं होना चाहिए, मैं तुझे चाहे जितना प्रेम वापस लौटाऊँ उससे भी मुझे संतुष्ट नहीं होना चाहिए, क्योंकि मेरे विचार बहुत ही भ्रष्ट हैं, और मैं तुझे सृष्टिकर्ता के रूप में देख पाने में असमर्थ हूँ। क्योंकि मैं अभी भी तुझसे प्रेम करने योग्य नहीं हूँ, मुझे वह योग्यता हासिल करनी होगी जिससे मेरे पास जो भी है, वह सब कुछ मैं तुझे अर्पित कर सकूँ, और मैं यह खुशी से करूँगा। मुझे वह सब कुछ जानना होगा जो तूने किया है, और मेरे पास कोई और विकल्प नहीं है, मुझे तेरे प्रेम को देखना होगा, मुझे तेरी स्तुति करने और तेरे पवित्र नाम का गुणगान करने के योग्य होना होगा, ताकि तू मेरे ज़रिए महान महिमा प्राप्त कर सके। मैं तेरी इस गवाही में मजबूती के साथ खड़ा होने को तैयार हूँ। हे परमेश्वर! तेरा प्रेम कितना बहुमूल्य और सुंदर है; मैं उस दुष्ट के हाथों में जीने की कामना कैसे कर सकता था? क्या मुझे तूने नहीं बनाया था? मैं शैतान के अधीन कैसे रह सकता था? मैं अपने समूचे अस्तित्व के साथ तेरी ताड़नाओं में रहना अधिक पसंद करूंगा। मैं उस दुष्ट के अधीन नहीं जीना चाहता। यदि मुझे पवित्र बनाया जा सके और यदि मैं अपना सब कुछ तुझे अर्पित कर सकूँ, तो मैं अपने शरीर और मन को तेरे न्याय और ताड़ना की भेंट चढ़ाने को तैयार हूँ, क्योंकि मैं शैतान से घृणा करता हूँ, मैं उसके अधीन जीवन बिताने को तैयार नहीं हूँ। मेरा न्याय करके तू अपना धार्मिक स्वभाव दर्शाता है; मैं खुश हूँ, और मुझे जरा-सी भी शिकायत नहीं है। यदि मैं एक प्राणी होने के कर्तव्य को निभा सकूँ, तो मैं तैयार हूँ कि मेरा संपूर्ण जीवन तेरे न्याय से जुड़ जाए, जिसके जरिए मैं तेरे धार्मिक स्वभाव को जान पाऊँगा, और शैतान के प्रभाव से अपने-आपको छुड़ा पाऊँगा।" पतरस ने हमेशा इस प्रकार प्रार्थना की, हमेशा इस प्रकार ही खोज की, और सापेक्ष रूप से कहें तो, वह एक ऊँचे आयाम पर पहुँच गया। वह न केवल परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल दे पाया, बल्कि, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसने एक प्राणी के तौर पर भी अपना कर्तव्य निभाया। न केवल उसकी चेतना ने उसे दोषी नहीं ठहराया, बल्कि वह चेतना के मानकों से भी ऊँचा उठ सका। उसकी प्रार्थनाएँ लगातार ऊपर परमेश्वर के सामने पहुँचती रहीं, कुछ इस तरह कि उसकी आकांक्षाएँ और भी ऊँची हो गईं, और परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम और भी विशाल हो गया। यद्यपि उसने भयानक पीड़ा सही, फिर भी वह परमेश्वर से प्रेम करना नहीं भूला, और फिर भी उसने परमेश्वर की इच्छा को समझने की क्षमता प्राप्त करने का प्रयास किया। अपनी प्रार्थनाओं में उसने ये बातें कहीं : तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के अलावा मैंने और कुछ नहीं किया है। "मैंने शैतान के सामने तेरे लिए गवाही नहीं दी है, मैंने अपने-आपको शैतान के प्रभाव से आजाद नहीं किया है, और मैं अब भी देह की इच्छाओं में ही जी रहा हूँ। मैं अपने प्रेम का इस्तेमाल करके शैतान को हराने की, उसे लज्जित करने की, और इस प्रकार तेरी इच्छा को संतुष्ट करने की कामना कर रहा हूँ। मैं तुझे अपना सर्वस्व अर्पित करना चाहता हूँ, मैं अपना थोड़ा-सा भी अंश शैतान को नहीं देना चाहता, क्योंकि शैतान तेरा शत्रु है।" उसने इस दिशा में जितना ज्यादा प्रयास किया, उतना ही ज्यादा वह प्रेरित हुआ, और उतना ही ज्यादा इन विषयों पर उसका ज्ञान बढ़ता गया। इसका अहसास किए बिना ही, उसे यह ज्ञान हो गया कि उसे अपने-आपको शैतान के प्रभाव से मुक्त कर लेना चाहिए, और पूरी तरह परमेश्वर के पास लौट आना चाहिए। उसने ऐसा आयाम हासिल कर लिया था। वह शैतान के