18. परमेश्वर पर निर्भर करने और उसका आदर करने के सिद्धांत

(1) यह जानना आवश्यक है कि परमेश्वर ने सभी को बनाया है और सब पर उसी की प्रभुता है, और यह विश्वास रखना है कि सभी घटनाएँ और चीजें उसी के हाथों में हैं। केवल इसी प्रकार कोई वास्तव में उस पर निर्भर हो सकता और उसका आदर कर सकता है।

(2) परमेश्वर पर निर्भर करने और उसका आदर करने के अभ्यास के माध्यम से एक व्यक्ति परमेश्वर के कर्मों को देख सकता है और उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को जान सकता है, जिससे धीरे-धीरे वह उसके प्रति श्रद्धापूर्ण और समर्पित हो सकता है।

(3) मसीह को महान मानकर ऊँचा उठाना आवश्यक है। केवल मसीह ही सत्य व्यक्त कर सकता है। इस विश्वास के साथ कि परमेश्वर के वचन सब कुछ पूरा करते हैं, व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मसीह का अनुसरण करने और गवाही देने में सक्षम हो जाता है।

(4) जब परीक्षाओं और क्लेशों का सामना करना पड़े, तो उसकी इच्छा को समझने के प्रयास में, सत्य की तलाश करना और परमेश्वर के वचनों के अनुसार उससे प्रार्थना करना आवश्यक है। केवल सत्य को व्यवहार में लाने के माध्यम से कोई अपनी गवाही में दृढ़ रह सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर को निहारना और सभी चीजों में परमेश्वर पर निर्भर रहना सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। यह ऐसी चीज है, जिसे ज्यादातर लोग नहीं समझ पाए हैं। इसके बजाय वे किस चीज पर भरोसा करते हैं? "मैं बहुत अध्ययन करता हूँ, परमेश्वर के बहुत सारे वचन सुनता और पढ़ता हूँ, अनेक सभाओं में जाता हूँ, अनेक कौशल और गाने सीखता हूँ। फिर मैं और भी अधिक प्रार्थना करता हूँ, भाई-बहनों के साथ और भी अधिक संगति करता हूँ, अपने कर्तव्यों का और भी अधिक निर्वहन करता हूँ, और भी अधिक कष्ट उठाता हूँ, और भी अधिक कीमत चुकाता हूँ, और भी अधिक चीजों को त्याग करता हूँ, और शायद यही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।" लेकिन तुमने यह सब करने के अंतिम उद्देश्य की अनदेखी कर दी है। चाहे कोई कितना भी सत्य समझता हो या उसने कितने ही कर्तव्यों को पूरा किया हो, उन कर्तव्यों को पूरा करते समय उसने कितने ही अनुभव किये हों, उसका आध्यात्मिक कद कितना ही बड़ा या छोटा हो या वो किसी भी परिवेश में हो, लेकिन अपने हर काम में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखे और उस पर भरोसा किए बिना उसका काम नहीं चल सकता। यही सर्वोच्च प्रकार की बुद्धि है। मैं इसे सर्वोच्च प्रकार की बुद्धि क्यों कहता हूँ? किसी ने बहुत-से सत्य समझ भी लिए हों तो क्या परमेश्वर पर भरोसा किये बिना काम चल सकता है? कुछ लोगों ने, कुछ अधिक समय तक परमेश्वर में आस्था रखकर, कुछ सत्य समझ लिए हैं और वे कुछ परीक्षणों से भी गुज़रे हैं। उन्हें थोड़ा व्यावहारिक अनुभव हो सकता है, लेकिन वे नहीं जानते कि परमेश्वर पर भरोसा कैसे करना है और वे यह भी नहीं जानते कि परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखकर उस पर कैसे भरोसा करना है। क्या ऐसे लोगों में बुद्धि होती है? ऐसे लोग सबसे ज़्यादा मूर्ख होते हैं, और खुद को चतुर समझते हैं; वे परमेश्वर का भय नहीं मानते और बुराई से दूर नहीं रहते। कुछ लोग कहते हैं, "मैं कई सत्य समझता हूँ और मेरे अंदर सत्य-वास्तविकता है। सैद्धांतिक तरीके से काम करना अच्छा होता है। मैं परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हूँ और मैं जानता हूँ कि परमेश्वर के करीब कैसे जाना है। क्या इतना पर्याप्त नहीं है कि मैं सत्य पर भरोसा करता हूँ?" सैद्धांतिक रूप से देखा जाए, तो "सत्य पर भरोसा करना" ठीक है। लेकिन कई मौके और स्थितियाँ ऐसी भी होती हैं, जिनमें लोगों को यही पता नहीं चलता कि सत्य क्या है, या सत्य सिद्धांत क्या हैं। व्यावहारिक अनुभव वाले लोग यह जानते हैं। उदाहरण के तौर पर, जब तुम्हारे सामने कोई समस्या आए, तो शायद तुम्हें यह पता न हो कि इस मुद्दे से जुड़े हुए सत्य का अभ्यास कैसे करना चाहिए या इसे कैसे लागू करना चाहिए। तुम्हें ऐसे मौकों पर क्या करना चाहिए? चाहे तुम्हें कितना भी व्यावहारिक अनुभव हो, तुम्हारे अंदर सभी स्थितियों में सत्य नहीं हो सकता। चाहे तुमने कितने ही वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया हो, चाहे तुमने कितनी ही चीज़ों का अनुभव किया हो, चाहे तुम कितनी ही काट-छाँट, निपटारे और अनुशासन से गुज़रे हो, क्या तुम सत्य के स्रोत हो? कुछ लोगों का कहना है, "मुझे वचन देह में प्रकट होता है पुस्तक के सभी जाने-माने कथन और अंश याद हैं। मुझे परमेश्वर पर भरोसा करने या परमेश्वर की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है। जब समय आएगा, मैं परमेश्वर के इन वचनों पर ही भरोसा करके आराम से काम चला लूँगा।" जिन वचनों को तुमने याद किया है, वे गतिहीन हैं, लेकिन जिन परिवेशों और अवस्थाओं का तुम सामना करते हो, वे गतिशील हैं। वचनों की शाब्दिक समझ रखने और कई आध्यात्मिक सिद्धांतों के बारे में बात कर लेने का अर्थ सत्य की समझ होना नहीं है, इसका यह अर्थ तो बिल्कुल नहीं है कि तुम्हें हर स्थिति में परमेश्वर की इच्छा की पूरी समझ है। इस तरह, यहाँ सीखने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण सबक है : वो यह है कि लोगों को सभी बातों में परमेश्वर की ओर देखने की ज़रूरत है और ऐसा करके, लोग परमेश्वर पर भरोसा कर सकते हैं। परमेश्वर पर भरोसा रखने से ही लोगों को अनुसरण का मार्ग मिलेगा। अन्यथा, तुम सही तरीके से और सत्य-सिद्धांतों के अनुरूप कोई काम कर तो सकते हो, लेकिन यदि तुम परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते हो, तो तुम जो भी करोगे वह सिर्फ मनुष्य का काम होगा, और यह ज़रूरी नहीं कि वह परमेश्वर को संतुष्ट करे। चूँकि लोगों को सत्य की इतनी उथली समझ होती है, इसलिए संभव है कि वे विभिन्न परिस्थितियों का सामना करने पर एक ही सत्य का उपयोग करके नियमों का पालन करें और शब्दों और सिद्धांतों से हठपूर्वक चिपके रहें। यह मुमकिन है