172. परमेश्वर के प्रेम को लौटाने के सिद्धांत

(1) जब तुम परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना से गुज़रते हो और अपने स्वयं के भ्रष्ट सार को जान लेते हो, और मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेम की महानता को देख लेते हो, तो उससे प्रेम करने के लिए जो भी कर सकते हो, उसे करो।

(2) परमेश्वर सत्य की एक विशालता को व्यक्त करता है और मनुष्यों को उनके जीवन के रूप में सेवा करने के लिए इसे प्रदान करता है; उसके उद्धार का अनुग्रह विशाल है। परमेश्वर के प्रेम को लौटाने हेतु अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने के लिए तैयार रहो।

(3) जब कोई परीक्षणों और शोधन से गुज़रता है, तो वह परमेश्वर द्वारा संरक्षित होता है, वह अपनी गवाही में दृढ़ रह पाता है, और वह परमेश्वर की भरपूर कृपा का आनंद लेता है; उसे जीवन भर और अनंत काल तक परमेश्वर की गवाही देने के लिए तैयार रहना चाहिए।

(4) परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में, किसी की भ्रष्टता शुद्ध हो जाती है, उसका जीवन स्वभाव बदल जाता है, और वह परमेश्वर की अत्यधिक मनोहरता को देखता है; उसे अपना पूरा जीवन उसके लिए खपा देने को तैयार रहना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

अब जो कुछ मैं तुम लोगों को देता हूँ, वह मूसा से बढ़कर और दाऊद से बड़ा है, अतः उसी प्रकार मैं कहता हूँ कि तुम्हारी गवाही मूसा से बढ़कर और तुम्हारे वचन दाऊद के वचनों से बड़े हों। मैं तुम लोगों को सौ गुना देता हूँ—अत: उसी प्रकार मैं तुम लोगों से कहता हूँ मुझे उतना ही वापस करो। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि वह मैं ही हूँ, जो मनुष्य को जीवन देता है, और तुम्हीं लोग हो, जो मुझसे जीवन प्राप्त करते हो और तुम्हें मेरी गवाही अवश्य देनी चाहिए। यह तुम लोगों का वह कर्तव्य है, जिसे मैं नीचे तुम लोगों के लिए भेजता हूँ और जिसे तुम लोगों को मेरे लिए अवश्य निभाना चाहिए। मैंने अपनी सारी महिमा तुम लोगों को दे दी है, मैंने तुम लोगों को वह जीवन दिया है, जो चुने हुए लोगों, इजरायलियों को भी कभी नहीं मिला। उचित तो यही है कि तुम लोग मेरे लिए गवाही दो, अपनी युवावस्था मुझे समर्पित कर दो और अपना जीवन मुझ पर कुर्बान कर दो। जिस किसी को मैं अपनी महिमा दूँगा, वह मेरा गवाह बनेगा और मेरे लिए अपना जीवन देगा। इसे मैंने पहले से नियत किया हुआ है। यह तुम लोगों का सौभाग्य है कि मैं अपनी महिमा तुम्हें देता हूँ, और तुम लोगों का कर्तव्य है कि तुम लोग मेरी महिमा की गवाही दो। अगर तुम लोग केवल आशीष प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हो, तो मेरे कार्य का ज़्यादा महत्व नहीं रह जाएगा, और तुम लोग अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रहे होगे। इजराइलियों ने केवल मेरी दया, प्रेम और महानता को देखा था, और यहूदी केवल मेरे धीरज और छुटकारे के गवाह बने थे। उन्होंने मेरे आत्मा के कार्य का एक बहुत ही छोटा भाग देखा था; इतना कि तुम लोगों ने जो देखा और सुना है, वह उसका दस हज़ारवाँ हिस्सा ही था। जो कुछ तुम लोगों ने देखा है, वह उससे भी बढ़कर है, जो उनके बीच के महायाजकों ने देखा था। आज तुम लोग जिन सत्यों को समझते हो, वह उनके द्वारा समझे गए सत्यों से बढ़कर है; जो कुछ तुम लोगों ने आज देखा है, वह उससे बढ़कर है जो व्यवस्था के युग में देखा गया था, साथ ही अनुग्रह के युग में भी, और जो कुछ तुम लोगों ने अनुभव किया है, वह मूसा और एलियाह के अनुभवों से कहीं बढ़कर है। क्योंकि जो कुछ इजरायलियों ने समझा था, वह केवल यहोवा की व्यवस्था थी, और जो कुछ उन्होंने देखा था, वह केवल यहोवा की पीठ की झलक थी; जो कुछ यहूदियों ने समझा था, वह केवल यीशु का छुटकारा था, जो कुछ उन्होंने प्राप्त किया था, वह केवल यीशु द्वारा दिया गया अनुग्रह था, और जो कुछ उन्होंने देखा था, वह केवल यहूदियों के घर के भीतर यीशु की तसवीर थी। आज तुम लोग यहोवा की महिमा, यीशु का छुटकारा और आज के मेरे सभी कार्य देख रहे हो। तुम लोगों ने मेरे आत्मा के वचनों को भी सुना है, मेरी बुद्धिमत्ता की तारीफ की है, मेरे चमत्कार देखे हैं, और मेरे स्वभाव के बारे में जाना है। मैंने तुम लोगों को अपनी संपूर्ण प्रबंधन योजना के बारे में भी बताया है। तुम लोगों ने मात्र एक प्यारा और दयालु परमेश्वर ही नहीं, बल्कि धार्मिकता से भरा हुआ परमेश्वर देखा है। तुम लोगों ने मेरे आश्चर्यजनक कामों को देखा है और जान गए हो कि