प्रभाव से ऊपर उठ रहा था, और वह शरीर के सुख और आनंद से अपने-आपको मुक्त कर रहा था, वह परमेश्वर की ताड़ना और न्याय दोनों को और अधिक गंभीरता से अनुभव करने को तैयार था। उसने कहा, "यद्यपि मैं तेरी ताड़नाओं और तेरे न्याय के बीच रहता हूँ, इससे जुड़ी कठिनाई के बावजूद, मैं शैतान के अधीन जीवन व्यतीत नहीं करना चाहता, मैं शैतान के छल-कपट को तो बिल्कुल नहीं सहना चाहता। मैं तेरे अभिशापों के बीच जी कर आनंदित हूँ, और मेरे लिए शैतान के आशीषों में जीना कष्टदायक है। तेरे न्याय के बीच जीवन बिताते हुए मैं तुझसे प्रेम करता हूँ, क्योंकि तेरे न्याय में जीवन बिताकर मुझे बहुत आनंद प्राप्त होता है। तेरी ताड़ना और न्याय धार्मिक और पवित्र हैं; ये मुझे शुद्ध करने और इससे भी बढ़कर मुझे बचाने के लिए हैं। मैं अपना सारा जीवन तेरे न्याय में बिताना चाहता हूँ ताकि मैं तेरी देखरेख में रहूँ। मैं एक घड़ी भी शैतान के अधिकार क्षेत्र में रहने को तैयार नहीं हूँ; मैं तेरे द्वारा शुद्ध होना चाहता हूँ; भले ही मुझे कष्ट झेलने पड़ें, मैं शैतान द्वारा शोषित होने और छले जाने को तैयार नहीं हूँ। मुझ प्राणी को, तेरे द्वारा इस्तेमाल किया जाना चाहिए, तेरे द्वारा प्राप्त किया जाना चाहिए, तेरे द्वारा न्याय दिया जाना चाहिए, और तेरे द्वारा ताड़ना दी जानी चाहिए। यहाँ तक कि मुझे तेरे द्वारा शापित भी किया जाना चाहिए। जब तू मुझे आशीष देने की इच्छा करता है तो मेरा हृदय आनंदित हो उठता है, क्योंकि मैं तेरे प्रेम को देख चुका हूँ। तू सृष्टिकर्ता है, और मैं इस सृष्टि का एक प्राणी हूँ : तुझको धोखा देकर, मुझे शैतान के अधिकार क्षेत्र में नहीं रहना चाहिए, न ही मुझे शैतान के हाथों शोषित होना चाहिए। शैतान के लिए जीने से अच्छा है, मैं तेरा घोड़ा या बैल बन जाऊँ। मैं बिना भौतिक सुखों के, तेरी ताड़नाओं में रहकर जीवन व्यतीत करना ज्यादा पसंद करूँगा, और इसमें मुझे आनंद मिलेगा, फिर भले ही मैं तेरा अनुग्रह गँवा दूँ। हालाँकि तेरा अनुग्रह मेरे साथ नहीं है, फिर भी मैं तेरे द्वारा ताड़ना दिए जाने और न्याय किए जाने से प्रसन्न हूँ; यह तेरा सर्वोत्तम आशीष है, तेरा सबसे बड़ा अनुग्रह है। हालाँकि मेरे प्रति तू हमेशा प्रतापी और रोषपूर्ण रहा है, फिर भी मैं तुझे नहीं छोड़ सकता, मैं तुझसे बेहद प्रेम करता हूँ। मैं तेरे घर में रहना पसंद करूँगा, मैं तेरे द्वारा शापित और प्रताड़ित किया जाना, और तेरे प्रेम में पीड़ित होना पसंद करूँगा, मैं शैतान के कब्जे में रहकर जीने को तैयार नहीं हूँ, न ही मैं केवल देह के लिए भाग-दौड़ करने और व्यस्त रहने को तैयार हूँ, सिर्फ देह के लिए जीने को तो बिलकुल भी नहीं।" पतरस का प्रेम पवित्र प्रेम था। यह पूर्ण बनाए जाने का अनुभव है, यह पूर्ण बनाए जाने का सर्वोच्च आयाम है; और इससे अधिक सार्थक जीवन नहीं हो सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

परमेश्वर पर अपने विश्वास के सन्दर्भ में, यदि मनुष्य, जीवन-विकास के मामलों के प्रति गंभीर नहीं है, वह सत्य में प्रवेश करने की कोशिश नहीं करता, अपने स्वभाव में परिवर्तन की कोशिश नहीं करता, और परमेश्वर के कार्य के ज्ञान की खोज तो और भी कम करता है, तो उसे पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। यदि तुम पूर्ण बनना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के कार्य को समझना होगा। खासतौर से, तुम्हें उसकी ताड़ना और उसके न्याय के अर्थ को समझना होगा, और यह समझना होगा कि इस कार्य को मनुष्य पर क्यों किया जाता है। क्या तुम यह स्वीकार कर सकते हो? इस प्रकार की ताड़ना के दौरान, क्या तुम पतरस की तरह ही अनुभव और ज्ञान प्राप्त कर सकते हो? यदि तुम परमेश्वर के ज्ञान और पवित्र आत्मा के कार्य को खोजोगे, और अपने स्वभाव में परिवर्तनों की कोशिश करोगे, तो तुम्हारे पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर होगा।

जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है, उनके लिए जीत लिए जाने के कार्य का यह कदम अति आवश्यक है; जब मनुष्य पर विजय पा ली जाती है, तो उसके बाद ही मनुष्य पूर्ण बनाए जाने के कार्य का अनुभव कर सकता है। केवल जीत लिए जाने की भूमिका को निभाने का कोई बड़ा महत्व नहीं है, जो तुम्हें परमेश्वर के इस्तेमाल के योग्य नहीं बनाएगा। सुसमाचार फैलाने की अपनी भूमिका को निभाने के लिए तुम्हारे पास कोई साधन नहीं होगा, क्योंकि तुम जीवन-विकास की खोज नहीं कर रहे, अपने अंदर परिवर्तन लाने और नवीनीकरण का प्रयास नहीं कर रहे, और इसलिए तुम्हारे पास जीवन-विकास का कोई वास्तविक अनुभव नहीं होता। इस कदम दर कदम कार्य के दौरान, तुम जब एक बार एक सेवाकर्मी और एक विषम के तौर पर कार्य कर लेते हो, लेकिन अगर अंततः तुम पतरस की तरह बनने का प्रयास नहीं करते, और यदि तुम्हारी खोज उस मार्ग के अनुसार नहीं है जिसके द्वारा पतरस को पूर्ण बनाया गया था, तो स्वाभाविक रूप से, तुम अपने स्वभाव में परिवर्तन का अनुभव नहीं कर पाओगे। यदि तुम पूर्ण बनाए जाने का प्रयास करते हो, तो तुम गवाही दे चुके होगे, और तुम कहोगे: "परमेश्वर के इस कदम दर कदम कार्य में, मैंने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य को स्वीकार कर लिया है, और हालाँकि मैंने बड़ा कष्ट सहा है, फिर भी मैं जान गया हूँ कि परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण कैसे बनाता है, मैंने परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य को प्राप्त कर लिया है, मैंने परमेश्वर की धार्मिकता का ज्ञान प्राप्त कर लिया है, और उसकी ताड़ना ने मुझे बचा लिया है। उसका धार्मिक स्वभाव मुझ पर अपना प्रभाव दिखा रहा है, और मेरे लिए आशीष और अनुग्रह लेकर आया है; उसके न्याय और ताड़ना ने ही मुझे बचाया है और मुझे शुद्ध किया है। यदि परमेश्वर ने मुझे ताड़ना न दी होती और मेरा न्याय न किया होता, और यदि परमेश्वर ने मुझे कठोर वचन न कहे होते, तो मैं परमेश्वर को नहीं जान पाता, और न ही मुझे बचाया जा सका होता। आज मैं देखता हूँ : एक प्राणी के रूप में, न केवल व्यक्ति परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों का आनंद उठाता है, बल्कि, महत्वपूर्ण यह है कि सभी प्राणी परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का आनंद उठाएँ, और उसके धार्मिक न्याय का आनन्द उठाएँ, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य के आनंद के योग्य है। एक ऐसे प्राणी के रूप में जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, इंसान को परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का आनंद उठाना चाहिए। उसके धार्मिक स्वभाव में उसकी ताड़ना और न्याय है, इससे भी बढ़कर, उसमें महान प्रेम है। हालाँकि आज मैं परमेश्वर के प्रेम को पूरी तरह प्राप्त करने में असमर्थ हूँ, फिर भी मुझे उसे देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है और इससे मैं धन्य हो गया हूँ।" यह वह पथ है जिस पर वे लोग चले हैं जो पूर्ण बनाए जाने का अनुभव करते हैं और इस ज्ञान के बारे में बोलते हैं। ऐसे लोग पतरस के समान हैं; उनके अनुभव भी पतरस के समान ही होते हैं। ऐसे लोग वे लोग भी हैं जो जीवन-विकास प्राप्त कर चुके होते हैं, जिनके अंदर सत्य है। जब उनका अनुभव अंत तक बना रहता है, तो परमेश्वर के न्याय के दौरान वे अपने-आपको पूरी तरह से शैतान के प्रभाव से छुड़ा लेते हैं और परमेश्वर को प्राप्त हो जाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

