46. व्‍यक्ति के स्‍वभाव में परिवर्तन के सवाल पर मनन के सिद्धांत

(1) मनन करो कि क्‍या ईमानदार व्‍यक्ति बनने की तुम्‍हारी कोशिशें कारगर हुई हैं, क्‍या झूठ और धोखा अभी भी तुम्‍हारे अंदर बने हुए हैं, क्‍या अपने कर्तव्‍य का पालन करते हुए तुम वफादार हो, और क्‍या तुम सिद्धांतों के मुताबिक आचरण कर सकते हो।

(2) मनन करो कि क्‍या चीजों के बारे में तुम्‍हारे दृष्टिकोण, जीवन के प्रति तुम्‍हारा नजरिया, और तुम्‍हारे मूल्‍य सत्‍य के अनुरूप हैं; मनन करो कि तुमने कितने शैतानी फलसफों और व्‍यवस्‍थाओं से खुद को परिष्कृत कर लिया है; और मनन करो कि तुम्‍हारा रूपान्‍तरण हुआ है या नहीं।

(3) मनन करो कि क्‍या तुममें अय्यूब की आस्‍था है, क्‍या तुम परमेश्‍वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में सक्षम हो, और क्‍या तुम सच्‍चे अर्थों में परमेश्‍वर को जानते और उससे प्रेम करते हो।

(4) मनन करो कि क्‍या तुम वह व्‍यक्ति हो जो सत्‍य का अभ्‍यास करता है और सच्‍चे मन से परमेश्‍वर के प्रति समर्पण करता है, और क्‍या तुम परीक्षणों के दौरान शैतान पर विजय प्राप्‍त करने में, अपनी गवाही में दृढ़ रहने में, और परमेश्‍वर को संतुष्ट करने में सक्षम हो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मनुष्य के स्वभाव का रूपांतरण परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके पास जाने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में रूपांतरण दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के दिल के क़रीब है। आज देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए आया है और वह अपेक्षा रखता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति आज्ञाकारी हो, उसके लिए उसकी गवाही दे—उसके व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जाने, उसके उन सभी वचनों और कार्य का पालन करे, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और उस समस्त कार्य की गवाही दे, जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और साथ ही सभी कर्मों की जिन्हें वह मनुष्य को जीतने के लिए कार्यान्वित करता है। जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही अचूक और वास्तविक होती है और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्‍वर अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने उसके न्याय और उसकी ताड़ना, व्यवहार और काट-छाँट से गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है और इसी तरह वह अपनी गवाही देने के लिए उन लोगों का भी उपयोग करता है, जिनका स्वभाव बदल गया है और जिन्होंने इस प्रकार उसके आशीर्वाद प्राप्त कर लिए हैं। उसे मनुष्य की आवश्यकता नहीं, जो अपने मुँह से उसकी स्तुति करे, न ही उसे शैतान की किस्म के लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जिन्हें उसने नहीं बचाया है। केवल वो जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही देने योग्य हैं और केवल वो जिनके स्वभाव को रूपांतरित कर दिया गया है, उसकी गवाही देने योग्य हैं। परमेश्वर जानबूझकर मनुष्य को अपने नाम को शर्मिंदा नहीं करने देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से उद्धृत

स्वभाव में परिवर्तन का क्या अर्थ है? यह तब होता है जब एक सत्य का प्रेमी, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए, उसके वचनों के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करता है, और सभी तरह की पीड़ाओं और परिशोधन का अनुभव करता है। इस तरह का व्यक्ति अपने भीतर उपस्थित शैतानी विष से शुद्ध हो जाता है और पूरी तरह अपने भ्रष्ट स्वभावों के चंगुल से बच निकलता है, ताकि वो परमेश्वर के वचनों, उसके सारे आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो सके और कभी परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह या प्रतिरोध न करे। यह स्वभाव में परिवर्तन है। ... स्वभाव में रूपांतरण का मतलब है कि एक व्यक्ति, क्योंकि वह सत्य को प्यार करता है और उसे स्वीकार कर सकता है, अंततः अपनी अवज्ञाकारी और परमेश्वर-विरोधी प्रकृति को जान जाता है; वह समझता है कि मनुष्य गहराई से भ्रष्ट है और मनुष्य के बेतुकेपन और धोखाधड़ी को समझता है, वह मनुष्य की कमजोरियों और दयनीयता को जानता है, और अंत में मनुष्य की प्रकृति और सार को समझ जाता है। यह सब जानकर, वह स्वयं को पूरी तरह अस्वीकार और त्यागने में समर्थ हो जाता है, परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन व्यतीत कर सकता है, और सभी बातों में सत्य पर चलने में समर्थ हो जाताहै। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर को जानता है और उसका स्वभाव बदल चुका है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

