24. सत्य की तलाश करने के सिद्धांत

(1) जब कोई परमेश्वर के वचनों में कठिनाइयों का सामना करता है, तो उसे परमेश्वर से प्रार्थना और सत्य की तलाश करनी चाहिए। इसके अलावा, उसे अक्सर परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करना चाहिए और उसके वचनों में जवाब खोजने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

(2) किसी को भी किसी अन्य व्यक्ति के शब्दों को आँखें मूँदकर स्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें परमेश्वर के वचनों के समक्ष रखते हुए विवेक का प्रयोग करना चाहिए। केवल वही जिसका परमेश्वर के वचनों में आधार हो, सत्य के साथ मेल खाता है।

(3) परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के अलावा, परमेश्वर के घर के उपदेशों और सहभागिता को सुनने पर ध्यान दो। केवल वही जो पवित्र आत्मा के प्रबोधन और रोशनी से आता है, सत्य के साथ मेल खाता है।

(4) किसी मत को समझना सत्य को समझना नहीं है। सत्य ही जीवन है; यह वास्तविकता है और इससे भी अधिक यह सिद्धांत है। केवल वही जिसकी अनुभव से पुष्टि होती है, सत्य के साथ मेल खाता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

यदि तुम जीवन में विकास करना चाहते हो, तो तुम्हें हर चीज़ में सत्य की तलाश करनी चाहिए। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, तुम्हें इस बात की खोज करनी चाहिए कि सत्य के अनुरूप जीने के लिए किस तरह व्यवहार करना चाहिए, और इस बात का पता लगाना चाहिए कि तुम्हारे भीतर क्या दोष मौजूद है, जो इसका उल्लंघन करता है; तुम्हें इन चीज़ों की स्पष्ट समझ होनी चाहिए। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, तुम्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि उसका कोई मूल्य है या नहीं। तुम वे चीज़ें कर सकते हो जो अर्थपूर्ण हों, लेकिन तुम्हें वे चीज़ें नहीं करनी चाहिए जिनका कोई अर्थ न हो। जहाँ तक उन चीज़ों का संबंध है, जिन्हें तुम कर भी सकते हो और नहीं भी कर सकते, उन्हें यदि जाने दिया जा सकता है, तो तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए। अन्यथा यदि तुम कुछ समय के लिए उन चीज़ों को करते हो और बाद में पाते हो कि तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए, तो एक त्वरित निर्णय लो और उन्हें ज़ल्दी से जाने दो। यह वह सिद्धांत है, जिसका अनुसरण तुम्हें अपने हर काम में करना चाहिए। कुछ लोग यह प्रश्न उठाते हैं : सत्य की तलाश करना और उसे व्यवहार में लाना इतना ज्यादा मुश्किल क्यों है—मानो तुम धारा के विरुद्ध नाव खे रहे हो और अगर तुमने आगे की ओर नाव खेना बंद कर दिया, तो पीछे बह जाओगे? बुरी या निरर्थक चीज़ें करना वास्तव में बहुत आसान क्यों है—नाव को धारा के साथ खेने जितना आसान? ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना है। शैतान की प्रकृति ने मनुष्यों के भीतर एक प्रमुख भूमिका ग्रहण कर ली है, और वह एक प्रतिक्रियावादी शक्ति है। परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने की प्रकृति वाले मनुष्य निश्चित रूप से ऐसी चीज़ें आसानी से कर सकते हैं, जो परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती हैं, और सकारात्मक कार्य करना उनके लिए स्वाभाविक रूप से कठिन होता है। यह पूरी तरह से मनुष्य की प्रकृति और सार द्वारा निश्चित किया जाता है। एक बार जब तुम वास्तव में सत्य को समझ जाते हो और उसे अपने भीतर से प्यार करना शुरू कर देते हो, तो तुम्हारे पास उन चीजों को करने की शक्ति होगी, जो सत्य के अनुरूप हैं। तब यह सामान्य हो जाता है, यहाँ तक कि सहज और सुखद भी, और तुम महसूस करते हो कि कोई नकारात्मक चीज़ करने के लिए भारी प्रयास की आवश्यकता होगी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि सत्य ने तुम्हारे दिल में एक प्रमुख भूमिका ले ली है। अगर तुम वाकई मानव-जीवन का सत्य समझते हो और अगर तुम यह सत्य समझते हो कि किस तरह का व्यक्ति होना चाहिए—किस तरह एक निष्कपट और सीधा-सादा व्यक्ति बनना चाहिए, एक ईमानदार व्यक्ति, ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर की गवाही देता हो और उसकी सेवा करता हो—तो तुम फिर कभी परमेश्वर की अवहेलना करने वाले बुरे कार्य करने में सक्षम नहीं होगे, और न ही तुम कभी एक झूठे अगुआ, झूठे कार्यकर्ता या मसीह-विरोधी की भूमिका निभाओगे। भले ही शैतान तुम्हें धोखा दे, या कोई दुष्ट तुम्हें उकसाए, तुम वो नहीं करोगे; कोई तुम्हारे साथ कितनी भी ज़बरदस्ती करे, तुम फिर भी वैसा नहीं करोगे। यदि लोग सत्य को प्राप्त कर लेते हैं और सत्य उनका जीवन बन जाता है, तो वे बुराई से घृणा करने और नकारात्मक चीजों से आंतरिक विरक्ति महसूस करने में सक्षम हो जाते हैं। उनके लिए बुराई करना मुश्किल होगा, क्योंकि उनके जीवन स्वभाव बदल गए हैं और उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बना दिया गया है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

