54. निराशा को हल करने के सिद्धान्‍त

(1) सबसे पहले, उन परिस्थितियों की पड़ताल करो जो निराशा को जन्‍म देती हैं : वह किन गतिविधियों की वजह से पैदा होती है, वह किन बाधाओं का नतीजा होती है, और उसके परिणाम क्‍या होते हैं;

(2) निराशा के सार और उद्गम को समझना, और उस स्‍वभाव को जानना आवश्‍यक है जिससे वह जुड़ी होती है। मूल समस्‍या को समझकर ही व्‍यक्ति सच्‍चे अर्थों में स्‍वयं को जान सकता है;

(3) जब व्‍यक्ति निराशा का सामना कर रहे हों, तो उन्‍हें आत्‍म-ज्ञान के शिक्षण के कार्य में संलग्‍न होना चाहिए। निराशा की समस्‍या को उसकी जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए व्‍यक्ति का जिन सत्‍यों से लैस होना अनिवार्य है उन सत्‍यों को जानना आवश्‍यक है;

(4) जब व्‍यक्ति शैतानी स्‍वभाव के अधीन होता है, तो निराशा किसी भी वक्‍़त जन्‍म ले सकती है, और इस तरह वह परमेश्‍वर के प्रति विद्रोह और प्रतिरोध का कारण बन सकती है। सभी मामलों में, निराशा का निराकरण करने के लिए व्‍यक्ति को सत्‍य को तलाशना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर द्वारा लोगों में किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से उन्हें सत्य प्राप्त करवाने के लिए है, तुमसे जीवन का अनुसरण करवाना तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए है, और यह सब तुम्हें परमेश्वर के उपयोग हेतु उपयुक्त बनाने के लिए है। अभी तुम सभी जो कुछ अनुसरण कर रहे हो, वह है रहस्यों को सुनना, परमेश्वर के वचनों को सुनना, अपनी आँखों को आनंदित करना और आसपास यह देखना कि कोई नई चीज़ या रुझान है या नहीं, और उससे अपनी जिज्ञासा संतुष्ट करना। यदि यही इरादा तुम्हारे दिल में है, तो तुम्हारे पास परमेश्वर की आवश्यकताएँ पूरी करने का कोई रास्ता नहीं है। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे अंत तक अनुसरण नहीं कर सकते। अभी, ऐसा नहीं है कि परमेश्वर कुछ नहीं कर रहा है, बल्कि लोग उसके साथ सहयोग नहीं कर रहे, क्योंकि वे उनके कार्य से थक गए हैं। वे केवल उन वचनों को सुनना चाहते हैं, जो वह आशीष देने के लिए बोलता है, और वे उसके न्याय और ताड़ना के वचनों को सुनने के अनिच्छुक हैं। इसका क्या कारण है? इसका कारण यह है कि लोगों की आशीष प्राप्त करने की इच्छा पूरी नहीं हुई है और इसलिए वे नकारात्मक और कमजोर हो गए हैं। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर जानबूझकर लोगों को अपना अनुसरण नहीं करने देता, और न ऐसा है कि वह जानबूझकर मानवजाति पर आघात कर रहा है। लोग नकारात्मक और कमजोर केवल इसलिए हैं, क्योंकि उनके इरादे गलत हैं। परमेश्वर तो परमेश्वर है, जो मनुष्य को जीवन देता है, और वह मनुष्य को मृत्यु में नहीं ला सकता। लोगों की नकारात्मकता, कमजोरी, और पीछे हटना सब उनकी अपनी करनी के नतीजे हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