स्वभाव में रूपांतरण मुख्य रूप से एक व्यक्ति की प्रकृति में रूपांतरण को संदर्भित करता है। किसी व्यक्ति की प्रकृति को बाहरी व्यवहारों से नहीं देखा जा सकता; उसका सीधा संबंध लोगों के अस्तित्व के मूल्य और महत्व से है। अर्थात इसमें जीवन के बारे में व्यक्ति का दृष्टिकोण और उसके मूल्य, उसका सार और उसकी आत्मा के भीतर गहराई में स्थित चीज़ें शामिल हैं। अगर एक व्यक्ति सत्य को स्वीकार नहीं कर पाता, तो उसे इन पहलुओं में किसी परिवर्तन से नहीं गुज़रना होगा। केवल अगर लोगों ने परमेश्वर के कार्य का पूरी तरह अनुभव किया है और पूरी तरह से सत्य में प्रवेश किया है, अगर उन्होंने अस्तित्व और जीवन पर अपने मूल्यों और दृष्टिकोणों को बदला है, अगर चीजों को वैसे ही देखा है जैसे परमेश्वर देखता है, और अगर वे पूरी तरह से अपने को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत और समर्पित करने में सक्षम हो गए हैं, तभी कहा जा सकता है कि उनके स्वभाव रूपांतरित हो गए हैं। ऐसा लग सकता है कि तुम कुछ प्रयास कर रहे हो, तुम कठिनाई के सामने लचीले हो सकते हो, तुम ऊपर से मिली कार्य व्यवस्थाओं को पूरा करने में सक्षम हो सकते हो, या तुम्हें जहाँ भी जाने के लिए कहा जाए तुम वहाँ जा सकते हो, लेकिन ये व्यवहार के केवल बहुत ही छोटे परिवर्तन हैं, और तुम्हारे स्वभाव के परिवर्तन के तौर पर गिने नहीं जा सकते हैं। तुम कई रास्तों पर जाने में सक्षम हो सकते हो, तुम कई कठिनाइयों का सामना कर सकते हो और घोर अपमान को सहन करने में सक्षम हो सकते हो; तुम महसूस कर सकते हो कि तुम परमेश्वर के बहुत करीब हो और पवित्र आत्मा तुम्हारे में काम कर रहा है, लेकिन जब परमेश्वर तुम से कुछ ऐसा करने के लिए अनुरोध करता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, तो तुम शायद अभी भी समर्पित नहीं हो पाओ, बल्कि तुम शायद बहाने ढूँढने लगो, तुम परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और विरोध कर सकते हो, इस हद तक कि तुम परमेश्वर की आलोचना और उसके ख़िलाफ़ विरोध करते हो। यह एक गंभीर समस्या होगी! यह साबित करता है कि तुममें अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने की प्रकृति है और तुम ज़रा भी परिवर्तित नहीं हुए हो। कुछ लोग तो परमेश्वर की आलोचना करने की सीमा तक चले जाते हैं, कहते हैं कि वह धार्मिक नहीं है। वे परमेश्वर के बारे में धारणाएँ भी रखते हैं, यहाँ तक कि वे परमेश्वर के साथ बहस करने या उससे माँग करने में भी सक्षम होते हैं : "परमेश्वर को यह काम खुले तौर पर करना चाहिए, ताकि हर किसी को मामले के सही-गलत होने का आकलन करने का मौका मिले।" यह तथ्य कि मनुष्य ऐसे कार्य करने में सक्षम हैं, यह साबित करता है कि वे परमेश्वर का विरोध करने वाले राक्षस हैं। उनकी प्रकृति कभी नहीं बदलेगी। ऐसे व्यक्ति को त्याग देना चाहिए। केवल उन लोगों के लिए ही सत्य को प्राप्त करने और अपने स्वभाव में बदलाव लाने की आशा है, जो सत्य को स्वीकार कर सकते हैं, और जो परमेश्वर के कार्य को न जानने की स्थिति में सत्य की खोज और जाँच कर सकते हैं और उसे समझ सकते हैं, और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करने में सक्षम हो सकते हैं। तुम्हारे अनुभव में, कुछ सामान्य स्थितियाँ हैं जिन्हें विशिष्ट रूप से समझना चाहिए। शायद जब तुम प्रार्थना करते हो तब तुम फूट-फूट कर रोते हो, या शायद तुम अपने दिल में परमेश्वर के लिए बहुत प्रेम महसूस करते हो और तुम परमेश्वर के करीब महसूस करते हो। जब पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य करता है, तो तुम इसी अवस्था में होते हो, लेकिन तुम अभी भी वह व्यक्ति नहीं होते जो परमेश्वर से प्रेम करता है, तुम अभी भी वह व्यक्ति नहीं होते जिसके पास सत्य होता है, और तुम वह व्यक्ति तो बिलकुल भी नहीं होते जिसका स्वभाव बदल दिया गया है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए' से उद्धृत

अपने स्वभाव में बदलाव की खोज में, तुम्हें स्वयं की समझ में एक निश्चित अवस्था तक पहुँचना चाहिए, जहाँ तुम उन शैतानी विषों का पता लगा सको जो तुम्हारी प्रकृति के भीतर बसी हैं। तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर की अवहेलना करने का क्या मतलब है, साथ ही साथ परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करने का क्या अर्थ है, और तुम्हें यह सीखना चाहिए कि सभी मामलों में सत्य के अनुरूप आचरण कैसे करना है। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं के बारे में भी कुछ समझ प्राप्त करनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के समक्ष ज़मीर और विवेक से युक्त होना चाहिए, तुम्हें डींगे नहीं हांकनी चाहिए और परमेश्वर से धोखा नहीं करना चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर का विरोध करने वाली बातें अब नहीं करनी चाहिए। इस तरह, तुमने अपना स्वभाव बदल लिया होगा। जिनके स्वभाव बदल गए हैं वे मन की गहराई में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा का अनुभव करते हैं, और परमेश्वर के प्रति उनका विद्रोह धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसके अलावा, अपने कर्तव्यों के निर्वहन में, उन्हें अब आवश्यकता नहीं होती कि दूसरे उनकी चिंता करें, और न ही पवित्र आत्मा को हमेशा उन पर अनुशासनात्मक कार्य करने की आवश्यकता होती है। वे मूलत: परमेश्वर को समर्पित हो सकते हैं, और चीज़ों पर उनके विचारों में सत्य मौजूद होता है। यह सब परमेश्वर के साथ संगत होने के बराबर है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

