4. परमेश्वर के वचनों का सम्मान करने के सिद्धांत

(1) यह विश्वास करना आवश्यक है कि परमेश्वर के वचन निर्णायक रूप से सत्य हैं। उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए और उनका पालन करना चाहिए, चाहे वे मानवीय धारणाओं के अनुरूप हों या न हों, या उन्हें समझा जा सके या न समझा जा सके।

(2) परमेश्वर के वचनों के न्याय और उनकी ताड़ना को स्वीकार करना आवश्यक है। केवल इसी प्रकार कोई अपनी स्वयं की भ्रष्टता के सार और सच्चाई को जान सकता है और अपने भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध कर सकता है।

(3) जब कोई परमेश्वर के कुछ वचनों को न समझ सकता हो, तो उसे परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए, सत्य की तलाश करनी चाहिए, और अभ्यास और अनुभव पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। केवल इसी प्रकार सत्य को समझा जा सकता है और वास्तविकता में प्रवेश किया जा सकता है।

(4) परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करना आवश्यक है। केवल इसी प्रकार कोई व्यक्ति सत्य और परमेश्वर के ज्ञान की समझ प्राप्त कर सकता है, और केवल इसी प्रकार व्यक्ति इस बात की पुष्टि कर सकता है कि मसीह ही सत्य, मार्ग और जीवन है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मैं जो वचन कहता हूँ वे सत्य हैं और समूची मानवजाति के लिए हैं; केवल किसी विशिष्ट या खास किस्म के व्यक्ति के लिए नहीं हैं। इसलिए, तुम लोगों को मेरे वचनों को सत्य के नजरिए से समझने पर ध्यान देना चाहिए और पूरी एकाग्रता एवं ईमानदारी की प्रवृत्ति रखनी चाहिए; मेरे द्वारा बोले गए एक भी वचन या सत्य की उपेक्षा मत करो, और उन्हें हल्के में मत लो। मैं देखता हूँ कि तुम लोगों ने अपने जीवन में ऐसा बहुत कुछ किया है जो सत्य के अनुरूप नहीं है, इसलिए मैं तुम लोगों से खास तौर से सत्य के सेवक बनने, दुष्टता और कुरूपता का दास न बनने के लिए कह रहा हूँ। सत्य को मत कुचलो और परमेश्वर के घर के किसी भी कोने को दूषित मत करो। तुम लोगों के लिए यह मेरी चेतावनी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

मैं केवल यह आशा करता हूँ कि तुम लोग मेरे श्रमसाध्य प्रयासों को बर्बाद नहीं करोगे और इसके अलावा, तुम लोग मेरी सहृदय परवाह को समझोगे, और मेरे वचनों को एक इंसान के रूप में अपने व्यवहार का आधार बनाओगे। चाहे ये वचन ऐसे हों जिन्हें तुम लोग सुनना चाहो या न चाहो, चाहे ये वचन ऐसे हों जिन्हें स्वीकार कर तुम लोगों को आनंद हो या तुम इसे बस असहजता के साथ ही स्वीकार कर सको, तुम लोगों को उन्हें गंभीरता से अवश्य लेना चाहिए। अन्यथा, तुम लोगों के लापरवाह और निश्चिंत स्वभाव और व्यवहार मुझे गंभीर रूप से परेशान कर देंगे और, निश्चय ही, मुझे घृणा से भर देंगे। मुझे बहुत आशा है कि तुम सभी लोग मेरे वचनों को बार-बार—हजारों बार—पढ़ सकते हो और यहाँ तक कि उन्हें याद भी कर सकते हो। केवल इसी तरीके से तुम लोग से मेरी अपेक्षाओं पर सफल हो सकोगे। हालाँकि, अभी तुम लोगों में से कोई भी इस तरह से नहीं जी रहा है। इसके विपरीत, तुम सभी एक ऐयाश जीवन में डूबे हुए हो, जी-भर कर खाने-पीने का जीवन, और तुम लोगों में से कोई भी अपने हृदय और आत्मा को समृद्ध करने के लिए मेरे वचनों का उपयोग नहीं करता है। यही कारण है कि मैंने मनुष्‍य जाति के असली चेहरे के बारे में यह निष्कर्ष निकाला है : मनुष्‍य कभी भी मेरे साथ विश्वासघात कर सकता है और कोई भी मेरे वचनों के प्रति पूर्णतः निष्ठावान नहीं हो सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (1)' से उद्धृत

मैंने तुम लोगों को कई चेतावनियाँ दी हैं और तुम लोगों को जीतने के इरादे से कई सत्य दिए हैं। अब तक, तुम लोग अतीत की तुलना में काफी अधिक समृद्ध अनुभव करते हो, इस बारे में कई सिद्धांत समझ गए हो कि व्यक्ति को कैसा होना चाहिए, और तुमने उतना सामान्य ज्ञान प्राप्त कर लिया है जो वफ़ादार लोगों में होना चाहिए। अनेक वर्षों के दौरान तुम लोगों ने यही फसल काटी है। मैं तुम्हारी उपलब्धियों से इनकार नहीं करता, लेकिन मुझे यह भी स्पष्ट रूप से कहना है कि मैं इन कई वर्षों में मेरे प्रति की गई तुम्हारी अवज्ञाओं और विद्रोहों से भी इनकार नहीं करता, क्योंकि तुम लोगों के बीच एक भी संत नहीं है। बिना किसी अपवाद के तुम शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए लोग हो; तुम मसीह के शत्रु हो। आज तक तुम लोगों के अपराधों और अवज्ञाओं की संख्या इतनी ज्यादा रही है कि उनकी गिनती नहीं की जा सकती, इसलिए इसे शायद ही अजीब माना जाए कि मैं हमेशा तुम लोगों को तंग करता रहता हूँ। मैं तुम लोगों के साथ इस तरह सह-अस्तित्व की इच्छा नहीं रखता, लेकिन तुम्हारे भविष्य की खातिर, तुम्हारी मंज़िल की खातिर मैं, यहाँ और अभी, तुम्हें एक बार फिर तंग करूंगा। मुझे आशा है, तुम लोग मुझे कहने दोगे, और इतना ही नहीं, मेरे हर कथन पर विश्वास करने में सक्षम होगे और मेरे वचनों का गहरा निहितार्थ समझ पाओगे। मेरे कहे पर संदेह न करो, मेरे वचनों को जैसे चाहो, वैसे लेकर उन्हें दरकिनार करने की बात तो छोड़ ही दो; यह मेरे लिए असहनीय होगा। मेरे वचनों की आलोचना मत करो, उन्हें हलके में तो तुम्हें बिलकुल नहीं लेना चाहिए, न ऐसा कुछ कहना चाहिए कि मैं हमेशा तुम लोगों को फुसलाता हूँ, या उससे भी ज्यादा ख़राब यह कि मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह ठीक नहीं है। ये चीज़ें भी मेरे लिए असहनीय हैं। चूँकि तुम लोग मुझे और मेरी कही गई बातों को संदेह की नज़र से देखते हो, मेरे वचनों को कभी स्वीकार नहीं करते और मेरी उपेक्षा करते हो, मैं तुम सब लोगों से पूरी गंभीरता से कहता हूँ : मेरी कही बातों को दर्शन-शास्त्र से मत जोड़ो; मेरे वचनों को कपटी लोगों के झूठ से मत जोड़ो। मेरे वचनों की अवहेलना तो तुम्हें बिलकुल भी नहीं करनी चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे' से उद्धृत

