18. परमेश्वर पर निर्भर करने और उसी के भरोसे रहने के सिद्धांत

(1) यह जानना कि परमेश्वर ने सभी को बनाया है और सब पर उसी की प्रभुता है, और यह विश्वास रखना है कि सभी घटनाएँ और चीज़ें उसी के हाथों में हैं, आवश्यक है। केवल इसी प्रकार कोई वास्तव में उस पर निर्भर हो सकता और उसके भरोसे रह सकता है;

(2) परमेश्वर पर निर्भर करने और उसी के भरोसे रहने के अभ्यास के माध्यम से, कोई भी व्यक्ति अपने कर्मों को देख सकता है और परमेश्वर की सर्वशक्तिमानता और उसके ज्ञान को जान सकता है, जिससे धीरे-धीरे उसके प्रति श्रद्धा और समर्पण उत्पन्न होते हैं;

(3) मसीह को महान मानकर ऊँचा उठाना आवश्यक है। केवल मसीह ही सत्य को व्यक्त कर सकता है। इस विश्वास के साथ कि परमेश्वर के वचन सब कुछ पूरा करते हैं, व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मसीह का अनुसरण करने और गवाही देने में सक्षम हो जाता है;

(4) जब परीक्षाओं और क्लेशों का सामना करना पड़े, तो उसकी इच्छा को समझने के प्रयास में, सत्य की तलाश करना और उसके वचनों के अनुसार परमेश्वर से प्रार्थना करना आवश्यक है। केवल सत्य को व्यवहार में लाने के माध्यम से कोई अपनी गवाही में दृढ़ रह सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

सर्वशक्तिमान परमेश्वर सभी चीज़ों और घटनाओं पर वर्चस्व रखता है! जब तक हमारे दिल हर वक्त उसकी ओर देखते हैं और हम आत्मा में प्रवेश करते हैं और उसके साथ सहभागिता करते हैं, तब तक वह हमें उन सभी चीज़ों को दिखाएगा जिन्हें हम चाहते हैं और उसकी इच्छा का हमारे सामने प्रकट होना निश्चित है; तब हमारे दिल आनंद और शांति में होंगे, और पूर्ण स्पष्टता के साथ स्थिर होंगे। उसके वचनों के अनुसार कार्य करने में सक्षम होना अत्यंत महत्वपूर्ण है; उसकी इच्छा को समझने और उसके वचनों पर निर्भर रहकर जीने में सक्षम होना—केवल यही सच्चा अनुभव है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 7' से उद्धृत

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, समस्त पदार्थों का मुखिया, अपने सिंहासन से अपनी राजसी शक्ति का निर्वहन करता है। वह समस्त ब्रह्माण्ड और सब वस्तुओं पर राज और सम्पूर्ण पृथ्वी पर हमारा मार्गदर्शन करता है। हम हर क्षण उसके समीप होंगे, और एकांत में उसके सम्मुख आयेंगे, एक पल भी नहीं खोयेंगे और हर समय कुछ न कुछ सीखेंगे। हमारे इर्द-गिर्द के वातावरण से लेकर लोग, विभिन्न मामले और वस्तुएँ, सबकुछ उसके सिंहासन की अनुमति से अस्तित्व में हैं। किसी भी वजह से अपने दिल में शिकायतें मत पनपने दो, अन्यथा परमेश्वर तुम्हें अनुग्रह प्रदान नहीं करेगा। बीमारी का होना परमेश्वर का प्रेम ही है और निश्चित ही उसमें उसके नेक इरादे निहित होते हैं। हालाँकि, हो सकता है कि तुम्हारे शरीर को कुछ पीड़ा सहनी पड़े, लेकिन कोई भी शैतानी विचार मन में मत लाओ। बीमारी के मध्य परमेश्वर की स्तुति करो और अपनी स्तुति के मध्य परमेश्वर में आनंदित हो। बीमारी की हालत में निराश न हो, खोजते रहो और हिम्मत न हारो, और परमेश्वर तुम्हें अपने प्रकाश से रोशन करेगा। अय्यूब का विश्वास कैसा था? सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक सर्वशक्तिशाली चिकित्सक है! बीमारी में रहने का मतलब बीमार होना है, परन्तु आत्मा में रहने का मतलब स्वस्थ होना है। जब तक तुम्हारी एक भी सांस बाकी है, परमेश्वर तुम्हें मरने नहीं देगा।