स्वभाव में बदलाव की एक विशेषता होती है। अर्थात्, उन चीज़ों को मानने में सक्षम होना जो सही हैं और सत्य के अनुरूप हैं। चाहे कोई भी तुम्हें सुझाव दे—चाहे वे युवा हों या बूढ़े, चाहे तुम्हारी उनसे अच्छी तरह से पटती हो, चाहे तुम लोगों के बीच का संबंध अच्छा हो या बुरा—जब तक कि वे कुछ ऐसा कहते हैं जो सही है, सत्य के अनुरूप है, और परमेश्वर के परिवार के कार्य के लिए फायदेमंद है, तब तक तुम इसे सुन, ग्रहण और स्वीकार कर सकते हो, और किन्हीं भी अन्य कारकों से प्रभावित नहीं हो सकते हो। यह उस विशेषता का पहला पहलू है। सबसे पहले तुम सत्य को, और साथ ही उन चीज़ों को स्वीकार कर सकते हो जो सही हैं और सत्य के अनुरूप हैं। दूसरा यह है कि किसी समस्या का सामना होने पर सत्य की खोज करने में सक्षम होना। तुम न केवल सत्य को स्वीकार कर सकते हो; तुम्हें इसकी तलाश करने में भी समर्थ अवश्य होना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि तू किसी नई समस्या का सामना करता है जिसे कोई भी नहीं समझ सकता है, तो तू सत्य की तलाश कर सकता है, यह देख सकता है कि बातों को सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप बनाने के लिए और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए तुझे क्या करना और किस चीज़ का अभ्यास करना चाहिए। एक और विशेषता है परमेश्वर की इच्छा के बारे में मननशील होने की योग्यता पाना। तुझे परमेश्वर की इच्छा के बारे में कैसे मननशील होना चाहिए? यह इस बात पर निर्भर करता है कि तू कौन से कर्तव्य को कर रहा है और इस कर्तव्य में परमेश्वर की क्या अपेक्षाएँ हैं। तुझे इस सिद्धांत को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। अपना कर्तव्य परमेश्वर की अपेक्षानुसार पूरा करना चाहिए, और इसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए करना चाहिए। तुझे परमेश्वर की इच्छा भी समझनी चाहिए, और तेरे कर्तव्य का वांछित परिणाम क्या है, एवं तुझे ज़िम्मेदारी और आस्थापूर्ण रूप से कार्य करना चाहिए। ये सभी परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होने के तरीके हैं। यदि तू यह नहीं जानता है कि जो तू कर रहा है, उसमें परमेश्वर की इच्छा पर कैसे मननशील हुआ जाए, तो उसे पूरा करने के लिए, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तुझे कुछ खोज अवश्य करनी चाहिए। अगर तुम सब इन तीन सिद्धांतों को अमल में ला सको, तुम उनके सहारे जिस तरह वास्तव में जी रहे हो, उसे माप सको, और अभ्यास के मार्ग को खोज सको, तो फिर तुम सैद्धांतिक तरीके से मामलों को संभाल रहे होगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य को अभ्यास में लाकर ही तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव की बेड़ियों को तोड़ सकते हो' से उद्धृत

अपने स्वभाव में परिवर्तन की कोशिश करते हुए तुम्हें समझना चाहिए कि स्वभावगत परिवर्तन से किस चीज का कोई लेना-देना नहीं है और क्या चीज इसके दायरे में नहीं आती, बल्कि वह बाहरी अच्छा व्यवहार है, जब परमेश्वर स्वभाव में परिवर्तन के बारे में बात करता है तो उसका क्या मतलब होता है, और परमेश्वर लोगों में क्या बदलना चाहता है। लोगों को ये बातें समझनी चाहिए। तुम जिसे स्वभाव में परिवर्तन समझते हो और परमेश्वर जिसे स्वभाव में परिवर्तन कहता है, वे दो अलग चीजें हैं, दो मार्ग हैं। जो तुम्हारे मन में है, वह अंत में परमेश्वर की इच्छा पूरी नहीं करेगा। परमेश्वर जिसे स्वभाव में परिवर्तन कहता है, वह तब होता है जब कोई व्यक्ति सत्य का अभ्यास करने और न्याय और ताड़ना किए जाने के माध्यम से, निपटे जाने और काट-छाँट किए जाने, और परमेश्वर द्वारा परीक्षण और शोधन किए जाने के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा और सत्य-सिद्धांतों की समझ हासिल करता है, और सत्य-सिद्धांतों के अनुसार जीवन जीता है, जब तक कि वह समर्पण प्राप्त नहीं कर लेता और परमेश्वर के प्रति श्रद्धापूर्ण हृदय नहीं रखता, परमेश्वर के बारे में कोई गलतफहमी नहीं रखता, और परमेश्वर का सच्चा ज्ञान रखता है, और वास्तव में उसकी आराधना करता है। परमेश्वर जिसकी बात करता है, वह व्यक्ति के स्वभाव से संबंध रखता है; तो जब लोग स्वभाव में परिवर्तन की बात करते हैं, तो उनका क्या अर्थ होता है? उनका अर्थ होता है कि व्यक्ति का व्यवहार बेहतर हो गया है, कि व्यक्ति निष्कपट और अच्छी तरह से विनियमित दिखाई देता है, उसकी वाणी सभ्य होती है, और वह दूसरों के साथ अपने संबंधों में अपने विवेक पर ध्यान देता है और नैतिक मानदंड रखता है। क्या इसमें और परमेश्वर ने जो कहा, उसमें कोई अंतर है? चाहे लोगों से संबंधित हों या चीजों से, तुम्हारी सभी प्रेरणाएँ, तुम्हारे कार्यों के पीछे के सिद्धांत, और मूल्यांकन के तुम्हारे मानदंड सत्य के अनुरूप होने चाहिए और तुम्हें सत्य-सिद्धांतों की तलाश करनी होगी। केवल इसी तरह स्वभाव में बदलाव हासिल किया जा सकता है। अगर तुम एक मापक के रूप में हमेशा व्यवहारगत मानदंडों का उपयोग करते हो और हमेशा व्यवहार में बाहरी परिवर्तनों पर ध्यान केंद्रित करते हो, लेकिन अपने भ्रष्ट स्वभाव का समाधान करने के लिए सत्य की तलाश नहीं करते, तो तुम परमेश्वर की धार्मिकता और पवित्रता का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते, ऐसे में तुम कैसे परमेश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा रखने वाला हृदय विकसित करोगे? अगर कोई व्यक्ति परमेश्वर का भय नहीं मान सकता और बुराई से दूर नहीं रह सकता, तो कितनी भी संख्या में अच्छे व्यवहार हों, इसका अर्थ यह नहीं है कि वे वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पित हो सकते हैं। इसलिए किसी के अच्छे व्यवहारों की संख्या जितनी भी हो, इसका मतलब यह नहीं है कि उसके स्वभाव में कोई बदलाव आ गया है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य का अभ्यास करके ही कोई सामान्य मानवता से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

