170. परमेश्वर को संतुष्ट करने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के वचनों के आधार पर किसी की भ्रष्टता की सच्चाई को समझना आवश्यक है। अपने भ्रष्ट स्वभाव में संशोधन करने के लिए सच्चाई का उपयोग करो, और पश्चाताप करने और बदल जाने के लिए नेकी से आगे आओ।

(2) परमेश्वर से कुछ मांगे बिना, उससे किसी भी चीज़ की अनावश्यक इच्छा रखे बगैर, व्यक्ति को शुद्ध अन्तःकरण वाला होना चाहिए। अंतिम दिनों तक उसके प्रति निष्ठापूर्ण सेवा प्रदान करने में सक्षम होने की एक मात्र चाह रखो।

(3) किसी सृजित प्राणी के लिए उचित हो, एक ऐसी स्थिति में खड़े रहो। वो सब जो लोगों के पास है, परमेश्वर से आता है। कोई शर्तें न रखते हुए, न ही सफ़ाई का अनुरोध करते हुए, व्यक्ति को उसके आयोजन का आदर करते हुए जीना और मरना चाहिए।

(4) परमेश्वर पर विश्वास करने में, व्यक्ति को सत्य की, अपने स्वभाव में परिवर्तनों की, परमेश्वर से प्रेम करने और उसके लिए गवाही देने की क्षमता की, तलाश करनी चाहिए। केवल इसी प्रकार कोई परमेश्वर की इच्छा को पूरी तरह से संतुष्ट कर सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर के विश्वासी के रूप में, तुम लोगों को हर चीज में परमेश्वर के अलावा अन्य किसी के प्रति वफादार नहीं होना चाहिए और हर चीज में उसी की इच्छा के अनुरूप बनना चाहिए। यद्यपि हर कोई इस संदेश को समझता है, लेकिन इंसान की तरह-तरह की मुश्किलों—उदाहरण के लिए, अज्ञानता, बेतुकेपन और भ्रष्टता के कारण, ये सच्चाइयाँ जो एकदम साफ और बुनियादी हैं, इंसान में पूरी तरह से दिखाई नहीं देतीं। इसलिए, इससे पहले कि तुम लोगों का अंत पत्थर की लकीर बन जाए, मैं पहले कुछ ऐसी बातें बता दूँ जो तुम लोगों के लिए अत्यधिक महत्व की हैं। इससे पहले कि मैं आरंभ करूँ, तुम्हें पहले इस बात को समझ लेना चाहिए : मैं जो वचन कहता हूँ वे सत्य हैं और समूची मानवजाति के लिए हैं; केवल किसी विशिष्ट या खास किस्म के व्यक्ति के लिए नहीं हैं। इसलिए, तुम लोगों को मेरे वचनों को सत्य के नजरिए से समझने पर ध्यान देना चाहिए और पूरी एकाग्रता एवं ईमानदारी की प्रवृत्ति रखनी चाहिए; मेरे द्वारा बोले गए एक भी वचन या सत्य की उपेक्षा मत करो, और उन्हें हल्के में मत लो। मैं देखता हूँ कि तुम लोगों ने अपने जीवन में ऐसा बहुत कुछ किया है जो सत्य के अनुरूप नहीं है, इसलिए मैं तुम लोगों से खास तौर से सत्य के सेवक बनने, दुष्टता और कुरूपता का दास न बनने के लिए कह रहा हूँ। सत्य को मत कुचलो और परमेश्वर के घर के किसी भी कोने को दूषित मत करो। तुम लोगों के लिए यह मेरी चेतावनी है। अब मैं मौजूदा प्रसंग पर बात करूँगा।

सबसे पहले, अपनी नियति के लिए, तुम लोगों को परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करना चाहिए। कहने का अर्थ है, चूँकि तुम लोग यह मानते हो कि तुम परमेश्वर के घर के एक सदस्य हो, तो तुम्हें परमेश्वर के मन को शांति प्रदान करनी चाहिए और सभी बातों में उसे संतुष्ट करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, तुम लोगों को अपने कार्यों में सिद्धांतवादी और सत्य के अनुरूप होना चाहिए। यदि यह तुम्हारी क्षमता के परे है, तो परमेश्वर तुमसे घृणा करेगा और तुम्हें अस्वीकृत कर देगा, और हर इंसान तुम्हें ठुकरा देगा। अगर एक बार तुम ऐसी दुर्दशा में पड़ गए, तो तुम्हारी गिनती परमेश्वर के घर में नहीं की जा सकती। परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं किए जाने का यही अर्थ है।

दूसरा, तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर ईमानदार इंसान को पसंद करता है। मूल बात यह है कि परमेश्वर निष्ठावान है, अत: उसके वचनों पर हमेशा भरोसा किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, उसका कार्य दोषरहित और निर्विवाद है, यही कारण है कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार होते हैं। ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; हर बात में उसके साथ सच्चाई से पेश आना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर और नीचे वालों को कभी भी धोखा न देना, और परमेश्वर से लाभ उठाने मात्र के लिए काम न करना। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और शब्दों में शुद्धता रखना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना। ...

