57. परमेश्‍वर के विरुद्ध आत्‍मरक्षात्‍मकता और उसके बारे में गलतफहमियों का निराकरण करने के सिद्धांत

(1) एकमात्र मसीह ही मानव-जाति का रक्षक है। केवल वही मनुष्‍य को सत्‍य और जीवन प्रदान कर सकता है, और उसके उद्धार के अलावा कोई और उद्धार नहीं है।

(2) यह जानना आवश्‍यक है कि परमेश्‍वर का न्‍याय और ताड़ना, परीक्षण और शोधन, और काट-छाँट तथा निपटारा, सभी कुछ मनुष्‍य के उद्धार और पूर्णता की खातिर किये जाते हैं, और वे सब मनुष्‍य के प्रति प्रेम की अभिव्‍यक्तियाँ हैं।

(3) जब व्‍यक्ति के साथ कोई ऐसी घटना हो जो उसकी धारणाओं से मेल न खाती हो, तो उन्‍हें सत्‍य तलाशना चाहिए, परमेश्‍वर की इच्‍छा समझनी चाहिए, और उसके स्‍वभाव का ज्ञान हासिल करने का प्रयास करना चाहिए। केवल तभी वे अपनी धारणाओं और गलतफहमियों से निजात पा सकते हैं।

(4) जो निरंतर परमेश्‍वर से अपना बचाव करते हैं, उसे गलत समझते हैं, वे धोखेबाज हैं, और वे सारे लोग जो यह विश्‍वास नहीं करते कि परमेश्‍वर ही सत्‍य है, वे घृणित अभागे हैं—पूरी तरह से गैर-विश्‍वासी और अविश्वासी हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

आज परमेश्वर तुम लोगों का न्याय करता है, तुम लोगों को ताड़ना देता है, और तुम्हारी निंदा करता है, लेकिन तुम्हें यह अवश्य जानना चाहिए कि तुम्हारी निंदा इसलिए की जाती है, ताकि तुम स्वयं को जान सको। वह इसलिए निंदा करता है, शाप देता है, न्याय करता और ताड़ना देता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको, ताकि तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हो सके, और, इसके अलावा, तुम अपनी कीमत जान सको, और यह देख सको कि परमेश्वर के सभी कार्य धार्मिक और उसके स्वभाव और उसके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं, और वह मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है, और कि वह धार्मिक परमेश्वर है, जो मनुष्य को प्यार करता है, उसे बचाता है, उसका न्याय करता है और उसे ताड़ना देता है। यदि तुम केवल यह जानते हो कि तुम निम्न हैसियत के हो, कि तुम भ्रष्ट और अवज्ञाकारी हो, परंतु यह नहीं जानते कि परमेश्वर आज तुममें जो न्याय और ताड़ना का कार्य कर रहा है, उसके माध्यम से वह अपने उद्धार के कार्य को स्पष्ट करना चाहता है, तो तुम्हारे पास अनुभव प्राप्त करने का कोई मार्ग नहीं है, और तुम आगे जारी रखने में सक्षम तो बिल्कुल भी नहीं हो। परमेश्वर मारने या नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि न्याय करने, शाप देने, ताड़ना देने और बचाने के लिए आया है। उसकी 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना के समापन से पहले—इससे पहले कि वह मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी का परिणाम स्पष्ट करे—पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य उद्धार के लिए होगा; इसका प्रयोजन विशुद्ध रूप से उन लोगों को पूर्ण बनाना—पूरी तरह से—और उन्हें अपने प्रभुत्व की अधीनता में लाना है, जो उससे प्रेम करते हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर लोगों को कैसे बचाता है, यह सब उन्हें उनके पुराने शैतानी स्वभाव से अलग करके किया जाता है; अर्थात्, वह उनसे जीवन की तलाश करवाकर उन्हें बचाता है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो उनके पास परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का कोई रास्ता नहीं होगा। उद्धार स्वयं परमेश्वर का कार्य है, और जीवन की तलाश करना ऐसी चीज़ है, जिसे उद्धार स्वीकार करने के लिए मनुष्य को करना ही चाहिए। मनुष्य की निगाह में, उद्धार परमेश्वर का प्रेम है, और परमेश्वर का प्रेम ताड़ना, न्याय और शाप नहीं हो सकता; उद्धार में प्रेम, करुणा और, इनके अलावा, सांत्वना के वचनों के साथ-साथ परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए असीम आशीष समाविष्ट होने चाहिए। लोगों का मानना है कि जब परमेश्वर मनुष्य को बचाता है, तो ऐसा वह उन्हें अपने आशीषों और अनुग्रह से प्रेरित करके करता है, ताकि वे अपने हृदय परमेश्वर को दे सकें। दूसरे शब्दों में, उसका मनुष्य को स्पर्श करना उसे बचाना है। इस तरह का उद्धार एक सौदा करके किया जाता है। केवल जब परमेश्वर मनुष्य को सौ गुना प्रदान करता है, तभी मनुष्य परमेश्वर के नाम के प्रति समर्पित होता है और उसके लिए अच्छा करने और उसे महिमामंडित करने का प्रयत्न करता है। यह मानवजाति के लिए परमेश्वर की अभिलाषा नहीं है। परमेश्वर पृथ्वी पर भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए कार्य करने आया है—इसमें कोई झूठ नहीं है। यदि होता, तो वह अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित ही नहीं आता। अतीत में, उद्धार के उसके साधन में परम प्रेम और करुणा दिखाना शामिल था, यहाँ तक कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। वर्तमान अतीत जैसा नहीं है : आज तुम लोगों को दिया गया उद्धार अंतिम दिनों के समय में प्रत्येक व्यक्ति का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण किए जाने के दौरान घटित होता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन प्रेम या करुणा नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है, ताकि मनुष्य को अधिक अच्छी तरह से बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है, वह ताड़ना, न्याय और निर्दय मार है, लेकिन यह जान लो : इस निर्मम मार में थोड़ा-सा भी दंड नहीं है। मेरे वचन कितने भी कठोर हों, तुम लोगों पर जो पड़ता है, वे कुछ वचन ही हैं, जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत हो सकते हैं, और मैं कितना भी क्रोधित क्यों न हूँ, तुम लोगों पर जो पड़ता है, वे फिर भी कुछ शिक्षाप्रद वचन ही हैं, और मेरा आशय तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना या तुम लोगों को मार डालना नहीं है। क्या यह सब तथ्य नहीं है? जान लो कि आजकल हर चीज़ उद्धार के लिए है, चाहे वह धार्मिक न्याय हो या निर्मम शुद्धिकरण और ताड़ना। भले ही आज प्रत्येक व्यक्ति का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण किया जा रहा हो या मनुष्य की श्रेणियाँ प्रकट की जा रही हों, परमेश्वर के समस्त वचनों और कार्य का प्रयोजन उन लोगों को बचाना है, जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं। धार्मिक न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से लाया जाता है, और निर्मम शुद्धिकरण उन्हें निर्मल बनाने के लिए किया जाता है; कठोर वचन या ताड़ना, दोनों शुद्ध करने के लिए किए जाते हैं और वे उद्धार के लिए हैं। इस प्रकार, उद्धार का आज का तरीका अतीत के तरीके जैसा नहीं है। आज तुम्हारे लिए उद्धार धार्मिक न्याय के ज़रिए लाया जाता है, और यह तुम लोगों में से प्रत्येक को उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करने का एक अच्छा उपकरण है। इसके अतिरिक्त, निर्मम ताड़ना तुम लोगों के सर्वोच्च उद्धार का काम करती है—और ऐसी ताड़ना और न्याय का सामना होने पर तुम लोगों को क्या कहना है? क्या तुम लोगों ने शुरू से अंत तक उद्धार का आनंद नहीं लिया है? तुम लोगों ने देहधारी परमेश्वर को देखा है और उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि का एहसास किया है; इसके अलावा, तुमने बार-बार मार और अनुशासन का अनुभव किया है। लेकिन क्या तुम लोगों को सर्वोच्च अनुग्रह भी प्राप्त नहीं हुआ है? क्या तुम लोगों को प्राप्त हुए आशीष किसी भी अन्य की तुलना में अधिक नहीं हैं? तुम लोगों को प्राप्त हुए अनुग्रह सुलेमान को प्राप्त महिमा और संपत्ति से भी अधिक विपुल हैं! इसके बारे में सोचो : यदि आगमन के पीछे मेरा इरादा तुम लोगों को बचाने के बजाय तुम्हारी निंदा करना और सज़ा देना होता, तो क्या तुम लोगों का जीवन इतने लंबे समय तक चल सकता था? क्या तुम, मांस और रक्त के पापी प्राणी आज तक जीवित रहते? यदि मेरा उद्देश्य केवल तुम लोगों को दंड देना होता, तो मैं देह क्यों बनता और इतने महान उद्यम की शुरुआत क्यों करता? क्या तुम पूर्णत: नश्वर प्राणियों को दंडित करने का काम एक वचन भर कहने से ही न हो जाता? क्या तुम लोगों की जानबूझकर निंदा करने के बाद अभी भी मुझे तुम लोगों को नष्ट करने की आवश्यकता होगी? क्या तुम लोगों को अभी भी मेरे इन वचनों पर विश्वास नहीं है? क्या मैं केवल प्यार और करुणा के माध्यम से मनुष्य को बचा सकता हूँ? या क्या मैं मनुष्यों को बचाने के लिए केवल सूली पर चढ़ने के तरीके का ही उपयोग कर सकता हूँ? क्या मेरा धार्मिक स्वभाव मनुष्य को पूरी तरह से आज्ञाकारी बनाने में अधिक सहायक नहीं है? क्या यह मनुष्य को पूरी तरह से बचाने में अधिक सक्षम नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए' से उद्धृत