अभी परमेश्वर अंत के दिनों का न्याय कार्य करता है, और उसने बहुत-से वचन व्यक्त किए हैं। परमेश्वर में आस्था के मार्ग में सत्य से जुड़ी बहुत-सी बातें हमारे सामने आई हैं। अगर हम सत्य की खोज नहीं करते तो कोई मार्ग नहीं है, इसलिए हमें लिए सत्य का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, और जब हम परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, तो हमें उन्हें वास्तविकता से जोड़ना चाहिए। परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं और उन्हें व्यक्तिगत रूप से अनुभव करना चाहिए। लोगों के जन्म लेने से लेकर उनके वयस्क होने, काम करना शुरू करने, घर बसाने और एक कैरियर जमाने तक, उनके पूरे जीवन के दौरान—जिसमें उनके सामने आने वाले लोग, घटनाएँ, चीजें और उनके साथ होने वाली सभी अन्य बातें शामिल हैं—ऐसा कुछ भी नहीं होता जो सत्य को स्पर्श करता हो, उनके द्वारा सत्य के माध्यम से कुछ समझना तो दूर की बात है। इसलिए, हर व्यक्ति सत्य के लिए अजनबी है। और ठीक इसलिए, क्योंकि हम सबमें सत्य का अभाव है, आज से शुरु करते हुए हमें सत्य को खोजना चाहिए; यह परम आवश्यक है। अगर तुम्हें अभी तक यह अहसास नहीं हुआ कि परमेश्वर में विश्वास करने पर तुम्हारे लिए सत्य की खोज करना आवश्यक है, और सिर्फ सत्य ही तुम्हें बदल सकता है, तुम्हें पूर्ण बना सकता है, तुम्हें बचा सकता है, और तुम्हें सही अर्थों में परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है, तो फिर तुम्हारी सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं हो सकती, और इसलिए तुम उसकी खोज करने में अक्षम हो। कुछ लोग कहते हैं, "यही काफी है कि परमेश्वर में अपनी आस्था में मैं परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने में, कलीसियाई जीवन जीने में, अपना कर्तव्य निभाने में, और सुसमाचार का उपदेश देने में संकोच नहीं करता—तो फिर मेरे लिए सत्य की खोज करना भी क्यों जरूरी है? मैं आम तौर से कभी कोई पाप या परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं करता, न ही मैं मसीह-विरोधी हूँ। मैं दुष्टों से दूर रहता हूँ। मुझे अपने मार्गदर्शन और मदद के लिए बस थोड़े-से सरल नियमों की जरूरत है; मुझे किसी गूढ़ सत्य की खोज करने की जरूरत नहीं है।" क्या यह चीजों को देखने का सही तरीका है? (नहीं।) क्यों नहीं? (क्योंकि लोग परमेश्वर द्वारा तभी बचाए जा सकते हैं, जब वे सत्य को प्राप्त कर चुके हों।) इस समय, कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें यह अस्पष्ट-सा बोध है कि उनके उद्धार के लिए सत्य कितना महत्वपूर्ण है, कि वह एक अच्छी चीज है। पर यह बोध जड़ पकड़ सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम बाद में सत्य की खोज कैसे करते हो। सत्य की खोज करना बहुत महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, जब तुम नकारात्मक और दुर्बल होते हो, तो क्या तुम सत्य की मदद और पोषण के बिना दृढ़ बन सकते हो? क्या तुम अपनी दुर्बलता से उबर सकते हो? क्या तुम यह समझ पाने में सक्षम होते हो कि तुम नकारात्मक और दुर्बल क्यों रहे हो? निश्चित रूप से नहीं। जब तुम अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए ढीले और लापरवाह होते हो, तो क्या तुम अपनी भ्रष्टता के इस पहलू को सत्य की खोज के बिना ठीक कर सकते हो? क्या तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होने में सक्षम होते हो? अगर लोग सत्य की खोज नहीं करते, तो क्या वे स्वयं को जान सकते हैं और अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान कर सकते हैं? नहीं। जब लोग परमेश्वर के बारे में लगातार धारणाएँ रखते हैं, और उसे हमेशा अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से मापते हैं, तो क्या इन चीजों का सत्य के बिना कोई समाधान हो सकता है? नहीं हो सकता। उन बहुत-सी चीजों में, जिनका हम सामना करते हैं—हमारे दैनिक जीवन के मामलों समेत—अगर हमारे पास सत्य नहीं है, हम सत्य की खोज नहीं करते, और इससे भी बढ़कर, हम सत्य को समझते नहीं, और अगर हम इस बात से अनजान हैं कि इन चीजों के बारे में परमेश्वर क्या कहता है और उसकी क्या इच्छा है, तो हम अपने साथ होने वाली चीजों से कैसे निपटेंगे? जो लोग थोड़े बेहतर हैं, वे अपने परिचित वचनों, वाक्यांशों और नियमों में या फिर मानवीय तरीकों का प्रयोग करके हल ढूँढ़ने की कोशिश कर सकते हैं, पर क्या ये समस्याओं को हल करने में सत्य की जगह ले सकते हैं? अगर हम सत्य की खोज नहीं करते, तो ऐसा कहा जा सकता है कि हमारे जीवन में किसी भी मामले में कोई सिद्धांत नहीं है, न ही हमारे पास अभ्यास का कोई मार्ग है, कोई उद्देश्य या दिशा होना तो दूर की बात है। अगर यह मामला है, तो हम जो कुछ भी करते हैं, वह परमेश्वर का विरोध और उसके साथ विश्वासघात है। तो क्या तब वह हमारे हर कृत्य से घृणा नहीं करेगा और उसे कोसेगा नहीं? क्या हमारे कृत्य उसके न्याय और ताड़ना का सामना नहीं करेंगे? इसलिए, इस बात की संभावना है कि सत्य को सही अर्थों में समझने से पहले हर व्यक्ति परमेश्वर के कुछ न्याय, ताड़ना, फटकार और अनुशासन का सामना करेगा—जिन सबका उद्देश्य लोगों को सत्य प्राप्त करवाना है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग' से उद्धृत