सत्य सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता है। यह इंसान का जीवन और उसकी यात्रा की दिशा बन सकता है; यह उसके भ्रष्ट स्वभाव को दूर करने में, परमेश्वर का भय मानने और बुराई को दूर करने में, एक ऐसा व्यक्ति बनने में जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हो तथा जो एक योग्य सृजित प्राणी हो, और जिसे परमेश्वर का प्रेम और अनुग्रह प्राप्त हो, उसकी अगुवाई कर सकता है। इसकी बहुमूल्यता को देखते हुए, परमेश्वर के वचनों और सत्य के प्रति किसी व्यक्ति का क्या दृष्टिकोण और परिप्रेक्ष्य होना चाहिए? यह बिल्कुल स्पष्ट है: जो लोग परमेश्वर में सचमुच विश्वास करते हैं और उसके प्रति एक श्रद्धापूर्ण हृदय रखते हैं, उनके लिए उसके वचन उनके जीवन के प्राण होते हैं। इंसान को परमेश्वर के वचनों को संजोए रखना चाहिए, उन्हें खाना और पीना चाहिए, उनका आनंद लेना चाहिए, और उन्हें अपने जीवन के रूप में, उस दिशा के रूप में जिसमें उसे चलना है, और उसके लिए तैयार उपादान और प्रावधान के रूप में, स्वीकार करना चाहिए; इंसान को सत्य के कथनों और आवश्यकताओं के अनुसार जीना, अभ्यास करना और अनुभव करना चाहिए, सत्य की माँगों के प्रति, उसे प्रदत्त प्रत्येक कथन और अपेक्षा के प्रति, समर्पण करना चाहिए, बजाय इसके कि उसका अध्ययन, विश्लेषण, उस पर अटकलबाज़ी या संदेह किया जाए। चूँकि सत्य इंसान के लिए एक तैयार सहायता, उसका तैयार प्रावधान है, और यह उसका जीवन हो सकता है, उसे सत्य को सबसे अनमोल मानना चाहिए, क्योंकि उसे जीने के लिए, परमेश्वर की माँगों को पूरा करने के लिए, उसका भय मानने और बुराई से दूर रहने के लिए और अपने दैनिक जीवन के भीतर अभ्यास के मार्ग को खोजने के लिए, सत्य पर भरोसा करना चाहिए, उसे अभ्यास के सिद्धांतों को समझना और परमेश्वर के प्रति समर्पित होना चाहिए। इंसान को अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्यागने के लिए भी, एक ऐसा व्यक्ति बनने के लिए जिसे बचाया गया हो और जो एक योग्य सृजित प्राणी हो, सत्य पर भरोसा करना करना चाहिए।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे सत्य से घृणा करते हैं, सिद्धांतों की खुले आम धज्जियाँ उड़ाते हैं और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की उपेक्षा करते हैं (भाग सात)' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों के न्याय को प्राप्त करते समय, हमें कष्टों से नहीं घबराना चाहिये, न ही पीड़ा से डरना चाहिये; और इस बात से तो बिल्कुल भी ख़ौफ़ नहीं खाना चाहिये कि परमेश्वर के वचन हमारे हृदय को बेध देंगे। हमें उसके वचनों को और अधिक पढ़ना चाहिये कि कैसे परमेश्वर न्याय करता है, ताड़ना देता है और कैसे हमारे भ्रष्ट सार को उजागर करता है, हमें उन्हें पढ़ना चाहिए और खुद को और अधिक उनके अनुसार बनाना चाहिए। उनसे दूसरों की तुलना मत करो—हमें उनसे अपनी तुलना करनी चाहिए। हमारे अंदर इनमें से किसी भी चीज़ का अभाव नहीं है; हम सभी उनसे सहमत हो सकते हैं। अगर तुम्हें इसका विश्वास न हो, तो खुद अनुभव करके देख लो। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, कुछ लोग उन्हें खुद पर लागू करने में असमर्थ होते हैं; उन्हें लगता है कि इन वचनों के कुछ हिस्से उनके बारे में नहीं, बल्कि अन्य लोगों के बारे में हैं। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर लोगों को कुलटाओं और वेश्याओं के रूप में उजागर करता है, तो कुछ बहनों को लगता है कि चूँकि वे अपने पति के प्रति पूरी तरह से वफ़ादार हैं, अत: ऐसे वचन उनके संदर्भ में नहीं होने चाहिए; कुछ बहनों को लगता है कि चूँकि वे अविवाहित हैं और उन्होंने कभी सेक्स नहीं किया है, इसलिए ऐसे वचन उनके बारे में भी नहीं होने चाहिए। कुछ भाइयों को लगता है कि ये वचन केवल महिलाओं के लिए कहे गए हैं, और इनका उनसे कोई लेना-देना नहीं है; कुछ लोगों का मानना है कि परमेश्वर के ऐसे वचन सुनने में बहुत अप्रिय लगते हैं और वे उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं। ऐसे लोग भी हैं, जो कहते हैं कि कुछ मामलों में परमेश्वर के वचन गलत हैं। क्या परमेश्वर के वचनों के प्रति यह रवैया सही है? लोग परमेश्वर के वचनों के आधार पर आत्मचिंतन करने में असमर्थ हैं। यहाँ "कुलटा" और "वेश्या" लोगों के व्यभिचार की भ्रष्टता को संदर्भित करते हैं। चाहे पुरुष हो या महिला, विवाहित हो या अविवाहित, हर कोई व्यभिचार की भ्रष्टता से ग्रस्त है—तो इसका तुमसे कोई लेना-देना कैसे नहीं हो सकता है? परमेश्वर के वचन लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करते हैं; चाहे पुरुष हो या स्त्री, भ्रष्टाचार का उनका स्तर समान है। क्या यह तथ्य नहीं है? कुछ और करने से पहले, हमें यह समझना होगा कि हमें परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों में से हर एक वचन को स्वीकार करना चाहिए, चाहे वे सुनने में अच्‍छे लगते हों या नहीं, और चाहे वे हमें कड़वाहट का एहसास कराते हों या मिठास का। यही वह दृष्टिकोण है, जिसे हमें परमेश्‍वर के वचनों के प्रति अपनाना चाहिए। यह किस प्रकार का दृष्टिकोण है? क्‍या यह भक्ति का दृष्टिकोण है, सहिष्‍णुता का दृष्टिकोण है, या कष्‍ट सहने का दृष्टिकोण है? मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि यह इनमें से कोई नहीं है। हमारी आस्‍था में, हमें दृढ़ता से यह बनाए रखना चाहिए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं। चूँकि वे सचमुच सत्य हैं, हमें उन्हें तर्कसंगत ढंग से स्वीकार कर लेना चाहिये। हम इस बात को भले ही न पहचानें या स्वीकार न करें, लेकिन परमेश्वर के वचनों के प्रति हमारा पहला रुख़ पूर्ण स्वीकृति का होना चाहिये। परमेश्वर के वचनों की प्रत्येक पंक्ति एक स्थिति-विशेष से जुड़ी है। यानी, परमेश्वर के कथनों की कोई भी पंक्ति बाह्य रूपों के बारे में नहीं है, बाह्य नियमों के बारे में या लोगों के व्यवहार के किसी सरल रूप के बारे में तो बिल्कुल भी नहीं हैं। वे ऐसी नहीं हैं। अगर तुम परमेश्वर द्वारा कही गई हर पंक्ति को एक सामान्य प्रकार के इंसानी व्यवहार या बाह्य रूप की तरह देखते हो, तो फिर तुम्हारे अंदर आध्यात्मिक समझ नहीं है, तुम नहीं समझते कि सत्य क्या होता है। परमेश्‍वर के वचन गहन होते हैं। वे कैसे गहन होते हैं? परमेश्वर द्वारा कही गयी हर चीज़, प्रकट की गयी हर चीज़ लोगों के भ्रष्ट स्वभावों और उन चीजों के बारे में है जो उसके जीवन के भीतर गहरी जड़ें जमाये हुए और मौलिक हैं। वे आवश्यक चीज़ें होती हैं, वे बाह्य रूप नहीं, विशेषकर बाह्य व्यवहार नहीं होते। लोगों को उनके बाहरी रूप से देखने पर, वे सभी ठीक लग सकते हैं। लेकिन फिर परमेश्वर क्यों कहता है कि कुछ लोग बुरी आत्माएं हैं और कुछ अशुद्ध आत्माएं हैं? यह एक ऐसा मामला है जो तुम्हें दिखाई नहीं देता है। इस प्रकार, तुम परमेश्वर के वचनों पर बने रहने के लिए रूप-रंग या जो बाहर से दिखता है उस पर निर्भर नहीं रह सकते। इस तरह से सहभागिता करने के बाद, क्या तुम लोगों ने परमेश्वर के वचनों के प्रति अपने रवैये में बदलाव का अनुभव किया है? बदलाव चाहे जितना भी छोटा या बड़ा हो, अगली बार जब तुम लोग ऐसे वचन पढ़ोगे, तो कम से कम परमेश्वर के साथ तर्क करने की कोशिश नहीं करोगे। तुम यह नहीं कहोगे, "परमेश्वर के वचनों को सुनना वास्तव में कठिन है; मैं इस पृष्ठ को नहीं पढ़ने वाला। मैं बस इसे पलट दूँगा! मुझे आशीषों और वादों के बारे में पढ़ने के लिए कुछ खोजना चाहिए, ताकि कुछ आराम मिल सके।" तुम्हें इस तरह से छाँट-छाँटकर नहीं पढ़ना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग' से उद्धृत

