45. अपराधों पर मनन करने के सिद्धान्‍त

(1) जब व्‍यक्ति कोई अपराध करते हैं, तो उन्‍हें निराश होकर नहीं बैठ जाना चाहिए, बल्कि यह समझना चाहिए कि यह लोगों को भरसक बचाने की परमेश्‍वर की इच्‍छा है। सच्‍चा पश्‍चाताप ही सबसे ज्‍़यादा मानी रखता है;

(2) जब लोगों को किसी अपराध का पता चले, तो उन्‍हें परमेश्‍वर की प्रार्थना करनी चाहिए और, उसके वचनों की रोशनी में, चिन्‍तन करना चाहिए और उस अपराध के सार तथा उद्गम को जानने की प्रक्रिया में स्‍वयं से घृणा करना चाहिए, और इस तरह पश्‍चाताप के योग्‍य बनना चाहिए;

(3) अपराध के सार और उद्गम को पकड़ो और सत्‍य के सहारे उसका विश्‍लेषण करो। सत्‍य के अभ्‍यास को अपराध की जगह लेने दो, अन्‍यथा तुम अपने पुराने तौर-तरीक़े अपनाने लगोगे और परमेश्‍वर के स्‍वभाव को ठेस पहुँचाओगे;

(4) अपने अतीत के अपराधों से लाचार मत हो जाओ। जब तक तुम सत्‍य का अनुसरण करते रहोगे, सच्‍चे मन से पश्‍चाताप करते रहोगे, और अपने कर्तव्‍य का पालन करते हुए सिद्धान्‍तों के मुताबिक़ आचरण करते रहोगे, तब तक तुम परमेश्‍वर द्वारा बचाये जाने के पात्र बने रहोगे।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

एक अरसे से, परमेश्वर में आस्था रखने वाले सभी लोग एक खूबसूरत मंज़िल की आशा कर रहे हैं, और परमेश्वर के सभी विश्वासियों को उम्मीद है कि सौभाग्य अचानक उनके पास आ जाएगा। उन्हें आशा है कि उन्हें पता भी नहीं चलेगा और वे शांति से स्वर्ग में किसी स्थान पर विराजमान होंगे। लेकिन मैं कहता हूँ कि प्यारे विचारों वाले इन लोगों ने कभी नहीं जाना कि वे स्वर्ग से आने वाले ऐसे सौभाग्य को पाने के या वहाँ किसी आसन पर बैठने तक के पात्र भी हैं या नहीं। आज तुम लोग अपनी स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ़ हो, फिर भी यह उम्मीद लगाए बैठे हो कि तुम लोग अंतिम दिनों की विपत्तियों और दुष्टों को दंडित करने वाले परमेश्वर के हाथों से बच जाओगे। ऐसा लगता है कि सुनहरे सपने देखना और चीज़ों के अपने मन-मुताबिक होने की अभिलाषा करना उन सभी लोगों की एक आम विशेषता है, जिन्हें शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है, और जिनमें से एक भी ज़रा भी प्रतिभाशाली नहीं है। फिर भी, मैं तुम लोगों की अनावश्यक इच्छाओं और साथ ही आशीष पाने की तुम्हारी उत्सुकता का अंत करना चाहता हूँ। यह देखते हुए कि तुम्हारे अपराध असंख्य हैं, और तुम्हारी विद्रोहशीलता का तथ्य हमेशा बढ़ता जा रहा है, ये चीज़ें तुम्हारी भविष्य की प्यारी योजनाओं में कैसे फबेंगी? यदि तुम मनमाने ढंग से चलते रहना चाहते हो, गलत मार्ग पर बने रहते हो और तुम्हें रोकने-टोकने वाला भी कोई नहीं है, और तुम फिर भी चाहते हो कि तुम्हारे सपने पूरे हों, तो मैं तुमसे गुज़ारिश करता हूँ कि अपनी जड़ता में बने रहो और कभी जागना मत, क्योंकि तुम्हारे सपने थोथे हैं, और धार्मिक परमेश्वर के होते हुए, वह तुम्हें कोई अपवाद नहीं बनाएगा। यदि तुम अपने सपने पूरे करना चाहते हो, तो कभी सपने मत देखो, बल्कि हमेशा सत्य और तथ्यों का सामना करो। ख़ुद को बचाने का यही एकमात्र तरीका है। ठोस रूप में, इस पद्धति के क्या चरण हैं?

पहला, अपने सभी अपराधों पर एक नज़र डालो, और जाँच करो कि तुम्हारे व्यवहार तथा विचारों में से कोई ऐसा तो नहीं है, जो सत्य के अनुरूप नहीं है।

यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे तुम आसानी से कर सकते हो, और मुझे विश्वास है कि सभी बुद्धिमान लोग यह कर सकते हैं। लेकिन जिन लोगों को यह नहीं पता कि अपराध और सत्य होते क्या हैं, वे अपवाद हैं, क्योंकि मूलत: ऐसे लोग बुद्धिमान नहीं होते। मैं उन लोगों से बात कर रहा हूँ, जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित हैं, ईमानदार हैं, जिन्होंने परमेश्वर के किसी प्रशासनिक आदेश का गंभीर उल्लंघन नहीं किया है, और जो सहजता से अपने अपराधों का पता लगा सकते हैं। हालाँकि यह एक ऐसी चीज़ है, जिसकी मुझे तुमसे अपेक्षा है, और जिसे तुम लोग आसानी से कर सकते हो, लेकिन यही एकमात्र चीज़ नहीं है, जो मैं तुम लोगों से चाहता हूँ। कुछ भी हो, मुझे आशा है कि तुम लोग अकेले में इस अपेक्षा पर हँसोगे नहीं, और खास तौर पर तुम इसे हिकारत से नहीं देखोगे या फिर हलके में नहीं लोगे। तुम्हें इसे गंभीरता से लेना चाहिए और ख़ारिज नहीं करना चाहिए।