लोग अ‍पने भीतर, गहराई में कुछ बुरी मनोदशा पाले रहते हैं, जैसे नकारात्मकता, दुर्बलता और अवसाद या भंगुरता; या लगातार हावी रहने वाली कोई तुच्छ मंशा; या हमेशा अपनी प्रतिष्ठा, स्वार्थ और अपने हितों को लेकर चिंता में घुलते रहते हैं; या फिर वे खुद को अयोग्य समझते हैं और कुछ विशिष्ट नकारात्मक मनोदशा में रहते हैं। जब तुम लगातार ऐसी मनोदशा में रहते हो, तो तुम्हारे लिए पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करना बहुत मुश्किल हो जाता है। अगर तुम्हें पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में मुश्किल होती है, तो तुम्हारे अंदर बहुत कम सकारात्मक भावनाएँ होंगी और तुम्हारे लिए सत्य को प्राप्त करना कठिन होगा। लोग संयम के अभ्यास के लिए हमेशा अपनी इच्छा-शक्ति पर निर्भर रहकर, खुद को किसी न किसी तरीके से अंकुश में रखते हैं, पर फिर भी वे उन नकारात्मक या प्रतिकूल मनोदशा से खुद को मुक्त नहीं कर पाते। इसके पीछे आंशिक रूप से मानवीय कारण हैं; लोग अपने अनुकूल अभ्यास का कोई मार्ग नहीं ढूंढ पाते। दूसरा कारण है—और यह भी एक बड़ा कारण है—कि लोग हमेशा इन नकारात्मक, पतनशील एवं विकृत मनोदशा में फंस जाते हैं और पवित्र आत्मा अपना कार्य नहीं कर पाता। अगर कभी-कभार पवित्र आत्मा उन्हें कुछ प्रबुद्धता देता भी है तो भी वह उनमें कोई बड़ा कार्य नहीं कर पाता। इसलिए लोगों को कोई कदम उठाने के लिए कड़ा प्रयास करना पड़ता है और उनके लिए कुछ भी देखना या समझना बहुत मुश्किल होता है। तुम्हारे लिए प्रबुद्धता और प्रकाशन प्राप्त करना दूभर है और प्रकाश प्राप्त करना तो और भी दूभर है, क्योंकि तुम्हारे भीतर बहुत सारी नकारात्मक और प्रतिकूल चीजों ने तमाम जगह घेर रखी है। अगर कोई व्यक्ति पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध न किया जा सके और वह पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त न कर पाए, तो वह इस मनोदशा से छुटकारा नहीं पा सकता या इस नकारात्मक मनोदशा को बदल नहीं सकता; पवित्र आत्मा कार्य नहीं करता और तुम्हें आगे का रास्ता नहीं मिल पाता। इन दोनों कारणों से, तुम्हारे लिए एक सकारात्मक, सामान्य मनोदशा प्राप्त करना मुश्किल हो जाता है। भले ही तुम बहुत कुछ सहन कर सकते हो, अपने कर्तव्यों के पालन में कड़ी मेहनत कर सकते हो, भले ही तुमने बहुत अधिक प्रयास किया है और अपना घर-बार और काम-धंधा तक छोड़ दिया है और हर चीज का पूरी तरह से त्याग कर दिया है, पर तुम्हारी अंदरूनी दशा अब भी नहीं बदली है। बहुत सारी उलझनें अब भी तुम्हें अपनी लपेट में लिए हुए हैं और तुम्हें सत्य का अभ्यास करने और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने से रोकती हैं। तुम्हारे अंदर बहुत सारी चीजों ने जगह घेर रखी है : निजी अवधारणाएँ, कल्पनाएँ, ज्ञान, जीवन-दर्शन, साथ ही, नकारात्मक चीजें, स्वार्थ, निजी-हित, प्रतिष्ठा से जुड़ी चिंताएँ और दूसरों के साथ विवाद। लोगों के भीतर कुछ भी सकारात्मक नहीं होता। उनके दिमाग नकारात्मक और प्रतिकूल विचारों से भरे रहते हैं, इस तथ्य को कोई नकार नहीं सकता। उनके दिल शैतानी चीजों से भरे हुए हैं और वे उन्हीं के कब्जे में हैं। अगर तुम इन चीजों को दूर नहीं हटाओगे, अगर तुम खुद को इन दशाओं से मुक्त नहीं कर सकते, अगर तुम एक बच्चे की तरह सच्चे नहीं बन सकते—मासूम, जीवंत, निश्छल, प्रामाणिक और विशुद्ध—परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं आ सकते और उसके सम्मुख नहीं आ सकते, तो तुम्हारे लिए सत्य प्राप्त करना अत्यंत कठिन होगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से पहले लोग कई अवस्थाओं से गुजर चुके होते हैं। उदाहरण के लिए, लोगों में अक्सर एक नकारात्मक स्थिति देखी जाती है : जब लोग दूसरों को