57. परमेश्‍वर के विरुद्ध आत्‍मरक्षात्‍मकता और उसकी ग़लत समझ का निराकरण करने के सिद्धान्‍त

(1) एकमात्र मसीह ही मानव-जाति का रक्षक है। केवल वही मनुष्‍य को सत्‍य और जीवन प्रदान कर सकता है, और उसके उद्धार के अलावा कोई और उद्धार नहीं है;

(2) यह जानना आवश्‍यक है कि परमेश्‍वर का न्‍याय और ताड़ना, परीक्षण और शोधन, और काट-छाँट तथा व्‍यवहार, सभी कुछ मनुष्‍य के उद्धार और पूर्णता की ख़ातिर किये जाते हैं, और वे सब मनुष्‍य के प्रति प्रेम की अभिव्‍यक्तियाँ हैं;

(3) जब व्‍यक्ति के साथ कोई ऐसी घटना हो जो उसकी धारणाओं से मेल न खाती हो, तो उन्‍हें सत्‍य को तलाशना चाहिए, परमेश्‍वर की इच्‍छा को समझना चाहिए, और उसके स्‍वभाव का ज्ञान हासिल करने का उद्यम करना चाहिए। केवल तभी वे अपनी धारणाओं और ग़लतफ़हमियों से निज़ात पा सकते हैं।

(4) जो परमेश्‍वर से अपना निरन्‍तर बचाव करते हैं और लोगों के प्रति छलपूर्ण व्‍यवहार करते हैं, और वे सारे लोग जो यह विश्‍वास नहीं करते कि परमेश्‍वर ही सत्‍य है, वे घृणित अभागे हैं – पूरी तरह से अविश्‍वासी और नास्तिक।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर देह क्यों बना? यह पहले ही कहा जा चुका है कि वह मानव जाति को बचाने के लिए हरसंभव प्रयास करता है; इस प्रकार, उसका देहधारण उसके प्रेम की संपूर्णता से संपन्न है, जो तुम लोगों को परमेश्वर के प्रति मनुष्य की अवज्ञा की चरम सीमा दिखाता है, और दिखाता है कि स्थिति लाइलाज है। उसके पास देह बनने और खुद को मानव जाति के लिए अर्पित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। परमेश्वर अपना पूरा प्रेम अर्पित करता है। अगर वह इंसान से प्रेम नहीं करता, तो वह देह नहीं बनता; बल्कि, वह स्वर्ग से वज्रपात करता, सीधे अपने प्रताप और क्रोध को भेजता जिससे इंसान भूमि पर गिर जाता। परमेश्वर को कोई ज़रूरत नहीं होती कि वह देह बने; उसे न तो इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती और न ही इतना अधिक अपमान सहना पड़ता। यह एक स्पष्ट उदाहरण है। वह इंसान को बचाने के लिए दर्द, अपमान, परित्याग और उत्पीड़न का शिकार होना चुनेगा; ऐसे शत्रुतापूर्ण माहौल के बावजूद, वह उन्हें उद्धार देगा। क्या इससे बड़ा कोई प्रेम हो सकता है? यदि परमेश्वर के पास धार्मिकता के अलावा और कुछ भी नहीं होता, और अगर वह मानव जाति के प्रति निरंतर घृणा से भरा होता, तो वह अपना काम करने के लिए देह नहीं बनता; वह तब तक इंतजार कर सकता था, जब तक कि मनुष्यों का भ्रष्टाचार अपने चरम पर नहीं पहुँच जाता और फिर उन सभी को भस्म कर देता, और इस तरह उनका काम तमाम कर देता। चूँकि परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है—क्योंकि उसमें मानव जाति के लिए अत्यधिक प्रेम है—इसीलिए वह इन असाधारण रूप से भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए देह बन गया। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से गुजरने के बाद, और उनकी प्रकृति से अवगत होने के बाद, कई लोग कहते हैं, "मेरे लिए सब कुछ खत्म हो गया है; मुझे कभी नहीं बचाया जा सकता।" केवल जब तुम खुद को उद्धार पाने में असमर्थ मान लेते हो, तभी तुम यह जान पाते हो कि परमेश्वर के पास वास्तव में मनुष्य के लिए अत्यधिक धैर्य और प्रेम है! परमेश्वर के प्रेम के बिना लोग क्या कर सकते थे? मानव प्रकृति इतनी भ्रष्ट है, फिर भी परमेश्वर अभी भी तुम लोगों से बात करता है; जो भी सवाल तुम लोग पूछते हो उसका तुरंत जवाब देता है, चिंता करते हुए कि शायद तुम न समझो और वह भयभीत रहता है कि कहीं तुम भटक न जाओ या चरम सीमा तक न चले जाओ। बात ऐसी होने पर भी, क्या तुम लोग अभी भी मानव जाति के लिए परमेश्वर के प्रेम के परिमाण को नहीं समझते?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्‍यता के लिए परमेश्‍वर का सच्‍चा प्रेम' से उद्धृत

परमेश्वर पृथ्वी पर भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए कार्य करने आया है—इसमें कोई झूठ नहीं है। यदि होता, तो वह अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित ही नहीं आता। अतीत में, उद्धार के उसके साधन में परम प्रेम और करुणा दिखाना शामिल था, यहाँ तक कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। वर्तमान अतीत जैसा नहीं है : आज तुम लोगों को दिया गया उद्धार अंतिम दिनों के समय में प्रत्येक व्यक्ति का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण किए जाने के दौरान घटित होता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन प्रेम या करुणा नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है, ताकि मनुष्य को अधिक अच्छी तरह से बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है, वह ताड़ना, न्याय और निर्दय मार है, लेकिन यह जान लो : इस निर्मम मार में थोड़ा-सा भी दंड नहीं है। मेरे वचन कितने भी कठोर हों, तुम लोगों पर जो पड़ता है, वे कुछ वचन ही हैं, जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत हो सकते हैं, और मैं कितना भी क्रोधित क्यों न हूँ, तुम लोगों पर जो पड़ता है, वे फिर भी कुछ शिक्षाप्रद वचन ही हैं, और मेरा आशय तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना या तुम लोगों को मार डालना नहीं है। क्या यह सब तथ्य नहीं है? जान लो कि आजकल हर चीज़ उद्धार के लिए है, चाहे वह धार्मिक न्याय हो या निर्मम शुद्धिकरण और ताड़ना। भले ही आज प्रत्येक व्यक्ति का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण किया जा रहा हो या मनुष्य की श्रेणियाँ प्रकट की जा रही हों, परमेश्वर के समस्त वचनों और कार्य का प्रयोजन उन लोगों को बचाना है, जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं। धार्मिक न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से लाया जाता है, और निर्मम शुद्धिकरण उन्हें निर्मल बनाने के लिए किया जाता है; कठोर वचन या ताड़ना, दोनों शुद्ध करने के लिए किए जाते हैं और वे उद्धार के लिए हैं। इस प्रकार, उद्धार का आज का तरीका अतीत के तरीके जैसा नहीं है। आज तुम्हारे लिए उद्धार धार्मिक न्याय के ज़रिए लाया जाता है, और यह तुम लोगों में से प्रत्येक को उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करने का एक अच्छा उपकरण है। इसके अतिरिक्त, निर्मम ताड़ना तुम लोगों के सर्वोच्च उद्धार का काम करती है—और ऐसी ताड़ना और न्याय का सामना होने पर तुम लोगों को क्या कहना है? क्या तुम लोगों ने शुरू से अंत तक उद्धार का आनंद नहीं लिया है? तुम लोगों ने देहधारी परमेश्वर को देखा है और उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि का एहसास किया है; इसके अलावा, तुमने बार-बार मार और अनुशासन का अनुभव किया है। लेकिन क्या तुम लोगों को सर्वोच्च अनुग्रह भी प्राप्त नहीं हुआ है? क्या तुम लोगों को प्राप्त हुए आशीष किसी भी अन्य की तुलना में अधिक नहीं हैं? तुम लोगों को प्राप्त हुए अनुग्रह सुलेमान को प्राप्त महिमा और संपत्ति से भी अधिक विपुल हैं! इसके बारे में सोचो : यदि आगमन के पीछे मेरा इरादा तुम लोगों को बचाने के बजाय तुम्हारी निंदा करना और सज़ा देना होता, तो क्या तुम लोगों का जीवन इतने लंबे समय तक चल सकता था? क्या तुम, मांस और रक्त के पापी प्राणी आज तक जीवित रहते? यदि मेरा उद्देश्य केवल तुम लोगों को दंड देना होता, तो मैं देह क्यों बनता और इतने महान उद्यम की शुरुआत क्यों करता? क्या तुम पूर्णत: नश्वर प्राणियों को दंडित करने का काम एक वचन भर कहने से ही न हो जाता? क्या तुम लोगों की जानबूझकर निंदा करने के बाद अभी भी मुझे तुम लोगों को नष्ट करने की आवश्यकता होगी? क्या तुम लोगों को अभी भी मेरे इन वचनों पर विश्वास नहीं है? क्या मैं केवल प्यार और करुणा के माध्यम से मनुष्य को बचा सकता हूँ? या क्या मैं मनुष्यों को बचाने के लिए केवल सूली पर चढ़ने के तरीके का ही उपयोग कर सकता हूँ? क्या मेरा धार्मिक स्वभाव मनुष्य को पूरी तरह से आज्ञाकारी बनाने में अधिक सहायक नहीं है? क्या यह मनुष्य को पूरी तरह से बचाने में अधिक सक्षम नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए' से उद्धृत