तुम सब पाप और व्यभिचार की धरती पर रहते हो; और तुम सब व्यभिचारी और पापी हो। आज तुम न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण रूप से, तुम लोगों ने ताड़ना और न्याय प्राप्त किया है, तुमने वास्तव में गहन उद्धार प्राप्त किया है, दूसरे शब्दों में, तुमने परमेश्वर का महानतम प्रेम प्राप्त किया है। वह जो कुछ करता है, उस सबमें वह तुम्हारे प्रति वास्तव में प्रेमपूर्ण है। वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता। यह तुम लोगों के पापों के कारण है कि वह तुम लोगों का न्याय करता है, ताकि तुम आत्म-परीक्षण करो और यह ज़बरदस्त उद्धार प्राप्त करो। यह सब मनुष्य को संपूर्ण बनाने के लिए किया जाता है। प्रारंभ से लेकर अंत तक, परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए पूरी कोशिश कर रहा है, और वह अपने ही हाथों से बनाए हुए मनुष्य को पूर्णतया नष्ट करने का इच्छुक नहीं है। आज वह कार्य करने के लिए तुम लोगों के मध्य आया है; क्या यह और भी उद्धार नहीं है? अगर वह तुम लोगों से नफ़रत करता, तो क्या फिर भी वह व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? वह इस प्रकार कष्ट क्यों उठाए? परमेश्वर तुम लोगों से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम लोगों को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम सबसे सच्चा प्रेम है। यह केवल लोगों की अवज्ञा के कारण है कि उसे न्याय के माध्यम से उन्हें बचाना पड़ता है; यदि वह ऐसा न करे, तो उन्हें बचाया जाना असंभव होगा। चूँकि तुम लोग नहीं जानते कि कैसे जिया जाए, यहाँ तक कि तुम इससे बिलकुल भी अवगत नहीं हो, और चूँकि तुम इस दुराचारी और पापमय भूमि पर जीते हो और स्वयं दुराचारी और गंदे दानव हो, इसलिए वह तुम्हें और अधिक भ्रष्ट होते नहीं देख सकता; वह तुम्हें इस मलिन भूमि पर रहते हुए नहीं देख सकता जहाँ तुम अभी रह रहे हो और शैतान द्वारा उसकी इच्छानुसार कुचले जा रहे हो, और वह तुम्हें अधोलोक में गिरने नहीं दे सकता। वह केवल लोगों के इस समूह को प्राप्त करना और तुम लोगों को पूर्णतः बचाना चाहता है। तुम लोगों पर विजय का कार्य करने का यह मुख्य उद्देश्य है—यह केवल उद्धार के लिए है। यदि तुम नहीं देख सकते कि जो कुछ तुम पर किया जा रहा है, वह प्रेम और उद्धार है, यदि तुम सोचते हो कि यह मनुष्य को यातना देने की एक पद्धति, एक तरीका भर है और विश्वास के लायक नहीं है, तो तुम पीड़ा और कठिनाई सहने के लिए वापस अपने संसार में लौट सकते हो! यदि तुम इस धारा में रहने और इस न्याय और अमित उद्धार का आनंद लेने, और मनुष्य के संसार में कहीं न पाए जाने वाले इन सब आशीषों का और इस प्रेम का आनंद उठाने के इच्छुक हो, तो अच्छा है : विजय के कार्य को स्वीकार करने के लिए इस धारा में बने रहो, ताकि तुम्हें पूर्ण बनाया जा सके। परमेश्वर के न्याय के कारण आज तुम्हें कुछ कष्ट और शुद्धिकरण सहना पड़ सकता है, लेकिन यह कष्ट मूल्यवान और अर्थपूर्ण है। यद्यपि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के द्वारा लोग शुद्ध, और निर्ममतापूर्वक उजागर किए जाते हैं—जिसका उद्देश्य उन्हें उनके पापों का दंड देना, उनके देह को दंड देना है—फिर भी इस कार्य का कुछ भी उनके देह को नष्ट करने की सीमा तक नकारने के इरादे से नहीं है। वचन के समस्त गंभीर प्रकटीकरण तुम्हें सही मार्ग पर ले जाने के उद्देश्य से हैं। तुम लोगों ने इस कार्य का बहुत-कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है, और स्पष्टतः, यह तुम्हें बुरे मार्ग पर नहीं ले गया है! यह सब तुम्हें सामान्य मानवता को जीने योग्य बनाने के लिए है; और यह सब तुम्हारी सामान्य मानवता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम तुम्हारी आवश्यकताओं पर आधारित है, तुम्हारी दुर्बलताओं के अनुसार है, और तुम्हारे वास्तविक आध्यामिक कद के अनुसार है, और तुम लोगों पर कोई असहनीय बोझ नहीं डाला गया है। यह आज तुम्हें स्पष्ट नहीं है, और तुम्हें लगता है कि मैं तुम पर कठोर हो रहा हूँ, और निस्संदेह तुम सदैव यह विश्वास करते हो कि मैं तुम्हें प्रतिदिन इसलिए ताड़ना देता हूँ, इसलिए तुम्हारा न्याय करता हूँ और इसलिए तुम्हारी भर्त्सना करता हूँ, क्योंकि मैं तुमसे घृणा करता हूँ। किंतु यद्यपि जो तुम सहते हो, वह ताड़ना और न्याय है, किंतु वास्तव में यह तुम्हारे लिए प्रेम है, और यह सबसे बड़ी सुरक्षा है। यदि तुम इस कार्य के गहन अर्थ को नहीं समझ सकते, तो तुम्हारे लिए अनुभव जारी रखना असंभव होगा। इस उद्धार से तुम्हें सुख प्राप्त होना चाहिए। होश में आने से इनकार मत करो। इतनी दूर आकर तुम्हें विजय के कार्य का अर्थ स्पष्ट दिखाई देना चाहिए, और तुम्हें अब और इसके बारे में ऐसी-वैसी राय नहीं रखनी चाहिए!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई (4)' से उद्धृत

परमेश्वर में विश्वास करने वाले बहुत-से लोग परमेश्वर की इच्छा को समझने पर ध्यान नहीं देते; वे सोचते हैं कि परमेश्वर ने जिसको बचाना पूर्वनिर्धारित कर दिया है, परमेश्वर उसे अवश्य ही बचाएगा; और वे सोचते हैं कि जिनको बचाना परमेश्वर ने पूर्वनिर्धारित नहीं किया है, परमेश्वर उन्हें नहीं बचाएगा, भले ही वे कुछ भी करें। उन्हें लगता है कि परमेश्वर लोगों के कृत्यों और व्यवहार के आधार पर उनकी नियति तय नहीं करेगा। अगर तुम इस तरह सोचते हो तो तुमने परमेश्वर को बिल्कुल गलत समझा है। अगर परमेश्वर सचमुच ऐसा करता तो क्या वह धार्मिक और न्यायसंगत हो सकता है? परमेश्वर लोगों की नियति एक सिद्धांत के आधार पर तय करते हैं। अंतत: लोगों की नियति उनके कामों और व्यवहार के अनुसार निर्धारित होगी। तुम्हें परमेश्वर का धर्मी स्वभाव नजर नहीं आता है, और तुम हमेशा ही परमेश्वर को गलत समझ लेते हैं और उसके इरादों को तोड़-मरोड़कर देखते हो। यही कारण है कि तुम निराशावादी बनकर उम्मीद छोड़ देते हैं। क्या यह खुद पर थोपी हुई चीज नहीं होती? क्या तुम सचमुच परमेश्वर को समझते हो, और क्या तुम परमेश्वर के इरादों को लेकर आश्वस्त हो? तुमने "परमेश्वर के पूर्वनिर्धारण" को हमेशा एक सीमा-रेखा खींचने के लिए इस्तेमाल किया है, और परमेश्वर के वचनों को नकारा है। यह परमेश्वर के विषय में एक गंभीर भ्रम है! तुम परमेश्वर के कार्य को नहीं समझते, और तुम परमेश्वर की इच्छा को भी बिल्कुल नहीं समझते; और इससे भी बढ़कर, तुम उन श्रमसाध्य प्रयासों को नहीं समझते, जो उसने अपने छह हजार वर्षीय प्रबंधन-कार्य में लगाए हैं! तुम खुद को निराशा के हवाले कर देते हो, अनुमान लगाते हो और परमेश्वर पर संदेह करते हो; तुम यह सोचते हुए सेवाकर्ता होने से डरते हो, "मुझमें कुछ भी खास नहीं है; मुझे इस काम को करने के लिए क्यों उन्नत किया जा रहा है? क्या परमेश्वर मेरा इस्तेमाल कर रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह अभी तो मुझसे सेवा करवा रहा हो और जब मैं किसी काम का नहीं रहूँगा, तो मुझसे छुटकारा पाने की योजना बना रहा हो।" क्या यह दृष्टिकोण परमेश्वर को उन्हीं लोगों की श्रेणी में नहीं रख देता, जो सत्ता में हैं? तुमने परमेश्वर को हमेशा गलत समझा है; तुमने परमेश्वर के बारे में बुरा सोचा है और उसकी अवमानना की है। तुमने कभी परमेश्वर के वचनों और उसकी ईमानदारी पर विश्वास नहीं किया, तुमने सक्रिय रूप से सेवाकर्ता बनने की कोशिश की है, तुमने सेवाकर्ताओं के मार्ग पर चलने की पहल की है, लेकिन तुमने अपना स्वभाव बदलने का प्रयास नहीं किया, और न ही तुमने सत्य को अभ्यास में लाने के लिए कठिनाइयाँ झेली हैं। अतत: तुमने अपनी सारी जिमेदारियाँ यह कहते हुए परमेश्वर पर डाल दी हैं कि उसने तुम्हें पूर्वनियत नहीं किया है, और वह तुम्हारे साथ ईमानदार नहीं रहा है। समस्या क्या है? तुम परमेश्वर के इरादों को गलत समझते हो, तुम परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं करते, तुम सत्य को अभ्यास में नहीं लाते, न ही तुम अपना कर्तव्य निभाते हुए पूरी तरह से समर्पित होते हो। तुम परमेश्वर की इच्छा कैसे पूरी कर सकते हो? ऐसे लोग सेवाकर्ता बनने के जरा भी योग्य नहीं हैं, तो फिर वे उसके साथ सौदेबाजी करने के योग्य कैसे हैं? अगर तुम सोचते हो कि परमेश्वर धार्मिक नहीं हैं, तो तुम उस पर विश्वास क्यों करते हो? तुमने हमेशा चाहा है कि तुम परमेश्वर के परिवार के लिए परिश्रम करो, इससे पहले ही परमेश्वर तुमसे व्यक्तिगत रूप से कहे, "तुम राज्य के लोगों में से हो, और यह स्थिति कभी नहीं बदलेगी," और अगर परमेश्वर ऐसा न कहे, तो तुम उसे अपना सच्चा हृदय कभी नहीं दोगे। ऐसे लोग कितने विद्रोही होते हैं! मैंने ऐसे बहुत सारे लोग देखे हैं, जिन्होंने अपने स्वभाव बदलने पर कभी ध्यान केंद्रित नहीं किया, और सत्य को अभ्यास में लाने पर भी कम ध्यान केंद्रित किया। वे केवल यह पूछने पर ध्यान देते हैं कि वे अच्छी मंजिल प्राप्त कर पाएँगे या नहीं, परमेश्वर उनके साथ कैसा बरताव करेगा, क्या उसने उन्हें अपने लोगों में शामिल करने के लिए पूर्वनियत किया है, और अन्य अफवाहजन्य मामले। ऐसे लोग, जो नेक काम में नहीं लगे हैं, शाश्वत जीवन कैसे पा सकते हैं? वे परमेश्वर के परिवार में कैसे बने रह सकते हैं?