पुनरुत्थित मसीह का जीवन हमारे भीतर है। निस्संदेह, परमेश्वर की उपस्थिति में हममें विश्वास की कमी रहती है : परमेश्वर हममें सच्चा विश्वास जगाये। परमेश्वर के वचन निश्चित ही मधुर हैं! परमेश्वर के वचन गुणकारी दवा हैं! वे दुष्टों और शैतान को शर्मिन्दा करते हैं! परमेश्वर के वचनों को समझने से हमें सहारा मिलता है। उसके वचन हमारे हृदय को बचाने के लिए शीघ्रता से कार्य करते हैं! वे शेष सब बातों को दूर कर सर्वत्र शान्ति बहाल करते हैं। विश्वास एक ही लट्ठे से बने पुल की तरह है: जो लोग घृणास्पद ढंग से जीवन से चिपके रहते हैं उन्हें इसे पार करने में परेशानी होगी, परन्तु जो आत्म बलिदान करने को तैयार रहते हैं, वे बिना किसी फ़िक्र के, मज़बूती से कदम रखते हुए उसे पार कर सकते हैं। अगर मनुष्य कायरता और भय के विचार रखते हैं तो ऐसा इसलिए है कि शैतान ने उन्हें मूर्ख बनाया है क्योंकि उसे इस बात का डर है कि हम विश्वास का पुल पार कर परमेश्वर में प्रवेश कर जायेंगे। शैतान अपने विचारों को हम तक पहुँचाने का हर संभव प्रयास कर रहा है। हमें हर पल परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें अपने प्रकाश से रोशन करे, अपने भीतर मौजूद शैतान के ज़हर से छुटकारा पाने के लिए हमें हर पल परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए। हमें हमेशा अपनी आत्मा के भीतर यह अभ्यास करना चाहिए कि हम परमेश्वर के निकट आ सकें और हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व पर परमेश्वर का प्रभुत्व होने देना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 6' से

तुझे सकारात्मक की तरफ़ से प्रवेश प्राप्त करना चाहिए। यदि तू हाथ पर हाथ धरे प्रतीक्षा करता है, तो तू अब भी नकारात्मक हो रहा है। तुझे आगे बढ़कर मेरे साथ सहयोग करना चाहिए; मेहनती बन, और आलसी कभी न बन। सदैव मेरी संगति में रह और मेरे साथ कहीं अधिक गहरी अंतरंगता प्राप्त कर। यदि तेरी समझ में नहीं आता है, तो त्वरित परिणामों के लिए अधीर मत बन। ऐसा नहीं है कि मैं तुझे नहीं बताऊँगा; बात यह है कि मैं देखना चाहता हूँ कि जब तू मेरी उपस्थिति में होता है क्या केवल तभी तू मुझ पर भरोसा करता है; और मुझ पर अपनी निर्भरता में तू आत्मविश्वास से पूर्ण है या नहीं। तुझे सदैव मेरे निकट रहना चाहिए और सभी विषय मेरे हाथों में रख देने चाहिए। खाली हाथ वापस मत जा। जब तू कुछ समयावधि के लिए बिना जाने-बूझे मेरे निकट रह लिया होगा, उसके पश्चात मेरे इरादे तुझ पर प्रकट होंगे। यदि तू उन्हें समझ लेता है, तो तू वास्तव में मेरे आमने-सामने होगा, और तूने वास्तव में मेरा चेहरे पा लिया होगा। तेरे भीतर अधिक स्पष्टता और दृढ़ता होगी, और तेरे पास भरोसा करने के लिए कुछ होगा। तब तेरे पास सामर्थ्य के साथ-साथ आत्मविश्वास भी होगा, तेरे पास आगे का मार्ग भी होगा। हर चीज़ तेरे लिए आसान हो जाएगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 9' से उद्धृत