लाभकारी ढंग से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए देखते हैं, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं; लोग नकारात्मक हो जाते हैं जब वे दूसरों के परिवारों को अपने से अधिक एकजुट देखते हैं; लोग नकारात्मक हो जाते हैं जब वे दूसरों की स्थिति अपने से बेहतर पाते हैं या जब वे दूसरों में अधिक क्षमता देखते हैं; लोग नकारात्मक हो जाते हैं जब उन्हें थोड़ा जल्दी जगा दिया जाता है, जब उनका काम थकाऊ होता है और जब थकाऊ नहीं होता तब भी। वे हर स्थिति में नकारात्मक रहते हैं। यदि ऐसे लोग खोजने में विशेष प्रयास करते हैं, और विशेष रूप से कीमत चुकाने में सक्षम होते हैं और यदि उनमें कुछ क्षमता होती है और कुछ हद तक व्यावहारिक कार्य करने में सक्षम होते हैं, तब हो सकता है कि दूसरों की अवधारणाओं के कारण ऐसे लोग उनके बारे में कहें, "यह कितने शर्म की बात है कि वे लोग हमेशा नकारात्मक होते हैं। क्या परमेश्वर को उन लोगों के प्रति थोड़ा पक्षपात दिखाकर उन्हें नकारात्मक होने से बचाना नहीं चाहिए ताकि वे अपनी नकारात्मकता से उभर जाएँ? परमेश्वर अपना काम क्यों नहीं कर रहा है?" ऐसे लोगों का परमेश्वर क्या करता है? उनके प्रति उसका दृष्टिकोण क्या होता है? वह उन्हें अनुशासित नहीं करता, न ही वह उनसे निपटता है या उनकी काट-छाँट करता है; वह बस उन्हें दर-किनार कर देता है। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि यदि तुम हमेशा नकारात्मक रहते हो और परमेश्वर द्वारा किए गए किसी भी काम से संतुष्ट नहीं होते हो, तो वह तुम्हें कहीं फेंक कर तुम्हें इंतजार करवाएगा। पवित्र आत्मा बेकार का काम नहीं करता। कुछ लोग कहते हैं, "यदि परमेश्वर ऐसा नहीं करेगा, तो इसका मतलब है कि वह प्रेम नहीं करता!" परमेश्वर इस ढंग से प्रेम व्यक्त नहीं करता। नकारात्मकता का मतलब है कि लोगों के भीतर कोई समस्या है : वे सत्य को स्वीकार नहीं कर पाते और वे परमेश्वर के हर काम से लगातार असंतुष्ट बने रहते हैं; इसके अलावा, वे सत्य की जरा-सी भी खोज नहीं करते या उसे व्यवहार में नहीं लाते। परमेश्वर ऐसे लोगों के प्रति उत्तरदायी क्यों रहेगा? क्या वे विवेकशून्य नहीं हैं? ऐसे विवेकशून्य लोगों के प्रति परमेश्वर का क्या रवैया होता है? वह उन्हें दर-किनार करके अनदेखा कर देता है। तुम जैसा चाहो करो और यदि ऐसा करना चाहते हो तो विश्वास रख सकते हो; यदि तुम विश्वास रखते हो और खोज करते हो, तो तुम प्राप्त कर सकते हो। परमेश्वर सभी के साथ उचित व्यवहार करता है। यदि तुम्हारा दृष्टिकोण सत्य को स्वीकार न करने का है और समर्पित न होने का है, और यदि तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हो, तो तुम उसी में विश्वास रखो जो तुम्हारी इच्छा है; इसके अलावा, यदि तुम छोड़ना चाहो, तो तुम तुरंत ऐसा कर सकते हो। यदि तुम अपने कर्तव्यों का निर्वहन न करना चाहो, तो तुम जो कुछ भी करो, उसमें कोई अपमानजनक स्थिति पैदा न करो या अहंकार मत दिखाओ, बल्कि तुरंत छोड़ दो, जहाँ जाना चाहो जाओ। परमेश्वर ऐसे लोगों से रुकने का आग्रह नहीं करता। यही उसका रवैया है। यदि तुम साफ तौर पर एक किसी सृजित प्राणी होकर भी, उसकी तरह व्यवहार नहीं करते, बल्कि हमेशा एक महादूत की तरह बनना चाहते हो, तो क्या परमेश्वर तुम पर ध्यान दे सकता है? यदि तुम जैसा स्पष्ट रूप से एक सामान्य व्यक्ति यह चाहे कि उसके साथ हमेशा विशेष और तरजीह देने वाला व्यवहार किया जाए और हैसियत और सम्माननीय व्यक्ति बनना चाहे जो सभी चीजों में दूसरों से अधिक उत्कृष्टता प्राप्त करता है, तो तुम अनुचित हो और तुममें समझदारी का अभाव है। परमेश्वर उन लोगों को कैसे देखता है जिनमें समझदारी का अभाव होता है? उनके बारे में उसका आकलन क्या होता है? ऐसे लोग विवेकशून्य होते हैं!