अब मैं तुमसे सत्यनिष्ठा से कहता हूँ : अगर कोई पूर्वनियत व्यक्ति सत्य को अभ्यास में नहीं लाता, तो अंतत: उसे हटा दिया जाएगा; और जो व्यक्ति ईमानदारी से खुद को परमेश्वर के लिए खपाता है और सत्य को अभ्यास में लाने की भरसक कोशिश करता है—भले ही लोग उसे वहाँ रहने के लिये पूर्वनियत न मानें—तो भले ही लोग उसे ऐसा व्यक्ति समझें, जिसे बने रहने के लिए पूर्वनियत नहीं किया गया है—परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के कारण उसकी अंतिम मंजिल उन तथाकथित पूर्वनियत लोगों से बेहतर होगी, जिनमें कोई निष्ठा नहीं है। क्या तुम्हें इन वचनों पर विश्वास है? अगर तुम्हें इन वचनों पर विश्वास नहीं है और तुम चीजों को गलत रूप में लेना जारी रखते हो, तो मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से बच नहीं पाओगे, क्योंकि तुम सच में परमेश्वर को नहीं चाहते और तुम्हें सत्य प्रिय नहीं है। चूँकि ऐसा है, इसलिए परमेश्वर का लोगों को पूर्वनियत करना महत्वपूर्ण नहीं है। मेरा ऐसा कहने का कारण यह है कि अंत में परमेश्वर लोगों का परिणाम उनके निष्पादन और बरताव से तय करेगा; निष्पक्ष रूप से कहूँ तो, परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत किया जाना एक छोटी भूमिका निभाता है, मुख्य भूमिका नहीं। क्या तुम इन वचनों को समझते हो?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा है कि यथासंभव लोगों की रक्षा की जाये' से उद्धृत

मैं उन लोगों में प्रसन्नता अनुभव करता हूँ जो दूसरों पर शक नहीं करते, और मैं उन लोगों को पसंद करता हूँ जो सच को तत्परता से स्वीकार कर लेते हैं; इन दो प्रकार के लोगों की मैं बहुत परवाह करता हूँ, क्योंकि मेरी नज़र में ये ईमानदार लोग हैं। यदि तुम धोखेबाज हो, तो तुम सभी लोगों और मामलों के प्रति सतर्क और शंकित रहोगे, और इस प्रकार मुझमें तुम्हारा विश्वास संदेह की नींव पर निर्मित होगा। मैं इस तरह के विश्वास को कभी स्वीकार नहीं कर सकता। सच्चे विश्वास के अभाव में तुम सच्चे प्यार से और भी अधिक वंचित हो। और यदि तुम परमेश्वर पर इच्छानुसार संदेह करने और उसके बारे में अनुमान लगाने के आदी हो, तो तुम यकीनन सभी लोगों में सबसे अधिक धोखेबाज हो। तुम अनुमान लगाते हो कि क्या परमेश्वर मनुष्य जैसा हो सकता है : अक्षम्य रूप से पापी, क्षुद्र चरित्र का, निष्पक्षता और विवेक से विहीन, न्याय की भावना से रहित, शातिर चालबाज़ियों में प्रवृत्त, विश्वासघाती और चालाक, बुराई और अँधेरे से प्रसन्न रहने वाला, आदि-आदि। क्या लोगों के ऐसे विचारों का कारण यह नहीं है कि उन्हें परमेश्वर का थोड़ा-सा भी ज्ञान नहीं है? ऐसा विश्वास पाप से कम नहीं है! कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो मानते हैं कि जो लोग मुझे खुश करते हैं, वे बिल्कुल ऐसे लोग हैं जो चापलूसी और खुशामद करते हैं, और जिनमें ऐसे हुनर नहीं होंगे, वे परमेश्वर के घर में अवांछनीय होंगे और वे वहाँ अपना स्थान खो देंगे। क्या तुम लोगों ने इतने बरसों में बस यही ज्ञान हासिल किया है? क्या तुम लोगों ने यही प्राप्त किया है? और मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान इन गलतफहमियों पर ही नहीं रुकता; परमेश्वर के आत्मा के खिलाफ तुम्हारी निंदा और स्वर्ग की बदनामी इससे भी बुरी बात है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि ऐसा विश्वास तुम लोगों को केवल मुझसे दूर भटकाएगा और मेरे खिलाफ बड़े विरोध में खड़ा कर देगा। कार्य के कई वर्षों के दौरान तुम लोगों ने कई सत्य देखे हैं, किंतु क्या तुम लोग जानते हो कि मेरे कानों ने क्या सुना है? तुम में से कितने लोग सत्य को स्वीकारने के लिए तैयार हैं? तुम सब लोग विश्वास करते हो कि तुम सत्य के लिए कीमत चुकाने को तैयार हो, किंतु तुम लोगों में से कितनों ने वास्तव में सत्य के लिए दुःख झेला है? तुम लोगों के हृदय में अधार्मिकता के सिवाय कुछ नहीं है, जिससे तुम लोगों को लगता है कि हर कोई, चाहे वह कोई भी हो, धोखेबाज और कुटिल है—यहाँ तक कि तुम यह भी विश्वास करते हो कि देहधारी परमेश्वर, किसी सामान्य मनुष्य की तरह, दयालु हृदय या कृपालु प्रेम से रहित हो सकता है। इससे भी अधिक, तुम लोग विश्वास करते हो कि कुलीन चरित्र और दयालु, कृपालु प्रकृति केवल स्वर्ग के परमेश्वर में ही होती है। तुम लोग विश्वास करते हो कि ऐसा कोई संत नहीं होता, कि केवल अंधकार एवं दुष्टता ही पृथ्वी पर राज करते हैं, जबकि परमेश्वर एक ऐसी चीज़ है, जिसे लोग अच्छाई और सुंदरता के लिए अपने मनोरथ सौंपते हैं, वह उनके द्वारा गढ़ी गई एक किंवदंती है। तुम लोगों के विचार से, स्वर्ग का परमेश्वर बहुत ही ईमानदार, धार्मिक और महान है, आराधना और श्रद्धा के योग्य है, जबकि पृथ्वी का यह परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर का एक स्थानापन्न और साधन है। तुम विश्वास करते हो कि यह परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर के समकक्ष नहीं हो सकता, उनका एक-साथ उल्लेख तो बिलकुल नहीं किया जा सकता। जब परमेश्वर की महानता और सम्मान की बात आती है, तो वे स्वर्ग के परमेश्वर की महिमा से संबंधित होते हैं, किंतु जब मनुष्य की प्रकृति और भ्रष्टता की बात आती है, तो ये ऐसे लक्षण हैं जिनमें पृथ्वी के परमेश्वर का एक अंश है। स्वर्ग का परमेश्वर हमेशा उत्कृष्ट है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर हमेशा ही नगण्य, कमज़ोर और अक्षम है। स्वर्ग के परमेश्वर में भावना नहीं, केवल धार्मिकता है, जबकि धरती के परमेश्वर के केवल स्वार्थपूर्ण उद्देश्य हैं और वह निष्पक्षता और विवेक से रहित है। स्वर्ग के परमेश्वर में थोड़ी-सी भी कुटिलता नहीं है और वह हमेशा विश्वसनीय है, जबकि पृथ्वी के परमेश्वर में हमेशा बेईमानी का एक पक्ष होता है। स्वर्ग का परमेश्वर मनुष्यों से बहुत प्रेम करता है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर मनुष्य की पर्याप्त परवाह नहीं करता, यहाँ तक कि उसकी पूरी तरह से उपेक्षा करता है। यह त्रुटिपूर्ण ज्ञान तुम लोगों के हृदय में काफी समय से रखा गया है और भविष्य में भी बनाए रखा जा सकता है। तुम लोग मसीह के सभी कर्मों पर अधार्मिकता के दृष्टिकोण से विचार करते हो और उसके सभी कार्यों और साथ ही उसकी पहचान और सार का मूल्यांकन दुष्ट के परिप्रेक्ष्य से करते हो। तुम लोगों ने बहुत गंभीर गलती की है और ऐसा काम किया है, जो तुमसे पहले के लोगों ने कभी नहीं किया। अर्थात्, तुम लोग केवल अपने सिर पर मुकुट धारण करने वाले स्वर्ग के उत्कृष्ट परमेश्वर की सेवा करते हो और उस परमेश्वर की सेवा कभी नहीं करते, जिसे तुम इतना महत्वहीन समझते हो, मानो वह तुम लोगों को दिखाई तक न देता हो। क्या यह तुम लोगों का पाप नहीं है? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध तुम लोगों के अपराध का विशिष्ट उदाहरण नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