कुछ लोग दूसरों की मदद करने के लिए, परमेश्वर की सेवा करने के लिए, और कलीसिया की उचित रूप से अगुआई करने के लिए स्वयं को सत्य से लैस कर लेते हैं। क्या यह दृष्टिकोण सही है? इस बात पर ध्यान न देते हुए कि तुमने कितने संदेश सुने हैं, या तुम्हारी योजनाएँ क्या हैं, मैं तुम्हें बता दूँ कि सबसे महत्वपूर्ण क्या है, और कौन-सा दृष्टिकोण सबसे सही है : तुम चाहे जो भी कर्तव्य निभाते हो, और तुम चाहे अगुआ हो या नहीं, तुम्हें पहले स्वयं को परमेश्वर के वचनों के समक्ष जाँचना होगा और उन्हें अपने भीतर कार्यान्वित करना होगा। इन वचनों को कार्य करने के साधन की तरह या कार्य करते हुए स्वयं द्वारा संचित की गई चीजों की तरह न समझो। अगर तुम इन सबमें सफल होते हो, तो तुम निश्चित रूप से अपने कार्य को अच्छे ढंग से करने में सक्षम होगे। अगर तुम हमेशा दूसरों को इन वचनों से मापना चाहते हो, उन्हें दूसरों पर कार्यान्वित करते हो, या उन्हें अपने कार्य के लिए पूँजी समझते हो, तो तुम संकट में हो; इसका अर्थ है कि तुम पौलुस के मार्ग पर चल रहे हो। यह परम सत्य है। चूँकि तुम्हारा यह दृष्टिकोण है, इसलिए तुम निस्संदेह इन वचनों को वाद और सिद्धांत मानते हो, और तुम उन्हें फैलाना और कार्य करना चाहते हो—यह बहुत खतरनाक चीज है। अगर तुम परमेश्वर के वचनों से स्वयं को मापते हो, और उन्हें स्वयं अभ्यास में लाने से शुरुआत करते हो, तो बदलने और प्रवेश प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति तुम होगे। केवल जब तुम स्वयं कुछ हासिल करते हो, तभी तुम्हारे पास उस कार्य को अच्छी तरह से करने के लिए, जो तुम्हें अवश्य करना चाहिए, आवश्यक कद-काठी, योग्यताएँ और क्षमता होगी; अगर तुम बिना कद-काठी के हो, तुम्हारे पास अनुभव नहीं है, और तुमने प्रवेश प्राप्त नहीं किया है, तो तुम आँख मूँदकर कार्य कर रहे हो, और आँख मूँदकर इधर-उधर दौड़ रहे हो, और इसका कोई वास्तविक परिणाम नहीं है। इस पर ध्यान दिए बगैर कि तुमने सत्य की वास्तविकता के कौन से पहलू को सुना है, यदि तुम इसके विरुद्ध अपने आप को सँभालते हो, यदि तुम इन वचनों को अपने जीवन में कार्यान्वित करते हो, और उन्हें अपने स्वयं के अभ्यास में शामिल करते हो, तो तुम निश्चित रूप से कुछ हासिल करोगे, और निश्चित रूप से बदल जाओगे। यदि तुम इन वचनों को पेट में ठूँस लेते हो, और उन्हें अपने मस्तिष्क में याद कर लेते हो, तो तुम कभी भी नहीं बदलोगे। उपदेश सुनते समय, तुम्हें इस प्रकार विचार करना चाहिए : "ये वचन किस प्रकार की अवस्था का उल्लेख कर रहे हैं? ये सार के किस पहलू का उल्लेख कर रहे हैं? सत्य के इस पहलू को मुझे किन मामलों में लागू करना चाहिए? जब भी मैं सत्य के इस पहलू से संबंधित कुछ कार्य करता हूँ, तो क्या मैं सत्य के अनुसार अभ्यास कर रहा होता हूँ? और जब मैं इसका अभ्यास कर रहा होता हूँ, तो क्या मेरी अवस्था इन वचनों के अनुसार होती है? अगर नहीं है, तो क्या मुझे खोज, संगति या प्रतीक्षा करनी चाहिए?" क्या तुम अपने जीवन में इस तरीके से अभ्यास करते हो? अगर नहीं करते, तो तुम्हारा जीवन परमेश्वरविहीन और सत्य से रहित है। तुम शब्दों और सिद्धांतों के अनुसार जीवन जीते हो या अपने हितों, विश्वास और उत्साह के अनुसार जीवन जीते हो। जिन लोगों में वास्तविकता के रूप में सत्य नहीं है, उनमें कोई वास्तविकता नहीं है और जिन लोगों में अपनी वास्तविकता के रूप में परमेश्वर के वचन नहीं हैं, उन्होंने परमेश्वर के वचनों में प्रवेश नहीं किया है। क्या तुम लोग मेरी बातों को समझ रहे हो? अगर समझ रहे हो तो बहुत अच्छी बात है—लेकिन तुमने उन्हें चाहे कितना भी समझा हो, जो कुछ सुना है, उसे चाहे कितना भी ग्रहण किया हो, महत्वपूर्ण बात यह है कि तुमने जो कुछ भी समझा है, तुम उसे अपने जीवन में उतार पाओ और अभ्यास में ला पाओ। तभी तुम्हारा आध्यात्मिक विकास होगा और तभी तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