लोगों का व्यवहार अच्छा हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके अंदर सत्य है। लोगों का उत्साह उनसे केवल सिद्धांतों का अनुसरण और नियम का पालन करवा सकता है; लेकिन जो लोग सत्य से रहित हैं उनके पास मूलभूत समस्याओं का समाधान करने का कोई रास्ता नहीं होता, न ही सिद्धांत सत्य का स्थान ले सकता है। जिन लोगों ने अपने स्वभाव में परिवर्तन का अनुभव किया है, वे अलग हैं; उन्होंने सत्य समझ लिया है, वे सभी मुद्दों पर विवेकी होते हैं, वे जानते हैं कि कैसे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करना है, कैसे सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना है, कैसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कार्य करना है, और वे उस भ्रष्टता की प्रकृति को समझते हैं जो वे प्रकट करते हैं। जब उनके अपने विचार और धारणाएँ प्रकट होती हैं, तो वे विवेकी बनकर देह की इच्छाओं को छोड़ सकते हैं। स्वभाव में परिवर्तन को इस प्रकार व्यक्त किया जाता है। जो लोग स्वभाव में परिवर्तन से गुज़रे हैं, उनके बारे में मुख्य बात यह है कि उन्होंने स्पष्ट रूप से सत्य समझ लिया है, और कार्य करते समय तो वे सापेक्ष सटीकता के साथ सत्य का अभ्यास करते हैं और वे अक्सर भ्रष्टता नहीं दिखाते। आम तौर पर, जिन लोगों का स्वभाव बदल गया है, वे खासकर तर्कसंगत और विवेकपूर्ण प्रतीत होते हैं, और सत्य की अपनी समझ के कारण, वे उतनी आत्म-तुष्टि और दंभ नहीं दिखाते। वे अपनी प्रकट हुई भ्रष्टता में से काफ़ी कुछ समझ-बूझ लेते हैं, इसलिए उनमें अभिमान उत्पन्न नहीं होता। मनुष्य का क्या स्थान है, कैसे उचित व्यवहार करना है, कैसे कर्तव्यनिष्ठ होना है, क्या कहना और क्या नहीं कहना है, और किन लोगों से क्या कहना और क्या करना है, इस बारे में उन्हें एक विवेकपूर्ण समझ होती है। इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि इस प्रकार के लोग अपेक्षाकृत तर्कसंगत होते हैं। जिन लोगों का स्वभाव बदल जाता है, वे वास्तव में एक मनुष्य के समान जीवन जीते हैं, और उनमें सत्य होता है। वे हमेशा सत्य के अनुरूप बोलने और चीज़ों को देखने में समर्थ होते हैं और वे जो भी करते हैं, सैद्धांतिक रूप से करते हैं; वे किसी व्यक्ति, मामले या चीज़ के प्रभाव में नहीं होते, उन सभी का अपना दृष्टिकोण होता है और वे सत्य-सिद्धांत को कायम रख सकते हैं। उनका स्वभाव सापेक्षिक रूप से स्थिर होता है, वे असंतुलित नहीं होते, चाहे उनकी स्थिति कैसी भी हो, वे समझते हैं कि कैसे उन्हें अपने कर्तव्य को सही ढंग से निभाना है और परमेश्वर की संतुष्टि के लिए कैसे व्यवहार करना है। जिन लोगों के स्वभाव वास्तव में बदल गए हैं वे इस पर ध्यान नहीं देते कि सतही तौर पर स्वयं को अच्छा दिखाने के लिए क्या किया जाए; परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए क्या करना है, इस पर उन्होंने आंतरिक स्पष्टता पा ली है। इसलिए, हो सकता है कि बाहर से वे इतने उत्साही न दिखें या ऐसा न लगे कि उन्होंने कुछ बड़ा किया है, लेकिन वो जो कुछ भी करते हैं वह सार्थक होता है, मूल्यवान होता है, और उसके परिणाम व्यावहारिक होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं उनके अंदर निश्चित रूप से बहुत सत्य होता है, और इस बात की पुष्टि चीज़ों के बारे में उनके दृष्टिकोण और सैद्धांतिक कार्यों के आधार पर की जा सकती है। जिन लोगों में सत्य नहीं है, उनके स्वभाव में कोई बिलकुल परिवर्तन नहीं हुआ है। स्वभाव में परिवर्तन का अर्थ परिपक्व और कुशल मानवता से युक्त होना नहीं है; यह मुख्य रूप से उन घटनाओं को संदर्भित करता है जिसमें लोगों की प्रकृति के भीतर के कुछ शैतानी विष, परमेश्वर का ज्ञान पा लेने और सत्य समझ लेने के परिणामस्वरूप बदल जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि उन शैतानी विषों को दूर कर दिया जाता है, और परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य ऐसे लोगों के भीतर जड़ें जमा लेता है, उनका जीवन बन जाता है, और उनके अस्तित्व की नींव बन जाता है। तभी वे नए लोग बनते हैं, और इस तरह उनका स्वभाव रूपांतरित होता है। स्वभाव में रूपांतरण का मतलब यह नहीं है कि उनका बाहरी स्वभाव पहले की तुलना में विनम्र हो गया है, कि वे अभिमानी हुआ करते थे लेकिन अब तर्कसंगत ढंग से बोलते हैं, या वे पहले किसी की नहीं सुनते थे, लेकिन अब वे दूसरों की बात सुन सकते हैं; ऐसे बाहरी परिवर्तन स्वभाव के रूपान्तरण नहीं कहे जा सकते। बेशक स्वभाव के रूपांतरण में ये अवस्थाएँ और अभिव्यक्तियाँ शामिल हैं, लेकिन सर्वाधिक महत्व की बात यह है कि अंदर से उनका जीवन बदल गया है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य ही उनका जीवन बन जाता है, उनके भीतर का शैतानी विष निकाल दिया गया है, उनका दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल गया है और उनमें से कुछ भी दुनिया के अनुसार नहीं है। ये लोग बड़े लाल अजगर की योजनाओं और विष को उनके असल रूप में स्पष्टता से देख सकते हैं; उन्होंने जीवन का सच्चा सार समझ लिया है। इस तरह उनके जीवन के मूल्य बदल गए हैं, और यह सबसे मौलिक किस्म का रूपांतरण है और स्वभाव में परिवर्तन का सार है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर' से उद्धृत