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (3)' से उद्धृत

चाहे बड़े मामले आएँ या छोटे, तुम हमेशा नकारात्मक और कमज़ोर होते हो, और तुम कोई गवाही नहीं देते। व्यक्ति को जो कार्य अथवा सहयोग करना चाहिए, तुम वह करने में विफल रहते हो, जिससे यह साबित होता है कि तुम्हारे दिल में न तो परमेश्वर है और न ही सत्य। आओ, फ़िलहाल हम इस बात पर ध्यान न दें कि पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को कैसे द्रवित करता है। परमेश्वर के कार्य के अपने वर्षों के अनुभव मात्र के बल पर, बहुत-सी सच्चाइयों को सुनकर, और थोड़े विवेक और दृढ़ संयम के साथ, उन्हें निम्नतम मानक पूरा करने में उन्हें सक्षम होना चाहिए, और उस तरह सुन्न और कमजोर नहीं होना चाहिए, जिस तरह वे अभी हैं। यह एक अविश्वसनीय बात है। यह स्पष्ट है कि तुम इन पिछले कुछ वर्षों में संभ्रमित हो गए हो—नहीं तो तुम ऐसे सुन्न और सुस्त क्यों होते, जैसे तुम हो? सच तो यह है कि तुमने यह सोचकर खुद को सीमांकित कर लिया है, "मैं ठीक नहीं हूँ—मैं अत्यधिक भ्रष्ट हूँ। यह ऐसा ही है, और मुझे बस इसके साथ ही रहना होगा!" तुमने अभी तक अपनी खोज का प्रयास नहीं किया है, और तुम कहते हो, "यही मेरी चुनौती है। मुझे तुम बस घर भेज सकते हो!" यह बकवास नहीं, तो क्या है? यह केवल जिम्मेदारी से कतराना और बचना है! यदि तुम्हारे पास थोड़ा-सा भी जमीर और विवेक है, तो तुम्हें वह ठीक से पूरा करना चाहिए, जो तुम्हें करना है और जो तुम्हारा ध्येय है; पलायनवादी होना एक भयानक बात है और परमेश्वर के साथ विश्वासघात है। सत्य का अनुसरण करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है, और जो लोग बहुत अधिक नकारात्मक या कमज़ोर होते हैं, वे कुछ भी संपन्न नहीं करेंगे। वे अंत तक परमेश्वर में विश्वास नहीं कर पाएँगे, और, यदि वे सत्य को प्राप्त करना चाहते हैं और स्वभावगत बदलाव हासिल करना चाहते हैं, तो उनके लिए अभी भी उम्मीद कम है। केवल वे, जो दृढ़-संकल्प हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं, ही उसे प्राप्त कर सकते हैं और परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा सकते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रमित लोगों को बचाया नहीं जा सकता' से उद्धृत