जब तुम्हें परमेश्वर के बारे में गलतफहमियाँ होती हैं, तो तुम्हारे भीतर सख्त, पूर्वाग्रही तत्त्व होते हैं जो तुम्हें सत्य की तलाश करने से रोकते हैं। यदि तुम्हारी गलतफहमियाँ दूर कर दी जाएँ, तो तुम सत्य की तलाश करने में समर्थ हो जाओगे; नहीं तो तुम्हारे हृदय में एक अलगाव की भावना होगी, और तुम बेमन से प्रार्थना करोगे; यह परमेश्वर को धोखा देना है, और वह तुम्हारी प्रार्थना नहीं सुनेगा। जैसे ही तुम्हें परमेश्वर के प्रति गलतफहमी होती है, और जैसे ही दूरी और अलगाव की भावनाएँ पैदा होती हैं, तुम्हारे हृदय के कपाट परमेश्वर के लिए बंद हो जाते हैं, और तुम उसके वचनों को सुनना नहीं चाहते और न ही सत्य की तलाश करना चाहते हो। तुम कोई भी काम बस अनमने ढंग से करते हो, स्वांग रचते हुए, धोखा देते हुए। जब परमेश्वर के प्रति व्यक्ति की गलतफहमियाँ दूर हो जाती हैं और वह इस अवरोध को पार कर लेता है, तो वह परमेश्वर के हर वचन और उसकी हर अपेक्षा पर ईमानदारी के साथ ध्यान देगा और उसके सामने सच्चे हृदय के साथ प्रस्तुत होगा। यदि मनुष्य और परमेश्वर के बीच अंतर्विरोध, दूरी और गलतफहमी है, तो व्यक्ति शैतान की भूमिका निभा रहा है और परमेश्वर के विरोध में है। विरोध के क्या परिणाम होते हैं? क्या ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के प्रति समर्पित हो सकता है? क्या वह सत्य को स्वीकार कर सकता है? वह दोनों ही काम नहीं कर सकता, और उसके स्वभाव के बदलाव रुक जाते हैं। इसलिए, जब कोई अपनी विभिन्न अवस्थाओं की जाँच करता है, तो एक ओर यह स्वयं को जानने के लिए किया जाता है, और दूसरी ओर, यह व्यक्ति को परमेश्वर के प्रति अपनी गलतफहमियों की जांच पर ध्यान केंद्रित करने को बाध्य करता है। इन गलतफहमियों में क्या-क्या शामिल होता है? धारणाएँ, कल्पनाएँ, परिसीमन, शंकाएँ, जांच-पड़ताल, और अटकलें। जब तुम इन स्थितियों की गिरफ्त में होते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध में एक समस्या उत्पन्न हो जाती है। इसे हल करने के लिए तुम्हें अविलंब सत्य की खोज करनी चाहिए—और तुम्हें इसे हल अवश्य करना चाहिए। कुछ लोग सोचते हैं कि यदि उन्हें परमेश्वर के प्रति गलतफहमी है, तो जब तक वे उसे सुलझा नहीं लेते, तब तक वे अपने कर्त्तव्य का निर्वहन नहीं कर सकते। क्या यह स्वीकार्य है? (नहीं।) अपने कर्त्तव्य-पालन को स्थगित मत करो, बल्कि अपना कर्त्तव्य-पालन और समस्या का समाधान साथ-साथ करो। कर्त्तव्य-पालन करते हुए परमेश्वर के प्रति तुम्हारी गलतफहमी तुम्हारे जाने बिना ही दूर होनी शुरू हो जाएगी, और तुम्हें पता चलेगा कि समस्या की शुरुआत कहाँ से हुई थी और वह कितनी गंभीर है। किसी दिन तुम लोग यह महसूस करने में समर्थ हो सकते हो, "व्यक्ति एक सृजित प्राणी है, और सृष्टिकर्त्ता सदैव मेरा प्रभु है; यह सार बदलता नहीं, न ही व्यक्ति की हैसियत बदलती है और न ही परमेश्वर की हैसियत। परमेश्वर चाहे जो भी करे, और भले ही पूरी मानवजाति उसके कार्य को गलत माने, मैं उसके किए हुए को नकार नहीं सकता, न ही मैं इस बात से इनकार कर सकता हूँ कि वह सत्य है। परमेश्वर सर्वोच्च सत्य है, शाश्वत रूप से दोष-रहित। मनुष्य को अपनी स्थिति पर अडिग रहना चाहिए; उसे परमेश्वर की पड़ताल नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसके आयोजनों और उसके सारे वचनों को स्वीकार करना चाहिए। परमेश्वर जो भी कहता और करता है, वह सही होता है। मनुष्य को परमेश्वर से विभिन्न माँगें नहीं करनी चाहिए—सृजित प्राणी ऐसा करने के अयोग्य हैं। भले ही परमेश्वर मुझे एक खिलौना समझे, तो भी मुझे समर्पण करना चाहिए, और अगर मैं ऐसा नहीं करता, तो यह मेरी समस्या है, परमेश्वर की नहीं।" जब तुम्हें सत्य के इस पहलू का अनुभव और ज्ञान होगा, तो तुम सच में परमेश्वर के प्रति समर्पण में प्रवेश करोगे, और तुम्हें अब कोई बड़ी कठिनाइयाँ नहीं होंगी, और चाहे तुम अपना कर्त्तव्य-पालन कर रहे हो या सत्य के विभिन्न पहलुओं का अभ्यास, बहुत सारी कठिनाइयों का समाधान हो चुका होगा। यह सबसे बड़ा और सबसे गहरा सत्य है। कई बार, जब लोगों के सामने विभिन्न समस्याएँ आती हैं, जब उनके सामने विभिन्न अड़चनें होती हैं, या जब वे ऐसी किसी चीज का सामना करते हैं जिसे वे स्वीकार नहीं कर सकते, तो ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे गलत स्थिति में खड़े होते हैं : उन्हें परमेश्वर के बारे में गलतफहमी होती है; वे परमेश्वर की पड़ताल करना चाहते हैं और उसे परमेश्वर नहीं मानना चाहते; वे परमेश्वर जो भी कहता और करता है, उसके सही होने को नकारना चाहते हैं; और वे यह नकारना चाहते हैं कि परमेश्वर सत्य है। इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति एक सृजित प्राणी नहीं होना चाहता, बल्कि वह परमेश्वर की बराबरी करना चाहता है, उसमें त्रुटियाँ ढूँढ़ना चाहता है। इससे समस्या पैदा होगी। अगर तुम अपना कर्त्तव्य सही तरह से पूरा कर सकते हो और एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी जगह पर अडिग रह सकते हो, तो परमेश्वर जो करता है, उसके प्रति अनिवार्य रूप से तुम्हारे भीतर प्रतिरोध पैदा नहीं होगा। तुम्हें कुछ गलतफहमियाँ हो सकती हैं, और तुम्हारी कुछ धारणाएँ हो सकती हैं, लेकिन कम-से-कम तुम्हारा रवैया परमेश्वर के आयोजनों को स्वीकारने के लिए इच्छुक होने वाला होगा, और तुम इच्छुक होने के स्थान से परमेश्वर के प्रति समर्पण करने के लिए आओगे, इसलिए तुम्हारे भीतर परमेश्वर के प्रति कोई प्रतिरोध पैदा नहीं होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के प्रति जो प्रवृत्ति होनी चाहिए मनुष्य की' से उद्धृत

लोग परमेश्वर के परीक्षणों को लेकर प्रायः चिंतित और भयभीत रहते हैं, तो भी वे हर समय शैतान के फंदे में रह रहे होते हैं, और ख़तरों से भरे क्षेत्र में रह रहे होते हैं जिसमें उन पर शैतान द्वारा आक्रमण और दुर्व्यवहार किया जाता है—मगर वे नहीं जानते भय क्या है, और अविचलित रहते हैं। चल क्या रहा है? परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास केवल उन चीज़ों तक ही सीमित है जिन्हें वह देख सकता है। उसमें मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेम और सरोकार की, या मनुष्य के प्रति उसकी सहृदयता और सोच-विचार की रत्ती भर भी सराहना नहीं है। यदि परमेश्वर की परीक्षाओं, न्याय और ताड़ना, तथा प्रताप और कोप के प्रति थोड़ी-सी घबराहट और डर को छोड़ दें, तो मनुष्य को परमेश्वर के अच्छे अभिप्रायों की रत्ती भर भी समझ नहीं है। परीक्षाओं का उल्लेख होने पर, लोगों को लगता है मानो परमेश्वर के छिपे हुए इरादे हैं, और कुछ तो यह तक मानते हैं कि परमेश्वर बुरे षडयंत्रों को प्रश्रय देता है, इस बात से अनभिज्ञ कि परमेश्वर वास्तव में उनके साथ क्या करेगा; इस प्रकार, परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारिता के बारे में चीखने-चिल्लाने के साथ-साथ, वे मनुष्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता और मनुष्य के लिए उसकी व्यवस्थाओं को रोकने और उनका विरोध करने के लिए जो कुछ कर सकते हैं सब करते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि यदि वे सावधान नहीं रहे तो उन्हें परमेश्वर द्वारा गुमराह कर दिया जाएगा, कि यदि वे अपने भाग्य पर पकड़ नहीं बनाए रखते हैं तो जो कुछ उनके पास है वह सब परमेश्वर द्वारा ले लिया जा सकता है, और यहाँ तक कि उनका जीवन भी समाप्त किया जा सकता है। मनुष्य शैतान के खेमे में है, परंतु वह शैतान द्वारा दुर्व्यवहार किए जाने की कभी चिंता नहीं करता है, और उसके साथ शैतान द्वारा दुर्व्यवहार किया जाता है परंतु वह शैतान द्वारा बंधक बनाए जाने से भी कभी नहीं डरता है। वह कहता रहता है कि वह परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करता है, मगर उसने परमेश्वर में कभी भरोसा नहीं किया है या विश्वास नहीं किया है कि परमेश्वर सचमुच मनुष्य को शैतान के पंजों से बचाएगा। यदि, अय्यूब के समान, मनुष्य परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर पाता है, और अपना संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर के हाथों में सौंप सकता है, तो क्या मनुष्य का अंत अय्यूब के समान ही नहीं होगा—परमेश्वर के आशीषों की प्राप्ति? यदि मनुष्य परमेश्वर का शासन स्वीकार और उसके प्रति समर्पण कर पाता है, तो इसमें खोने के लिए क्या है? इस प्रकार, मैं सुझाव देता हूँ कि तुम लोग अपने कार्यकलापों में सावधान रहो, और उस सब के प्रति चौकन्ने रहो जो तुम लोगों पर आने ही वाला है। तुम लोग उतावले या आवेगी न बनो, और परमेश्वर तथा लोगों, विषयों, और वस्तुओं के साथ, जिनकी उसने तुम लोगों के लिए व्यवस्था की है, अपने गर्म खून या अपनी स्वाभाविकता पर निर्भर करते हुए, या अपनी कल्पनाओं और अवधारणाओं के अनुसार व्यवहार मत करो; परमेश्वर के कोप को भड़काने से बचने के लिए, तुम लोगों को अपने कार्यकलापों में सचेत होना ही चाहिए, और अधिक प्रार्थना तथा खोज करनी चाहिए। यह याद रखो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