तुम सब पाप और व्यभिचार की धरती पर रहते हो; और तुम सब व्यभिचारी और पापी हो। आज तुम न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण रूप से, तुम लोगों ने ताड़ना और न्याय प्राप्त किया है, तुमने वास्तव में गहन उद्धार प्राप्त किया है, दूसरे शब्दों में, तुमने परमेश्वर का महानतम प्रेम प्राप्त किया है। वह जो कुछ करता है, उस सबमें वह तुम्हारे प्रति वास्तव में प्रेमपूर्ण है। वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता। यह तुम लोगों के पापों के कारण है कि वह तुम लोगों का न्याय करता है, ताकि तुम आत्म-परीक्षण करो और यह ज़बरदस्त उद्धार प्राप्त करो। यह सब मनुष्य को संपूर्ण बनाने के लिए किया जाता है। प्रारंभ से लेकर अंत तक, परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए पूरी कोशिश कर रहा है, और वह अपने ही हाथों से बनाए हुए मनुष्य को पूर्णतया नष्ट करने का इच्छुक नहीं है। आज वह कार्य करने के लिए तुम लोगों के मध्य आया है, और क्या ऐसा उद्धार और भी बड़ा नहीं है? अगर वह तुम लोगों से नफ़रत करता, तो क्या फिर भी वह व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? वह इस प्रकार कष्ट क्यों उठाए? परमेश्वर तुम लोगों से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम लोगों को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम सबसे सच्चा प्रेम है। यह केवल लोगों की अवज्ञा के कारण है कि उसे न्याय के माध्यम से उन्हें बचाना पड़ता है; यदि वह ऐसा न करे, तो उन्हें बचाया जाना असंभव होगा। चूँकि तुम लोग नहीं जानते कि कैसे जिया जाए, यहाँ तक कि तुम इससे बिलकुल भी अवगत नहीं हो, और चूँकि तुम इस दुराचारी और पापमय भूमि पर जीते हो और स्वयं दुराचारी और गंदे दानव हो, इसलिए वह तुम्हें और अधिक भ्रष्ट होते नहीं देख सकता; वह तुम्हें इस मलिन भूमि पर रहते हुए नहीं देख सकता जहाँ तुम अभी रह रहे हो और शैतान द्वारा उसकी इच्छानुसार कुचले जा रहे हो, और वह तुम्हें अधोलोक में गिरने नहीं दे सकता। वह केवल लोगों के इस समूह को प्राप्त करना और तुम लोगों को पूर्णतः बचाना चाहता है। तुम लोगों पर विजय का कार्य करने का यह मुख्य उद्देश्य है—यह केवल उद्धार के लिए है। यदि तुम नहीं देख सकते कि जो कुछ तुम पर किया जा रहा है, वह प्रेम और उद्धार है, यदि तुम सोचते हो कि यह मनुष्य को यातना देने की एक पद्धति, एक तरीका भर है और विश्वास के लायक नहीं है, तो तुम पीड़ा और कठिनाई सहने के लिए वापस अपने संसार में लौट सकते हो! यदि तुम इस धारा में रहने और इस न्याय और अमित उद्धार का आनंद लेने, और मनुष्य के संसार में कहीं न पाए जाने वाले इन सब आशीषों का और इस प्रेम का आनंद उठाने के इच्छुक हो, तो अच्छा है : विजय के कार्य को स्वीकार करने के लिए इस धारा में बने रहो, ताकि तुम्हें पूर्ण बनाया जा सके। परमेश्वर के न्याय के कारण आज तुम्हें कुछ कष्ट और शुद्धिकरण सहना पड़ सकता है, लेकिन यह कष्ट मूल्यवान और अर्थपूर्ण है। यद्यपि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के द्वारा लोग शुद्ध, और निर्ममतापूर्वक उजागर किए जाते हैं—जिसका उद्देश्य उन्हें उनके पापों का दंड देना, उनके देह को दंड देना है—फिर भी इस कार्य का कुछ भी उनके देह को नष्ट करने की सीमा तक नकारने के इरादे से नहीं है। वचन के समस्त गंभीर प्रकटीकरण तुम्हें सही मार्ग पर ले जाने के उद्देश्य से हैं। तुम लोगों ने इस कार्य का बहुत-कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है, और स्पष्टतः, यह तुम्हें बुरे मार्ग पर नहीं ले गया है! यह सब तुम्हें सामान्य मानवता को जीने योग्य बनाने के लिए है; और यह सब तुम्हारी सामान्य मानवता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम तुम्हारी आवश्यकताओं पर आधारित है, तुम्हारी दुर्बलताओं के अनुसार है, और तुम्हारे वास्तविक आध्यामिक कद के अनुसार है, और तुम लोगों पर कोई असहनीय बोझ नहीं डाला गया है। यह आज तुम्हें स्पष्ट नहीं है, और तुम्हें लगता है कि मैं तुम पर कठोर हो रहा हूँ, और निस्संदेह तुम सदैव यह विश्वास करते हो कि मैं तुम्हें प्रतिदिन इसलिए ताड़ना देता हूँ, इसलिए तुम्हारा न्याय करता हूँ और इसलिए तुम्हारी भर्त्सना करता हूँ, क्योंकि मैं तुमसे घृणा करता हूँ। किंतु यद्यपि जो तुम सहते हो, वह ताड़ना और न्याय है, किंतु वास्तव में यह तुम्हारे लिए प्रेम है, और यह सबसे बड़ी सुरक्षा है। यदि तुम इस कार्य के गहन अर्थ को नहीं समझ सकते, तो तुम्हारे लिए अनुभव जारी रखना असंभव होगा। इस उद्धार से तुम्हें सुख प्राप्त होना चाहिए। होश में आने से इनकार मत करो। इतनी दूर आकर तुम्हें विजय के कार्य का अर्थ स्पष्ट दिखाई देना चाहिए, और तुम्हें अब और इसके बारे में ऐसी-वैसी राय नहीं रखनी चाहिए!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई (4)' से उद्धृत

बहुत से लोग परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते; वे सोचते हैं कि परमेश्वर ने जिसके जीवन को भी पूर्वनिर्धारित कर दिया है, परमेश्वर अवश्य ही उसकी रक्षा करेंगे और सोचते हैं जिनके जीवन को पूर्वनिर्धारित नहीं किया है, परमेश्वर उनकी रक्षा नहीं करेंगे, भले ही वह अच्छे काम करते हों। उन्हें लगता है कि परमेश्वर लोगों के काम और व्यवहार के आधार पर नियति तय नहीं करेंगे। यदि आप इस तरह सोचते हैं, तो फिर आपने परमेश्वर को गलत समझा है। यदि परमेश्वर ऐसा करते, तो क्या वह न्यायसंगत हो सकते हैं? परमेश्वर लोगों की नियति एक सिद्धांत के आधार पर करते हैं: आखिरकार लोगों की नियति उनके व्यक्तिगत कामों और व्यवहार के अनुसार तय होगी। आपको परमेश्वर का धर्मी स्वभाव नज़र नहीं आता है, और आप हमेशा ही परमेश्वर को गलत समझ लेते हैं और उनकी आकांक्षाओं को तोड़-मरोड़ देते हैं, यही कारण है कि आप निराशावादी होकर उम्मीद छोड़ बैठते हैं। क्या यह खुद पर थोपा हुआ नहीं है? वस्तुत, क्या आप वाकई परमेश्वर को समझते हैं, और क्या आप परमेश्वर की आकांक्षाओं के प्रति आश्वस्त हैं? आपने हमेशा “परमेश्वर के पूर्वनिर्धारण” को एक खाका खींचने के लिये इस्तेमाल किया है और परमेश्वर के वचनों को नकारा है। यह परमेश्वर के विषय में एक गंभीर भ्रम है! आप परमेश्वर के कार्यों को और परमेश्वर की इच्छाओं को बिल्कुल भी नहीं समझते हैं; बल्कि आप परमेश्वर की उन आकांक्षाओं को भी नहीं समझते हैं जो उन्होंने 6000 सालों के अपने प्रबंधन कार्य में समाहित कर दी हैं! आप निराशा से घिर जाते हैं, पूर्वानुमान लगाते हैं और परमेश्वर पर संदेह करते हैं; आप सेवाकर्ता बनने से डरते हैं, यह सोचकर “मुझमें कौन सी खास बात है; मुझे इस काम के लायक क्यों समझा जा रहा है? क्या परमेश्वर मेरा इस्तेमाल कर रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह मुझसे सेवा करवा लें और जब मैं किसी काबिल न रहूं तो मुझसे छुटकारा पा लें।” क्या ऐसा सोचकर आप परमेश्वर को उन्हीं लोगों की श्रेणी में नहीं रख रहे हैं जो सत्ता में हैं? आपने हमेशा परमेश्वर को गलत समझा है; आपने परमेश्वर के बारे में गलत धारणा बनाकर उनसे घृणा की है। आपने परमेश्वर के वचनों और बेबाकी पर विश्वास ही नहीं किया, आपने सेवाकर्ता बनने की पहल तो की है, आपने सेवाकर्ता बनने की राह पर चलने की पहल तो की है, लेकिन आपने अपना स्वभाव बदलने का प्रयास नहीं किया और न ही सच्चाई की राह पर चलने के लिये कठिनाइयों का सामना किया। आखिरकार, आपने अपना सारा दायित्व यह कहते हुए परमेश्वर पर डाल दिया कि परमेश्वर ने आपको पूर्वनिर्धारित नहीं किया था, और यह कि परमेश्वर आपके साथ निष्ठावान नहीं रहे। समस्या क्या है? आपने परमेश्वर की आकांक्षाओं को ठीक से समझा नहीं, आपको परमेश्वर के वचनों पर भरोसा नहीं है, आप सत्य का पालन नहीं कर रहे, न ही आप अपना दायित्व निभाने के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं। आप परमेश्वर की इच्छा को कैसे पूरा करेंगे? इस तरह के कर्मों से आप ज़रा भी सेवाकर्ता बनने के योग्य नहीं हैं, तब आप उसके साथ सौदे-बाज़ी कैसे करोगे? यदि आप मानते हैं कि परमेश्वर धर्मी नहीं हैं, तो फिर आप उन पर विश्वास क्यों करते हैं? आप हमेशा चाहते हैं कि आप परमेश्वर के परिवार के लिये परिश्रम करने से पहले ही परमेश्वर आपसे कहें, ‘आप परमेश्वर के साम्राज्य के लोगों में से हैं और यह स्थिति कभी बदलेगी नहीं।” यदि परमेश्वर ऐसा नहीं कहते, तो आप कभी भी परमेश्वर को अपना सच्चा हृदय समर्पित नहीं करेंगे। ऐसा व्यक्ति कितना विद्रोही है! मैंने ऐसे अनेक लोग देखे हैं जो अपने स्वभाव को बदलने पर ज़रा भी ध्यान नहीं देते, सच्चाई को अपने जीवन में उतारने की तो बात ही क्या है। उनका सारा ध्यान इसी ओर रहता है कि उनका अंतिम गंतव्य अच्छा रहेगा या नहीं, परमेश्वर उनके साथ कैसा बर्ताव करेंगे, अपने लोगों में शामिल करने के लिये उन्हें परमेश्वर ने पूर्वनिर्धारित किया है क्या, तथा और भी सुनी-सुनाई बातें। जो लोग नेक कामों में नहीं लगे हैं उन्हें शाश्वत जीवन कैसे मिल सकता है? वे परमेश्वर के परिवार में कैसे रह सकते हैं?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा है कि यथासंभव लोगों की रक्षा की जाये' से उद्धृत