दूसरे, अपने प्रत्येक अपराध और अवज्ञा के लिए तुम्हें एक तदनुरूप सत्य खोजना चाहिए, और फिर उन सत्यों का उपयोग उन मुद्दों को हल करने के लिए करना चाहिए। उसके बाद, अपने आपराधिक कृत्यों और अवज्ञाकारी विचारों व कृत्यों को सत्य के अभ्यास से बदल लो।

तीसरे, तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति बनना चाहिए, न कि एक ऐसा व्यक्ति, जो हमेशा चालबाज़ी या कपट करे। (यहाँ मैं तुम लोगों से पुन: ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए कह रहा हूँ।)

यदि तुम ये तीनों चीज़ें कर पाते हो, तो तुम ख़ुशकिस्मत हो—ऐसे व्यक्ति, जिसके सपने पूरे होते हैं और जो सौभाग्य प्राप्त करता है। शायद तुम इन तीन नीरस अपेक्षाओं को गंभीरता से लोगे या शायद तुम इन्हें गैर-ज़िम्मेदारी से लोगे। जो भी हो, मेरा उद्देश्य तुम्हारे सपने पूरा करना और तुम्हारे आदर्श अमल में लाना है, न कि तुम लोगों का उपहास करना या तुम लोगों को बेवकूफ़ बनाना।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे' से उद्धृत

तुम सत्य की खोज नहीं करते हो, न ही तुम इसे अभ्यास में लाते हो, और तुम्हें सकारात्मक चीजों से कोई मोह नहीं है; परिणामस्वरूप, जब तुम किसी ऐसी चीज का सामना करते हो जो तुम्हारी प्रतिष्ठा और हितों से जुड़ी हुई है, तो तुम नकारात्मक हो जाते हो और सिर्फ इस बात का ध्यान रखते हो कि लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं और तुम्हें लाभ कैसे हो सकता है। तुम आत्म-चिंतन बिल्कुल नहीं करते हो, कि तुम्हारे अंदर इतनी नकारात्मकता क्यों है, और तुमने दूसरी हर चीज से बढ़कर प्रतिष्ठा और निजी हितों को क्यों चुना। यहाँ दरअसल समस्या क्या है? यह एक अतिक्रमण है, कि जब कोई समस्या खड़ी हो जाए तो सत्य के अनुसार व्यवहार न करना; जब कोई दूसरी समस्या खड़ी होती है, तब भी तुम सत्य के अनुसार व्यवहार नहीं करते, और अपने हितों की रक्षा के लिए और अपने सभी पहलुओं की सकुशलता के लिए तुम सत्य का अभ्यास न करने का चुनाव करते हो। इस तरह, तुम्हारा अतिक्रमण बढ़ता रहता है, पर आखिर में तुम्हारा अंत क्या होगा? इसे बिल्कुल साफ-साफ देखा जा सकता है : तुम्हारे ये सारे अतिक्रमण, और साथ ही तुम्हारे चुनाव, तुम्हारी खोजें, और तुम्हारी आत्मनिष्ठ इच्छाएँ, और कोई कदम उठाते हुए तुम जो दिशाएँ और रास्ते चुनते हो—इन सभी चीजों से कुल मिलाकर यह अर्थ निकलता है कि तुम्हारा नरक में जाना तय है। क्या यह एक महत्वपूर्ण मामला नहीं है? इन सभी अतिक्रमणों को एक साथ जोड़कर देखें तो यह एक दुष्कर्म बन जाता है। कुछ लोग अपने सामने आने वाली समस्याओं के बारे में विस्तार से सोच-विचार करते हैं; अन्य लोग न तो उनके बारे में जरा भी चिंतन-मनन करते हैं और न ही प्रार्थना करते हैं, और जब उनकी खोज या चुनाव पथभ्रष्ट होते हैं या सत्य के विरुद्ध जाते हैं तो वे परमेश्वर के सामने नहीं आते, बल्कि अपनी समस्या को भारी मन से देखते हैं और भाग खड़े होते हैं। वे सोचते हैं, “मैं लोगों की नजरों में नहीं आया, और मुझे आसपास परमेश्वर भी दिखाई नहीं देता। मुझे परवाह नहीं कि परमेश्वर जानता है या नहीं कि मैंने क्या किया है। जब तक मेरे हित सुरक्षित हैं तो मेरे लिए तो समस्या ठीकठाक निपट ही गई है। हर मामले में, मेरे निजी हित सबसे पहले आते हैं।” आखिर में, परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने की बजाय, या परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने की बजाय, वे सिर्फ अपना बचाव करना चुनते हैं। क्या यह एक अतिक्रमण नहीं है? यह बिल्कुल साफ देखा जा सकता है कि यह सचमुच एक अतिक्रमण ही है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर में विश्वास करने का सबसे महत्वपूर्ण भाग सत्य को व्यवहार में लाना है' से उद्धृत