स्वभाव में रूपांतरण लाना कोई आसान काम नहीं है; इसका मतलब महज़ व्यवहार में थोड-सा बदलाव लाना और सत्य का थोड़ा ज्ञान हासिल कर लेना, सत्य के हर पहलू के बारे में अपने अनुभव पर थोड़ा बात कर लेना, या थोड़ा-सा बदल जाना, अनुशासित किए जाने के बाद थोड़ा-सा आज्ञाकारी हो जाना नहीं है। ये चीज़ें जीवन स्वभाव में रूपांतरण का अंग नहीं हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? भले ही तुम थोड़ा-बहुत बदल गए हो, लेकिन तुम अभी भी सही मायने में सत्य का अभ्यास नहीं कर रहे हो। तुम शायद इस तरह से व्यवहार इसलिए करते हो क्योंकि तुम कुछ समय के लिए उपयुक्त परिवेश में और अनुकूल स्थिति में हो या तुम्हारी वर्तमान परिस्थितियों ने तुम्हें इस तरह से व्यवहार करने के लिए मजबूर किया है। साथ ही, जब तुम्हारी मन:स्थिति स्थिर हो और पवित्र आत्मा कार्यरत हो, तो तुम अभ्यास कर पाते हो। यदि तुम अय्यूब की तरह परीक्षणों से गुज़रकर कष्ट उठा रहे होते, या पतरस की तरह जिसे परमेश्वर ने मर जाने के लिए कहा था, क्या तुम यह कह पाते, "अगर तुम्हें जानने के बाद मैं मर भी जाऊं, तो कोई बात नहीं"? स्वभाव में रूपांतरण कोई रातोंरात नहीं होता, और न ही इसका मतलब यह है कि सत्य को समझकर तुम प्रत्येक वातावरण में सत्य को अभ्यास में ला पाओगे। इससे मनुष्य की प्रकृति जुड़ी हुई है। ऐसा लग सकता है जैसे तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो, लेकिन वास्तव में, तुम्हारे कृत्यों की प्रकृति यह नहीं दर्शाती कि तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो। कई लोगों के बाहरी व्यवहार निश्चित प्रकार के होते हैं, जैसे, अपने परिवार और काम-धंधे का त्याग करके अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर पाना, इसलिए वो मानते हैं कि वो सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। लेकिन परमेश्वर नहीं मानता कि वो सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। अगर तुम्हारे हर काम के पीछे व्यक्तिगत इरादे हों और यह दूषित हो, तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर रहे हो; तुम्हारा आचरण केवल बाहरी दिखावा है। सच कहें, तो परमेश्वर तुम्हारे आचरण की निंदा करेगा; वह इसकी प्रशंसा नहीं करेगा या इसे याद नहीं रखेगा। इसका आगे विश्लेषण करें तो, तुम दुष्टता कर रहे हो, तुम्हारा व्यवहार परमेश्वर के विरोध में है। बाहर से देखने पर तो तुम किसी चीज़ में अवरोध या व्यवधान नहीं डाल रहे हो और तुमने वास्तविक क्षति नहीं पहुंचाई है या किसी सत्य का उल्लंघन नहीं किया है। यह न्यायसंगत और उचित लगता है, मगर तुम्हारे कृत्यों का सार दुष्टता करने और परमेश्वर का विरोध करने से संबंधित है। इसलिए परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में अपने कृत्यों के पीछे के अभिप्रायों को देखकर तुम्हें निश्चित करना चाहिए कि क्या तुम्हारे स्वभाव में कोई परिवर्तन हुआ है, क्या तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो। यह इस इंसानी नज़रिए पर निर्भर नहीं करता कि तुम्हारे कृत्य इंसानी कल्पनाओं और इरादों के अनुरूप हैं या नहीं या वो तुम्हारी रुचि के उपयुक्त हैं या नहीं; ऐसी चीज़ें महत्वपूर्ण नहीं हैं। बल्कि, यह इस बात पर आधारित है कि परमेश्वर की नज़रों में तुम उसकी इच्छा के अनुरूप चल रहे हो या नहीं, तुम्हारे कृत्यों में सत्य-वास्तविकता है या नहीं, और वे उसकी अपेक्षाओं और मानकों को पूरा करते हैं या नहीं। केवल परमेश्वर की अपेक्षाओं से तुलना करके अपने आपको मापना ही सही है। स्वभाव में रूपांतरण और सत्य को अभ्यास में लाना उतना सहज और आसान नहीं है जैसा लोग सोचते हैं। क्या तुम लोग अब इस बात को समझ गए? क्या इसका तुम सबको कोई अनुभव है? जब समस्या के सार की बात आती है, तो शायद तुम लोग इसे नहीं समझ सकोगे; तुम्हारा प्रवेश बहुत ही उथला रहा है। तुम लोग सुबह से शाम तक भागते-दौड़ते हो, तुम लोग जल्दी उठते हो और देर से सोते हो, फिर भी तुम्हारा स्वभाव रूपांतरित नहीं हुआ है, और तुम इस बात को समझ नहीं सकते कि इस रूपांतरण में क्या-क्या चीज़ें शामिल हैं। इसका अर्थ है कि तुम्हारा प्रवेश बहुत ही उथला है, है न? भले ही तुम अधिक समय से परमेश्वर में आस्था रखते आ रहे हो, लेकिन हो सकता है कि तुम लोग स्वभाव में रूपांतरण हासिल करने के सार और उसकी गहराई को महसूस न कर सको। क्या यह कहा जा सकता है कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है? तुम कैसे जानते हो कि परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा करता है या नहीं? कम से कम, तुम अपने हर काम में ज़बर्दस्त दृढ़ता महसूस करोगे और तुम महसूस करोगे कि जब तुम अपने कर्तव्यों को पूरा कर रहे हो, परमेश्वर के घर में कोई काम कर रहे हो, या सामान्य तौर पर भी, पवित्र आत्मा तुम्हारा मार्गदर्शन और प्रबोधन कर रहा है और तुममें कार्य कर रहा है। तुम्हारा आचरण परमेश्वर के वचनों के अनुरूप होगा, और जब तुम्हारे पास कुछ हद तक अनुभव हो जाएगा, तो तुम महसूस करोगे कि अतीत में तुमने जो कुछ किया वह अपेक्षाकृत उपयुक्त था। लेकिन अगर कुछ समय तक अनुभव प्राप्त करने के बाद, तुम महसूस करो कि अतीत में तुम्हारे द्वारा किए गए कुछ काम उपयुक्त नहीं थे, तुम उनसे असंतुष्ट हो, और वास्तव में तुम्हारे द्वारा किए गए कार्यों में कोई सत्यता नहीं थी, तो इससे यह साबित होता है कि तुमने जो कुछ भी किया, वह परमेश्वर के विरोध में था। यह साबित करता है कि तुम्हारी सेवा विद्रोह, प्रतिरोध और मानवीय व्यवहार से भरी हुई थी।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए' से उद्धृत

इससे पहले लोग किस आधार पर रहते थे? सभी लोग स्वयं के लिए जीते हैं। मैं तो बस अपने लिए सोचूँगा, बाकियों को शैतान ले जाए—यह मानव प्रकृति का निचोड़ है। लोग अपनी ख़ातिर परमेश्वर पर विश्वास करते हैं; वे चीजों को त्यागते हैं, परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते हैं और परमेश्वर के प्रति वफादार रहते हैं—लेकिन फिर भी वे ये सब स्वयं के लिए करते हैं। संक्षेप में, यह सब स्वयं के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जाता है। दुनिया में, सब कुछ निजी लाभ के लिए होता है। परमेश्वर पर विश्वास करना आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए है, और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए ही कोई व्यक्ति सब कुछ छोड़ देता है, और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कोई व्यक्ति बहुत दुःख का भी सामना कर सकता है। यह सब मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति का प्रयोगसिद्ध प्रमाण है। हालांकि, जिन लोगों के स्वभाव में परिवर्तन आया है, वे भिन्न होते हैं; वे मानते हैं कि सार्थक रूप से कैसे जीना चाहिए, मानव कहलाने के योग्य होने के लिए एक व्यक्ति के कर्तव्यों को कैसे पूरा करना चाहिए, परमेश्वर की आराधना कैसे करनी चाहिए, और परमेश्वर के प्रति समर्पित कैसे होना चाहिए और उसे संतुष्ट कैसे करना चाहिए—यह सब इस बात का आधार है कि मनुष्य होने का क्या अर्थ है, और यह स्वर्ग द्वारा आदेशित और पृथ्वी द्वारा स्वीकृत दायित्व है। अन्यथा, वे मानव कहलाने के योग्य नहीं होंगे; उनके जीवन खाली और निरर्थक होंगे। वे यह महसूस करते हैं कि लोगों को परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए, अपने कर्तव्य अच्छी तरह से पूरे करने के लिए जीना चाहिए, उन्हें एक सार्थक जीवन जीना चाहिए, ताकि जब उनके मरने का समय हो तब भी, वे संतुष्ट महसूस करें और उनमें जरा-सा भी पछतावा न हो, और यह कि वे व्यर्थ नहीं जिए हैं। इन दो प्रकार की परिस्थितियों की तुलना करने से, हम देखते हैं कि बाद वाला वह व्यक्ति है जिसका स्वभाव बदल गया है, और चूँकि उसका जीवन-स्वभाव बदल चुका है, जीवन पर उसका दृष्टिकोण निश्चित रूप से बदल गया है। इन अलग मूल्यों के साथ, वह फिर कभी खुद के लिए नहीं जीएगा, और परमेश्वर पर उसका विश्वास फिर कभी अपने लिए आशीर्वाद पाने के उद्देश्य के लिए नहीं होगा। वह इसे कहने में सक्षम होगा, "परमेश्वर को जानने के बाद, मेरे लिए मृत्यु क्या है? परमेश्वर को जानने से मुझे एक सार्थक जीवन जीने में मदद मिली है। मैं व्यर्थ में नहीं जिया हूँ और मैं पछतावे के साथ नहीं मरूँगा—मुझे कोई शिकायत नहीं है।" क्या यह जीवन पर एक परिवर्तित दृष्टिकोण नहीं है? इसलिए, किसी के जीवन स्वभाव में परिवर्तन का मुख्य कारण उसके भीतर सत्य का होना है, और परमेश्वर का ज्ञान होना है; इससे जीवन पर व्यक्ति का दृष्टिकोण बदल जाता है, और मूल्य पहले से भिन्न हो जाते हैं। यह परिवर्तन व्यक्ति के भीतर से, और उसके जीवन से शुरू होता है; यह निश्चित रूप से सिर्फ एक बाहरी परिवर्तन नहीं है। कुछ नए विश्वासियों ने, परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद, लौकिक चीज़ों को पीछे छोड़ दिया है; जब वे अविश्वासियों से मिलते हैं तो वे कुछ नहीं बोलते हैं, और वे शायद ही कभी अपने अविश्वासी रिश्तेदारों और मित्रों से मिलते हैं। अविश्वासियों का कहना होता है, "यह व्यक्ति सचमुच बदल चुका है।" इसलिए वे सोचते हैं, "मेरा स्वभाव सचमुच बदल गया है—अविश्वासी कहते हैं कि मैं बदल गया हूँ।" सच कहें तो, क्या उनके स्वभाव में वास्तव में बदलाव आया है? नहीं आया है। ये केवल बाह्य परिवर्तन हैं। उनके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, और उनकी शैतानी प्रकृति उनके भीतर जड़ें जमाये हुए है, पूरी तरह अछूती रही है। कभी-कभी, लोग पवित्र आत्मा के कार्य की वजह से उत्साह में आ जाते हैं; कुछ बाहरी परिवर्तन होते हैं, और वे कुछ अच्छे कर्म करते हैं। लेकिन यह स्वभाव में परिवर्तन के बराबर नहीं है। तुम बिना सत्य के हो, चीज़ों के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण नहीं बदला है, यहाँ तक कि यह अविश्वासी लोगों से भी अलग नहीं है, और जीवन के बारे में तुम्हारे मूल्य और दृष्टिकोण नहीं बदले हैं। तुम्हारे पास एक ऐसा हृदय भी नहीं है जो परमेश्वर का सम्मान करे—जो कि तुममें होना ही चाहिए—तो तुम अपने स्वभाव में बदलाव लाने के थोड़ा-भी करीब नहीं हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर' से उद्धृत

अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन का प्रयास करने में, अभ्यास का मार्ग सरल है। यदि, अपने व्यावहारिक अनुभव में, तू पवित्र आत्मा के मौजूदा वचनों का पालन और परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर सकता है, तो तेरा स्वभाव परिवर्तित हो सकता है। यदि तू पवित्र आत्मा की हर बात का पालन करता है, पवित्र आत्मा की कही हर बात की खोज करता है, तो तू उसकी आज्ञा का पालन करने वाला व्यक्ति है, और तेरे स्वभाव में परिवर्तन होगा। पवित्र आत्मा के मौजूदा वचनों से लोगों का स्वभाव परिवर्तित होता है; यदि तू हमेशा अपने पुराने अनुभवों और नियमों से चिपका रहता है, तो तेरे स्वभाव में परिवर्तन नहीं हो सकता। यदि पवित्र आत्मा के आज के वचन सभी लोगों को एक सामान्य मानवता की जिंदगी में प्रवेश करने को कहें, लेकिन तेरा ध्यान बाहरी चीज़ों पर ही अटका रहता है और तू वास्तविकता के बारे में अनिश्चित है और इसे गंभीरता से नहीं लेता है, तो तू पवित्रात्मा के कार्य के साथ कदम से कदम मिलाने में असफल हो गया है, तू कोई ऐसा है जिसने पवित्र आत्मा की रहनुमाई के मार्ग में प्रवेश नहीं किया है। तेरे स्वभाव में परिवर्तन होगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तू पवित्र आत्मा के मौजूदा वचनों के साथ चलता है या नहीं और सच्ची समझ तुझमें है या नहीं। यह तुम लोगों की पूर्व की समझ से अलग है। स्वभाव परिवर्तन के विषय में पहले जो तेरी समझ थी वह ये थी कि तू, जो आलोचना करने को इतना तत्पर है, परमेश्वर द्वारा अनुशासित किये जाने के कारण अब लापरवाही से नहीं बोलता है। पर यह परिवर्तन का सिर्फ एक पहलू है। अभी सबसे महत्वपूर्ण बात है पवित्र आत्मा के दिशा निर्देश में रहना : परमेश्वर की हर बात का अनुसरण करना और हर आज्ञा का पालन करना। लोग अपना स्वभाव स्वयं परिवर्तित नहीं कर सकते; उन्हें परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना, पीड़ा और शोधन से गुजरना होगा, या उसके वचनों द्वारा निपटाया, अनुशासित किया जाना और काँटा-छाँटा जाना होगा। इन सब के बाद ही वे परमेश्वर के प्रति विश्वसनीयता और आज्ञाकारिता प्राप्त कर सकते हैं और उसके प्रति बेपरवाह होना बंद कर सकते हैं। परमेश्वर के वचनों के शोधन के द्वारा ही मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन आ सकता है। केवल उसके वचनों के संपर्क में आने से, उनके न्याय, अनुशासन और निपटारे से, वे कभी लापरवाह नहीं होंगे, बल्कि शांत और संयमित बनेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे परमेश्वर के मौजूदा वचनों और उसके कार्यों का पालन करने में सक्षम होते हैं, भले ही यह मनुष्य की धारणाओं से परे हो, वे इन धारणाओं को नज़रअंदाज करके अपनी इच्छा से पालन कर सकते हैं। पहले स्वभाव में बदलाव की बात मुख्यतः खुद को त्यागने, शरीर को कष्ट सहने देने, अपने शरीर को अनुशासित करने, और अपने आप को शारीरिक प्राथमिकताओं से दूर करने के बारे में होती थी—जो एक तरह का स्वभाव परिवर्तन है। आज, सभी जानते हैं कि स्वभाव में बदलाव की वास्तविक अभिव्यक्ति परमेश्वर के मौजूदा वचन को मानने में है, और साथ ही साथ उसके नए कार्य को सच में समझने में है। इस प्रकार, परमेश्वर के बारे में लोगों का पूर्व ज्ञान जो उनकी धारणा से रंगी थी, वह मिटाई जा सकती है और वे परमेश्वर का सच्चा ज्ञान और आज्ञाकारिता प्राप्त कर सकते हैं—केवल यही है स्वभाव में बदलाव की वास्तविक अभिव्यक्ति।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं' से उद्धृत