सत्य की तलाश करना जरूरी है। यदि तुम सत्य की तलाश करते हो, तो तुम्हें जो कुछ भी मिलेगा, वह निश्चित रूप से सत्य होगा; यदि तुम सत्य की तलाश नहीं करते, और हमेशा मानवीय तर्कों की बात करते हो, तो तुम अंत में परमेश्वर के बारे में गलतफहमी ही हासिल करोगे। ये दो मार्ग हैं। तुम यह कहते हुए लगातार अपने तर्कों पर ध्यान दिलाते हो, "मैंने काम किया है और मैंने कुछ बुरा नहीं किया है, मुझे कोई आपत्ति नहीं कि तुमने मेरी प्रशंसा नहीं की या मुझे इनाम नहीं दिया, लेकिन तुम मेरे साथ सख्ती से व्यवहार करते हो, तुम मेरा न्याय करते हो और मुझे ताड़ना देते हो। कहाँ है परमेश्वर का प्यार? मुझे वह क्यों दिखाई नहीं देता? हर कोई कहता है कि परमेश्वर लोगों से प्यार करता है, तो फिर ऐसा क्यों है कि वह मुझे छोडकर बाकी सबसे प्यार करता है?" तुम्हारी सारी नाराजगी सामने आ जाती है। क्या ऐसी अवस्था में कोई व्यक्ति सत्य प्राप्त कर सकता है? (नहीं।) परमेश्वर के साथ मनुष्य के संबंध में एक समस्या उत्पन्न हो गई है, और जब भी कोई समस्या उत्पन्न होती है, तो मनुष्य पीछे नहीं हटता, और न ही वह अपने गलत विचारों, दृष्टिकोणों, भ्रांतियों, या सोच के पक्षपातपूर्ण तरीकों को छोड़ता है, बल्कि इसकी बजाय वह परमेश्वर का विरोध करने पर जोर देता है। इसका परिणाम केवल परमेश्वर द्वारा तुम्हारा त्याग और तुम्हारे द्वारा परमेश्वर का त्याग ही हो सकता है। तुम परमेश्वर के प्रति आक्रोश से भरे हो; तुम उसकी संप्रभुता का खंडन करते हो और उसकी निंदा करते हो, तुम उसके प्रति समर्पण करने के इच्छुक नहीं हो, और तुम उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होने के लिए तैयार नहीं हो। इससे भी गंभीर बात यह है कि तुम इस बात से इनकार करोगे कि परमेश्वर सही है, कि वह सत्य है—यह इसका परिणाम है। किंतु यदि तुम सत्य की तलाश करते हो, तो तुम न केवल यह सत्यापित करोगे कि तुम जिस परमेश्वर में विश्वास करते हो, वह सत्य, मार्ग, जीवन और प्रेम है, बल्कि तुम इस बात की भी पुष्टि करोगे कि परमेश्वर जो करता है, सही करता है, कि उसका लोगों को शुद्ध करना सही है। चूँकि मनुष्य का स्वभाव भ्रष्ट है, और उसके समस्त कर्म और व्यवहार और जो कुछ वह प्रकट करता है, वह परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण है, इसलिए वह परमेश्वर के प्यार के योग्य नहीं है। हालाँकि, परमेश्वर अभी भी मनुष्य के लिए बहुत परवाह और चिंता करता है, और वह मनुष्य के लिए एक ऐसे परिवेश की व्यवस्था करता है जिसमें वह उसका व्यक्तिगत रूप से परीक्षण और शुद्धिकरण करे, जिससे वह परिवर्तन से गुज़रने में सक्षम हो सके; वह मनुष्य को इस परिवेश के माध्यम से सत्य से सुसज्जित होने और सत्य को प्राप्त करने देता है। परमेश्वर मनुष्य को इतना प्रेम करता है, और उसका प्रेम इतना वास्तविक है, और परमेश्वर वफ़ादार होने के अलावा कुछ नहीं है। तुम इसे महसूस करोगे। अगर परमेश्वर ने ये काम न किए होते, तो कोई भी नहीं कह सकता कि मनुष्य कितना नीचे गिर गया होता! मनुष्य अपनी हैसियत, अपनी प्रसिद्धि और संपत्ति का प्रबंधन करने की कोशिश करता है, और अंत में, यह सब कर लेने के बाद, वह दूसरों को जीतकर अपने पक्ष में कर लेता है और उन्हें अपने सामने लाता है—क्या यह परमेश्वर के विरोध में नहीं है? इस तरह से जारी रखने के परिणामों की कल्पना करना कठिन नहीं है! परमेश्वर समय पर इस सब पर रोक लगाकर उत्कृष्ट कार्य करता है! हालाँकि परमेश्वर जो करता है, उससे मनुष्य उजागर होता है और वह उसका न्याय करता है, लेकिन यह कार्य उसे बचाता भी है। यह असली प्यार है। जब तुम इसे अपने लिए चरितार्थ कर लोगे, तब क्या तुम सच के इस पहलू को प्राप्त नहीं कर लोगे? जब व्यक्ति खुद इसे महसूस कर लेता है और यह समझ प्राप्त कर लेता है, और जब वह इन सत्यों को समझ जाता है, तो क्या वह फिर भी परमेश्वर के प्रति नाराजगी महसूस करता है? नहीं—उसकी वह नाराजगी काफूर हो जाती है, और पूरी तरह से आश्वस्त होने के बाद, वह पूरी निष्ठा के साथ परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो जाता है। अगली बार ऐसी स्थिति का सामना करने पर उसे एहसास होगा कि परमेश्वर जो करता है, सही करता है और मनुष्य जो करता है, वह निश्चित रूप से गलत होता है, और यह भी कि मनुष्य विद्रोही है, उसके पास सत्य नहीं है। ऐसे लोग बहुत जल्दी समर्पण करने के लिए तैयार हो जाएँगे। इसे हासिल कर सकने वाले लोग इस बिंदु पर पहुँचने के लिए शुद्धिकरण के कई दौरों से गुजरते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर में विश्वास करने का सबसे महत्वपूर्ण भाग सत्य को व्यवहार में लाना है' से उद्धृत

क्या तुम लोगों की सत्य की समझ तुम्हारी अपनी अवस्थाओं के साथ एकीकृत है? वास्तविक जीवन में तुम्हें पहले यह सोचना होगा कि कौन-से सत्य तुम्हारे सामने आए लोगों, घटनाओं और चीज़ों से संबंध रखते हैं; इन्हीं सत्यों के बीच तुम परमेश्वर की इच्छा तलाश सकते हो और अपने सामने आने वाली चीज़ों को उसकी इच्छा के साथ जोड़ सकते हो। यदि तुम नहीं जानते कि सत्य के कौन-से पहलू तुम्हारे सामने आई चीज़ों से संबंध रखते हैं, और सीधे परमेश्वर की इच्छा खोजने चल देते हो, तो यह एक अंधा दृष्टिकोण है और परिणाम हासिल नहीं कर सकता। यदि तुम सत्य की खोज करना और परमेश्वर की इच्छा समझना चाहते हो, तो पहले तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि तुम्हारे साथ किस प्रकार की चीज़ें घटित हुई हैं, वे सत्य के किन पहलुओ से संबंध रखती हैं, और परमेश्वर के वचन में उस विशिष्ट सत्य को देखो, जो तुम्हारे अनुभव से संबंध रखता है। तब तुम उस सत्य में अभ्यास का वह मार्ग खोजो, जो तुम्हारे लिए सही है; इस तरह से तुम परमेश्वर की इच्छा की अप्रत्यक्ष समझ प्राप्त कर सकते हो। सत्य की खोज करना और उसका अभ्यास करना यांत्रिक रूप से किसी सिद्धांत को लागू करना या किसी सूत्र का अनुसरण करना नहीं है। सत्य सूत्रबद्ध नहीं होता, न ही वह कोई विधि है। वह मृत नहीं है—वह स्वयं जीवन है, वह एक जीवित चीज़ है, और वह वो नियम है, जिसका अनुसरण प्राणी को अपने जीवन में अवश्य करना चाहिए और वह वो नियम है, जो मनुष्य के पास अपने जीवन में अवश्य होना चाहिए। यह ऐसी चीज़ है, जिसे तुम्हें जितना संभव हो, अनुभव के माध्यम से समझना चाहिए। तुम अपने अनुभव की किसी भी अवस्था पर क्यों न पहुँच चुके हो, तुम परमेश्वर के वचन या सत्य से अविभाज्य हो, और जो कुछ तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में समझते हो और जो कुछ तुम परमेश्वर के स्वरूप के बारे में जानते हो, वह सब परमेश्वर के वचनों में व्यक्त होता है; वह सत्य से अटूट रूप से जुड़ा है। परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप की एक प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। वह परमेश्वर के स्वरूप को ठोस बनाता है और उसका स्पष्ट विवरण देता है; वह तुम्हें और अधिक सीधी तरह से बताता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है और वह क्या पसंद नहीं करता, वह तुमसे क्या कराना चाहता है और वह तुम्हें क्या करने की अनुमति नहीं देता, वह किन लोगों से घृणा करता है और वह किन लोगों से प्रसन्न होता है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्यों के पीछे लोग उसके आनंद, क्रोध, दुःख और खुशी, और साथ ही उसके सार को देख सकते हैं—यह उसके स्वभाव का प्रकट होना है। परमेश्वर के स्वरूप को जानने और उसके वचन से उसके स्वभाव को समझने के अतिरिक्त जो सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है, वह है व्यावहारिक अनुभव के द्वारा इस समझ तक पहुँचने की आवश्यकता। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को जानने के लिए अपने आप को वास्तविक जीवन से हटा लेता है, तो वह उसे प्राप्त नहीं कर पाएगा। भले ही कुछ लोग हों, जो परमेश्वर के वचन से कुछ समझ प्राप्त कर सकते हों, किंतु उनकी समझ सिद्धांतों और वचनों तक ही सीमित रहती है, और परमेश्वर वास्तव में जैसा है, वह उससे भिन्न रहती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