मैं तुम लोगों से तीसरी बात यह कहना चाहता हूँ : हर व्यक्ति ने अपने जीवन में परमेश्वर में आस्था के दौरान किसी न किसी स्तर पर परमेश्वर का प्रतिरोध किया है, उसे धोखा दिया है। कुछ गलत कामों को अपराध के रूप में दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन कुछ अक्षम्य होते हैं; क्योंकि बहुत से कर्म ऐसे होते हैं जिनसे प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन होता है, जो परमेश्वर के स्वभाव के प्रति अपराध होते हैं। भाग्य को लेकर चिंतित बहुत से लोग पूछ सकते हैं कि ये कर्म कौनसे हैं। तुम लोगों को यह पता होना चाहिए कि तुम प्रकृति से ही अहंकारी और अकड़बाज हो, और सत्य के प्रति समर्पित होने के इच्छुक नहीं हो। इसलिए जब तुम लोग आत्म-चिंतन कर लोगे, तो मैं थोड़ा-थोड़ा करके तुम लोगों को बताँऊगा। मैं तुम लोगों से प्रशासनिक आज्ञाओं के विषय की बेहतर समझ हासिल करने और परमेश्वर के स्वभाव को जानने का प्रयास करने का आग्रह करता हूँ। अन्यथा, तुम लोग अपनी जबान बंद नहीं रख पाओगे और बड़ी-बड़ी बातें करोगे, तुम अनजाने में परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करके अंधकार में जा गिरोगे और पवित्र आत्मा एवं प्रकाश की उपस्थिति को गँवा दोगे। चूँकि तुम्हारे काम के कोई सिद्धांत नहीं हैं, तुम्हें जो नहीं करना चाहिए वह करते हो, जो नहीं बोलना चाहिए वह बोलते हो, इसलिए तुम्हें यथोचित दंड मिलेगा। तुम्हें पता होना चाहिए कि, हालाँकि कथन और कर्म में तुम्हारे कोई सिद्धांत नहीं हैं, लेकिन परमेश्वर इन दोनों बातों में अत्यंत सिद्धांतवादी है। तुम्हें दंड मिलने का कारण यह है कि तुमने परमेश्वर का अपमान किया है, किसी इंसान का नहीं। यदि जीवन में बार-बार तुम परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध अपराध करते हो, तो तुम नरक की संतान ही बनोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

अगर तुम अपना हृदय, शरीर और अपना समस्त वास्तविक प्यार परमेश्वर को समर्पित कर सकते हो, उसके प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी हो सकते हो, और उसकी इच्छा के प्रति पूर्णतः विचारशील हो सकते हो-देह के लिए नहीं, परिवार के लिए नहीं, और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के परिवार के हित के लिए, परमेश्वर के वचन को हर चीज में सिद्धांत और नींव के रूप में ले सकते हो-तो ऐसा करने से तुम्हारे इरादे और दृष्टिकोण सब युक्तिसंगत होंगे, और तब तुम परमेश्वर के सामने ऐसे व्यक्ति होगे, जो उसकी प्रशंसा प्राप्त करता है। जिन लोगों को परमेश्वर पसंद करता है वे वो लोग हैं जो पूर्णतः उसकी ओर उन्मुख हैं; वे वो लोग हैं जो केवल उसके प्रति समर्पित हो सकते हैं। जिनसे परमेश्वर घृणा करता है वे वो लोग हैं जो आधे-अधूरे मन से उसकी ओर उन्मुख हैं, और जो उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं। वह उन लोगों से घृणा करता है जो उस पर विश्वास तो करते हैं और हमेशा उसका आनंद लेना चाहते हैं, लेकिन उसके लिए स्वयं को पूरी तरह से खपा नहीं सकते। वह उन से घृणा करता है जो कहते हैं कि वे उससे प्यार करते हैं, लेकिन अपने हृदय में उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं; वह उनसे घृणा करता है जो धोखा देने के लिए मनोहर और लच्छेदार वचनों का उपयोग करते हैं। जिन लोगों का परमेश्वर के प्रति वास्तविक समर्पण या उसके प्रति सच्ची आज्ञाकारिता नहीं है, वे विश्वासघाती लोग हैं और वे प्रकृति से अत्यधिक अभिमानी हैं। जो लोग सामान्य, व्यावहारिक परमेश्वर के सामने वास्तव में आज्ञाकारी नहीं हो सकते, वे तो और भी अधिक अभिमानी हैं, और वे विशेष रूप से महादूत के कर्त्तव्यनिष्ठ वंशज हैं। जो लोग वास्तव में खुद को परमेश्वर के लिए खपाते हैं वे उसके सामने अपना पूरा अस्तित्व रख देते हैं; वे वास्तव में उसके सभी कथनों का पालन करते हैं, और उसके वचनों को अभ्यास में लाने में सक्षम होते हैं। वे परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की नींव बनाते हैं, और परमेश्वर के वचनों में अभ्यास करने के हिस्सों को गंभीरता तलाश करने में सक्षम होते हैं। ऐसे लोग वास्तव में परमेश्वर के सामने रहते हैं। यदि तुम जो करते हो वह तुम्हारे जीवन के लिए लाभदायक है, और उसके वचनों को खाने और पीने के द्वारा, तुम अपनी आंतरिक आवश्यकताओं और कमियों को पूरा कर सकते हो ताकि तुम्हारा जीवन स्वभाव रूपान्तरित हो जाए, तो यह परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करेगा। यदि तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करते हो, यदि तुम देह को संतुष्ट नहीं करते हो, बल्कि उसकी इच्छा को संतुष्ट करते हो, तो यह उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं' से उद्धृत

जबसे लोगों ने परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू किया है, उन्होंने कई ग़लत इरादों को प्रश्रय दिया है। जब तुम सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहे होते हो, तो तुम ऐसा महसूस करते हो कि तुम्हारे सभी इरादे सही हैं, किंतु जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, तो तुम देखोगे कि तुम्हारे भीतर बहुत-से गलत इरादे हैं। इसलिए, जब परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, तो वह उन्हें महसूस करवाता है कि उनके भीतर कई ऐसी धारणाएँ हैं, जो परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान को अवरुद्ध कर रही हैं। जब तुम पहचान लेते हो कि तुम्हारे इरादे ग़लत हैं, तब यदि तुम अपनी धारणाओं और इरादों के अनुसार अभ्यास करना छोड़ पाते हो, और परमेश्वर के लिए गवाही दे पाते हो और अपने साथ घटित होने वाली हर बात में अपनी स्थिति पर डटे रहते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने देह के विरुद्ध विद्रोह कर दिया है। जब तुम