मैं प्रताप और क्रोध से भरपूर हूँ। इतना ही नहीं, तुम लोग जानते हो कि मैंने एक बार इजराइल के घराने पर अपने क्रोध का प्रकोप उड़ेला था, और आज यह तुम लोगों पर आ गया है। तुम लोग यशायाह और यूहन्ना की अपेक्षा स्वर्ग के मेरे रहस्यों को कहीं ज़्यादा समझते हो; पिछली पीढ़ियों के सभी संतों की अपेक्षा तुम लोग मेरी मनोरमता और पूजनीयता को कहीं ज़्यादा जानते हो। तुम लोगों ने केवल मेरे सत्य, मेरे मार्ग और मेरे जीवन को ही प्राप्त नहीं किया है, अपितु मेरी उस दृष्टि और प्रकटीकरण को भी प्राप्त किया है, जो यूहन्ना को प्राप्त दृष्टि और प्रकटीकरण से भी बड़ा है। तुम लोग कई और रहस्य समझते हो, और तुमने मेरा सच्चा चेहरा भी देख लिया है; तुम लोगों ने मेरे न्याय को अधिक स्वीकार किया है और मेरे धर्मी स्वभाव को अधिक जाना है। और इसलिए, यद्यपि तुम लोग इन अंत के दिनों में जन्मे हो, फिर भी तुम लोग पूर्व की और पिछली बातों की भी समझ रखते हो, और तुम लोगों ने आज की चीजों का भी अनुभव किया है, और यह सब मेरे द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था। जो मैं तुम लोगों से माँगता हूँ, वह बहुत ज्यादा नहीं है, क्योंकि मैंने तुम लोगों को इतना ज़्यादा दिया है और तुम लोगों ने मुझमें बहुत-कुछ देखा है। इसलिए, मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि सभी युगों के संतों के लिए मेरी गवाही दो, और यह मेरे हृदय की एकमात्र इच्छा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विश्वास के बारे में क्या जानते हो?' से उद्धृत

तुम लोगों ने आज के दिन जो विरासत पाई है वह युगों-युगों तक परमेश्वर के प्रेरितों और नबियों की विरासत से भी बढ़कर है और यहाँ तक कि मूसा और पतरस की विरासत से भी अधिक है। आशीष एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं; वे बड़े त्याग के माध्यम से ही कमाए जाने चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है, तुम लोगों को उस प्रेम से युक्त होना ही चाहिए जो शुद्धिकरण से गुज़र चुका है, तुममें अत्यधिक आस्था होनी ही चाहिए, और तुम्हारे पास कई सत्य होने ही चाहिए जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि तुम प्राप्त करो; इससे भी बढ़कर, भयभीत हुए या टाल-मटोल किए बिना, तुम्हें न्याय की ओर जाना चाहिए, और परमेश्वर के प्रति मृत्युपर्यंत रहने वाला प्रेम रखना चाहिए। तुममें संकल्प होना ही चाहिए, तुम लोगों के जीवन स्वभाव में बदलाव आने ही चाहिए; तुम लोगों की भ्रष्टता का निदान होना ही चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के सारे आयोजन बिना शिकायत स्वीकार करने ही चाहिए, और तुम्हें मृत्युपर्यंत आज्ञाकारी होना ही चाहिए। यह वह है जो तुम्हें प्राप्त करना ही है, यह परमेश्वर के कार्य का अंतिम लक्ष्य है, और यह वह है जो परमेश्वर लोगों के इस समूह से चाहता है। चूँकि वह तुम लोगों को देता है, इसलिए वह बदले में तुम लोगों से निश्चिय ही माँगेगा भी, और तुम लोगों से निश्चय ही उपयुक्त माँगें ही करेगा। इसलिए, परमेश्वर जो भी कार्य करता है उस सबका कारण होता है, जो दिखलाता है कि परमेश्वर बार-बार ऐसा कार्य क्यों करता है जो इतने उच्च मानक स्थापित करता और कड़ी अपेक्षाएँ करता है। यही कारण है कि परमेश्वर के प्रति विश्वास तुममें समाया होना चाहिए। संक्षेप में, परमेश्वर का समूचा कार्य तुम लोगों के लिए किया जाता है, ताकि तुम लोग उसकी विरासत पाने के योग्य बन सको। यह सब परमेश्वर की अपनी महिमा के वास्ते उतना नहीं है बल्कि तुम लोगों के उद्धार के लिए और इस देश में अत्यधिक सताए गए लोगों के इस समूह को पूर्ण बनाने के लिए है। तुम लोगों को परमेश्वर की इच्छा समझनी चाहिए। और इसलिए, मैं बहुत-से अज्ञानी लोगों को, जो किसी भी अंतर्दृष्टि या समझ से रहित हैं, उपदेश देता हूँ : परमेश्वर की परीक्षा मत लो, तथा अब और प्रतिरोध मत करो। परमेश्वर पहले ही उस पीड़ा से गुज़र चुका है जो कभी किसी मनुष्य ने नहीं सही, और यहाँ तक कि बहुत पहले मनुष्य के स्थान पर इससे भी अधिक अपमान सह चुका है। ऐसा और क्या है जो तुम लोग नहीं छोड़ सकते? परमेश्वर की इच्छा से अधिक महत्वपूर्ण और क्या हो सकता है? परमेश्वर के प्रेम से बढ़कर और क्या हो सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?' से उद्धृत