कभी-कभी, किसी काम को खत्म करने के बाद, तुम अपने दिल में कुछ असहज महसूस करते हो। करीब से निरीक्षण करने पर, तुम पाते हो कि वास्तव में कोई समस्या है। इसे हल करना होगा, जिसके बाद तुम चैन महसूस करोगे। तुम्हारी बेचैनी साबित करती है कि कोई समस्या है जिस पर तुम्हें अतिरिक्त समय देने की ज़रूरत है और जिस पर तुम्हें अधिक ध्यान देना चाहिए। यह अपने कर्तव्य निभाने के प्रति एक गंभीर, ज़िम्मेदार रवैया है। जब कोई व्यक्ति गंभीर, जिम्मेदार, समर्पित, और कड़ी मेहनत करने वाला होता है, तो काम सही तरीके से पूरा किया जाएगा। कभी-कभी तुम्हारा मन ऐसा नहीं होता और तुम साफ-साफ नज़र आने वाली गलती को भी ढूँढ या पकड़ नहीं पाते। अगर किसी का ऐसा मन हो तो पवित्र आत्मा की प्रेरणा और मार्गदर्शन से वह समस्या को पहचानने में सक्षम हो जाएगा। किंतु अगर पवित्र आत्मा तुम्हारा मार्गदर्शन करे और तुम्हें ऐसी जागरूकता दे, तुम्हें यह बोध कराए कि कुछ गलत है, पर फिर भी तुम्हारा मन ऐसा न हो, तो भी तुम समस्या को पहचान नहीं हो पाओगे। तो इससे क्या पता चलता है? लोगों का सहयोग बहुत ही महत्वपूर्ण है, उनके दिल बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, और वे अपने सोच और विचार को किस दिशा में ले जाते हैं, वह भी बहुत महत्वपूर्ण है। जहां तक लोगों के इरादों और कर्तव्यों के निर्वहन में उनके द्वारा किये जाने वाले प्रयासों की बात है, परमेश्वर इसकी जाँच करता है और इसे देख सकता है। यह महत्वपूर्ण है कि अपने कार्य करते समय लोग उसमें अपने पूरे दिल और पूरी शक्ति का प्रयोग करें। उनका सहयोग भी काफी महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति ने जिन कर्तव्यों को पूरा किया है उस पर और अपने पिछले कार्यों पर कोई पछतावा न हो, इसके लिए प्रयास करना और उस स्थिति तक पहुंचना, जहां उस पर परमेश्वर का कोई ऋण बाकी न रहे—अपना पूरा दिल और अपनी पूरी शक्ति लगाने का यही अर्थ है। अगर आज तुम अपना पूरा दिल और पूरी शक्ति नहीं लगाते हो, तो बाद में, जब कुछ गलत हो जाएगा, और उसके परिणाम सामने आएंगे, तो क्या तब पछतावा करने के लिए बहुत देर नहीं हो जाएगी? तुम हमेशा के लिए ऋणी बन जाओगे, और यह तुम्हारे ऊपर एक धब्बा बन जाएगा! धब्बा लगने का मतलब है अपने कर्तव्य पूरे करते समय लोगों द्वारा किया गया उल्लंघन। अपने कर्तव्य पूरे करते समय जो किया जाना चाहिये और जो करना ज़रूरी हो, उसके प्रति अपना पूरा दिल और पूरी शक्ति लगाने की कोशिश करो। अगर तुम बस लापरवाही से उन कार्यों को नहीं करते हो, और अगर तुम्हें कोई पछतावा नहीं है, तो इस समय के दौरान किये गये तुम्हारे कार्यों को याद रखा जाएगा। जिन कार्यों को याद रखा जाता है वे परमेश्वर के सामने अच्छे कर्म होते हैं। और कौन से कार्य हैं जिन्हें याद नहीं रखा जाता है? (उल्लंघन और बुरे कर्म।) उल्लंघनों को याद नहीं रखा जाता। ऐसा हो सकता है कि इस समय उन कार्यों का जिक्र करने पर लोग यह स्वीकार न करें कि वे बुरे कर्म हैं, लेकिन अगर ऐसा दिन आता है जब इस बात के गंभीर परिणाम सामने आते हैं, जब इसका नकारात्मक असर पड़ता है, तो उस समय तुम्हें यह महसूस होगा कि यह सिर्फ व्यवहार संबंधी उल्लंघन नहीं था, बल्कि यह एक बुरा कर्म था। जब तुम्हें इसका एहसास होगा, तुम अपने मन में विचार करोगे, "अगर मुझे पहले इसका एहसास हो गया होता, तो ऐसा नहीं हुआ होता! अगर मैंने इस पर थोड़ा और विचार कर लिया होता, अगर मैंने थोड़ा और प्रयास कर लिया होता, तो ऐसा नहीं होता।" कोई भी चीज़ तुम्हारे हृदय पर हमेशा के लिए लगे इस धब्बे को मिटा नहीं सकेगी। अगर यह एक अनंत ऋण बन जाता है, तो तुम परेशानी में पड़ जाओगे। इसलिए, आज, हर बार जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो, या किसी आज्ञा को स्वीकार करते हो, तो तुम सभी को इसे अपनी पूरी ताक़त और पूरे दिल से करने का प्रयास करना चाहिए। तुम लोगों को इसे इस तरह से करना चाहिए कि तुम अपराध-बोध और पछतावे से मुक्त रहो, ताकि इसे परमेश्वर द्वारा याद किया जाए, और यह एक अच्छा काम हो। असावधानी और लापरवाही से, एक आँख खुली और दूसरी बंद रखकर, काम न करो; तुम पछताओगे, और इसे सुधार नहीं पाओगे। यह अपराध होगा, और अंततः, तुम्हारे दिल में हमेशा अपराधबोध, ऋणग्रस्तता और आरोप बने रहेंगे। इन दोनों रास्तों में से कौन-सा सबसे अच्छा है? कौन-सा रास्ता सही मार्ग है? बिना किसी पछतावे के, अपने पूरे दिल और ताक़त के साथ अपना कर्तव्य निभाना और अच्छे कामों को तैयार और संचित करना। अपने अपराधों को जमा न होने दो, जिससे तुम्हें पछतावा करना और ऋणी होना पड़े। क्या होता है जब एक व्यक्ति ने बहुत सारे अपराध किए हों? वह परमेश्वर के सामने ही अपने प्रति उसके क्रोध को जगा रहा है! यदि तुम और भी अपराध करते जाते हो, और तुम्हारे प्रति परमेश्वर का क्रोध और भी बढ़ता है, तो, अंततः, तुम्हें दंडित किया जाएगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना कर्तव्‍य करते हुए गैरज़िम्‍मेदार और असावधान होने की समस्‍या का समाधान कैसे करें' से उद्धृत

