53. अहंकार और दंभ में सुधार लाने के सिद्धांत

(1) परमेश्‍वर के न्‍याय और ताड़ना को स्‍वीकार करना, और अपनी भ्रष्‍टता के घिनौने सत्‍य को देख पाने में सक्षम होना आवश्‍यक है। इस तरह, व्‍यक्ति को पता चलता है कि वे किस तरह के लोग हैं।

(2) यह आवश्‍यक है कि जब व्‍यक्ति की काट-छाँट की जा रही हो और उसके साथ निपटा जा रहा हो, साथ ही जब उसकी परीक्षा ली जा रही हो और उसे उजागर किया जा रहा हो, तो वह उसे स्‍वीकार करे, और यह देख सकने में सक्षम हो कि वह कितना कमजोर है। इस तरह व्‍यक्ति को अपनी सच्ची दिलेरी का पता चलता है।

(3) कई विफलताओं और कठिनाइयों का अनुभव कर लेने और अपने अहंकारी होने के मूल कारण को समझ लेने के बाद व्यक्ति स्‍वाभाविक ही काफी बेहतर आचरण करने लगता है, और उसके तौर-तरीके काफी नियंत्रित हो जाते हैं।

(4) परमेश्‍वर के न्‍याय और ताड़ना को भुगतना, उसके धार्मिक स्‍वभाव को जानना, और उसके प्रति श्रद्धा उत्‍पन्न करना आवश्‍यक है। इस तरह लोग अच्छा आचरण करने लगते हैं।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

शैतान ने जब मनुष्यों को भ्रष्ट कर दिया, तो उनकी प्रकृति शैतानी हो गई। मनुष्य होते हुए भी लोगों ने मनुष्य की तरह बर्ताव करना बंद कर दिया है; बल्कि, वे मानवता के ओहदे को पार कर गए हैं। वे इंसान होने की इच्छा नहीं रखते; वे अब और ऊँचे स्तर की आकांक्षा करते हैं। और यह ऊँचा स्तर क्या है? वे परमेश्वर से बढ़कर होना चाहते हैं, स्वर्ग से बढ़कर होना चाहते हैं, और बाकी सभी से बढ़कर होना चाहते हैं। लोग इस तरह क्यों हो गए हैं, इसका मूल कारण क्या है? कुल मिलाकर यही नतीजा निकलता है कि मनुष्य की प्रकृति बहुत अधिक अहंकारी है। "अहंकारी" एक अपमानजनक शब्द है, और कोई भी इसे अपने साथ जोड़ा जाना पसंद नहीं करता। पर तथ्य यह है कि हर कोई अहंकारी है, और सभी भ्रष्ट मनुष्यों का यही सार है। कुछ लोग कहते हैं, "मैं जरा भी अहंकारी नहीं हूँ। मैंने कभी भी महादूत नहीं बनना चाहा, न ही मैंने कभी परमेश्वर से या दूसरों से ऊंचा उठना चाहा है। मैं हमेशा एक ऐसा व्यक्ति रहा हूँ जो शिष्ट और कर्तव्यनिष्ठ है।" कोई जरूरी नहीं है; ये शब्द गलत हैं। जब लोगों की प्रकृति और सार अहंकारी हो जाते हैं, तो वे ऐसी चीजें करने के काबिल हो जाते हैं जो परमेश्वर की अवज्ञा और विरोध करती हैं, उसके वचनों को ध्यान में रखे बिना चीजें करते हैं, ऐसी चीजें करते हैँ जो परमेश्वर के बारे में धारणाएं उत्पन्न करती हैं, जो उसका विरोध करती हैं, और जो उस व्यक्ति का उत्कर्ष करती हैं और उस व्यक्ति की गवाही देती हैं। तुम्हारा कहना है कि तुम अहंकारी नहीं हो, लेकिन मान लो कि तुम्हें कई कलीसियाओं को चलाने और उनकी अगुआई करने की ज़िम्मेदारी दी जाती है; मान लो कि मैं तुम्हारे साथ नहीं निपटता हूँ, और परमेश्वर के परिवार के किसी सदस्य ने तुम्हारी कांट-छांट नहीं की : थोड़ी देर उनका नेतृत्व करने के बाद, तुम उन्हें अपने पैरों पर गिरा लोगे और अपने सामने समर्पण करवाने लगोगे। और तुम ऐसा क्यों करोगे? यह तुम्हारी प्रकृति द्वारा निर्धारित होगा; यह स्वाभाविक प्रकटीकरण के अलावा और कुछ नहीं होगा। इसे सीखने के लिए तुम्हें दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, और न ही दूसरों से यह कहने की ज़रूरत है कि वे तुम्हें सिखाएं। तुम्हें इनमें से कुछ भी जानबूझकर करने की आवश्यकता नहीं है। इस तरह की स्थिति स्वाभाविक रूप से तुम्हारे सामने आएगी : तुम लोगों से अपने सामने समर्पण करवाओगे, उनसे अपनी आराधना करवाओगे, अपनी प्रशंसा करवाओगे, अपनी गवाही दिलवाओगे, उनसे अपनी सभी बातें मनवाओगे, और उन्हें अपने अधिकार क्षेत्र से दूर नहीं जाने दोगे। तुम्हारे नेतृत्व में, ऐसी स्थितियाँ स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती हैं। और ये हालात कैसे आते हैं? ये मनुष्य की अहंकारी प्रकृति से निर्धारित होते हैं। अहंकार की अभिव्यक्ति परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और उसका विरोध है। जब लोग अहंकारी, दंभी और आत्मतुष्ट होते हैं, तो उनकी अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने और इच्छानुसार चीज़ों को करने की प्रवृत्ति होती है। वे दूसरों को भी अपनी ओर खींचकर उन्हें अपने आलिंगन में ले लेते हैं। लोगों का ऐसी हरकतें करने का अर्थ है कि उनके अहंकार का सार महादूत जैसा ही बन गया है। जब उनका अहंकार और दंभ एक निश्चित स्तर पर पहुँच जाता है, तो इससे यह तय हो जाता है कि वे महादूत हैं और वे परमेश्वर को दरकिनार कर देंगे। यदि तुम्हारा स्वभाव ऐसा ही अहंकारी है, तो तुम्हारे हृदय में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अहंकारी स्वभाव ही परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध की जड़ है' से उद्धृत

