45. अपराधों पर मनन करने के सिद्धांत

(1) जब व्‍यक्ति कोई अपराध करता है, तो उसे निराश होकर नहीं बैठ जाना चाहिए, बल्कि यह समझना चाहिए कि यह लोगों को भरसक बचाने की परमेश्‍वर की इच्‍छा है। सच्‍चा पश्‍चाताप ही सबसे ज्यादा मायने रखता है।

(2) जब लोगों को किसी अपराध का पता चले, तो उन्‍हें परमेश्‍वर से प्रार्थना करनी चाहिए और, उसके वचनों के प्रकाश में, चिंतन करना चाहिए और उस अपराध के सार तथा उद्गम को जानना चाहिए, स्‍वयं से घृणा करनी चाहिए, और इस तरह पश्‍चाताप के योग्‍य बनना चाहिए।

(3) अपराध के सार और उद्गम को पकड़ो और सत्‍य के सहारे उसका विश्‍लेषण करो। सत्‍य के अभ्‍यास को अपराध की जगह लेने दो, अन्‍यथा तुम अपने पुराने तौर-तरीके से काम करने लगोगे और परमेश्‍वर के स्‍वभाव को ठेस पहुँचाओगे।

(4) अपने अतीत के अपराधों से लाचार मत हो जाओ। जब तक तुम सत्‍य का अनुसरण करते रहोगे, सच्‍चे मन से पश्‍चाताप करते रहोगे, और अपने कर्तव्‍य का पालन करते हुए सिद्धांतों के मुताबिक आचरण करते रहोगे, तब तक तुम परमेश्‍वर द्वारा बचाए जाने के पात्र बने रहोगे।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

एक अरसे से, परमेश्वर में आस्था रखने वाले सभी लोग एक खूबसूरत मंज़िल की आशा कर रहे हैं, और परमेश्वर के सभी विश्वासियों को उम्मीद है कि सौभाग्य अचानक उनके पास आ जाएगा। उन्हें आशा है कि उन्हें पता भी नहीं चलेगा और वे शांति से स्वर्ग में किसी स्थान पर विराजमान होंगे। लेकिन मैं कहता हूँ कि प्यारे विचारों वाले इन लोगों ने कभी नहीं जाना कि वे स्वर्ग से आने वाले ऐसे सौभाग्य को पाने के या वहाँ किसी आसन पर बैठने तक के पात्र भी हैं या नहीं। आज तुम लोग अपनी स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ़ हो, फिर भी यह उम्मीद लगाए बैठे हो कि तुम लोग अंतिम दिनों की विपत्तियों और दुष्टों को दंडित करने वाले परमेश्वर के हाथों से बच जाओगे। ऐसा लगता है कि सुनहरे सपने देखना और चीज़ों के अपने मन-मुताबिक होने की अभिलाषा करना उन सभी लोगों की एक आम विशेषता है, जिन्हें शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है, और जिनमें से एक भी ज़रा भी प्रतिभाशाली नहीं है। फिर भी, मैं तुम लोगों की अनावश्यक इच्छाओं और साथ ही आशीष पाने की तुम्हारी उत्सुकता का अंत करना चाहता हूँ। यह देखते हुए कि तुम्हारे अपराध असंख्य हैं, और तुम्हारी विद्रोहशीलता का तथ्य हमेशा बढ़ता जा रहा है, ये चीज़ें तुम्हारी भविष्य की प्यारी योजनाओं में कैसे फबेंगी? यदि तुम मनमाने ढंग से गलतियाँ करना चाहते हो, तुम्हें रोकने-टोकने वाला भी कोई नहीं है, और तुम फिर भी चाहते हो कि तुम्हारे सपने पूरे हों, तो मैं तुमसे गुज़ारिश करता हूँ कि अपनी जड़ता में बने रहो और कभी जागना मत, क्योंकि तुम्हारे सपने थोथे हैं, और धार्मिक परमेश्वर के होते हुए, वह तुम्हें कोई अपवाद नहीं बनाएगा। यदि तुम अपने सपने पूरे करना चाहते हो, तो कभी सपने मत देखो, बल्कि हमेशा सत्य और तथ्यों का सामना करो। ख़ुद को बचाने का यही एकमात्र तरीका है। ठोस रूप में, इस पद्धति के क्या चरण हैं?

पहला, अपने सभी अपराधों पर एक नज़र डालो, और जाँच करो कि तुम्हारे व्यवहार तथा विचारों में से कोई ऐसा तो नहीं है, जो सत्य के अनुरूप नहीं है।

यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे तुम आसानी से कर सकते हो, और मुझे विश्वास है कि सभी बुद्धिमान लोग यह कर सकते हैं। लेकिन जिन लोगों को यह नहीं पता कि अपराध और सत्य होते क्या हैं, वे अपवाद हैं, क्योंकि मूलत: ऐसे लोग बुद्धिमान नहीं होते। मैं उन लोगों से बात कर रहा हूँ, जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित हैं, ईमानदार हैं, जिन्होंने परमेश्वर के किसी प्रशासनिक आदेश का गंभीर उल्लंघन नहीं किया है, और जो सहजता से अपने अपराधों का पता लगा सकते हैं। हालाँकि यह चीज़ जिसकी मुझे तुमसे अपेक्षा है इसे तुम लोग आसानी से कर सकते हो, लेकिन यही एकमात्र चीज़ नहीं है, जो मैं तुम लोगों से चाहता हूँ। कुछ भी हो, मुझे आशा है कि तुम लोग अकेले में इस अपेक्षा पर हँसोगे नहीं, और खास तौर पर तुम इसे हिकारत से नहीं देखोगे या फिर हलके में नहीं लोगे। तुम्हें इसे गंभीरता से लेना चाहिए और ख़ारिज नहीं करना चाहिए।

दूसरे, अपने प्रत्येक अपराध और अवज्ञा के लिए तुम्हें एक तदनुरूप सत्य खोजना चाहिए, और फिर उन सत्यों का उपयोग उन मुद्दों को हल करने के लिए करना चाहिए। उसके बाद, अपने आपराधिक कृत्यों और अवज्ञाकारी विचारों व कृत्यों को सत्य के अभ्यास से बदल लो।

तीसरे, तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति बनना चाहिए, न कि एक ऐसा व्यक्ति, जो हमेशा चालबाज़ी या कपट करे। (यहाँ मैं तुम लोगों से पुन: ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए कह रहा हूँ।)