मैं उन लोगों में प्रसन्नता अनुभव करता हूँ जो दूसरों पर शक नहीं करते, और मैं उन लोगों को पसंद करता हूँ जो सच को तत्परता से स्वीकार कर लेते हैं; इन दो प्रकार के लोगों की मैं बहुत परवाह करता हूँ, क्योंकि मेरी नज़र में ये ईमानदार लोग हैं। यदि तुम धोखेबाज हो, तो तुम सभी लोगों और मामलों के प्रति सतर्क और शंकित रहोगे, और इस प्रकार मुझमें तुम्हारा विश्वास संदेह की नींव पर निर्मित होगा। मैं इस तरह के विश्वास को कभी स्वीकार नहीं कर सकता। सच्चे विश्वास के अभाव में तुम सच्चे प्यार से और भी अधिक वंचित हो। और यदि तुम परमेश्वर पर इच्छानुसार संदेह करने और उसके बारे में अनुमान लगाने के आदी हो, तो तुम यकीनन सभी लोगों में सबसे अधिक धोखेबाज हो। तुम अनुमान लगाते हो कि क्या परमेश्वर मनुष्य जैसा हो सकता है : अक्षम्य रूप से पापी, क्षुद्र चरित्र का, निष्पक्षता और विवेक से विहीन, न्याय की भावना से रहित, शातिर चालबाज़ियों में प्रवृत्त, विश्वासघाती और चालाक, बुराई और अँधेरे से प्रसन्न रहने वाला, आदि-आदि। क्या लोगों के ऐसे विचारों का कारण यह नहीं है कि उन्हें परमेश्वर का थोड़ा-सा भी ज्ञान नहीं है? ऐसा विश्वास पाप से कम नहीं है! कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो मानते हैं कि जो लोग मुझे खुश करते हैं, वे बिल्कुल ऐसे लोग हैं जो चापलूसी और खुशामद करते हैं, और जिनमें ऐसे हुनर नहीं होंगे, वे परमेश्वर के घर में अवांछनीय होंगे और वे वहाँ अपना स्थान खो देंगे। क्या तुम लोगों ने इतने बरसों में बस यही ज्ञान हासिल किया है? क्या तुम लोगों ने यही प्राप्त किया है? और मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान इन गलतफहमियों पर ही नहीं रुकता; परमेश्वर के आत्मा के खिलाफ तुम्हारी निंदा और स्वर्ग की बदनामी इससे भी बुरी बात है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि ऐसा विश्वास तुम लोगों को केवल मुझसे दूर भटकाएगा और मेरे खिलाफ बड़े विरोध में खड़ा कर देगा। कार्य के कई वर्षों के दौरान तुम लोगों ने कई सत्य देखे हैं, किंतु क्या तुम लोग जानते हो कि मेरे कानों ने क्या सुना है? तुम में से कितने लोग सत्य को स्वीकारने के लिए तैयार हैं? तुम सब लोग विश्वास करते हो कि तुम सत्य के लिए कीमत चुकाने को तैयार हो, किंतु तुम लोगों में से कितनों ने वास्तव में सत्य के लिए दुःख झेला है? तुम लोगों के हृदय में अधार्मिकता के सिवाय कुछ नहीं है, जिससे तुम लोगों को लगता है कि हर कोई, चाहे वह कोई भी हो, धोखेबाज और कुटिल है—यहाँ तक कि तुम यह भी विश्वास करते हो कि देहधारी परमेश्वर, किसी सामान्य मनुष्य की तरह, दयालु हृदय या कृपालु प्रेम से रहित हो सकता है। इससे भी अधिक, तुम लोग विश्वास करते हो कि कुलीन चरित्र और दयालु, कृपालु प्रकृति केवल स्वर्ग के परमेश्वर में ही होती है। तुम लोग विश्वास करते हो कि ऐसा कोई संत नहीं होता, कि केवल अंधकार एवं दुष्टता ही पृथ्वी पर राज करते हैं, जबकि परमेश्वर एक ऐसी चीज़ है, जिसे लोग अच्छाई और सुंदरता के लिए अपने मनोरथ सौंपते हैं, वह उनके द्वारा गढ़ी गई एक किंवदंती है। तुम लोगों के विचार से, स्वर्ग का परमेश्वर बहुत ही ईमानदार, धार्मिक और महान है, आराधना और श्रद्धा के योग्य है, जबकि पृथ्वी का यह परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर का एक स्थानापन्न और साधन है। तुम विश्वास करते हो कि यह परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर के समकक्ष नहीं हो सकता, उनका एक-साथ उल्लेख तो बिलकुल नहीं किया जा सकता। जब परमेश्वर की महानता और सम्मान की बात आती है, तो वे स्वर्ग के परमेश्वर की महिमा से संबंधित होते हैं, किंतु जब मनुष्य की प्रकृति और भ्रष्टता की बात आती है, तो ये ऐसे लक्षण हैं जिनमें पृथ्वी के परमेश्वर का एक अंश है। स्वर्ग का परमेश्वर हमेशा उत्कृष्ट है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर हमेशा ही नगण्य, कमज़ोर और अक्षम है। स्वर्ग के परमेश्वर में भावना नहीं, केवल धार्मिकता है, जबकि धरती के परमेश्वर के केवल स्वार्थपूर्ण उद्देश्य हैं और वह निष्पक्षता और विवेक से रहित है। स्वर्ग के परमेश्वर में थोड़ी-सी भी कुटिलता नहीं है और वह हमेशा विश्वसनीय है, जबकि पृथ्वी के परमेश्वर में हमेशा बेईमानी का एक पक्ष होता है। स्वर्ग का परमेश्वर मनुष्यों से बहुत प्रेम करता है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर मनुष्य की पर्याप्त परवाह नहीं करता, यहाँ तक कि उसकी पूरी तरह से उपेक्षा करता है। यह त्रुटिपूर्ण ज्ञान तुम लोगों के हृदय में काफी समय से रखा गया है और भविष्य में भी बनाए रखा जा सकता है। तुम लोग मसीह के सभी कर्मों पर अधार्मिकता के दृष्टिकोण से विचार करते हो और उसके सभी कार्यों और साथ ही उसकी पहचान और सार का मूल्यांकन दुष्ट के परिप्रेक्ष्य से करते हो। तुम लोगों ने बहुत गंभीर गलती की है और ऐसा काम किया है, जो तुमसे पहले के लोगों ने कभी नहीं किया। अर्थात्, तुम लोग केवल अपने सिर पर मुकुट धारण करने वाले स्वर्ग के उत्कृष्ट परमेश्वर की सेवा करते हो और उस परमेश्वर की सेवा कभी नहीं करते, जिसे तुम इतना महत्वहीन समझते हो, मानो वह तुम लोगों को दिखाई तक न देता हो। क्या यह तुम लोगों का पाप नहीं है? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध तुम लोगों के अपराध का विशिष्ट उदाहरण नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