क्या तू "हर युग में परमेश्वर द्वारा व्यक्त स्वभाव" को ठोस ढंग से ऐसी भाषा में बता सकता है जो उपयुक्त तरीके से युग की सार्थकता को व्यक्त करे? क्या तू, जो अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है, परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का वर्णन विस्तार से कर सकता है? क्या तू स्पष्ट एवं सटीक ढंग से परमेश्वर के स्वभाव की गवाही दे सकता है? तू उन दयनीय, बेचारे और धार्मिकता के भूखे-प्यासे धर्मनिष्ठ विश्वासियों के साथ, जो तेरी देखरेख की आस लगाए बैठे हैं, अपने दर्शनों और अनुभवों को कैसे बांटेगा? किस प्रकार के लोग तेरी देखरेख की प्रतीक्षा कर रहे हैं? क्या तू सोच सकता है? क्या तू अपने कधों के बोझ, अपने आदेश और अपने उत्तरदायित्व से अवगत है? ऐतिहासिक मिशन का तेरा बोध कहाँ है? तू अगले युग में प्रधान के रूप में सही ढंग से काम कैसे करेगा? क्या तुझमें प्रधानता का प्रबल बोध है? तू समस्त पृथ्वी के प्रधान का वर्णन कैसे करेगा? क्या वास्तव में संसार के समस्त सजीव प्राणियों और सभी भौतिक वस्तुओं का कोई प्रधान है? कार्य के अगले चरण के विकास हेतु तेरे पास क्या योजनाएं हैं? तुझे चरवाहे के रूप में पाने हेतु कितने लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं? क्या तेरा कार्य काफी कठिन है? वे लोग दीन-दुखी, दयनीय, अंधे, भ्रमित, अंधकार में विलाप कर रहे हैं—मार्ग कहाँ है? उनमें टूटते तारे जैसी रोशनी के लिए कितनी ललक है जो अचानक नीचे आकर उन अंधकार की शक्तियों को तितर-बितर कर दे, जिन्होंने वर्षों से मनुष्यों का दमन किया है। कौन जान सकता है कि वे किस हद तक उत्सुकतापूर्वक आस लगाए बैठे हैं और कैसे दिन-रात इसके लिए लालायित रहते हैं? उस दिन भी जब रोशनी चमकती है, भयंकर कष्ट सहते, रिहाई से नाउम्मीद ये लोग, अंधकार में कैद रहते हैं; वे कब रोना बंद करेंगे? ये दुर्बल आत्माएँ बेहद बदकिस्मत हैं, जिन्हें कभी विश्राम नहीं मिला है। सदियों से ये इसी स्थिति में क्रूर बधंनों और अवरुद्ध इतिहास में जकड़े हुए हैं। उनकी कराहने की आवाज किसने सुनी है? किसने उनकी दयनीय दशा को देखा है? क्या तूने कभी सोचा है कि परमेश्वर का हृदय कितना व्याकुल और चिंतित है? जिस मानवजाति को उसने अपने हाथों से रचा, उस निर्दोष मानवजाति को ऐसी पीड़ा में दु:ख उठाते देखना वह कैसे सह सकता है? आखिरकार मानवजाति को विष देकर पीड़ित किया गया है। यद्यपि मनुष्य आज तक जीवित है, लेकिन कौन यह जान सकता था कि उसे लंबे समय से दुष्टात्मा द्वारा विष दिया गया है? क्या तू भूल चुका है कि शिकार हुए लोगों में से तू भी एक है? परमेश्वर के लिए अपने प्रेम की खातिर, क्या तू उन जीवित बचे लोगों को बचाने का इच्छुक नहीं है? क्या तू उस परमेश्वर को प्रतिफल देने के लिए अपना सारा ज़ोर लगाने को तैयार नहीं है जो मनुष्य को अपने शरीर और लहू के समान प्रेम करता है? सभी बातों को नज़र में रखते हुए, तू एक असाधारण जीवन व्यतीत करने के लिए परमेश्वर द्वारा प्रयोग में लाए जाने की व्याख्या कैसे करेगा? क्या सच में तुझमें एक धर्म-परायण, परमेश्वर-सेवी जैसा अर्थपूर्ण जीवन जीने का संकल्प और विश्वास है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुझे अपने भविष्य के मिशन पर कैसे ध्यान देना चाहिए?' से

यदि तुम्हारे पास वास्तव में विवेक है, तो तुम्हारे पास बोझ और उत्तरदायित्व की भावना अवश्य होनी चाहिए। तुम्हें कहना चाहिए : "चाहे मुझे जीता जाए या पूर्ण बनाया जाए, मुझे गवाही देने का यह चरण सही ढंग से पूरा करना चाहिए।" परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में व्यक्ति परमेश्वर द्वारा सर्वथा जीता जा सकता है, और अंततः वह परमेश्वर से प्रेम रखने वाले दिल से परमेश्वर के प्रेम को चुकाते हुए और पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हुए, परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम हो जाता है। यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है, यह वह कर्तव्य है जिसे मनुष्य को अवश्य करना चाहिए, और यह वह बोझ है जिसे मनुष्य द्वारा अवश्य वहन किया जाना चाहिए, और मनुष्य को यह आदेश पूरा करना चाहिए। केवल तभी वह वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करता है। आज, तुम कलीसिया में जो करते हो, क्या वह तुम्हारे उत्तरदायित्व की पूर्ति है? यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम पर बोझ है या नहीं, और यह तुम्हारे अपने ज्ञान पर निर्भर करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (3)' से उद्धृत