यदि तुम ये तीनों चीज़ें कर पाते हो, तो तुम ख़ुशकिस्मत हो—ऐसे व्यक्ति, जिसके सपने पूरे होते हैं और जो सौभाग्य प्राप्त करता है। शायद तुम इन तीन नीरस अपेक्षाओं को गंभीरता से लोगे या शायद तुम इन्हें गैर-ज़िम्मेदारी से लोगे। जो भी हो, मेरा उद्देश्य तुम्हारे सपने पूरा करना और तुम्हारे आदर्श अमल में लाना है, न कि तुम लोगों का उपहास करना या तुम लोगों को बेवकूफ़ बनाना।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे' से उद्धृत

तुम जितने अधिक अपराध करोगे, उतने ही कम अवसर तुम्हें अच्छी मंज़िल पाने के लिए मिलेंगे। इसके विपरीत, तुम जितने कम अपराध करोगे, परमेश्वर की प्रशंसा पाने के तुम्हारे अवसर उतने ही बेहतर हो जाएँगे। यदि तुम्हारे अपराध इतने बढ़ जाएँ कि मैं भी तुम्हें क्षमा न कर सकूँ, तो तुम क्षमा किए जाने के अपने अवसर पूरी तरह से गँवा दोगे। इस तरह, तुम्हारी मंज़िल उच्च नहीं, निम्न होगी। यदि तुम्हें मेरी बातों पर यकीन न हो, तो बेधड़क गलत काम करो और उसके नतीजे देखो। यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसका सत्य का अभ्यास बहुत सच्चा है, तो तुम्हें अपने अपराधों के लिए क्षमा किए जाने का अवसर अवश्य मिलेगा, और तुम कम से कम अवज्ञा करोगे। और यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो सत्य पर अमल नहीं करना चाहता, तो परमेश्वर के समक्ष तुम्हारे अपराधों की संख्या निश्चित रूप से बढ़ जाएगी और तुम तब तक बार-बार अवज्ञा करोगे, जब तक कि सीमा पार नहीं कर लोगे, जो तुम्हारी पूरी तबाही का समय होगा। यह तब होगा, जब आशीष पाने का तुम्हारा खूबसूरत सपना चूर-चूर हो चुका हो जाएगा। अपने अपराधों को किसी अपरिपक्व या मूर्ख व्यक्ति की गलतियाँ मात्र मत समझो, यह बहाना मत करो कि तुमने सत्य पर अमल इसलिए नहीं किया, क्योंकि तुम्हारी ख़राब क्षमता ने उसे असंभव बना दिया था। इसके अतिरिक्त, स्वयं द्वारा किए गए अपराधों को किसी अज्ञानी व्यक्ति के कृत्य भी मत समझ लेना। यदि तुम स्वयं को क्षमा करने और अपने साथ उदारता का व्यवहार करने में अच्छे हो, तो मैं कहता हूँ, तुम एक कायर हो, जिसे कभी सत्य हासिल नहीं होगा, न ही तुम्हारे अपराध तुम्हारा पीछा छोड़ेंगे, वे तुम्हें कभी सत्य की अपेक्षाएँ पूरी नहीं करने देंगे और तुम्हें हमेशा के लिए शैतान का वफ़ादार साथी बनाए रखेंगे। तुम्हें फिर भी मेरी यही सलाह है : अपने गुप्त अपराधों का पता लगाने में विफल रहते हुए केवल अपनी मंज़िल पर ध्यान मत दो; अपने अपराधों को गंभीरता से लो, अपनी मंज़िल की चिंता में उनमें से किसी को नज़रअंदाज़ मत करो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे' से उद्धृत