कि वे कई मामलों को आम तौर पर सत्य सिद्धांतों के अनुरूप पूरा कर लें, लेकिन उसमें परमेश्वर के मार्गदर्शन को या पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं देखा जा सकता है। यहाँ पर एक गंभीर समस्या है, वो यह है कि लोग अपने अनुभव और उन्होंने जो नियम समझे हैं उन पर, और कुछ मानवीय कल्पनाओं पर निर्भर रहकर बहुत से काम करते हैं। वे मुश्किल से ही सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त कर सकते हैं, जो कि परमेश्वर की ओर देखने, उससे प्रार्थना करने, फिर परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन पर भरोसा करके, परमेश्वर की इच्छा को साफ़-साफ़ समझने से प्राप्त होता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि सबसे बड़ी बुद्धिमानी परमेश्वर की ओर देखना और सभी बातों में परमेश्वर पर भरोसा करना है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए' से उद्धृत

तुम्हें परमेश्वर की ओर देखने और उस पर भरोसा करने का अभ्यास कैसे करना चाहिए? कुछ लोग कहते हैं : "मैं उम्र में छोटा हूँ, मेरा आध्यात्मिक कद छोटा है और मुझे परमेश्वर में आस्था रखे हुए अभी थोड़ा ही समय हुआ है। मुझे नहीं पता कि परमेश्वर की ओर कैसे देखना चाहिए, इसलिए परमेश्वर की ओर देखना मेरे लिए मुश्किल है। मुझे यह भी नहीं पता कि परमेश्वर पर भरोसा कैसे करना चाहिए।" क्या यह कोई समस्या है? क्या परमेश्वर की ओर देखना कोई खोखला सिद्धांत है? क्या यह औपचारिकता है? नहीं। कुछ लोग कहते हैं : "जिन चीजों के लिए हम परमेश्वर की ओर देखते हैं, उनमें से अधिकांश हमारे कर्तव्य हैं। हमें छोटी-छोटी व्यक्तिगत बातों के लिए परमेश्वर की ओर नहीं देखना चाहिए। परमेश्वर उनकी परवाह नहीं करता।" क्या यह व्याख्या सही है? (नहीं, यह गलत है।) तो लोगों को किन चीजों में परमेश्वर की ओर देखना चाहिए? (सभी चीजों में।) "सभी चीजों" का क्या अर्थ है? (चाहे कोई मामला बड़ा हो या छोटा, हमें परमेश्वर की ओर देखना चाहिए और परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए।) कुछ में सामान्य मानवता की चीजें शामिल होती हैं, जैसे दाँत साफ करना, चेहरा धोना और खाना। तुम्हारा इन चीजों को स्वयं संभालना ठीक है, लेकिन जब तुम्हारे सामने असाधारण परिस्थितियाँ आएँ, तो तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर की ओर देखना चाहिए। मान लो, आज तुम्हारे पेट में गड़बड़ है और इससे तुम्हारे काम पर असर पड़ रहा है। इसके लिए तुम्हें यह कहते हुए प्रार्थना करनी चाहिए : "हे परमेश्वर, आज मेरा पेट मुझे परेशान कर रहा है। क्या मैंने कुछ गलत खा लिया, क्या मुझे सर्दी हो गई या मेरे अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित न होने के कारण तू मुझे अनुशासित कर रहा है? मैं तुझसे प्रबुद्धता और मार्गदर्शन देने के लिए प्रार्थना करता हूँ।" तुम्हें इस तरह से परमेश्वर को पुकारना चाहिए; यही "परमेश्वर की ओर देखना" है। लेकिन तुम्हें परमेश्वर की ओर देखने का असर अपनी सामान्य