परमेश्वर जिन लोगों को बचाता है वे वही लोग हैं जिनके स्वभाव शैतान की भ्रष्टता के कारण भ्रष्ट हो गये हैं; वे निष्कलंक, पूर्ण लोग नहीं हैं, वे ऐसे लोग भी नहीं हैं जो रिक्तता में जीवन जीते हैं। कुछ लोग, अपनी भ्रष्टता के प्रकट होते ही सोचते हैं, "एक बार फिर, मैंने परमेश्वर का विरोध किया है; मैंने कई सालों से उस पर विश्वास किया है, लेकिन मैं अब भी नहीं बदला हूँ। परमेश्वर निश्चित रूप से अब मुझे पसंद नहीं करता है!" यह किस तरह का रवैया है? उन लोगों ने खुद से उम्मीद छोड़ दी है, और वे सोचते हैं कि अब परमेश्वर उन्हें नहीं चाहता है। क्या यह परमेश्वर को गलत समझने वाली बात नहीं है? जब तुम इतना नकारात्मक होते हो तो, शैतान के लिये तुम्हें नुकसान पहुंचाना सबसे आसान होता है, और एक बार वह कामयाब हो गया, तो परिणामों की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए, चाहे तुम कितनी ही बड़ी मुश्किल में क्यों न हो या चाहे तुम कितना भी निराश क्यों न महसूस करते हो, तुम्हें कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिये! जीवन में प्रगति की प्रक्रिया में और बचाये जाते समय, लोग कभी-कभी गलत मार्ग चुन लेते हैं या पथभ्रष्ट हो जाते हैं। वे कुछ समय के लिए अपने जीवन में कुछ अपरिपक्वता दिखाते हैं, या कभी-कभी कमज़ोर या नकारात्मक हो जाते हैं, गलत बातें कहते हैं, फिसल जाते हैं और गिरते हैं, या असफलता का सामना करते हैं। परमेश्वर के दृष्टिकोण से, ऐसी बातें सामान्य हैं, और वह इन बातों का बतंगड़ नहीं बनाएगा। यह देखकर कि वे कितने गंभीर रूप से भ्रष्ट हैं, कि वे परमेश्वर को कभी भी संतुष्ट नहीं कर पाएंगे, कुछ लोगों के हृदय में पीड़ा होती है और जिन लोगों को ऐसा पश्चाताप होता है, वे अक्सर परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य होते हैं। जिन लोगों को उद्धार की आवश्यकता महसूस नहीं होती, जिन्हें लगता है कि वे पहले से ही पूर्ण हैं, उन्हें परमेश्वर द्वारा बचाया नहीं जाएगा। मैं तुम्हें यह क्यों बता रहा हूँ? मेरे कहने का मतलब यह है कि तुम्हारे अंदर आस्था होनी चाहिएः "इस तथ्य के बावजूद कि मैं अब कमज़ोर हो गया हूँ, पतित हो गया हूँ और असफल हो चुका हूँ, एक न एक दिन मैं उठूँगा और परमेश्वर को संतुष्ट कर पाऊँगा, सत्य को समझूँगा और बचा लिया जाऊँगा।" तुम्हारे अंदर यह आस्था होनी चाहिए। चाहे जो भी बाधाएं, परेशानियाँ आएं या असफलताएं और पराजय हाथ लगे, तुम्हें निराश नहीं होना चाहिए; तुम्हें यह जानना चाहिए कि किस प्रकार के लोग परमेश्वर द्वारा बचाए जाते हैं। इसके अलावा, यदि तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर के उद्धार के अयोग्य हो, यदि तुम्हें कभी-कभार ऐसा महसूस होने लगे कि परमेश्वर तुमसे घृणा करता है या तुमसे नाराज़ है या अतीत में कभी ऐसा हो चुका है कि तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण रूप से अस्वीकार या खारिज कर दिया गया है, तो चिंता न करो। तुम यह बात तुम्हें पता है, इसलिए बहुत देर नहीं हुई है; यदि तुम पश्चाताप करोगे, तो परमेश्वर तुम्हें उद्धार का अवसर प्रदान करेगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर में आस्था के लिए सर्वाधिक आवश्यक है जीवन में प्रवेश' से उद्धृत

परमेश्वर के एक वचन के कारण, लोग अक्सर सोच लेते हैं कि परमेश्वर उनके बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुंच गया है और उसने उन्हें त्याग दिया है—और इसके परिणामस्वरूप, वे परमेश्वर का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ने को तैयार नहीं होते। वास्तव में, तुम्हें समझ ही नहीं है कि त्यागना क्या होता है; तुम्हारा अपने देह-सुखों का त्याग करना ही असली त्याग है। कभी-कभी परमेश्वर तुम्हें जिन वचनों से परिभाषित करता है, वे मात्र गुस्से में बोले गए होते हैं; वह न तो तुम्हारे बारे में कोई निष्कर्ष निकाल रहा होता है और न ही तुम्हारी निंदा कर रहा होता है, यह उसकी अंतिम सजा तो बिल्कुल नहीं होती। वह तुम्हारा अंतिम गंतव्य निर्धारित नहीं कर रहा है। ये मात्र ऐसे वचन होते हैं जो तुम्हारा न्याय करते हैं और तुमसे निपटते हैं। ये तुम्हारे लिए परमेश्वर की उत्कट आशाओं की बात करते हैं, ये तुम्हें याद दिलाने और चेतावनी देने वाले वचन होते हैं और ये परमेश्वर के हृदय से निकले वचन होते हैं। फिर भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जो न्याय के इन वचनों के कारण पतित होकर परमेश्वर को त्याग देते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो थोड़े समय के लिए कमजोर पड़ जाते हैं और परमेश्वर के सामने आ कर कहते हैं, "ऐसा नहीं चलेगा। मुझे आगे बढ़ते रहना चाहिए और जैसा परमेश्वर कहे वैसा करना चाहिए। यदि लोग सृष्टिकर्ता को छोड़ देते हैं, तो उनका जीवन जीने लायक नहीं रह जाता है। एक सृजित प्राणी की सार्थकता को जीने के लिए, मुझे परमेश्वर का अनुसरण करते रहना चाहिए।" तो वे परमेश्वर का अनुसरण कैसे कर सकते हैं? उनका अनुसरण वैसा नहीं होना चाहिए, जैसा पहले था। पहले वे अपने कर्तव्य में निष्ठावान नहीं थे। वे काट-छाँट और निपटे जाने को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे, थोड़ा कष्ट सहते ही शिकायत करने लगते थे। तुम्हें अब उस मार्ग पर नहीं चलना चाहिए, तुम्हें दूसरे साधनों से अनुसरण करना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के कहे अनुसार चलना चाहिए। अगर परमेश्वर कहता है कि तुम गलत हो, तो तुम्हें अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग करके किसी निष्कर्ष पर पहुँचकर, परमेश्वर के खिलाफ खड़े नहीं हो जाना चाहिए; तुम्हें समर्पित होकर स्वीकार कर लेना चाहिए कि तुम गलत हो। क्या यह अभ्यास का मार्ग नहीं है? जब लोगों के पास अभ्यास का मार्ग होता है, तो क्या वे भटककर परमेश्वर से दूर चले जाते हैं? कभी-कभी ऐसा भी होता है जब लोग मानते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें छोड़ दिया है—लेकिन वास्तव में, परमेश्वर ने तुम्हें छोड़ा नहीं है, वह सिर्फ तुमसे घृणा करता है और तुम पर ध्यान नहीं देना चाहता। लेकिन उसने सच में तुम्हें छोड़ा नहीं है। ऐसे लोग भी होते हैं जो परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य का निर्वहन करने का प्रयास करते हैं, लेकिन उनके सार और उनमें प्रकट होने वाली विभिन्न चीजों के कारण, परमेश्वर वास्तव में उनका त्याग कर देता है; वे वास्तव में चुने नहीं गए थे, बल्कि उन्होंने कुछ समय के लिए सेवा प्रदान की थी। जबकि कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें परमेश्वर अनुशासित करने, ताड़ना देने और उनका न्याय करने की पूरी कोशिश करता है; वह उन लोगों से पेश आने के ऐसे विभिन्न तरीके आजमाता है जो मनुष्य की अवधारणाओं से मेल नहीं खाते। कुछ लोग समझ नहीं पाते और सोचते हैं कि परमेश्वर उन्हें निशाना बनाकर आहत कर रहा है। वे सोचते हैं कि परमेश्वर के सामने जीने की कोई गरिमा नहीं है, वे परमेश्वर को किसी भी तरह से और दुखी नहीं करना चाहते और परमेश्वर को छोड़ने का दायित्व खुद पर ले लेते हैं। उन्हें लगता है कि उनके जीने का तरीका समझदारी भरा है, इसलिए वे परमेश्वर को छोड़ने का दायित्व अपने ऊपर ले लेते हैं—लेकिन वास्तव में, परमेश्वर ने उन्हें छोड़ा नहीं था। ऐसे लोगों में परमेश्वर की इच्छा के प्रति कोई भाव नहीं होता। वे लोग कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील होते हैं, परमेश्वर का उद्धार छोड़ने के लिए इस हद तक चले जाते हैं। क्या उनके अंदर वास्तव में विवेक होता है? कभी-कभी परमेश्वर लोगों को छोड़ देता है, उन्हें दर-किनार कर देता है ताकि वे आत्म-चिंतन कर सकें, लेकिन परमेश्वर ने उन्हें वास्तव में नहीं छोड़ा नहीं होता है; वह उन्हें केवल पश्चाताप करने का अवसर दे रहा है, उनका सचमुच त्याग नहीं कर रहा है। परमेश्वर सही मायने में केवल मसीह-विरोधियों और दुष्टों का ही त्याग करता है जो अनेक बुरे कामों में लिप्त रहते हैं। कुछ लोग कहते हैं, "मैं पवित्र आत्मा के कार्य से वंचित महसूस करता हूँ और मैं लंबे समय से पवित्र आत्मा के प्रबोधन से भी वंचित हूँ। क्या परमेश्वर ने मुझे छोड़ दिया है?" यह एक गलत धारणा है। तुम कहते हो कि परमेश्वर ने तुम्हें छोड़ दिया है, वह तुम्हें नहीं बचाएगा, तो क्या उसने तुम्हारा अंत तय कर दिया है? कई बार ऐसा होता जब तुम पवित्र आत्मा के कार्य को महसूस नहीं कर पाते, लेकिन क्या परमेश्वर ने तुम्हें अपने वचन पढ़ने के अधिकार से वंचित कर दिया है? तुम्हारे अंदर सामान्य मानवीय विचार हैं और तुम्हारे लिए उद्धार का मार्ग बंद नहीं किया गया है, इसलिए तुम दुःखी क्यों होते हो? लोग अच्छी अवस्था में नहीं हैं, और वे इसे सुधारने के लिए सत्य की खोज भी नहीं करते, बल्कि हर समय परमेश्वर को ही दोष देते रहते हैं, वे कहते, "परमेश्वर, तुझे मेरी आवश्यकता नहीं है, इसलिए मुझे भी तेरी आवश्यकता नहीं है।" यह अनुचित है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