तथ्‍य यह है कि हर व्‍यक्ति ने, कमोबेश, पाप किया है। जब तुम किसी चीज़ के बारे में यह नहीं जानते कि वह पाप है, तो तुम उसके बारे में धुँधले-से ढंग से सोचते हो या शायद तुम अपनी धारणाओं, आदतों और समझने के तौर-तरीक़ों से चिपके रहते हो—लेकिन एक दिन, चाहे अपने भाइयों और बहनों के साथ संगति के माध्‍यम से या परमेश्‍वर के प्रकाशन के माध्‍यम से, तुम जान जाते हो कि यह एक पाप है, परमेश्‍वर का अपमान है। तब तुम्‍हारा रवैया क्‍या होगा? क्‍या तुम तब भी, इस विश्‍वास के साथ कि तुम जो कुछ भी कर रहे हो वह सत्‍य के अनुरूप है, अपनी ज़ि‍द पर अड़े रहते हुए तर्क देते रहोगे, बहस करते रहोगे, अपने विचारों का अनुसरण करते रहोगे, यह मानते हुए कि जो तुम कर रहे हो वह सत्य के साथ तालमेल में है? यह चीज़ परमेश्‍वर के साथ तुम्‍हारे रवैये से संबंध रखती है। डेविड ने अपने पाप के प्रति किस तरह का रवैया अपनाया था? पश्‍चाताप–मैं अब यह पाप नहीं करूँगा। तब उसने क्‍या किया था? उसने परमेश्‍वर से प्रार्थना की थी कि वह उसे दंड दे : "अगर मैं यह ग़लती फिर से करूँ, तो परमेश्‍वर मुझे दंड दे और मेरी मृत्‍यु का कारण बने!" यह था उसका संकल्‍प; वह सच्‍चा पश्‍चाताप था। क्‍या साधारण लोग इसे हासिल कर सकते हैं? साधारण लोगों के लिए यही अच्‍छा है कि वे बहस करने की कोशिश नहीं करते या चुपचाप जवाबदेही स्‍वीकार कर लेते हैं और मन-ही-मन यह सोचते हैं : "उम्‍मीद है अब फिर से यह मुद्दा कोई नहीं उठाएगा। मुझे अपमानित होना पड़ेगा।" क्‍या यह सच्‍चा पश्‍चाताप है? सच्‍चे पश्‍चाताप के लिए अनिवार्य है कि तुम अतीत की अपनी बुराई को त्‍याग दो, उसे ख़त्‍म कर दो और भविष्‍य में उसे न दोहराओ। तब फिर क्‍या किया जाए? क्‍या मात्र बुराई को त्‍याग देने से और वह कृत्‍य न करने तथा उसके बारे में न सोचने से काम चल जाएगा? परमेश्‍वर के प्रति तुम्‍हारा क्‍या रवैया है? अब तुम स्‍वयं को परमेश्‍वर के समक्ष उजागर करते हुए उसके प्रति क्‍या दृष्टिकोण अपनाओगे? (हम परमेश्‍वर का दंड स्‍वीकार करेंगे।) परमेश्‍वर के दंड को, उसके न्‍याय और ताड़ना को स्‍वीकार करना–यह उसका एक हिस्‍सा है। दूसरा हिस्‍सा है परेमश्‍वर के दंड को स्‍वीकार करते हुए उसकी पड़ताल को स्‍वीकार करना। जब तुम इन दोनों हिस्‍सों को स्‍वीकार कर लोगे, तब तुम्‍हारे संकल्‍प का रूप क्‍या होगा? जब भविष्‍य में इस तरह की परिस्थितियों और मसलों से तुम्‍हारा सामना होगा, तब तुम क्‍या करोगे? सच्‍चे पश्‍चाताप के बिना व्‍यक्ति अपनी बुराई को नहीं त्‍याग सकता और वे कहीं भी, कभी भी, अपने पुराने तौर-तरीक़ों पर वापस लौट सकते हैं और बार-बार उसी बुरे काम को, उसी पाप को, उसी भूल को दोहरा सकते हैं। इससे सत्‍य और परमेश्‍वर के प्रति मनुष्‍य का रवैया ज़ाहिर होता है। तब फिर पाप से पूरी तरह छुटकारा पाने के लिए क्‍या कर सकते हैं? सत्‍य का अभ्‍यास? सत्‍य के प्रति लोगों का रवैया सही होना चाहिए। और सत्‍य के प्रति लोगों को क्‍या रवैया अपनाना चाहिए तथा सत्‍य के प्रति उनका रवैया सही है यह दर्शाने के लिए उन्‍हें किस तरह का अभ्‍यास करना चाहिए? अगर इस तरह के मसले से तुम्हारा दोबारा सामना होने पर तुम प्रलोभन के शिकार हो जाते हो, तब तुम क्‍या करेंगे? दो शब्‍द : "दूर रहो!" इसी के साथ-साथ अगर लोग फिर-से वैसी ही ग़लती करते हैं, तो लोगों को परमेश्‍वर द्वारा दंडित किए जाने के संकल्‍प पर भी अडिग रहना चाहिए। ऐसा करना उस बुराई से सच्‍चे हृदय से घृणा करना है, उसे दुनिया की सबसे ज्‍़यादा घृणित, पापपूर्ण, परमेश्‍वर को अपमानित करने वाली चीज़ के रूप में देखना है, उसे शाश्‍वत कलंक के रूप में देखना है। बाइबल कहती है : "चतुर मनुष्य विपत्ति को आते देखकर छिप जाता है; परन्तु भोले लोग आगे बढ़कर दण्ड भोगते हैं" (नीतिवचन 22:3)। यह सरलता नहीं है—यह स्‍पष्‍ट और सीधे तौर पर बेवकूफ़ी है। "दूर रहो"—यह अभ्‍यास करने का ढंग कैसे है? (यह अच्‍छा है।) क्‍या ऐसा वक्‍़त नहीं आता जब लोग दूर नहीं रह पाते? तब तुम क्‍या करोगे? तुम्‍हें सच्‍चे मन से परमेश्‍वर से प्रार्थना करनी होगी और उससे स्थितियों के आयोजन का अनुरोध करना होगा। कुछ परीक्षाएं भी प्रलोभनकारी होती हैं। आख़ि‍र परमेश्‍वर ऐसी स्थितियों को तुम्‍हारे साथ घटित होने की गुंजाइश ही क्‍यों देता है? ये संयोग से घटित नहीं होतीं; इनके माध्‍यम से परमेश्‍वर तुम्‍हें आज़मा रहा है, तुम्‍हारी परीक्षा ले रहा है। जब तुम परमेश्‍वर द्वारा तुम्‍हारे लिए निश्चित की गई परिस्थितियों से और उन परीक्षणों से अपना मुँह फेर लेते हो, जिन्‍हें वह तुम्‍हारे सामने पेश करता है और उद्दंड रवैया अपना लेते हो और न प्रार्थना करते हो न याचना करते हो, न ही उन परिस्थितियों और परीक्षणों के दौरान अभ्‍यास के मार्ग की खोज करते हो, तब क्‍या यह चीज़ परमेश्‍वर के प्रति मनुष्‍य के रवैये के बारे में नहीं बताती? ऐसे लोग हैं, जो कहते हैं : "मेरे ऐसे विचार नहीं रहे हैं, और मेरा वह उद्देश्‍य नहीं था।" अगर तुम उद्देश्‍य-रहित हो, तब परमेश्‍वर के प्रति तुम्‍हारा रवैया क्‍या है? कुछ रवैये सुविचारित और सोद्देश्‍य होते हैं, जबकि कुछ के पीछे कोई उद्देश्‍य नहीं होता–तुम्‍हारा रवैया कैसा है? क्‍या ऐसा व्‍यक्ति सत्‍य से प्रेम करता है, जो उद्दंड होता है और परमेश्‍वर को गंभीरता से नहीं लेता? यह बात सिद्ध हो चुकी है कि जो व्‍यक्ति सत्‍य और परमेश्‍वर को बच्‍चों का खेल समझता है, उन्‍हें मूल्‍यहीन समझता है, वह सत्‍य को प्रेम करने वाला व्‍यक्ति नहीं होता।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