मानवीय गतिविधियों नहीं पड़ने देना चाहिए। परमेश्वर से प्रार्थना करने और उसकी ओर देखने के बाद, तुम्हें हमेशा की तरह भोजन करना चाहिए। यदि तुम भोजन न कर पाओ, तो तुम्हें कुछ अधिक उपयुक्त चीज खानी चाहिए। अगर तुम्हारे पेट में बहुत ज्यादा दर्द हो, तो कोई दवा ले लो, लेकिन तुम्हें प्रार्थना और खोज भी करनी चाहिए। तुम्हें सामान्य मानवता में जिन चीजों के साथ काम करना चाहिए, उन चीजों के साथ काम जरूर करना चाहिए, और भावनाओं में नहीं बहना चाहिए। लेकिन तुम्हें अभी भी इस मामले में खोज करनी चाहिए और परमेश्वर की ओर देखना चाहिए। बाद में, यह संभव है कि परमेश्वर तुम्हें किसी मामले के माध्यम से प्रबुद्ध करे और तुम अवचेतन में महसूस करो कि तुमने अपने कर्तव्यों के दौरान कोई ऐसा व्यवहार दिखाया है, जो उतना अच्छा नहीं है। यह महसूस करने पर तुम्हें तुरंत चिंतन करना चाहिए। तुम्हें अपने पाप स्वीकारने चाहिए और परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप करना चाहिए : "हे परमेश्वर, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए मेरा उद्देश्य गड्डमड्ड हो जाता है, मैं अपनी इच्छा पर भरोसा कर लेता हूँ। मैं बहुत ही चंचल हूँ, मैंने अपने कर्तव्यों की प्रगति को प्रभावित किया है। मैं तेरे अनुशासन और फटकार को धन्यवाद देता हूँ। मैं ऐसा दोबारा नहीं करूँगा। मैं तुझसे प्रार्थना करता हूँ कि तू मेरा मार्गदर्शन कर और बस इस बार मुझे क्षमा कर दे।" प्रार्थना करने के बाद तुम्हारा दिल शांत हो जाता है। और अनजाने में ही तुम्हारी बीमारी धीरे-धीरे ठीक होने लगती है। मनुष्य को करने योग्य काम अवश्य करना चाहिए, लेकिन उस काम को करते समय उसे परमेश्वर पर भरोसा करना नहीं भूलना चाहिए—यह अभ्यास का एक तरीका है। जब तुम परमेश्वर की ओर देखते हो, तो यह संभव है कि वह तुम्हें कोई भी बोध या कोई स्पष्ट विचार न दे, किसी स्पष्ट मार्गदर्शन की तो बात ही दूर है, लेकिन वह तुम्हें कुछ समझने की अनुमति देता है। या हो सकता है कि इस बार तुम्हें कुछ भी समझ न आए, परन्तु फिर भी यह उचित है कि तुम परमेश्वर की ओर देखो। लोगों द्वारा इस तरह से अभ्यास करना नियमों का पालन करने के लिए नहीं है, बल्कि यह उनके दिलों की ज़रूरत होती है और यही वो तरीक़ा है जिससे कि मनुष्य को अभ्यास करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि हर बार जब तुम परमेश्वर की ओर देखो और परमेश्वर को पुकारो, तो तुम प्रबोधन और मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हो; मनुष्य के जीवन में यह आध्यात्मिक स्थिति सामान्य और स्वाभाविक होती है, और परमेश्वर की ओर देखना लोगों के लिए अपने दिलों में परमेश्वर के साथ सामान्य बातचीत करना है।