कुछ लोग कहते हैं : "मैंने इतने सालों से परमेश्वर का अनुसरण किया है और उसके इतने अनुग्रह का, इतने आशीषों का आनंद उठाया है। मैं उसके वचनों से शुद्धिकरण और न्याय के अधीन रहा हूँ। इसलिए मैं बहुत-कुछ समझ गया हूँ और मैंने परमेश्वर के प्रेम को देखा है। मुझे उसका धन्यवाद करना चाहिए, मुझे उसका अनुग्रह चुकाना चाहिए। मैं मृत्यु से परमेश्वर को संतुष्ट करूँगा, और मैं उसके प्रति अपना प्रेम अपने विवेक पर आधारित करूँगा।" लोग अगर केवल अपने विवेक की भावनाओं की सुनें, तो वे परमेश्वर की मनोहरता महसूस नहीं कर सकते। अगर वे सिर्फ अपने विवेक पर भरोसा करें, तो परमेश्वर के लिए उनका प्रेम कमजोर होगा। यदि तुम केवल परमेश्वर के अनुग्रह और प्रेम का कर्ज़ चुकाने की बात करते हो, तो तुम्हारे पास उसके प्रति अपने प्रेम में कोई जोश नहीं होगा; अपने विवेक की भावनाओं के आधार पर उससे प्रेम करना एक निष्क्रिय दृष्टिकोण है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह एक निष्क्रिय दृष्टिकोण है? यह एक व्यावहारिक मुद्दा है। परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम किस तरह का प्रेम है? क्या वह परमेश्वर को मूर्ख बनाना और उसके लिए बेमन से काम करना नहीं है? अधिकांश लोगों का मानना है कि चूँकि परमेश्वर से प्रेम करने के लिए कोई पुरस्कार नहीं है, और उससे प्रेम न करने के लिए ताड़ना दी जाएगी, तो कुल मिलाकर पाप न करना ही काफी है। इसलिए अपने विवेक की भावनाओं के आधार पर परमेश्वर से प्रेम करना और उसके प्रेम को चुकाना एक निष्क्रिय दृष्टिकोण है, और वह परमेश्वर के लिए किसी के हृदय से निकला स्वाभाविक प्रेम नहीं है। परमेश्वर के लिए प्रेम व्यक्ति के हृदय की गहराई से निकला एक वास्तविक मनोभाव होना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं : "मैं खुद परमेश्वर के पीछे जाने और उसका अनुसरण करने के लिए तत्पर हूँ। अब भले ही परमेश्वर मुझे त्याग देना चाहे, मैं फिर भी उसका अनुसरण करूँगा। वह मुझे चाहे या न चाहे, मैं फिर भी उससे प्रेम करता रहूँगा, और अंत में मुझे उसे प्राप्त करना होगा। मैं अपना हृदय परमेश्वर को अर्पण करता हूँ, और चाहे वह कुछ भी करे, मैं अपने पूरे जीवन उसका अनुसरण करूँगा। चाहे कुछ भी हो, मुझे परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए और उसे प्राप्त करना चाहिए; मैं तब तक आराम नहीं करूँगा, जब तक मैं उसे प्राप्त नहीं कर लेता।" क्या तुम इस तरह का संकल्प रखते हो?

परमेश्वर पर विश्वास करने का मार्ग उससे प्रेम करने का मार्ग ही है। यदि तुम उस पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उससे प्रेम करना ही चाहिए; हालाँकि उससे प्रेम करने का तात्पर्य केवल उसके प्रेम का प्रतिदान करना या उससे अपने विवेक की भावनाओं के आधार पर प्रेम करना नहीं है—यह परमेश्वर के लिए शुद्ध प्रेम है। कभी-कभी लोग सिर्फ अपने विवेक के आधार पर परमेश्वर के प्रेम को महसूस करने में सक्षम नहीं होते। मैंने हमेशा क्यों कहा : "परमेश्वर का आत्मा हमारी आत्माओं को प्रेरित करे"? मैंने परमेश्वर से प्रेम करने के लिए लोगों के विवेक को प्रेरित करने की बात क्यों नहीं की? इसका कारण यह है कि लोगों का विवेक परमेश्वर की मनोहरता को महसूस नहीं कर सकता। यदि तुम इन वचनों से आश्वस्त नहीं हो, तो उसके प्रेम को महसूस करने के लिए अपने विवेक का उपयोग करो। उस पल तुम्हारे पास कुछ प्रेरणा हो सकती है, लेकिन वह जल्दी ही गायब हो जाएगी। यदि तुम परमेश्वर की मनोहरता को महसूस करने के लिए केवल अपने विवेक का उपयोग करते हो, तो प्रार्थना करते समय तो तुम प्रेरणा प्राप्त करोगे, लेकिन उसके बाद जल्दी ही वह चली जाएगी और गायब हो जाएगी। ऐसा क्यों होता है? यदि तुम केवल अपने विवेक का उपयोग करते हो, तो तुम परमेश्वर के लिए अपना प्रेम जगाने में असमर्थ होगे; जब तुम वास्तव में अपने हृदय में उसकी मनोहरता महसूस करते हो, तो तुम्हारी आत्मा उसके द्वारा प्रेरित होगी, और केवल उसी समय तुम्हारा विवेक अपनी मूल भूमिका निभाने में सक्षम होगा। अर्थात जब परमेश्वर मनुष्य की आत्मा को प्रेरित करता है और जब मनुष्य के पास ज्ञान होता है और वह हृदय में प्रोत्साहित होता है, अर्थात जब वह अनुभव प्राप्त कर लेता है, केवल तभी वह अपने विवेक से परमेश्वर को प्रभावी रूप से प्रेम करने में सक्षम होगा। अपने विवेक से परमेश्वर से प्रेम करना गलत नहीं है—यह परमेश्वर को प्रेम करने का सबसे निम्न स्तर है। "परमेश्वर के अनुग्रह के प्रति बस इंसाफ करते हुए" प्रेम करना मनुष्य को सक्रिय ढंग से प्रवेश करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता। जब लोग पवित्र आत्मा का कुछ कार्य प्राप्त करते हैं, यानी जब वे अपने व्यावहारिक अनुभव में परमेश्वर का प्रेम देखते और अनुभव करते हैं, जब उन्हें परमेश्वर का कुछ ज्ञान होता है और वे वास्तव में देखते हैं कि परमेश्वर मानव-जाति के प्रेम के कितना योग्य है और वह कितना प्यारा है, केवल तभी वे परमेश्वर को सच में प्रेम करने में सक्षम होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है' से उद्धृत