यदि तुम सत्य को व्यवहार में लाना और उसे समझना चाहते हो, तो सबसे पहले अपने सामने आने वाली कठिनाइयों और अपने आसपास घटने वाली चीज़ों का सार समझो, समझो कि इन मुद्दों के साथ क्या समस्याएँ हैं, साथ ही इस बात को भी समझो कि वो सत्य के किस पहलू से संबंधित हैं। इन चीज़ों की तलाश करो और उसके बाद अपनी वास्तविक कठिनाइयों के आधार पर सत्य की खोज करो। इस तरह, जैसे-जैसे तुम अनुभव प्राप्त करोगे, वैसे-वैसे तुम अपने साथ होने वाली हर चीज़ में परमेश्वर का हाथ देखने लगोगे, और यह भी जानने लगोगे कि वह क्या करना चाहता है और तुममें कौन-से परिणाम प्राप्त करना चाहता है। शायद तुम्हें कभी ऐसा न लगता हो कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ हो रहा है, वह परमेश्वर में विश्वास और सत्य से जुड़ा है, और बस अपने आप से कहो, "इससे निपटने का मेरा अपना तरीका है; मुझे सत्य की या परमेश्वर के वचनों की आवश्यकता नहीं है। जब मैं सभाओं में भाग लूँगा, या जब मैं परमेश्वर के वचनों को पढूँगा, या अपना कर्तव्य निभाऊँगा, तो मैं अपनी जाँच सत्य और परमेश्वर के वचनों से तुलना करके करूँगा।" अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारे जीवन में होने वाली रोज़मर्रा की चीज़ों का, जैसे परिवार, काम-काज, विवाह और तुम्हारे भविष्य से संबंधित विभिन्न चीज़ों का, सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, और तुम उन्हें मानवीय तरीकों से हल करते हो, अगर तुम्हारे अनुभव करने का यही तरीका है, तो तुम्हें सत्य कभी प्राप्त नहीं होगा; तुम कभी यह नहीं समझ पाओगे कि परमेश्वर तुम्हारे भीतर क्या करना चाहता है या वह कौन-से परिणाम प्राप्त करना चाहता है। सत्य का अनुसरण करना एक लंबी प्रक्रिया है। इसका एक सरल पक्ष है, और इसका एक जटिल पक्ष भी है। सरल शब्दों में, हमें अपने आसपास होने वाली हर चीज़ में सत्य की खोज करनी चाहिए और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करना चाहिए। एक बार जब तुम ऐसा करना शुरू कर दोगे, तो तुम यह देखोगे कि तुम्हें परमेश्वर पर अपने विश्वास में कितना सत्य हासिल करना चाहिए और उसका कितना अनुसरण करना चाहिए, तुम जानोगे कि सत्य बहुत वास्तविक है और सत्य ही जीवन है। यह सच नहीं है कि केवल परमेश्वर की सेवा करने वालों और कलीसिया के अगुआओं को ही सब-कुछ सत्य के अनुसार करने की आवश्यकता होती है, साधारण अनुयायियों को नहीं; यदि ऐसा होता, तो परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों में कोई बड़ा अर्थ नहीं होता। क्या अब तुम लोगों के पास सत्य के अनुसरण का मार्ग है? सत्य का अनुसरण करते हुए पहला काम क्या करना चाहिए? सबसे पहले तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और संगति सुनने में ज्यादा समय बिताना चाहिए। जब तुम्हारे सामने कोई समस्या आए, तो ज्यादा प्रार्थना करो, ज्यादा खोजो। जब तुम लोग अधिक सत्य से युक्त हो जाओगे, जीवन-प्रवेश पा लोगे, और तुम्हारा कद आध्यात्मिक हो जाएगा, तो तुम लोग कुछ वास्तविक कर पाओगे, कुछ काम हाथ में ले पाओगे, और इस तरह कुछ परीक्षणों और प्रलोभनों के माध्यम से सफलता पाने में सक्षम हो पाओगे। उस समय तुम महसूस करोगे कि तुमने वास्तव में कुछ सत्य समझ और पा लिए हैं, और तुम जानोगे कि परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन ही लोगों की आवश्यकता हैं, उन्हें ही हासिल करना चाहिए, और वही दुनिया में एकमात्र सत्य हैं, जो लोगों को जीवन दे सकते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग' से उद्धृत