जिन कुछ लोगों ने थोड़ा आज्ञा का उल्लंघन किया है, वे अनुमान लगायेंगे: क्या परमेश्वर मुझे समाप्त कर देंगे? इस बार परमेश्वर लोगों को समाप्त करने नहीं, बल्कि यथासम्भव उनकी रक्षा करने आये हैं। गलतियां किससे नहीं होतीं? यदि सभी को समाप्त कर दिया जायेगा तो फिर इसे उद्धार कैसे कहेंगे? कुछ आज्ञालंघन जान-बूझकर किये जाते हैं और कुछ अनजाने में हो जाते हैं। अनजाने में हुये मामलों में, पहचानने के बाद आप उन्हें बदल सकते हैं, तो क्या परमेश्वर बदलने से पहले ही आपको समाप्त कर देंगे? क्या ऐसे ही परमेश्वर लोगों की रक्षा करते हैं? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है! इससे कोई अंतर नहीं पडता कि आज्ञा का उल्लंघन अनजाने में हुआ है कि विद्रोही स्वभाव के कारण, केवल इतना याद रखें: शीघ्रता करें और वास्तविकता को पहचानें! आगे बढने का प्रयास करें; हालात कुछ भी हों, आप आगे बढने का प्रयास करें। परमेश्वर लोगों की रक्षा करने के कार्य में लगे हैं और वह जिनकी रक्षा करना चाहते हैं उन्हें अंधाधुंध तरीके से कैसे मार देंगे? आपके अंदर चाहे कितना भी परिवर्तन आया हो, अंत में अगर परमेश्वर ने आपको समाप्त भी कर दिया तो उनका वह निर्णय धर्मितापूर्ण होगा; जब वह समय आयेगा तो वह आपको समझने का अवसर देंगे। लेकिन इस समय आपका दायित्व है कि आगे बढ़ने का प्रयास करें, रूपांतरण की कोशिश में लग जायें और परमेश्वर को संतुष्ट करने की कामना करें; आपको केवल परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ही अपना दायित्व निभाते रहने की चिंता करनी चाहिये। और इसमें कोई दोष नहीं है! अंतत:, परमेश्वर आपके साथ जैसा चाहें बर्ताव करें, वह हमेशा न्यायसंगत ही होता है; आपको इस पर न तो संदेह करना चाहिये और न ही इसकी चिंता करनी चाहिये; भले ही परमेश्वर की धर्मिता अभी आपकी समझ से बाहर हो, लेकिन वह दिन आयेगा जब आप पूरी तरह से आश्वस्त हो जायेंगे। परमेश्वर किसी सरकारी अधिकारी या राक्षसों के सम्राट की तरह बिल्कुल नहीं है! यदि आप गौर से इस पहलू को समझने की कोशिश करेंगे तो आप दृढ़ता से विश्वास करने लगेंगे कि परमेश्वर का कार्य लोगों की रक्षा करना और उनके स्वभाव को रूपांतरित करना है। चूंकि यह लोगों के स्वभाव के रूपांतरण का कार्य है, यदि लोग अपने स्वभाव को प्रकट नहीं करेंगे, तो कुछ नहीं किया जा सकता और फिर परिणाम भी कुछ नहीं निकलेगा। लेकिन एक बार अपना स्वभाव प्रकट करने के बाद, पुरानी आदतें जारी रखना कष्टकर होगा, यह प्रबंधन आदेश की अवमानना होगी और परमेश्वर इससे अप्रसन्न होंगे। परमेश्वर अलग-अलग स्तर के दंड का विधान करेंगे और आपको आज्ञा के उल्लंघन की कीमत चुकानी होगी। कभी-कभी आप अनजाने में भ्रष्ट आचरण करने लगते हैं, तो परमेश्वर आपको आगाह करते हैं, आपको सुधारते हैं, आपसे व्यवहार करते हैं; अगर आप अच्छा करते हैं तो परमेश्वर आपको उत्तरदायी नहीं ठहरायेंगे। यह रूपांतरण की सामान्य प्रक्रिया है; इस प्रक्रिया में उद्धार का कार्य सही मायनों में अभिव्यक्त होता है। यही कुंजी है!