परमेश्वर मनुष्य का न्याय करता है और उसे ताड़ना देता है क्योंकि यह उसके कार्य की मांग है, और मनुष्य को इसकी आवश्यकता भी है। मनुष्य को ताड़ना दिए जाने और उसका न्याय किए जाने की आवश्यकता है, तभी वह परमेश्वर से प्रेम कर सकता है। आज, तुम लोग पूरी तरह से आश्वस्त हो चुके हो, लेकिन जैसे ही थोड़ी-सी मुश्किल आती है, तो तुम परेशान हो जाते हो; तुम्हारा आध्यात्मिक कद अभी भी बहुत छोटा है, और गहरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए तुम लोगों को अभी भी ऐसी ताड़ना और न्याय का अनुभव करने की आवश्यकता है। आज, तुम लोगों में परमेश्वर के प्रति थोड़ी श्रद्धा है, तुम परमेश्वर का भय मानते हो, और जानते हो कि वह सच्चा परमेश्वर है, परंतु तुम लोगों में उसके लिए प्रगाढ़ प्रेम नहीं है, और तुमने उससे शुद्ध प्रेम तो किया ही नहीं है; तुम लोगों का ज्ञान बहुत ही सतही है, और तुम्हारा आध्यात्मिक कद अभी भी नाकाफी है। जब तुम लोग सचमुच किसी स्थिति का सामना करते हो, तो तुम अब तक गवाही नहीं दे सके हो, तुम्हारा प्रवेश बहुत कम सक्रिय है, और तुममें अभ्यास करने की कोई समझ नहीं है। अधिकतर लोग निष्क्रिय और सुस्त होते हैं; वे केवल गुप्त रूप से अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, किंतु उनके पास अभ्यास का कोई तरीका नहीं होता, न ही वे अपने लक्ष्यों को लेकर स्पष्ट होते हैं। पूर्ण बनाए गए लोगों में न केवल सामान्य मानवता होती है, बल्कि उनमें ऐसे सत्य होते हैं जो चेतना के मापदंडों से बढ़कर होते हैं, और जो चेतना के मानकों से ऊँचे हैं; वे परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल देने के लिए न केवल अपनी चेतना का इस्तेमाल करते हैं, बल्कि, वे परमेश्वर को जान चुके होते हैं, यह देख चुके होते हैं कि परमेश्वर प्रिय है, वह मनुष्य के प्रेम के योग्य है, परमेश्वर में प्रेम करने योग्य इतना कुछ है कि मनुष्य उसे प्रेम किए बिना नहीं रह सकता! वे लोग जिन्हें पूर्ण बनाया जा चुका है उनका परमेश्वर के लिए प्रेम उनकी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए है। उनका प्रेम स्वैच्छिक है, एक ऐसा प्रेम जो बदले में कुछ भी नहीं चाहता, और जो सौदेबाज़ी नहीं है। परमेश्वर से उनके प्रेम का कारण उसके बारे में उनके ज्ञान को छोड़कर और कुछ भी नहीं है। ऐसे लोग यह परवाह नहीं करते कि परमेश्वर उन पर अनुग्रह करेगा कि नहीं, और वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के सिवा और किसी भी चीज से तृप्त नहीं होते हैं। वे परमेश्वर से मोल-भाव नहीं करते, न ही वे परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को चेतना से मापते हैं : "तुमने मुझे दिया है, तो उसके बदले में मैं तुमसे प्रेम करता हूँ; यदि तुम मुझे कुछ नहीं देते, तो बदले में मेरे पास भी तुम्हेँ देने के लिए कुछ नहीं है।" जिन्हें पूर्ण बनाया गया है, वे हमेशा यह विश्वास करते हैं : "परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, और वह हम पर अपना कार्य करता है। चूँकि मेरे पास पूर्ण बनाए जाने का यह अवसर, परिस्थिति और योग्यता है, इसीलिए एक अर्थपूर्ण जीवन बिताना ही मेरा लक्ष्य होना चाहिए, और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए।" यह बिलकुल वैसा ही है जैसा पतरस ने अनुभव किया था : जब वह सबसे कमजोर स्थिति में था, तब उसने प्रार्थना की और कहा, "हे परमेश्वर! तू जानता है कि मैंने समय और स्थान की परवाह न करते हुए, हमेशा तुझे याद किया है। तू जानता है कि चाहे कोई भी समय और स्थान हो, मैं तुझसे प्रेम करना चाहता हूँ, परंतु मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, मैं बहुत कमजोर और शक्तिहीन हूँ, मेरा प्रेम बहुत सीमित है, और तेरे प्रति मेरी सत्यनिष्ठा बहुत कम है। तेरे प्रेम की तुलना में, मैं जीने के योग्य भी नहीं हूँ। मैं केवल यही कामना करता हूँ कि मेरा जीवन व्यर्थ न हो, और मैं न केवल तेरे प्रेम का प्रतिफल दे सकूँ, बल्कि, इसके अतिरिक्त जो