कभी-कभी, परमेश्वर तुम्हें उजागर करने या तुम्हें अनुशासित करने के लिए किसी निश्चित मामले का उपयोग करता है। क्या इसका मतलब यह है कि तुम्हें हटा दिया गया है? क्या इसका मतलब यह है कि तुम्हारा अंत आ गया है? नहीं। इसका मतलब यह है कि जैसे किसी बच्चे ने अवज्ञा की है और उसने गलती की है; उसके माता-पिता उसे डाँटते है और उसे दंडित करते हैं, लेकिन अगर बच्चा अपने माता-पिता के इरादे को समझ नहीं पाए या वो यह न समझ पाए कि वे उसके साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं, तो वह हैरान होगा कि क्या वह वास्तव में उनकी असली संतान है भी या नहीं। माता-पिता के द्वारा ये काम करने के पीछे वास्तविक कारण क्या था? ऐसा तुम्हें सबक सिखाने के लिए किया गया था ताकि भविष्य में तुम उनकी बातों को गंभीरता से लो, जो तुम्हें बताया जाए वो तुम करो, उनकी सलाह के अनुसार आचरण करो और ऐसा कुछ भी न करो जो उनकी अवज्ञा करता हो या उनकी चिंता का कारण बनता हो, और तब तुम वैसे बन जाते हो जैसा वे चाहते हैं। यदि तुमने अपने माता-पिता की बात मानी है, तो क्या तुम प्रगति नहीं करोगे? और क्या वे निश्चिंत नहीं हो जाएँगे? क्या तब वे तुमसे संतुष्ट नहीं होंगे? क्या उन्हें अब भी तुम्हें इस तरह से दंडित करने की आवश्यकता होगी? इस प्रकार, कई मामलों में लोगों की चिंता अपने हितों से ही उपजती है। आम तौर पर, यह भय होता है कि उनका कोई परिणाम नहीं होगा : "यदि संयोग से, परमेश्वर मुझे उजागर करता है, मुझे हटा देता है और मुझे अस्वीकार करता है, तो मैं कुछ नहीं कर सकता; अगर वह कहता है कि वह मुझे नहीं चाहता, तो बस वह मुझे नहीं चाहता है।" यह तुम्हारे द्वारा परमात्मा को गलत समझना है; ये केवल तुम्हारे अपने विचार हैं। तुम्हें पता लगाना होगा कि परमेश्वर का इरादा क्या है। उसका लोगों को उजागर करना उन्हें हटाना नहीं है, बल्कि उन्हें उन्नत बनाना है। इसके अलावा, कभी-कभी तुम सोच सकते हो कि तुम्हें उजागर किया जा रहा है, जबकि ऐसा नहीं होता। अक्सर, क्योंकि लोगों की क्षमता कम होती है और वे सत्य को नहीं समझते हैं, साथ ही, उनका स्वभाव अभिमानी होता है, वे दिखावा करना पसंद करते हैं, उनका स्वभाव विद्रोही होता है, वे बेईमान, लापरवाह और अपने कर्तव्य-निर्वहन को हल्के में लेते हैं, उसे ठीक से नहीं निभाते। दूसरी ओर, कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि तुम उन सिद्धांतों का पालन न कर पाओ जो तुम्हें सिखाये गये हैं, तुम उन्हें एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हो। तुम वही काम करते हो जिससे तुम्हें खुशी मिलती है, दूसरों के साथ संगति करने से पहले ही काम को जल्दबाजी में कर देते हो और खुद ही कानून बन जाते हो। तुम्हारे काम उल्लेखनीय नहीं होते, और सिद्धांत के विपरीत होते हैं। इस मामले में, तुम्हें अनुशासित होना चाहिये—तो यह कैसे कहा जा सकता है कि तुम्हें हटा दिया गया है? तुम्हें इसे सही तरीके से देखना चाहिए। इसे देखने का सही तरीका क्या है? उन मामलों में, जहां तुम सत्य नहीं समझते, तुम्हें उसकी खोज करनी चाहिये। खोज में क्या शामिल है? यह मात्र किसी अभिमत की समझ की खोज करने का मामला नहीं है। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिये, और साथ ही परमेश्वर के घर के द्वारा किए जाने वाले इस काम के सिद्धांत को समझना चाहिए। सिद्धांत क्या है? सिद्धांत कोई अभिमत नहीं है। इसके कई मानदंड हैं : ऐसे मामलों के लिए कार्य की व्यवस्थाएँ क्या तय करती हैं, ऐसे काम को करने के संबंध में ऊपर से क्या आदेश दिया गया है, इस तरह के कर्तव्य को पूरा करने के बारे में परमेश्वर के वचन क्या कहते हैं और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने की क्या अनिवार्यता है। परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के क्या मानदंड हैं? उनमें सत्य-सिद्धांत के अनुसार कार्य करना शामिल होता है। मोटे तौर पर, वे परमेश्वर के घर के हितों को और उसके कार्य को सबसे पहले रखते हैं। इससे भी स्पष्ट बात यह है कि हर तरह से, कोई बड़ी समस्या खड़ी नहीं होनी चाहिये, और परमेश्वर पर कोई शर्मिंदगी की बात नहीं पड़ने देनी चाहिये। अगर लोग इन सिद्धांतों में महारत हासिल कर लेते हैं, तो क्या उनकी चिंताएं धीरे-धीरे कम नहीं हो जाएंगी? और क्या उनकी गलत धारणाएँ भी दूर नहीं हो जाएंगी? एक बार जब तुम अपनी गलत धारणाओं को दूर कर लेते हो और परमेश्वर के बारे में कोई अनुचित विचार नहीं रखते हो, तो तुम्हारे अंदर नकारात्मक चीजों का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता जाएगा और तुम ऐसे मामलों को सही ढंग से देखोगे। इस प्रकार, सत्य की खोज करना और परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश करना महत्वपूर्ण है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्‍वर के वचनों पर अमल करके ही अपने स्‍वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