कई लोग परमेश्वर के वचनों को दिन-रात पढ़ते रहते हैं, यहाँ तक कि उनके उत्कृष्ट अंशों को सबसे बेशकीमती संपत्ति के तौर पर स्मृति में अंकित कर लेते हैं, इतना ही नहीं, वे जगह-जगह परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हैं, और दूसरों को भी परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति करके उनकी सहायता करते हैं। वे सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर की गवाही देना है, उसके वचनों की गवाही देना है; ऐसा करना परमेश्वर के मार्ग का पालन करना है; वे सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना है, ऐसा करना उसके वचनों को अपने जीवन में लागू करना है, ऐसा करना उन्हें परमेश्वर की सराहना प्राप्त करने, बचाए जाने और पूर्ण बनाए जाने योग्य बनाएगा। परंतु परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हुए भी वे कभी परमेश्वर के वचनों पर खुद अमल नहीं करते या परमेश्वर के वचनों में जो प्रकाशित किया गया है, उससे अपनी तुलना करने की कोशिश नहीं करते। इसके बजाय, वे परमेश्वर के वचनों का उपयोग छल से दूसरों की प्रशंसा और विश्वास प्राप्त करने, अपने दम पर प्रबंधन में प्रवेश करने, परमेश्वर की महिमा का गबन और उसकी चोरी करने के लिए करते हैं। वे परमेश्‍वर के वचनों के प्रसार से मिले अवसर का दोहन परमेश्‍वर का कार्य और उसकी प्रशंसा पाने के लिए करने की व्‍यर्थ आशा करते हैं। कितने ही वर्ष गुज़र चुके हैं, परंतु ये लोग परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने की प्रक्रिया में न केवल परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करने में असमर्थ रहे हैं, परमेश्वर के वचनों की गवाही देने की प्रक्रिया में न केवल उस मार्ग को खोजने में असफल रहे हैं जिसका उन्हें अनुसरण करना चाहिए, दूसरों को परमेश्वर के वचनों से सहायता और पोषण प्रदान करने की प्रक्रिया में न केवल उन्होंने स्वयं सहायता और पोषण नहीं पाया है, और इन सब चीज़ों को करने की प्रक्रिया में वे न केवल परमेश्वर को जानने या परमेश्वर के प्रति स्वयं में वास्तविक श्रद्धा जगाने में असमर्थ रहे हैं; बल्कि, इसके विपरीत, परमेश्वर के बारे में उनकी गलतफहमियाँ और अधिक गहरी हो रही हैं; उस पर अविश्वास और अधिक बढ़ रहा है और उसके बारे में उनकी कल्पनाएँ और अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण होती जा रही हैं। परमेश्वर के वचनों के बारे में अपने सिद्धांतों से आपूर्ति और निर्देशन पाकर वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे बिलकुल मनोनुकूल परिस्थिति में हों, मानो वे अपने कौशल का सरलता से इस्तेमाल कर रहे हों, मानो उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य, अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया हो, और मानो उन्होंने एक नया जीवन जीत लिया हो और वे बचा लिए गए हों, मानो परमेश्वर के वचनों को धाराप्रवाह बोलने से उन्‍होंने सत्य प्राप्त कर लिया हो, परमेश्वर के इरादे समझ लिए हों, और परमेश्वर को जानने का मार्ग खोज लिया हो, मानो परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने की प्रक्रिया में वे अकसर परमेश्वर से रूबरू होते हों। साथ ही, अक्सर वे "द्रवित" होकर बार-बार रोते हैं और बहुधा परमेश्वर के वचनों में "परमेश्वर" की अगुआई प्राप्त करते हुए, वे उसकी गंभीर परवाह और उदार मंतव्य समझते प्रतीत होते हैं और साथ ही लगता है कि उन्होंने मनुष्य के लिए परमेश्वर के उद्धार और उसके प्रबंधन को भी जान लिया है, उसके सार को भी जान लिया है और उसके धार्मिक स्वभाव को भी समझ लिया है। इस नींव के आधार पर, वे परमेश्वर के अस्तित्‍व पर और अधिक दृढ़ता से विश्वास करते, उसकी उत्कृष्टता की स्थिति से और अधिक परिचित होते और उसकी भव्यता एवं श्रेष्ठता को और अधिक गहराई से महसूस करते प्रतीत होते हैं। परमेश्वर के वचनों के सतही ज्ञान से ओतप्रोत होने से ऐसा प्रतीत होता है कि उनके विश्वास में वृद्धि हुई है, कष्ट सहने का उनका संकल्प दृढ़ हुआ है, और परमेश्वर संबंधी उनका ज्ञान और अधिक गहरा हुआ है। वे नहीं जानते कि जब तक वे परमेश्वर के वचनों का वास्तव में अनुभव नहीं करेंगे, तब तक उनका परमेश्वर संबंधी सारा ज्ञान और उसके बारे में उनके विचार उनकी अपनी इच्छित कल्पनाओं और अनुमान से निकलते हैं। उनका विश्वास परमेश्वर की किसी भी प्रकार की परीक्षा के सामने नहीं ठहरेगा, उनकी तथाकथित आध्‍यात्मिकता और उनका आध्‍यात्मिक कद परमेश्वर के किसी भी परीक्षण या निरीक्षण के तहत बिलकुल नहीं ठहरेगी, उनका संकल्प रेत पर बने हुए महल से अधिक कुछ नहीं है, और उनका परमेश्वर संबंधी तथाकथित ज्ञान उनकी कल्पना की उड़ान से अधिक कुछ नहीं है। वास्तव में इन लोगों ने, जिन्होंने एक तरह से परमेश्वर के वचनों पर काफी परिश्रम किया है, कभी यह एहसास ही नहीं किया कि सच्ची आस्था क्या है, सच्ची आज्ञाकारिता क्या है, सच्ची देखभाल क्या है, या परमेश्वर का सच्चा ज्ञान क्या है। वे सिद्धांत, कल्पना, ज्ञान, हुनर, परंपरा, अंधविश्वास, यहाँ तक कि मानवता के नैतिक मूल्यों को भी परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने के लिए "पूँजी" और "हथियार" का रूप दे देते हैं, उन्‍हें परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने का आधार बना लेते हैं। साथ ही, वे इस पूँजी और हथियार का जादुई तावीज़ भी बना लेते हैं और उसके माध्यम से परमेश्वर को जानते हैं और उसके निरीक्षणों, परीक्षणों, ताड़ना और न्याय का सामना करते हैं। अंत में जो कुछ वे प्राप्त करते हैं, उसमें फिर भी परमेश्वर के बारे में धार्मिक संकेतार्थों और सामंती अंधविश्वासों से ओतप्रोत निष्कर्षों से अधिक कुछ नहीं होता, जो हर तरह से रोमानी, विकृत और रहस्‍यमय होता है। परमेश्वर को जानने और उसे परिभाषित करने का उनका तरीका उन्हीं लोगों के साँचे में ढला होता है, जो केवल ऊपर स्वर्ग में या आसमान में किसी वृद्ध के होने में विश्वास करते हैं, जबकि परमेश्वर की वास्तविकता, उसका सार, उसका स्वभाव, उसका स्‍वरूप और अस्तित्‍व आदि—वह सब, जो वास्तविक स्वयं परमेश्वर से संबंध रखता है—ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें समझने में उनका ज्ञान विफल रहा है, जिनसे उनके ज्ञान का पूरी तरह से संबंध-विच्छेद हो गया है, यहाँ तक कि वे इतने अलग हैं, जितने उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव। इस तरह, हालाँकि वे लोग परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति और पोषण में जीते हैं, फिर भी वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर सचमुच चलने में असमर्थ हैं। इसका वास्‍तविक कारण यह है कि वे कभी भी परमेश्वर से परिचित नहीं हुए हैं, न ही उन्होंने उसके साथ कभी वास्तविक संपर्क या समागम किया है, अत: उनके लिए परमेश्वर के साथ पारस्परिक समझ पर पहुँचना, या अपने भीतर परमेश्वर के प्रति सच्‍चा विश्‍वास पैदा कर पाना, उसका सच्चा अनुसरण या उसकी सच्ची आराधना जाग्रत कर पाना असंभव है। इस परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण ने—कि उन्हें इस प्रकार परमेश्वर के वचनों को देखना चाहिए, उन्हें इस प्रकार परमेश्वर को देखना चाहिए, उन्हें अनंत काल तक अपने प्रयासों में खाली हाथ लौटने, और परमेश्वर का भय मानने तथा बुराई से दूर रहने के मार्ग पर न चल पाने के लिए अभिशप्त कर दिया है। जिस लक्ष्य को वे साध रहे हैं और जिस ओर वे जा रहे हैं, वह प्रदर्शित करता है कि अनंत काल से वे परमेश्वर के शत्रु हैं और अनंत काल तक वे कभी उद्धार प्राप्त नहीं कर सकेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर उन लोगों के लिए सत्य व्यक्त करता है जिनमें सत्य की प्यास है, जो सत्य खोजते हैं और जो सत्य से प्रेम करते हैं। वे लोग जो शब्दों और सिद्धांतों में उलझे रहते हैं तथा लंबे, आडंबरपूर्ण भाषण देना पसंद करते हैं, वे कभी भी सत्य प्राप्त नहीं कर पाएँगे; वे स्वयं को बेवकूफ बना रहे हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के बारे में गलत दृष्टिकोण रखते हैं; जो सीधा है उसे पढ़ने के लिए वे अपनी गरदन उल्टी कर लेते हैं, उनका दृष्टिकोण पूरी तरह गलत होता है। कुछ लोग केवल परमेश्वर के वचनों पर शोध करना जानते हैं और अध्ययन करते हैं कि वह आशीष पाने के बारे में और मनुष्य के गंतव्य के बारे में क्या कहता है। अगर परमेश्वर के वचन उनकी धारणाओं के अनुकूल नहीं होते हैं, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं और अपना अनुसरण बंद कर देते हैं। यह दिखाता है कि उन्हें सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं है। परिणामस्वरूप, वे सत्य को गंभीरता से नहीं लेते; वे बस अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के सत्य को स्वीकारने में सक्षम हैं। भले ही वे परमेश्वर में अपने विश्वास को लेकर बेहद उत्साही हैं और कुछ अच्छे कर्म करने के लिए हरसंभव तरीके से प्रयास करते हैं और दूसरों के सामने खुद को अच्छे से पेश करते हैं, लेकिन वे यह सब केवल भविष्य में एक अच्छी मंज़िल पाने के लिए कर रहे हैं। इस तथ्य के बावजूद कि वे कलीसियाई जीवन से जुड़े हैं, सभी के साथ परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, उन्हें सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने और सत्य प्राप्त करने में कठिनाई होती है। कुछ अन्य लोग भी हैं जो परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं, लेकिन वे बस बिना रुचि के काम करते हैं; वे सोचते हैं कि उन्होंने बस कुछ शब्दों और सिद्धांतों को समझकर सत्य पा लिया है। वे कितने बेवकूफ हैं! परमेश्वर का वचन ही सत्य है। हालांकि, परमेश्वर के वचनों को पढ़ लेने के बाद तुम आवश्यक रूप से सत्य को न तो समझोगे, न सत्य को प्राप्त करोगे। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के बाद यदि तुम सत्य को हासिल करने में असफल हो जाते हो, तो तुमने बस शब्दों और सिद्धांतों को हासिल किया है। तुम नहीं जानते कि सत्य को प्राप्त करने का अर्थ क्या है। तुम अपनी हथेलियों में परमेश्वर के वचनों को रख सकते हो, लेकिन उन्हें पढ़ने के बाद भी तुम परमेश्वर की इच्छा को समझने में विफल रहते हो, तुम केवल कुछ शब्दों और सिद्धांतों को ही प्राप्त करते हो। सर्वप्रथम, तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर के वचन समझने की दृष्टि से इतने सरल नहीं हैं; परमेश्वर के वचन में बहुत गहराई है। कई वर्षों के अनुभव के बगैर, तुम परमेश्वर के वचनों को संभवतः कैसे समझ सकते हो? परमेश्वर के वचनों के एक वाक्य को ही पूरी तरह अनुभव करने में तुम्हारा पूरा जीवन-काल लग जाएगा। तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हो, लेकिन परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हो; तुमने उसके वचनों के उद्देश्यों, उनके उद्गम, उस प्रभाव को नहीं समझा है जो वे प्राप्त करना चाहते हैं, या जो वे हासिल करना चाहते हैं। अगर तुम इनमें से कुछ भी नहीं समझते हो, तो तुम सत्य को कैसे समझ सकते हो? संभवतः तुमने परमेश्वर के वचनों को कई बार पढ़ा हो और शायद तुमने इसके कई अंशों को कंठस्थ कर लिया हो, लेकिन तुम अभी भी बिलकुल बदले नहीं हो, न ही तुमने कोई प्रगति की है। परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध हमेशा की तरह दूरस्थ और विरक्त है। तुम्हारे और परमेश्वर के बीच, पहले की ही तरह, अभी भी रुकावटें हैं। तुम्हें अभी भी उस पर संदेह है। न केवल तुम परमेश्वर को समझते नहीं हो, बल्कि तुम उसे बहाने देते हो और उसके प्रति धारणाएँ पालते हो। तुम उसका विरोध करते हो और उसका तिरस्कार भी करते हो। इसका अर्थ यह कैसे हो सकता है कि तुमने सत्य प्राप्त कर लिया है? हालांकि हर किसी के पास परमेश्वर के वचन की प्रतिलिपि है जिसे वे प्रत्येक दिन पढ़ते हैं, और वे सहभागिता से प्राप्त प्रबोधन के बारे में लिखते हैं, लेकिन अंत में, अलग-अलग लोग अलग-अलग प्रभाव प्राप्त करते हैं। कुछ लोग धर्म-सिंद्धांतों पर ध्यान देते हैं, जबकि अन्य लोग अपने अभ्यास पर ध्यान देते हैं। कुछ लोग वह अध्ययन करना पसंद करते हैं जो गहरा और रहस्यमय है, जबकि अन्य लोग मनुष्य के भविष्य के गंतव्य के बारे में जानना पसंद करते हैं। कुछ प्रशासनिक आदेशों का अध्ययन करना पसंद करते हैं, जबकि कुछ सांत्वना के शब्दों की तलाश में रहते हैं, और अन्य भविष्यवाणियाँ पढ़ना पसंद करते हैं--लोग अलग-अलग चीजों पर ध्यान देते हैं। कुछ लोग पवित्र आत्मा द्वारा कलीसियाओं को बोले गए वचनों को पढ़ना पसंद करते हैं, और "मेरे पुत्र" बनना चाहते हैं। लेकिन ऐसे लोगों को अंत में क्या प्राप्त होगा? आजकल, कुछ नए विश्वासी हैं जो कहते हैं: "देखो परमेश्वर का वचन कितना संत्वना देने वाला है! 'मेरे पुत्रो, मेरे पुत्रो!' दुनिया में और कौन हमें ऐसी सांत्वना दे सकता है?" वे यह नहीं समझते कि ये शब्द किनके लिए अभीष्ट हैं। परमेश्वर के नए कार्य को एक या दो साल तक स्वीकार करने के बाद भी, कुछ लोग अभी भी समझने में विफल हैं और लाल या शर्मिंदा हुए बगैर ऐसी बातें कहते हैं। क्या यह सत्य को समझना है? वे परमेश्वर की इच्छा को भी नहीं समझते हैं, लेकिन वे परमेश्वर के पुत्रों की हैसियत धारण करने का दुस्साहस करते हैं! ऐसे लोग परमेश्वर के वचन से क्या सीखते हैं? वे केवल परमेश्वर के वचन की गलत व्याख्या करते हैं। वे लोग जो सत्य से प्रेम नहीं करते, वे कभी भी सत्य को प्राप्त नहीं कर पाएँगे, भले ही वे परमेश्वर के वचन पढ़ते हों। जब किसी को सत्य से प्रेम नहीं होता तो उनके साथ चाहे कितनी ही सहभागिता करो, वे इस पर ध्यान नहीं देंगे। वे लोग जो सत्य से प्रेम करते हैं, परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, परमेश्वर की इच्छा की खोज करेंगे और उसे समझेंगे; वे जांच-पड़ताल करेंगे, और दूसरों के साथ सत्य पर सहभागिता करेंगे। केवल इस प्रकार का व्यक्ति ही सत्य को प्राप्त करने की आशा कर सकता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वे ही अगुआई कर सकते हैं जिनके पास सत्य वास्तविकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के वचन को सुनना और परमेश्वर की आवश्यकताओं को मानना इंसान का स्वर्ग-प्रदत्त कार्य है; परमेश्वर क्या कहता है, यह इंसान का काम नहीं है। चाहे परमेश्वर जो भी कहे, परमेश्वर इंसान से कुछ भी मांगे, परमेश्वर की पहचान, सार और स्थिति, ये नहीं बदलते—वह सदैव परमेश्वर ही है। जब तुम्हें कोई संदेह न हो कि वह परमेश्वर है, तो तुम्हारी एकमात्र ज़िम्मेदारी, केवल एक ही चीज़ जो तुम्हें करनी चाहिए, वह है उसे सुनना जो वह कहता है; अभ्यास का मार्ग यही है। परमेश्वर के एक सृजित प्राणी को परमेश्वर के वचनों की जाँच, उनका विश्लेषण, अन्वेषण, नामंजूरी, विरोध, अवज्ञा या उन्हें अस्वीकार नहीं करना चाहिए; परमेश्वर इससे घृणा करता है, और यह वो नहीं है जो वह इंसान में देखना चाहता है। तो आख़िर अभ्यास का मार्ग क्या है? यह वास्तव में बहुत सरल होता है : सुनना, अपने दिल से सुनना, अपने दिल से स्वीकार करना, अपने दिल से समझना और बूझना सीखो, और फिर जाओ और करो, उसे पूरा करो, अपने दिल से उसे कार्यान्वित करो। जो तुम सुनते और दिल में बूझते हो, वह उसके साथ निकटता से जुड़ा होता है जो तुम अमल में लाते हो। इन दोनों को अलग मत करो; तुम जो अमल में लाते हो, तुम जिसका पालन करते हो, जो तुम अपने हाथ से करते हो, हर वो चीज़ जिसके लिए तुम भागते-फिरते हो—वो सब उससे जुड़ा है जिसे तुम सुनते और अपने दिल में बूझते हो, और इसमें तुम सृष्टिकर्ता के वचनों के प्रति अज्ञाकारिता हासिल करोगे। यही अभ्यास का मार्ग है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'प्रकरण तीन : कैसे नूह और अब्राहम ने परमेश्वर के वचन सुने और उसकी आज्ञा का पालन किया (भाग दो)' से उद्धृत