कुछ भी मेरे पास है वह सब तुझे समर्पित कर सकूँ। यदि मैं तुझे संतुष्ट कर सकूँ, तो एक प्राणी के नाते, मेरे मन में शांति होगी, और मैं कुछ और नहीं मांगूंगा। यद्यपि अभी मैं कमजोर और शक्तिहीन हूँ, फिर भी मैं तेरे उपदेशों को नहीं भूलूंगा, और मैं तेरे प्रेम को नहीं भूलूंगा। अभी तो मैं बस तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के सिवा कुछ और नहीं कर रहा हूँ। हे परमेश्वर, मुझे बहुत बुरा लग रहा है! मेरे हृदय में तेरे लिए जो प्रेम है उसे मैं तुझे वापस कैसे लौटा सकता हूँ, मेरी क्षमता में जो भी है उसे मैं कैसे कर सकता हूँ, मैं तेरी इच्छाओं को पूरा करने के योग्य कैसे बन सकता हूँ, और जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब कुछ तुझे भेंट चढ़ाने के योग्य कैसे बन सकता हूँ? तू मनुष्य की कमजोरी को जानता है; मैं तेरे प्रेम के काबिल कैसे हो सकता हूँ? हे परमेश्वर! तू जानता है कि मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, मेरा प्रेम बहुत थोड़ा-सा है। इस प्रकार की परिस्थितियों में मैं अपनी क्षमतानुसार सर्वोत्तम कार्य कैसे कर सकता हूँ? मैं जानता हूँ कि मुझे तेरे प्रेम का प्रतिफल देना चाहिए, मैं जानता हूँ कि मुझे वह सब कुछ देना चाहिए जो मेरे पास है, परंतु आज मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है। मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू मुझे सामर्थ्य और आत्मविश्वास दे, जिससे तुझे अर्पित करने के लिए मैं और अधिक शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने के काबिल हो जाऊँ, और जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब कुछ अर्पित कर पाऊँ; न केवल मैं तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के योग्य हो जाऊँगा, बल्कि तेरी ताड़ना, न्याय और परीक्षणों, यहाँ तक कि कठिन अभिशापों का भी अनुभव करने के योग्य हो जाऊँगा। तूने मुझे अपना प्रेम दिखा दिया, और मैं ऐसा नहीं कर सकता कि तुझसे प्रेम न करूँ। आज भले ही मैं कमजोर और शक्तिहीन हूँ, फिर भी मैं तुझे कैसे भूल सकता हूँ? तेरे प्रेम, ताड़ना और न्याय से मैंने तुझे जाना है, फिर भी तेरे प्रेम की पूर्ति करने में मैं खु़द को असमर्थ पा रहा हूँ, क्योंकि तू महान है। जो कुछ मेरे पास है, वह सब-कुछ मैं सृष्टिकर्ता को कैसे अर्पित कर सकता हूँ?" पतरस की विनती ऐसी थी, फिर भी उसका आध्यात्मिक कद बहुत मामूली था। उस क्षण, उसने ऐसा महसूस किया मानो एक कटार उसके हृदय के आर-पार हो गई हो। वह अत्यंत दुखी था; वह नहीं जानता था कि ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए। फिर भी वह लगातार प्रार्थना करता रहा : "हे परमेश्वर! मनुष्य का आध्यात्मिक कद एक बच्चे जैसा है, उसकी चेतना बहुत कमजोर है, और तेरा प्रेम ही एकमात्र ऐसी चीज है जिसका प्रतिफल मैं दे सकता हूँ। आज, मैं नहीं जानता कि तेरी इच्छाओं को कैसे संतुष्ट करूँ, और मैं बस वह सब करना चाहता हूँ जो मैं कर सकता हूँ, वह सब तुझे देना चाहता हूँ जो मेरे पास है और अपना सब-कुछ तुझे अर्पित कर देना चाहता हूँ। तेरे न्याय के बावजूद, तेरी ताड़नाओं के बावजूद, इसके बावजूद कि तू मुझे क्या देता है, इसके बावजूद कि तू मुझसे क्या ले लेता है, मुझे तेरे प्रति जरा-सी भी शिकायत से मुक्त कर दे। कई बार, जब तूने मुझे ताड़ना दी और मेरा न्याय किया, तो मैं मन ही मन भुनभुनाया करता था, और मैं शुद्ध नहीं हो पाता था या तेरी इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पाता था। मैंने मजबूरी में ही तेरे प्रेम का प्रतिफल दिया था, और इस क्षण मैं अपने-आपसे और भी अधिक नफरत कर रहा हूँ।" चूँकि पतरस परमेश्वर से अधिक शुद्ध प्रेम करने का प्रयास कर रहा था, इसलिए उसने ऐसी प्रार्थना की थी। वह खोज रहा था, और विनती कर रहा था, उससे भी बढ़कर, वह खुद को दोष दे रहा था, परमेश्वर के सामने अपने पापों को स्वीकार कर रहा था। उसने महसूस किया कि वह परमेश्वर का ऋणी है, उसे अपने-आपसे नफरत होने लगी, लेकिन वह थोड़ा उदास और निढाल भी था। उसे हमेशा ऐसा महसूस होता था, मानो वह परमेश्वर की इच्छाओं को पूरा करने लायक नहीं है, और वह अपना सर्वोत्तम देने में असमर्थ है। ऐसी स्थितियों में, पतरस ने अय्यूब के विश्वास का ही अनुसरण किया। उसने देखा था कि अय्यूब का विश्वास कितना बड़ा था, क्योंकि अय्यूब ने जान लिया था कि उसका सब कुछ परमेश्वर का दिया हुआ है, और अगर परमेश्वर सब कुछ वापस ले लेता है तो यह स्वभाविक ही है, परमेश्वर