चाहे तुम कुछ भी करो, तुम्हें सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि तुम इसे क्यों कर रहे हो, वह कौन सी मंशा है जो तुम्हें ऐसा करने के लिए निर्देशित करती है, तुम्हारे ऐसा करने का क्या महत्व है, मामले की प्रकृति क्या है, और क्या तुम जो कर रहे हो वह कोई सकारात्मक चीज़ है या कोई नकारात्मक चीज़ है। तुम्हें इन सभी मामलों की एक स्पष्ट समझ अवश्य होनी चाहिए; सिद्धान्त के साथ कार्य करने में समर्थ होने के लिए यह बहुत आवश्यक है। यदि तुम अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए कुछ कर रहे हो, तो तुम्हें यह विचार करना चाहिए: मुझे यह किस तरह करना चाहिए? मुझे किस तरह अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से करना चाहिए ताकि मैं इसे बस लापरवाही से न कर रहा हूँ? इस मामले में तुम्हें परमेश्वर के करीब आना चाहिए। परमेश्वर के करीब आने का मतलब है इस बात में सच्चाई को खोजना, अभ्यास करने के तरीके को खोजना, परमेश्वर की इच्छा को खोजना, और इस बात को खोजना है कि परमेश्वर को संतुष्ट कैसे करना है। इसी तरह तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर के करीब आया जाता है। इसमें कोई धार्मिक अनुष्ठान या बाहरी क्रिया-कलाप करना शामिल नहीं है। यह परमेश्वर की इच्छा को खोजने के बाद सत्य के अनुसार अभ्यास करने के उद्देश्य से किया जाता है। अगर तुम हमेशा ऐसा कहते हो कि "परमेश्वर का धन्यवाद," जबकि तुमने कुछ भी नहीं किया होता है, लेकिन तब जब तुम कुछ कर रहे होते हो, तो तुम जिस तरीके से चाहते हो वैसा करते रहते हो, तब इस तरह धन्यवाद देना केवल एक बाहरी कृत्य है। अपना कर्तव्य करते समय या किसी चीज़ पर कार्य करते समय, तुम्हें हमेशा सोचना चाहिए: मुझे यह कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? परमेश्वर की इच्छा क्या है? जो भी तुम करते हो उसके द्वारा परमेश्वर के करीब जाना तुम पर है; और ऐसा करते हुए अपने कृत्यों और साथ ही परमेश्वर की इच्छा के पीछे के सिद्धान्तों और सत्य की खोज करना, और तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर से नहीं भटकना तुम पर है। केवल ऐसा व्यक्ति ही सचमुच परमेश्वर में विश्वास करता है। इन दिनों, जब लोगों के सामने चीज़ें आती हैं, तो चाहे वास्तविक स्थिति कुछ भी हो, उन्हें लगता है कि वे बहुत-कुछ कर सकते हैं, लेकिन परमेश्वर उनके दिल में नहीं होते, और वे अपनी इच्छा के अनुसार उसे करते हैं। भले ही उनके कार्य का तरीका उपयुक्त हो या नहीं, या वह सत्य के अनुरूप हो या नहीं, वे बस जिद पर अड़े रहते हैं और अपने व्यक्तिगत इरादों के अनुसार कार्य कर डालते हैं। आम तौर पर ऐसा लग सकता है कि परमेश्वर उनके दिल में हैं, लेकिन जब वे काम करते हैं, तो वस्तुतः परमेश्वर उनके दिल में नहीं होते। कुछ लोग कहते हैं : "मैं अपने कामों में परमेश्वर के निकट नहीं हो सकता। अतीत में मैं धार्मिक अनुष्ठान करने का आदी था, और मैंने परमेश्वर के करीब आने की कोशिश की, लेकिन इसका कुछ परिणाम नहीं हुआ। मैं उसके पास नहीं जा सका।" ऐसे लोगों के दिल में परमेश्वर नहीं होता; वे स्वयं ही अपने दिल में होते हैं, और अपने किसी भी काम में सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते। सत्य के अनुसार काम न करने का अर्थ है अपनी इच्छा के अनुसार काम करना, और अपनी इच्छा के अनुसार काम करने का अर्थ है परमेश्वर को छोड़ देना; अर्थात, उनके दिल में परमेश्वर नहीं हैं। मानवीय अभिप्राय आमतौर पर लोगों को अच्छे और सही लगते हैं, और वे ऐसे दिखते हैं मानो कि वे सत्य का बहुत अधिक उल्लंघन नहीं करते हैं। लोगों को लगता है कि चीज़ों को इस तरह से करना सत्य को अभ्यास में लाना है; उन्हें लगता है कि चीज़ों को उस तरह से करना परमेश्वर के प्रति समर्पण करना है। दरअसल, वे वास्तव में परमेश्वर की तलाश नहीं कर रहे हैं, और वे परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार, उसकी इच्छा को संतुष्ट करने के लिए, इसे अच्छी तरह से करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। उनके पास यह सच्ची अवस्था नहीं है, न ही उनकी ऐसी अभिलाषा है। यही वह सबसे बड़ी ग़लती है, जो लोग अपने अभ्यास में करते हैं। तुम परमेश्वर पर विश्वास तो करते हो, परन्तु तुम परमेश्वर को अपने दिल में नहीं रखते हो। यह पाप कैसे नहीं है? क्या तुम अपने आप को धोखा नहीं दे रहे हो? यदि तुम इसी तरीके से विश्वास करते रहो तो तुम किस प्रकार के प्रभावों को पाओगे? इसके अलावा, विश्वास के महत्व को कैसे अभिव्यक्त किया जा सकता है?

जब तुमने कुछ काम किया था, तो परमेश्वर बहुत असंतुष्ट हुआ था। जब तुम उसे करने जा रहे थे, तब क्या तुमने उससे प्रार्थना की थी? क्या तुमने कभी यह सोचा, "यदि यह बात परमेश्वर के सामने लाई जाएगी, तो उसे कैसी लगेगी? अगर उसे इसका पता चलेगा, तो वह खुश होगा या कुपित? क्या वह इससे घृणा करेगा?" तुमने यह जानने की कोशिश नहीं की, है ना? यहाँ तक कि अगर दूसरे लोगों ने तुम्हें याद भी दिलाया, तो तुम तब भी यही सोचोगे कि यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, और यह किसी भी सिद्धांत के खिलाफ नहीं जाता और न ही कोई पाप है। परिणामस्वरूप, इस बात ने परमेश्वर के स्वभाव को नाराज़ कर दिया और उसे बहुत क्रोध करने के लिए उकसाया, इस हद तक कि उसे तुमसे नफ़रत हो जाए। यदि तुमने जानने की कोशिश की होती और जाँच की होती, और करने से पहले मामले को स्पष्ट रूप से देखा होता, तो क्या तुम इसे सँभाल न पाते? भले ही लोग कभी अच्छी स्थिति में न हों, लेकिन अगर वे जो कुछ करने की योजना बना रहे हैं, उसे पहले निष्ठापूर्वक परमेश्वर के सामने जाँच और खोज के लिए ले आते हैं, तो वे कोई बड़ी भूल नहीं करेंगे। सत्य का अभ्यास करते समय लोगों के लिए भूल करने से बचना कठिन होता है, लेकिन अगर चीज़ों को करते समय तुम जानते हो कि उन्हें सत्य के अनुसार कैसे करना है, लेकिन फिर भी तुम उन्हें सत्य के अनुसार नहीं करते, तो फिर समस्या यह है कि तुम्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है। सत्य के प्रति प्रेम से रहित व्यक्ति का स्वभाव नहीं बदलेगा। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को ठीक से नहीं समझ पाते, और नहीं जानते कि अभ्यास कैसे करना है, तो तुम्हें दूसरों के साथ सहभागिता करनी चाहिए। यदि किसी को भी नहीं लगता कि वे इस मामले को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं, तो फिर तुम्हें सबसे तर्कसंगत समाधान लागू करना चाहिए। किंतु, यदि तुम्हें अंततः यह पता चले कि इसे इस तरह से करने में तुमने थोड़ी-सी भूल कर दी है, तो तुम्हें जल्दी से उसे सही कर लेना चाहिए, और तब परमेश्वर इस भूल को पाप के रूप में नहीं गिनेगा। चूँकि इस मामले को व्यवहार में लाते समय तुम्हारे इरादे सही थे, और तुम सत्य के अनुसार अभ्यास कर रहे थे और केवल इसे स्पष्ट रूप से देख नहीं पाए, और तुम्हारे कार्यों के परिणामस्वरूप कुछ भूलें हो गईं, तो यह एक अपराध घटाने वाली परिस्थिति थी। किंतु, आजकल बहुत-से लोग काम करने के लिए केवल अपने दो हाथों पर, और बहुत-कुछ करने के लिए केवल अपने मन पर भरोसा करते हैं, और वे शायद ही कभी इन सवालों पर कोई विचार करते हैं : क्या इस तरह से अभ्यास करना परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है? अगर मैं इसे इस तरह से करूँगा, तो क्या परमेश्वर खुश होगा? अगर मैं इसे इस तरह से करूँगा, तो क्या परमेश्वर मुझ पर भरोसा करेगा? अगर मैं इसे इस तरह से करूँगा, तो क्या मैं सत्य को अभ्यास में लाऊँगा? यदि परमेश्वर इसके बारे सुनेगा, तो क्या वह कह सकेगा, "तुमने यह सही तरह से और उपयुक्त तरीके से किया है। इसे जारी रखो"? क्या तुम अपने सामने आने वाले हर मामले की सावधानीपूर्वक जाँच करने में सक्षम हो? क्या तुम उनमें से प्रत्येक के बारे में गंभीर और सतर्क हो सकते हो? या क्या तुम यह सोच पाते हो कि तुम जिस तरीके से इसे कर रहे हो, परमेश्वर उसे घृणास्पद तो नहीं समझता, अन्य सभी लोग तुम्हारे तरीकों के बारे में कैसा महसूस करते हैं, और कहीं तुम इसे अपनी ही इच्छा के आधार पर या अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए तो नहीं कर रहे...? तुम्हें इसके बारे में अधिक विचार करना होगा और अधिक जानने की कोशिश करनी होगी, और तुम्हारी गलतियाँ छोटी से छोटी होती जाएँगी। चीज़ों को इस तरह करना यह साबित करेगा कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो वास्तव में सत्य की तलाश करता है और तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखता है, क्योंकि तुम चीज़ों को सत्य द्वारा अपेक्षित निर्देशन के अनुसार कर रहे हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा को खोजना सत्य के अभ्यास के लिए है' से उद्धृत