पवित्र आत्मा के पास प्रत्येक व्यक्ति में चलने के लिए एक मार्ग है, और वह प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण होने का अवसर प्रदान करता है। तुम्हारी नकारात्मकता के माध्यम से तुम्हें तुम्हारी भ्रष्टता ज्ञात करवाई जाती है, और फिर नकारात्मकता को फेंककर तुम्हें अभ्यास करने का मार्ग मिल जाएगा; इन्हीं सब तरीकों से तुम पूर्ण किए जाते हो। इसके अतिरिक्त, निरंतर मार्गदर्शन और अपने भीतर कुछ सकारात्मक चीज़ों की रोशनी के द्वारा तुम अपना कार्य अग्रसक्रियता से पूरा करोगे, तुम्हारी अंतर्दृष्टि विकसित होगी और तुम विवेक प्राप्त करोगे। जब तुम्हारी स्थितियाँ अच्छी होती हैं, तुम परमेश्वर के वचन पढ़ने के विशेष रूप से इच्छुक होते हो, और परमेश्वर से प्रार्थना करने के भी विशेष रूप से इच्छुक होते हो, और जो उपदेश तुम सुनते हो, उसे अपनी अवस्था के साथ जोड़ सकते हो। ऐसे समय परमेश्वर तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध और रोशन करता है, और तुम्हें सकारात्मक पहलू वाली कुछ चीज़ों का एहसास कराता है। इसी तरह से तुम सकारात्मक पहलू में पूर्ण किए जाते हो। नकारात्मक स्थितियों में तुम दुर्बल और निष्क्रिय होते हो; तुम्हें महसूस होता है कि तुम्हारे दिल में परमेश्वर नहीं है, फिर भी परमेश्वर तुम्हें रोशन करता है और अभ्यास करने के लिए मार्ग खोजने में तुम्हारी सहायता करता है। इससे बाहर आना नकारात्मक पहलू में पूर्णता प्राप्त करना है। परमेश्वर मनुष्य को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं में पूर्ण बना सकता है। यह इस पर निर्भर करता है कि तुम अनुभव करने में सक्षम हो या नहीं, और तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के लिए कोशिश करते हो या नहीं। यदि तुम सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के लिए कोशिश करते हो, तो नकारात्मक पहलू तुम्हारी हानि नहीं कर सकता, बल्कि तुम्हारे लिए अधिक वास्तविक चीज़ें ला सकता है, और तुम्हें यह जानने में और अधिक सक्षम सकता है कि तुम्हारे भीतर क्या कमी है, अपनी वास्तविक स्थिति को समझने में अधिक सक्षम बना सकता है, और यह देखने में भी कि मनुष्य के पास कुछ नहीं है, और मनुष्य कुछ नहीं है; यदि तुम परीक्षण अनुभव नहीं करते, तो तुम नहीं जानते, और तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि तुम दूसरों से ऊपर हो और प्रत्येक व्यक्ति से बेहतर हो। इस सबके द्वारा तुम देखोगे कि जो कुछ पहले आया था, वह सब परमेश्वर द्वारा किया गया था और सुरक्षित रखा गया था। परीक्षणों में प्रवेश तुम्हें प्रेम या विश्वास से रहित बना देता है, तुममें प्रार्थना की कमी होती है और तुम भजन गाने में असमर्थ होते हो और इसे जाने बिना ही तुम इसके मध्य स्वयं को जान लेते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के निष्क्रिय अनुयायी मत बनो, और उसकी खोज मत करो जिससे तुम्हारे भीतर कौतूहल जागता है। इस तरह की दुविधा में पड़कर तुम अपने-आपको बर्बाद कर लोगे और अपने जीवन-विकास में देरी करोगे। तुम्हें स्वयं को ऐसी शिथिलता और निष्क्रियता से मुक्त करके, सकारात्मक चीजों का अनुसरण करने एवं अपनी कमजोरियों पर विजय पाने में कुशल बनना चाहिए, ताकि तुम सत्य को प्राप्त करके उसे जी सको। तुम्हें अपनी कमजोरियों को लेकर डरने की जरूरत नहीं है, तुम्हारी कमियां तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या नहीं है। तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या, और सबसे बड़ी कमी है तुम्हारा दुविधाग्रस्त होना, और तुममें सत्य खोजने की इच्छा की कमी होना। तुम लोगों की सबसे बड़ी समस्या है तुम्हारी डरपोक मानसिकता जिसके कारण तुम लोग यथास्थिति से खुश हो जाते हो, और निष्क्रिय होकर इंतजार करते हो। यही तुम्हारी सबसे बड़ी बाधा है, यही सत्य की खोज करने में तुम्हारा सबसे बड़ा शत्रु है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

अब तुम्हें नकारात्मक चीज़ों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। पहले, हर उस चीज़ को अलग रख दो और उसकी उपेक्षा करो, जो तुम्हें नकारात्मक महसूस कराए। जब तुम कामकाज सँभाल रहे होते हो, तो ऐसे दिल से सँभालो, जो खोज करता हो और सावधानी से आगे बढ़ता हो, ऐसा दिल जो परमेश्वर के प्रति समर्पित होता हो। जब कभी तुम लोगों को अपने भीतर किसी कमजोरी का पता चले, पर तुम उसे खुद पर काबू न पाने दो, और उसके बावजूद तुम वे कार्य करो, जो तुम्हें करने चाहिए, तो तुमने एक सकारात्मक कदम आगे बढ़ा लिया। उदाहरण के लिए, तुम वृद्ध भाई-बहनों की धार्मिक धारणाएँ हैं, फिर भी तुम प्रार्थना कर सकते हो, समर्पण कर सकते हो, परमेश्वर के वचन खा-पी सकते हो, और भजन गा सकते हो...। दूसरे शब्दों में, तुम जो कुछ भी करने में सक्षम हो, जो कोई भी कार्य तुम कर सकते हो, तुम्हें अपनी पूरी शक्ति के साथ उसके प्रति समर्पित हो जाना चाहिए। निष्क्रियता से प्रतीक्षा न करो। अपने कर्तव्य के निर्वहन में परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम होना पहला कदम है। फिर, एक बार जब तुम सत्य को समझने में सक्षम हो जाओगे और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश हासिल कर लोगे, तब तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा चुके होगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सभी के द्वारा अपना कार्य करने के बारे में' से उद्धृत