जब परमेश्वर के बारे में तुम्हें गलतफहमियाँ हैं, तुम्हारे भीतर सख्त, पूर्वाग्रही तत्त्व हैं जो तुम्हें सत्य की तलाश करने से रोकेंगे। यदि तुम्हारी गलतफहमियाँ दूर कर दी जाती हैं, तुम सत्य की तलाश करने में समर्थ हो जाओगे; नहीं तो, तुम्हारे हृदय में एक अलगाव महसूस होगा, और तुम बेपरवाही के साथ प्रार्थना करोगे; यह परमेश्वर को धोखा देना है, और वह तुम्हें नहीं सुनेगा। जैसे ही परमेश्वर के प्रति तुम्हारे भीतर गलतफहमी पैदा होती है, और जैसे ही दूरी और अलगाव के भाव पैदा होते हैं, तुम्हारे हृदय का कपाट परमेश्वर के लिए बंद हो जाता है, और तुम उसके वचनों को सुनना नहीं चाहते और न ही सत्य की तलाश करना चाहते हो। तुम कोई भी काम बस अनमने ढंग से करते हो, स्वांग रचते हुए, धोखा देते हुए। जब परमेश्वर के प्रति व्यक्ति की गलतफहमियाँ दूर हो जाती हैं और वह इस अवरोध को पार कर लेता है, वह परमेश्वर के सामने सच्चे हृदय के साथ प्रस्तुत होगा और परमेश्वर के हर वचन और उसकी हर माँग पर ईमानदारी के साथ ध्यान देगा। यदि, व्यक्ति और परमेश्वर के बीच अंतर्विरोध, दूरी और गलतफहमी है, तो व्यक्ति शैतान की भूमिका निभा रहा है और परमेश्वर के प्रतिपक्ष में है। इस प्रतिपक्ष के परिणाम क्या हैं? क्या ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के प्रति समर्पित हो सकता है? क्या वह सत्य को स्वीकार कर सकता है? (नहीं कर सकता।) वह दोनों ही काम नहीं कर सकता, और उसके स्वभाव के बदलाव रुक जाते हैं। इसलिए, जब कोई अपनी विभिन्न अवस्थाओं की जाँच करता है, एक अर्थ में यह स्वयं को जानने के लिए किया जाता है, जबकि दूसरे अर्थ में, यह व्यक्ति को परमेश्वर के प्रति जो गलतफहमियाँ हैं उसकी जांच पर ध्यान केंद्रित करने को बाध्य करता है। इन गलतफहमियों के परिणाम क्या हैं? अवधारणाएँ, कल्पनाएँ, परिसीमाएँ, शंकाएँ, जांच-पड़ताल, और अटकलें। जब तुम इन स्थितियों की गिरफ्त में होते हो, परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध में एक समस्या उत्पन्न होती है। इसे दूर करने के लिए तुम्हें अविलंब सत्य तक पहुंचना होगा–और इसे दूर तो तुम्हें करना ही होगा। कुछ लोग सोचते हैं कि यदि परमेश्वर के प्रति उन्हें गलतफहमी है तो जबतक वे इसे सुलझा नहीं लेते, वे अपने कर्त्तव्य का निर्वहन नहीं कर सकते। क्या यह सही है? (नहीं।) अपने कर्त्तव्य-पालन को स्थगित मत करो, बल्कि अपना कर्त्तव्य पूरा करते हुए समस्या का समाधान भी निकालो। तुम्हारे कर्त्तव्य-पालन के दौरान, परमेश्वर के प्रति तुम्हारी गलतफहमी दूर होने लगेगी और जिसका तुम्हें अहसास भी नहीं होगा, और तुम्हें पता चलेगा कि समस्या की शुरुआत कहाँ से हुई थी और कितनी गंभीर है। किसी दिन तुम यह महसूस करने में समर्थ होगे, "व्यक्ति एक सृष्ट प्राणी है, और सृष्टिकर्त्ता सदैव मेरा स्वामी है; यह सार बदलता नहीं है, न ही व्यक्ति की स्थिति बदलती है और न ही परमेश्वर की। परमेश्वर जो भी करता हो, और अगर पूरी मानवता उसके कार्य को गलत मानती हो, तो भी उसने जो किया है उसे मैं नकार नहीं सकता, न ही मैं इस बात से इनकार कर सकता हूँ कि वह सत्य है। परमेश्वर परम सत्य है, सदा दोष-रहित। व्यक्ति को अपनी स्थिति में दृढ़तापूर्वक डटे रहना चाहिए; उसे परमेश्वर की पड़ताल नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसके आयोजनों और उसके सारे वचनों को स्वीकार करना चाहिए। परमेश्वर जो भी कहता और करता है वह सही है। व्यक्ति को परमेश्वर के सामने माँगें नहीं रखनी चाहिए–सृष्ट प्राणी में ऐसा करने की पात्रता नहीं होती। अगर परमेश्वर मुझे एक खिलौना समझता हो, तो भी मैं समर्पण करूँगा, और अगर मैं ऐसा नहीं करता, तो यह मेरी समस्या है, परमेश्वर की नहीं।" जब तुम्हारे पास सत्य के इस पहलू का अनुभव और ज्ञान होता है, तुम सही मायने में परमेश्वर के प्रति समर्पण में प्रवेश करोगे, और तुम्हारे पास अब बड़ी समस्याएँ नहीं होंगी, और, चाहे तुम अपना कर्त्तव्य-पालन कर रहे हो, या सत्य के विभिन्न पहलुओं का अभ्यास, बहुत सारी समस्याओं का समाधान हो चुका होगा। यह सबसे बड़ा और सबसे गहरा सत्य है। कई बार, जब लोग विभिन्न समस्याओं का सामना कर रहे होते हैं, जब कई प्रकार की अड़चनें सामने आती हैं, या जब वे ऐसी किसी चीज का सामना करते हैं जिसके साथ समझौता नहीं कर सकते, ऐसा इसलिए है क्योंकि वे गलत जगह पर खड़े हैं : उन्हें परमेश्वर के प्रति गलतफहमी है; वे परमेश्वर की पड़ताल करना चाहते हैं, और उसे परमेश्वर मानना नहीं चाहते; परमेश्वर जो भी कहता और करता है उसके औचित्य को वे नकारना चाहते हैं; और वे नकारना चाहते हैं कि परमेश्वर सत्य है। इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति एक सृष्ट प्राणी नहीं रहना चाहता, बल्कि वह परमेश्वर की बराबरी करना चाहता है, उसमें त्रुटियाँ ढूंढना चाहता है। इससे समस्या पैदा होगी। अगर तुम अपना कर्त्तव्य पूरा कर सकते हो और एक सृष्ट प्राणी के रूप में अपनी जगह पर डटे रहे सकते हो, तो निश्चित तौर परमेश्वर जो करता है उसके प्रति तुम्हारे भीतर प्रतिरोध पैदा नहीं होगा। तुम्हें कुछ गलतफहमियाँ हो सकती हैं, और तुम्हारे पास कुछ अवधारणाएँ हो सकती हैं, लेकिन, कम-से-कम तुम्हारा रवैया परमेश्वर के आयोजनों को स्वीकारने की स्वेच्छा वाला होगा, और तुम इस स्वेच्छा-स्थल से परमेश्वर के प्रति समर्पण की ओर आओगे, इस तरह तुम्हारे भीतर परमेश्वर के प्रति कोई प्रतिरोध पैदा नहीं होगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के प्रति जो प्रवृत्ति होनी चाहिए मनुष्य की' से उद्धृत

लोग परमेश्वर के परीक्षणों को लेकर प्रायः चिंतित और भयभीत रहते हैं, तो भी वे हर समय शैतान के फंदे में रह रहे होते हैं, और ख़तरों से भरे क्षेत्र में रह रहे होते हैं जिसमें उन पर शैतान द्वारा आक्रमण और दुर्व्यवहार किया जाता है—मगर वे नहीं जानते भय क्या है, और अविचलित रहते हैं। चल क्या रहा है? परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास केवल उन चीज़ों तक ही सीमित है जिन्हें वह देख सकता है। उसमें मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेम और सरोकार की, या मनुष्य के प्रति उसकी सहृदयता और सोच-विचार की रत्ती भर भी सराहना नहीं है। यदि परमेश्वर की परीक्षाओं, न्याय और ताड़ना, तथा प्रताप और कोप के प्रति थोड़ी-सी घबराहट और डर को छोड़ दें, तो मनुष्य को परमेश्वर के अच्छे अभिप्रायों की रत्ती भर भी समझ नहीं है। परीक्षाओं का उल्लेख होने पर, लोगों को लगता है मानो परमेश्वर के छिपे हुए इरादे हैं, और कुछ तो यह तक मानते हैं कि परमेश्वर बुरे षडयंत्रों को प्रश्रय देता है, इस बात से अनभिज्ञ कि परमेश्वर वास्तव में उनके साथ क्या करेगा; इस प्रकार, परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारिता के बारे में चीखने-चिल्लाने के साथ-साथ, वे मनुष्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता और मनुष्य के लिए उसकी व्यवस्थाओं को रोकने और उनका विरोध करने के लिए जो कुछ कर सकते हैं सब करते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि यदि वे सावधान नहीं रहे तो उन्हें परमेश्वर द्वारा गुमराह कर दिया जाएगा, कि यदि वे अपने भाग्य पर पकड़ नहीं बनाए रखते हैं तो जो कुछ उनके पास है वह सब परमेश्वर द्वारा ले लिया जा सकता है, और यहाँ तक कि उनका जीवन भी समाप्त किया जा सकता है। मनुष्य शैतान के खेमे में है, परंतु वह शैतान द्वारा दुर्व्यवहार किए जाने की कभी चिंता नहीं करता है, और उसके साथ शैतान द्वारा दुर्व्यवहार किया जाता है परंतु वह शैतान द्वारा बंधक बनाए जाने से भी कभी नहीं डरता है। वह कहता रहता है कि वह परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करता है, मगर उसने परमेश्वर में कभी भरोसा नहीं किया है या विश्वास नहीं किया है कि परमेश्वर सचमुच मनुष्य को शैतान के पंजों से बचाएगा। यदि, अय्यूब के समान, मनुष्य परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर पाता है, और अपना संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर के हाथों में सौंप सकता है, तो क्या मनुष्य का अंत अय्यूब के समान ही नहीं होगा—परमेश्वर के आशीषों की प्राप्ति? यदि मनुष्य परमेश्वर का शासन स्वीकार और उसके प्रति समर्पण कर पाता है, तो इसमें खोने के लिए क्या है? इस प्रकार, मैं सुझाव देता हूँ कि तुम लोग अपने कार्यकलापों में सावधान रहो, और उस सब के प्रति चौकन्ने रहो जो तुम लोगों पर आने ही वाला है। तुम लोग उतावले या आवेगी न बनो, और परमेश्वर तथा लोगों, विषयों, और वस्तुओं के साथ, जिनकी उसने तुम लोगों के लिए व्यवस्था की है, अपने गर्म खून या अपनी स्वाभाविकता पर निर्भर करते हुए, या अपनी कल्पनाओं और अवधारणाओं के अनुसार व्यवहार मत करो; परमेश्वर के कोप को भड़काने से बचने के लिए, तुम लोगों को अपने कार्यकलापों में सचेत होना ही चाहिए, और अधिक प्रार्थना तथा खोज करनी चाहिए। यह याद रखो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