अगर तुम भ्रष्टता से शुद्ध होना चाहते हो और अपने जीवन-स्वभाव में बदलाव से गुज़रते हो, तो तुममें सत्य के लिए प्रेम करने और सत्य को स्वीकार करने की योग्यता होनी ही चाहिए। सत्य को स्वीकार करने का क्या अर्थ है? सत्य को स्वीकार करना यह इंगित करता है कि चाहे तुममें किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचारी स्वभाव हो या बड़े लाल अजगर के जो भी विष तुम्हारी प्रकृति में हों, तुम उसे तब स्वीकार कर लेते हो जब यह परमेश्वर के वचन द्वारा प्रकट किया जाता है और इन वचनों के प्रति समर्पित होते हो; तुम इसे बेशर्त स्वीकार करते हो, तुम बहाने नहीं बनाते या चुनने की कोशिश नहीं करते और खुद को इस आधार पर जान जाते हो कि परमेश्वर क्या कहता है। परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने का यही अर्थ है। चाहे वह कुछ भी कहे, चाहे उसके कथन तुम्हारे दिल को कितना भी भेद दें, चाहे वह किन्हीं भी वचनों का उपयोग करे, तुम इन्हें तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि वह जो भी कहता है वह सत्य है, और तुम इन्हें तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि वे वास्तविकता के अनुरूप हैं। इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम परमेश्वर के वचनों को कितनी गहराई से समझते हो, तुम इनके प्रति समर्पित हो सकते हो, तुम उस रोशनी को स्वीकार कर सकते हो और उसके प्रति समर्पित हो सकते हो जो पवित्र आत्मा द्वारा प्रकट की गयी है और जिसकी तुम्हारे भाई-बहनों द्वारा सहभागिता की गयी है। जब ऐसा व्यक्ति सत्य का अनुसरण एक निश्चित बिंदु तक कर लेता है, तो वह सत्य को प्राप्त कर सकता है और अपने स्वभाव के रूपान्तरण को प्राप्त कर सकता है। यद्यपि सत्य से प्रेम न करने वाले लोगों में शिष्ट इंसानियत हो, लेकिन जब सत्य की बात आती है, वे भ्रमित होते हैं और इसे गंभीरता से नहीं लेते। भले ही वे कुछ अच्छे कर्म करने में समर्थ हों, खुद को परमेश्वर के लिए खपा सकते हों, और त्याग करने में समर्थ हों, पर वे स्वभाव में बदलाव नहीं ला सकते।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर पर विश्वास करने में, यदि लोग अपने स्वभाव में परिवर्तन की चाहत रखते हैं, तो उन्हें अपने आपको वास्तविक जीवन से अलग नहीं करना चाहिए। नियमित परिवर्तन को प्राप्त करने से पहले तुम्हें वास्तविक जीवन में स्वयं को जानने की, स्वयं को त्यागने की, सत्य का अभ्यास करने की, और साथ ही सब बातों में सिद्धांतों, व्यवहारिक ज्ञान और हर बात में अपने आचरण के नियमों को समझने की आवश्यकता है। यदि तुम केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर ही ध्यान देते हो, और वास्तविकता की गहराई में प्रवेश किए बिना, वास्तविक जीवन में प्रवेश किये बिना धार्मिक अनुष्ठानों के बीच ही जीते हो, तो तुम कभी भी वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाओगे, तुम कभी स्वयं को, सत्य को या परमेश्वर को नहीं जान पाओगे, और तुम सदैव अंधे और अज्ञानी ही बने रहोगे। लोगों को बचाने का परमेश्वर का कार्य उन्हें छोटी अवधि के बाद सामान्य मानवीय जीवन जीने देने के लिए नहीं है, न ही यह उनकी त्रुटिपूर्ण धारणाओं और सिद्धांतों को परिवर्तित करने के लिए है। बल्कि, परमेश्वर का उद्देश्य लोगों के पुराने स्वभावों को बदलना है, उनके जीवन के पुराने तरीकों की समग्रता को बदलना है, और उनकी सारी पुरानी विचारधाराओं और उनके मानसिक दृष्टिकोण को बदलना है। केवल कलीसियाई जीवन पर ध्यान देने से मनुष्य के जीवन की पुरानी आदतें या लंबे समय तक वे जिस तरीके से जिए हैं, वे नहीं बदलेंगे। कुछ भी हो, लोगों को वास्तविक जीवन से अलग नहीं होना चाहिए। परमेश्वर चाहता है कि लोग वास्तविक जीवन में सामान्य मनुष्यत्व को जिएँ, न कि केवल कलीसियाई जीवन जिएँ; वे वास्तविक जीवन में सत्य को जिएँ, न कि केवल कलीसियाई जीवन में; वे वास्तविक जीवन में अपने कार्य को पूरा करें, न कि केवल कलीसियाई जीवन में। वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए इंसान को सबकुछ वास्तविक जीवन की ओर मोड़ देना चाहिए। यदि परमेश्वर में विश्वास रखने में, लोग वास्तविक जीवन में प्रवेश करके खुद को न जान पाएँ, और वे वास्तविक जीवन में सामान्य इंसानियत को न जी पाएँ, तो वे विफल हो जाएँगे। जो लोग परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते, वे सब ऐसे लोग हैं जो वास्तविक जीवन में प्रवेश नहीं कर सकते। वे सब ऐसे लोग हैं जो मनुष्यत्व के बारे में बात करते हैं, परंतु दुष्टात्माओं की प्रकृति को जीते हैं। वे सब ऐसे लोग हैं जो सत्य के बारे में बात करते हैं परंतु सिद्धांतों को जीते हैं। जो लोग वास्तविक जीवन में सत्य के साथ नहीं जी सकते, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं परंतु वे उसके द्वारा घृणित और अस्वीकृत माने जाते हैं। तुम्हें वास्तविक जीवन में प्रवेश करने का अभ्यास करना है, अपनी कमियों, अवज्ञाकारिता, और अज्ञानता को जानना है, और अपने असामान्य मनुष्यत्व और अपनी कमियों को जानना है। इस तरह से, तुम्हारा ज्ञान तुम्हारी वास्तविक स्थिति और कठिनाइयों के साथ एकीकृत हो जाएगा। केवल इस प्रकार का ज्ञान वास्तविक होता है और इससे ही तुम अपनी दशा को सचमुच समझ सकते हो और स्वभाव-संबंधी परिवर्तनों को प्राप्त कर सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कलीसियाई जीवन और वास्तविक जीवन पर विचार-विमर्श' से उद्धृत

जब लोग उस दिन तक अनुभव करते हैं जब तक जीवन के बारे में उनका दृष्टिकोण और उनके अस्तित्व का अर्थ एवं आधार पूरी तरह से बदल नहीं जाते हैं, जब उनका सब कुछ परिवर्तित नहीं हो जाता और वे कोई अन्य व्यक्ति नहीं बन जाते हैं, क्या यह अद्भुत नहीं है? यह एक बड़ा परिवर्तन है; यह एक ऐसा परिवर्तन है जो सब कुछ उलट-पुलट कर देता है। केवल जब दुनिया की कीर्ति, लाभ, पद, धन, सुख, सत्ता और महिमा में तुम्हारी रुचि ख़त्म हो जाती है और तुम आसानी से उन्हें छोड़ पाते हो, केवल तभी तुम एक मनुष्य के समान बन पाओगे। जो लोग अंततः पूर्ण किये जाएंगे, वे इस तरह के एक समूह होंगे। वे सत्य के लिए, परमेश्वर के लिए और धार्मिकता के लिए जीएँगे। यही एक मनुष्य के समान होना है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'समझना ही होगा कि लोगों की प्रकृतियों में समानताएँ भी हैं और भिन्नताएँ भी' से उद्धृत

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