जिसको चाहेगा उसको देगा—ऐसा था परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव। अय्यूब ने कोई शिकायत नहीं की थी, और वह तब भी परमेश्वर की स्तुति कर रहा था। पतरस भी अपने-आपको जानता था, उसने मन ही मन प्रार्थना की, "आज अपनी चेतना का इस्तेमाल करके और तेरे प्रेम का बदला चुका कर मुझे संतुष्ट नहीं होना चाहिए, मैं तुझे चाहे जितना प्रेम वापस लौटाऊँ उससे भी मुझे संतुष्ट नहीं होना चाहिए, क्योंकि मेरे विचार बहुत ही भ्रष्ट हैं, और मैं तुझे सृष्टिकर्ता के रूप में देख पाने में असमर्थ हूँ। क्योंकि मैं अभी भी तुझसे प्रेम करने योग्य नहीं हूँ, मुझे वह योग्यता हासिल करनी होगी जिससे मेरे पास जो भी है, वह सब कुछ मैं तुझे अर्पित कर सकूँ, और मैं यह खुशी से करूँगा। मुझे वह सब कुछ जानना होगा जो तूने किया है, और मेरे पास कोई और विकल्प नहीं है, मुझे तेरे प्रेम को देखना होगा, मुझे तेरी स्तुति करने और तेरे पवित्र नाम का गुणगान करने के योग्य होना होगा, ताकि तू मेरे ज़रिए महान महिमा प्राप्त कर सके। मैं तेरी इस गवाही में मजबूती के साथ खड़ा होने को तैयार हूँ। हे परमेश्वर! तेरा प्रेम कितना बहुमूल्य और सुंदर है; मैं उस दुष्ट के हाथों में जीने की कामना कैसे कर सकता था? क्या मुझे तूने नहीं बनाया था? मैं शैतान के अधीन कैसे रह सकता था? मैं अपने समूचे अस्तित्व के साथ तेरी ताड़नाओं में रहना अधिक पसंद करूंगा। मैं उस दुष्ट के अधीन नहीं जीना चाहता। यदि मुझे पवित्र बनाया जा सके और यदि मैं अपना सब कुछ तुझे अर्पित कर सकूँ, तो मैं अपने शरीर और मन को तेरे न्याय और ताड़ना की भेंट चढ़ाने को तैयार हूँ, क्योंकि मैं शैतान से घृणा करता हूँ, मैं उसके अधीन जीवन बिताने को तैयार नहीं हूँ। मेरा न्याय करके तू अपना धार्मिक स्वभाव दर्शाता है; मैं खुश हूँ, और मुझे जरा-सी भी शिकायत नहीं है। यदि मैं एक प्राणी होने के कर्तव्य को निभा सकूँ, तो मैं तैयार हूँ कि मेरा संपूर्ण जीवन तेरे न्याय से जुड़ जाए, जिसके जरिए मैं तेरे धार्मिक स्वभाव को जान पाऊँगा, और शैतान के प्रभाव से अपने-आपको छुड़ा पाऊँगा।" पतरस ने हमेशा इस प्रकार प्रार्थना की, हमेशा इस प्रकार ही खोज की, और सापेक्ष रूप से कहें तो, वह एक ऊँचे आयाम पर पहुँच गया। वह न केवल परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल दे पाया, बल्कि, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसने एक प्राणी के तौर पर भी अपना कर्तव्य निभाया। न केवल उसकी चेतना ने उसे दोषी नहीं ठहराया, बल्कि वह चेतना के मानकों से भी ऊँचा उठ सका। उसकी प्रार्थनाएँ लगातार ऊपर परमेश्वर के सामने पहुँचती रहीं, कुछ इस तरह कि उसकी आकांक्षाएँ और भी ऊँची हो गईं, और परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम और भी विशाल हो गया। यद्यपि उसने भयानक पीड़ा सही, फिर भी वह परमेश्वर से प्रेम करना नहीं भूला, और फिर भी उसने परमेश्वर की इच्छा को समझने की क्षमता प्राप्त करने का प्रयास किया। अपनी प्रार्थनाओं में उसने ये बातें कहीं : तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के अलावा मैंने और कुछ नहीं किया है। "मैंने शैतान के सामने तेरे लिए गवाही नहीं दी है, मैंने अपने-आपको शैतान के प्रभाव से आजाद नहीं किया है, और मैं अब भी देह की इच्छाओं में ही जी रहा हूँ। मैं अपने प्रेम का इस्तेमाल करके शैतान को हराने की, उसे लज्जित करने की, और इस प्रकार तेरी इच्छा को संतुष्ट करने की कामना कर रहा हूँ। मैं तुझे अपना सर्वस्व अर्पित करना चाहता हूँ, मैं अपना थोड़ा-सा भी अंश शैतान को नहीं देना चाहता, क्योंकि शैतान तेरा शत्रु है।" उसने इस दिशा में जितना ज्यादा प्रयास किया, उतना ही ज्यादा वह प्रेरित हुआ, और उतना ही ज्यादा इन विषयों पर उसका ज्ञान बढ़ता गया। इसका अहसास किए बिना ही, उसे यह ज्ञान हो गया कि उसे अपने-आपको शैतान के प्रभाव से मुक्त कर लेना चाहिए, और पूरी तरह परमेश्वर के पास लौट आना चाहिए। उसने ऐसा आयाम हासिल कर लिया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