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा है कि यथासंभव लोगों की रक्षा की जाये' से उद्धृत

फिलहाल, जब तक तुम लोगों के पास आशा की एक किरण है, तब तक, परमेश्वर अतीत की घटनाओं को स्मरण रखे या न रखे, तुम्हें कैसी मानसिकता बनाये रखनी चाहिए? "मुझे अपने स्वभाव में परिवर्तन की चेष्टा, परमेश्वर को जानने, शैतान के द्वारा फिर कभी मूर्ख नहीं बनने, और ऐसा कुछ भी जिससे परमेश्वर का नाम लज्जित होता हो, नहीं करने की चेष्टा अवश्य करनी चाहिए।" कौन-से मुख्य क्षेत्र निर्धारित करते हैं कि लोगों को बचाया जा सकता है या नहीं और उनके लिए कोई आशा है या नहीं? बात का मर्म यह है कि धर्मोपदेश सुनकर, तुम सत्य को समझ सकते हो या नहीं, तुम सत्य को अभ्यास में ला सकते हो या नहीं, और तुम बदल सकते हो या नहीं। यही वे मुख्य क्षेत्र हैं। यदि तुम केवल पछतावा महसूस करते हो, और जब कुछ करते हो तब बस वही करते हो जो तुम करना चाहते हो, उन्हीं पुराने तौर-तरीक़ों से करते हो, न केवल सत्य की तलाश नहीं करते, अब भी पुराने विचारों और पुराने अभ्यासों से चिपके रहते हो, और न केवल समझ से पूर्णतः रहित होते हो, बल्कि इसकी बजाय और बद से बदतर होते जाते हैं, तो तुम आशा से रहित होगे, और तुम्हें बट्टे खाते में डाल दिया जाना चाहिए। तुम जितना अधिक परमेश्वर को समझते हो, उतना ही अधिक तुम अपने आपको समझते हो, और स्वयं अपनी प्रकृति की जितनी आद्योपांत तुम्हारी समझ होती है, उतना ही अधिक तुम अपने आपको काबू में रख पाते हो। जब तुमने अपने अनुभव का निचोड़ निकाल लिया, तो उसके बाद तुम फिर कभी इस विषय में विफल नहीं होगे। वास्तविक तथ्य यह है कि हर किसी में दोष हैं, बस उन्हें जवाबदेह नहीं ठहराया जाता। सभी में वे हैं—कुछ में छोटे दोष हैं, और कुछ में बड़े दोष हैं; कुछ मुँहफट हैं, और कुछ घुन्ने हैं। कुछ लोग ऐसी चीज़ें करते हैं जिनके विषय में अन्य लोग जानते हैं, जबकि कुछ लोग दूसरों के इसके बारे में जाने बिना चीज़ें करते हैं। सभी के ऊपर दाग़-धब्बे हैं, और वे सभी कुछ निश्चित भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं, जैसे अहंकार या मिथ्याभिमान; या फिर वे कुछ न कुछ उल्लंघन, या अपने कार्य में कुछ न कुछ भूल-चूक या त्रुटियाँ करते हैं, या वे थोड़े-से विद्रोही हैं। ये सभी क्षमा योग्य चीज़ें हैं, क्योंकि ये ऐसी चीज़ें हैं जिनसे भ्रष्ट कर दिया गया कोई व्यक्ति बच नहीं सकता है। एक बार जब तुमने सत्य को समझ लिया, तो तुम्हें इनसे बचना चाहिए, और तब अतीत में घटित चीज़ों से हमेशा परेशान होना ज़रूरी नहीं रह जाएगा। इसके बजाय, डर यह है कि समझ लेने के बाद भी तुम नहीं बदलोगे, यह जानकर भी कि वे ग़लत हैं तुम वहीं सब चीजें करते रहोगे, और यह बताए जाने के बाद भी कि यह ग़लत है तुम एक निश्चित ढंग से काम करते रहोगे। ऐसे लोग छुटकारे से परे हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की सेवा करने के लिए पतरस के मार्ग पर चलना चाहिए' से उद्धृत

