19. परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध की सुरक्षा करने के सिद्धांत

(1) व्यक्ति को अपना हृदय परमेश्वर को सौंप देना और उसे इसका स्वामी बनने देना चाहिए। सभी मामलों में, उसे परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उसके सामने अपना दिल खोल देना चाहिए, और उसके साथ एक सामान्य संबंध की सुरक्षा करने में सक्षम होना चाहिए।

(2) परमेश्वर के वचनों को सामान्य रूप से खाना और पीना, सत्य पर दूसरों के साथ अक्सर सहभागिता करना, इसे व्यवहार में लाने पर ध्यान केंद्रित केंद्रित करना, और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाकर परमेश्वर का प्रेम प्राप्त करना आवश्यक है।

(3) तुम्हें हर समय परमेश्वर की जाँच स्वीकार करनी चाहिए। परमेश्वर के घर के हितों को प्राथमिकता दो, और व्यक्तिगत लाभ के लिए कपट करने की कोशिश न करो, बल्कि परमेश्वर जिसकी भी व्यवस्था करे, उसके प्रति समर्पित हो जाओ।

(4) सत्य-सिद्धांत की सभी मामलों में तलाश करो, परमेश्वर का भय मानो और बुराई से दूर रहो, परमेश्वर को जानने का प्रयास करो, उससे प्रेम करने का अभ्यास करो। इस तरह, तुम स्वाभाविक रूप से उससे दूर नहीं होगे।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर में विश्वास करने में, तुम्हें कम से कम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखने के मुद्दे का समाधान करना आवश्यक है। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य संबंध नहीं है, तो परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का अर्थ खो जाता है। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहने वाले हृदय के साथ पूर्णतया संभव है। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का अर्थ है परमेश्वर के किसी भी कार्य पर संदेह न करने या उससे इनकार न करने और उसके कार्य के प्रति समर्पित रहने में सक्षम होना। इसका अर्थ है परमेश्वर की उपस्थिति में सही इरादे रखना, स्वयं के बारे में योजनाएँ न बनाना, और सभी चीजों में पहले परमेश्वर के परिवार के हितों का ध्यान रखना; इसका अर्थ है परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करना और उसकी व्यवस्थाओं का पालन करना। तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें तुम्हें परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं भी समझते, तो भी तुम्हें अपनी सर्वोत्तम योग्यता के साथ अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को पूरा करना चाहिए। एक बार परमेश्वर की इच्छा तुम पर प्रकट हो जाती है, तो फिर इस पर अमल करो, यह बहुत विलंब नहीं होगा। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाता है, तब लोगों के साथ भी तुम्हारा संबंध सामान्य होगा। सब-कुछ परमेश्वर के वचनों की नींव पर निर्मित होता है। परमेश्वर के वचनों को खाओ-पियो, फिर परमेश्वर की आवश्यकताओं को अभ्यास में लाओ, अपने विचार सही करो, और परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला या कलीसिया में विघ्न डालने वाला कोई काम मत करो। ऐसा कोई काम मत करो, जो तुम्हारे भाई-बहनों के जीवन को लाभ न पहुँचाए; ऐसी कोई बात मत कहो, जो दूसरों के लिए सहायक न हो, और कोई निंदनीय कार्य न करो। अपने हर कार्य में न्यायसंगत और सम्माननीय रहो और सुनिश्चित करो कि तुम्हारा हर कार्य परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने योग्य हो। यद्यपि कभी-कभी देह कमज़ोर हो सकती है, फिर भी तुम्हें अपने व्यक्तिगत लाभ का लालच न करते हुए परमेश्वर के परिवार के हित पहले रखने और न्यायपूर्वक कार्य करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम इस तरह से कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?' से उद्धृत

अपने हर कार्य में तुम्हें यह जाँचना चाहिए कि क्या तुम्हारे इरादे सही हैं। यदि तुम परमेश्वर की माँगों के अनुसार कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है। यह न्यूनतम मापदंड है। अपने इरादों पर ग़ौर करो, और अगर तुम यह पाओ कि गलत इरादे पैदा हो गए हैं, तो उनसे मुँह मोड़ लो और परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करो; इस तरह तुम एक ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के समक्ष सही है, जो बदले में दर्शाएगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, और तुम जो कुछ करते हो वह परमेश्वर के लिए है, न कि तुम्हारे अपने लिए। तुम जो कुछ भी करते या कहते हो, उसमें अपने हृदय को सही बनाने और अपने कार्यों में नेक होने में सक्षम बनो, और अपनी भावनाओं से संचालित मत होओ, न अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करो। ये वे सिद्धांत हैं, जिनके अनुसार परमेश्वर के विश्वासियों को आचरण करना चाहिए। छोटी-छोटी बातें व्यक्ति के इरादे और आध्यात्मिक कद प्रकट कर सकती हैं, और इसलिए, परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश करने के लिए व्यक्ति को पहले अपने इरादे और परमेश्वर के साथ अपना संबंध सुधारना चाहिए। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होता है, केवल तभी तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किए जा सकते हो; केवल तभी तुममें परमेश्वर का व्यवहार, काट-छाँट, अनुशासन और शोधन अपना वांछित प्रभाव हासिल कर पाएगा। कहने का अर्थ यह है कि यदि मनुष्य अपने हृदय में परमेश्वर को रखने में सक्षम हैं और वे व्यक्तिगत लाभ नहीं खोजते या अपनी संभावनाओं पर विचार नहीं करते (देह-सुख के अर्थ में), बल्कि जीवन में प्रवेश करने का बोझ उठाने के बजाय सत्य का अनुसरण करने की पूरी कोशिश करते हैं और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित होते हैं—अगर तुम ऐसा कर सकते हो, तो जिन लक्ष्यों का तुम अनुसरण करते हो, वे सही होंगे, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाएगा। परमेश्वर के साथ अपना संबंध सही करना व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा में प्रवेश करने का पहला कदम कहा जा सकता है। यद्यपि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है और वह परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित है, और मनुष्य द्वारा उसे बदला नहीं जा सकता, फिर भी तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जा सकते हो या नहीं अथवा तुम परमेश्वर द्वारा स्वीकार किए जा सकते हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं। तुम्हारे कुछ हिस्से ऐसे हो सकते हैं, जो कमज़ोर या अवज्ञाकारी हों—परंतु जब तक तुम्हारे विचार और तुम्हारे इरादे सही हैं, और जब तक परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सही और सामान्य है, तब तक तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य हो। यदि तुम्हारा परमेश्वर के साथ सही संबंध नहीं है, और तुम देह के लिए या अपने परिवार के लिए कार्य करते हो, तो चाहे तुम जितनी भी मेहनत करो, यह व्यर्थ ही होगा। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, तो बाकी सब चीजें भी ठीक हो जाएँगी। परमेश्वर कुछ और नहीं देखता, केवल यह देखता है कि क्या परमेश्वर में विश्वास करते हुए तुम्हारे विचार सही हैं : तुम किस पर विश्वास करते हो, किसके लिए विश्वास करते हो, और क्यों विश्वास करते हो। यदि तुम इन बातों को स्पष्ट रूप से देख सकते हो, और अच्छी तरह से अपने विचारों के साथ अभ्यास करते हो, तो तुम अपने जीवन में उन्नति करोगे, और तुम्हें सही मार्ग पर प्रवेश की गारंटी भी दी जाएगी। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं है, और परमेश्वर में विश्वास के तुम्हारे विचार विकृत हैं, तो बाकी सब-कुछ बेकार है; तुम कितना भी दृढ़ विश्वास क्यों न करो, तुम कुछ प्राप्त नहीं कर पाओगे। परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होने के बाद ही तुम परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करोगे, जब तुम देह-सुख का त्याग कर दोगे, प्रार्थना करोगे, दुःख उठाओगे, सहन करोगे, समर्पण करोगे, अपने भाई-बहनों की सहायता करोगे, परमेश्वर के लिए खुद को अधिक खपाओगे, इत्यादि। तुम्हारे कुछ करने की कोई कीमत या महत्त्व है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुम्हारे इरादे ठीक और विचार सही हैं? आजकल बहुत-से लोग परमेश्वर पर विश्वास इस तरह करते हैं, जैसे घड़ी देखने के लिए सिर उठा रहे हों—उनके दृष्टिकोण विकृत होते हैं और उन्हें सफलतापूर्वक सुधारा जाना चाहिए। अगर यह समस्या हल हो गई, तो सब-कुछ सही हो जाएगा; और अगर नहीं हुई, तो सब-कुछ नष्ट हो जाएगा। कुछ लोग मेरी उपस्थिति में अच्छा व्यवहार करते हैं, परंतु मेरी पीठ पीछे वे केवल मेरा विरोध ही करते हैं। यह कुटिलता और धोखे का प्रदर्शन है, और इस तरह के व्यक्ति शैतान के सेवक हैं; वे परमेश्वर के परीक्षण के लिए आए शैतान के विशिष्ट रूप हैं। तुम केवल तभी एक सही व्यक्ति हो, जब तुम मेरे कार्य और मेरे वचनों के प्रति समर्पित रह सको। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों को खा-पी सकते हो; जब तक तुम जो करते हो वह परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने योग्य है और अपने समस्त कार्यों में तुम न्यायसंगत और सम्मानजनक व्यवहार करते हो; जब तुम निंदनीय अथवा दूसरों के जीवन को नुकसान पहुँचाने वाले कार्य नहीं करते; और जब तुम प्रकाश में रहते हो और शैतान को अपना शोषण नहीं करने देते, तब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध उचित होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?' से उद्धृत

एक सामान्य इंसानी जीवन—एक सामान्य इंसानी जीवन जिसका परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध है—पाने हेतु तुझे पहले उसके वचनों पर विश्वास करना होगा। अगर तूने, लोगों में पवित्र आत्मा के कार्य के पहले चरण को हासिल नहीं किया है तो तुम्हारे पास कोई आधार नहीं है। अगर सबसे बुनियादी सिद्धांत भी तेरी पहुँच से परे है तो तू आगे का सफर कैसे तय करेगा? परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण किए जाने के सही मार्ग में कदम रखने का अर्थ है पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य के सही मार्ग में प्रवेश करना; इसका अर्थ है पवित्र आत्मा द्वारा अपनाए गए मार्ग पर कदम रखना। इस वक्त पवित्र आत्मा जिस मार्ग को अपनाता है वह परमेश्वर के मौजूदा वचन हैं। अतः अगर लोग पवित्र आत्मा के मार्ग पर चलने के इच्छुक हैं, तो उन्हें देहधारी परमेश्वर के मौजूदा वचनों का पालन करना चाहिए, और उन्हें खाना तथा पीना चाहिए। जो कार्य वह करता है वो वचनों का कार्य है, सब कुछ उसके वचनों से शुरू होता है, और सब कुछ उसके वचनों, उसके मौजूदा वचनों, पर स्थापित होता है। चाहे बात परमेश्वर के देहधारण के बारे में निश्चित होने की हो या उसे जानने की, हरेक के लिए उसके वचनों पर अधिक समय देने की आवश्यकता है। अन्यथा लोग कुछ प्राप्त नहीं कर पाएंगे और उनके पास कुछ शेष नहीं रहेगा। सिर्फ परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के परिणामस्वरूप उसे जानने और संतुष्ट करने के आधार पर ही लोग धीरे-धीरे उसके साथ उचित संबंध स्थापित कर सकते हैं। मनुष्य के लिए, परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना तथा उन्हें अभ्यास में लाना ही परमेश्वर के साथ श्रेष्ठ सहयोग है। ऐसे अभ्यास के द्वारा वे परमेश्वर के जन होने की अपनी गवाही में मजबूत खड़े रह पाएंगे। जब लोग परमेश्वर के मौजूदा वचनों को समझते हैं और उसके सार का पालन करने में सक्षम होते हैं, तो वे पवित्र आत्मा द्वारा मार्गदर्शन किए जाने के पथ पर जीते हैं और वह परमेश्वर द्वारा मनुष्य को सिद्ध करने के सही मार्ग में प्रवेश कर चुके हैं। पहले लोग बस परमेश्वर के अनुग्रह की खोज करने या शांति और आनंद की खोज करने से परमेश्वर के कार्य को प्राप्त कर सकते थे, लेकिन अब बात अलग है। देहधारी परमेश्वर के वचनों के बगैर, उसके वचनों की वास्तविकता के बगैर, लोग परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं कर सकते हैं और वे सभी परमेश्वर द्वारा खत्म कर दिए जाएँगे। एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने के लिए, लोगों को पहले परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना और उनका अभ्यास करना चाहिए; और फिर इस आधार पर परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध स्थापित करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं' से उद्धृत