कोई भी काम ठीक से करने के लिए सत्‍य-सिद्धान्‍तों का पता लगाना ज़रूरी है। व्‍यक्ति को इ सपर एकाग्रता के साथ विचार करना चाहिए कि किसी काम को करते हुए उसे ठीक तरह से कैसे किया जाए, और प्रार्थना करने तथा परमेश्‍वर के समक्ष याचना करते हुए खुद को ख़ामोश रखना ज़रूरी है। कुछ भी करने से पहले दूसरों के साथ संवाद करना आवश्‍यक है, और अगर संवाद के लिए कोई उपलब्‍ध न हो, तो व्‍यक्ति को उस मसले पर खुद ही चिन्‍तन-मनन करना चाहिए, और उस काम को सही ढंग से करने की खातिर उसके तरीके के लिए खोज तथा प्रार्थना करनी चाहिए। परमेश्‍वर के समक्ष स्‍वयं को ख़ामोश करना यही है। परमेश्‍वर के समक्ष ख़ामोश रहने के लिए तुम्हें विचारशून्य होने की ज़रूरत नहीं है; तुम्‍हें इसी के साथ-साथ, अपने हृदय में याचना और प्रतीक्षा के भाव के साथ, इस मसले को बरतने के उपयुक्त तरीके़ की खोज में सक्रिय होना और चिन्‍तन-मनन करना भी अनिवार्य है। अगर तुम्‍हें उस मसले के बारे में ज़रा भी अनुमान नहीं है, तो उसके बारे में जानने के लिए किसी को खोजो। उनसे पूछने का तुम्‍हारा ढंग क्‍या होना चाहिए? दरअसल तुम्‍हें याचना और प्रतीक्षा करते हुए यह देखना चाहिए कि परमेश्‍वर किस तरह काम करता है। पवित्र आत्‍मा तुम्‍हारा प्रबोधन और मार्गदर्शन इस तरह नहीं करता जैसे वह कोई रोशनी जलाकर तुम्‍हें अन्‍दर से अचानक रोशन कर देता हो। परमेश्‍वर निरंतर तुम्‍हारी समझ को उत्‍प्रेरित करने के लिए किसी व्‍यक्ति या किसी घटना का इस्‍तेमाल करता है। प्रार्थना करते हुए गम्‍भीर भाव से घुटनों पर झुकने और उसी मुद्रा में बने रहने से परे भी याचना के बहुत-से तरीक़े हैं; घुटनों पर झुके रहने से दूसरे काम लटके रहते हैं। कभी-कभी, कोई व्‍यक्ति चलते हुए भी किसी मसले पर सोच-विचार कर सकता है; कभी-कभी कोई मसला पैदा होने पर कोई सामूहिक संवाद के लिए उतावला हो सकता है; कभी कोई आसमान की ओर ताक सकता है; कभी कोई खुद ही परमेश्‍वर के वचनों को पढ़ सकता है; कभी, जब मामला तात्‍कालिक हो, तो तुम स्थिति की वास्‍तविकता को समझने के लिए सीधे घटना-स्‍थल की ओर भाग सकते हो, और उससे उन सिद्धांतों के मुताबिक़ निपट सकते हो जिन्‍हें तुमने फ़ि‍लहाल समझा है, साथ ही मन-ही-मन प्रार्थना और याचना करते रह सकते हो। यही वह तरीक़ा है जो तुम्‍हें अपनाना चाहिए—दक्षतापूर्ण तरीक़ा! कभी कुछ अप्रत्‍याशित घटित होने की दशा में तुम्‍हें इससे घबराहट नहीं होगी। तुम्‍हें याचना के कई तरीक़े सीखने चाहिए : जब तुम अपने कर्तव्‍य में व्‍यस्‍त हो, तो अपनी व्‍यस्‍तता के अनुरूप याचना करो; जब तुम्‍हारे पास समय हो, तो समय की उपलब्‍धता के अनुरूप याचना करो और प्रतीक्षा करो। बहुत-से अलग-अलग तरीके़ हैं। अगर प्रतीक्षा के लिए पर्याप्‍त समय है, तो कुछ देर प्रतीक्षा करो। बड़े मामलों में तुम हड़बड़ी नहीं कर सकते; हड़बड़ी में ग़लतियाँ करने के परिणाम अकल्‍पनीय हो सकते हैं। श्रेष्‍ठ परिणाम हासिल करने के लिए तुम्‍हें प्रतीक्षा करते हुए देखना चाहिए कि आगे क्‍या होता है, अन्‍यथा तुम किसी ऐसे व्‍यक्ति के उकसावे में आ जाओगे जिसे उस स्थिति का ज्ञान है। ये सब याचना के ढंग हैं। परमेश्‍वर लोगों को प्रबुद्ध करने के लिए किसी एक पद्धति का इस्‍तेमाल नहीं करता; न तो वह मात्र अपने वचनों से तुम्‍हें प्रबुद्ध करता है, न ही वह तुम्‍हारे आसपास मौजूद लोगों से तुम्‍हें हमेशा मार्गदर्शन मुहैया कराता है। परमेश्‍वर तुम्‍हें तुम्‍हारी दक्षता के दायरे में न आने वाले मसलों के बारे में, ऐसी चीज़ों के बारे में जिनसे तुम्‍हारा सामना कभी नहीं हुआ है, किस तरह प्रबुद्ध करता है? वह कुछ ख़ास तरह के लोगों का उपयोग करता है, ऐसे लोगों का जो उस क़ि‍स्‍म के मसले की जानकारी रखते हैं जो फ़ि‍लहाल तुम्‍हारे सामने होता है। तुम उनसे मिलने भागते हो, उनसे कुछ सुझाव हासिल करते हो, फिर तुम सिद्धांतों के मुताबिक उस पर अमल करते हो, और जिस दौरान तुम यह कर रहे होगे, परमेश्‍वर तुम्‍हारा मार्गदर्शन करेगा। तब भी तुम्‍हें उस तात्‍कालिक मसले की व्‍यावसायिक दक्षताओं या विशेषज्ञता की थोड़ी-सी समझ, और उसके बारे में कुछ अनुमान तो होना ही चाहिए। इसी बुनियाद के आधार पर परमेश्‍वर तुम्‍हें प्रबुद्ध करेगा कि तुम्‍हें क्‍या करना चाहिए।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