यदि तुम्हारा हृदय वास्तव में परमेश्वर के समक्ष शांत रहता है, तो बाहरी दुनिया में होने वाली किसी भी बात से तुम अशांत नहीं होगे, या तुम पर किसी भी व्यक्ति, घटना या वस्तु द्वारा कब्जा नहीं किया जा सकेगा। यदि तुम्हारा इसमें प्रवेश है, तो वे नकारात्मक अवस्थाएँ और समस्त नकारात्मक चीज़ें—मानवीय धारणाएँ, जीवन-दर्शन, लोगों के बीच असामान्य संबंध तथा मत और विचार, इत्यादि—स्वाभाविक रूप से गायब हो जाएँगी। चूँकि तुम सदा परमेश्वर के वचनों पर चिंतन कर रहे हो, और तुम्हारा हृदय हमेशा परमेश्वर के निकट आ रहा है और हमेशा परमेश्वर के वर्तमान वचनों से घिरा रहता है, इसलिए वे नकारात्मक चीज़ें अनजाने ही तुमसे दूर हो जाएँगी। जब नई और सकारात्मक चीज़ें तुम पर कब्जा करेंगी, तब पुरानी नकारात्मक चीज़ों के लिए कोई जगह नहीं रहेगी, इसलिए उन नकारात्मक चीज़ों पर ध्यान न दो। तुम्हें उन्हें नियंत्रित करने के लिए कोई प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें परमेश्वर के समक्ष शांत रहने, परमेश्वर के वचनों को अधिक से अधिक खाने, पीने और उनका आनंद लेने, परमेश्वर की स्तुति में अधिकाधिक भजन गाने, और परमेश्वर को अपने ऊपर कार्य करने का अवसर देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर इस समय मानव-जाति को व्यक्तिगत रूप से सिद्ध बनाना चाहता है, और वह तुम्हारे हृदय को हासिल करना चाहता है; उसका आत्मा तुम्हारे हृदय को प्रेरित करता है, और यदि पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का अनुसरण करके तुम परमेश्वर की उपस्थिति में आ जाते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट करोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर जिन लोगों को बचाता है वे वही लोग हैं जिनके स्वभाव शैतान की भ्रष्टता के कारण भ्रष्ट हो गये हैं; वे निष्कलंक, पूर्ण लोग नहीं हैं, वे ऐसे लोग भी नहीं हैं जो रिक्तता में जीवन जीते हैं। कुछ लोग, अपनी भ्रष्टता के प्रकट होते ही सोचते हैं, "एक बार फिर, मैंने परमेश्वर का विरोध किया है; मैंने कई सालों से उस पर विश्वास किया है, लेकिन मैं अब भी नहीं बदला हूँ। परमेश्वर निश्चित रूप से अब मुझे पसंद नहीं करता है!" यह किस तरह का रवैया है? उन लोगों ने खुद से उम्मीद छोड़ दी है, और वे सोचते हैं कि अब परमेश्वर उन्हें नहीं चाहता है। क्या यह परमेश्वर को गलत समझने वाली बात नहीं है? जब तुम इतना नकारात्मक होते हो तो, शैतान के लिये तुम्हें नुकसान पहुंचाना सबसे आसान होता है, और एक बार वह कामयाब हो गया, तो परिणामों की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए, चाहे तुम कितनी ही बड़ी मुश्किल में क्यों न हो या चाहे तुम कितना भी निराश क्यों न महसूस करते हो, तुम्हें कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिये! जीवन में प्रगति की प्रक्रिया में और बचाये जाते समय, लोग कभी-कभी गलत मार्ग चुन लेते हैं या पथभ्रष्ट हो जाते हैं। वे कुछ समय के लिए अपने जीवन में कुछ अपरिपक्वता दिखाते हैं, या कभी-कभी कमज़ोर या नकारात्मक हो जाते हैं, गलत बातें कहते हैं, फिसल जाते हैं और गिरते हैं, या असफलता का सामना करते हैं। परमेश्वर के दृष्टिकोण से, ऐसी बातें सामान्य हैं, और वह इन बातों का बतंगड़ नहीं बनाएगा। यह देखकर कि वे कितने गंभीर रूप से भ्रष्ट हैं, कि वे परमेश्वर को कभी भी संतुष्ट नहीं कर पाएंगे, कुछ लोगों के हृदय में पीड़ा होती है और जिन लोगों को ऐसा पश्चाताप होता है, वे अक्सर परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य होते हैं। जिन लोगों को उद्धार की आवश्यकता महसूस नहीं होती, जिन्हें लगता है कि वे पहले से ही पूर्ण हैं, उन्हें परमेश्वर द्वारा बचाया नहीं जाएगा। मैं तुम्हें यह क्यों बता रहा हूँ? मेरे कहने का मतलब यह है कि तुम्हारे अंदर आस्था होनी चाहिएः "इस तथ्य के बावजूद कि मैं अब कमज़ोर हो गया हूँ, पतित हो गया हूँ और असफल हो चुका हूँ, एक न एक दिन मैं उठूँगा और परमेश्वर को संतुष्ट कर पाऊँगा, सत्य को समझूँगा और बचा लिया जाऊँगा।" तुम्हारे अंदर यह आस्था होनी चाहिए। चाहे जो भी बाधाएं, परेशानियाँ आएं या असफलताएं और पराजय हाथ लगे, तुम्हें निराश नहीं होना चाहिए; तुम्हें यह जानना चाहिए कि किस प्रकार के लोग परमेश्वर द्वारा बचाए जाते हैं। इसके अलावा, यदि तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर के उद्धार के अयोग्य हो, यदि तुम्हें कभी-कभार ऐसा महसूस होने लगे कि परमेश्वर तुमसे घृणा करता है या तुमसे नाराज़ है या अतीत में कभी ऐसा हो चुका है कि तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण रूप से अस्वीकार या खारिज कर दिया गया है, तो चिंता न करो। तुम यह बात तुम्हें पता है, इसलिए बहुत देर नहीं हुई है; यदि तुम पश्चाताप करोगे, तो परमेश्वर तुम्हें उद्धार का अवसर प्रदान करेगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर में आस्था के लिए सर्वाधिक आवश्यक है जीवन में प्रवेश' से उद्धृत