कोई हिचकिचाहट मत रखो, निराश या दुर्बल मत बनो। अपनी आत्मा में सीधे मेरे साथ अधिक सहभागिता करो, धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करो और मैं निश्चित रूप से अपने समय के अनुसार तुम्हारे सामने प्रकट हूँगा। तुम्हें, पूरी तरह से ध्यान रखना होगा और मेरे प्रयासों को तुम पर बर्बाद नहीं होने देना है; और एक पल को भी खोना नहीं। जब तुम्हारा दिल मेरे साथ निरंतर सहभागिता में रहता है, जब तुम्हारा दिल लगातार मेरे सामने रहता है, तो कोई भी व्यक्ति, कोई भी घटना, कोई भी बात, कोई पति, बेटा या बेटी तुम्हारे दिल में मेरे साथ सहभागिता करने में विघ्न नहीं डाल सकते। जब तुम्हारा दिल पवित्र आत्मा द्वारा लगातार प्रतिबंधित किया जाएगा और जब तुम हर पल मेरे साथ सहभागिता करोगे, तो मेरी इच्छा निश्चित रूप से तुम्हारे लिए प्रकट की जाएगी। जब तुम लगातार इस तरह से मेरे करीब आते हो, चाहे तुम्हारा परिवेश कैसा भी हो या तुम्हें किसी भी व्यक्ति, घटना या चीज़ का सामना करना पड़े, तुम भ्रमित नहीं होगे बल्कि तुम्हारे पास आगे बढ़ने का एक मार्ग होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 8' से उद्धृत

जो कुछ भी वर्तमान में व्यवस्थित किया गया है वह तुम लोगों को प्रशिक्षित करने के लिए है, ताकि तुम लोग अपने जीवन में विकास कर सको, अपनी आत्माओं को उत्सुक और तीक्ष्ण कर सको, अपनी आध्यात्मिक आंखों को खोल सको ताकि उन चीज़ों को पहचान सको जो परमेश्वर से आती हैं। परमेश्वर से आने वाली हर चीज़ तुम्हें क्षमता और बोझ के साथ सेवा करने और आत्मा में दृढ़ होने में सक्षम बनाती है। जो चीज़ें मुझसे नहीं आतीं वे खाली हैं; वे तुम्हें कुछ नहीं देतीं, वे तुम्हारी आत्मा में एक शून्य पैदा कर देती हैं, तुम्हारा विश्वास खत्म कर देती हैं और तुम्हारे और मेरे बीच दूरी पैदा कर देती हैं, तुम्हें अपने ही मस्तिष्क में फंसा देती हैं। जब तुम आत्मा में जीते हो, तो धर्मनिरपेक्ष विश्व में हर चीज़ से ऊपर उठ सकते हो, लेकिन अपने मस्तिष्क में जीने का अर्थ है शैतान द्वारा कब्ज़ा; यह एक बंद गली है। अब यह बहुत सरल है : मुझे अपने दिल से देखो, तुम्हारी आत्मा तुरंत मजबूत हो जाएगी। तुम्हारे पास अभ्यास करने का मार्ग होगा और मैं हर कदम पर तुम्हारा मार्गदर्शन करूंगा। मेरा वचन हर समय और हर स्थान पर तुम्हारे लिए प्रकट किया जाएगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कहाँ या कब, या वातावरण कितना प्रतिकूल है, मैं तुम्हें स्पष्टता से दिखाऊंगा और मेरा दिल तुम्हारे लिए प्रकट किया जाएगा, यदि तुम मेरी ओर अपने दिल से देखते हो; इस तरह, तुम रास्ते में आगे निकल जाओगे और कभी अपने रास्ते से नहीं भटकोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 13' से उद्धृत

ऐसा नहीं कि तुम्हारा विश्वास अच्छा और शुद्ध है, बल्कि मेरा कार्य चमत्कारी है! यह सब-कुछ मेरी दया के कारण है! तुममें स्वार्थ या दंभ का जरा-सा भी भ्रष्ट स्वभाव नहीं होना चाहिए, वरना मैं तुम पर कार्य नहीं करूँगा। तुम्हें स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि मनुष्य चाहे गिरें या दृढ़ता से खड़े रहें, यह उनकी वजह से नहीं है, यह मेरी वजह से है। आज अगर तुम इस कदम को स्पष्ट रूप से नहीं समझते, तो तुम निश्चय ही राज्य में प्रवेश करने में असफल हो जाओगे! तुम्हें यह अवश्य समझना चाहिए कि आज जो किया जा रहा है, वह परमेश्वर का चमत्कारी कार्य है; इसका मनुष्य से कुछ लेना-देना नहीं। मनुष्य के कार्य क्या महत्व रखते हैं? जब वे स्वार्थी, दंभी और अभिमानी नहीं होते, तब वे परमेश्वर के प्रबंधन को बाधित और उसकी योजनाओं को नष्ट कर रहे होते हैं। अरे, भ्रष्ट जनो! तुम्हें आज मुझ पर भरोसा अवश्य करना चाहिए; अगर तुम नहीं करते, तो आज मैं तुम्हें बताऊँगा कि तुम कभी कुछ हासिल नहीं कर पाओगे! सब-कुछ व्यर्थ होगा और तुम्हारे उपक्रम मूल्यहीन होंगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 38' से उद्धृत