तुम्हें हर चीज में परमेश्वर की इच्छा की खोज करनी चाहिए और तुम्हें हर चीज में सत्य की तलाश करनी चाहिए। उदाहरण के लिए, तुम खाने और पहनने और निजी जीवन के मामले में कैसे सत्य ढूंढते हो? क्या इन चीजों में तलाश करने के लिए सत्य है? कुछ का कहना है, "कुछ भी हो, अच्छा खाना सही है; अच्छे वस्त्र पहनना सही है। खराब भोजन करना या खराब वस्त्र पहनना किसी व्यक्ति के लिए नुकसानदायक हो सकता है।" क्या इस दृष्टिकोण में सच्चाई है? क्या जीवन में अच्छा खाना और अच्छा पहनना अत्यंत महत्वपूर्ण है? बिलकुल नहीं। अगर एक दूसरे तरीके से कहा जाए, तो यदि कोई वास्तव में परमेश्वर को जान सकता है और सत्य को प्राप्त कर सकता है, तो वह जो कुछ भी करता है वह परमेश्वर की गवाही होती है, और वह परमेश्वर को संतुष्ट करता है। भले ही ऐसा व्यक्ति बुरा खाता हो या बुरे वस्त्र पहनता हो, उसके जीवन का मूल्य होता है, और वह परमेश्वर की मंज़ूरी प्राप्त कर सकता है—क्या यह सबसे ज़्यादा सार्थक बात नहीं है? यह बिल्कुल प्राथमिक महत्व की बात नहीं है कि कोई व्यक्ति किस प्रकार के वस्त्र पहनता है। अच्छे कपड़े पहनना इस बात की गारंटी नहीं है कि तुम धन्य हो जाओगे : गलत रास्ते पर जाने के लिए तुम फिर भी शापित होगे। और, मैले-कुचैले कपड़े पहने हुए कोई व्यक्ति, जिसके पास सत्य है, परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेगा। इसलिए, यह जानने के लिए कि तुम्हें खाने और पहनने के बारे में किस तरह सोचना चाहिए, तुम्हें सत्य की खोज करनी होगी। और अपने कर्तव्य का पालन करते हुए तुम्हें कैसे व्यवहार करना चाहिए, यह जानने के लिए और भी अधिक सत्य की खोज की जरूरत है। तुम परमेश्वर के आदेशों को कैसे लेते हो, यह एक बहुत ही गंभीर विषय है! परमेश्वर ने जो तुम्हें सौंपा है, यदि तुम उसे पूरा नहीं कर सकते, तो तुम उसकी उपस्थिति में जीने के योग्य नहीं हो और तुम्हें दण्डित किया जाना चाहिए। यह स्वर्ग का नियम और पृथ्वी का सिद्धांत है कि मनुष्य परमेश्वर द्वारा दिये गए हर आदेश को पूरा करे; यह उसका सर्वोच्च दायित्व है, उसके जीवन जितना ही महत्वपूर्ण है। यदि तुम परमेश्वर के आदेशों को गंभीरता से नहीं लेते, तो तुम उसके साथ सबसे कष्टदायक तरीक़े से विश्वासघात कर रहे हो, और तुम यहूदा से भी अधिक शोकजनक हो और तुम्हें शाप दिया जाना चाहिए। परमेश्वर के सौंपे हुए कार्य को कैसे लिया जाए, लोगों को इसकी एक पूरी समझ पानी चाहिए, और उन्हें कम से कम यह बोध होना चाहिए कि वह मानवजाति को जो आदेश देता है वे परमेश्वर से मिले उत्कर्ष और विशेष कृपाएँ हैं, ये सबसे महिमावान बातें हैं। अन्य सब कुछ छोड़ा जा सकता है; यहाँ तक कि अगर किसी को अपना जीवन भी बलिदान करना पड़े, तो भी उसे परमेश्वर के आदेश को पूरा करना चाहिए। क्या यहाँ सत्य की खोज की जरूरत नहीं है? अपने स्वभाव में बदलाव लाना सत्य की खोज से बहुत नजदीक से जुड़ा हुआ है। यदि तुम्हें यह सत्य समझ में आ जाए कि लोग क्यों जीते हैं और तुम्हें जीवन को कैसे देखना चाहिए, तो क्या जीवन के विषय में तुम्हारा दृष्टिकोण बदल नहीं जाएगा? इससे भी ज्यादा यहाँ सत्य की खोज की जरूरत है। परमेश्वर से प्रेम करने में क्या सत्य हैं? क्यों मनुष्य को परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए? परमेश्वर से प्रेम करने का क्या महत्व है? यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम करने के सत्य के बारे में स्पष्ट है और अगर यह व्यक्ति अपने दिल में परमेश्वर के लिए थोड़ा-सा भी प्रेम रखता है—तो उसका जीवन सत्य जीवन है और वह सबसे धन्य व्यक्ति है। जो लोग हर चीज में सत्य की तलाश करते हैं, वे जीवन में सबसे तेजी से प्रगति करते हैं और अपने स्वभाव में परिवर्तन ला सकते हैं। बिल्कुल वही लोग जो हर चीज में सत्य की तलाश करते हैं, परमेश्वर को प्रिय होते हैं। अगर कोई व्यक्ति धारणाओं और धर्म-सिद्धांतों पर निर्भर रहता है या सभी चीज़ों में नियमों का पालन करता है, तो वह प्रगति नहीं करेगा, वह कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करेगा, और कभी न कभी उसका सफाया हो जाएगा—परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति से सर्वाधिक घृणा करता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