लोग अपने हृदय से परमेश्वर की आत्मा को स्पर्श करके परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उससे प्रेम करते हैं और उसे संतुष्ट करते हैं, और इस प्रकार वे परमेश्वर की संतुष्टि प्राप्त करते हैं; परमेश्वर के वचनों से जुड़ने के लिए वे अपने हृदय का उपयोग करते हैं और इस प्रकार वे परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाते हैं। यदि तुम एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करना चाहते हो और परमेश्वर के साथ सामान्यसंबंध स्थापित करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले उसे अपना हृदय अर्पित करना चाहिए। अपने हृदय को उसके सामने शांत करने और अपने पूरे हृदय को उस पर उँड़ेलने के बाद ही तुम धीरे-धीरे एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन विकसित करने में सक्षम होगे। यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में लोग परमेश्वर को अपना हृदय अर्पित नहीं करते और यदि उनका हृदय उसमें नहीं है और वे उसके दायित्व को अपना दायित्व नहीं मानते, तो जो कुछ भी वे करते हैं, वह परमेश्वर को धोखा देने का कार्य है, जो धार्मिक व्यक्तियों का ठेठ व्यवहार है, और वे परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकते। परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति से कुछ हासिल नहीं कर सकता; इस तरह का व्यक्ति परमेश्वर के काम में केवल एक विषमता का कार्य कर सकता है, परमेश्वर के घर में सजावट की तरह, फालतू और बेकार। परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति का कोई उपयोग नहीं करता। ऐसे व्यक्ति में न केवल पवित्र आत्मा के काम के लिए कोई अवसर नहीं है, बल्कि उसे पूर्ण किए जाने का भी कोई मूल्य नहीं है। इस प्रकार का व्यक्ति, सच में, एक चलती-फिरती लाश की तरह है। ऐसे व्यक्तियों में ऐसा कुछ नहीं है, जिसका पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जा सके, बल्कि इसके विपरीत, उन सभी को शैतान द्वारा हड़पा और गहरा भ्रष्ट किया जा चुका है। परमेश्वर इन लोगों को हटा देगा। वर्तमान में, लोगों का इस्तेमाल करते हुए पवित्र आत्मा न सिर्फ़ उनके उन हिस्सों का उपयोग करता है, जो काम करने के लिए वांछित हैं, बल्कि वह उनके अवांछित हिस्सों को भी पूर्ण करता और बदलता है। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर में उँड़ेला जा सकता है और उसके सामने शांत रह सकता है, तो तुम्हारे पास पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने, और पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने का अवसर और योग्यता होगी, और इससे भी बढ़कर, तुम्हारे पास पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हारी कमियाँ दूर किए जाने का अवसर होगा। जब तुम अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करते हो, तो सकारात्मक पहलू में, तुम अधिक गहन प्रवेश प्राप्त कर सकोगे और अंतर्दृष्टि का एक उच्च तल हासिल कर सकोगे; और नकारात्मक पहलू में, तुम अपनी गलतियों और कमियों की अधिक समझ प्राप्त कर सकोगे, तुम परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति करने के लिए ज़्यादा उत्सुक होगे, और तुम निष्क्रिय नहीं रहोगे, बल्कि सक्रिय रूप से प्रवेश करोगे। इस प्रकार, तुम एक सही व्यक्ति बन जाओगे। यह मानते हुए कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने शांत रहने में सक्षम है, इस बात की कुंजी कि तुम पवित्र आत्मा की प्रशंसा प्राप्त करते हो या नहीं, और तुम परमेश्वर को ख़ुश कर पाते हो या नहीं, यह है कि तुम सक्रिय रूप से प्रवेश कर सकते हो या नहीं। जब पवित्र आत्मा किसी व्यक्ति को प्रबुद्ध करता है और उसका उपयोग करता है, तो वह उसे कभी भी नकारात्मक नहीं बनाता, बल्कि हमेशा उसके सक्रिय रूप से प्रगति करने की व्यवस्था करता है। भले ही इस व्यक्ति में कमज़ोरियाँ हों, वह अपना जीवन जीने का तरीका उन कमजोरियों पर आधारित करने से बच सकता है। वह अपने जीवन में विकास में देरी करने से से बच सकता है, और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की अपनी कोशिश जारी रख पाता है। यह एक मानक है। अगर तुम इसे प्राप्त कर सकते हो, तो यह पर्याप्त सबूत है कि तुमने पवित्र आत्मा की उपस्थिति प्राप्त कर ली है। यदि कोई व्यक्ति हमेशा नकारात्मक रहता है, और प्रबुद्धता हासिल करने तथा खुद को जानने के बाद भी नकारात्मक और निष्क्रिय बना रहता है और परमेश्वर के साथ खड़े होने तथा उसके साथ मिलकर कार्य करने में अक्षम रहता है, तो इस किस्म का व्यक्ति केवल परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करता है, लेकिन पवित्र आत्मा उसके साथ नहीं होता। जब कोई व्यक्ति नकारात्मक होता है, तो इसका मतलब है कि उसका हृदय परमेश्वर की तरफ़ नहीं मुड़ पाया है और उसकी आत्मा परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित नहीं की गई है। इसे सभी को समझना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाना चाहते हो, तो तुम्हारा हृदय उसकी तरफ़ मुड़ना चाहिए। इस बुनियाद पर, तुम दूसरे लोगों के साथ भी सामान्य संबंध रखोगे। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य संबंध नहीं है, तो चाहे तुम दूसरों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए कुछ भी कर लो, चाहे तुम जितनी भी मेहनत कर लो या जितनी भी ऊर्जा लगा दो, वह मानव के जीवनदर्शन से संबंधित ही होगा। तुम दूसरे लोगों के बीच एक मानव-दृष्टिकोण और मानव-दर्शन के माध्यम से अपनी स्थिति बनाकर रख रहे हो, ताकि वे तुम्हारी प्रशंसा करे, लेकिन तुम लोगों के साथ सामान्य संबंध स्थापित करने के लिए परमेश्वर के वचनों का अनुसरण नहीं कर रहे। अगर तुम लोगों के साथ अपने संबंधों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, लेकिन परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध बनाए रखते हो, अगर तुम अपना हृदय परमेश्वर को देने और उसकी आज्ञा का पालने करने के लिए तैयार हो, तो स्वाभाविक रूप से सभी लोगों के साथ तुम्हारे संबंध सामान्य हो जाएँगे। इस तरह से, ये संबंध शरीर के स्तर पर स्थापित नहीं होते, बल्कि परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर स्थापित होते हैं। इनमें शरीर के स्तर पर लगभग कोई अंत:क्रिया नहीं होती, लेकिन आत्मा में संगति, आपसी प्रेम, आपसी सुविधा और एक-दूसरे के लिए प्रावधान की भावना रहती है। यह सब ऐसे हृदय की बुनियाद पर होता है, जो परमेश्वर को संतुष्ट करता हो। ये संबंध मानव जीवन-दर्शन के आधार पर नहीं बनाए रखे जाते, बल्कि परमेश्वर के लिए दायित्व वहन करने के माध्यम से बहुत ही स्वाभाविक रूप से बनते हैं। इसके लिए मानव-निर्मित प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। तुम्हें बस परमेश्वर के वचन-सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है। क्या तुम परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के समक्ष "तर्कहीन" व्यक्ति बनने के लिए तैयार हो? क्या तुम अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को देने और लोगों के बीच अपनी स्थिति की परवाह न करने के लिए तैयार हो? उन सभी लोगों में से, जिनके साथ तुम्हारा संबध है, किनके साथ तुम्हारे सबसे अच्छे संबंध हैं? किनके साथ तुम्हारे सबसे खराब संबंध हैं? क्या लोगों के साथ तुम्हारे संबंध सामान्य हैं? क्या तुम सभी लोगों से समान व्यवहार करते हो? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध तुम्हारे जीवन-दर्शन पर आधारित हैं, या वे परमेश्वर के प्रेम की बुनियाद पर बने हैं? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर को अपना हृदय नहीं देता, तो उसकी आत्मा सुस्त, सुन्न और अचेत हो जाती है। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के वचनों को कभी नहीं समझेगा और परमेश्वर के साथ उसके संबंध कभी सामान्य नहीं होंगे; इस तरह के व्यक्ति का स्वभाव कभी नहीं बदलेगा। अपने स्वभाव को बदलना अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को अर्पित करने और परमेश्वर के वचनों से प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने की प्रक्रिया है। परमेश्वर का कार्य व्यक्ति को सक्रियता से प्रवेश करा सकता है, और साथ ही उसे अपने नकारात्मक पहलुओं के बारे में जानने के बाद उनका परिमार्जन करने में सक्षम भी बना सकता है। जब तुम अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करने के बिंदु पर पहुँचोगे, तो तुम अपनी आत्मा के भीतर हर सूक्ष्म हलचल को महसूस कर पाओगे, और तुम परमेश्वर से प्राप्त हर प्रबुद्धता और रोशनी को जान जाओगे। इस सूत्र को पकड़कर रखोगे, तो तुम धीरे-धीरे पवित्र आत्मा द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश करोगे। तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष जितना शांत रह पाएगा, तुम्हारी आत्मा उतनी अधिक संवेदनशील और नाज़ुक रहेगी, और उतनी ही अधिक तुम्हारी आत्मा यह महसूस कर पाएगी कि पवित्र आत्मा किस तरह उसे प्रेरित करती है, और तब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध और भी अधिक सामान्य हो जाएगा। लोगों के बीच सामान्य संबंध परमेश्वर को अपना हृदय सौंपने की नींव पर स्थापित होता है; मनुष्य के प्रयासों से नहीं। अपने दिलों में परमेश्वर को रखे बिना लोगों के अंत:संबंध केवल शरीर के संबंध होते हैं। वे सामान्य नहीं होते, बल्कि वासना से युक्त होते हैं। वे ऐसे संबंध होते हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, जिन्हें वह नापसंद करता है। यदि तुम कहते हो कि तुम्हारी आत्मा प्रेरित हुई है, लेकिन तुम हमेशा उन लोगों के साथ साहचर्य चाहते हो, जिन्हें तुम पसंद करते हो, जिन्हें तुम उत्कृष्ट समझते हो, और यदि कोई दूसरा खोज कर रहा है लेकिन तुम उसे पसंद नहीं करते, यहाँ तक कि तुम उसके प्रति पूर्वाग्रह रखते हो और उसके साथ मेलजोल नहीं रखते, तो यह इस बात का अधिक प्रमाण है कि तुम भावनाओं के अधीन हो और परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध बिलकुल भी सामान्य नहीं हैं। तुम परमेश्वर को धोखा देने और अपनी कुरूपता छिपाने का प्रयास कर रहे हो। यहाँ तक कि अगर तुम कुछ समझ साझा कर भी पाते हो, तो भी तुम गलत इरादे रखते हो, तब तुम जो कुछ भी करते हो, वह केवल मानव-मानकों से ही अच्छा होता है। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा—तुम शरीर के अनुसार काम कर रहे हो, परमेश्वर के दायित्व के अनुसार नहीं। यदि तुम परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करने में सक्षम हो और उन सभी लोगों के साथ तुम्हारे सामान्य संबंध हैं, जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, तो केवल तभी तुम परमेश्वर के उपयोग के लिए उपयुक्त होते हो। इस तरह, तुम दूसरों के साथ चाहे जैसे भी जुड़े हो, यह किसी जीवन-दर्शन के अनुसार नहीं होगा, बल्कि यह परमेश्वर के सामने उस तरह से जीना होगा, जो उसके दायित्व के प्रति विचारशील हो। तुम्हारे बीच ऐसे कितने लोग हैं? क्या दूसरों के साथ तुम्हारे संबंध वास्तव में सामान्य हैं? वे किस बुनियाद पर बने हैं? तुम्हारे भीतर कितने जीवन-दर्शन हैं? क्या तुमने उन्हें त्याग दिया है? यदि तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ़ नहीं मुड़ पाता, तो तुम परमेश्वर के नहीं हो—तुम शैतान से आते हो, और अंत में शैतान के पास ही लौट जाओगे। तुम परमेश्वर के लोगों में से एक होने के योग्य नहीं हो। इन सभी बातों पर तुम्हें ध्यानपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