कुछ लोग, अपनी भ्रष्टता के प्रकट होते ही सोचते हैं, "एक बार फिर, मैंने परमेश्वर का विरोध किया है; मैंने कई सालों से उस पर विश्वास किया है, लेकिन मैं अब भी नहीं बदला हूँ। परमेश्वर निश्चित रूप से अब मुझे पसंद नहीं करता है!" यह किस तरह का रवैया है? उन लोगों ने खुद से उम्मीद छोड़ दी है, और वे सोचते हैं कि अब परमेश्वर उन्हें नहीं चाहता है। क्या यह परमेश्वर को गलत समझने वाली बात नहीं है? जब तुम इतना नकारात्मक होते हो तो, शैतान के लिये तुम्हें नुकसान पहुंचाना सबसे आसान होता है, और एक बार वह कामयाब हो गया, तो परिणामों की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए, चाहे तुम कितनी ही बड़ी मुश्किल में क्यों न हो या चाहे तुम कितना भी निराश क्यों न महसूस करते हो, तुम्हें कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिये! जीवन में प्रगति की प्रक्रिया में और बचाये जाते समय, लोग कभी-कभी गलत मार्ग चुन लेते हैं या पथभ्रष्ट हो जाते हैं। वे कुछ समय के लिए अपने जीवन में कुछ अपरिपक्वता दिखाते हैं, या कभी-कभी कमज़ोर या नकारात्मक हो जाते हैं, गलत बातें कहते हैं, फिसल जाते हैं और गिरते हैं, या असफलता का सामना करते हैं। परमेश्वर के दृष्टिकोण से, ऐसी बातें सामान्य हैं, और वह इन बातों का बतंगड़ नहीं बनाएगा। यह देखकर कि वे कितने गंभीर रूप से भ्रष्ट हैं, कि वे परमेश्वर को कभी भी संतुष्ट नहीं कर पाएंगे, कुछ लोगों के हृदय में पीड़ा होती है और जिन लोगों को ऐसा पश्चाताप होता है, वे अक्सर परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य होते हैं। जिन लोगों को उद्धार की आवश्यकता महसूस नहीं होती, जिन्हें लगता है कि वे पहले से ही पूर्ण हैं, उन्हें परमेश्वर द्वारा बचाया नहीं जाएगा। मैं तुम्हें यह क्यों बता रहा हूँ? मेरे कहने का मतलब यह है कि तुम्हारे अंदर आस्था होनी चाहिएः "इस तथ्य के बावजूद कि मैं अब कमज़ोर हो गया हूँ, पतित हो गया हूँ और असफल हो चुका हूँ, एक न एक दिन मैं उठूँगा और परमेश्वर को संतुष्ट कर पाऊँगा, सत्य को समझूँगा और बचा लिया जाऊँगा।" तुम्हारे अंदर यह आस्था होनी चाहिए। चाहे जो भी बाधाएं, परेशानियाँ आएं या असफलताएं और पराजय हाथ लगे, तुम्हें निराश नहीं होना चाहिए; तुम्हें यह जानना चाहिए कि किस प्रकार के लोग परमेश्वर द्वारा बचाए जाते हैं। इसके अलावा, यदि तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर के उद्धार के अयोग्य हो, यदि तुम्हें कभी-कभार ऐसा महसूस होने लगे कि परमेश्वर तुमसे घृणा करता है या तुमसे नाराज़ है या अतीत में कभी ऐसा हो चुका है कि तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण रूप से अस्वीकार या खारिज कर दिया गया है, तो चिंता न करो। तुम यह बात तुम्हें पता है, इसलिए बहुत देर नहीं हुई है; यदि तुम पश्चाताप करोगे, तो परमेश्वर तुम्हें उद्धार का अवसर प्रदान करेगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर में आस्था के लिए सर्वाधिक आवश्यक है जीवन में प्रवेश' से उद्धृत

जिन कुछ लोगों ने थोड़ा आज्ञा का उल्लंघन किया है, वे अनुमान लगायेंगे: क्या परमेश्वर मुझे समाप्त कर देंगे? इस बार परमेश्वर लोगों को समाप्त करने नहीं, बल्कि यथासम्भव उनकी रक्षा करने आये हैं। गलतियां किससे नहीं होतीं? यदि सभी को समाप्त कर दिया जायेगा तो फिर इसे उद्धार कैसे कहेंगे? कुछ आज्ञालंघन जान-बूझकर किये जाते हैं और कुछ अनजाने में हो जाते हैं। अनजाने में हुये मामलों में, पहचानने के बाद आप उन्हें बदल सकते हैं, तो क्या परमेश्वर बदलने से पहले ही आपको समाप्त कर देंगे? क्या ऐसे ही परमेश्वर लोगों की रक्षा करते हैं? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है! इससे कोई अंतर नहीं पडता कि आज्ञा का उल्लंघन अनजाने में हुआ है कि विद्रोही स्वभाव के कारण, केवल इतना याद रखें: शीघ्रता करें और वास्तविकता को पहचानें! आगे बढने का प्रयास करें; हालात कुछ भी हों, आप आगे बढने का प्रयास करें। परमेश्वर लोगों की रक्षा करने के कार्य में लगे हैं और वह जिनकी रक्षा करना चाहते हैं उन्हें अंधाधुंध तरीके से कैसे मार देंगे? आपके अंदर चाहे कितना भी परिवर्तन आया हो, अंत में अगर परमेश्वर ने आपको समाप्त भी कर दिया तो उनका वह निर्णय धर्मितापूर्ण होगा; जब वह समय आयेगा तो वह आपको समझने का अवसर देंगे। लेकिन इस समय आपका दायित्व है कि आगे बढ़ने का प्रयास करें, रूपांतरण की कोशिश में लग जायें और परमेश्वर को संतुष्ट करने की कामना करें; आपको केवल परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ही अपना दायित्व निभाते रहने की चिंता करनी चाहिये। और इसमें कोई दोष नहीं है! अंतत:, परमेश्वर आपके साथ जैसा चाहें बर्ताव करें, वह हमेशा न्यायसंगत ही होता है; आपको इस पर न तो संदेह करना चाहिये और न ही इसकी चिंता करनी चाहिये; भले ही परमेश्वर की धर्मिता अभी आपकी समझ से बाहर हो, लेकिन वह दिन आयेगा जब आप पूरी तरह से आश्वस्त हो जायेंगे। परमेश्वर किसी सरकारी अधिकारी या राक्षसों के सम्राट की तरह बिल्कुल नहीं है! यदि आप गौर से इस पहलू को समझने की कोशिश करेंगे तो आप दृढ़ता से विश्वास करने लगेंगे कि परमेश्वर का कार्य लोगों की रक्षा करना और उनके स्वभाव को रूपांतरित करना है। चूंकि यह लोगों के स्वभाव के रूपांतरण का कार्य है, यदि लोग अपने स्वभाव को प्रकट नहीं करेंगे, तो कुछ नहीं किया जा सकता और फिर परिणाम भी कुछ नहीं निकलेगा। लेकिन एक बार अपना स्वभाव प्रकट करने के बाद, पुरानी आदतें जारी रखना कष्टकर होगा, यह प्रबंधन आदेश की अवमानना होगी और परमेश्वर इससे अप्रसन्न होंगे। परमेश्वर अलग-अलग स्तर के दंड का विधान करेंगे और आपको आज्ञा के उल्लंघन की कीमत चुकानी होगी। कभी-कभी आप अनजाने में भ्रष्ट आचरण करने लगते हैं, तो परमेश्वर आपको आगाह करते हैं, आपको सुधारते हैं, आपसे व्यवहार करते हैं; अगर आप अच्छा करते हैं तो परमेश्वर आपको उत्तरदायी नहीं ठहरायेंगे। यह रूपांतरण की सामान्य प्रक्रिया है; इस प्रक्रिया में उद्धार का कार्य सही मायनों में अभिव्यक्त होता है। यही कुंजी है!

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा है कि यथासंभव लोगों की रक्षा की जाये' से उद्धृत