अब तुम्हें उस मार्ग को स्पष्ट रूप से देखने में समर्थ हो जाना चाहिए, जिस पर पतरस चला था। यदि तुम पतरस के मार्ग को स्पस्ट रूप देख सको, तो तुम उस कार्य के बारे में निश्चित होगे जो आज किया जा रहा है, इसलिए तुम शिकायत नहीं करोगे या निष्क्रिय नहीं होगे, या किसी भी चीज़ की लालसा नहीं करोगे। तुम्हें पतरस की उस समय की मनोदशा का अनुभव करना चाहिए : वह दुख से त्रस्त था; उसने फिर कोई भविष्य या आशीष नहीं माँगा। उसने सांसारिक लाभ, प्रसन्नता, प्रसिद्धि या धन-दौलत की कामना नहीं की; उसने केवल सर्वाधिक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहा, जो कि परमेश्वर के प्रेम को चुकाने और परमेश्वर को अपनी सबसे अधिक बहुमूल्य वस्तु समर्पित करने के लिए था। तब वह अपने हृदय में संतुष्ट होता। उसने प्रायः इन शब्दों में यीशु से प्रार्थना की : "प्रभु यीशु मसीह, मैंने एक बार तुझे प्रेम किया था, किंतु मैंने तुझे वास्तव में प्रेम नहीं किया था। यद्यपि मैंने कहा था कि मुझे तुझ पर विश्वास है, किंतु मैंने तुझे कभी सच्चे हृदय से प्रेम नहीं किया। मैंने केवल तुझे देखा, तुझे सराहा, और तुझे याद किया, किंतु मैंने कभी तुझे प्रेम नहीं किया, न ही तुझ पर वास्तव में विश्वास किया।" अपना संकल्प करने के लिए उसने लगातार प्रार्थना की, और वह यीशु के वचनों से हमेशा प्रोत्साहित होता और उनसे प्रेरणा प्राप्त करता। बाद में, एक अवधि तक अनुभव करने के बाद, यीशु ने अपने लिए उसमें और अधिक तड़प पैदा करते हुए उसकी परीक्षा ली। उसने कहा : "प्रभु यीशु मसीह! मैं तुझे कितना याद करता हूँ, और तुझे देखने के लिए कितना लालायित रहता हूँ। मुझमें बहुत कमी है, और मैं तेरे प्रेम का बदला नहीं चुका सकता। मैं तुझसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे शीघ्र ले जा। तुझे मेरी कब आवश्यकता होगी? तू मुझे कब ले जाएगा? मैं कब एक बार फिर तेरा चेहरा देखूँगा? मैं भ्रष्ट होते रहने के लिए इस शरीर में अब और नहीं जीना चाहता, न ही अब और विद्रोह करना चाहता हूँ। मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब मैं यथाशीघ्र तुझे समर्पित करने के लिए तैयार हूँ, और अब मैं तुझे और दुखी नहीं करना चाहता।" उसने इसी तरह से प्रार्थना की, किंतु उस समय वह नहीं जानता था कि यीशु उसमें क्या पूर्ण करेगा। उसकी परीक्षा की पीड़ा के दौरान, यीशु पुनः उसके सामने प्रकट हुआ और बोला : "पतरस, मैं तुझे पूर्ण बनाना चाहता हूँ, इस तरह कि तू फल का एक टुकड़ा बन जाए, जो मेरे द्वारा तेरी पूर्णता का ठोस रूप हो, और जिसका मैं आनंद लूँगा। क्या तू वास्तव में मेरे लिए गवाही दे सकता है? क्या तूने वह किया, जो मैं तुझे करने के लिए कहता हूँ? क्या तूने मेरे कहे वचनों को जिया है? तूने एक बार मुझे प्रेम किया, किंतु यद्यपि तूने मुझे प्रेम किया, पर क्या तूने मुझे जिया है? तूने मेरे लिए क्या किया है? तू महसूस करता है कि तू मेरे प्रेम के अयोग्य है, पर तूने मेरे लिए क्या किया है?" पतरस ने देखा कि उसने यीशु के लिए कुछ नहीं किया था, और परमेश्वर को अपना जीवन देने की पिछली शपथ स्मरण की। और इसलिए, उसने अब और शिकायत नहीं की, और तब से उसकी प्रार्थनाएँ और अधिक बेहतर हो गईं। उसने यह कहते हुए प्रार्थना की : "प्रभु यीशु मसीह! एक बार मैंने तुझे छोड़ा था, और एक बार तूने भी मुझे छोड़ा था। हमने अलग होकर, और साहचर्य में एक-साथ, समय बिताया है। फिर भी तू मुझे अन्य सभी की अपेक्षा सबसे ज्यादा प्रेम करता है। मैंने बार-बार तेरे विरुद्ध विद्रोह किया है और तुझे बार-बार दुःखी किया है। ऐसी बातों को मैं कैसे भूल सकता हूँ? जो कार्य तूने मुझ पर किया है और जो कुछ तूने मुझे सौंपा है, मैं उसे हमेशा मन में रखता हूँ, और कभी नहीं भूलता। जो कार्य तूने मुझ पर किया है, उसके लिए मैंने वह सब किया है, जो मैं कर सकता हूँ। तू जानता है कि मैं क्या कर सकता हूँ, और तू यह भी जानता है कि मैं क्या भूमिका निभा सकता हूँ। मैं तेरे आयोजनों को समर्पित होना चाहता हूँ और मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब मैं तुझे समर्पित कर दूँगा। केवल तू ही जानता है कि मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूँ। यद्यपि शैतान ने मुझे बहुत मूर्ख बनाया और मैंने तेरे विरुद्ध विद्रोह किया, किंतु मुझे विश्वास है कि तू मुझे उन अपराधों के लिए स्मरण नहीं करता, और कि तू मेरे साथ उनके आधार पर व्यवहार नहीं करता। मैं अपना संपूर्ण जीवन तुझे समर्पित करना चाहता हूँ। मैं कुछ नहीं माँगता, और न ही मेरी अन्य आशाएँ या योजनाएँ हैं; मैं केवल तेरे इरादे के अनुसार कार्य करना चाहता हूँ और तेरी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ। मैं तेरे कड़वे कटोरे में से पीऊँगा और मैं तेरे आदेश के लिए हूँ।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस ने यीशु को कैसे जाना' से उद्धृत

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