शुरुआत से ही, मैंने अक्सर तुम लोगों को समझाया है कि तुम में से प्रत्येक को सत्य की तलाश करनी चाहिए। जब तक ऐसा करने का मौका हो, तब तक हार मत मानो; सत्य की तलाश करना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व, जिम्मेदारी और कर्तव्य है, और यह वह मार्ग है जिस पर प्रत्येक व्यक्ति को चलना चाहिए, साथ ही साथ यह वह मार्ग है जिस पर उन सभी को जिन्हें बचाया जाएगा, चलना चाहिए। फिर भी कोई इस पर ध्यान नहीं देता है—कोई भी इसे अर्थपूर्ण मुद्दा नहीं मानता है, इसे एक कुभाषा के रूप में माना जाता है, प्रत्येक व्यक्ति अपने ही ढंग से सोचता है। यही कारण है कि शुरू से लेकर आज तक, हालाँकि कई ऐसे लोग रहे हैं जो अपने हाथों में परमेश्वर के वचनों की किताबें थामे रहते हैं और उन्हें पढ़ते हैं, जो उपदेश सुनते हैं, जिन सभी ने अपने कर्तव्यों को पूरा करने के दौरान न्याय और ताड़ना को स्वीकार किया है, और जो परमेश्वर के मार्गदर्शन को स्वीकार करते हैं, फिर भी इंसान और परमेश्वर के बीच कोई भी संबंध वास्तव में स्थापित नहीं हो पाया है, और सभी लोग अपनी ही कल्पनाओं, धारणाओं, गलतफ़हमियों और अटकलों द्वारा निर्देशित होते हैं, जिसके कारण वे प्रत्येक दिन इस संदेह और नकारात्मकता में रहते हैं कि वे परमेश्वर के वचनों और कार्य, साथ ही उसके मार्गदर्शन, के प्रति कैसा व्यवहार करें। यदि तुम ऐसी अवस्थाओं में रहते हो, तो तुम नकारात्मकता को कैसे दूर कर सकते हो? तुम विद्रोहीपन को कैसे दूर कर सकते हो? तुम छल और बुराई की मानसिकता और रवैये को, या उन अटकलों और गलतफ़हमियों को जिनके साथ तुम परमेश्वर द्वारा दिए गए आदेश और कर्तव्य के प्रति व्यवहार करते हो, कैसे दूर करोगे? निश्चित रूप से, उन्हें दूर नहीं किया जा सकता है। इसलिए, यदि तुम सत्य की तलाश और अभ्यास करने और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने के मार्ग पर चलना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के सामने तुरंत आना चाहिए, उससे प्रार्थना करनी चाहिए, और उसकी इच्छा को समझने का—और यह निर्धारित कर लेने का कि उसकी इच्छा ही सबसे ज़्यादा मायने रखती है, प्रयास करना चाहिए। तुम्हें ऐसा करना चाहिए, बजाय इसके कि तुम अपने दिनों को अपने दिमाग के विचारों और ख्यालों में ही जीने में बिता दो, लगातार यह सोचते हुए: मैं क्या सोच रहा हूँ? मैं क्या चाहता हूँ? मुझमें परमेश्वर के बारे में किस तरह की गलतफ़हमियाँ और धारणाएँ हैं? मैं किन चीजों में परमेश्वर से सवाल करता हूँ? परमेश्वर ने ऐसा क्या किया है जिसने मुझे कष्ट पहुँचाया है, या मुझे दुखी किया है, या जो मुझमें उठती अटकलों और संदेहों का कारण बना है? यदि तुम इन चीजों पर विचार करने में पूरे दिन व्यस्त रहते हो, तो क्या तुम सत्य को समझ पाओगे? जितना आगे तुम इस रास्ते पर चलोगे, परमेश्वर के बारे में तुम्हारी गलतफ़हमियाँ उतनी ही गहरी होती जाएँगी और उससे तुम्हारा रिश्ता उतना ही दूर का होता जाएगा; यह कहा जा सकता है कि तुम जितना अधिक आगे बढ़ोगे, उतने ही बुरे कर्म और अपराध तुम्हारे पास जमा होते जाएँगे। हो सकता है कि तुम अपने कर्तव्यों का पालन तो करते हो, लेकिन ऐसा करते समय, अपने कर्तव्य और ज़िम्मेदारियों के प्रति तुम्हारा रवैया लापरवाह, ढीला, प्रतिरोधी और विद्रोही होता है, या सिर्फ खानापूर्ति करने वाला और असम्मानपूर्ण भी। अंततः इसका परिणाम क्या होगा? इसका परिणाम यह होगा कि, ऐसे समय में जब तुम कष्ट उठाते हो और अपना कर्तव्य निभाते हो, तुम्हें सत्य हासिल नहीं हुआ होगा, न ही तुम इसे हासिल कर सकोगे और न ही सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर सकोगे। इस परिणाम को उत्पन्न करने वाला कारण क्या है? इसका कारण यह है कि लोगों के दिलों में परमेश्वर के बारे में धारणाएँ और गलतफहमियाँ होती हैं—इन व्यावहारिक समस्याओं का कोई समाधान नहीं किया गया है। इस प्रकार, इंसान और परमेश्वर के बीच हमेशा एक खाई बनी रहती है। इसलिए, यदि इंसान परमेश्वर के सामने आना चाहता है, तो उसे पहले उन गलतफ़हमियों को दूर करना होगा, साथ ही उन धारणाओं, सवालों, अटकलों और कल्पनाओं को भी, जो परमेश्वर के बारे में अभी भी उसमें मौजूद हैं। उसे अपने भीतर इन चीज़ों की जाँच करनी चाहिए। यदि किसी में वास्तव में परमेश्वर के बारे में धारणाएँ या गलतफ़हमियाँ हैं, तो यह एक साधारण समस्या नहीं है। यदि उस व्यक्ति ने सत्य को हासिल नहीं किया है और वह सत्य की तलाश करके अपनी धारणाओं और गलतफ़हमियों को हल नहीं करता है, तो ये चीजें स्वयं ही गायब नहीं हो जाएँगी। हो सकता है कि वे तुम्हारे कर्तव्य के पालन या सत्य के अनुसरण को प्रभावित न करें, पर जब तुम कुछ खास मामलों या विशिष्ट परिस्थितियों का सामना करते हो, तो वे पुनः प्रकट हो जाएँगी, और तब तक ऐसा करती रहेंगी जब तक कि तुम उन्हें हल नहीं कर लेते। आत्म-चिंतन में रहते हुए परमेश्वर के सामने आना मुख्यतः परमेश्वर के प्रति इंसान की गलतफ़हमियों और धारणाओं को हल करने का एक जरिया होता है, और जैसे-जैसे प्रत्येक मुद्दे को हल किया जाता है, परमेश्वर के साथ इंसान का संबंध थोड़ा अधिक सामान्य होने लगता है, और इंसान का जीवन परिपक्वता की ओर एक और कदम बढ़ाता है। एक बार जब कोई अपनी अनेक धारणाओं और गलतफ़हमियों को हल कर लेता है, तो उसके और परमेश्वर के बीच की खाई काफी छोटी हो जाती है, और परमेश्वर में उसकी आस्था बढ़ जाती है—और गहरी आस्था होने के कारण बहुत कम चीज़ें किसी के सत्य के अभ्यास में मिलावट करती हैं, और इसी तरह उसकी सत्य की तलाश में भी बहुत कम मिलावटें और अड़चनें सामने आती हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज से ही परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और गलतफ़हमियों को दूर किया जा सकता है' से उद्धृत

यदि कोई समस्या तुम पर आ पड़ती है और तुम सत्य की तलाश कर सकते हो, तो तुम सत्य के एक पहलू को समझ सकते हो और सत्य के उस पहलू को प्राप्त कर सकते हो। सत्य को समझने से क्या हासिल हो सकता है? जब तुम सत्य के एक पहलू को समझते हो, तो तुम परमेश्वर की इच्छा के एक पहलू को समझ लेते हो, और तुम यह समझ लेते हो कि परमेश्वर ने तुम्हारे पास इस चीज़ को क्यों आने दिया, क्यों वह तुमसे ऐसी माँग करेगा, क्यों वह तुम्हें इस तरह से ताड़ना देने और अनुशासित करने के लिए परिस्थितियों का आयोजन करेगा, क्यों वह तुम्हें अनुशासित करने के लिए इस मामले का उपयोग करेगा, और क्यों तुम इस मामले में गिरे, असफल हुए, और उजागर किए गए हो। यदि तुम इन चीज़ों को समझ सकते हो, तो तुम सत्य की तलाश करने में सक्षम होंगे और जीवन-प्रवेश हासिल करोगे। यदि तुम इन चीज़ों को नहीं समझ सकते और इन तथ्यों को स्वीकार नहीं करते, बल्कि विरोध और प्रतिरोध पर, खुद की गलतियों पर पर्दा डालने के लिए अपनी ही तरकीबों का उपयोग करने पर, एक झूठे चेहरे के साथ अन्य सभी का और परमेश्वर का सामना करने पर, ज़ोर देते हो, तो तुम सत्य को हासिल करने में हमेशा असमर्थ रहोगे।

यदि तुम्हारा रवैया ईमानदारी बरतने और सत्य को स्वीकार करने का है; यदि तुम इन मामलों में एक ऐसे नज़रिए के साथ व्यवहार करते हो जो सत्य के प्रति समर्पित है और उससे प्रेम करता है, चाहे वह सहन करने में कितना भी कठिन और तुम्हारी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाला ही क्यों न हो; यदि तुम इन मामलों में सत्यों की तलाश करने और उन्हें स्वीकार करने के लिए परमेश्वर के सामने आते हो, और उन्हें स्वीकार करते समय तुम निरंतर विश्लेषण करते हो और तुम जो भी करते हो और जो भी प्रकट करते हो, उस पर और अपने इरादों पर चिंतन करते हो, तो तुम प्रगति करोगे और सत्य को तुम्हारे भीतर कार्यरत किया जाएगा। और जब इन समस्याओं का समाधान हो जाता है, और किसी मुद्दे का सामना करते समय तुम्हारा रवैया, नज़रिया, और तुम्हारी स्थिति सकारात्मकता की ओर बढ़ते हैं, तो क्या तब भी तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई खाई होगी? अगर हो भी तो, वह छोटी होती जाएगी, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारे प्रश्न, साथ ही साथ तुम्हारी अटकलें, गलतफ़हमियाँ, शिकायतें, विद्रोह, और प्रतिरोध, कम होने लगेंगे। जब ये चीजें कम होने लगती हैं, तब यदि तुम पर कोई विपत्ति आती है तो तुम अधिक शांत रहोगे; तुम स्थिरचित्त होने लगोगे और अभ्यास के सही मार्ग की तलाश करोगे। यदि, जब भी कोई घटना तुम्हारे साथ होती है, तुम चिंतित हो जाते हो, और तुम सत्य की ज़रा भी तलाश किए बिना, हमेशा इंसान के तरीकों का उपयोग करना चाहते हो, तो यह परेशानी वाली बात होगी। तुम अवश्य ही इसे हल करने के लिए इंसान के तरीकों पर भरोसा करोगे—यह पहली प्रतिक्रिया है जो किसी व्यक्ति के दिमाग में आती है, और इसके साथ ही ढीले-ढाले तरीके, "होशियारी भरी" तकनीकें और जीने के दर्शन भी आने लगते हैं। कई ऐसे लोग हैं जो इन चीज़ों से लंबे समय से त्रस्त हैं, जो खुद को सत्य की ओर कभी नहीं ले जाते, बजाय इसके वे लगातार यह सोचते रहते हैं कि इंसान की तकनीकों को कैसे लागू किया जाए; वे इतने लंबे समय तक संघर्ष करते हैं कि वे थकान से पस्त हो जाते हैं। इंसान जब सत्य का अभ्यास या उसकी तलाश नहीं करता तो वह इतना ही दयनीय हो जाता है। हो सकता है कि अब तुम अपना कर्तव्य स्वेच्छा से निभा रहे हो, और तुम स्वेच्छा से त्याग कर रहे हो और खुद को स्वेच्छा से खपा रहे हो, फिर भी यदि तुम्हारी गलतफ़हमियाँ, अटकलें, संदेह, या परमेश्वर के प्रति शिकायतें, या उसके खिलाफ तुम्हारा विद्रोह और प्रतिरोध, अभी हल नहीं हुए हैं, या यदि परमेश्वर का विरोध करने और तुम पर उसकी संप्रभुता को अस्वीकार करने के लिए तुम्हारे द्वारा उपयोग में लाए गए विभिन्न तरीकों और तकनीकों का समाधान भी नहीं हुआ है, तो तुम में सत्य का शासन होना लगभग असंभव होगा, और तुम्हारा जीवन पस्त करने वाला बन जाएगा। लोग अक्सर इन नकारात्मक अवस्थाओं में संघर्ष करते रहते हैं और त्रस्त होते रहते हैं, इस तरह छटपटाते रहते हैं मानो वे किसी दलदल में फंस गए हों, हमेशा सच और झूठ, सही और गलत के बीच जीते हुए। वे सत्य को कैसे पा सकते हैं? सत्य की तलाश करने के लिए, सबसे पहले व्यक्ति को समर्पण करना पड़ता है। अनुभव की एक अवधि के बाद, वे कुछ परिणाम देख सकेंगे, जिस बिंदु पर सत्य को समझना आसान होता है। अगर कोई हमेशा सही और गलत का निर्णय करने की कोशिश करता रहता है और सच और झूठ का भेद करने में उलझा रहता है, तो उसके पास सत्य की तलाश करने या उसे समझने का कोई तरीका नहीं होता है। और अगर कोई सत्य को कभी नहीं समझ सकता है, तो इसका क्या परिणाम होगा? सत्य को न समझना गलतफ़हमियों को जन्म देता है; गलतफ़हमियों के साथ, व्यथित महसूस करना और आसान हो जाता है; जब शिकायतें फूटकर सामने आती हैं, तो वे प्रतिरोध बन जाती हैं; प्रतिरोध तुरंत ही अपराध में बदल जाता है; और कई अपराध शीघ्र ही विविध बुराइयों में बदल जाते हैं, और तब उस व्यक्ति को दंड भोगना पड़ता है। इस अवस्था का इसी तरह का परिणाम निकल सकता है। तो, सत्य की तलाश का अर्थ केवल यह नहीं है कि तुम अपने कर्तव्यों का अच्छी तरह से पालन करो, आज्ञाकारी बनो, नियमानुसार व्यवहार करो, भक्तिपूर्ण दिखो, या संत की तरह सुशोभित रहो। यह केवल ऐसे मुद्दों को हल करने के लिए नहीं, बल्कि सभी तरह के उन गलत विचारों को हल करने के लिए होता है जिनके अनुसार तुम परमेश्वर के साथ व्यवहार करते हो। सत्य को समझने का उद्देश्य इंसान के भ्रष्ट स्वभावों को हल करना होता है; जब उन भ्रष्ट स्वभावों को सुलझा लिया जाता है, तो इंसान में परमेश्वर के बारे में गलतफ़हमियाँ नहीं रहेंगी, और इंसान और परमेश्वर के बीच का संबंध धीरे-धीरे सुधरेगा और सामान्य होता जाएगा। इसलिए, जब एक बार किसी भ्रष्ट स्वभाव का समाधान हो जाता है, तो परमेश्वर के बारे में इंसान की आशंकाएँ, संदेह, गलतफ़हमियाँ, प्रश्न, और शिकायतें, साथ ही साथ उसका प्रतिरोध और उसके द्वारा परमेश्वर की परीक्षा भी धीरे-धीरे हल हो जाएंगे। जब किसी भ्रष्ट स्वभाव का समाधान होता है तो इसकी त्वरित अभिव्यक्ति क्या होती है? (परमेश्वर के प्रति इंसान का दृष्टिकोण बदल जाता है।) परमेश्वर के बारे में इंसान का प्रत्येक नज़रिया किन तरीकों से प्रकट होता है? ये नज़रिए तुम्हारे साथ घटती हर घटना में, उस घटना के प्रति तुम्हारे व्यवहार में, उसके प्रति तुम्हारे रवैये में, तुम्हारी पहली प्रतिक्रिया में, और तुम्हारी अवस्था में, प्रकट होते हैं। तुम्हारे रवैये को क्या निर्धारित करता है? यह इस बात से तय होता है कि क्या इस मामले में तुम्हारे पास सत्य है, क्या तुमने सत्य की तलाश की है, क्या तुम सत्य को हासिल करना चाहते हो, और क्या तुम सत्य को समझते हो। इंसान और परमेश्वर के बीच एक सुधरा हुआ संबंध किस तरह से प्रकट होता है? यह इस बात से प्रकट होता है कि तुम दैनिक जीवन में लोगों, घटनाओं, और तुम्हारे सामने आने वाली चीज़ों के साथ कैसा व्यवहार करते हो। क्या इसमें कर्तव्य का पालन शामिल है? (यह शामिल है।) यही वह रिश्ता होता है। यही कारण है कि सत्य का अभ्यास और अनुसरण परम महत्व रखता है! यदि तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते हो, फिर भी तुम परमेश्वर के संबंध में अपनी धारणाओं, शिकायतों और गलतफ़हमियों की समस्या को हल करना चाहते हो, तो क्या तुम कर पाओगे? कुछ ऐसे लोग होते हैं जो कहते हैं कि वे सरल विचारों के हैं और इसलिए उनमें ये विचार उत्पन्न नहीं होते हैं। क्या वे इसे हासिल करने में सक्षम हैं? क्या एक भ्रष्ट स्वभाव सोचने से आता है? यह सोचने से नहीं आता है—यह इंसान का जीवन होता है, और इंसान जीने के लिए इस पर निर्भर करता है। इसकी जड़ें इंसान के भीतर होती हैं और यह इंसान का सार होता है। इंसान के पास इसे मिटाने या हटाने के लिए कोई साधन नहीं होता है। केवल सत्य का उपयोग करके ही इन चीज़ों को हल किया जा सकता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज से ही परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और गलतफ़हमियों को दूर किया जा सकता है' से उद्धृत