नूह परमेश्वर की आराधना करने और उसका अनुसरण करने वाला एक साधारण इंसान था। जब उसने परमेश्वर के वचन सुने, तो उसका रवैया उन्हें टालने, विलंब करने या अपने समय से करने वाला नहीं था। बल्कि उसने परमेश्वर के वचनों को बड़ी गंभीरता से सुना, उसने परमेश्वर के प्रत्येक कथन को बड़ी सावधानी और ध्यान से सुना, परमेश्वर ने उसे जो भी आज्ञा दी, उसने उन्हें पूरी लगन से समझने और याद रखने की कोशिश की, और कोई भी बात अपने दिमाग से निकलने नहीं दी। परमेश्वर और परमेश्वर के वचनों के प्रति उसके रवैये में परमेश्वर का भय था, जो दर्शाता है कि उसके हृदय में परमेश्वर बसता था और वह परमेश्वर का आज्ञाकारी था। उसने परमेश्वर की बात को, परमेश्वर के वचनों के विषय को और परमेश्वर की अपेक्षाओं को ध्यान से सुना। उसने सारी बातें गौर से सुनी—विश्लेषण करने के बजाय उसने उन्हें स्वीकार किया। उसके हृदय में न तो कोई अस्वीकृति थी, न विरोध था और न ही कोई अधीरता थी; बल्कि उसने परमेश्वर के हर वचन और परमेश्वर को उससे जो अपेक्षा थी, उन सब चीजों को अपने हृदय में शांति से, सावधानी से और ध्यान से अंकित कर लिया। परमेश्वर द्वारा दिए गए निर्देशों के बाद, नूह ने विस्तार से और अपने तरीके से, वह सब दर्ज कर लिया जो परमेश्वर ने कहा और उसे सौंपा था। उसके बाद उसने अपनी मेहनत-मजदूरी त्याग दी, अपने पुराने जीवन की दिनचर्या और योजनाएँ छोड़ दीं, और उन कामों को करने की तैयारी शुरू कर दी जो परमेश्वर ने उसे सौंपा था, और उस जहाज के लिए आवश्यक सभी सामग्री जुटानी शुरू कर दी जो परमेश्वर ने उसे बनाने के लिए कहा था। उसने परमेश्वर के एक भी वचन की या परमेश्वर ने उससे जो कुछ कहा था या परमेश्वर के वचनों में जो कुछ भी अपेक्षित था उसके किसी भी विवरण की उपेक्षा नहीं की। उसने अपने तरीके से उन सभी मुख्य बिंदुओं और विवरणों को दर्ज कर लिया, जो परमेश्वर ने उससे कहे थे और उसे सौंपे थे, फिर उसने उन पर बार-बार विचार और चिंतन किया। उसके बाद, नूह उस सारी सामग्री को जुटाने के लिए निकल पड़ा जिसे परमेश्वर ने तैयार करने के लिए कहा था। स्वाभाविक रूप से, परमेश्वर द्वारा उसे दिए गए प्रत्येक निर्देश के बाद, परमेश्वर ने उसे जो आदेश सौंपा था और जो करने का उसे निर्देश दिया था, उसके लिए उसने अपने तरीके से विस्तृत योजनाएँ और व्यवस्थाएँ बनाईं—और फिर, धीरे-धीरे परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार उसने अपनी योजनाओं और व्यवस्थाओं को लागू और क्रियान्वित करना शुरू कर दिया, हर विवरण पर ध्यान दिया और अलग-अलग कदम उठाए। पूरी प्रक्रिया के दौरान, नूह ने जो कुछ भी किया, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, चाहे वह इंसान की दृष्टि में उल्लेखनीय हो या न हो, वह वही था जिसे करने के लिए उसे परमेश्वर ने निर्देश दिया था, और वही था जिसके बारे में परमेश्वर ने कहा था और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित था। परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने के बाद नूह में जो कुछ भी प्रदर्शित हुआ, उससे यह स्पष्ट है कि परमेश्वर के वचनों के प्रति उसका रवैया मात्र सुन लेने और कुछ न करने का नहीं था—नूह का ऐसा रवैया तो बिल्कुल भी नहीं था कि मन अच्छा होने पर ही वह इस पर अमल करेगा या जब माहौल सही होगा तब सोचेगा या जब इसे करने के लिए समय अनुकूल होगा तब करेगा। इसके बजाय, वह अपना काम-धंधा छोड़कर, अपनी दिनचर्या तोड़कर, उसी समय वह अपने जीवन और अस्तित्व की सबसे बड़ी प्राथमिकता समझकर उस जहाज के निर्माण में लग गया जिसे बनाने का परमेश्वर ने उसे आदेश दिया था। परमेश्वर के आदेश और परमेश्वर के वचनों के प्रति उसका रवैया लापरवाही भरा, अन्यमनस्कता का या उथला नहीं था, अस्वीकृति का तो बिल्कुल नहीं था; इसके बजाय, उसने परमेश्वर के वचनों को ध्यान से सुना, और उन्हें पूरे दिल से याद रखा और उन पर विचार किया। परमेश्वर के वचनों के प्रति उसका दृष्टिकोण स्वीकृति और आज्ञाकारिता का था। परमेश्वर की दृष्टि में, परमेश्वर के वचनों के प्रति किसी भी सच्चे प्राणी का रवैया यही होना चाहिए। इस रवैये में न तो कोई अस्वीकृति थी, न कोई आधा-अधूरापन था, न कोई उच्छृंखलता थी और न ही इंसानी मंशा की कोई मिलावट थी; कुल मिलाकर यह ऐसा संपूर्ण रवैया था जो एक सृजित प्राणी का होना चाहिए।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'प्रकरण तीन : कैसे नूह और अब्राहम ने परमेश्वर के वचन सुने और उसकी आज्ञा का पालन किया (भाग दो)' से उद्धृत