देह के विरुद्ध विद्रोह करते हो, तो तुम्हारे भीतर अपरिहार्य रूप से एक संघर्ष होगा। शैतान लोगों से अपना अनुसरण करवाने की कोशिश करेगा, उनसे देह की धारणाओं का अनुसरण करवाने की कोशिश करेगा और देह के हितों को बनाए रखेगा—किंतु परमेश्वर के वचन भीतर से लोगों को प्रबुद्ध करेंगे और उन्हें रोशनी प्रदान करेंगे, और उस समय यह तुम पर निर्भर करेगा कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो या शैतान का। परमेश्वर लोगों से मुख्य रूप से उनके भीतर की चीज़ों से, उनके उन विचारों और धारणाओं से, जो परमेश्वर के मनोनुकूल नहीं हैं, निपटने के लिए सत्य को अभ्यास में लाने के लिए कहता है। पवित्र आत्मा लोगों के हृदय में स्पर्श करता है और उन्हें प्रबुद्ध और रोशन करता है। इसलिए जो कुछ होता है, उस सब के पीछे एक संघर्ष होता है : हर बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं या परमेश्वर के लिए प्रेम को अभ्यास में लाते हैं, तो एक बड़ा संघर्ष होता है, और यद्यपि अपने देह से सभी अच्छे दिखाई दे सकते हैं, किंतु वास्तव में, उनके हृदय की गहराई में जीवन और मृत्यु का संघर्ष चल रहा होता है—और केवल इस घमासान संघर्ष के बाद ही, अत्यधिक चिंतन के बाद ही, जीत या हार तय की जा सकती है। कोई यह नहीं जानता कि रोया जाए या हँसा जाए। क्योंकि मनुष्यों के भीतर के अनेक इरादे ग़लत हैं, या फिर चूँकि परमेश्वर का अधिकांश कार्य उनकी धारणाओं के विपरीत होता है, इसलिए जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं, तो पर्दे के पीछे एक बड़ा संघर्ष छिड़ जाता है। इस सत्य को अभ्यास में लाकर, पर्दे के पीछे लोग अंततः परमेश्वर को संतुष्ट करने का मन बनाने से पहले उदासी के असंख्य आँसू बहा चुके होंगे। यह इसी संघर्ष के कारण है कि लोग दुःख और शोधन सहते हैं; यही असली कष्ट सहना है। जब संघर्ष तुम्हारे ऊपर पड़ता है, तब यदि तुम सचमुच परमेश्वर की ओर खड़े रहने में समर्थ होते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे। सत्य का अभ्यास करते हुए व्यक्ति का अपने अंदर पीड़ा सहना अपरिहार्य है; यदि, जब वे सत्य को अभ्यास में लाते हैं, उस समय उनके भीतर सब-कुछ ठीक होता, तो उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की आवश्यकता न होती, और कोई संघर्ष न होता और वे पीड़ित न होते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोगों के भीतर कई ऐसी चीज़ें हैं, जो परमेश्वर के द्वारा उपयोग में लाए जाने योग्य नहीं हैं, और चूँकि देह का बहुत विद्रोही स्वभाव है, इसलिए लोगों को देह के विरुद्ध विद्रोह करने के सबक को अधिक गहराई से सीखने की आवश्यकता है। इसी को परमेश्वर पीड़ा कहता है, जिसमें से उसने मनुष्य को अपने साथ गुज़रने के लिए कहा है। जब कठिनाइयों से तुम्हारा सामना हो, तो जल्दी करो और परमेश्वर से प्रार्थना करो : "हे परमेश्वर! मैं तुझे संतुष्ट करना चाहता हूँ, मैं तेरे हृदय को संतुष्ट करने के लिए अंतिम कठिनाई सहना चाहता हूँ, और चाहे मैं कितनी भी बड़ी असफलताओं का सामना करूँ, मुझे तब भी तुझे संतुष्ट करना चाहिए। यहाँ तक कि यदि मुझे अपना संपूर्ण जीवन भी त्यागना पड़े, मुझे तब भी तुझे संतुष्ट करना चाहिए!" इस संकल्प के साथ, जब तुम इस प्रकार प्रार्थना करोगे, तो तुम अपनी गवाही में अडिग रह पाओगे। हर बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं, हर बार जब वे शोधन से गुज़रते हैं, हर बार जब उन्हें आजमाया जाता है, और हर बार जब परमेश्वर का कार्य उन पर आता है, तो उन्हें चरम पीड़ा सहनी होगी। यह सब लोगों के लिए एक परीक्षा है, और इसलिए इन सबके भीतर एक संघर्ष होता है। यही वह वास्तविक मूल्य है, जो वे चुकाते हैं। परमेश्वर के वचनों को और अधिक पढ़ना तथा अधिक दौड़-भाग उस क़ीमत का एक भाग है। यही है, जो लोगों को करना चाहिए, यही उनका कर्तव्य और उनकी ज़िम्मेदारी है, जो उन्हें पूरी करनी चाहिए, किंतु लोगों को अपने भीतर की उन बातों को एक ओर रखना चाहिए, जिन्हें एक ओर रखे जाने की आवश्यकता है। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो चाहे तुम्हारी बाह्य पीड़ा कितनी भी बड़ी क्यों न हों, और चाहे तुम कितनी भी भाग-दौड़ क्यों न कर लो, सब व्यर्थ रहेगा! कहने का अर्थ है कि, केवल तुम्हारे भीतर के बदलाव ही निर्धारित कर सकते हैं कि तुम्हारी बाहरी कठिनाई का कोई मूल्य है या नहीं। जब तुम्हारा आंतरिक स्वभाव बदल जाता है और तुम सत्य को अभ्यास में ले आते हो, तब तुम्हारी समस्त बाहरी पीड़ाओं को परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त हो जाएगा; यदि तुम्हारे आंतरिक स्वभाव में कोई बदलाव नहीं हुआ है, तो चाहे तुम कितनी भी पीड़ा क्यों न सह लो या तुम बाहर कितनी भी दौड़-भाग क्यों न कर लो, परमेश्वर की ओर से कोई अनुमोदन नहीं होगा—और ऐसी कठिनाई व्यर्थ है जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं है। इसलिए, तुम्हारे द्वारा जो क़ीमत चुकाई गई है, वह परमेश्वर द्वारा अनुमोदित की जाती है या नहीं, यह इस बात से निर्धारित होता है कि तुम्हारे भीतर कोई बदलाव आया है या नहीं, और कि परमेश्वर की इच्छा की संतुष्टि, परमेश्वर का ज्ञान और परमेश्वर के प्रति वफादारी प्राप्त करने के लिए तुम सत्य को अभ्यास में लाते हो या नहीं, और अपने इरादों और धारणाओं के विरुद्ध विद्रोह करते हो या नहीं। चाहे तुम कितनी भी भाग-दौड़ क्यों न करो, यदि तुमने कभी अपने इरादों के विरुद्ध विद्रोह करना नहीं जाना, बल्कि केवल बाहरी कार्यकलापों और जोश की खोज करना ही जानते हो, और कभी अपने जीवन पर ध्यान नहीं देते, तो तुम्हारी कठिनाई व्यर्थ रही होगी। यदि, किसी निश्चित परिवेश में, तुम्हारे पास कुछ है जो तुम कहना चाहते हो, किंतु अंदर से तुम महसूस करते हो कि यह कहना सही नहीं है, कि इसे कहने से तुम्हारे भाइयों और बहनों को लाभ नहीं