लोग अपना अधिकांश समय अचेतावस्था में रहते हुए बिताते हैं। उन्हें पता नहीं होता कि उन्हें परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए या स्वयं पर। फिर वे स्वयं पर और अपने आसपास की लाभकारी स्थितियों और वातावरण पर, और साथ ही अपने लिए लाभदायक किन्हीं भी लोगों, घटनाओं, और चीज़ों पर भरोसा करना चुनने की ओर प्रवृत्त होते हैं। बस इसी में लोग सबसे निपुण होते हैं। जिसमें वे सबसे निकृष्ट हैं, वह है परमेश्वर पर भरोसा करना और उसका आदर करना, क्योंकि उन्हें लगता है कि परमेश्वर का आदर करना बहुत ज़हमत मोल लेना है-वे देख नहीं सकते, वे छू नहीं सकते-और उन्हें लगता है कि ऐसा करना अस्पष्ट और अवास्तविक है। इस प्रकार, अपनी शिक्षाओं के इस पहलू में, लोग सबसे निकृष्ट प्रदर्शन करते हैं, और इसमें उनका प्रवेश सबसे उथला होता है। अगर तुम परमेश्वर का आदर करना और उस पर भरोसा करना नहीं सीखते, तो तुम अपने भीतर परमेश्वर के कार्य को तुम्हारा मार्गदर्शन, या तुम्हारा प्रबोधन करते कभी नहीं देख पाओगे। अगर तुम इन चीज़ों को नहीं देख सकते, तो ऐसे प्रश्न कि "परमेश्वर विद्यमान है या नहीं और वह मानवजाति के जीवन में हर चीज़ का मार्गदर्शन करता है या नहीं", तुम्हारे हृदय की गहराइयों में, प्रश्नवाचक चिह्न की बजाय विराम चिह्न या विस्मयादिबोधक चिह्न के साथ समाप्त होंगे। "क्या परमेश्वर मानवजाति के जीवन में हर चीज़ का मार्गदर्शन करता है?" "क्या परमेश्वर मनुष्य के हृदय की गहराइयों में देखता है?" क्या कारण है कि तुम इन बातों को प्रश्नों में बदल देते हो? अगर तुम सच में परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते हो या उसका आदर नहीं करते हो, तो तुम उसमें सच्ची आस्था उत्पन्न नहीं कर पाओगे। अगर तुम उसमें सच्ची आस्था को उत्पन्न नहीं कर पाते हो, तो तुम परमेश्वर जो भी करता है उस पर हमेशा प्रश्नवाचक चिह्न ही लगाओगे, कभी कोई विराम चिह्न नहीं लगाओगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए' से उद्धृत

जब तुम परमेश्वर की ओर देखते हो, तो यह संभव है कि वह तुम्हें कोई भी बोध या कोई स्पष्ट विचार न दे, किसी स्पष्ट मार्गदर्शन की तो बात ही दूर है, लेकिन वह तुम्हें कुछ समझने की अनुमति देता है। या हो सकता है कि इस बार तुम्हें कुछ भी समझ न आए, परन्तु फिर भी यह उचित है कि तुम परमेश्वर की ओर देखो। लोगों द्वारा इस तरह से अभ्यास करना नियमों का पालन करने के लिए नहीं है, बल्कि यह उनके दिलों की ज़रूरत होती है और यही वो तरीक़ा है जिससे कि मनुष्य को अभ्यास करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि हर बार जब तुम परमेश्वर की ओर देखो और परमेश्वर को पुकारो, तो तुम प्रबोधन और मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हो; मनुष्य के जीवन में यह आध्यात्मिक स्थिति सामान्य और स्वाभाविक होती है, और परमेश्वर की ओर देखना लोगों के लिए अपने दिलों में परमेश्वर के साथ सामान्य बातचीत करना है।