अब्राहम एक ईमानदार व्यक्ति था। परमेश्वर के वचनों के प्रति उसका एक ही दृष्टिकोण था : सुनना, स्वीकार करना और पालन करना। परमेश्वर ने जो कुछ भी कहा उसने सुन लिया; अगर परमेश्वर ने कहा कि यह चीज काली है, तो भले ही वह चीज अब्राहम को काली न दिखी हो, फिर भी उसने बिना सवाल किए मान लिया कि वह काली है। अगर परमेश्वर ने कहा कि वह सफेद है, तो वह सफेद है। यह इतना सरल था। जब परमेश्वर ने कहा कि वह उसे एक बच्चा देगा, तो उसने मन ही मन सोचा, "मैं सौ वर्ष का हूँ। अगर परमेश्वर कहता है कि वह मुझे एक बच्चा देगा, तो मैं परमेश्वर को धन्यवाद देता हूँ, मैं अपने प्रभु को धन्यवाद देता हूँ।" वह बहुत ज्यादा नहीं सोचता था; उसे सिर्फ परमेश्वर में विश्वास था। और इस विश्वास का सार क्या था? उसे परमेश्वर के सार और पहचान में विश्वास था; सृष्टिकर्ता के बारे में उसका ज्ञान सच्चा था। वह उनमें से नहीं था, जो बोलते हैं कि उनका मानना है परमेश्वर के पास सभी चीजों को बनाने का सामर्थ्य है, परमेश्वर ने ही मानवजाति को बनाया है, फिर भी मन ही मन उस पर संदेह करते हैं : "क्या हम बंदर से विकसित होकर इंसान नहीं हुए हैं? परमेश्वर ने जब सब-कुछ बनाया तो मैंने क्यों नहीं देखा?" जब भी वे परमेश्वर को बोलते सुनते हैं, तो उनके दिल में बड़े सवालिया निशान होते हैं। परमेश्वर द्वारा बोले गए प्रत्येक तथ्य, बात और निर्देश का वे सूक्ष्मता से, ध्यान से, और सावधानी से अध्ययन और विश्लेषण करते हैं; अन्यथा, यदि वे सावधान न रहें, तो उन्हें बरगलाया जा सकता है, और उनका फायदा उठाया जा सकता है। लेकिन अब्राहम ऐसा नहीं था। उसका हृदय शुद्ध था, उसने शुद्ध हृदय से परमेश्वर के वचनों को सुना और यद्यपि, जब परमेश्वर ने इस बार बात की, तो उसे पीड़ा हुई, फिर भी उसने विश्वास रखकर आज्ञापालन किया; उसे विश्वास था कि परमेश्वर के वचन नहीं बदलेंगे, वे वास्तविकता बन जाएँगे, सृजित मानवजाति को उनका पालन और उन्हें कार्यान्वित करना चाहिए; परमेश्वर के वचनों को सुनकर, सृजित मानवजाति को चुनने का कोई अधिकार नहीं है, उनका अध्ययन या विश्लेषण करना तो दूर की बात है। परमेश्वर के वचनों के प्रति अब्राहम का रवैया ऐसा ही था। इसलिए, भले ही इससे उसे बहुत पीड़ा हुई, भले ही अपने बेटे के प्रति अपने लगाव, स्नेह और अति प्रेम के कारण, उसने अत्यधिक तनाव और पीड़ा महसूस की, फिर भी उसने अपना बेटा परमेश्वर को वापस देने का फैसला किया। उसे अपना बेटा परमेश्वर को क्यों लौटाना पड़ा? यदि परमेश्वर ने नहीं माँगा होता, तो उसे अपने पुत्र को वापस करने का दायित्व लेने की आवश्यकता नहीं होती—लेकिन एक बार जब परमेश्वर ने माँग लिया, तो उसे परमेश्वर को लौटाना ही था; उसके पास कोई बहाना नहीं था, लोगों को परमेश्वर के साथ तर्क करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए; यह अब्राहम का रवैया था। उसने शुद्ध हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया : यही परमेश्वर चाहता था और यही परमेश्वर देखना चाहता था। अब्राहम ने इसहाक को अर्पित करके क्या हासिल किया, और परमेश्वर के सामने उसमें क्या प्रदर्शित हुआ, यही परमेश्वर देखना चाहता था, और यही परमेश्वर द्वारा उसकी परीक्षा थी। फिर भी, परमेश्वर ने अब्राहम के साथ वैसा व्यवहार नहीं किया जैसा उसने नूह के साथ किया था। उसने अब्राहम को इस मामले के पीछे की पूरी कहानी, प्रक्रिया, कुछ नहीं बताया। अब्राहम केवल एक ही बात जानता था : परमेश्वर ने उसे इसहाक को लौटाने के लिए कहा है, बस। वह न तो यह जानता था कि ऐसा करके, परमेश्वर उसकी परीक्षा ले रहा है और न ही उसे इस बात की जानकारी थी कि यह परीक्षा लेने के बाद, परमेश्वर उसमें और उसके वंशजों में क्या संपन्न करना चाहता है। परमेश्वर ने उसे हर बात नहीं बताई, उसने उसे बस एक सरल निर्देश दिया, एक अनुरोध किया। यद्यपि परमेश्वर के ये वचन बहुत ही सरल और निर्मम थे, फिर भी अपेक्षा के अनुरूप, अब्राहम ने वही किया जो परमेश्वर की इच्छा थी और जो परमेश्वर चाहता था : उसने वेदी पर इसहाक की बलि चढ़ाने के लिए अर्पित किया। उसने जो कुछ भी किया उससे पता चलता है कि उसकी भेंट एक औपचारिकता मात्र नहीं थी, वह सिर्फ यूँ नहीं कर रहा था, बल्कि पूरे हृदय से, पूरी ईमानदारी से कर रहा था। हालाँकि सृष्टिकर्ता ने उससे जो कुछ माँगा था, वह उसकी सहनशक्ति से बाहर था, उसे पीड़ा हुई, फिर भी अब्राहम ने वह किया जो कोई इंसान नहीं करेगा : सृष्टिकर्ता के वचनों का एकनिष्ठ आज्ञापालन, बिना समझौता किए आज्ञापालन, बिना कोई बहाने बनाए, और बिना किसी शर्त के—उसमें ऐसी क्या बात थी जिस कारण वह वैसा कर सका जो परमेश्वर ने चाहा? एक तो उसमें परमेश्वर के प्रति सच्चा विश्वास था; उसे यकीन था कि सृष्टिकर्ता परमेश्वर है, उसका परमेश्वर, उसका प्रभु, जो सभी चीजों पर शासन करता है और जिसने इंसान को बनाया है। यह सच्चा विश्वास था। दूसरे, उसका हृदय शुद्ध था। वह सृष्टिकर्ता द्वारा कहे गए प्रत्येक वचन पर भरोसा करता था, और सृष्टिकर्ता द्वारा कहे गए प्रत्येक वचन को सरलता और सहजता से स्वीकार करने में सक्षम था। एक बात और, सृष्टिकर्ता ने उससे जो भी करने को कहा, वह कितना ही मुश्किल क्यों न हो, इससे उसे कितनी ही पीड़ा क्यों न हो, लेकिन उसका रवैया आज्ञाकारिता का था, उसने परमेश्वर से तर्क करने की कोशिश नहीं की, टालने या इंकार करने का प्रयास नहीं किया, बल्कि उसमें पूर्ण और एकनिष्ठ आज्ञाकारिता थी, उसमें परमेश्वर की अपेक्षा, उसके प्रत्येक वचन और आदेश के अनुसार कार्य करने और कार्यान्वित करने का भाव था। जैसी कि परमेश्वर की इच्छा थी और वह देखना चाहता था, वैसे ही अब्राहम ने इसहाक को वेदी पर अर्पित कर दिया, उसने उसे परमेश्वर को अर्पित किया—और उसने जो कुछ भी किया, उससे यह साबित होता है कि परमेश्वर ने सही व्यक्ति चुना था, परमेश्वर की दृष्टि में, वह धार्मिक था।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'प्रकरण तीन : कैसे नूह और अब्राहम ने परमेश्वर के वचन सुने और उसकी आज्ञा का पालन किया (भाग दो)' से उद्धृत

परमेश्वर के लोग ही परमेश्वर के वचनों को सीने से लगाकर रखते हैं, परमेश्वर के वचनों को संजोकर रखते हैं, परमेश्वर के वचनों में श्रद्धा रखते हैं, परमेश्वर के कहे प्रत्येक वचन और वाक्य का, उस परिप्रेक्ष्य का जिससे वह बोलता है और प्रत्येक अवतरण में वह जो कहता है, उसका सम्मान करते हैं। केवल परमेश्वर के शत्रु ही अक्सर उसके वचनों का उपहास और तिरस्कार करते हैं। उनकी उपेक्षा करते हैं। वे परमेश्वर के वचनों को सत्य नहीं मानते, सृष्टिकर्ता द्वारा बोले गए वचन नहीं मानते। इस तरह, अक्सर मन ही मन उनकी इच्छा होती है कि वे परमेश्वर के वचनों के साथ छेड़छाड़ करें और मनमाने ढंग से उनकी व्याख्या करें। वे परमेश्वर के वचनों को बदलने के लिए अपने तरीकों, अपने विचारों की रीति और अपनी सोच के तर्क का उपयोग करने का प्रयास करते हैं, ताकि उसके वचन भ्रष्ट मानवीय रुचि, भ्रष्ट मानवीय दृष्टिकोण और भ्रष्ट मानवीय सोच और दर्शन के अनुरूप हों, जिससे कि अंतत: वे अधिक से अधिक लोगों की प्रशंसा पा सकें। परमेश्वर के वचन परमेश्वर के वचन ही हैं, चाहे वे किसी भी विषय पर हों, किसी भी तरह संप्रेषित किए गए हों, और चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य से बोले गए हों। यह देखते हुए कि भ्रष्ट मानव परमेश्वर के वचनों को तुरंत समझ सके, उन्हें सराह सके, उन्हें आसानी से प्राप्त कर सके, जिससे कि वह उसके वचनों में छिपे सत्य को समझ सके, परमेश्वर अक्सर मानवीय भाषाओं, मानवीय पद्धतियों, तरीकों और बोलने के लहजे का और ऐसे सरल तर्कों का उपयोग करता है जिन्हें इंसान के लिए समझना सरल हो सके। परमेश्वर यह सब अपनी इच्छा को स्पष्ट करने के लिए और इंसान को उसके बारे में बताने के लिए करता है जिसमें उसे प्रवेश करना चाहिए। फिर भी मसीह-विरोधी इन्हीं अगोचर रीतियों, अगोचर लहजे और अगोचर वचनों का दुरुपयोग करके परमेश्वर के विरुद्ध आरोप लगाते हैं और उसके वचनों को सत्य मानने से इनकार करते हैं। मसीह-विरोधी अक्सर परमेश्वर के वचनों की तुलना प्रसिद्ध हस्तियों के ज्ञान और लेखन से करते हैं। यहाँ तक कि वे परमेश्वर के वचनों की तुलना जाने-माने व्यक्तियों के भाषणों, वाक्यांशों, बातचीत के लहजे और उनकी नैतिक निष्ठा से करते हैं। वे इस तरह की तुलना जितनी ज्यादा करते हैं, उन्हें परमेश्वर के वचन उतने ही कम उल्लेखनीय लगते हैं, उन्हें वे उतने ही उथले लगते हैं, और उतना ही अधिक वे उन्हें बदलना चाहते हैं, परमेश्वर के वचनों को ठीक करना चाहते हैं, उसके लहजे और शैली, साथ ही उस परिप्रेक्ष्य को सही करना चाहते हैं जिस परिप्रेक्ष्य से वह बोलता है। परमेश्वर चाहे जैसे भी बोले या इंसान परमेश्वर के वचनों से कितना भी लाभ उठाए, लेकिन मसीह-विरोधी परमेश्वर के वचनों को सत्य नहीं मानते। वे परमेश्वर के वचनों में सत्य, अभ्यास के सिद्धांत या जीवन में प्रवेश का मार्ग नहीं खोजते; बल्कि वे निरंतर अपनी बुद्धि से उन पर शोध करते हैं, उनका अध्ययन करते हैं, और परमेश्वर के वचनों के साथ गहन शोध और जाँच-पड़ताल की ऐसी मनोवृत्ति के साथ बर्ताव करते हैं। हर तरह से शोध करके, अंदर तक उनकी जाँच-पड़ताल करके, वे अपने इस विश्वास पर कायम रहते हैं कि परमेश्वर के वचनों में ऐसे अनेक स्थान हैं जिन्हें बदलने की आवश्यकता है, जिन्हें "ठीक" करने की आवश्यकता है। इसलिए, जिस दिन से कोई मसीह-विरोधी परमेश्वर के वचनों के संपर्क में आता है, और दस, बीस, तीस वर्षों तक विश्वासी रहने के बावजूद, लोगों के कहने के विपरीत, उसे तब भी न तो परमेश्वर के वचनों में जीवन नजर आता है और न ही सत्य। उसे यह भरोसा ही नहीं होता कि यह राज्य का द्वार है या स्वर्ग की ओर जाने वाला मार्ग है। उसे वह दिखायी ही नहीं देता। वह उसका पता ही नहीं लगा पाता। तो फिर वह क्या सोचता है? "ऐसा क्यों होता है कि मेरे विश्वास की अवधि जितनी बढ़ती जाती है, उतना ही मुझे यह लगता जाता है कि परमेश्वर के वचन कुछ खास नहीं हैं? मेरे विश्वास की अवधि जितनी अधिक बढ़ती जाती है, उतना ही अधिक मुझे क्यों लगता है कि परमेश्वर के वचनों में कोई सत्य नहीं है।" यह क्या है? यह अच्छा संकेत है या बुरा? (यह बुरा संकेत है।) यह बुरा संकेत कैसे है? एक बार जब तुम्हारा विश्वास ऐसी स्थिति में पहुँच जाता है, तो क्या उतना ही होकर रह जाता है? क्या तुम्हारे विश्वास का अंत हो जाता है?