कभी-कभी, परमेश्वर पर निर्भर होने का मतलब विशिष्ट वचनों का उपयोग करके परमेश्वर से कुछ करने को कहना, या उससे विशिष्ट मार्गदर्शन या सुरक्षा माँगना नहीं होता है। बल्कि, इसका मतलब है किसी समस्या का सामना करने पर, लोगों का उसे ईमानदारी से पुकारने में सक्षम होना। तो, जब लोग परमेश्वर को पुकारते हैं तो वह क्या कर रहा होता है? जब किसी के हृदय में हलचल होती है और वह सोचता है: "हे परमेश्वर, मैं यह खुद नहीं कर सकता, मुझे नहीं पता कि यह कैसे करना है, और मैं कमज़ोर और नकारात्मक महसूस करता हूँ...," जब उनके मन में ये विचार आते हैं, तो क्या परमेश्वर इसके बारे में जानता है? जब ये विचार लोगों के मन में उठते हैं, तो क्या उनके हृदय ईमानदार होते हैं? जब वे इस तरह से ईमानदारी से परमेश्वर को पुकारते हैं, तो क्या परमेश्वर उनकी मदद करने की सहमति देता है? इस तथ्य के बावजूद कि हो सकता है कि उन्होंने एक वचन भी नहीं बोला हो, वे ईमानदारी दिखाते हैं, और इसलिए परमेश्वर उनकी मदद करने की सहमति देता है। जब कोई विशेष रूप से कष्टमय कठिनाई का सामना करता है, जब ऐसा कोई नहीं होता जिससे वो सहायता मांग सके, और जब वह विशेष रूप से असहाय महसूस करता है, तो वह परमेश्वर में अपनी एकमात्र आशा रखता है। ऐसे लोगों की प्रार्थनाएँ किस तरह की होती हैं? उनकी मन:स्थिति क्या होती है? क्या वे ईमानदार होते हैं? क्या उस समय कोई मिलावट होती है? केवल तभी तेरा हृदय ईमानदार होता है, जब तू परमेश्वर पर इस तरह भरोसा करता है मानो कि वह अंतिम तिनका है जिसे तू अपने जीवन को बचाने के लिए पकड़ता है और यह उम्मीद करता है कि वह तेरी मदद करेगा। यद्यपि तूने ज्यादा कुछ नहीं कहा होगा, लेकिन तेरा हृदय पहले से ही द्रवित है। अर्थात्, तू परमेश्वर को अपना ईमानदार हृदय देता है, और परमेश्वर सुनता है। जब परमेश्वर सुनता है, वह तेरी कठिनाइयों को देखेगा, तो वह तुझे प्रबुद्ध करेगा, तेरा मार्गदर्शन करेगा, और तेरी सहायता करेगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए' से उद्धृत

तुम चाहे जितने भी कमजोर और निष्क्रिय हो, तुम चाहे जितने भी व्यथित और नकारात्मक महसूस कर रहे हो, इसे परमेश्वर को बताओ। परमेश्वर को अजनबी मत समझो; तुम इसे किसी से भी छिपा सकते हो, लेकिन परमेश्वर से मत छिपाओ, क्योंकि अकेला परमेश्वर ही है जिस पर तुम निर्भर कर सकते हो, अकेला वही है जो तुम्हें बचा सकता है। केवल लोगों के परमेश्वर के सामने आने से ही इन चीजों का समाधान होगा। दूसरों पर निर्भर रहना बेकार है। और इसलिए, जब लोगों का सामना ऐसी चीज से हो, जो उन्हें कमजोर और निष्क्रिय बना सकती है, तो सबसे बुद्धिमान वे हैं जो परमेश्वर के सामने आ पाते हैं और उस पर भरोसा कर पाते हैं। केवल मूर्ख ही स्वयं को परमेश्वर से दूर-से-दूर रखते हैं और जब बड़ी, दु:साध्य घटनाएँ घटित होती हैं और परमेश्वर को अपने विश्वास में लेने की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है, तो वे अपने-आपको उससे सबसे ज्यादा छिपाए रहते हैं, और इन बातों को लेकर दिल-ही-दिल में चिंतामग्न रहते हैं। और तब क्या होता है जब वे उन्हें लेकर चिंतामग्न रहते हैं? ये शिकायतें विरोध बन जाती हैं, और विरोध परमेश्वर के विरुद्ध प्रतिरोध और कोलाहल बन जाता है। ये लोग परमेश्वर के साथ असंगत हो जाते हैं, और परमेश्वर के