कुछ लोग सत्य से प्रेम करते हैं, और इस प्रकार उनमें सत्य का अनुसरण करने की शक्ति होती है। तुम्हें त्याग करने में सक्षम होना चाहिए; जब किसी ऐसी चीज का सामना करना पड़े जो तुम्हारे अपने हितों से संबंधित हो, तो तुम्हें उसे अलग रखने में सक्षम होना चाहिए। अगर तुम ऐसा नहीं कर सकते, तो सत्य का अनुसरण करने की तुम्हारी ताकत असल में कितनी बड़ी है? अगर ऐसी चीजों से सामना होने पर तुम अपने हित अलग नहीं रख सकते—अगर तुम हमेशा स्वार्थी बने रहते हो, अगर तुम्हारा दिमाग कमजोरी के क्षण में हमेशा बदल जाता है, और तुम मन में सोचते हो, "इसमें मेरा कोई फायदा नहीं है, मुझे अपने सारे प्रयासों के बदले कुछ नहीं मिलेगा, मैं इसे बस ऐसे ही करूँगा"—तो तुम निश्चित रूप से भटक जाओगे, और भले ही तुम बुराई न करो, लेकिन तुम सत्य का अभ्यास भी नहीं करोगे। तुम सत्य की खोज नहीं करते, न ही तुम उसे अभ्यास में लाते हो, और तुम्हें सकारात्मक चीजों से कोई प्रेम नहीं है; परिणामस्वरूप, जब तुम किसी ऐसी चीज का सामना करते हो जो तुम्हारी प्रतिष्ठा और हितों से जुड़ी होती है, तो तुम नकारात्मक हो जाते हो और सिर्फ इस बात पर ध्यान देते हो कि लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं और तुम्हें लाभ कैसे हो सकता है। तुम इस बारे में बिलकुल भी आत्म-चिंतन नहीं करते, कि तुम इतने नकारात्मकता कैसे हो पाते हो, या तुमने दूसरी सभी चीजों से बढ़कर प्रतिष्ठा और निजी हित क्यों चुने। यहाँ दरअसल समस्या क्या है? कोई समस्या उत्पन्न होने पर सत्य के अनुसार व्यवहार न करना एक अपराध है; जब कोई दूसरी समस्या उत्पन्न होती है, तब भी तुम सत्य के अनुसार व्यवहार नहीं करते, और अपने हितों की रक्षा और अपने सभी पहलुओं की सुरक्षा के लिए तुम सत्य का अभ्यास न करने का चुनाव करते हो, इस तरह तुम्हारे अपराध कई गुना बढ़ जाएँगे, और तुम्हारा अंतिम परिणाम क्या होगा? इसे स्पष्ट देखा जा सकता है : तुम्हारे ये सारे अपराध, और साथ ही तुम्हारे चुनाव, तुम्हारी खोजें और तुम्हारी आत्मनिष्ठ इच्छाएँ, और कोई कार्य करते हुए तुम्हारे द्वारा चुनी जाने वाली दिशाएँ और रास्ते—इन सभी चीजों का कुल मिलाकर यह अर्थ है कि तुम्हारा नरक में जाना तय है। क्या यह एक महत्वपूर्ण मामला नहीं है? ये सभी अपराध मिलकर एक दुष्कर्म बन जाते हैं। कुछ लोग अपने सामने आने वाली समस्याओं के बारे में विस्तार से चिंतन-मनन करते हैं; अन्य लोग उनके बारे में जरा भी चिंतन-मनन नहीं करते, न ही वे प्रार्थना करते हैं, और जब उनकी खोजें या चुनाव पथभ्रष्ट होते हैं या सत्य के विरुद्ध जाते हैं, तो वे परमेश्वर के सामने नहीं आते, बल्कि अपनी समस्या को कठोर हृदय से देखते हैं और यह सोचते हुए भाग खड़े होने का चुनाव करते हैं, "मैं लोगों की नजरों में नहीं आया, और मुझे आसपास परमेश्वर भी दिखाई नहीं देता। मुझे परवाह नहीं कि परमेश्वर जानता है या नहीं कि मैंने क्या किया है। अगर मेरे हित सुरक्षित हैं, तो मेरे लिए समस्या ठीक-ठाक निपट गई है। हर मामले में मेरे निजी हित सबसे पहले आते हैं।" आखिर में, परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने या परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने के बजाय, वे सिर्फ अपना बचाव करना चुनते हैं। क्या यह एक अपराध नहीं है? स्पष्ट देखा जा सकता है कि यह सचमुच एक अपराध है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर में विश्वास करने का सबसे महत्वपूर्ण भाग सत्य को व्यवहार में लाना है' से उद्धृत