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे सत्य से घृणा करते हैं, सिद्धांतों की खुले आम धज्जियाँ उड़ाते हैं और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की उपेक्षा करते हैं (भाग पाँच)' से उद्धृत

मूल रूप से मैं तुम लोगों को और अधिक सत्य प्रदान करना चाहता था, लेकिन मुझे इससे विरत होना पड़ा, क्योंकि सत्य के प्रति तुम्हारा रवैया बहुत ठंडा और उदासीन है; मैं नहीं चाहता कि मेरी कोशिशें व्यर्थ जाएँ, न ही मैं यह देखना चाहता हूँ कि लोग मेरे वचनों को तो थामे रहें, लेकिन काम हर लिहाज से ऐसे करें, जिनसे मेरा विरोध होता हो, जो मुझे कलंकित करते हों और मेरा तिरस्कार करते हों। तुम लोगों के रवैये और मानवीय स्वभाव के कारण, मैं तुम्हें अपने वचनों का एक छोटा-सा भाग ही प्रदान करता हूँ, जो तुम्हारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, और जो मनुष्यों के बीच मेरा परीक्षण-कार्य है। केवल अब मैंने वास्तव में पुष्टि की है कि जो निर्णय और योजनाएँ मैंने बनाई हैं, वे तुम लोगों की जरूरतों के अनुरूप हैं, और यह भी कि मानव-जाति के प्रति मेरा रवैया सही है। मेरे सामने तुम लोगों के कई वर्षों के व्यवहार ने मुझे बिना दृष्टांत के उत्तर दे दिया, और इस उत्तर का प्रश्न यह है कि : "सत्य और सच्चे परमेश्वर के सामने मनुष्य का रवैया क्या है?" मैंने मनुष्य के लिए जो प्रयास किए हैं, वे मनुष्य के लिए मेरे प्रेम के सार को प्रमाणित करते हैं, और मेरे सामने मनुष्य का हर कार्य सत्य से घृणा करने और मेरा विरोध करने के उसके सार को प्रमाणित करता है। मैं हर समय उन सबके लिए चिंतित रहता हूँ, जो मेरा अनुसरण करते हैं, लेकिन मेरा अनुसरण करने वाले कभी मेरे वचनों को ग्रहण करने में समर्थ नहीं होते; यहाँ तक कि वे मेरे सुझाव स्वीकार करने में भी सक्षम नहीं हैं। यह बात मुझे सबसे ज़्यादा उदास करती है। कोई भी मुझे कभी भी समझ नहीं पाया है, और इतना ही नहीं, कोई भी मुझे कभी भी स्वीकार नहीं कर पाया है, बावजूद इसके कि मेरा रवैया नेक और मेरे वचन सौम्य हैं। सभी लोग मेरे द्वारा उन्हें सौंपा गया कार्य अपने विचारों के अनुसार करने की कोशिश करते हैं; वे मेरे इरादे को जानने की कोशिश नहीं करते, मेरी अपेक्षाओं के बारे में पूछने की बात तो छोड़ ही दीजिए। वे अभी भी वफादारी के साथ मेरी सेवा करने का दावा करते हैं, जबकि वे मेरे खिलाफ विद्रोह करते हैं। बहुतों का यह मानना है कि जो सत्य उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं या जिनका वे अभ्यास नहीं कर पाते, वे सत्य ही नहीं हैं। ऐसे लोगों में सत्य ऐसी चीज़ बन जाते हैं, जिन्हें नकार दिया जाता है और दरकिनार कर दिया जाता है। उसी समय, लोग मुझे वचन में परमेश्वर के रूप में पहचानते हैं, परंतु साथ ही मुझे एक ऐसा बाहरी व्यक्ति मानते हैं, जो सत्य, मार्ग या जीवन नहीं है। कोई इस सत्य को नहीं जानता : मेरे वचन सदा-सर्वदा अपरिवर्तनीय सत्‍य हैं। मैं मनुष्य के लिए जीवन की आपूर्ति और मानव-जाति के लिए एकमात्र मार्गदर्शक हूँ। मेरे वचनों का मूल्य और अर्थ इससे निर्धारित नहीं होता कि उन्हें मानव-जाति द्वारा पहचाना या स्वीकारा जाता है या नहीं, बल्कि स्वयं वचनों के सार द्वारा निर्धारित होता है। भले ही इस पृथ्वी पर एक भी व्यक्ति मेरे वचनों को ग्रहण न कर पाए, मेरे वचनों का मूल्य और मानव-जाति के लिए उनकी सहायता किसी भी मनुष्य के लिए अपरिमेय है। इसलिए ऐसे अनेक लोगों से सामना होने पर, जो मेरे वचनों के खिलाफ विद्रोह करते हैं, उनका खंडन करते हैं, या उनका पूरी तरह से तिरस्कार करते हैं, मेरा रुख केवल यह रहता है : समय और तथ्यों को मेरी गवाही देने दो और यह दिखाने दो कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं। उन्हें यह दिखाने दो कि जो कुछ मैंने कहा है, वह सही है, और वह ऐसा है जिसकी आपूर्ति लोगों को की जानी चाहिए, और इतना ही नहीं, जिसे मनुष्य को स्वीकार करना चाहिए। मैं उन सबको, जो मेरा अनुसरण करते हैं, यह तथ्य ज्ञात करवाऊँगा : जो लोग पूरी तरह से मेरे वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों का अभ्यास नहीं कर सकते, जिन्हें मेरे वचनों में कोई लक्ष्य नहीं मिल पाता, और जो मेरे वचनों के कारण उद्धार प्राप्त नहीं कर पाते, वे लोग हैं जो मेरे वचनों के कारण निंदित हुए हैं और इतना ही नहीं, जिन्होंने मेरे उद्धार को खो दिया है, और मेरी लाठी उन पर से कभी नहीं हटेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए' से उद्धृत

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