जब लोग कठिनाइयों का सामना करते हैं या जब वे काटे-छाँटे जाते हैं और उनके साथ निपटा जाता है या जब वे विफल होते हैं और गिरते हैं, तब वे नकारात्मक होने से बच सकते हैं। इसका प्राथमिक कारण क्या है? वह यह है कि वे सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं। सत्य को स्वीकार करने में सक्षम होने से वे नकारात्मक होना बंद कर देते हैं। यदि वे सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, हमेशा अपने भीतर कठिनाइयों को पालते हैं और हमेशा उनका हल निकालने में असफल रहते हैं, तो वे हमेशा नकारात्मक ही रहेंगे; इसका संबंध उनकी सत्य की समझ से हैं। कुछ लोग जो नकारात्मक हो गए हैं, उनके साथ संगति करने पर वे कहते हैं, “मेरे साथ संगति मत करो, मैं सब समझता हूँ।” क्या वे वास्तव में सब समझते हैं? अगर वे सब कुछ समझते तो क्या वे नकारात्मक होते? यह समझदारी जिसका वे उल्लेख करते हैं, उसमें किस चीज़ की आवश्यकता है? इसमें आवश्यक है कि वे सिद्धांतों को समझें और वे उनका शाब्दिक अर्थ समझें। हक़ीक़त में, वे सच को नहीं समझते। सत्य को न समझते हुए भी, वे सिद्धांतों को स्वीकार करने में सक्षम क्यों हैं? (वे परमेश्वर के वचनों को अनुभव नहीं करते, वे उन पर मनन नहीं करते, और न ही वे सत्य खोजते हैं, वे अपनी भ्रष्ट स्वभाव की तुलना वचनों से नहीं करते।) वास्तव में यही हो रहा है। वे जिन सिद्धांतों को समझते हैं, उन्हें अभ्यास में नहीं लाते, न उसका उपयोग करते हैं; वे केवल उनके बारे में बात करते हैं या दूसरों को उसका उपदेश देते हैं, और फिर वहीं रुक जाते हैं। वे स्वयं सत्य को स्वीकार नहीं करते और इस प्रकार वे अपनी नकारात्मक स्थितियों, अपनी कमज़ोरियों, अपने विद्रोहीपन, अपनी मिथ्या धारणाओं, और अपनी शिकायतों का हल निकालने में सक्षम नहीं हो पाते हैं। तो फिर, नकारात्मक होने, बदतर हो जाने और ख़ुद को निराश होने के लिए छोड़ देने की समस्या का हल निकालने का सबसे अच्छा तरीका क्या है? (सत्य को स्वीकार करना) यह अपनी समझ के अनुसार सत्य को स्वीकार करना और फिर उसकी वास्तविकता में प्रवेश करना है। इसे कह तो आसानी से दिया जाता है, लेकिन इसमें प्रवेश करने पर कठिनाइयों से सामना होता है, और यह प्रवेश को कठिन बना देता है। इसलिए तुम्हें यह सच में समझना चाहिये कि सत्य क्या है। यदि तुम हमेशा यही सोचोगे कि तुम समझते हो, लेकिन तुम अपनी कठिनाइयों का समाधान करने में सक्षम नहीं हो, तो इससे सिद्ध होता है कि तुमने सत्य को नहीं समझा है। उन सिद्धांतों के आधार पर जो तुम समझते हो, यदि तुम उन्हें सत्य की तरह मानो और स्वयं को उनकी कसौटी पर रखो, और उनको अभ्यास मे लाओ, तो तुम्हारी समस्याएँ हल हो जाएंगी, यदि तुम नकारात्मक या कमज़ोर हो तब भी कोई समस्या नहीं होगी, और तुम निराश नहीं होगे या ठहर नहीं जाओगे। यह निश्चित रूप से नकारात्मकता का हल निकालने का तरीका है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई वास्तव में ख़ुश हो सकता है' से उद्धृत