अपने दैनिक जीवन में तुम्हें यह समझना आवश्यक है कि तुम्हारे द्वारा कहे जाने वाले कौन-से शब्द और तुम्हारे द्वारा किए जाने वाले कौन-से कार्य परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं रहने देंगे, और फिर सही तरीका अपनाने के लिए स्वयं को सुधारो। हर वक्त अपने शब्दों, अपने कार्यों, अपने हर कदम और अपने समस्त विचारों और भावों की जाँच करो। अपनी वास्तविक स्थिति की सही समझ हासिल करो और पवित्र आत्मा के कार्य के तरीके में प्रवेश करो। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का यही एकमात्र तरीका है। इसका आकलन करके कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं, तुम अपने इरादों को सुधार पाओगे, मनुष्य की प्रकृति-सार को समझ पाओगे, और स्वयं को वास्तव में समझ पाओगे, और ऐसा करने पर तुम वास्तविक अनुभवों में प्रवेश कर पाओगे, स्वयं को सही रूप में त्याग पाओगे, और इरादे के साथ समर्पण कर पाओगे। जब तुम इस बात से संबंधित इन मामलों के तथ्य का अनुभव करते हो कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के अवसर प्राप्त करोगे और पवित्र आत्मा के कार्य की कई स्थितियों को समझने में सक्षम होगे। तुम शैतान की कई चालों को भी देख पाओगे और उसके षड्यंत्रों को समझ पाओगे। केवल यही मार्ग परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की ओर ले जाता है। परमेश्वर के साथ अपना संबंध सही करके तुम अपने आपको परमेश्वर के सभी प्रबंधनों के प्रति उनकी पूर्णता में समर्पित कर सकते हो, और वास्तविक अनुभवों में और भी गहराई से प्रवेश कर सकते हो और पवित्र आत्मा का कार्य और अधिक प्राप्त कर सकते हो। जब तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का अभ्यास करते हो, तो अधिकांश मामलों में सफलता देह-सुख का त्याग करने और परमेश्वर के साथ वास्तविक सहयोग करने से मिलेगी। तुम्हें यह समझना चाहिए कि "सहयोगी हृदय के बिना परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करना कठिन है; यदि देह पीड़ा का अनुभव नहीं करती, तो परमेश्वर से आशीषें प्राप्त नहीं होंगी; यदि आत्मा संघर्ष नहीं करती, तो शैतान को शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा।" यदि तुम इन सिद्धांतों का अभ्यास करो और इन्हें अच्छी तरह से समझ लो, तो परमेश्वर में विश्वास करने के तुम्हारे विचार सही हो जाएँगे। अपने वर्तमान अभ्यास में तुम लोगों को "भूख शांत करने के लिए रोटी खोजने" की मानसिकता को छोड़ना आवश्यक है; तुम्हें इस मानसिकता को छोड़ना भी आवश्यक है कि "सब-कुछ पवित्र आत्मा द्वारा किया जाता है और लोग उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते।" जो भी लोग ऐसा कहते हैं, वे सब यह सोचते हैं, "लोग वह सब कर सकते हैं जो वे करना चाहते हैं, और जब समय आएगा तो पवित्र आत्मा अपना कार्य करेगा। लोगों को देह का प्रतिरोध या सहयोग करने की आवश्यकता नहीं है; महत्त्वपूर्ण यह है कि पवित्र आत्मा द्वारा उन्हें प्रेरित किया जाए।" ये मत बेतुके हैं। इन परिस्थितियों में पवित्र आत्मा कार्य करने में असमर्थ है। इस प्रकार का दृष्टिकोण पवित्र आत्मा के कार्य के लिए एक बड़ी रुकावट बन जाता है। अकसर पवित्र आत्मा का कार्य लोगों के सहयोग से प्राप्त किया जाता है। जो लोग सहयोग नहीं करते और कृतसंकल्प नहीं होते हैं और फिर भी अपने स्वभाव में बदलाव और पवित्र आत्मा का कार्य तथा परमेश्वर से प्रबोधन और प्रकाश प्राप्त करना चाहते हैं, वे सचमुच उच्छृंखल विचार रखते हैं। इसे "अपने आपको लिप्त करना और शैतान को क्षमा करना" कहा जाता है। ऐसे लोगों का परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध नहीं होता। तुम्हें अपने भीतर शैतानी स्वभाव के कई खुलासे और अभिव्यक्तियाँ ढूँढ़नी चाहिए और अपने ऐसे अभ्यास तलाशने चाहिए, जो अब परमेश्वर की आवश्यकताओं के प्रतिकूल हैं। क्या तुम अब शैतान को त्याग सकोगे? तुम्हें परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना चाहिए, परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करना चाहिए, और नए जीवन के साथ एक नया व्यक्ति बनना चाहिए। अपने पिछले अपराधों पर ध्यान मत दो; अनुचित रूप से पश्चातापी न बनो; दृढ़ रहकर परमेश्वर के साथ सहयोग करो, और अपने कर्तव्य पूरे करो। इस प्रकार परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाएगा।

यदि इसे पढ़ने के बाद तुम केवल शब्दों को स्वीकार करने का दावा करते हो, और अभी भी तुम्हारा हृदय द्रवित नहीं होता, और तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का प्रयास नहीं करते, तो यह प्रमाणित हो जाता है कि तुम परमेश्वर के साथ अपने संबंध को महत्त्व नहीं देते, तुम्हारे विचार अभी तक सही नहीं हुए हैं, तुम्हारे इरादे परमेश्वर द्वारा तुम्हें प्राप्त किए जाने और उसके लिए महिमा लाने की ओर निर्दिष्ट नहीं किए गए हैं, बल्कि शैतान के षड्यंत्र जारी रहने और तुम्हारे व्यक्तिगत उद्देश्य पूरे करने के लिए निर्दिष्ट किए गए हैं। ऐसे व्यक्ति अनुचित इरादे और गलत विचार रखते हैं। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि परमेश्वर ने क्या कहा है और कैसे कहा है, ऐसे लोग बिलकुल उदासीन रहते हैं और उनमें जरा-सा भी परिवर्तन दिखाई नहीं देता। उनके हृदय में कोई भय अनुभव नहीं होता और वे बेशर्म रहते हैं। इस प्रकार का व्यक्ति आत्माविहीन मूर्ख होता है। परमेश्वर के हर कथन को पढ़ो और जैसे ही तुम उन्हें समझ जाओ, उन पर अमल करना शुरू कर दो। शायद कुछ अवसरों पर तुम्हारी देह कमज़ोर थी, या तुम विद्रोही थे, या तुमने प्रतिरोध किया; इस बात की परवाह न करो कि अतीत में तुमने किस तरह का व्यवहार किया था, यह कोई बड़ी बात नहीं है, और यह आज तुम्हारे जीवन को परिपक्व होने से नहीं रोक सकती। अगर आज तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रख सकते हो, तो आशा की किरण बाकी है। यदि हर बार परमेश्वर के वचन पढ़ने पर तुममें परिवर्तन होता है, और दूसरे लोग बता सकते हैं कि तुम्हारा जीवन बदलकर बेहतर हो गया है, तो यह दिखाता है कि अब तुम्हारा परमेश्वर के साथ संबंध सामान्य है और उसे सही रखा गया है। परमेश्वर लोगों से उनके अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। एक बार जब तुम समझ जाते हो और जागरूक हो जाते हो, जब तुम विद्रोही नहीं रहते और प्रतिरोध करना छोड़ देते हो, तो परमेश्वर फिर भी तुम पर दया करता है। जब तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण किए जाने की समझ और संकल्प होता है, तो परमेश्वर की उपस्थिति में तुम्हारी अवस्था सामान्य हो जाएगी। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, उसे करते हुए बस इस बात पर ध्यान दो : यदि मैं यह कार्य करूँगा, तो परमेश्वर क्या सोचेगा? क्या इससे मेरे भाई-बहनों को लाभ पहुँचेगा? क्या यह परमेश्वर के घर के कार्य के लिए लाभकारी होगा? अपनी प्रार्थना, संगति, बोलचाल, कार्य और लोगों के साथ संपर्क में अपने इरादों की जाँच करो, और देखो कि क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है? यदि तुम अपने इरादों और विचारों को नहीं समझ सकते, तो इसका अर्थ है कि तुममें विवेक की कमी है, जिससे प्रमाणित होता है कि तुम सत्य को बहुत कम समझते हो। अगर तुम, जो कुछ भी परमेश्वर करता है, उसे स्पष्ट रूप से समझने और परमेश्वर के पक्ष में खड़े होकर चीजों को उसके वचनों के लेंस के माध्यम से देखने में समर्थ हुए, तो तुम्हारे दृष्टिकोण सही हो गए होंगे। अतः परमेश्वर के साथ अच्छे संबंध बनाना हर उस व्यक्ति के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है, जो परमेश्वर में विश्वास रखता है; सभी को इसे सर्वोपरि महत्त्व का कार्य और अपने जीवन की सबसे बड़ी घटना मानना चाहिए। जो कुछ भी तुम करते हो, उसे इस बात से मापा जाता है कि क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है? यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है और तुम्हारे इरादे सही हैं, तो कार्य करो। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाए रखने के लिए तुम्हें अपने व्यक्तिगत हितों का नुकसान उठाने से डरने की आवश्यकता नहीं है; तुम शैतान को जीतने नहीं दे सकते, तुम शैतान को अपने ऊपर पकड़ बनाने नहीं दे सकते, और तुम शैतान को तुम्हें हँसी का पात्र बनाने नहीं दे सकते। ऐसे इरादे होना इस बात का संकेत है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है—यह देह के लिए नहीं है, बल्कि आत्मा की शांति के लिए है, पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने के लिए है और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए है। सही स्थिति में प्रवेश करने के लिए तुम्हें परमेश्वर के साथ अच्छा संबंध बनाना और उस पर विश्वास करने के विचारों को सही रखना आवश्यक है। ऐसा इसलिए, ताकि परमेश्वर तुम्हें प्राप्त कर सके और ताकि वह अपने वचन के फल तुममें प्रकट कर सके, और तुम्हें और अधिक प्रबुद्ध और प्रकाशित कर सके। इस प्रकार से तुम सही तरीके में प्रवेश करोगे। परमेश्वर के आज के वचनों को लगातार खाते-पीते रहो, पवित्र आत्मा के कार्य के वर्तमान तरीके में प्रवेश करो, परमेश्वर की आज की माँगों के अनुसार कार्य करो, अभ्यास के पुराने तरीकों का पालन मत करो, कार्य करने के पुराने तरीकों से मत चिपके रहो, और जितना जल्दी हो सके, कार्य करने के आज के तरीके में प्रवेश करो। इस तरह परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पूरी तरह से सामान्य हो जाएगा और तुम परमेश्वर में विश्वास रखने के सही मार्ग पर चल पड़ोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?' से उद्धृत

सृष्टिकर्ता चाहे कुछ भी करे, वह सही होता है। वह चाहे कुछ भी करे, उसकी पहचान और हैसियत वही रहती है, और लोगों को उसकी आराधना करनी चाहिए। वह मानवजाति का शाश्वत प्रभु और शाश्वत परमेश्वर है, और यह तथ्य कभी नहीं बदल सकता। ऐसा नहीं होना चाहिए कि जब परमेश्वर लोगों को देता है तो वे स्वीकार करें कि वह परमेश्वर है, लेकिन जब वह लेता है, तो वह परमेश्वर नहीं होता। यह सृजित प्राणियों को सही ज्ञान न होने का मामला है, परमेश्वर द्वारा गलती करने का नहीं। यदि लोगों के अनुभव उन्हें इसकी समझ देते हैं, और यह उन्हें स्पष्ट है—अगर अपने हृदय में वे स्वीकार करें कि यह सत्य है—तो परमेश्वर के साथ उनका संबंध और भी सामान्य हो जाएगा। अगर तुम केवल शब्दों में स्वीकार करते हो कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह सही है, तो यह तुम्हारे लिए केवल सिद्धांत होगा, और जब तुम्हारे सामने कोई समस्या आएगी, तो तब भी तुम परमेश्वर के साथ तर्क करने का प्रयास करोगे, तब भी तुम्हें लगेगा कि परमेश्वर को ऐसा नहीं करना चाहिए या वैसा नहीं करना चाहिए, ऐसे में परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कभी भी सामान्य नहीं होगा। अगर तुम कभी भी इस कदम से आगे नहीं बढ़ पाए, अगर तुम इस तरह के सत्यों को पूरी तरह से स्वीकार करने और उनमें प्रवेश करने में असमर्थ हुए, तो तुम कभी भी परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाओगे, और इस तरह तुम परमेश्वर के आयोजनों का पूरी तरह से पालन करने में असमर्थ रहोगे, और इसलिए तुम हमेशा परमेश्वर को आजमाओगे और उसके साथ तर्क करोगे, और हमेशा महसूस करोगे कि तुम्हारे तर्क सत्य से ऊपर और चर्चा योग्य हैं, और तुम्हें लगेगा कि बहुत-से लोग तुम्हारा समर्थन करेंगे। अगर बहुत-से लोग तुम्हारा समर्थन करें भी, तो भी वे सब भ्रष्ट मानवजाति के हैं, और वे सत्य