जब लोग पूर्णता के मार्ग पर कदम रखते हैं, तो उनका पुराना स्वभाव बदल सकता है। इसके अतरिक्त, उनके जीवन निरंतर विकसित होते रहते हैं, और वे धीरे-धीरे सत्य में और गहरे प्रवेश करते जाते हैं। वे संसार से और उन सभी से घृणा करने में सक्षम होते हैं, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते। वे विशेष रूप से स्वयं से घृणा करते हैं, परंतु उससे अधिक, वे स्वयं को स्पष्ट रूप से जानते हैं। वे सत्य के द्वारा जीने के इच्छुक होते हैं और वे सत्य के अनुसरण को अपना लक्ष्य बनाते हैं। वे अपने मस्तिष्क द्वारा उत्पन्न विचारों के भीतर जीवन जीने के लिए तैयार नहीं हैं और वे मनुष्य के पाखंड, दंभ और आत्म-संतोष से घृणा महसूस करते हैं। वे औचित्य की सशक्त भावना के साथ बोलते हैं, चीज़ों को विवेक और बुद्धि से सँभालते हैं, और परमेश्वर के प्रति निष्ठावान एवं आज्ञाकारी होते हैं। यदि वे ताड़ना और न्याय की किसी घटना का अनुभव करते हैं, तो न केवल वे निष्क्रिय और दुर्बल नहीं बनते, बल्कि वे परमेश्वर की इस ताड़ना और न्याय के प्रति आभारी होते हैं। वे विश्वास करते हैं कि वे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के बिना नहीं रह सकते; कि वे उसकी रक्षा करते हैं। वे लोग शांति और आनंद प्राप्त करने और क्षुधा तृप्त करने के लिए विश्वास का अनुसरण नहीं करते, न ही वे अस्थायी दैहिक आनंद के पीछे भागते हैं। पूर्ण किए गए लोगों के साथ ऐसा ही होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई (4)' से उद्धृत

यदि कोई अपना कर्तव्य पूरा करते हुए परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है, और अपने कार्यों और क्रियाकलापों में सैद्धांतिक है और सत्य के समस्त पहलुओं की वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया गया है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य और उसके वचन ऐसे लोगों के लिए पूरी तरह से प्रभावी हो गए हैं, कि परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन गए हैं, उन्होंने सच्चाई को प्राप्त कर लिया है, और वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने में समर्थ हैं। इसके बाद, उनके देह की प्रकृति—अर्थात, उनके मूल अस्तित्व की नींव—हिलकर अलग हो जाएगी और ढह जाएगी। जब लोग परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में धारण कर लेंगे, तो वे नए लोग बन जाएंगे। अगर परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन जाते हैं; परमेश्वर के कार्य का दर्शन, मानवता से उसकी अपेक्षाएँ, मनुष्यों को उसके प्रकाशन, और एक सच्चे जीवन के वे मानक जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि वे प्राप्त करें, उनका जीवन बन जाते हैं, अगर वे इन वचनों और सच्चाइयों के अनुसार जीते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों द्वारा सिद्ध बनाए जाते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पुनर्जन्म लेते हैं और नए लोग बन गए हैं। यह वह मार्ग है जिसके द्वारा पतरस ने सत्य का अनुसरण किया; यह सिद्ध बनाए जाने, परमेश्वर के वचनों से पूर्ण बनाए जाने, और परमेश्वर के वचनों से जीवन को पाने का मार्ग था। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य उसका जीवन बन गया, और केवल तभी वह एक ऐसा व्यक्ति बना जिसने सत्य को प्राप्त किया।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

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