कुछ लोग नकारात्मकता के बीच हैं, पर फिर भी वे अपने कर्तव्यों में “परमेश्वर के प्रति आखिर तक वफ़ादार, चाहे अंत में कुछ भी हो” ऐसा नज़रिया बनाये रख सकते हैं। मैं मानता हूँ कि यह परिवर्तन है, फिर भी आप लोग स्वयं इसको समझ नहीं पा रहे हैं। वास्तव में, यदि आप स्वयं को सावधानीपूर्वक परखें, आप देखेंगे कि आपके भ्रष्ट स्वभाव का एक हिस्सा बदल चुका है ; परन्तु, जब आप स्वयं को मापने के लिए उच्चतम पैमाने का प्रयोग करने लगते हैं, तब न केवल आप उस उच्च स्तर तक पहुँच नहीं पाएँगे, बल्कि वे बदलाव या सुधार जो आप अपने में ला पाए हैं, उन्हें भी नकारेंगे – यह एक मानवीय त्रुटि है। अगर आप सचमुच वो हैं जो सही-गलत का विवेक रखता हो, तब अपने भीतर हुए सुधार के प्रति खुद को जागरूक बनाने में कोई नुकसान नहीं ; उससे न केवल आप अपने स्वयं के परिवर्तनों को देख पाएँगे, बल्कि आप उस आगे के मार्ग को भी देख पाएँगे जिस पर आपको चलना है ; उस समय आप देखेंगे कि जब तक आप कठिन परिश्रम करेंगे, आपके लिए आशा फिर भी बनी रहेगी ; आप कभी-न-सुधरने-योग्य नहीं। मैं अभी आपको बताता हूँ : जो अपनी समस्याओं को स्पष्ट देख सकते हैं, उनके लिए उम्मीद है ; वे नकारात्मकता से बाहर आ सकते हैं।

आप सत्य को त्याग देते हैं इसका कारण है आपका यह सोच लेना कि आप बचाव के परे जा चुके हैं, इसी वजह से आप मूलभूत सच्चाइयों को भी छोड़ देते हैं। संभवतः ऐसा नहीं कि आप सत्य को अभ्यास में ला ही नहीं सकते, बल्कि यह कि आप उन मौकों से चूक जाते हैं जब आप सत्य पर आचरण कर सकें ; यदि आप सत्य को ही त्याग दें, क्या आप फिर भी बदल सकेंगे? और यदि आप सत्य को ही त्याग दें, तब कहाँ है कोई अर्थ परमेश्वर में विश्वास रखने का? क्या यह पहले से ही नहीं कहा जा चुका है, “यह ठीक है चाहे कभी भी स्वभाव में परिवर्तन की चाह की जाए”? क्या आप यह भूल चुके हैं? आप सभी को तो बस यही याद है कि बहुत कम को बचाया जा सकेगा[क] और आप को लगता है कि आप सब के लिए कोई उम्मीद ही नहीं बची। यदि आप सकारात्मक लक्ष्य नहीं रखते, क्या नकारात्मक बातें प्रकट न होंगी? तब आप नकारात्मक होने से कैसे बचेंगे? इस लिए मैं फिर भी आपसे कह रहा हूँ : आप को स्वयं को सही-सही देखना ही होगा, और सत्य का त्याग न करें।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को सही ढंग से देखो और सत्य में विश्वास करना बंद मत करो' से उद्धृत

फुटनोट :

क. मूलपाठ में लिखा है: “आप को याद है कि वैसे लोग बहुत ही कम हैं”।

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