कभी-कभी, परमेश्वर पर निर्भर होने का मतलब विशिष्ट वचनों का उपयोग करके परमेश्वर से कुछ करने को कहना, या उससे विशिष्ट मार्गदर्शन या सुरक्षा माँगना नहीं होता है। बल्कि, इसका मतलब है किसी समस्या का सामना करने पर, लोगों का उसे ईमानदारी से पुकारने में सक्षम होना। तो, जब लोग परमेश्वर को पुकारते हैं तो वह क्या कर रहा होता है? जब किसी के हृदय में हलचल होती है और वह सोचता है: "हे परमेश्वर, मैं यह खुद नहीं कर सकता, मुझे नहीं पता कि यह कैसे करना है, और मैं कमज़ोर और नकारात्मक महसूस करता हूँ...," जब उनके मन में ये विचार आते हैं, तो क्या परमेश्वर इसके बारे में जानता है? जब ये विचार लोगों के मन में उठते हैं, तो क्या उनके हृदय ईमानदार होते हैं? जब वे इस तरह से ईमानदारी से परमेश्वर को पुकारते हैं, तो क्या परमेश्वर उनकी मदद करने की सहमति देता है? इस तथ्य के बावजूद कि हो सकता है कि उन्होंने एक वचन भी नहीं बोला हो, वे ईमानदारी दिखाते हैं, और इसलिए परमेश्वर उनकी मदद करने की सहमति देता है। जब कोई विशेष रूप से कष्टमय कठिनाई का सामना करता है, जब ऐसा कोई नहीं होता जिससे वो सहायता मांग सके, और जब वह विशेष रूप से असहाय महसूस करता है, तो वह परमेश्वर में अपनी एकमात्र आशा रखता है। ऐसे लोगों की प्रार्थनाएँ किस तरह की होती हैं? उनकी मन:स्थिति क्या होती है? क्या वे ईमानदार होते हैं? क्या उस समय कोई मिलावट होती है? केवल तभी तेरा हृदय ईमानदार होता है, जब तू परमेश्वर पर इस तरह भरोसा करता है मानो कि वह अंतिम तिनका है जिसे तू अपने जीवन को बचाने के लिए पकड़ता है और यह उम्मीद करता है कि वह तेरी मदद करेगा। यद्यपि तूने ज्यादा कुछ नहीं कहा होगा, लेकिन तेरा हृदय पहले से ही द्रवित है। अर्थात्, तू परमेश्वर को अपना ईमानदार हृदय देता है, और परमेश्वर सुनता है। जब परमेश्वर सुनता है, वह तेरी कठिनाइयों को देखेगा, तो वह तुझे प्रबुद्ध करेगा, तेरा मार्गदर्शन करेगा, और तेरी सहायता करेगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए' से उद्धृत