साथ उनका संबंध पूरी तरह से टूट जाता है। लेकिन जब इस तरह की कमजोरी और निष्क्रियता का सामना करने पर तुम तब भी परमेश्वर के सामने आने का विकल्प चुनते हो, खुद पर परमेश्वर की संप्रभुता स्वीकारते हो, उसके आयोजन और व्यवस्थाएँ स्वीकारते हो, तो तुम्हारा रवैया आज्ञाकारिता का रहता है, और जब परमेश्वर तुम्हारी ईमानदारी देखता है और जब वह तुम्हारी कमजोरी देखता है, तो वह जानता है कि तुम्हारा कैसे मार्गदर्शन करना है, कैसे तुम्हें कमजोरी और निष्क्रियता से बाहर निकालना है। और इसलिए, परमेश्वर के मार्गदर्शन में ये चीजें नगण्य जैसी होकर बहुत आसान हो जाती हैं; बिना तुम्हारे जाने ही परमेश्वर उन्हें दूर करने में तुम्हारी मदद करता है, तुम अनजाने में ही एक रास्ता खोज लेते हो, और अनजाने में ही मजबूत हो जाते हो, और पहले की तरह कमजोर नहीं रहते। जब तुम पलटकर पीछे देखते हो, तो तुम्हें आश्चर्य होता है कि उस समय तुम्हारी कमजोरी इतनी बचकानी कैसे हो सकती थी। लेकिन लोग ऐसे ही बचकाने होते हैं। परमेश्वर की मदद के बिना वे कभी भी बचकानेपन और मूर्खता की स्थिति से निकलकर परिपक्वता की स्थिति में नहीं आ पाएँगे। केवल तभी जब इन बचकानी बातों का अनुभव करने के क्रम में, लोग धीरे-धीरे परमेश्वर की संप्रभुता स्वीकारते हैं और उसके प्रति समर्पित हो जाते हैं, और सिद्धांत और परमेश्वर की इच्छा की खोज करते हुए सक्रिय रूप से इन मामलों का सीधे सामना करते हैं—बजाय इसके कि जितना अधिक वे ऐसी चीजों का सामना करें, उतना ही अधिक वे परमेश्वर से दूर भटक जाएँ, उतना ही अधिक वे परमेश्वर से छिप जाएँ, और उतना ही अधिक वे परमेश्वर का प्रतिरोध और विरोध करें, और न तो परमेश्वर से कुछ कहें और न ही उसके वचन पढ़ें, जब उनकी इनमें से कोई भी स्थिति नहीं होती—केवल तभी लोग अधिकाधिक परिपक्व और अधिकाधिक प्रौढ़ होते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (17)' से उद्धृत

सर्वशक्तिमान परमेश्वर सभी चीज़ों और घटनाओं पर वर्चस्व रखता है! जब तक हमारे दिल हर वक्त उसकी ओर देखते हैं और हम आत्मा में प्रवेश करते हैं और उसके साथ सहभागिता करते हैं, तब तक वह हमें उन सभी चीज़ों को दिखाएगा जिन्हें हम चाहते हैं और उसकी इच्छा का हमारे सामने प्रकट होना निश्चित है; तब हमारे दिल आनंद और शांति में होंगे, और पूर्ण स्पष्टता के साथ स्थिर होंगे। उसके वचनों के अनुसार कार्य करने में सक्षम होना अत्यंत महत्वपूर्ण है; उसकी इच्छा को समझने और उसके वचनों पर निर्भर रहकर जीने में सक्षम होना—केवल यही सच्चा अनुभव है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 7' से उद्धृत