शुरुआत से ही, मैंने अक्सर तुम लोगों को जताया है कि तुम में से प्रत्येक को सत्य की तलाश करनी चाहिए। जब तक ऐसा करने का मौका हो, तब तक हार मत मानो; सत्य की तलाश करना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व, ज़िम्मेदारी और कर्तव्य है, और यह वो मार्ग है जिस पर प्रत्येक व्यक्ति को चलना चाहिए, साथ ही साथ यह वो मार्ग है जिस पर उन सभी को जिन्हें बचाया जाएगा, चलना चाहिए। फिर भी कोई इस ओर ध्यान नहीं देता है—कोई भी इसे अर्थपूर्ण मुद्दा नहीं मानता है, इसे एक कुभाषा के रूप में माना जाता है, प्रत्येक व्यक्ति अपने ही ढंग से सोचता है। यही कारण है कि शुरू से लेकर आज तक, हालाँकि कई ऐसे भी रहे हैं जो अपने हाथों में परमेश्वर के वचनों की किताबें थामे रहते हैं और उन्हें पढ़ते हैं, जो उपदेश सुनते हैं, जिन सभी ने अपने कर्तव्यों को पूरा करने के दौरान न्याय और ताड़ना को स्वीकार किया है, और जो परमेश्वर के मार्गदर्शन को स्वीकार करते हैं, फिर भी इंसान और परमेश्वर के बीच कोई भी संबंध वास्तव में स्थापित नहीं किया गया है, और सभी लोग अपनी ही कल्पनाओं, अवधारणाओं, गलतफ़हमियों और अटकलों द्वारा निर्देशित होते हैं, जिससे कि वे प्रत्येक दिन इस संदेह और नकारात्मकता में रहते हैं कि वे परमेश्वर के वचनों और कार्य, साथ ही उसके मार्गदर्शन, के प्रति कैसा व्यवहार करें। यदि तुम ऐसी स्थितियों में रहते हो, तो तुम नकारात्मकता को कैसे दूर कर सकते हो? तुम अक्खड़पन को कैसे दूर कर सकते हो? तुम छल और बुराई की मानसिकता और रवैये को, या उन अटकलों और ग़लतफहमियों को जिनके साथ तुम परमेश्वर द्वारा दिए गए आदेश और कर्तव्य के प्रति व्यवहार करते हो, कैसे दूर करोगे? निश्चित रूप से, उन्हें दूर नहीं किया जा सकता है। इसलिए, यदि तुम सत्य की तलाश और अभ्यास करने और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने के मार्ग पर चलना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के सामने तुरंत आना चाहिए, उससे प्रार्थना करनी चाहिए, और उसकी इच्छा को समझने का—और यह निर्धारित कर लेने का कि उसकी इच्छा ही सबसे ज़्यादा मायने रखती है, प्रयास करना चाहिए। तुम्हें ऐसा करना ही चाहिए, बजाय इसके कि तुम अपने दिनों को अपने दिमाग के विचारों और ख़यालों में ही जीने में बीता दो, लगातार यह अचरज करते हुए: मैं क्या सोच रहा हूँ? मैं क्या चाहता हूँ? मेरे पास किस तरह की ग़लतफहमियाँ और अवधारणाएँ हैं? मैं किन चीज़ों में परमेश्वर से सवाल करता हूँ? परमेश्वर ने ऐसा क्या किया है जिसने मुझे कष्ट पहुँचाया है, या मुझे दुखी किया है, या जो मुझ में उठती अटकलों और संदेहों का कारण बना है? यदि तुम इन चीज़ों पर विचार करने में पूरे दिन व्यस्त रहते हो, तो क्या तुम सत्य को समझ पाओगे? जितना आगे तुम इस रास्ते पर चलोगे, परमेश्वर के बारे में तुम्हारी ग़लतफहमियाँ उतनी ही गहरी होती जाएँगी और उससे तुम्हारा रिश्ता उतना ही दूर का होता जाएगा; यह कहा जा सकता है कि तुम जितना अधिक आगे बढ़ोगे, उतने ही बुरे कर्म और अपराध तुम्हारे पास जमा होते जाएँगे। हो सकता है कि तुम अपने कर्तव्यों का पालन तो करते हो, लेकिन यह करते समय, तुम्हारे कर्तव्य और ज़िम्मेदारियों के प्रति तुम्हारा रवैया लापरवाह, उदासीन, प्रतिरोधी और विद्रोही होता है, यहाँ तक ​​कि बेपरवाह, असम्मानपूर्ण भी। अंततः इसका परिणाम क्या होगा? इसका परिणाम यह होगा कि, ऐसे समय में जब तुम कष्ट उठाते और अपना कर्तव्य निभाते हो, तुम्हें सत्य हासिल नहीं हुआ होगा, न ही तुम इसे हासिल कर सकोगे और न ही सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर सकोगे। इस परिणाम को उत्पन्न करने वाला कारण क्या है? वो यह है कि लोगों के दिलों में परमेश्वर के बारे में अवधारणाएँ और गलतफहमियाँ होती हैं—इन व्यावहारिक समस्याओं का समाधान नहीं किया गया है। इस प्रकार हमेशा इंसान और परमेश्वर के बीच एक खाई होती है। इसलिए, यदि इंसान परमेश्वर के सामने आना चाहता है, तो उसे पहले उन ग़लतफ़हमियों को दूर करना होगा, साथ ही उन अवधारणाओं, सवालों, अटकलों और कल्पनाओं को भी, जो परमेश्वर के प्रति अभी भी उसके पास हैं। उसे अपने आप में इन बातों की जाँच करनी चाहिए। यदि किसी को वास्तव में परमेश्वर के बारे में अवधारणाएँ या गलतफहमियाँ हैं, तो यह एक साधारण समस्या नहीं है। यदि उस व्यक्ति ने सत्य को हासिल नहीं किया है और वह सत्य की तलाश करके अपनी अवधारणाओं और ग़लतफ़हमियों को हल नहीं करता है, तो ये चीज़ें स्वयं ही गायब नहीं हों जाएँगी। यद्यपि, हो सकता है कि, वे तुम्हारे कर्तव्य के पालन या सच्चाई के अनुसरण को प्रभावित न करें, पर जब तुम कुछ मामलों या विशेष परिस्थितियों का सामना करते हो, तो वे पुनः प्रकट होंगी, और तब तक ऐसा करती रहेंगी जब तक कि तुम उन्हें हल नहीं कर लेते। आत्म-चिंतन में रहते हुए परमेश्वर के सामने आना मुख्यतः परमेश्वर के प्रति इंसान की ग़लतफ़हमियों और अवधारणाओं को हल करने का एक जरिया होता है, और जैसे-जैसे प्रत्येक मुद्दे को हल किया जाता है, परमेश्वर के साथ इंसान का संबंध थोड़ा अधिक सामान्य होने लगता है, और इंसान का जीवन परिपक्वता की ओर एक कदम बढ़ाता है। एक बार जब कोई अपनी अनेक अवधारणाओं और गलतफहमियों को हल कर लेता है, तो उसके और परमेश्वर के बीच की खाई काफ़ी छोटी हो जाती है, और परमेश्वर में उसकी आस्था बढ़ जाती है—और गहरी आस्था के साथ, बहुत कम चीज़ें किसी के सत्य के अभ्यास में मिलावट करती हैं, और सत्य की तलाश में बहुत कम मिलावटें और अड़चनें होती हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज से ही परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है' से उद्धृत

कभी-कभी, परमेश्वर तुम्हें उजागर करने या तुम्हें अनुशासित करने के लिए किसी निश्चित मामले का उपयोग करता है। क्या इसका मतलब यह है कि तुम्हें हटा दिया गया है? क्या इसका मतलब यह है कि तुम्हारा अंत आ गया है? नहीं। यह ऐसी बात है कि मानो किसी बच्चे ने अवज्ञा की है और उसने ग़लती की है; उसके माता-पिता उसे सुना सकते और उसे दंडित कर सकते हैं, लेकिन अगर बच्चा अपने माता-पिता के इरादे को समझ नहीं सकता है या वो यह नहीं समझ पाता है कि वे उसके साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं, तो वह हैरान होने लगेगा कि क्या वह वास्तव में उनकी जैविक संतान है। माता-पिता के द्वारा ये काम करने के पीछे वास्तविक कारण क्या था? वे काम इसलिए किए गए थे कि तुम अपना सबक सीखो, और मुख्य रूप से इसलिए कि भविष्य में तुम उनकी बातों को गंभीरता से लो, जो तुम्हें बताया जाए वो तुम करो, उनकी सलाह के अनुसार आचरण करो, और ऐसा कुछ भी न करो जो उनकी अवज्ञा करता हो या उनकी चिंता का कारण बनता हो, और तब उन्होंने वांछित प्रभाव प्राप्त कर लिया होगा। यदि तुमने अपने माता-पिता की बात सुनी है, तो क्या तुम प्रगति नहीं करोगे? और क्या यह उन्हें चिंता करने से बचा नहीं लेगा? क्या तब वे तुमसे संतुष्ट नहीं होंगे? क्या उन्हें अब भी तुम्हें इस तरह से दंडित करने की आवश्यकता होगी? इस प्रकार, कई मामलों में, (उन) लोगों की चिंता (हमारे) अपने हितों से ही उपजती है। आम तौर पर, यह भय होता है कि उनका कोई परिणाम नहीं होगा: "यदि संयोग से, परमेश्वर मुझे उजागर करता है और मुझे हटा देता है, और मुझे अस्वीकार करता है, तो ऐसा कुछ भी नहीं होगा जो मैं कर सकता हूँ; अगर वह कहता है कि वह मुझे नहीं चाहता है, तो बस वह मुझे नहीं चाहता है।" यह तुम्हारे द्वारा परमात्मा को ग़लत समझना है; ये केवल तुम्हारे अपने विचार हैं। तुम्हें पता लगाना होगा कि परमेश्वर का इरादा क्या है। लोगों को उजागर करने में परमेश्वर का इरादा उन्हें हटाना नहीं, बल्कि उन्हें उन्नत बनाना है। इतना ही नहीं, कभी-कभी तुम सोचते हो कि तुम्हें उजागर किया जा रहा है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता। अक्सर, क्योंकि लोगों की क्षमता कम है और वे सत्य को नहीं समझते हैं, साथ ही, उनका स्वभाव अभिमानी है, वे खुद का दिखावा करना पसंद करते हैं, उनके पास एक विद्रोही स्वभाव है, वे बेईमान, लापरवाह, और उदासीन हैं, वे अपना काम खराब तरीके से करते हैं, और अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाते। दूसरी ओर, कभी-कभी तुम उन सिद्धांतों को याद नहीं रखते हो जो तुम्हें सिखाये गये हैं, तुम उन्हें एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकल जाने देते हो। तुम वही काम करते हो जिससे तुम्हें खुशी मिलती है, दूसरों के साथ ज़्यादा संगति करने से पहले काम कर देते हो और अपने तुम एक कानून बन जाते हो। तुम जो करते हो उसका कोई बड़ा असर नहीं पड़ने वाला और यह सिद्धांत के विपरीत जाता है। इस मामले में, तुम्हें अनुशासित होना चाहिये—लेकिन यह कैसे कहा जा सकता है कि तुम्हें हटा दिया गया है। तुम्हें इसे सही तरीके से देखना चाहिए। इसे देखने का सही तरीका क्या है? उन मामलों में, जहां तुम सत्य को नहीं समझते, तुम्हें इसकी खोज करनी चाहिये। यह सिर्फ़ एक सिद्धांत की समझ की खोज करना नहीं है। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिये, और परमेश्वर का परिवार कोई काम कैसे करता है इसके पीछे का सिद्धांत तुम्हें समझना चाहिए। सिद्धांत क्या है? सिद्धांत कोई मत नहीं है। इसके कई मानदंड हैं, और तुम्हें ऐसे मामलों के लिए कार्य की व्यवस्थाओं पर किये गये आख़िरी फैसले को जानना चाहिये, ऐसे काम को करने के संबंध में ऊपर से क्या आदेश दिया गया है, इस तरह के कर्तव्य को पूरा करने के बारे में परमेश्वर के वचन क्या कहते हैं, और परमेश्वर की इच्छा को कैसे संतुष्ट किया जाये। परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के क्या मानदंड हैं? सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना। व्यापक निर्देश परमेश्वर के परिवार के हितों को और परमेश्वर के परिवार के कार्य को सबसे पहले रखना है। इससे भी स्पष्ट बात यह है कि सभी पहलुओं में, कोई बड़ी समस्या नहीं होनी चाहिये, और परमेश्वर पर कोई शर्मिंदगी की बात पड़ने नहीं देनी चाहिये। अगर लोग इन सिद्धांतों में महारत हासिल कर लेते हैं, तो क्या उनकी चिंताएं धीरे-धीरे कम हो जाएंगी? और क्या उनकी गलतफहमियां भी कम हो जाएंगी? एक बार जब तुम अपनी गलतफहमियों को दूर कर लेते हो और परमेश्वर के बारे में कोई अनुचित विचार नहीं रखते हो, तो नकारात्मक चीज़ें धीरे-धीरे तुम्हारे अंदर प्रभुत्व की स्थिति में नहीं रह जाएंगी, और तुम ऐसे मामलों पर सही तरीके से गौर करोगे। इस प्रकार, सत्य की खोज करना और परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश करना महत्वपूर्ण है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्‍वर के वचनों पर अमल कर के ही स्‍वभाव में बदलाव हो सकता है' से उद्धृत