नहीं हैं; अगर पूरी मानवजाति भी तुम्हारा समर्थन करे और परमेश्वर का विरोध करने में तुम्हारा साथ दे, फिर भी परमेश्वर गलत नहीं होगा, मानवजाति हीगलत होगी। क्या यह कोई सूत्र है, कोई नियम है, कोई वक्तव्य है? (नहीं।) यह सत्य है। लोगों को इस प्रकार के सत्यों पर बार-बार चिंतन करना चाहिए और उनका अनुभव करना चाहिए। परमेश्वर ने कार्य के कई चरण पूरे किए हैं और हर चरण में ऐसे कई लोग हुए हैं, जो उसका विरोध करते हैं। जब प्रभु यीशु छुटकारे का कार्य करने के लिए आया, तो पूरे इस्राएल ने उसका विरोध किया—और फिर भी आज करोड़ों लोग प्रभु यीशु को उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करते हैं, दुनिया भर में लोग प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, और प्रभु यीशु ने पहले ही पूरी मानवजाति को छुटकारा दिला दिया है। यह तथ्य है। जब लोग, चाहे वे किसी भी देश के हों, प्रभु यीशु के छुटकारे को नकारने का प्रयास करते हैं, तो वह किसी काम का नहीं होता। चाहे पूरी मानवजाति परमेश्वर का विरोध करने के लिए उठ खड़ी हो, फिर भी परमेश्वर गलत नहीं होगा। चाहे पूरी मानवजाति हर तरह के सिद्धांत का सहारा ले, फिर भी वह परमेश्वर के एक भी वाक्य या सत्य का खंडन नहीं कर सकती। ये वचन सत्य हैं, सिद्धांत नहीं, इसलिए लोगों को इनका निरंतर अनुभव करना चाहिए। और उन्हें अनुभव करने का आधार क्या है? तुम्हें पहले इन वचनों की यथार्थता माननी और स्वीकार करनी चाहिए, उनका अभ्यास करना चाहिए और उन्हें समझना चाहिए। अनजाने ही तुम पाओगे कि ये वचन सही हैं, कि वे वास्तव में सत्य हैं, और उस समय तुम उन्हें सँजोना शुरू कर दोगे। अंतत:, लोग उद्धार प्राप्त कर सकते हैं या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं होता कि वे कौन-सा कर्तव्य निभाते हैं, बल्कि इस बात पर निर्भर होता है कि उन्होंने सत्य को समझा और हासिल किया है या नहीं, और वे परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित हो सकते हैं या नहीं और एक सच्चे सृजित प्राणी बन सकते हैं या नहीं। परमेश्वर धार्मिक है, और यही वह सिद्धांत है, जिससे वह पूरी मानवजाति को मापता है। यह सिद्धांत अपरिवर्तनीय है, और तुम्हें यह याद रखना चाहिए। कोई दूसरा रास्ता ढूँढ़ने या किसी अवास्तविक चीज़ का अनुसरण करने की मत सोचो। उद्धार पाने वाले सभी लोगों से अपेक्षित परमेश्वर के मानक अपरिवर्तनीय हैं; वे वैसे ही रहते हैं, फिर चाहे तुम कोई भी क्यों न हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के प्रति जो प्रवृत्ति होनी चाहिए मनुष्य की' से उद्धृत

सृजित मानवजाति में ऐसा कोई इंसान नहीं है, जो यह राय न रखता हो कि परमेश्वर का इंसान बनने से ज्यादा नीच और अपमानजनक कार्य और कुछ नहीं है। परमेश्वर को ऐसा कभी नहीं करना चाहिए; परमेश्वर, जो इतना ऊँचा है, उसका एक मामूली इंसान की तरह देहधारण करना और भी अधिक अशोभनीय है। यह तथ्य कि आज जब परमेश्वर एक मामूली इंसान बन गया है, तब तुम लोगों का उसे अपना परमेश्वर स्वीकार कर पाना और मान पाना अपने आप में गवाही है। और अगर ऐसा है, तो इससे परमेश्वर के साथ तुम्हारे सामान्य संबंध पर क्या प्रभाव पड़ सकता है या क्या नुकसान हो सकता है? कुछ भी नहीं। इस बात को ध्यान में रखते हुए, मसीह को अपना परमेश्वर मान पाना इंसान और परमेश्वर के बीच के संबंध को मापने के सबसे महत्वपूर्ण मानदंडों में से एक है। बहुत-से लोग परमेश्वर में विश्वास तो रखते हैं, लेकिन वे यह स्वीकार नहीं करते कि परमेश्वर सत्य है—तो क्या वे यह स्वीकार कर पाते हैं कि परमेश्वर उनका परमेश्वर है? तो जो लोग यह नहीं मानते कि परमेश्वर सत्य है, उनका परमेश्वर से क्या संबंध होता है? तुम्हारा और परमेश्वर दोनों का एक ही मानवीय रूप है, एक ही मानवीय झुकाव है, एक ही मानवीय भाषा है, एक ही मानवीय छवि है, और तुम दोनों ही इंसानों की दुनिया में रहते हो। लेकिन तुम अपनी स्थिति सुधारने में सक्षम हो, तुम अपनी और परमेश्वर की हैसियत में अंतर बता सकते हो, तुम परमेश्वर से अपना संबंध सुधार सकते हो, और तुम इस संबंध की मर्यादा कभी भंग नहीं करोगे। यदि लोग इस स्तर को प्राप्त कर सकें, तो परमेश्वर के लिए वे समुचित हैं, और कोई भी प्रलोभन या ताकत परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध को बिगाड़ नहीं कर सकता। यह संभवतः सबसे स्थिर संबंध है; यह मानक है। इसका निहितार्थ यह है कि यदि इस भौतिक देह के साथ तुम्हारा संबंध इंसान और परमेश्वर के बीच के संबंध को प्राप्त नहीं करता, यदि तुम्हारा संबंध ऐसा नहीं है, तो जब तुम कहते हो, "मेरा स्वर्ग के परमेश्वर के साथ अच्छा संबंध है और वह बहुत ही सामान्य संबंध है," तो क्या यह सच है? यह सच नहीं है। तुमने जो कहा, वह किसने कभी देखा है? वह कहाँ दिखाया गया है? उसका कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है। तो इस समय, क्या तुम लोग देहधारी परमेश्वर के साथ यह संबंध प्राप्त करने में सक्षम हो? (नहीं।) तो कठिनाई कहाँ है? वर्तमान में, कई सत्य हैं, जिन्हें इंसान नहीं समझता। इसका क्या अर्थ है कि इंसान नहीं समझता? इसका अर्थ है कि मानवजाति, जो कि भ्रष्ट है, ऐसे विचार और मत रखती है जो, कई संदर्भों में, देहधारी परमेश्वर के विचारों और मतों से मेल नहीं खाते; इसका अर्थ है कि जिन सिद्धांतों के अनुसार और जिस आधार पर इंसान कई चीजों के साथ व्यवहार करता है, वे देहधारी परमेश्वर के सिद्धांतों और आधार के साथ मेल नहीं खाते। और इस समस्या की जड़ कहाँ है? परमेश्वर और मानवजाति के बीच के संबंधों को कौन-सा घटक प्रभावित कर रहा है? वह है मानवजाति का भ्रष्ट स्वभाव। अर्थात्, मानवजाति अभी भी शैतान के पक्ष में खड़ी है; इंसान शैतान के जहर पर निर्भर होकर जीता है, और अपने जीने के तरीके में इंसान शैतान के स्वभाव और सार को ही प्रकट करता है। परमेश्वर का सार सत्य है; वह अचल है। तो, वह कौन है जिसे परमेश्वर के अनुरूप होने के लिए बदलना होगा? (मानवजाति।) यकीनन, वह मानवजाति ही है; यह असंदिग्ध है। तो फिर, मानवजाति को कैसे बदलना होगा? उसे परमेश्वर के सामने आकर सत्य को स्वीकार करना होगा; इंसान के लिए सत्य को स्वीकार करना चीजों के बारे में परमेश्वर के नजरिए के, और जिन सिद्धांतों के द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, उनके अनुरूप होने का एकमात्र मार्ग है। इस मार्ग पर कदम रखते ही तुम्हारा रवैया और तरीका, जिससे तुम चीजों को देखते हो, वे सिद्धांत जिनके अनुसार तुम काम करते हो, और अन्य सब-कुछ क्रमशः परमेश्वर के अनुरूप होना प्रारंभ हो जाएगा। इस तरह, तुम्हारे और परमेश्वर के बीच के अवरोध लगातार कम होते जाएँगे, कोई विरोधाभास नहीं रहेंगे, और परमेश्वर को अध्ययन के अधीन करने की तुम्हारी कोशिशें भी कम से कमतर होती जाएँगी।