जब परमेश्वर लोगों में अपना कार्य करता है, तो उनका स्वभाव व्यक्त हो ही जाता है और शैतान की भ्रष्टता के चलते उनमें अनिवार्य रूप से कुछ कमियां होती हैं, परन्तु इसके मध्य में भी उनमें परमेश्वर का कार्य कुछ फलों को लेकर आता है। यदि परमेश्वर वह नहीं देखता, बल्कि केवल मनुष्यों के व्यक्त स्वभाव को ही देखता, तो मनुष्यों का उद्धार नहीं हो सकता था। लोगों को बचाए जाने का फल मुख्य तौर पर उनके कर्तव्य को पूर्ण करने और सत्य को अभ्यास में लाने में प्रकट होता है। परमेश्वर इन क्षेत्रों में लोगों की उपलब्धि के स्तर, साथ ही साथ उनके अपराधों की हद की ओर देखता है। ये दोनों कारक उनके परिणाम और उनके बचाए या न बचाए जाने को निर्धारित करते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग बहुत ही अधिक भ्रष्ट होते हैं, और पूर्ण तौर पर देह के, न कि परमेश्वर के परिवार को समर्पित होते हैं। उन्होंने परमेश्वर के लिए अपने आप को बिल्कुल ही नहीं खपाया, परन्तु अब वे अपने कर्तव्य का प्रदर्शन अति उत्साह और परमेश्वर के साथ एक मन होकर कर रहे हैं—इस दृष्टिकोण से, क्या कोई परिवर्तन हुआ है? यह एक परिवर्तन है। यही परिवर्तन परमेश्वर चाहता है। इसके अलावा, कुछ लोग, जब उनके पास कुछ विचार होते थे तो वे अपने आप को स्वयं के आसपास प्रसारित करना चाहते थे, परन्तु अब जब उनके पास कुछ विचार हैं, तो वे अपने आप को प्रसारित किए बिना या परमेश्वर के विरोध कुछ भी किए बिना, आज्ञाकारी और सत्य को खोजने वाले बन गए हैं। क्या यहां पर परिवर्तन है? हां! कुछ लोगों ने कभी विरोध किया होगा जब उनके साथ कार्य किया गया या उन्हें सुधारा गया था, परन्तु अब जब उनका सुधार किया जाता है और उनके साथ फिर से कार्य किया जाता है, तो वे स्वयं जान सकते हैं। इसे स्वीकार करने के बाद, उनमें कुछ वास्तविक परिवर्तन होते हैं—क्या यह एक प्रभाव नहीं है? हां! फिर भी, तुम्हारे परिवर्तन कितने भी बड़े क्यों न हों, तुम्हारा स्वभाव एक बार में ही नहीं बदल सकता। किसी भी अपराध को प्रकट नहीं करना असम्भव है, परन्तु यदि तुम्हारा प्रवेश सामान्य किया गया है, यहां तक कि यदि कुछ अनाज्ञाकारिता भी होती है, तो तुम्हें उस समय इसके बारे में पता चल जाएगा। यह जागरूकता तुम में तुरन्त परिवर्तन लेकर आ सकती है और तुम्हारी स्थिति बेहतर से और भी बेहतर होती जाएगी। तुम से एक या दो बार अपराध हो सकते हैं, परन्तु इसे बार-बार नहीं दोहराया जाएगा। यही परिवर्तन कहलाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यदि कोई किसी एक क्षेत्र में परिवर्तित हो गया है तो उस में अब कुछ भी अपराध नहीं है; यह मामला नहीं है। इस प्रकार के परिवर्तन का अर्थ है कि जिसने भी परमेश्वर के कार्य का अनुभव प्राप्त कर लिया है वह सत्य को और भी अधिक अभ्यास में ला सकता है तथा परमेश्वर की आवश्यकता में से कुछ का अभ्यास कर सकता है। उनके अपराध और भी कम होते जाएंगे तथा अनाज्ञाकरिता की अवस्था कम गम्भीर होती जाएगी। तुम इस से देख सकते हो कि परमेश्वर का कार्य प्रभावशाली होना प्रारम्भ हो गया है; इस प्रकार की अभिव्यक्ति में परमेश्वर जो चाहता है कि यह परिणाम लोगों में प्राप्त किए जाएं। इसी प्रकार से, परमेश्वर द्वारा मनुष्यों के परिणामों को सम्भालने का तरीका और किसी के साथ व्यवहार करने का तरीका पूरी तरह से धर्मी, उचित और निष्पक्ष है। तुम को सिर्फ़ अपने सम्पूर्ण प्रयासों को केवल परमेश्वर के लिए ही लगाने की आवश्यकता है, दृढ़तापूर्वक सत्य के अभ्यास में अपने हृदय को पूरी तरह से लगाएं, यही तुमको करना चाहिए और परमेश्वर तुम से अन्यायपूर्ण ढंग से व्यवहार नहीं करेगा। इसके बारे में सोचें: क्या वे लोग जो सत्य को अभ्यास में लाते हैं उन्हें परमेश्वर के द्वारा दण्ड दिया जा सकता है? कई लोग हमेशा ही परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के बारे में शक करते हैं और भयभीत रहते हैं कि यदि वे सत्य को अभ्यास में लाएंगे तो भी उन्हें दण्ड मिलेगा; वे भयभीत रहते हैं कि परमेश्वर उनकी वफ़ादारी और भक्ति को नहीं देखेगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'लोगों के प्रदर्शन के आधार पर परमेश्वर द्वारा उनके परिणाम निर्धारण के निहितार्थ' से उद्धृत