जब लोग परमेश्वर को नहीं समझते और उसके स्वभाव को नहीं जानते, तो उनका हृदय परमेश्वर के लिए वास्तव में कभी नहीं खुल सकता। जब वे परमेश्वर को समझ जाते हैं, तो वे रुचि और विश्वास के साथ जो कुछ परमेश्वर के हृदय में है, उसकी सराहना करना और उसका स्वाद लेना आरंभ कर देते हैं। जब तुम जो परमेश्वर के हृदय में है, उसकी सराहना करने और उसका स्वाद लेने लगोगे, तो तुम्हारा हृदय धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा करके, उसके लिए खुलता जाएगा। जब तुम्हारा हृदय उसके लिए खुल जाएगा, तो तुम्हें महसूस होगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारे लेन-देन, परमेश्वर से तुम्हारी माँगें और तुम्हारी अपनी अनावश्यक अभिलाषाएँ कितनी शर्मनाक और घृणित थीं। जब तुम्हारा हृदय वास्तव में परमेश्वर के लिए खुल जाएगा, तो तुम देखोगे कि उसका हृदय एक असीमित संसार है, और तुम एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करोगे, जिसे तुमने पहले कभी अनुभव नहीं किया है। इस क्षेत्र में कोई छल-कपट नहीं है, कोई धोखेबाज़ी नहीं है, कोई अंधकार नहीं है और कोई बुराई नहीं है। वहाँ केवल ईमानदारी और विश्वसनीयता है; केवल प्रकाश और सत्यपरायणता है; केवल धार्मिकता और दयालुता है। वह प्रेम और परवाह से भरा हुआ है, अनुकंपा और सहनशीलता से भरा हुआ है, और उसके माध्यम से तुम जीवित होने की प्रसन्नता और आनंद महसूस करोगे। ये वे चीज़ें हैं, जिन्हें परमेश्वर तुम्हारे लिए तब प्रकट करेगा, जब तुम अपना हृदय उसके लिए खोलोगे। यह असीमित संसार परमेश्वर की बुद्धि से और उसकी सर्वशक्तिमत्ता से भरा हुआ है; यह उसके प्रेम और अधिकार से भी भरा हुआ है। यहाँ तुम परमेश्वर के स्वरूप के हर पहलू को देख सकते हो, कि किस बात से वह आनंदित होता है, क्यों वह चिंता करता है और क्यों उदास होता है, और क्यों वह क्रोधित होता है...। हर व्यक्ति, जो अपने हृदय को खोलता है और परमेश्वर को भीतर आने देता है, इसे अनुभव कर सकता है। परमेश्वर केवल तभी तुम्हारे हृदय में आ सकता है, जब तुम अपना हृदय उसके लिए खोल देते हो। तुम केवल तभी परमेश्वर के स्वरूप को देख सकते हो, केवल तभी अपने लिए उसके इरादे देख सकते हो, जब वह तुम्हारे हृदय के भीतर आ गया होता है। उस समय तुम्हें पता चलेगा कि परमेश्वर से संबंधित हर चीज़ कितनी बहुमूल्य है, कि उसका स्वरूप कितना सँजोकर रखने लायक है। उसकी तुलना में तुम्हें घेरे रहने वाले लोग, तुम्हारे जीवन की वस्तुएँ और घटनाएँ, यहाँ तक कि तुम्हारे प्रियजन, तुम्हारा जीवनसाथी, और वे चीज़ें जिनसे तुम प्रेम करते हो, वे शायद ही उल्लेखनीय हों। वे इतने छोटे हैं, और इतने निम्न हैं; तुम महसूस करोगे कि कोई भौतिक पदार्थ फिर कभी तुम्हें आकर्षित करने में सक्षम नहीं होगा, या कोई भौतिक पदार्थ तुम्हें फिर कभी अपने लिए कोई कीमत चुकाने हेतु फुसला नहीं सकेगा। परमेश्वर की विनम्रता में तुम उसकी महानता और उसकी सर्वोच्चता देखोगे। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के कुछ कर्मों में, जिन्हें तुम पहले काफी छोटा समझते थे, तुम उसकी असीमित बुद्धि और उसकी सहनशीलता देखोगे, और तुम उसका धैर्य, उसकी सहनशीलता और अपने बारे में उसकी समझ देखोगे। यह तुममें उसके लिए श्रद्धा उत्पन्न करेगा। उस दिन तुम्हें लगेगा कि मानवजाति कितने गंदे संसार में रह रही है, कि तुम्हारे आसपास रहने वाले लोग और तुम्हारे जीवन में घटित होने वाली घटनाएँ, यहाँ तक कि जिनसे तुम प्रेम करते हो, तुम्हारे प्रति उनका प्रेम और उनकी तथाकथित सुरक्षा या तुम्हारे लिए उनकी चिंता भी उल्लेखनीय तक नहीं हैं—केवल परमेश्वर ही तुम्हारा प्रिय है, और केवल परमेश्वर ही है जिसे तुम सबसे ज़्यादा सँजोते हो। जब वह दिन आएगा, तो मैं मानता हूँ कि कुछ लोग होंगे जो कहेंगे : परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और उसका सार बहुत पवित्र है—परमेश्वर में कोई धोखा नहीं है, कोई बुराई नहीं है, कोई ईर्ष्या नहीं है, और कोई कलह नहीं है, बल्कि केवल धार्मिकता और प्रामाणिकता है, और मनुष्यों को परमेश्वर के स्वरूप की हर चीज़ की लालसा करनी चाहिए। मनुष्यों को उसके लिए प्रयास करना चाहिए और उसकी आकांक्षा करनी चाहिए। किस आधार पर मानवजाति की इसे प्राप्त करने की योग्यता निर्मित होती है? वह मनुष्यों की परमेश्वर के स्वभाव की समझ, और उनकी परमेश्वर के सार की समझ के आधार पर निर्मित होती है। इसलिए परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझना प्रत्येक व्यक्ति के लिए जीवनभर की शिक्षा है; और यह हर उस व्यक्ति के द्वारा अनुसरण किया जाने वाला एक जीवनभर का लक्ष्य है, जो अपने स्वभाव को बदलने का प्रयास करता है, और परमेश्वर को जानने का प्रयास करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

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