कभी-कभी, किसी काम को खत्म करने के बाद, तुम अपने दिल में कुछ असहज महसूस करते हो। करीब से निरीक्षण करने पर, तुम पाते हो कि वास्तव में कोई समस्या है। इसे हल करना होगा, जिसके बाद तुम चैन महसूस करोगे। तुम्हारी बेचैनी साबित करती है कि कोई समस्या है जिस पर तुम्हें अतिरिक्त समय देने की ज़रूरत है और जिस पर तुम्हें अधिक ध्यान देना चाहिए। यह अपने कर्तव्य निभाने के प्रति एक गंभीर, ज़िम्मेदार रवैया है। जब कोई व्यक्ति गंभीर, जिम्मेदार, समर्पित, और कड़ी मेहनत करने वाला होता है, तो काम सही तरीके से पूरा किया जाएगा। कभी-कभी तुम्हारा मन ऐसा नहीं होता और तुम साफ-साफ नज़र आने वाली गलती को भी ढूँढ या पकड़ नहीं पाते। अगर किसी का ऐसा मन हो तो पवित्र आत्मा की प्रेरणा और मार्गदर्शन से वह समस्या को पहचानने में सक्षम हो जाएगा। किंतु अगर पवित्र आत्मा तुम्हारा मार्गदर्शन करे और तुम्हें ऐसी जागरूकता दे, तुम्हें यह बोध कराए कि कुछ गलत है, पर फिर भी तुम्हारा मन ऐसा न हो, तो भी तुम समस्या को पहचान नहीं हो पाओगे। तो इससे क्या पता चलता है? यह दिखाता है कि बहुत महत्वपूर्ण है कि लोग सहयोग करें; उनके दिल बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, और वे अपनी सोच और इरादों को किस दिशा में ले जाते हैं, वह भी बहुत महत्वपूर्ण है। परमेश्वर इसकी जाँच करता है और यह देख सकता है कि अपने कर्तव्य का निर्वहन करते समय, लोगों के मन में क्या होता है। यह महत्वपूर्ण है कि अपने कार्य करते समय लोग उसमें अपने पूरे दिल और पूरी शक्ति का प्रयोग करें। सहयोग भी काफी महत्वपूर्ण घटक होता है। यदि लोग अपने जिन कर्तव्यों का निर्वहन कर चुके हैं और कार्य पूरा कर चुके हैं उन पर कोई प्रायश्चित न करें, परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ न रहें, तो क्या वे पूरे दिल और पूरी शक्ति से कार्य करेंगे? अगर आज तुम अपना पूरा दिल और पूरी शक्ति नहीं लगाते हो, तो, जब कुछ गलत हो जाएगा और उसके परिणाम सामने आएंगे, क्या तब पछतावा करने के लिए बहुत देर नहीं हो जाएगी? तुम हमेशा के लिए ऋणी बन जाओगे, और यह तुम्हारे ऊपर एक धब्बा लग जाएगा! किसी के कर्तव्य के निर्वहन में धब्बा लगना अपराध होता है। इसलिए तुम्हें अपने हिस्से का कार्य सही ढंग से करना चाहिये, पूरे दिल और पूरी शक्ति से करना चाहिए। वे चीजें लापरवाही और बेमन से नहीं की जानी चाहिए; तुम्हें कोई पछतावा नहीं होना चाहिए। इस तरह, इस दौरान किये गये तुम्हारे कार्यों को परमेश्वर द्वारा याद रखा जाएगा। जिन कार्यों को परमेश्वर द्वारा याद रखा जाता है वे अच्छे कर्म होते हैं। फिर ऐसे कौन-से कार्य हैं जिन्हें याद नहीं रखा जाता? अपराधों को याद नहीं रखा जाता। ऐसा हो सकता है कि इस समय उन कार्यों का जिक्र करने पर लोग यह स्वीकार न करें कि वे बुरे कर्म हैं, लेकिन अगर ऐसा दिन आता है जब इन चीजों के गंभीर परिणाम सामने आते हैं, और वे नकारात्मक प्रभाव बन जाएँ, तब तुम्हें समझ में आएगा कि ये चीजें मात्र व्यवहार संबंधी अपराध नहीं हैं, बल्कि बुरा कर्म हैं। जब तुम्हें इसका एहसास होगा, तुम पछताओगे और सोचोगे : मुझे थोड़ी-बहुत रोकथाम करनी चाहिए थी! अगर मैंने इस पर थोड़ा और विचार कर लिया होता और प्रयास कर लिया होता, तो यह समस्या नहीं होती। कोई भी चीज़ तुम्हारे हृदय पर हमेशा के लिए लगे इस धब्बे को मिटा नहीं सकेगी और तुम परेशानी में पड़ जाओगे, अगर यह तुम पर एक स्थायी ऋण बन गयी। इसलिए, आज, हर बार जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो, या किसी आज्ञा को स्वीकार करते हो, तो तुम सभी को इसे अपनी पूरी ताक़त और पूरे दिल से करने का प्रयास करना चाहिए। तुम लोगों को इसे इस तरह से करना चाहिए कि तुम अपराध-बोध और पछतावे से मुक्त रहो, ताकि इसे परमेश्वर द्वारा याद किया जाए, और यह एक अच्छा काम हो। असावधानी और लापरवाही से, एक आँख खुली और दूसरी बंद रखकर, काम न करो; तुम पछताओगे, और इसे सुधार नहीं पाओगे। यह अपराध होगा, और अंततः, तुम्हारे दिल में हमेशा अपराधबोध, ऋणग्रस्तता और आरोप बने रहेंगे। इन दोनों रास्तों में से कौन-सा सबसे अच्छा है? कौन-सा रास्ता सही मार्ग है? बिना किसी पछतावे के, अपने पूरे दिल और ताक़त के साथ अपना कर्तव्य निभाना और अच्छे कामों को तैयार और संचित करना। अपने अपराधों को जमा न होने दो, जिससे तुम्हें पछतावा करना और ऋणी होना पड़े। क्या होता है जब एक व्यक्ति ने बहुत सारे अपराध किए हों? वह परमेश्वर के सामने ही अपने प्रति उसके क्रोध को जगा रहा है! यदि तुम और भी अपराध करते जाते हो, और तुम्हारे प्रति परमेश्वर का क्रोध और भी बढ़ता है, तो, अंततः, तुम्हें दंडित किया जाएगा।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

छोटा-मोटा अपराध कर देने वाले कुछ लोग सोचते हैं : "क्या परमेश्वर ने मुझे उजागर कर दिया है और मुझे निकाल दिया है? क्या वह मुझे मार डालेगा?" इस बार परमेश्वर लोगों को मारने नहीं, बल्कि यथासम्भव उन्हें आया है। गलतियां किससे नहीं होतीं? अगर सभी को मार दिया जाए, तो फिर यह "उद्धार" कैसे होगा? कुछ अपराध जान-बूझकर किये जाते हैं, जबकि कुछ अनजाने में हो जाते हैं। अनजाने में हुये अपराधों को पहचानकर, तुम बदल सकते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हारे बदलने से पहले ही तुम्हें समाप्त कर देगा? क्या उस तरह से परमेश्वर लोगों को बचा सकता है? वह इस तरह काम नहीं करता! चाहे तुमसे अपराध अनजाने में हुआ हो या विद्रोही प्रकृति के कारण, तुम्हें यह याद रखना चाहिए कि एक बार अपराध हो जाने पर, तुम्हें शीघ्रता करनी है, और वास्तविकता को पहचानकर आगे बढ़ना है; हालात कुछ भी हों, तुम्हें आगे बढ़ने का प्रयास करना है। परमेश्वर उद्धार का कार्य कर रहा है और वह जिन्हें बचाना चाहता है, उन्हें यूँ ही नहीं मार देगा। तुम चाहे किसी भी स्तर तक बदल पाने की स्थिति में हो, अगर अंत में परमेश्वर तुम्हें मार भी देता है, तो निश्चय ही उसका ऐसा करना धर्मितापूर्ण होगा; और जब समय आयेगा तो वह तुम्हें समझा देगा। इस समय तुम्हें सत्य के लिए प्रयास करना चाहिए, जीवन प्रवेश पर ध्यान देना चाहिए और सही तरीके से अपने कर्तव्य का निर्वहन करना चाहिए। इसमें कोई दोष नहीं है! अंतत:, परमेश्वर तुम्हारे साथ जैसा चाहे बर्ताव करे, वह हमेशा न्यायसंगत ही होता है; इस पर तुम्हें न तो संदेह करना चाहिये और न ही इसकी चिंता करनी चाहिये; भले ही इस समय तुम परमेश्वर की धार्मिकता न समझ पाओ, लेकिन वह दिन आयेगा जब तुम आश्वस्त हो जाओगे। परमेश्वर अपना कार्य प्रकाश में और न्यायसंगत ढंग से करता है; वह स्पष्ट रूप से सब कुछ ज्ञात करवाता है। अगर तुम लोग इस विषय पर ध्यान से चिंतन करो, तो तुम इस निष्कर्ष पर पहुँचोगे कि परमेश्वर का कार्य लोगों को बचाना और उनके स्वभाव बदलना है। चूँकि उसका कार्य लोगों के स्वभाव बदलना है, इसलिए अगर लोग अपनी भ्रष्टता प्रकट न करें, तो कुछ नहीं किया जा सकता, और कुछ प्राप्त नहीं होगा। अपनी भ्रष्टता प्रकट करने के बाद अगर लोग जरा-भी पश्चात्ताप नहीं करते, और वैसा ही करते रहते हैं जैसा करते रहे हैं, तो वे परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचाएंगे। परमेश्वर लोगों से विभिन्न मात्राओं में प्रतिशोध लेगा, और वे अपने अपराधों की कीमत चुकाएंगे। कभी-कभी तुम अनजाने ही स्वच्छंद हो जाते हो, और परमेश्वर तुम्हें इसका संकेत देता है, तुम्हारी काट-छाँट करता है, और तुमसे निपटता है। अगर तुम बदलकर बेहतर हो जाते हो, तो परमेश्वर तुम्हें जवाबदेह नहीं ठहराएगा। यह स्वभाव-परिवर्तन की सामान्य प्रक्रिया है, और उद्धार के कार्य का वास्तविक महत्व इस प्रक्रिया में प्रकट होता है। यह कुंजी है!

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा है कि यथासंभव लोगों की रक्षा की जाये' से उद्धृत

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, अतीत की घटनाएँ एक झटके में साफ की जा सकती हैं; अतीत के स्थान पर भविष्य को लाया जा सकता है; परमेश्वर की सहनशीलता समुद्र के समान असीम है। लेकिन इन वचनों में सिद्धांत भी निहित हैं। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे द्वारा किए गए किसी भी पाप को मिटा देगा, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो। परमेश्वर के समस्त कार्य के सिद्धांत हैं। इस मुद्दे को हल करने के लिए अतीत में एक प्रशासनिक आदेश दिया गया था—व्यक्ति द्वारा परमेश्वर का नाम स्वीकार करने से पहले किए गए सभी पापों को परमेश्वर माफ और क्षमा कर देता है, और जो लोग कलीसिया में प्रवेश करने के बाद भी पाप करते रहते हैं, उनका समाधान करने की एक प्रणाली है : जो कोई छोटा-मोटा पाप करता है, उसे पश्चात्ताप करने का मौका दिया जाता है, जबकि बार-बार पाप करने वालों को निष्कासित कर दिया जाता है। परमेश्वर ने हमेशा अपने कार्य में लोगों को यथासंभव अधिकतम सीमा तक सहन किया है, और इसमें यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य वास्तव में लोगों को बचाने का कार्य है। लेकिन अगर कार्य के इस अंतिम चरण में तुम अभी भी अक्षम्य पाप करते हो, तो तुम्हें वास्तव में बचाया नहीं जा सकता, और तुम बदल नहीं सकते। लोगों के स्वभाव शुद्ध करने और बदलने के लिए परमेश्वर के पास एक प्रक्रिया है। लोगों की भ्रष्ट प्रकृति की सतत अभिव्यक्ति और बदलाव की प्रक्रिया में परमेश्वर अपना उद्धार का लक्ष्य प्राप्त करता है। कुछ लोग सोचते हैं : "चूंकि यह मेरी प्रकृति है, इसलिए मैं इसे जितना संभव होगा, उजागर करूँगा, और इसके उजागर होने के बाद मैं इसे जानूँगा और सत्य को अभ्यास में लाऊँगा।" क्या यह प्रक्रिया आवश्यक है? अगर तुम वास्तव में सत्य को अभ्यास में लाने वाले व्यक्ति हो, और दूसरों के विभिन्न संघर्ष खुद में देखते हो, तो तुम खुद में उन्हीं व्यवहारों से बचने का कार्य करोगे। क्या यह अप्रत्यक्ष बदलाव नहीं है? कभी-कभी तुम्हारे मन में कुछ करने का विचार आता है, लेकिन इससे पहले कि तुम उसे करो, तुम्हें लगता है कि यह गलत है, और तुम उसे छोड़ देते हो। क्या इसका परिणाम तुम्हारा उद्धार नहीं है? प्रत्येक सत्य का अभ्यास एक प्रक्रिया है। जब व्यक्ति ने अपना अभ्यास शुरू ही किया होता है, तो गलतियों से मुक्ति और सटीकता उसी तरह से असंभव है, जैसे किसी अभ्यास का व्यक्ति की इच्छा से अदूषित होना। ऐसे कई मामले होते हैं, जिनसे तुम पूरी तरह से अपनी इच्छा के अनुसार निपटते हो, लेकिन निपटे और काट-छाँट किए जाने के बाद तुम अंततः पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा और वचनों के अनुसार अभ्यास करने लगोगे। यह बदलाव है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा है कि यथासंभव लोगों की रक्षा की जाये' से उद्धृत

फिलहाल, जब तक तुम लोगों के पास आशा की एक किरण है, तब तक, परमेश्वर अतीत की घटनाओं को स्मरण रखे या न रखे, तुम्हें कैसी मानसिकता बनाये रखनी चाहिए? "मुझे अपने स्वभाव में परिवर्तन की चेष्टा, परमेश्वर को जानने, शैतान के द्वारा फिर कभी मूर्ख नहीं बनने, और ऐसा कुछ भी जिससे परमेश्वर का नाम लज्जित होता हो, नहीं करने की चेष्टा अवश्य करनी चाहिए।" कौन-से मुख्य क्षेत्र निर्धारित करते हैं कि लोगों को बचाया जा सकता है या नहीं और उनके लिए कोई आशा है या नहीं? बात का मर्म यह है कि धर्मोपदेश सुनकर, तुम सत्य को समझ सकते हो या नहीं, तुम सत्य को अभ्यास में ला सकते हो या नहीं, और तुम बदल सकते हो या नहीं। यही वे मुख्य क्षेत्र हैं। यदि तुम केवल पछतावा महसूस करते हो, और जब कुछ करते हो तब बस वही करते हो जो तुम करना चाहते हो, उन्हीं पुराने तौर-तरीक़ों से करते हो, न केवल सत्य की तलाश नहीं करते, अब भी पुराने विचारों और पुराने अभ्यासों से चिपके रहते हो, और न केवल समझ से पूर्णतः रहित होते हो, बल्कि इसकी बजाय और बद से बदतर होते जाते हैं, तो तुम आशा से रहित होगे, और तुम्हें बट्टे खाते में डाल दिया जाना चाहिए। तुम जितना अधिक परमेश्वर को समझते हो, उतना ही अधिक तुम अपने आपको समझते हो, और स्वयं अपनी प्रकृति की जितनी आद्योपांत तुम्हारी समझ होती है, उतना ही अधिक तुम अपने आपको काबू में रख पाते हो। जब तुमने अपने अनुभव का निचोड़ निकाल लिया, तो उसके बाद तुम फिर कभी इस विषय में विफल नहीं होगे। वास्तविक तथ्य यह है कि हर किसी में दोष हैं, बस उन्हें जवाबदेह नहीं ठहराया जाता। सभी में वे हैं—कुछ में छोटे दोष हैं, और कुछ में बड़े दोष हैं; कुछ मुँहफट हैं, और कुछ घुन्ने हैं। कुछ लोग ऐसी चीज़ें करते हैं जिनके विषय में अन्य लोग जानते हैं, जबकि कुछ लोग दूसरों के इसके बारे में जाने बिना चीज़ें करते हैं। सभी के ऊपर दाग़-धब्बे हैं, और वे सभी कुछ निश्चित भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं, जैसे अहंकार या मिथ्याभिमान; या फिर वे कुछ न कुछ उल्लंघन, या अपने कार्य में कुछ न कुछ भूल-चूक या त्रुटियाँ करते हैं, या वे थोड़े-से विद्रोही हैं। ये सभी क्षमा योग्य चीज़ें हैं, क्योंकि ये ऐसी चीज़ें हैं जिनसे भ्रष्ट कर दिया गया कोई व्यक्ति बच नहीं सकता है। एक बार जब तुमने सत्य को समझ लिया, तो तुम्हें इनसे बचना चाहिए, और तब अतीत में घटित चीज़ों से हमेशा परेशान होना ज़रूरी नहीं रह जाएगा। इसके बजाय, डर यह है कि समझ लेने के बाद भी तुम नहीं बदलोगे, यह जानकर भी कि वे ग़लत हैं तुम वहीं सब चीजें करते रहोगे, और यह बताए जाने के बाद भी कि यह ग़लत है तुम एक निश्चित ढंग से काम करते रहोगे। ऐसे लोग छुटकारे से परे हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की सेवा करने के लिए पतरस के मार्ग पर चलना चाहिए' से उद्धृत

इंसान को अपने भ्रष्ट स्वभाव का पता होना चाहिए। उसे अपनी प्रकृति का, उसने क्या किया है और उसने जो रास्ता अपनाया है उसका, या अपने अपराधों और गलतियों का, ज्ञान होना चाहिए—उसे उन्हें विश्लेषित करना चाहिए। इसके अलावा, इंसान को यह स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि क्यों वह इन चीज़ों को करने में सक्षम है, और ऐसी चीज़ों को करने की प्रकृति क्या होती है। उसे यह भी समझना चाहिए कि परमेश्वर इंसान के लिए क्या चाहता है। इंसान अपने द्वारा की गई गलतियों के लिए दोषी, ऋणी या आरोपित महसूस कर सकता है, लेकिन क्या यह सही है अगर वह हमेशा नकारात्मक स्थिति में फँसा रहे? क्या इस तरह का रवैया या ऐसे विचारों का होना सही है? क्या यह सत्य के साथ मेल खाता है? क्या यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है? क्या तुम्हारी अवस्था वास्तव में इससे बाहर निकल आई है? क्या इसे वास्तव में सुधारा गया है? या क्या वह पिछली बात अभी भी तुम्हारे मौजूदा अभ्यास या तुम्हारे द्वारा अपनाए गए मार्ग को प्रभावित करती है—क्या यह इन पर अपनी छाया डाले हुए है? यदि तुम अक्सर इसका प्रभाव महसूस करते हो, तो इससे पता चलता है कि यह मुद्दा तुम्हारे दिल में पूरी तरह से हल नहीं हुआ है, और यह कि तुम्हें इसके सार का पता नहीं चला है या तुमने इससे वह सबक नहीं लिया है जो तुम्हें लेना चाहिए। यह केवल परमेश्वर को न जानने का मुद्दा नहीं है—यह कुछ ऐसा है जो इंसान के स्वभाव या सार से उत्पन्न होता है। अब यह कौन-सी समस्या पर विचार करने पर ज़ोर देता है? यह समस्या है, आगे का रास्ता कैसे तय किया जाए—वह अध्याय खत्म हो चुका है। परमेश्वर इंसान की भ्रष्टता की अभिव्यक्तियों के साथ इस बात के अनुसार व्यवहार करता है कि क्या इंसान अंततः सत्य को स्वीकार करने और अपनी भ्रष्टता को हल करने में सक्षम है। और फिर, लोग शैतान के वंशज होते हैं, और उनका प्रकृति-सार वही होता है, चाहे उन्होंने परमेश्वर के स्वभाव को नाराज किया हो या नहीं। ऐसा हो सकता है कि तुमने कुछ किया, पर किसी अन्य व्यक्ति के पास ऐसा करने का मौका न रहा हो। और चूँकि तुमने वह किया, तुम्हें अपने दिल में स्पष्ट होना चाहिए कि परमेश्वर के प्रति तुम्हें कैसा रवैया अपनाना चाहिए, तुम्हें उसके समक्ष कौन-से उत्तर प्रस्तुत करने चाहिए, और उसे क्या चाहिए। जब तुम इन चीज़ों को पूरी तरह से समझ लेते हो और पूरी स्पष्टता के साथ उनको मानते हो, उनका वैसे ही अनुकरण करते हो जैसा कि तुम्हें करना चाहिए, और उस बात से प्रभावित और बाधित नहीं होते हो, बल्कि आगे का मार्ग उसी तरह लेते हो जैसे कि तुम्हें लेना चाहिए—तो इसे हमेशा के लिए पीछे छोड़ दो, फिर तुम अपना कर्तव्य उसी तरह निभाओ जैसा तुम्हें करना चाहिए। एक लिहाज से, अपना कर्तव्य निभाना अब पिछले अपराधों का प्रायश्चित करने का एक तरीका है। यह नकारात्मक नज़रिया है, और हालांकि यह बहुत वांछनीय नहीं है, यह वह न्यूनतम स्वीकार्य मानसिकता है जो तुम्हारे पास होनी चाहिए। एक अन्य लिहाज से, तुम्हें अग्रसक्रिय होना चाहिए, और कहना चाहिए: "अतीत में मैंने जो भी किया हो, अब मैं परमेश्वर की इच्छा और सत्य को समझता हूँ। मुझे अपनी पूरी कोशिश करनी चाहिए कि मैं वह सब अर्पित कर दूँ जिसे अर्पित करने में मैं सक्षम हूँ—परमेश्वर को अर्पित कर देने के लिए। मुझे अपनी ज़िम्मेदारियों को अच्छी तरह से पूरा करना चाहिए और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहिए। एक सृजित प्राणी को यही करना चाहिए"। तुम्हें सकारात्मक लिहाज से प्रवेश करना चाहिए। चाहे तुम्हारे पास परमेश्वर के बारे में धारणाएँ हों, या तुम अपनी भ्रष्टता को उजागर करके उसके स्वभाव को नाराज करते हो, तुम्हें आत्म-चिंतन करना चाहिए और सत्य की तलाश करनी चाहिए। अपना सबक सीखो, और अतीत की उस नकारात्मक चीज को खुद को प्रभावित न करने दो। इसे अपने पीछे छोड़ दो, एक ही बार में, और हमेशा के लिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज से ही परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और गलतफ़हमियों को दूर किया जा सकता है' से उद्धृत

शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के कारण लोगों द्वारा अपनी भ्रष्टता प्रकट किए जाने की संभावना है, और उनके द्वारा कुछ अपराध किए जाने की भी संभावना है। किंतु साथ ही, परमेश्वर का कार्य उनमें फिर भी कुछ परिणाम हासिल करता है। यदि परमेश्वर परिणामों पर कोई विचार न करता, और केवल मनुष्य की प्रकृति को ही प्रकट होते देखता, तो इसे लोगों को बचाना नहीं कहा जा सकता था। उद्धार का परिणाम मुख्य रूप से लोगों के अपने कर्तव्य पूरे करने और सत्य को अभ्यास में लाने में प्रकट होता है। परमेश्वर यह देखता है कि उन्होंने इन क्षेत्रों में कितनी उपलब्धियाँ हासिल की हैं, और फिर वह उनके अपराधों की सीमा देखता है; ये दोनों कारक उनके परिणामों और उनके बने रहने या न रहने को निर्धारित करते हैं। उदाहरण के लिए, अतीत में, कुछ लोगों ने बहुत अधिक भ्रष्टता प्रकट की और देह-सुख की बहुत अधिक परवाह की; वे परमेश्वर के लिए खुद को खपाने को तैयार नहीं थे, न ही उन्होंने परमेश्वर के घर के हितों को बनाए रखा। किंतु कई वर्षों तक उपदेश सुनने के बाद उनमें वास्तविक परिवर्तन आया है। वे अपने कर्तव्य पूरे करने में सत्य-सिद्धांतों तक पहुँचना जानते हैं, और वे अधिकाधिक परिणाम प्राप्त करते हैं। वे सभी बातों में परमेश्वर के पक्ष में खड़े भी हो सकते हैं और परमेश्वर के घर के कार्य को बनाए रखने के लिए भरसक प्रयास कर सकते हैं। अपने जीवन-स्वभाव को बदलने का यही अर्थ है, और यही वह परिवर्तन है, जिसे परमेश्वर चाहता है। साथ ही, कुछ लोग, जब उनके पास कुछ धारणाएँ होती थीं, तो वे उन्हें चारों ओर फैलाना पसंद करते थे, किंतु अब जब उनके पास कुछ धारणाएँ होती हैं, तो वे अपनी धारणाएँ फैलाए बिना या परमेश्वर के विरोध में कुछ किए बिना, सत्य को खोजने और विनम्र होने में सक्षम होते हैं। क्या यहाँ कोई परिवर्तन हुआ है? कुछ लोग, जैसे ही किसी के द्वारा उनसे निपटा जाता था और उनकी काट-छाँट की जाती थी, वे तुरंत विरोध करते थे; किंतु अब जब उनके साथ ऐसा होता है, तो वे स्वयं को जानने और इसे स्वीकार करने में सक्षम होते हैं। बाद में, वे कुछ वास्तविक परिवर्तन से गुजरते हैं। क्या यह एक परिणाम नहीं है? किंतु तुम्हारा परिवर्तन कितना भी बड़ा क्यों न हो, तुम्हारी प्रकृति फौरन नहीं बदली जा सकती। अपराधों से पूरी तरह मुक्त होना असंभव है। यदि कोई परमेश्वर में विश्वास के सही रास्ते पर चल पड़ता है, और सभी चीजों में सत्य की तलाश करना जानता है, तो भले ही वह थोड़ी अवज्ञा भी दिखाए, लेकिन वह उस समय इसके प्रति सचेत होगा। यह जागरूकता उनमें तुरंत परिवर्तन ला सकती है, और उनकी स्थितियाँ बेहतर से बेहतर होती जाएँगी। वे एक-दो बार अपराध कर सकते हैं, लेकिन बार-बार नहीं। यही होता है परिवर्तन। इस प्रकार के परिवर्तन का अर्थ है कि जिसने परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लिया है, वह अधिक सत्य अभ्यास में ला सकता है तथा परमेश्वर की अपेक्षानुसार कुछ कर सकता है। ऐसा व्यक्ति कम से कम अपराध करेगा और उसकी अवज्ञा कम से कम गंभीर होगी। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि परमेश्वर के कार्य का प्रभाव हो गया है; वह लोगों में इसी प्रकार की अभिव्यक्ति चाहता है, जो यह दिखाता है कि उनमें ये परिणाम प्राप्त कर लिए गए हैं। तदनुसार, जिस तरह से परमेश्वर लोगों के परिणामों को सँभालता है या जिस तरह से वह किसी के साथ व्यवहार करता है, वह पूरी तरह से धार्मिक, उचित और निष्पक्ष है। तुम्हें केवल अपने सभी प्रयास उसके लिए खुद को खर्च करने में लगाने की जरूरत है, साहस और दृढ़ता के साथ, बिना किसी हिचकिचाहट के उस सत्य का अभ्यास करो जिसका कि अभ्यास तुम्हें करना चाहिए, परमेश्वर तुम्हारे साथ अनुचित व्यवहार नहीं करेगा। इस बारे में सोचो : क्या वे लोग, जो सत्य को अभ्यास में लाते हैं, परमेश्वर के द्वारा दंडित किए जा सकते हैं? कई लोग हमेशा परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के बारे में शंकालु रहते हैं, और भयभीत रहते हैं कि सत्य को अभ्यास में लाने के बावजूद उन्हें दंडित किया जाएगा; वे हमेशा भयभीत रहते हैं कि अगर वे वफादारी दिखाएँ भी, तो वह उसे नहीं देखेगा। ऐसे लोगों को परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का कोई ज्ञान नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'लोगों के प्रदर्शन के आधार पर परमेश्वर द्वारा उनके परिणाम निर्धारण के निहितार्थ' से उद्धृत

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