यदि कोई समस्या तुम पर आ पड़ती है और तुम सत्य की तलाश कर सकते हो, तो तुम सत्य के एक पहलू को समझ सकते हो और सत्य के उस पहलू को प्राप्त कर सकते हो। सत्य को समझने से क्या हासिल हो सकता है? जब तुम सत्य के एक पहलू को समझते हो, तो तुम परमेश्वर की इच्छा के एक पहलू को समझ लेते हो, और तुम यह समझ लेते हो कि परमेश्वर ने तुम्हारे पास इस चीज़ को क्यों आने दिया, क्यों वह तुमसे ऐसी माँग करेगा, क्यों वह तुम्हें इस तरह से ताड़ना देने और अनुशासित करने के लिए परिस्थितियों का आयोजन करेगा, क्यों वह तुम्हें अनुशासित करने के लिए इस मामले का उपयोग करेगा, और क्यों तुम इस मामले में गिरे, असफल हुए, और उजागर किए गए हो। यदि तुम इन चीज़ों को समझ सकते हो, तो तुम सत्य की तलाश करने में सक्षम होंगे और जीवन-प्रवेश हासिल करोगे। यदि तुम इन चीज़ों को नहीं समझ सकते और इन तथ्यों को स्वीकार नहीं करते, बल्कि विरोध और प्रतिरोध पर, खुद की गलतियों पर पर्दा डालने के लिए अपनी ही तरकीबों का उपयोग करने पर, एक झूठे चेहरे के साथ अन्य सभी का और परमेश्वर का सामना करने पर, ज़ोर देते हो, तो तुम सत्य को हासिल करने में हमेशा असमर्थ रहोगे।

यदि तुम्हारे पास ईमानदारी का और सत्य को स्वीकार करने का एक रवैया है; यदि तुम इन मामलों के साथ एक ऐसे नज़रिए के साथ व्यवहार करते हो जो सत्य के प्रति समर्पित हो और उससे प्रेम करता हो, चाहे वह सहन करने में कितना भी कठिन और तुम्हारी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाला क्यों न हो; यदि तुम परमेश्वर के सामने उन मामलों की तलाश करने और उन्हें स्वीकार करने आते हो, और उन्हें स्वीकार करते समय तुम निरंतर विश्लेषण करते हो और तुम जो करते और जो प्रकट करते हो, उस पर और अपने इरादों पर चिंतन करते हो, तो तुम प्रगति करोगे और सत्य को तुम्हारे में कार्यरत किया जाएगा। और जब इन समस्याओं का समाधान हो जाता है, और किसी मुद्दे का सामना करते समय तुम्हारा रवैया, नज़रिया, और तुम्हारी स्थिति सकारात्मकता की ओर बढ़ते हैं, तो क्या तब भी तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई खाई होगी? अगर हो भी तो, वह छोटी होती जाएगी, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारे प्रश्न, साथ ही साथ तुम्हारी अटकलें, गलतफहमियाँ, शिकायतें, विद्रोह, और प्रतिरोध, कम होने लगेंगे। जब ये चीज़ें कम होने लगती हैं, तब, किसी चीज़ के तुम पर आ पड़ने पर, तुम अधिक शांत रहोगे; तुम स्थिर होने लगोगे और अभ्यास के सही मार्ग की तलाश करोगे। यदि, जब भी कोई घटना तुम्हारे साथ होती है, तुम चिंतित होते हो, और तुम सच्चाई की ज़रा भी तलाश किए बिना, हमेशा इंसान के तरीकों का उपयोग करना चाहते हो, तो यह परेशानी वाली बात होगी। तुम अवश्य ही इसे संभालने के लिए इंसान के तरीकों पर भरोसा करोगे—यह पहली प्रतिक्रिया है जो किसी व्यक्ति के दिमाग में आती है, और इसलिए फिसलन भरे तरीके, "चालाक" तकनीकें और जीने के दर्शन आ जाते हैं। ऐसे लोग हैं जिन्हें इन चीज़ों ने लंबे समय से सताया है, जो खुद को सच्चाई की ओर कभी नहीं ले जाते हैं, बजाय इसके वे लगातार सोचते हैं कि इंसान की तकनीकों को कैसे लागू किया जाए; वे इतने लंबे समय तक संघर्ष करते हैं कि वे थकान से कुम्हला जाते हैं। बहुत दयनीय होता है इंसान जब वह सत्य का अभ्यास या उसकी तलाश नहीं करता है। हालाँकि, अब तुम अपना कर्तव्य स्वेच्छा से निभा सकते हो, और तुम स्वेच्छा से बलिदान कर सकते और खुद को खपा सकते हो, फिर भी यदि तुम्हारी ग़लतफ़हमियाँ, अटकलें, संदेह, या परमेश्वर के प्रति शिकायतें, या यहाँ तक कि तुम्हारा विद्रोह और प्रतिरोध भी, अभी हल नहीं हुए हैं, यदि परमेश्वर का विरोध करने और तुम पर उसकी संप्रभुता को अस्वीकार करने के लिए तुम्हारे द्वारा उपयोग में लाये गए विभिन्न तरीकों और तकनीकों का समाधान नहीं होता है, तो तुम्हारे में सत्य का शासन होना लगभग असंभव होगा, और तुम्हारा जीवन थकाऊ होगा। लोग इन नकारात्मक अवस्थाओं में अक्सर संघर्ष करते और उत्पीड़ित होते हैं, यहाँ-वहाँ छटपटाते हैं मानो वे एक दलदल में डूब गए हों, हमेशा सच और झूठ, सही और ग़लत के बीच रहते हुए। वे सत्य की तलाश कैसे कर सकते हैं? सत्य की तलाश करने के लिए, पहले व्यक्ति को समर्पण करना होगा। अनुभव की एक अवधि के बाद, वे कुछ परिणाम देख सकेंगे, जिस बिंदु पर सच्चाई को समझना आसान होता है। अगर कोई हमेशा सही और गलत का निर्णय करने की कोशिश करता रहता है और सच और झूठ का भेद करने में उलझा रहता है, तो उसके पास सच्चाई की तलाश करने या उसे समझने का कोई तरीका नहीं होता है। और अगर कोई सत्य को कभी नहीं समझ सकता है, तो इसका क्या परिणाम होगा? सत्य को न समझना ग़लतफ़हमियों को जन्म देता है; ग़लतफ़हमियों के साथ, व्यथित महसूस करना आसान होता है; जब शिकायतें फूटकर सामने आती हैं, तो वे प्रतिरोध बन जाती हैं; प्रतिरोध तुरंत ही अपराध में बदल जाता है; और कई अपराध शीघ्र ही विविध बुराइयों में बदल जाते हैं, और तब उस व्यक्ति को दंडित किया जाना चाहिए। यह वो परिणाम है जो इसमें से आ सकता है। तो, सत्य की तलाश का अर्थ केवल यह नहीं है कि तुम अपने कर्तव्यों का अच्छी तरह से पालन करो, आज्ञाकारी बनो, नियमानुसार व्यवहार करो, भक्तिपूर्ण दिखो, या संत की तरह सुशोभित रहो। यह केवल ऐसे मुद्दों को हल करने के लिए नहीं, बल्कि सभी तरह के उन ग़लत विचारों को हल करने के लिए होता है जिनके अनुसार तुम परमेश्वर के साथ व्यवहार करते हो। सत्य को समझने का उद्देश्य इंसान के भ्रष्ट स्वभावों को हल करना होता है; जब उन भ्रष्ट स्वभावों को सुलझा लिया जाता है, तो इंसान को परमेश्वर के बारे में ग़लतफ़हमियाँ नहीं होंगी, और इंसान और परमेश्वर के बीच का संबंध धीरे-धीरे सुधरेगा और तेजी से सामान्य होता जाएगा। इसलिए, जब एक बार किसी भ्रष्ट स्वभाव का समाधान हो जाता है, तो परमेश्वर के बारे में इंसान के भय, संदेह, ग़लतफ़हमियाँ, सवालात, और शिकायतें, साथ ही साथ उसका प्रतिरोध और यहाँ तक कि उसके द्वारा परमेश्वर की परीक्षा, सभी को धीरे-धीरे हल कर दिया जाएगा। जब किसी भ्रष्ट स्वभाव को हल किया जाता है तो इसकी त्वरित अभिव्यक्ति क्या होती है? (परमेश्वर के प्रति इंसान का दृष्टिकोण बदल जाता है।) परमेश्वर के बारे में इंसान का प्रत्येक नज़रिया किन तरीकों से प्रकट होता है? वे नज़रिए तुम्हारे साथ होती हर घटना में, उस घटना के प्रति तुम्हारे व्यवहार में, उसके प्रति तुम्हारे रवैये में, तुम्हारी पहली प्रतिक्रिया में, और तुम्हारी अवस्था में, प्रकट होते हैं। तुम्हारे रवैये को क्या निर्धारित करता है? यह इस बात से तय होता है कि क्या इस मामले में तुम्हारे पास सच्चाई है, क्या तुमने सच्चाई की तलाश की है, क्या तुम सच्चाई को हासिल करना चाहते हो, और क्या तुम सच्चाई को समझते हो। इंसान और परमेश्वर के बीच एक सुधरा हुआ संबंध किस तरह से प्रकट होता है? यह इस बात से प्रकट होता है कि तुम दैनिक जीवन में लोगों, घटनाओं, और तुम्हारे सामने आने वाली चीज़ों, के साथ कैसा व्यवहार करते हो। क्या इसमें कर्तव्य का पालन शामिल है? (यह शामिल है।) यही वो रिश्ता होता है। यही कारण है कि सत्य का अभ्यास और अनुसरण करना अत्यंत महत्व का होता है! यदि तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते हो, फिर भी तुम परमेश्वर के संबंध में तुम्हारी अवधारणाओं, शिकायतों और ग़लतफ़हमियों की समस्या को हल करना चाहते हो, तो क्या तुम कर पाओगे? कुछ लोग होते हैं जो कहते हैं कि वे सरल विचारों के हैं और इसलिए उनमें ये विचार उत्पन्न नहीं होते हैं। क्या वे इसे हासिल करने में सक्षम हैं? क्या एक भ्रष्ट स्वभाव सोचने से आता है? यह सोचने से नहीं आता है—यह इंसान का जीवन होता है, और इंसान जीने के लिए इस पर निर्भर करता है। इसकी जड़ें इंसान के भीतर होती हैं और यह इंसान का सार होता है। इंसान के पास इसे मिटाने या हटाने के लिए कोई साधन नहीं होता है। केवल सच्चाई का उपयोग करके ही इन चीज़ों को हल किया जा सकता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज से ही परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है' से उद्धृत