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य और परमेश्वर के बीच संबंध सुधारना अत्यंत आवश्यक है' से उद्धृत

सृष्टि के प्रभु का सृजित प्राणियों के साथ व्यवहार करने का एक बुनियादी सिद्धांत है, जो सर्वोच्च सिद्धांत है। वह सृजित प्राणियों के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह पूरी तरह से उसकी प्रबंधन योजना और उसकी अपेक्षाओं पर आधारित है; उसे किसी व्यक्ति से सलाह लेने की जरूरत नहीं है, न ही उसे इसकी आवश्यकता है कि कोई व्यक्ति उससे सहमत हो। जो कुछ भी उसे करना चाहिए और जिस भी तरह से उसे लोगों से व्यवहार करना चाहिए, वह करता है, और भले ही वह कुछ भी करता हो और जिस भी तरह से लोगों से व्यवहार करता हो, वह सब उन सिद्धांतों के अनुरूप होता है, जिनके द्वारा सृष्टि का प्रभु कार्य करता है। एक सृजित प्राणी के रूप में करने लायक केवल एक ही चीज़ है और वह है समर्पण करना; इसका कोई और विकल्प नहीं होना चाहिए। यह क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि सृष्टि का प्रभु हमेशा सृष्टि का प्रभु ही रहेगा; उसके पास किसी भी सृजित प्राणी पर जैसे चाहे वैसे आयोजन और शासन करने की शक्ति और योग्यता है, और ऐसा करने के लिए उसे किसी कारण की आवश्यकता नहीं है। यह उसका अधिकार है। सृजित प्राणियों में से किसी एक में भी, जिस सीमा तक वे सृजित प्राणी हैं, इस बात पर निर्णय देने की शक्ति या योग्यता नहीं है कि सृष्टिकर्ता को कैसे कार्य करना चाहिए या वह जो करता है, वह सही है या गलत है, न ही कोई सृजित प्राणी यह चुनने के योग्य है कि सृष्टि का प्रभु उन पर शासन, आयोजन या उनका निपटान करे या नहीं। इसी तरह, एक भी सृजित प्राणी में यह चुनने की योग्यता नहीं है कि सृष्टि के प्रभु द्वारा उनका शासन या निपटान किस तरह से हो। यह सर्वोच्च सत्य है। सृष्टि के प्रभु ने चाहे सृजित प्राणियों के साथ कुछ भी किया हो या कैसे भी किया हो, उसके द्वारा सृजित मनुष्यों को केवल एक ही काम करना चाहिए : सृष्टि के प्रभु द्वारा प्रस्तुत इस तथ्य को खोजना, इसके प्रति समर्पित होना, इसे जानना और स्वीकार करना। इसका अंतिम परिणाम यह होगा कि सृष्टि के प्रभु ने अपनी प्रबंधन योजना और अपना काम पूरा कर लिया होगा, जिससे उसकी प्रबंधन योजना बिना किसी अवरोध के आगे बढ़ेगी; इस बीच, चूँकि सृजित प्राणियों ने सृष्टिकर्ता का नियम और उसकी व्यवस्थाएँ स्वीकार कर ली हैं, और वे उसके शासन और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो गए हैं, इसलिए उन्होंने सत्य प्राप्त कर लिया होगा, सृष्टिकर्ता की इच्छा को समझ लिया होगा, और उसके स्वभाव को जान लिया होगा। एक और सिद्धांत है, जो मुझे तुम्हें बताना चाहिए : सृष्टिकर्ता चाहे जो भी करे, जिस भी तरह से अभिव्यक्त करे, उसका कार्य बड़ा हो या छोटा, वह फिर भी सृष्टिकर्ता ही है; जबकि समस्त मनुष्य, जिन्हें उसने सृजित किया, चाहे उन्होंने कुछ भी किया हो, या वे कितने भी प्रतिभाशाली और अभीष्ट क्यों न हों, वे सृजित प्राणी ही रहते हैं। जहाँ तक सृजित मनुष्यों का सवाल है, चाहे जितना भी अनुग्रह और जितने भी आशीष उन्होंने सृष्टिकर्ता से प्राप्त कर लिए हों, या जितनी भी दया, प्रेमपूर्ण करुणा और उदारता प्राप्त कर ली हो, उन्हें खुद को भीड़ से अलग नहीं मानना चाहिए, या यह नहीं सोचना चाहिए कि वे परमेश्वर के बराबर हो सकते हैं और सृजित प्राणियों में ऊँचा दर्जा प्राप्त कर चुके हैं। परमेश्वर ने तुम्हें चाहे जितने उपहार दिए हों, या जितना भी अनुग्रह प्रदान किया हो, या जितनी भी दयालुता से उसने तुम्हारे साथ व्यवहार किया हो, या चाहे उसने तुम्हें कोई विशेष प्रतिभा दी हो, इनमें से कुछ भी तुम्हारी संपत्ति नहीं है। तुम एक सृजित प्राणी हो, और इस तरह तुम सदा एक सृजित प्राणी ही रहोगे। तुम्हें कभी नहीं सोचना चाहिए, "मैं परमेश्वर के हाथों में उसका लाड़ला हूँ। वह मुझ पर हाथ नहीं उठाएगा। परमेश्वर का रवैया मेरे प्रति हमेशा प्रेम, देखभाल और नाज़ुक दुलार के साथ-साथ सुकून के गर्मजोशी भरे बोलों और प्रोत्साहन का होगा।" इसके विपरीत, सृष्टिकर्ता की दृष्टि में तुम अन्य सभी सृजित प्राणियों की ही तरह हो; परमेश्वर तुम्हें जिस तरह चाहे, उस तरह इस्तेमाल कर सकता है, और साथ ही तुम्हारे लिए जैसा चाहे, वैसा आयोजन कर सकता है, और तुम्हारे लिए सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीज़ों के बीच जैसी चाहे वैसी प्रत्येक भूमिका निभाने की व्यवस्था कर सकता है। लोगों को यह ज्ञान होना चाहिए और उनमें यह अच्छी समझ होनी चाहिए। अगर व्यक्ति इन वचनों को समझ और स्वीकार सके, तो परमेश्वर के साथ उसका संबंध अधिक सामान्य हो जाएगा, और वह उसके साथ एक सबसे ज़्यादा वैध संबंध स्थापित कर लेगा; अगर व्यक्ति इन वचनों को समझ और स्वीकार सके, तो वह अपने स्थान को सही ढंग से उन्मुख कर पाएगा, वहाँ अपना आसन ग्रहण कर पाएगा और अपना कर्तव्य निभा पाएगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही व्यक्ति परमेश्वर के कर्मों को जान सकता है' से उद्धृत

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