तथ्‍य यह है कि हर व्‍यक्ति ने, कमोबेश, पाप किया है। जब तुम किसी चीज़ के बारे में यह नहीं जानते कि वह पाप है, तो तुम उसके बारे में धुँधले-से ढंग से सोचते हो या शायद तुम अपनी धारणाओं, आदतों और समझने के तौर-तरीक़ों से चिपके रहते हो—लेकिन एक दिन, चाहे अपने भाइयों और बहनों के साथ संगति के माध्‍यम से या परमेश्‍वर के प्रकाशन के माध्‍यम से, तुम जान जाते हो कि यह एक पाप है, परमेश्‍वर का अपमान है। तब तुम्‍हारा रवैया क्‍या होगा? क्‍या तुम तब भी, इस विश्‍वास के साथ कि तुम जो कुछ भी कर रहे हो वह सत्‍य के अनुरूप है, अपनी ज़ि‍द पर अड़े रहते हुए तर्क देते रहोगे, बहस करते रहोगे, अपने विचारों का अनुसरण करते रहोगे, यह मानते हुए कि जो तुम कर रहे हो वह सत्य के साथ तालमेल में है? यह चीज़ परमेश्‍वर के साथ तुम्‍हारे रवैये से संबंध रखती है। डेविड ने अपने पाप के प्रति किस तरह का रवैया अपनाया था? (पश्‍चाताप।) पश्‍चाताप–मैं अब यह पाप नहीं करूँगा। तब उसने क्‍या किया था? उसने परमेश्‍वर से प्रार्थना की थी कि वह उसे दंड दे : ‘‘अगर मैं यह ग़लती फिर से करूँ, तो परमेश्‍वर मुझे दंड दे और मेरी मृत्‍यु का कारण बने!’’ यह था उसका संकल्‍प; वह सच्‍चा पश्‍चाताप था। क्‍या साधारण लोग इसे हासिल कर सकते हैं? साधारण लोगों के लिए यही अच्‍छा है कि वे बहस करने की कोशिश नहीं करते या चुपचाप जवाबदेही स्‍वीकार कर लेते हैं और मन-ही-मन यह सोचते हैं : ‘‘उम्‍मीद है अब फिर से यह मुद्दा कोई नहीं उठाएगा। मुझे अपमानित होना पड़ेगा।’’ क्‍या यह सच्‍चा पश्‍चाताप है? सच्‍चे पश्‍चाताप के लिए अनिवार्य है कि तुम अतीत की अपनी बुराई को त्‍याग दो, उसे ख़त्‍म कर दो और भविष्‍य में उसे न दोहराओ। तब फिर क्‍या किया जाए? क्‍या मात्र बुराई को त्‍याग देने से और वह कृत्‍य न करने तथा उसके बारे में न सोचने से काम चल जाएगा? परमेश्‍वर के प्रति तुम्‍हारा क्‍या रवैया है? अब तुम स्‍वयं को परमेश्‍वर के समक्ष उजागर करते हुए उसके प्रति क्‍या दृष्टिकोण अपनाओगे? (हम परमेश्‍वर का दंड स्‍वीकार करेंगे।) परमेश्‍वर के दंड को, उसके न्‍याय और ताड़ना को स्‍वीकार करना–यह उसका एक हिस्‍सा है। दूसरा हिस्‍सा है परेमश्‍वर के दंड को स्‍वीकार करते हुए उसकी पड़ताल को स्‍वीकार करना। जब तुम इन दोनों हिस्‍सों को स्‍वीकार कर लोगे, तब तुम्‍हारे संकल्‍प का रूप क्‍या होगा? जब भविष्‍य में इस तरह की परिस्थितियों और मसलों से तुम्‍हारा सामना होगा, तब तुम क्‍या करोगे? सच्‍चे पश्‍चाताप के बिना व्‍यक्ति अपनी बुराई को नहीं त्‍याग सकता और वे कहीं भी, कभी भी, अपने पुराने तौर-तरीक़ों पर वापस लौट सकते हैं और बार-बार उसी बुरे काम को, उसी पाप को, उसी भूल को दोहरा सकते हैं। क्‍या सत्‍य के प्रति लोगों का रवैया यही नहीं है? इससे सत्‍य और परमेश्‍वर के प्रति मनुष्‍य का रवैया ज़ाहिर होता है। तब फिर पाप से पूरी तरह छुटकारा पाने के लिए क्‍या कर सकते हैं? सत्‍य का अभ्‍यास? सत्‍य के प्रति लोगों का रवैया सही होना चाहिए। और सत्‍य के प्रति लोगों को क्‍या रवैया अपनाना चाहिए तथा सत्‍य के प्रति उनका रवैया सही है यह दर्शाने के लिए उन्‍हें किस तरह का अभ्‍यास करना चाहिए? अगर इस तरह के मसले से आपका दोबारा सामना होने पर आप प्रलोभन के शिकार हो जाते हैं, तब आप क्‍या करेंगे? दो शब्‍द : ‘‘दूर रहो!’’ इसी के साथ-साथ अगर लोग फिर-से वैसी ही ग़लती करते हैं, तो लोगों को परमेश्‍वर द्वारा दंडित किए जाने के संकल्‍प पर भी अडिग रहना चाहिए। ऐसा करना उस बुराई से सच्‍चे हृदय से घृणा करना है, उसे दुनिया की सबसे ज्‍़यादा घृणित, पापपूर्ण, परमेश्‍वर को अपमानित करने वाली चीज़ के रूप में देखना है, उसे शाश्‍वत कलंक के रूप में देखना है। बाइबल कहती है : "चतुर मनुष्य विपत्ति को आते देखकर छिप जाता है; परन्तु भोले लोग आगे बढ़कर दण्ड भोगते हैं" (नीतिवचन 22:3)। यह सरलता नहीं है—यह स्‍पष्‍ट और सीधे तौर पर बेवकूफ़ी है। "दूर रहो"—यह अभ्‍यास करने का ढंग कैसे है? (यह अच्‍छा है।) क्‍या ऐसा वक्‍़त नहीं आता जब लोग दूर नहीं रह पाते? तब तुम क्‍या करोगे? तुम्‍हें सच्‍चे मन से परमेश्‍वर से प्रार्थना करनी होगी और उससे स्थितियों के आयोजन का अनुरोध करना होगा। कुछ परीक्षाएं भी प्रलोभनकारी होती हैं। आख़ि‍र परमेश्‍वर ऐसी स्थितियों को तुम्‍हारे साथ घटित होने की गुंजाइश ही क्‍यों देता है? ये संयोग से घटित नहीं होतीं; इनके माध्‍यम से परमेश्‍वर तुम्‍हें आज़मा रहा है, तुम्‍हारी परीक्षा ले रहा है। अगर तुम परमेश्‍वर द्वारा ली जा रही परीक्षा को स्‍वीकार नहीं करते और उसकी उपेक्षा करने की कोशिश करते हो, तो क्‍या इससे परमेश्‍वर के प्रति तुम्‍हारा रवैया ज़ाहिर नहीं होता? जब तुम परमेश्‍वर द्वारा तुम्‍हारे लिए निश्चित की गई परिस्थितियों से और उन परीक्षणों से अपना मुँह फेर लेते हो, जिन्‍हें वह तुम्‍हारे सामने पेश करता है और उद्दंड रवैया अपना लेते हो और न प्रार्थना करते हो न याचना करते हो, न ही उन परिस्थितियों और परीक्षणों के दौरान अभ्‍यास के मार्ग की खोज करते हो, तब क्‍या यह चीज़ परमेश्‍वर के प्रति मनुष्‍य के रवैये के बारे में नहीं बताती? ऐसे लोग हैं, जो कहते हैं : ‘‘मेरे ऐसे विचार नहीं रहे हैं, और मेरा वह उद्देश्‍य नहीं था।’’ अगर तुम उद्देश्‍य-रहित हो, तब परमेश्‍वर के प्रति तुम्‍हारा रवैया क्‍या है? कुछ रवैये सुविचारित और सोद्देश्‍य होते हैं, जबकि कुछ के पीछे कोई उद्देश्‍य नहीं होता–तुम्‍हारा रवैया कैसा है? क्‍या ऐसा व्‍यक्ति सत्‍य से प्रेम करता है, जो उद्दंड होता है और परमेश्‍वर को गंभीरता से नहीं लेता? यह बात सिद्ध हो चुकी है कि जो व्‍यक्ति सत्‍य और परमेश्‍वर को बच्‍चों का खेल समझता है, उन्‍हें मूल्‍यहीन समझता है, वह सत्‍य को प्रेम करने वाला व्‍यक्ति नहीं होता।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