होगा, और यह उन्हें ठेस पहुँचा सकता है, तो तुम इसे नहीं कहोगे, भीतर ही भीतर कष्ट सहना पसंद करोगे, क्योंकि ये वचन परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में अक्षम हैं। उस समय तुम्हारे भीतर एक संघर्ष होगा, किंतु तुम पीड़ा सहने और उस चीज़ को छोड़ने की इच्छा करोगे जिससे तुम प्रेम करते हो, तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए इस कठिनाई को सहने की इच्छा करोगे, और यद्यपि तुम भीतर कष्ट सहोगे, लेकिन तुम देह को बढ़ावा नहीं दोगे, और इससे परमेश्वर का हृदय संतुष्ट हो जाएगा, और इसलिए तुम्हें भी अंदर सांत्वना मिलेगी। यही वास्तव में क़ीमत चुकाना है, और परमेश्वर द्वारा वांछित क़ीमत है। यदि तुम इस तरीके से अभ्यास करोगे, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें आशीष देगा; यदि तुम इसे प्राप्त नहीं कर सकते, तो चाहे तुम कितना ही अधिक क्यों न समझते हो, या तुम कितना अच्छा क्यों न बोल सकते हो, यह सब कुछ व्यर्थ होगा! यदि परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग पर तुम उस समय परमेश्वर की ओर खड़े होने में समर्थ हो, जब वह शैतान के साथ संघर्ष करता है, और तुम शैतान की ओर वापस नहीं जाते, तब तुमने परमेश्वर के लिए प्रेम प्राप्त कर लिया होगा, और तुम अपनी गवाही में दृढ़ खड़े रहे होगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा मनुष्य के भीतर किए जाने वाले कार्य के प्रत्येक चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य अंतःक्रिया प्रतीत होता है, मानो यह मानव-व्यवस्थाओं द्वारा या मानवीय हस्तक्षेप से उत्पन्न हुआ हो। किंतु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाली हर चीज़, शैतान द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी है, और लोगों से अपेक्षित है कि वे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब को आजमाया गया था : पर्दे के पीछे शैतान परमेश्वर के साथ दाँव लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कर्म थे, और मनुष्यों का हस्तक्षेप था। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों में किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाज़ी होती है—इस सब के पीछे एक संघर्ष होता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम अपने भाइयों और बहनों के प्रति पूर्वाग्रह रखते हो, तो तुम्हारे पास ऐसे वचन होंगे जो तुम कहना चाहते हो—ऐसे वचन, जो तुम्हें परमेश्वर को अप्रसन्न करने वाले लगते हैं—किंतु अगर तुम उन्हें न कहो तो तुम्हें भीतर से बेचैनी महसूस होगी, और उस क्षण तुम्हारे भीतर एक संघर्ष शुरू हो जाएगा : "मैं बोलूँ या नहीं?" यही संघर्ष है। इस प्रकार, हर उस चीज़ में, जिसका तुम सामना करते हो, एक संघर्ष है, और जब तुम्हारे भीतर एक संघर्ष चलता है, तो तुम्हारे वास्तविक सहयोग और पीड़ा के कारण, परमेश्वर तुम्हारे भीतर कार्य करता है। अंततः, अपने भीतर तुम मामले को एक ओर रखने में सक्षम होते हो और क्रोध स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाता है। परमेश्वर के साथ तुम्हारे सहयोग का ऐसा ही प्रभाव होता है। हर चीज़ जो लोग करते हैं, उसमें उन्हें अपने प्रयासों के लिए एक निश्चित क़ीमत चुकाने की आवश्यकता होती है। बिना वास्तविक कठिनाई के वे परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकते; वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के करीब तक भी नहीं पहुँचते और केवल खोखले नारे लगा रहे होते हैं! क्या ये खोखले नारे परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं? जब परमेश्वर और शैतान आध्यात्मिक क्षेत्र में संघर्ष करते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए, और किस प्रकार उसकी गवाही में अडिग रहना चाहिए? तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है, वह एक महान परीक्षण है और ऐसा समय है, जब परमेश्वर चाहता है कि तुम उसके लिए गवाही दो। हालाँकि ये बाहर से महत्त्वहीन लग सकती हैं, किंतु जब ये चीज़ें होती हैं तो ये दर्शाती हैं कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो या नहीं। यदि तुम करते हो, तो तुम उसके लिए गवाही देने में अडिग रह पाओगे, और यदि तुम उसके प्रेम को अभ्यास में नहीं लाए हो, तो यह दर्शाता है कि तुम वह व्यक्ति नहीं हो जो सत्य को अभ्यास में लाता है, यह कि तुम सत्य से रहित हो, और जीवन से रहित हो, यह कि तुम भूसा हो! लोगों के साथ जो कुछ भी होता है, वह तब होता है जब परमेश्वर को आवश्यकता होती है कि लोग उसके लिए अपनी गवाही में अडिग रहें। भले ही इस क्षण में तुम्हारे साथ कुछ बड़ा घटित न हो रहा हो, और तुम बड़ी गवाही नहीं देते, किंतु तुम्हारे जीवन का प्रत्येक विवरण परमेश्वर के लिए गवाही का मामला है। यदि तुम अपने भाइयों और बहनों, अपने परिवार के सदस्यों और अपने आसपास के सभी लोगों की प्रशंसा प्राप्त कर सकते हो; यदि किसी दिन अविश्वासी आएँ और जो कुछ तुम करते हो उसकी तारीफ़ करें, और देखें कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह अद्भुत है, तो तुमने गवाही दे दी होगी। यद्यपि तुम्हारे पास कोई अंतर्दृष्टि नहीं है और तुम्हारी क्षमता कमज़ोर है, फिर भी परमेश्वर द्वारा तुम्हारी पूर्णता के माध्यम से तुम उसे संतुष्ट करने और उसकी इच्छा के प्रति सचेत होने में समर्थ हो जाते हो और दूसरों को दर्शाते हो कि सबसे कमज़ोर क्षमता के लोगों में उसने कितना महान कार्य किया है। जब लोग परमेश्वर को जान जाते हैं और शैतान के सामने विजेता और परमेश्वर के प्रति अत्यधिक वफादार बन जाते हैं, तब किसी में इस समूह के लोगों से अधिक आधार नहीं होता, और यही सबसे बड़ी गवाही है। यद्यपि तुम महान कार्य करने में अक्षम हो, लेकिन तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम हो। अन्य लोग अपनी धारणाओं को एक ओर नहीं रख सकते, लेकिन तुम रख सकते हो; अन्य लोग अपने वास्तविक अनुभवों के दौरान परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते, लेकिन तुम परमेश्वर के प्रेम को चुकाने और उसके लिए ज़बर्दस्त गवाही देने के लिए अपनी वास्तविक कद-काठी और कार्यकलापों का उपयोग कर सकते हो। केवल इसी को परमेश्वर से वास्तव में प्रेम करना माना जाता है। यदि तुम इसमें अक्षम हो, तो तुम अपने परिवार के सदस्यों के बीच, अपने भाइयों और बहनों के बीच, या संसार के अन्य लोगों के सामने गवाही नहीं देते। यदि तुम शैतान के सामने गवाही नहीं दे सकते, तो शैतान तुम पर हँसेगा, वह तुम्हें एक मजाक के रूप, एक खिलौने के रूप में लेगा, वह बार-बार तुम्हें मूर्ख बनाएगा, और तुम्हें विक्षिप्त कर देगा। भविष्य में, महान परीक्षण तुम्हारे ऊपर पड़ेंगे—किंतु आज यदि तुम परमेश्वर को सच्चे हृदय से प्रेम करते हो, और चाहे आगे कितनी भी बड़ी परीक्षाएँ हों, चाहे तुम्हारे साथ कुछ भी होता जाए, तुम अपनी गवाही में अडिग रहते हो, और परमेश्वर को संतुष्ट कर पाते हो, तब तुम्हारे हृदय को सांत्वना मिलेगी, और भविष्य में चाहे कितने भी बड़े परीक्षण क्यों न आएँ, तुम निर्भय रहोगे। तुम लोग नहीं देख सकते कि भविष्य में क्या होगा; तुम लोग केवल आज की परिस्थितियों में ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो। तुम लोग कोई भी महान कार्य करने में अक्षम हो, और तुम लोगों को वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों को अनुभव करने के माध्यम से उसे संतुष्ट करने, और एक मज़बूत और ज़बर्दस्त गवाही देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो शैतान के लिए शर्मिंदगी लाती है। यद्यपि तुम्हारी देह असंतुष्ट रहेगी और उसने पीड़ा भुगती होगी, लेकिन तुमने परमेश्वर को संतुष्ट कर दिया होगा और तुम शैतान के लिए शर्मिंदगी लाए होगे। यदि तुम हमेशा इस तरह से अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे सामने एक मार्ग खोल देगा। किसी दिन जब कोई बड़ा परीक्षण आएगा, तो अन्य लोग गिर जाएँगे, लेकिन तुम तब भी अडिग रहने में समर्थ होगे : तुमने जो क़ीमत चुकाई है, उसकी वजह से परमेश्वर तुम्हारी रक्षा करेगा, ताकि तुम अडिग रह सको और गिरो नहीं। यदि, साधारणतया, तुम सत्य को अभ्यास में लाने और परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने वाले हृदय से परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हो, तो परमेश्वर भविष्य के परीक्षणों के दौरान निश्चित रूप से तुम्हारी सुरक्षा करेगा। यद्यपि तुम मूर्ख और छोटी कद-काठी और कमज़ोर क्षमता वाले हो, तब भी परमेश्वर तुम्हारे खिलाफ भेदभाव नहीं करेगा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्हारे इरादे सही हैं या नहीं। आज, तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हो, जिसमें तुम छोटी से छोटी बात का ध्यान रखते हो, तुम सभी चीज़ों में परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, तुम्हारे पास परमेश्वर से वास्तव में प्रेम करने वाला हृदय है, तुम अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को देते हो और यद्यपि कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें तुम नहीं समझ सकते, लेकिन तुम अपने इरादों को सुधारने और परमेश्वर की इच्छा को खोजने के लिए परमेश्वर के सामने आ सकते हो, और तुम वह सब-कुछ करते हो, जो परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए आवश्यक है। हो सकता है कि तुम्हारे भाई और बहन तुम्हारा परित्याग कर दें, किंतु तुम्हारा हृदय परमेश्वर को संतुष्ट कर रहा होगा, और तुम देह के सुख का लालच नहीं करोगे। यदि तुम हमेशा इस तरह से अभ्यास करते हो, तो जब तुम्हारे ऊपर बड़े परीक्षण आएँगे, तुम्हें बचा लिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

आज अधिकांश लोगों के पास यह ज्ञान नहीं है। वे मानते हैं कि दुःख उठाने का कोई महत्व नहीं है, वे संसार के द्वारा त्यागे जाते हैं, उनके पारिवारिक जीवन में परेशानी होती है, वे परमेश्वर के प्रिय भी नहीं होते, और उनकी संभावनाएं बहुत धूमिल होती हैं। कुछ लोगों के कष्ट चरम तक पहुँच जाते हैं, और उनके विचार मृत्यु की ओर मुड़ जाते हैं। यह परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम नहीं है; ऐसे लोग कायर होते हैं, उनमें धीरज नहीं होता, वे कमजोर और शक्तिहीन होते हैं! परमेश्वर उत्सुक है कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परंतु मनुष्य जितना अधिक उससे प्रेम करता है, उसके कष्ट उतने अधिक बढ़ते हैं, और जितना अधिक मनुष्य उससे प्रेम करता है, उसके परीक्षण उतने अधिक बढ़ते हैं। यदि तुम उससे प्रेम करते हो, तो हर प्रकार के कष्ट से तुम्हारा सामना होगा—और यदि तुम उससे प्रेम नहीं करते, तब शायद सब कुछ तुम्हारे लिए अच्छा चलता रहेगा और तुम्हारे चारों ओर सब कुछ शांतिमय होगा। जब तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तो तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर सब कुछ दुर्गम है, और क्योंकि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, तुम्हारा शोधन किया जाएगा, इसके अलावा तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ रहोगे और हमेशा महसूस करोगे कि परमेश्वर की इच्छा बहुत बड़ी है, यह मनुष्य की पहुँच से बाहर है। इन सारी वजहों से तुम्हें परिशुद्ध किया जाएगा—क्योंकि तुममें बहुत निर्बलता है, और ऐसा बहुत कुछ है जो परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने में असमर्थ है, इसलिए तुम्हें भीतर से परिशुद्ध किया जाएगा। फिर भी तुम लोगों को यह स्पष्ट देखना आवश्यक है कि केवल शोधन के द्वारा ही शुद्धीकरण प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार, इन अंतिम दिनों में, तुम्हें अवश्य ही परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें अवश्य ही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान और उसकी कृपा पर बने रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही सशक्त और जोरदार गवाही है। जब शैतान तुम्हें लुभाता है तो तुम्हें यह कहना चाहिए: "मेरा हृदय परमेश्वर का है, और परमेश्वर ने मुझे पहले ही प्राप्त कर लिया है। मैं तुझे संतुष्ट नहीं कर सकता—मुझे अपना सर्वस्व परमेश्वर को संतुष्ट करने में लगाना है।" जितना अधिक तुम परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, उतना ही अधिक परमेश्वर तुम्हें आशीष देता है, और परमेश्वर के लिए तुम्हारे प्रेम की ताकत भी उतनी ही अधिक होगी; और इसके साथ-साथ तुममें विश्वास और दृढ़-निश्चय होगा, और तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर को प्रेम करने में बिताए गए जीवन से बढ़कर कीमती और महत्वपूर्ण और कुछ नहीं है। यह कहा जा सकता है कि अगर मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करता है तो वह शोक से रहित होगा। यद्यपि ऐसा समय भी होता है जब तुम्हारी देह निर्बल पड़ जाती है, और कई वास्तविक परेशानियाँ तुम्हें घेर लेती हैं, ऐसे समय में तुम सचमुच परमेश्वर पर निर्भर रहोगे, और अपनी आत्मा के भीतर तुम राहत महसूस करोगे, और एक निश्चितता का अनुभव करोगे, महसूस करोगे कि तुम्हारे पास कुछ है जिस पर तुम भरोसा कर सकते हो। इस तरह, तुम कई वातावरणों पर विजय प्राप्त कर पाओगे, और इसलिए तुम अपनी यंत्रणा के कारण परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करोगे; बल्कि तुम गीत गाना, नाचना, और प्रार्थना करना चाहोगे, तुम एकत्रित होना, संगति करना, परमेश्वर के बारे में विचार करना चाहोगे, और तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर सारे लोग, सारी वस्तुएँ और चीजें जो परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित की गई हैं वे सब उपयुक्त हैं। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हो, तो जिन चीजों पर भी तुम दृष्टि डालते हो वे सब तुम्हारे लिए दुःखद होंगी, कुछ भी तुम्हारी दृष्टि में सुखद नहीं होगा; अपनी आत्मा में तुम स्वाधीन नहीं बल्कि पतित होगे, तुम्हारा हृदय सदैव परमेश्वर के बारे में शिकायत करेगा, और तुम सदैव महसूस करोगे कि तुम बहुत अधिक यातना सहते हो, और कि यह बहुत ही अन्यायपूर्ण है। यदि तुम प्रसन्नता के लिए प्रयास नहीं करते, बल्कि परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए और शैतान के द्वारा दोषी न ठहराए जाने के लिए प्रयास करते हो, तो ऐसे प्रयास तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने का बहुत सामर्थ्य देंगे। परमेश्वर द्वारा कही गई सारी बातें मनुष्य पूरी कर सकता है, और वह जो कुछ भी करता है वह परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम है—वास्तविकता से सम्पन्न होने का अर्थ यही है। परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास, उसके वचनों को अभ्यास में लाने के लिए परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम का प्रयोग करना है; समय की परवाह किए बिना—तब भी जब दूसरे लोग सामर्थ्यहीन हैं—तुम्हारे भीतर अभी भी एक ऐसा हृदय है जो परमेश्वर से प्रेम करता है, जो बड़ी गहराई से परमेश्वर की लालसा करता है, और परमेश्वर को याद करता है। यह वास्तविक आध्यात्मिक कद है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर अपने प्रति मनुष्य की आज्ञाकारिता को विशेष रूप से सहेजकर रखता है, और अपने बारे में मनुष्य की समझ और अपने प्रति मनुष्य की शुद्ध हृदयता उसे अच्छी लगती है। यह शुद्ध हृदयता परमेश्वर को कितनी अच्छी लगती है? तुम लोग शायद समझ न सको कि उसे यह कितनी अच्छी लगती है, और शायद ऐसा कोई भी न हो जिसे इसका अहसास हो। परमेश्वर ने अब्राहम को पुत्र दिया, और जब वह पुत्र बड़ा हो गया, तो परमेश्वर ने अब्राहम से अपना पुत्र परमेश्वर को भेंट चढ़ाने के लिए कहा। अब्राहम ने परमेश्वर की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया, उसने परमेश्वर के वचन का पालन किया, और उसकी शुद्ध हृदयता ने परमेश्वर को द्रवित कर दिया और परमेश्वर ने उसे सहेजकर रखा। परमेश्वर ने इसे कितना सहेजकर रखा? और उसने इसे क्यों सहेजकर रखा? ऐसे समय जब किसी ने भी परमेश्वर के वचनों को बूझा या उसके हृदय को समझा नहीं था, अब्राहम ने कुछ ऐसा किया जिसने स्वर्ग को हिला दिया और पृथ्वी को कँपा दिया, तथा इसने परमेश्वर को अभूतपूर्व संतुष्टि का भाव महसूस कराया, और यह परमेश्वर के लिए ऐसे व्यक्ति को प्राप्त करने का आनंद लाया जो उसके वचनों का पालन करने में समर्थ था। यह संतुष्टि और आनंद परमेश्वर द्वारा अपने हाथ से सृजित किए गए प्राणी से आया, और जब से मनुष्य का सृजन किया गया था, तब से यह पहला "बलिदान" था जिसे मनुष्य ने परमेश्वर को चढ़ाया था और जिसे परमेश्वर ने सर्वाधिक सहेजकर रखा था। इस बलिदान की प्रतीक्षा करते हुए परमेश्वर ने बहुत कठिन समय गुज़ारा था, और उसने इसे उस मनुष्य की ओर से दिए गए पहले सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपहार के रूप में लिया जिसे उसने सृजित किया था। इसने परमेश्वर को उसके प्रयासों और उसकी चुकाई क़ीमत का पहला फल दिखाया, और उसे मनुष्यजाति में आशा देखने की गुंजाइश दी। इसके बाद, परमेश्वर को ऐसे लोगों के समूह की और अधिक लालसा हुई जो उसका साथ दें, उसके साथ शुद्ध हृदयता से व्यवहार करें, और शुद्ध हृदयता के साथ उसकी परवाह करें। परमेश्वर ने यह तक आशा की कि अब्राहम निरंतर जीवित रहेगा, क्योंकि वह चाहता था कि जब वह अपने प्रबंधन को आगे बढ़ाए तब अब्राहम जैसा एक हृदय उसका साथ दे और उसके साथ रहे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

चाहे परमेश्वर कैसे भी कार्य करे या तुम्हारा परिवेश जैसा भी हो, तुम जीवन का अनुसरण करने में समर्थ होगे और सत्य की खोज करने और परमेश्वर के कार्यों के ज्ञान को तलाशने में समर्थ होगे, और तुममें उसके क्रियाकलापों की समझ होगी और तुम सत्य के अनुसार कार्य करने में समर्थ होगे। ऐसा करना ही सच्चा विश्वास रखना है, ऐसा करना यह दिखाता है कि तुमने परमेश्वर में अपना विश्वास नहीं खोया है। जब तुम शुद्धिकरण द्वारा सत्य का अनुसरण करने में समर्थ हो, तुम सच में परमेश्वर से प्रेम करने में समर्थ हो और उसके बारे में संदेहों को पैदा नहीं करते हो, चाहे वो जो भी करे, तुम फिर भी उसे संतुष्ट करने के लिए सत्य का अभ्यास करते हो, और तुम गहराई में उसकी इच्छा की खोज करने में समर्थ होते हो और उसकी इच्छा के बारे में विचारशील होते हो, केवल तभी इसका अर्थ है कि तुम्हें परमेश्वर में सच्चा विश्वास है। इससे पहले, जब परमेश्वर ने कहा कि तुम एक सम्राट के रूप में शासन करोगे, तो तुमने उससे प्रेम किया, और जब उसने स्वयं को खुलेआम तुम्हें दिखाया, तो तुमने उसका अनुसरण किया। परन्तु अब परमेश्वर छिपा हुआ है, तुम उसे देख नहीं सकते हो, और परेशानियाँ तुम पर आ गई हैं। तो इस समय, क्या तुम परमेश्वर पर आशा छोड़ देते हो? इसलिए हर समय तुम्हें जीवन की खोज अवश्य करनी चाहिए और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। यही सच्चा विश्वास कहलाता है, और यही सबसे सच्चा और सबसे सुंदर प्रकार का प्रेम है।

... जब तुम कष्टों का सामना करते हो तो तुम्हें देह पर विचार नहीं करने और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत नहीं करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। जब परमेश्वर अपने आप को तुमसे छिपाता है, तो तुम्हें उसका अनुसरण करने के लिए, अपने पिछले प्यार को लड़खड़ाने या मिटने न देते हुए उसे बनाए रखने के लिए, तुम्हें विश्वास रखने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर क्या करता है, तुम्हें उसके मंसूबे के प्रति समर्पण अवश्य करना चाहिए, और उसके विरूद्ध शिकायत करने की अपेक्षा अपनी स्वयं की देह को धिक्कारने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब तुम्हारा परीक्षणों से सामना होता है तो तुम्हें अपनी किसी प्यारी चीज़ से अलग होने की अनिच्छा, या बुरी तरह रोने के बावजूद तुम्हें अवश्य परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। केवल यही सच्चा प्यार और विश्वास है। तुम्हारी वास्तविक कद-काठी चाहे जो भी हो, तुममें सबसे पहले कठिनाई को भुगतने की इच्छा और सच्चा विश्वास, दोनों ही अवश्य होना चाहिए और तुममें देह-सुख को त्याग देने की इच्छा अवश्य होनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के उद्देश्य से व्यक्तिगत कठिनाइयों का सामना करने और अपने व्यक्तिगत हितों का नुकसान उठाने के लिए तैयार होना चाहिए। तुम्हें अपने हृदय में अपने बारे में पछतावा महसूस करने में भी अवश्य समर्थ होना चाहिए : अतीत में तुम परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर पाते थे, और अब तुम स्वयं पर पछतावा कर सकते हो। इनमें से किसी भी एक का अभाव तुममें बिलकुल नहीं होना चाहिए—परमेश्वर इन चीज़ों के द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाएगा। यदि तुम इन कसौटियों पर खरे नहीं उतरते हो, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर तुमसे चाहे कुछ भी माँगे, तुम्हें अपनी पूरी ताकत के साथ केवल इस ओर काम करने की आवश्यकता है, और मुझे आशा है कि अंत में तुम परमेश्वर के समक्ष आने और उसे अपनी परम भक्ति प्रदान करने में सक्षम होगे। अगर तुम सिंहासन पर बैठे परमेश्वर की संतुष्ट मुसकराहट देख सकते हो, तो भले ही यह तुम्हारी मृत्यु का नियत समय ही क्यों न हो, आँखें बंद करते समय भी तुम्हें हँसने और मुसकराने में सक्षम होना चाहिए। पृथ्वी पर अपने समय के दौरान तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपना अंतिम कर्तव्य अवश्य निभाना चाहिए। अतीत में, पतरस को परमेश्वर के लिए क्रूस पर उलटा लटका दिया गया था; परंतु तुम्हें अंत में परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, और उसके लिए अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर देनी चाहिए। एक सृजित प्राणी परमेश्वर के लिए क्या कर सकता है? इसलिए तुम्हें जल्दी से अपने आपको परमेश्वर को सौंप देना चाहिए, ताकि वह अपनी इच्छा के अनुसार तुम्हारा निपटारा कर सके। अगर इससे परमेश्वर खुश और प्रसन्न होता हो, तो उसे अपने साथ जो चाहे करने दो। मनुष्यों को शिकायत के शब्द बोलने का क्या अधिकार है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 41' से उद्धृत

परमेश्वर का कार्य अपनी सेवकाई करना है, और मनुष्य का कर्तव्य बिना किसी प्रतिरोध के परमेश्वर के समस्त मार्गदर्शन का पालन करना है। परमेश्वर चाहे किसी भी ढंग से कार्य करे या रहे, मनुष्य को वह करना उचित है, जो उसे प्राप्त करना चाहिए। केवल स्वयं परमेश्वर ही मनुष्य से अपेक्षाएँ कर सकता है, अर्थात् केवल स्वयं परमेश्वर ही मनुष्य से अपेक्षाएँ करने के लिए उपयुक्त है। मनुष्य के पास कोई विकल्प नहीं होना चाहिए और उसे पूरी तरह से समर्पण और अभ्यास करने के सिवा कुछ नहीं करना चाहिए; यही वह समझ है, जो मनुष्य में होनी चाहिए। जब वह कार्य पूरा हो जाता है जो स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए, तो मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह कदम-दर-कदम उसका अनुभव करे। यदि, अंत में, जब परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन पूरा हो जाता है, तब भी मनुष्य वह नहीं करता, जिसकी परमेश्वर द्वारा अपेक्षा की गई है, तो मनुष्य को दंडित किया जाना चाहिए। यदि मनुष्य परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी नहीं करता, तो यह उसकी अवज्ञा के कारण है; इसका अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर ने अपना कार्य पर्याप्त पूर्णता से नहीं किया है। वे सभी, जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं ला सकते, वे जो परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी नहीं कर सकते, और वे जो अपनी वफादारी नहीं दे सकते और अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर सकते, उन सभी को दंड दिया जाएगा। आज तुम लोगों से जो कुछ हासिल करने की अपेक्षा की जाती है, वे अतिरिक्त माँगें नहीं, बल्कि मनुष्य का कर्तव्य है, जिसे सभी लोगों द्वारा किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अपना कर्तव्य तक निभाने में या उसे भली-भाँति करने में असमर्थ हो, तो क्या तुम लोग अपने ऊपर मुसीबतें नहीं ला रहे हो? क्या तुम लोग मृत्यु को आमंत्रित नहीं कर रहे हो? कैसे तुम लोग अभी भी भविष्य और संभावनाओं की आशा कर सकते हो? परमेश्वर का कार्य मानवजाति के लिए किया जाता है, और मनुष्य का सहयोग परमेश्वर के प्रबंधन के लिए दिया जाता है। जब परमेश्वर वह सब कर लेता है जो उसे करना चाहिए, तो मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने अभ्यास में उदार हो और परमेश्वर के साथ सहयोग करे। परमेश्वर के कार्य में मनुष्य को कोई कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए, उसे अपनी वफादारी प्रदान करनी चाहिए, और अनगिनत धारणाओं में सलंग्न नहीं होना चाहिए, या निष्क्रिय बैठकर मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। परमेश्वर मनुष्य के लिए स्वयं को बलिदान कर सकता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर को अपनी वफादारी प्रदान नहीं कर सकता? परमेश्वर मनुष्य के प्रति एक हृदय और मन वाला है, तो क्यों मनुष्य थोड़ा-सा सहयोग प्रदान नहीं कर सकता? परमेश्वर मानवजाति के लिए कार्य करता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के लिए अपना कुछ कर्तव्य पूरा नहीं कर सकता? परमेश्वर का कार्य इतनी दूर तक आ गया है, पर तुम लोग अभी भी देखते ही हो किंतु करते नहीं, सुनते ही हो किंतु हिलते नहीं। क्या ऐसे लोग तबाही के लक्ष्य नहीं हैं? परमेश्वर पहले ही अपना सर्वस्व मनुष्य को अर्पित कर चुका है, तो क्यों आज मनुष्य ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ है? परमेश्वर के लिए उसका कार्य उसकी पहली प्राथमिकता है, और उसके प्रबंधन का कार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करना उसकी पहली प्राथमिकता है। इसे तुम सभी लोगों को समझ लेना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

अब तुम सभी लोगों को अपने अंदर यथाशीघ्र झांककर देखना चाहिए कि तुम लोगों के अंदर मेरे प्रति कितना विश्वासघात बाक़ी है। मैं उत्सुकता से तुम्हारी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मेरे साथ अपने व्यवहार में लापरवाह मत होना। मैं कभी भी लोगों के साथ खेल नहीं खेलता हूँ। यदि मैं कहता हूँ कि मैं कुछ करूँगा तो मैं निश्चित रूप से ऐसा करूँगा। मुझे आशा है कि तुम सभी ऐसे लोग हो सकते हो जो मेरे वचनों को गंभीरता से लेते हो और यह नहीं सोचते हो कि वे मात्र वैज्ञानिक कपोल कथाएँ हैं। मैं तुम लोगों से एक ठोस कार्रवाई चाहता हूँ, न कि तुम लोगों की कल्पनाएँ। इसके बाद, तुम लोगों को मेरे प्रश्नों के उत्तर देने होंगे, जो इस प्रकार हैं : 1. यदि तुम सचमुच में सेवा करने वाले हो, तो क्या तुम बिना किसी लापरवाही या नकारात्मक तत्वों के निष्ठापूर्वक मुझे सेवा प्रदान कर सकते हो? 2. यदि तुम्हें पता चले कि मैंने कभी भी तुम्हारी सराहना नहीं की है, तो क्या तब भी तुम जीवन भर टिके रह कर मुझे सेवा प्रदान कर पाओगे? 3. यदि तुमने मेरी ख़ातिर बहुत सारे प्रयास किए हैं लेकिन मैं तब भी तुम्हारे प्रति बहुत रूखा रहूँ, तो क्या तुम गुमनामी में भी मेरे लिए कार्य करना जारी रख पाओगे? 4. यदि, तुम्हारे द्वारा मेरे लिए खर्च करने के बाद भी मैंने तुम्हारी तुच्छ माँगों को पूरा नहीं किया, तो क्या तुम मेरे प्रति निरुत्साहित और निराश हो जाओगे या यहाँ तक कि क्रोधित होकर गालियाँ भी बकने लगोगे? 5. यदि तुम हमेशा मेरे प्रति बहुत निष्ठावान रहे हो, मेरे लिए तुममें बहुत प्रेम है, मगर फिर भी तुम बीमारी, दरिद्रता, और अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के द्वारा त्यागे जाने की पीड़ा को भुगतते हो या जीवन में किसी भी अन्य दुर्भाग्य को सहन करते हो, तो क्या तब भी मेरे लिए तुम्हारी निष्ठा और प्यार बना रहेगा? 6. यदि मैने जो किया है उसमें से कुछ भी उससे मेल नहीं खाता है जिसकी तुमने अपने हृदय में कल्पना की है, तो तुम अपने भविष्य के मार्ग पर कैसे चलोगे? 7. यदि तुम्हें वह कुछ भी प्राप्त नहीं होता है जो तुमने प्राप्त करने की आशा की थी, तो क्या तुम मेरे अनुयायी बने रह सकते हो? 8. यदि तुम्हें मेरे कार्य का उद्देश्य और महत्व कभी भी समझ में नहीं आए हों, तो क्या तुम ऐसे आज्ञाकारी व्यक्ति हो सकते हो जो मनमाने निर्णय और निष्कर्ष नहीं निकालता हो? 9. मानवजाति के साथ रहते समय, मैंने जो वचन कहे हैं और मैंने जो कार्य किए हैं उन सभी को क्या तुम संजोए रख सकते हो? 10. यदि तुम कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाते हो, तो भी क्या तुम मेरे निष्ठावान अनुयायी बने रहने में सक्षम हो, और आजीवन मेरे लिए कष्ट भुगतने को तैयार हो? 11. क्या तुम मेरे वास्ते भविष्य में अपने जीने के मार्ग पर विचार न करने, योजना न बनाने या तैयारी न करने में सक्षम हो? ये प्रश्न तुम लोगों से मेरी अंतिम अपेक्षाओं को दर्शाते हैं, और मुझे आशा है कि तुम सभी लोग मुझे उत्तर दे सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2)' से उद्धृत

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