तुझे सकारात्मक की तरफ़ से प्रवेश प्राप्त करना चाहिए। यदि तू हाथ पर हाथ धरे प्रतीक्षा करता है, तो तू अब भी नकारात्मक हो रहा है। तुझे आगे बढ़कर मेरे साथ सहयोग करना चाहिए; मेहनती बन, और आलसी कभी न बन। सदैव मेरी संगति में रह और मेरे साथ कहीं अधिक गहरी अंतरंगता प्राप्त कर। यदि तेरी समझ में नहीं आता है, तो त्वरित परिणामों के लिए अधीर मत बन। ऐसा नहीं है कि मैं तुझे नहीं बताऊँगा; बात यह है कि मैं देखना चाहता हूँ कि जब तू मेरी उपस्थिति में होता है क्या केवल तभी तू मुझ पर भरोसा करता है; और मुझ पर अपनी निर्भरता में तू आत्मविश्वास से पूर्ण है या नहीं। तुझे सदैव मेरे निकट रहना चाहिए और सभी विषय मेरे हाथों में रख देने चाहिए। खाली हाथ वापस मत जा। जब तू कुछ समयावधि के लिए बिना जाने-बूझे मेरे निकट रह लिया होगा, उसके पश्चात मेरे इरादे तुझ पर प्रकट होंगे। यदि तू उन्हें समझ लेता है, तो तू वास्तव में मेरे आमने-सामने होगा, और तूने वास्तव में मेरा चेहरे पा लिया होगा। तेरे भीतर अधिक स्पष्टता और दृढ़ता होगी, और तेरे पास भरोसा करने के लिए कुछ होगा। तब तेरे पास सामर्थ्य के साथ-साथ आत्मविश्वास भी होगा, तेरे पास आगे का मार्ग भी होगा। हर चीज़ तेरे लिए आसान हो जाएगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 9' से उद्धृत

लोग अपना अधिकांश समय अचेतावस्था में रहते हुए बिताते हैं। उन्हें पता नहीं होता कि उन्हें परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए या स्वयं पर। फिर वे स्वयं पर और अपने आसपास की लाभकारी स्थितियों और वातावरण पर, और साथ ही अपने लिए लाभदायक किन्हीं भी लोगों, घटनाओं, और चीज़ों पर भरोसा करना चुनने की ओर प्रवृत्त होते हैं। बस इसी में लोग सबसे निपुण होते हैं। जिसमें वे सबसे निकृष्ट हैं, वह है परमेश्वर पर भरोसा करना और उसका आदर करना, क्योंकि उन्हें लगता है कि परमेश्वर का आदर करना बहुत ज़हमत मोल लेना है-वे देख नहीं सकते, वे छू नहीं सकते-और उन्हें लगता है कि ऐसा करना अस्पष्ट और अवास्तविक है। इस प्रकार, अपनी शिक्षाओं के इस पहलू में, लोग सबसे निकृष्ट प्रदर्शन करते हैं, और इसमें उनका प्रवेश सबसे उथला होता है। अगर तुम परमेश्वर का आदर करना और उस पर भरोसा करना नहीं सीखते, तो तुम अपने भीतर परमेश्वर के कार्य को तुम्हारा मार्गदर्शन, या तुम्हारा प्रबोधन करते कभी नहीं देख पाओगे। अगर तुम इन चीज़ों को नहीं देख सकते, तो ऐसे प्रश्न कि "परमेश्वर विद्यमान है या नहीं और वह मानवजाति के जीवन में हर चीज़ का मार्गदर्शन करता है या नहीं", तुम्हारे हृदय की गहराइयों में, प्रश्नवाचक चिह्न की बजाय विराम चिह्न या विस्मयादिबोधक चिह्न के साथ समाप्त होंगे। "क्या परमेश्वर मानवजाति के जीवन में हर चीज़ का मार्गदर्शन करता है?" "क्या परमेश्वर मनुष्य के हृदय की गहराइयों में देखता है?" क्या कारण है कि तुम इन बातों को प्रश्नों में बदल देते हो? अगर तुम सच में परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते हो या उसका आदर नहीं करते हो, तो तुम उसमें सच्ची आस्था उत्पन्न नहीं कर पाओगे। अगर तुम उसमें सच्ची आस्था को उत्पन्न नहीं कर पाते हो, तो तुम परमेश्वर जो भी करता है उस पर हमेशा प्रश्नवाचक चिह्न ही लगाओगे, कभी कोई विराम चिह्न नहीं लगाओगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए' से उद्धृत

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