जब लोग परमेश्वर को नहीं समझते और उसके स्वभाव को नहीं जानते, तो उनका हृदय परमेश्वर के लिए वास्तव में कभी नहीं खुल सकता। जब वे परमेश्वर को समझ जाते हैं, तो वे रुचि और विश्वास के साथ जो कुछ परमेश्वर के हृदय में है, उसकी सराहना करना और उसका स्वाद लेना आरंभ कर देते हैं। जब तुम जो परमेश्वर के हृदय में है, उसकी सराहना करने और उसका स्वाद लेने लगोगे, तो तुम्हारा हृदय धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा करके, उसके लिए खुलता जाएगा। जब तुम्हारा हृदय उसके लिए खुल जाएगा, तो तुम्हें महसूस होगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारे लेन-देन, परमेश्वर से तुम्हारी माँगें और तुम्हारी अपनी अनावश्यक अभिलाषाएँ कितनी शर्मनाक और घृणित थीं। जब तुम्हारा हृदय वास्तव में परमेश्वर के लिए खुल जाएगा, तो तुम देखोगे कि उसका हृदय एक असीमित संसार है, और तुम एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करोगे, जिसे तुमने पहले कभी अनुभव नहीं किया है। इस क्षेत्र में कोई छल-कपट नहीं है, कोई धोखेबाज़ी नहीं है, कोई अंधकार नहीं है और कोई बुराई नहीं है। वहाँ केवल ईमानदारी और विश्वसनीयता है; केवल प्रकाश और सत्यपरायणता है; केवल धार्मिकता और दयालुता है। वह प्रेम और परवाह से भरा हुआ है, अनुकंपा और सहनशीलता से भरा हुआ है, और उसके माध्यम से तुम जीवित होने की प्रसन्नता और आनंद महसूस करोगे। ये वे चीज़ें हैं, जिन्हें परमेश्वर तुम्हारे लिए तब प्रकट करेगा, जब तुम अपना हृदय उसके लिए खोलोगे। यह असीमित संसार परमेश्वर की बुद्धि से और उसकी सर्वशक्तिमत्ता से भरा हुआ है; यह उसके प्रेम और अधिकार से भी भरा हुआ है। यहाँ तुम परमेश्वर के स्वरूप के हर पहलू को देख सकते हो, कि किस बात से वह आनंदित होता है, क्यों वह चिंता करता है और क्यों उदास होता है, और क्यों वह क्रोधित होता है...। हर व्यक्ति, जो अपने हृदय को खोलता है और परमेश्वर को भीतर आने देता है, इसे अनुभव कर सकता है। परमेश्वर केवल तभी तुम्हारे हृदय में आ सकता है, जब तुम अपना हृदय उसके लिए खोल देते हो। तुम केवल तभी परमेश्वर के स्वरूप को देख सकते हो, केवल तभी अपने लिए उसके इरादे देख सकते हो, जब वह तुम्हारे हृदय के भीतर आ गया होता है। उस समय तुम्हें पता चलेगा कि परमेश्वर से संबंधित हर चीज़ कितनी बहुमूल्य है, कि उसका स्वरूप कितना सँजोकर रखने लायक है। उसकी तुलना में तुम्हें घेरे रहने वाले लोग, तुम्हारे जीवन की वस्तुएँ और घटनाएँ, यहाँ तक कि तुम्हारे प्रियजन, तुम्हारा जीवनसाथी, और वे चीज़ें जिनसे तुम प्रेम करते हो, वे शायद ही उल्लेखनीय हों। वे इतने छोटे हैं, और इतने निम्न हैं; तुम महसूस करोगे कि कोई भौतिक पदार्थ फिर कभी तुम्हें आकर्षित करने में सक्षम नहीं होगा, या कोई भौतिक पदार्थ तुम्हें फिर कभी अपने लिए कोई कीमत चुकाने हेतु फुसला नहीं सकेगा। परमेश्वर की विनम्रता में तुम उसकी महानता और उसकी सर्वोच्चता देखोगे। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के कुछ कर्मों में, जिन्हें तुम पहले काफी छोटा समझते थे, तुम उसकी असीमित बुद्धि और उसकी सहनशीलता देखोगे, और तुम उसका धैर्य, उसकी सहनशीलता और अपने बारे में उसकी समझ देखोगे। यह तुममें उसके लिए श्रद्धा उत्पन्न करेगा। उस दिन तुम्हें लगेगा कि मानवजाति कितने गंदे संसार में रह रही है, कि तुम्हारे आसपास रहने वाले लोग और तुम्हारे जीवन में घटित होने वाली घटनाएँ, यहाँ तक कि जिनसे तुम प्रेम करते हो, तुम्हारे प्रति उनका प्रेम और उनकी तथाकथित सुरक्षा या तुम्हारे लिए उनकी चिंता भी उल्लेखनीय तक नहीं हैं—केवल परमेश्वर ही तुम्हारा प्रिय है, और केवल परमेश्वर ही है जिसे तुम सबसे ज़्यादा सँजोते हो। जब वह दिन आएगा, तो मैं मानता हूँ कि कुछ लोग होंगे जो कहेंगे : परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और उसका सार बहुत पवित्र है—परमेश्वर में कोई धोखा नहीं है, कोई बुराई नहीं है, कोई ईर्ष्या नहीं है, और कोई कलह नहीं है, बल्कि केवल धार्मिकता और प्रामाणिकता है, और मनुष्यों को परमेश्वर के स्वरूप की हर चीज़ की लालसा करनी चाहिए। मनुष्यों को उसके लिए प्रयास करना चाहिए और उसकी आकांक्षा करनी चाहिए। किस आधार पर मानवजाति की इसे प्राप्त करने की योग्यता निर्मित होती है? वह मनुष्यों की परमेश्वर के स्वभाव की समझ, और उनकी परमेश्वर के सार की समझ के आधार पर निर्मित होती है। इसलिए परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझना प्रत्येक व्यक्ति के लिए जीवनभर की शिक्षा है; और यह हर उस व्यक्ति के द्वारा अनुसरण किया जाने वाला एक जीवनभर का लक्ष्य है, जो अपने स्वभाव को बदलने का प्रयास करता है, और परमेश्वर को जानने का प्रयास करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

पिछला: 56. धारणाओं और कल्‍पनाओं से निपटने के सिद्धान्‍त

अगला: 58. कलीसिया का जीवन जीने के सिद्धान्‍त

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

संबंधित सामग्री

775 तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास

1समझना चाहिये तुम्हें कितना बहुमूल्य है आज कार्य परमेश्वर का।जानते नहीं ये बात ज़्यादातर लोग, सोचते हैं कि पीड़ा है बेकार:अपने विश्वास के...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें