77. परमेश्वर के घर के कार्य को सुरक्षित रखने के सिद्धांत

(1) कलीसिया के सामान्य जीवन की रक्षा के लिए झूठे अगुवाओं, मसीह-विरोधियों, दुष्ट लोगों, और अविश्वासियों का पता लगाना आवश्यक होता है, और यदि वे पाए जाएँ, तो फौरन ही उनका पर्दाफाश करना और उन्हें प्रबंधित करना आवश्यक होता है।

(2) जब एक झूठे अगुवा या कार्यकर्ता को व्यावहारिक कार्य करने में असमर्थ पाया जाता है, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों से संपर्क किया जाना चाहिए ताकि उन्हें पहचाना जा सके, और उन्हें तुरंत प्रतिबंधित और खारिज किया जा सके।

(3) विधर्म और भ्रान्ति के सभी तरीकों को उजागर करना और उनका खंडन करना आवश्यक होता है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उन्हें समझने के लिए सक्षम करो, अन्यथा वे धोखा खा सकते हैं, और यह सुनिश्चित करो कि परमेश्वर का वचन सत्य, कलीसिया पर शासन करे।

(4) उच्च से मिली कार्य व्यवस्थाओं के अनुसार कड़ाई से कलीसिया का जीवन जीना आवश्यक है। उन मसीह-विरोधियों और बुरे लोगों से सावधान रहो जो अपनी मनमानी करते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को धोखा देते हैं।

(5) अगर मसीह-विरोधी और दुष्ट लोग कलीसिया के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं की घेराबंदी करने लगें, तो एक व्यक्ति को उनकी पहचान करना सीखना चाहिए। शैतान की चाल अच्छे से समझो, और अगुवाओं और कार्यकर्ताओं की रक्षा करो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

कलीसिया निर्माणाधीन है और शैतान इसे ध्वस्त करने की पूरी कोशिश कर रहा है। यह मेरे निर्माण को किसी भी तरह से नष्ट कर देना चाहता है; इस कारण, कलीसिया को तुरंत शुद्ध किया जाना चाहिए। बुराई का ज़रा-सा भी तलछट शेष नहीं रहना चाहिए; कलीसिया को इस ढंग से शुद्ध किया जाना चाहिए ताकि यह निष्कलंक और उतनी ही शुद्ध हो जाए जितनी यह पहले थी और आगे भी वैसी ही रहे। तुम लोगों को जागते रहना चाहिए और समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए, और तुम लोगों को मेरे सामने अधिक बार प्रार्थना करनी चाहिए। तुम्हें शैतान की विभिन्न साजिशों और चालाक योजनाओं को पहचानना चाहिए, आत्माओं को पहचानना चाहिए, लोगों को जानना चाहिए और सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों को समझने में सक्षम होना चाहिए; तुम्हें मेरे वचनों को और अधिक खाना और पीना भी चाहिए, और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम्हें उन्हें अपने आप खाने और पीने में सक्षम होना चाहिए। तुम अपने आप को पूरे सत्य से युक्त करो और मेरे सामने आओ, ताकि मैं तुम लोगों की आध्यात्मिक आँखें खोल सकूँ और तुम्हें आत्मा के भीतर निहित सभी रहस्यों को देखने का मौका दे सकूँ...। जब कलीसिया अपने निर्माण के चरण में आती है, तो संत युद्ध के लिए कूच करते हैं। शैतान के विभिन्न वीभत्स लक्षण तुम सभी के सामने रखे जाते हैं : क्या तुम रुकते और पीछे हट जाते हो, या तुम मुझ में भरोसा रखकर खड़े हो जाते हो और आगे बढ़ना जारी रखते हो? शैतान के भ्रष्ट और घिनौने लक्षणों को पूरी तरह से उजागर कर दो, कोई भावुकता न रखो और कोई दया मत दिखाओ! मौत तक शैतान से लड़ते रहो! मैं तुम्हारे पीछे हूँ और तुममें एक मर्द बच्चे की भावना होनी चाहिए! शैतान अपनी मौत की पीड़ा में अंतिम प्रहार कर रहा है, लेकिन फिर भी वह मेरे न्याय से बच निकलने में असमर्थ ही रहेगा। शैतान मेरे पैरों तले है और उसे तुम लोगों के पैरों तले भी कुचला जा रहा है—यह एक तथ्य है!

सभी धार्मिक बाधकों और कलीसिया की संरचना को ध्वस्त करने वालों के प्रति ज़रा-सी भी सहनशीलता नहीं दिखायी जा सकती, बल्कि तुरंत उनका न्याय किया जाएगा; शैतान का पर्दाफ़ाश किया जाएगा, उसे पैरों तले कुचला जाएगा, उसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया जाएगा और उसके छिपने के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी जाएगी। सभी तरह के हैवान और भूत निश्चित रूप से मेरे सामने अपना असली रूप प्रकट कर देंगे और मैं उन सभी को अथाह कुंड में डाल दूंगा जिससे वे कभी मुक्त नहीं होंगे; वे सब हमारे पैरों तले होंगे। यदि तुम सत्य की खातिर एक अच्छी लड़ाई लड़ना चाहते हो, तो सबसे पहले, तुम्हें शैतान को काम करने का कोई मौका नहीं देना चाहिए—ऐसा करने के लिए तुम्हें एकमत होना पड़ेगा और मिलजुल कर सेवा करने में समर्थ होना होगा, अपनी सभी धारणाओं, विचारों, मतों और काम करने के तरीकों को छोड़ना होगा, मेरे भीतर अपने दिल को शांत करना होगा, पवित्र आत्मा की आवाज़ पर ध्यान देना होगा, पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति चौकस रहना होगा और परमेश्वर के वचनों का विस्तार से अनुभव करना होगा। तुम्हारी बस एक ही मंशा होनी चाहिए, और वह ये कि मेरी इच्छा पूरी हो। इसके अलावा तुम्हारी और कोई मंशा नहीं होनी चाहिए। तुम्हें अपने पूरे दिल से मेरी ओर देखना चाहिए, मेरे सारे कामों और चीजों को करने के मेरे तरीकों को बारीकी से देखना चाहिए और ज़रा-भी लापरवाह नहीं होना चाहिए। तुम्हारी आत्मा प्रखर हो और तुम्हारी आँखें खुली हों। आम तौर पर, जब उनकी बात आती है जिनके इरादे और उद्देश्य सही नहीं होते, और साथ ही उनकी जो दूसरों के द्वारा देखे जाना पसंद करते हैं, जो चीज़ों को करने के लिए उतावले होते हैं, जो बाधा डालने में उद्यत होते हैं, जो धार्मिक सिद्धांतों की झड़ी लगाने में अच्छे होते हैं, जो शैतान के अनुचर होते हैं, आदि—ऐसे लोग जब खड़े हो जाते हैं तो वे कलीसिया के लिए कठिनाइयाँ बन जाते हैं, और भाई-बहनों द्वारा परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने को व्यर्थ कर देते हैं। अगर तुम इस तरह के लोगों को ढोंग करते हुए पाओ, तो तुरंत उन पर प्रतिबंध लगा दो। यदि वे बार-बार फटकारे जाने पर भी न बदलें, तो उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा। यदि वे लोग जो अपने तौर-तरीक़ों में जिद्दी होते हैं, वे अपना बचाव करने और अपने पापों को ढँकने की कोशिश करें, तो कलीसिया को उन्हें तुरंत बहिष्कृत कर देना चाहिए और उनकी चालबाज़ी के लिए कोई जगह नहीं छोड़नी चाहिए। थोड़ा-सा बचाने की कोशिश में बहुत कुछ न खो देना; अपनी निगाह मुख्य बातों पर बनाये रखो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 17' से उद्धृत

हर कलीसिया में ऐसे लोग होते हैं जो कलीसिया के लिए मुसीबत पैदा करते हैं या परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं। ये सभी लोग शैतान के छ्द्म वेष में परमेश्वर के परिवार में घुस आए हैं। ऐसे लोग अभिनय कला में निपुण होते हैं : मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, खुजली वाले कुत्ते की तरह व्यवहार करते हैं, अपने मकसद को पूरा करने के लिये अपना "सर्वस्व" न्योछावर करते हैं, लेकिन भाई-बहनों के सामने उनका बदसूरत चेहरा प्रकट हो जाता है। जब वे सत्य पर चलने वाले लोगों को देखते हैं तो उन पर आक्रमण कर देते हैं और उन्हें दर-किनार कर देते हैं; और जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो उनसे भी अधिक भयंकर हैं, तो फिर वे उनकी चाटुकारिता करने लगते हैं, उनके आगे गिड़गिड़ाने लगते हैं। कलीसिया के भीतर वे आततायियों की तरह व्यवहार करते हैं। कह सकते हैं कि ऐसे "स्थानीय गुण्डे" और ऐसे "पालतू कुत्ते" ज़्यादातर कलीसियाओं में मौजूद हैं। ऐसे लोग मिलकर दुष्ट हरकतें करते हैं, आँखे झपका कर, गुप्त संकेतों और इशारों से आपस में बात करते हैं, और इनमें से कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता। जो सबसे ज़्यादा ज़हरीला होता है, वही "प्रधान राक्षस" होता है, और जो सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है, वह इनकी अगुवाई करता है और इनका परचम बुलंद रखता है। ऐसे लोग कलीसिया में उपद्रव मचाते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे बकते हैं; किसी में इन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती है, ये शैतानी स्वभाव से भरे होते हैं। जैसे ही ये लोग व्यवधान पैदा करते हैं, कलीसिया में मुर्दनी छा जाती है। कलीसिया के भीतर सत्य का अभ्यास करने वाले लोगों को अलग हटा दिया जाता है और वे अपना सर्वस्व अर्पित करने में असमर्थ हो जाते हैं, जबकि कलीसिया में परेशानियाँ खड़ी करने वाले, मौत का वातावरण निर्मित करने वाले लोग यहां उपद्रव मचाते फिरते हैं, और इतना ही नहीं, अधिकतर लोग उनका अनुसरण करते हैं। साफ बात है, ऐसी कलीसियाएँ शैतान के कब्ज़े में होती है; हैवान इनका सरदार होता है। यदि समागम के सदस्य विद्रोह नहीं करेंगे और उन प्रधान राक्षसों को खारिज नहीं करेंगे, तो देर-सवेर वे भी बर्बाद हो जाएँगे। अब ऐसी कलीसियाओं के ख़िलाफ़ कदम उठाए जाने चाहिए। जो लोग थोड़ा भी सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं यदि वे खोज नहीं करते हैं, तो उस कलीसिया को मिटा दिया जाएगा। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हो, और परमेश्वर की गवाही दे सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए और अन्य कलीसियाओं के साथ उसके संबंध समाप्त कर दिये जाने चाहिए। इसे "मृत्यु दफ़्न करना" कहते हैं; इसी का अर्थ है शैतान को बहिष्कृत करना। यदि किसी कलीसिया में कई स्थानीय गुण्डे हैं, और कुछ छोटी-मोटी "मक्खियों" द्वारा उनका अनुसरण किया जाता है जिनमें विवेक का पूर्णतः अभाव है, और यदि समागम के सदस्य, सच्चाई जान लेने के बाद भी, इन गुण्डों की जकड़न और तिकड़म को नकार नहीं पाते, तो उन सभी मूर्खों का अंत में सफाया कर दिया जायेगा। भले ही इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कुछ खौफ़नाक न किया हो, लेकिन ये और भी धूर्त, ज़्यादा मक्कार और कपटी होती हैं, इस तरह के सभी लोगों को हटा दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान से जुड़े हैं, उन्हें शैतान के पास भेज दिया जाएगा, जबकि जो परमेश्वर से संबंधित हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज में चले जाएँगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। जो सत्य के खोजी हैं उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदय के तृप्त होने तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; वह किसी से पक्षपात नहीं करता। यदि तुम शैतान हो, तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते; और यदि तुम सत्य की खोज करने वाले हो, तो यह निश्चित है कि तुम शैतान के बंदी नहीं बनोगे—इसमें कोई संदेह नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

मानव जाति के लिए परमेश्वर का सबसे बड़ा आदेश परमेश्वर के घर के लिए वृहतम लाभ है। यह कौन-सा लाभ है? यह मानव जाति के बीच परमेश्वर की छह हजार वर्षों की प्रबंधन योजना का कार्यान्वयन है, एक ऐसा कार्यान्वयन जिसमें सहज रूप से कई पहलू शामिल हैं। तो, इसमें क्या शामिल है? इसमें कलीसिया की स्थापना और गठन और सभी स्तरों पर कलीसिया के अगुआओं और कर्मियों का उद्भव शामिल है, जो कलीसिया में, परमेश्वर के नए काम और उसके सुसमाचार के प्रसार से संबंधित सभी कार्यों के अबाधित प्रवाह के लिए रास्ता साफ करते हैं। इसमें कलीसिया शामिल है; यह कलीसिया के हित में है। यह परमेश्वर और उसके घर और कलीसिया के बार-बार उल्लिखित हितों में शामिल सबसे महत्वपूर्ण बात है। परमेश्वर के कार्य को विस्तार मिलता है; परमेश्वर की प्रबंधन योजना निर्बाध प्रवाहित हो सकती है; लोगों के बीच परमेश्वर का इरादा और इच्छा अबाधित रूप से प्रवाहित हो सकती है; और उनके बीच परमेश्वर के वचन को अधिक व्यापक रूप से विस्तारित, घोषित और प्रचारित किया जा सकता है, जिससे उनमें से और अधिक लोग परमेश्वर के सामने आते हैं। यह परमेश्वर के द्वारा किए जाने वाले इस कार्य का उद्देश्य और मूल है। इसलिए, जो कुछ भी परमेश्वर के घर और कलीसिया के हितों से संबंधित है, वह निश्चित रूप से परमेश्वर की इच्छा और प्रबंधन योजना से संबंधित है। विशेष रूप से, यह इस बात से संबंधित है कि क्या परमेश्वर के प्रत्येक युग और अवस्था के कार्य अबाधित रूप से प्रवाहित हो सकते हैं, क्या इसका विस्तार किया जा सकता है, और क्या मानव जाति के बीच यह सुगम रूप से प्रगति कर सकता है, सुचारू रूप से विकसित हो सकता है और इसे निर्बाध रूप से कार्यान्वित किया जा सकता है। यदि यह सब सामान्य रूप से प्रगति कर रहा है, तो परमेश्वर के परिवार के और कलीसिया के हितों को सुरक्षित किया जा चुका होगा, और उनकी महिमा और साक्ष्यों को भी सुरक्षित किया जा चुका होगा। यदि परमेश्वर का कार्य, उनके घर और कलीसिया में बाधित होता है और अबाधित रूप से प्रवाहित होने में असमर्थ है, यदि परमेश्वर की इच्छा और उसके द्वारा जो कार्य किए जाएंगे, वे बाधित हो जाते हैं, तो निश्चित रूप से परमेश्वर के घर के और कलीसिया के हितों की बहुत हानि होगी। ये चीजें परस्पर जुड़ी हैं। इसका अर्थ यह भी है कि जब परमेश्वर के घर के और कलीसिया के हितों को अत्यधिक बिगाड़ा या बाधित किया जाता है, तो उनकी प्रबंधन योजना में बहुत बाधा आनी निश्चित है, और परमेश्वर के हित अत्यधिक प्रभावित होते हैं।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग एक)' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, प्रार्थना का अभ्यास करना, परमेश्वर के बोझ को स्वीकार करना, और उसे स्वीकार करना जो उसने तुम्हें सौंपा है—ये सब मार्ग को प्राप्त करने के उद्देश्य से हैं। परमेश्वर द्वारा सौंपा गया जितना अधिक बोझ तुम्हारे ऊपर होगा, तुम्हारे लिए उसके द्वारा पूर्ण बनाया जाना उतना ही आसान होगा। कुछ लोग परमेश्वर की सेवा में दूसरों के साथ समन्वय करने के इच्छुक नहीं होते, तब भी नहीं जबकि वे बुलाए जाते हैं; ये आलसी लोग केवल आराम का सुख उठाने के इच्छुक होते हैं। तुमसे जितना अधिक दूसरों के साथ समन्वय करने का आग्रह किया जाएगा, तुम उतना ही अधिक अनुभव प्राप्त करोगे। तुम्हारे पास अधिक बोझ होने के कारण, तुम अधिक अनुभव करोगे, तुम्हारे पास पूर्ण बनाए जाने का अधिक मौका होगा। इसलिए, यदि तुम सच्चे मन से परमेश्वर की सेवा कर सको, तो तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहोगे; और इस तरह तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाये जाने का अधिक अवसर होगा। ऐसे ही मनुष्यों के एक समूह को इस समय पूर्ण बनाया जा रहा है। पवित्र आत्मा जितना अधिक तुम्हें स्पर्श करेगा, तुम उतने ही अधिक परमेश्वर के बोझ के लिए विचारशील रहने के प्रति समर्पित होओगे, तुम्हें परमेश्वर द्वारा उतना अधिक पूर्ण बनाया जाएगा, तुम्हें उसके द्वारा उतना अधिक प्राप्त किया जाएगा, और अंत में, तुम ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जिसे परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त किया जाता है। वर्तमान में, कुछ ऐसे लोग हैं जो कलीसिया के लिए कोई बोझ नहीं उठाते। ये लोग सुस्त और ढीले-ढाले हैं, और वे केवल अपने शरीर की चिंता करते हैं। ऐसे लोग बहुत स्वार्थी होते हैं और अंधे भी होते हैं। यदि तुम इस मामले को स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम नहीं होते हो, तो तुम कोई बोझ नहीं उठा पाओगे। तुम जितना अधिक परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखोगे, तुम्हें परमेश्वर उतना ही अधिक बोझ सौंपेगा। स्वार्थी लोग ऐसी चीज़ें सहना नहीं चाहते; वे कीमत नहीं चुकाना चाहते, परिणामस्वरूप, वे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर से चूक जाते हैं। क्या वे अपना नुकसान नहीं कर रहे हैं? यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखता है, तो तुम कलीसिया के लिए वास्तविक बोझ विकसित करोगे। वास्तव में, इसे कलीसिया के लिए बोझ उठाना कहने की बजाय, यह कहना चाहिए कि तुम खुद अपने जीवन के लिए बोझ उठा रहे हो, क्योंकि कलीसिया के प्रति बोझ तुम इसलिए पैदा करते हो, ताकि तुम ऐसे अनुभवों का इस्तेमाल परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए कर सको। इसलिए, जो भी कलीसिया के लिए सबसे भारी बोझ उठाता है, जो भी जीवन में प्रवेश के लिए बोझ उठाता है, उसे ही परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाता है। क्या तुमने इस बात को स्पष्ट रूप से समझ लिया है? जिस कलीसिया के साथ तुम हो, यदि वह रेत की तरह बिखरी हुई है, लेकिन तुम न तो चिंतित हो और न ही व्याकुल, यहाँ तक कि जब तुम्हारे भाई-बहन परमेश्वर के वचनों को सामान्य ढंग से खाते-पीते नहीं हैं, तब भी तुम आँख मूंद लेते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम कोई जिम्मेदारी वहन नहीं कर रहे। ऐसे मनुष्य से परमेश्वर प्रसन्न नहीं होता। परमेश्वर जिनसे प्रसन्न होता है वे लोग धार्मिकता के भूखे और प्यासे होते हैं और वे परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होते हैं। इसलिए, तुम्हें परमेश्वर के बोझ के लिए अभी तुरंत विचारशील हो जाना चाहिए; परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील होने से पहले तुम्हें इंतजार नहीं करना चाहिए कि परमेश्वर सभी लोगों के सामने अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करे। क्या तब तक बहुत देर नहीं हो जाएगी? परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए अभी अच्छा अवसर है। यदि तुम अपने हाथ से इस अवसर को निकल जाने दोगे, तो तुम जीवन भर पछताओगे, जैसे मूसा कनान की अच्छी भूमि में प्रवेश नहीं कर पाया और जीवन भर पछताता रहा, पछतावे के साथ ही मरा। एक बार जब परमेश्वर अपना धार्मिक स्वभाव सभी लोगों पर प्रकट कर देगा, तो तुम पछतावे से भर जाओगे। यदि परमेश्वर तुम्हें ताड़ना नहीं भी देता है, तो भी तुम स्वयं ही अपने आपको अपने पछतावे के कारण ताड़ना दोगे। कुछ लोग इस बात से आश्वस्त नहीं हैं, यदि तुम्हें इस पर विश्वास नहीं है, तो इन्तजार करो और देखो। कुछ लोगों का उद्देश्य एकमात्र इन वचनों को साकार करना है। क्या तुम इन वचनों के लिए खुद को बलिदान करने को तैयार हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखो' से उद्धृत

वह सब कुछ करो जो परमेश्वर के कार्य के लिए लाभदायक है और ऐसा कुछ भी न करो जो परमेश्वर के कार्य के हितों के लिए हानिकर हो। परमेश्वर के नाम, परमेश्वर की गवाही और परमेश्वर के कार्य की रक्षा करो।

तुम्‍हें उस हर चीज का समर्थन करना चाहिए और उसके प्रति जवाबदेह होना चाहिए जो परमेश्‍वर के घर के हित से संबंध रखती है, या जिसका ताल्‍लुक परमेश्‍वर के घर के कार्य और परमेश्‍वर के नाम से है। तुम में से हरेक की यह जिम्‍मेदारी है, तुम में से हरेक के लिए यह बंधनकारी है, और यही तुम सबको करना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'राज्य के युग में परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं के बारे में वार्ता' से उद्धृत

दुष्टों को उजागर करना सभी लोगों का कर्तव्य भी है और दायित्व भी। यह जीते-जागते शैतान से लड़ना है। कुलीन सैनिकों को शैतान से लड़ना ही चाहिए। परमेश्वर ने लोगों को इतना सारा सत्य प्रदान किया है। परमेश्वर ने इतने लंबे समय तक तुम्हारा मार्गदर्शन किया है और इतना कुछ प्रदान किया है। यदि कुकर्मियों के आते ही तुम डर जाते हो, अगर तुम डर के मारे भाग जाते हो, तो तुम निकम्मे और कायर हो। तुम मसीह के कुलीन सैनिकों में से नहीं हो, तुम शैतान पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते, तुम्हारे पास कोई गवाही नहीं है, परमेश्वर भी तुम्हें तुच्छ समझता है। तुम्हें मजबूती के साथ शैतान से लड़ना होगा, उसके बुरे कर्मों को उजागर करना होगा, उसकी निंदा करनी होगी, उसे धिक्कारना होगा और शर्मिंदा करना होगा। तुम्हें कलीसिया के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना होगा। तुम्हें डरना नहीं चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, "यह व्यक्ति खतरनाक है, उसे मेरे परिवार के बारे में पता है और वह जानता है कि मैं कहाँ काम करता हूँ। अगर उसने पीछे से मुझे नुकसान पहुँचाया तो?" "क्या होगा अगर" एक मूर्खतापूर्ण प्रश्न है, ऐसी बातें कोई अविश्वासी ही कहता है। अच्छा बताओ, एक ईसाई होने के लिए, मसीह का अनुयायी होने के लिए क्या करना चाहिए? उसके पास क्या गवाही और अभिव्यक्ति होनी चाहिए? तुम्हें "क्या होगा अगर" जैसे सवाल नहीं पूछने चाहिए, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? (हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, उस व्यक्ति के बुरे कामों को पूरी तरह से उजागर करना चाहिए और भाई-बहनों को उसे नकारने के लिए विवेक प्राप्त करने देना चाहिए। हमें अपनी निजी सुरक्षा की चिंता नहीं करनी चाहिए। जब दुष्ट लोग परमेश्वर के घर के काम में बाधा डाल रहे हों तो हमें सबसे अधिक चिंता अपने कर्तव्य के निर्वहन की होनी चाहिए।) यदि इसका प्रभाव तुम्हारे परिवार पर पड़ता है तो तुम्हें क्या करना चाहिए? (दृढ़ता से हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और अपने परिवार की सुरक्षा के बारे में भावनात्मक चिंताओं को आड़े नहीं आने देना चाहिए ताकि हम अपने कर्तव्य का त्याग न करें और गवाही देना न छोड़ दें।) यह सही है। सबसे पहली बात तो यह कि तुम्हें अपनी गवाही में दृढ़ रहना होगा और अंत तक मसीह-विरोधियों और दुष्टों से लड़ना होगा। तुम्हें उन्हें परमेश्वर के घर में खड़े होने की कोई जगह नहीं देनी है। यदि वे सेवा करना चाहते हैं, तो उन्हें उचित तरीके से, नियमों के अनुसार जो कुछ सेवा करनी है, कर सकते हैं। यदि वे सेवा नहीं करना चाहते, तो तुम सबको मिलकर उन्हें निष्कासित करना होगा, ताकि वे परमेश्वर के घर में व्यवधान और गड़बड़ी पैदा न करें और परमेश्वर के घर के काम को बर्बाद न करें। यह पहला काम है जो तुम्हें करना चाहिए और यही गवाही देनी चाहिए। दूसरा, तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का जीवन पूरी तरह से परमेश्वर के हाथों में है। परमेश्वर का कहना है कि शैतान उसकी अनुमति के बिना पृथ्वी पर पानी की एक बूंद या रेत के कण को भी हिलाने की हिम्मत नहीं कर सकता। तुम इन वचनों पर कितना विश्वास करते हो? इस बात से तुम्हारी आस्था देखी जा सकती है। यदि तुम सचमुच परमेश्वर में विश्वास रखते हो, तो परमेश्वर में तुम्हारी आस्था सच्ची है। यदि परमेश्वर में तुम्हें थोड़ी-बहुत आस्था है, यदि यह आस्था अस्पष्ट और खोखली है, तो तुम्हारी आस्था सच्ची नहीं है। यदि तुम्हें यह विश्वास नहीं है कि हर चीज पर परमेश्वर की संप्रभुता है, यदि तुम नहीं मानते कि शैतान परमेश्वर के अधीन है, यदि तुम अभी भी उससे डरते हो और उसे कलीसिया में बुराई करने देते हो, यदि शैतान के साथ समझौता करते हो और अपनी रक्षा के लिए उससे दया की भीख माँगते हो, यदि तुम मजबूती के साथ उससे लड़ने की हिम्मत नहीं करते हो, तो फिर परमेश्वर में तुम्हारी आस्था सच्ची नहीं है। परमेश्वर में तुम्हारी आस्था सवालों के घेरे में है, और उसकी स्थिति वस्तुत: दयनीय है! तुम मसीह-विरोधियों और दुष्टों को परमेश्वर के घर में अशांति और व्यवधान पैदा करते हुए देखकर भी उदासीन रहते हो। अपने, अपने परिवार के जीवन और अपने हितों की रक्षा के लिए, तुम परमेश्वर और परमेश्वर के घर के हितों से समझौता कर लेते हो, तुम परमेश्वर के घर के हितों से विश्वासघात करते हो, और ऐसा करके तुमविश्वासघाती, यहूदा बन जाते हो। इससे अधिक स्पष्ट कुछ नहीं हो सकता।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग आठ)' से उद्धृत

गैरजिम्मेदारी का स्वभाव क्या होता है? यह चालाकी है। इंसान के जीवन-दर्शनों में चालाकी सबसे अधिक उलल्रेखनीय है। लोग सोचते हैं कि अगर वे चालाक न हों, तो वे दूसरों को नाराज करेंगे और खुद की रक्षा करने में असमर्थ होंगे; उन्हें लगता है कि कोई उनसे नाराज या आहत न हो जाए, इसलिए उन्हें पर्याप्त रूप से चालाक होना चाहिए, जिससे वे खुद को सुरक्षित रख सकें, अपनी आजीविका की रक्षा कर सकें, और जन-साधारण के बीच पाँव जमाने के लिए एक सुदृढ़ जगह हासिल कर सकें। अविश्वासियों की दुनिया में लोग ऐसे ही कार्य करते हैं; ऐसा क्यों है कि परमेश्वर के घर में कुछ लोग अब भी इसी तरह से कार्य करते हैं? यह देखकर कि परमेश्वर के घर के हितों को कोई बात नुकसान पहुँचा रही है, वे कुछ नहीं कहते हैं; वे यह भी कह सकते हैं, "यदि कोई और इस बारे में बोलना चाहता है, तो उसे बोलने दो—मैं यह करने नहीं जा रहा हूँ। मैं किसी को नाराज नहीं करूँगा और न ही खतरा मोल लूँगा।" यह गैरजिम्मेदारी और चालाकी है, और ऐसे लोगों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। अपने आत्म-सम्मान, अपनी प्रतिष्ठा, ईमानदारी और गरिमा की रक्षा करने के लिए, वे कहीं मिले हुए धन को उसके मालिक को लौटा देंगे, दूसरों की मदद करने में आनंद पाएँगे, एक उचित कारण के लिए अपना जीवन अर्पण कर देंगे, दूसरे के लिए कुछ भी करेंगे, और वे किसी भी कीमत को चुकाने में संकोच नहीं करते हैं। लेकिन, जब परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करना, सत्य की रक्षा करना और न्याय की रक्षा करना आवश्यक हो, तो यह सब गायब हो जाता है, और तब वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं। यह क्या मामला है? यहाँ एक स्वभाव काम कर रहा है, सत्य से घृणा करने वाला। मैं क्यों कहता हूँ कि उनके पास सत्य से घृणा करने वाला स्वभाव है? इसके पीछे यह तथ्य है कि जैसे ही कोई चीज सकारात्मक चीजों की वास्तविकता को स्पर्श करती है, तो लोग भाग खड़े होते हैं और कतरा जाते हैं। हालाँकि वे भीतर से आत्म-तिरस्कार का कुछ अंश महसूस कर सकते हैं, पर वे इस ओर ध्यान नहीं देते हैं, और इसे दबाना चाहते हैं, और सोचते हैं, "मैं ऐसा नहीं कर सकता था—यह मूर्खता होगी", या फिर उन्हें लगता है कि यह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है, और वे इसके बारे में फिर कभी बात कर सकते हैं। जब न्याय और सकारात्मक चीजों को बनाए रखने की बात आती है, तो वे भाग जाते हैं और जिम्मेदारी लेने में असफल रहते हैं। वे आँखें मूंद लेते हैं और इस मामले को गंभीरता से नहीं लेते। यह सकारात्मक चीजों से प्रेम न करने और सत्य से घृणा करने का एक उदाहरण है। तो, इस मामले के सामने आने पर तुम्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए? इसके सिद्धांत क्या होते हैं? अगर कोई मामला परमेश्वर के घर के हितों या परमेश्वर के लिए गवाही देने से संबंधित हो, तो तुम्हें इसे अपने ही हितों की तरह गंभीरता से लेना चाहिए, कोई भी कसर न छोड़ते हुए—सत्य और सकारात्मक चीजों से प्रेम करने वाले का, जिम्मेदारी लेने वाले का ऐसा ही रवैया होता है। यदि तुम लोगों में यह रवैया नहीं है, तथा चीजों को संभालने में लापरवाह होने के अलावा तुम और कुछ नहीं हो, और तुम सोचते हो, "मैं अपने कर्तव्य के दायरे में चीजों को करूँगा, लेकिन मुझे किसी और चीज की परवाह नहीं है। यदि तुम मुझसे कुछ पूछते हो, मैं तुम्हें उत्तर दूँगा—यदि मैं अच्छे मूड में हुआ तो। अन्यथा, मैं जवाब नहीं दूँगा। यह मेरा रवैया है", तो तुम्हारा स्वभाव इस तरह का है। केवल अपने पद, अपनी प्रतिष्ठा, अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करना, और केवल उन चीजों की रक्षा करना जो किसी के स्वयं के हितों से संबंधित हों—क्या ऐसा करके कोई किसी न्यायसंगत कारण की रक्षा करता है? क्या वह सकारात्मक चीजों की रक्षा करता है? ये ओछे, स्वार्थी इरादे सत्य से घृणा करने का स्वभाव हैं। तुम लोगों में से अधिकांश अक्सर इस प्रकार के व्यवहारों को व्यक्त करते हो, और जिस क्षण तुम किसी ऐसी बात का सामना करते हो, जो परमेश्वर के परिवार के हितों से संबंधित हो, तो तुम टालमटोल करते हो और कहते हो, "मैंने नहीं देखा...। मुझे पता नहीं...। मैंने सुना नहीं...।" चाहे तुम सचमुच कुछ नहीं जानते या सिर्फ इसका ढोंग कर रहे हो, यहाँ कुल मिलाकर एक स्वभाव काम कर रहा होता है।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

जब सत्य तुम्हारा जीवन बन जाता है, तब अगर कोई परमेश्वर की निंदा करता है, उसके प्रति कोई श्रद्धा नहीं रखता, अपने काम में लापरवाही दिखाता है, कलीसिया के काम में रुकावट या गड़बड़ी पैदा करता है, और जब तुम यह सब होते देखते हो तो तुम उस चीज को पहचानकर, जरूरत होने पर उसे उजागर कर सकते हो और सत्य-सिद्धांत के अनुसार उसका समाधान कर सकते हो। अगर सत्य तुम्हारा जीवन नहीं बना है और तुम अभी भी अपने शैतानी स्वभाव के भीतर रहते हो, तो जब तुम्हारा सामना दुष्ट लोगों और शैतानों से होगा जो परमेश्वर के घर के कार्य में रुकावट डालते हैं और बाधाएँ खड़ी करते हैं, तुम उन पर ध्यान नहीं दोगे और उन्हें अनसुना कर दोगे; अपने विवेक द्वारा धिक्कारे जाए बिना, तुम उन्हें नज़रअंदाज़ कर दोगे। यहाँ तक कि तुम यह भी सोचोगे कि वह जो परमेश्वर के घर के कार्य में बाधाएँ खड़ी कर रहा है, तुम्हारा उससे कोई लेना-देना नहीं है। चाहे परमेश्वर के कार्य और उनके घर के हितों को कितना भी बड़ा नुकसान हो जाए, तुम अपने विवेक से कोई धिक्कार महसूस नहीं करोगे, जिसका अर्थ है कि तुम कोई ऐसे व्यक्ति बनोगे जो अपने शैतानी स्वभाव से जीता हो। शैतान तुम्हें नियंत्रित करता है और तुम्हें कुछ इस तरह से जीने के लिए प्रेरित करता है जो न तो पर्याप्त रूप से मानवीय होता है, और न ही पूरी तरह से दानवीय। तुम परमेश्वर का दिया हुआ खाते हो, पीते हो, और जो कुछ भी उससे मिलता है, उसका आनंद लेते हो, फिर भी जब परमेश्वर के घर के कार्य का कोई नुकसान होता है, तो तुम सोचोगे कि तुम्हारा इससे कोई लेना-देना नहीं है, और जब तुम इसे होते हुए देखते हो, तो तुम "अपनी कोहनी को बाहर की ओर मोड़ लेते हो",[क] और तुम परमेश्वर का पक्ष नहीं लेते, न ही परमेश्वर के कार्य को या परमेश्वर के घर के हितों को थामते हो। इसका मतलब है कि तुम पर शैतान का प्रभाव है, क्या ऐसा नहीं है? क्या ऐसे लोग मानव की तरह जीते हैं? जाहिर है, वो दुष्टात्मा हैं, मानव नहीं! हालाँकि, जब सत्य का तुम्हारे दिल में बोलबाला होता है और यह तुम्हारा जीवन बन गया होता है, तो जब भी तुम किसी निष्क्रिय, नकारात्मक, या बुराई को उभरते हुए देखते हो, तो तुम्हारे दिल में पूरी तरह से अलग प्रतिक्रिया होती है। पहले, तुम्हें धिक्कार और एक बेचैनी का अनुभव होता है जिसके तुरंत बाद यह भावना होती है, "मैं यूँ ही अकर्मण्य बना नहीं रह सकता और और न ही इसे अनदेखा कर सकता हूँ। मुझे उठना और बोलना चाहिए, मुझे खड़े होकर जिम्मेदारी लेनी चाहिए।" फिर तुम उठ सकते हो और इन बुरे कामों पर रोक लगा सकते हो, उनका पर्दाफ़ाश करते हुए, परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने का प्रयास करते हुए, परमेश्वर के कार्य को बाधित होने से रोक सकते हो। न केवल तुममें यह साहस और संकल्प होगा, और तुम इस मामले को पूरी तरह से समझने में सक्षम होगे, बल्कि तुम परमेश्वर के कार्य और उसके घर के हितों के लिए भी उस ज़िम्मेदारी को पूरा करोगे जो तुम्हें उठानी चाहिए, और उससे तुम्हारे कर्तव्य की पूर्ति हो जाएगी। यदि तुम अपने कर्तव्य-निर्वहन को अपनी जिम्मेदारी, अपना दायित्व और परमेश्वर का आदेश समझ सको, ऐसा कार्य समझ सको जिसे परमेश्वर के, अपनी अंतरात्मा के समक्ष आने के लिए अच्छी तरह करना आवश्यक है, तो क्या इस तरह तुम अपनी अंतरात्मा, विवेक, निष्ठा और गरिमा में नहीं जी रहे होगे? तुम्हारा कर्म और व्यवहार "परमेश्वर का भय मानो और बुराई से दूर रहो" होगा, जिसके बारे में वह बोलता है। तुम इन वचनों के सार का पालन कर रहे होगे और उनकी वास्तविकता को जी रहे होगे। जब सत्य किसी व्यक्ति का जीवन बन जाता है, तब वह इस वास्तविकता को जीने में सक्षम होता है। लेकिन अगर तुमने अभी तक इस वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, तो जब तुम धोखा, छल दिखाते हो या जब तुम स्वांग रचते हो या जब तुम दुष्ट लोगों को बुरे काम करते देखते हो या बुरी शक्तियों को परमेश्वर के कार्य में बाधाएँ और रुकावटें डालते देखते हो, तो तुम्हें कुछ भी महसूस नहीं होता और कुछ भी अनुभव नहीं होता। चाहे ये चीज़ें ठीक तुम्हारे सामने हो रही हों, तुम फिर भी हँस पाते हो और सहज अंतरात्मा के साथ खा और सो पाते हो और तुम्हें थोड़ा-सा भी खेद नहीं होता। इन दोनों जीवन में से तुम कोई भी जीवन जी सकते हो, तुम लोग कौन-सा चुनते हो? किस जीवन में एक वास्तविक मानवीय साम्यता है, जिसके साथ तुम सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता को जीते हो और कौन-सा जीवन एक बुरा, शैतान जैसा है? जवाब स्पष्ट है। जब सत्य लोगों की वास्तविकता या जीवन नहीं बना है, तो जो वो जीते हैं वह काफी दयनीय और दुखद होता है और वो अपने जीवन के लिए उत्तरदायी नहीं होते। चाहते हुए भी उनका सत्य का अभ्यास न कर पाना; चाहते हुए भी उनका परमेश्वर से प्रेम न कर पाना; परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की खातिर शक्ति का अभाव होना, जबकि उनमें ऐसा करने की लालसा है—भ्रष्ट इंसान की यही व्यथा और दुख है। इस समस्या के समाधान के लिए, इंसान को सत्य स्वीकार कर उसका अनुसरण करना चाहिए; नया जीवन पाने के लिए उन्हें अपने हृदय में सत्य का स्वागत करना चाहिए। जो लोग सत्य स्वीकार नहीं कर पाते, चाहे वे कुछ भी करें या सोचें, चाहे देखने में उनके काम कितने भी अच्छे हों, उनके वे काम ढोंग और चालाकी हैं और पाखंड हैं। इसलिए अगर कोई सत्य का अनुसरण न करे, तो वह जीवन प्राप्त नहीं कर सकता। इन दो किस्म की जिंदगियों में इतना विशाल अंतर है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं' से उद्धृत

फुटनोट :

क. "अपनी कोहनी को बाहर की ओर मोड़ लेना" एक चीनी मुहावरा है, जिसका अर्थ है कि कोई किसी दूसरे व्यक्ति की मदद, उसी व्यक्ति के करीब के लोगों की, उदाहरण के लिए उसके माता-पिता, बच्चे, रिश्तेदार या भाई-बहन की, कीमत पर कर रहा है।

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