चाहे कोई कितना भी सत्य समझता हो या उसने कितने ही कर्तव्यों को पूरा किया हो, उन कर्तव्यों को पूरा करते समय उसने कितने ही अनुभव किये हों, उसका आध्यात्मिक कद कितना ही बड़ा या छोटा हो या वो किसी भी परिवेश में हो, लेकिन अपने हर काम में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखे और उस पर भरोसा किए बिना उसका काम नहीं चल सकता। यही सर्वोच्च प्रकार की बुद्धि है। मैं इसे सर्वोच्च प्रकार की बुद्धि क्यों कहता हूँ? किसी ने बहुत-से सत्य समझ भी लिए हों तो क्या परमेश्वर पर भरोसा किये बिना काम चल सकता है? कुछ लोगों ने, कुछ अधिक समय तक परमेश्वर में आस्था रखकर, कुछ सत्य समझ लिए हैं और वे कुछ परीक्षणों से भी गुज़रे हैं। उन्हें थोड़ा व्यावहारिक अनुभव हो सकता है, लेकिन वे नहीं जानते कि परमेश्वर पर भरोसा कैसे करना है और वे यह भी नहीं जानते कि परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखकर उस पर कैसे भरोसा करना है। क्या ऐसे लोगों में बुद्धि होती है? ऐसे लोग सबसे ज़्यादा मूर्ख होते हैं, और खुद को चतुर समझते हैं; वे परमेश्वर का भय नहीं मानते और बुराई से दूर नहीं रहते। कुछ लोग कहते हैं, "मैं कई सत्य समझता हूँ और मेरे अंदर सत्य-वास्तविकता है। सैद्धांतिक तरीके से काम करना अच्छा होता है। मैं परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हूँ और मैं जानता हूँ कि परमेश्वर के करीब कैसे जाना है। क्या इतना पर्याप्त नहीं है कि मैं सत्य पर भरोसा करता हूँ?" सैद्धांतिक रूप से देखा जाए, तो "सत्य पर भरोसा करना" ठीक है। लेकिन कई मौके और स्थितियाँ ऐसी भी होती हैं, जिनमें लोगों को यही पता नहीं चलता कि सत्य क्या है, या सत्य सिद्धांत क्या हैं। व्यावहारिक अनुभव वाले लोग यह जानते हैं। उदाहरण के तौर पर, जब तुम्हारे सामने कोई समस्या आए, तो शायद तुम्हें यह पता न हो कि इस मुद्दे से जुड़े हुए सत्य का अभ्यास कैसे करना चाहिए या इसे कैसे लागू करना चाहिए। तुम्हें ऐसे मौकों पर क्या करना चाहिए? चाहे तुम्हें कितना भी व्यावहारिक अनुभव हो, तुम्हारे अंदर सभी स्थितियों में सत्य नहीं हो सकता। चाहे तुमने कितने ही वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया हो, चाहे तुमने कितनी ही चीज़ों का अनुभव किया हो, चाहे तुम कितनी ही काट-छाँट, निपटारे और अनुशासन से गुज़रे हो, क्या तुम सत्य के स्रोत हो? कुछ लोगों का कहना है, "मुझे वचन देह में प्रकट होता है पुस्तक के सभी जाने-माने कथन और अंश याद हैं। मुझे परमेश्वर पर भरोसा करने या परमेश्वर की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है। जब समय आएगा, मैं परमेश्वर के इन वचनों पर ही भरोसा करके आराम से काम चला लूँगा।" जिन वचनों को तुमने याद किया है, वे गतिहीन हैं, लेकिन जिन परिवेशों और अवस्थाओं का तुम सामना करते हो, वे गतिशील हैं। वचनों की शाब्दिक समझ रखने और कई आध्यात्मिक सिद्धांतों के बारे में बात कर लेने का अर्थ सत्य की समझ होना नहीं है, इसका यह अर्थ तो बिल्कुल नहीं है कि तुम्हें हर स्थिति में परमेश्वर की इच्छा की पूरी समझ है। इस तरह, यहाँ सीखने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण सबक है : वो यह है कि लोगों को सभी बातों में परमेश्वर की ओर देखने की ज़रूरत है और ऐसा करके, लोग परमेश्वर पर भरोसा कर सकते हैं। परमेश्वर पर भरोसा रखने से ही लोगों को अनुसरण का मार्ग मिलेगा। अन्यथा, तुम सही तरीके से और सत्य-सिद्धांतों के अनुरूप कोई काम कर तो सकते हो, लेकिन यदि तुम परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते हो, तो तुम जो भी करोगे वह सिर्फ मनुष्य का काम होगा, और यह ज़रूरी नहीं कि वह परमेश्वर को संतुष्ट करे। चूँकि लोगों को सत्य की इतनी उथली समझ होती है, इसलिए संभव है कि वे विभिन्न परिस्थितियों का सामना करने पर एक ही सत्य का उपयोग करके नियमों का पालन करें और शब्दों और सिद्धांतों से हठपूर्वक चिपके रहें। यह मुमकिन है कि वे कई मामलों को आम तौर पर सत्य सिद्धांतों के अनुरूप पूरा कर लें, लेकिन उसमें परमेश्वर के मार्गदर्शन को या पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं देखा जा सकता है। यहाँ पर एक गंभीर समस्या है, वो यह है कि लोग अपने अनुभव और उन्होंने जो नियम समझे हैं उन पर, और कुछ मानवीय कल्पनाओं पर निर्भर रहकर बहुत से काम करते हैं। वे मुश्किल से ही सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त कर सकते हैं, जो कि परमेश्वर की ओर देखने, उससे प्रार्थना करने, फिर परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन पर भरोसा करके, परमेश्वर की इच्छा को साफ़-साफ़ समझने से प्राप्त होता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि सबसे बड़ी बुद्धिमानी परमेश्वर की ओर देखना और सभी बातों में परमेश्वर पर भरोसा करना है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए' से उद्धृत

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