तुम जितने अधिक अपराध करोगे, उतने ही कम अवसर तुम्हें अच्छी मंज़िल पाने के लिए मिलेंगे। इसके विपरीत, तुम जितने कम अपराध करोगे, परमेश्वर की प्रशंसा पाने के तुम्हारे अवसर उतने ही बेहतर हो जाएँगे। यदि तुम्हारे अपराध इतने बढ़ जाएँ कि मैं भी तुम्हें क्षमा न कर सकूँ, तो तुम क्षमा किए जाने के अपने अवसर पूरी तरह से गँवा दोगे। इस तरह, तुम्हारी मंज़िल उच्च नहीं, निम्न होगी। यदि तुम्हें मेरी बातों पर यकीन न हो, तो बेधड़क गलत काम करो और उसके नतीजे देखो। यदि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो और सत्य पर अमल करते हो, तो तुम्हें अपने अपराधों के लिए क्षमा किए जाने का अवसर अवश्य मिलेगा, और तुम कम से कम अवज्ञा करोगे। और यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो सत्य पर अमल नहीं करना चाहता, तो परमेश्वर के समक्ष तुम्हारे अपराधों की संख्या निश्चित रूप से बढ़ जाएगी और तुम तब तक बार-बार अवज्ञा करोगे, जब तक कि सीमा पार नहीं कर लोगे, जो तुम्हारी पूरी तबाही का समय होगा। यह तब होगा, जब आशीष पाने का तुम्हारा खूबसूरत सपना चूर-चूर हो चुका हो जाएगा। अपने अपराधों को किसी अपरिपक्व या मूर्ख व्यक्ति की गलतियाँ मात्र मत समझो, यह बहाना मत करो कि तुमने सत्य पर अमल इसलिए नहीं किया, क्योंकि तुम्हारी ख़राब क्षमता ने उसे असंभव बना दिया था। इसके अतिरिक्त, स्वयं द्वारा किए गए अपराधों को किसी अज्ञानी व्यक्ति के कृत्य भी मत समझ लेना। यदि तुम स्वयं को क्षमा करने और अपने साथ उदारता का व्यवहार करने में अच्छे हो, तो मैं कहता हूँ, तुम एक कायर हो, जिसे कभी सत्य हासिल नहीं होगा, न ही तुम्हारे अपराध तुम्हारा पीछा छोड़ेंगे, वे तुम्हें कभी सत्य की अपेक्षाएँ पूरी नहीं करने देंगे और तुम्हें हमेशा के लिए शैतान का वफ़ादार साथी बनाए रखेंगे। तुम्हें फिर भी मेरी यही सलाह है : अपने गुप्त अपराधों का पता लगाने में विफल रहते हुए केवल अपनी मंज़िल पर ध्यान मत दो; अपने अपराधों को गंभीरता से लो, अपनी मंज़िल की चिंता में उनमें से किसी को नज़रअंदाज़ मत करो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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