अगर किसी विश्वासी के कर्म सत्य के अनुरूप नही हैं, तो वह किसी अविश्वासी के समान ही है। वह उस तरह का व्यक्ति है, जिसके दिल में परमेश्वर नहीं होता, और जो परमेश्वर को छोड़ देता है, और ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के परिवार में काम पर रखे गए उस कर्मचारी की तरह होता है, जो अपने मालिक के लिए कोई छोटे-मोटे कार्य कर देता है, कुछ मुआवज़ा पाता है और फिर चला जाता है। यह ऐसा व्यक्ति बिलकुल नहीं हो सकता, जो परमेश्वर में विश्वास करता है। पीछे इस बात का उल्लेख हुआ था कि तुम परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करने के लिए क्या कर सकते हो। परमेश्वर का अनुमोदन वह पहली चीज़ है, जिसके बारे में तुम्हें सोचना और जिसके लिए तुम्हें काम करना चाहिए; यह तुम्हारे अभ्यास का सिद्धांत और दायरा होना चाहिए। तुम जो कर रहे हो वह सत्य के अनुरूप है या नहीं, इसका निश्चय तुम्हें इसलिए करना चाहिए, क्योंकि यदि वह सत्य के अनुरूप है, तो वह निश्चित रूप से ईश्वर की इच्छा के अनुरूप है। ऐसा नहीं है कि तुम्हें यह मापना चाहिए कि यह बात सही है या गलत है, या क्या यह हर किसी की रुचि के अनुरूप है, या क्या यह तुम्हारी अपनी इच्छाओं के अनुसार है; बल्कि तुम्हें यह निश्चित करना चाहिए कि यह सत्य के अनुरूप है या नहीं, और यह कलीसिया के काम और हितों को लाभ पहुँचाता है या नहीं। यदि तुम इन बातों पर विचार करते हो, तो तुम चीज़ों को करते समय परमेश्वर की इच्छा के अधिकाधिक अनुरूप होते जाओगे। यदि तुम इन पहलुओं पर विचार नहीं करते, और चीज़ों को करते समय केवल अपनी इच्छा पर निर्भर रहते हो, तो तुम्हारा उन्हें गलत तरीके से करना गारंटीशुदा है, क्योंकि मनुष्य की इच्छा सत्य नहीं है और निश्चित रूप से, वह परमेश्वर के साथ असंगत होती है। यदि तुम ईश्वर द्वारा अनुमोदित होने की इच्छा रखते हो, तो तुम्हें सत्य के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, न कि अपनी इच्छा के अनुसार। कुछ लोग अपने कर्तव्य पूरे करने के नाम पर कुछ निजी मामलों में संलग्न रहते हैं। उनके भाई और बहन इसे अनुचित मानते हैं और इसके लिए उन्हें फटकारते हैं, लेकिन ये लोग भूल स्वीकार नहीं करते। उन्हें लगता है कि चूँकि यह एक व्यक्तिगत मामला है, जिसमें कलीसिया का कार्य, वित्त या उसके लोग शामिल नहीं हैं, इसलिए इसे सत्य के दायरे का उल्लंघन नहीं माना जा सकता, और परमेश्वर को इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कुछ चीज़ें तुम्हें निजी मामले लग सकती हैं, जिन पर कोई सिद्धांत या सत्य लागू नहीं होता। किंतु, तुम्हारे द्वारा किए गए कार्य को देखते हुए, तुम इस दृष्टि से बहुत स्वार्थी रहे कि तुमने परमेश्वर के परिवार के कार्य पर कोई ध्यान नहीं दिया, न ही यह सोचा कि तुमने जो किया, उसका इस पर क्या प्रभाव पड़ेगा; तुम केवल अपने फायदे पर विचार करते रहे। इसमें पहले ही संतों का औचित्य और साथ ही व्यक्ति की मानवता से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। भले ही तुम जो कर रहे थे, उससे चर्च के हित नहीं जुड़े थे, न ही उसमें सत्य शामिल था, फिर भी अपने कर्तव्य के पालन करने का दावा करते हुए एक निजी मामले में संलग्न होना सत्य के अनुरूप नहीं है। चाहे तुम कुछ भी कर रहे हो, चाहे मामला कितना भी बड़ा या छोटा हो, और चाहे तुम इसे परमेश्वर के परिवार में अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए या अपने निजी कारणों के लिए यह कर रहे हो, तुम्हें इस बात पर विचार करना ही चाहिए कि जो तुम कर रहे हो वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है या नहीं, साथ ही क्या यह ऐसा कुछ है जो किसी मानवता युक्त व्यक्ति को करना चाहिए। अगर तुम जो भी करते हो उसमें उस तरह सत्य की तलाश करते हो तो तुम ऐसे इंसान हो जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करता है। यदि तुम हर बात और हर सत्य को इस ढंग से लेते हो, तो तुम अपने स्वभाव में बदलाव हासिल करने में सक्षम होगे। कुछ लोगों को लगता है कि जब वे कुछ निजी कार्य कर रहे होते हैं, तो वे सत्य की उपेक्षा कर सकते हैं, इच्छानुसार काम कर सकते हैं और वैसे कर सकते हैं जैसे उन्हें खुशी मिले, और उस ढंग से जो उनके लिए फायदेमंद हो। वे इस तरफ ज़रा-सा भी ध्यान नहीं देते कि यह परमेश्वर के परिवार को कैसे प्रभावित करेगा और न ही वे यह सोचते हैं कि यह संतों के आचरण को शोभा देता है या नहीं। अंत में, जब मामला समाप्त हो जाता है, तो वे भीतर अंधकारमय और असहज हो जाते हैं; लेकिन उन्हें नहीं पता होता कि यह सब क्यों हो रहा है। क्या यह प्रतिशोध उचित नहीं है? यदि तुम ऐसी चीजें करते हो जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं हैं, तो तुमने परमेश्वर को नाराज़ किया है। यदि लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, और अक्सर अपनी इच्छा के आधार पर काम करते हैं, तो वे अक्सर परमेश्वर को रुष्ट या अपमानित करेंगे। ऐसे लोग आम तौर पर अपने कर्मों में परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं होते और अगर वे पश्चाताप नहीं करते हैं, तो वे सज़ा से ज़्यादा दूर नहीं होंगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा को खोजना सत्य के अभ्यास के लिए है' से उद्धृत

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