अहंकार मनुष्‍य के भ्रष्‍ट स्‍वभाव की जड़ है। लोग जितने ही ज्‍़यादा अहंकारी होते हैं, उतनी ही अधिक संभावना होती है कि वे परमेश्‍वर का प्रतिरोध करेंगे। यह समस्‍या कितनी गम्‍भीर है? अहंकारी स्‍वभाव के लोग न केवल बाकी सभी को अपने से नीचा मानते हैं, बल्कि, सबसे बुरा यह है कि वे परमेश्‍वर को भी हेय दृष्टि से देखते हैं। भले ही कुछ लोग, बाहरी तौर पर, परमेश्‍वर में विश्‍वास करते और उसका अनुसरण करते दिखायी दें, तब भी वे उसे परमेश्‍वर क़तई नहीं मानते। उन्‍हें हमेशा लगता है कि उनके पास सत्‍य है और वे अपने बारे में बहुत ऊँचा सोचते हैं। यही अहंकारी स्वभाव का सार और जड़ है और इसका स्रोत शैतान में है। इसलिए, अहंकार की समस्‍या का समाधान अनिवार्य है। यह भावना कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ—एक तुच्‍छ मसला है। महत्‍वपूर्ण बात यह है कि एक व्‍यक्ति का अहंकारी स्‍वभाव उसको परमेश्‍वर के प्रति, उसके विधान और उसकी व्‍यवस्‍था के प्रति समर्पण करने से रोकता है; इस तरह का व्‍यक्ति हमेशा दूसरों पर सत्‍ता स्‍थापित करने की ख़ातिर परमेश्‍वर से होड़ करने की ओर प्रवृत्‍त होता है। इस तरह का व्‍यक्ति परमेश्‍वर में तनिक भी श्रद्धा नहीं रखता, परमेश्‍वर से प्रेम करना या उसके प्रति समर्पण करना तो दूर की बात है। जो लोग अहंकारी और दंभी होते हैं, खास तौर से वे, जो इतने घमंडी होते हैं कि अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं, वे परमेश्वर पर अपने विश्वास में उसके प्रति समर्पित नहीं हो पाते, यहाँ तक कि बढ़-बढ़कर खुद के लिए गवाही देते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करते हैं। यदि लोग परमेश्वर का आदर करने की स्थिति में पहुँचना चाहते हैं, तो पहले उन्हें अपने अहंकारी स्वभावों का समाधान करना होगा। जितना अधिक तुम अपने अहंकारी स्वभाव का समाधान करोगे, उतना अधिक आदर तुम्हारे भीतर परमेश्वर के लिए होगा, और केवल तभी तुम उसके प्रति समर्पित हो सकते हो, सत्य को प्राप्त कर सकते हो और उसे जान सकते हो।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

अगर तुम्हारे भीतर वाकई सत्य है, तो जिस मार्ग पर तुम चलते हो वह स्वाभाविक रूप से सही मार्ग होगा। सत्य के बिना, बुरे काम करना आसान है और तुम यह अपनी मर्जी के बिना करोगे। उदाहरण के लिए, यदि तुम्हारे भीतर अहंकार और दंभ मौजूद हुआ, तो तुम परमेश्वर की अवहेलना करने से खुद को रोकना असंभव पाओगे; तुम्हें महसूस होगा कि तुम उसकी अवहेलना करने के लिए मज़बूर किये गये हो। तुम ऐसा जानबूझ कर नहीं करोगे; तुम ऐसा अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करोगे। तुम्हारे अहंकार और दंभ के कारण तुम परमेश्वर को तुच्छ समझोगे और उसे ऐसे देखोगे जैसे कि उसका कोई महत्व ही न हो, वे तुमसे स्वयं की प्रशंसा करवाने की वजह होंगे, निरंतर तुमको दिखावे में रखवाएंगे और अंततः परमेश्वर के स्थान पर बैठाएंगे और स्वयं के लिए गवाही दिलवाएंगे। अंत में तुम आराधना किए जाने हेतु सत्य में अपने स्वयं के विचार, अपनी सोच, और अपनी स्वयं की धारणाएँ बदल लोगे। देखो लोग अपनी उद्दंडता और अहंकारी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन कितनी बुराई करते हैं! अपने बुरे कर्मों के समाधान के लिए, पहले उन्हें अपनी प्रकृति की समस्या को हल करना होगा। स्वभाव में बदलाव किए बिना, इस समस्या का मौलिक समाधान हासिल करना संभव नहीं है। जब तुम्हें परमेश्वर की कुछ समझ होगी, जब तुम अपनी भ्रष्टता को देख सकोगे, अहंकार और दंभ की कुरूपता और घिनौनेपन को पहचान सकोगे, तब तुम नफरत, घृणा और व्यथा को महसूस करोगे। तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपनी इच्छा से कुछ काम करने में सक्षम होगे और ऐसा करने में तुम्हें सुकून महसूस होगा। तुम अपनी इच्छा से परमेश्वर के लिए गवाही देने में सक्षम होगे और ऐसा करने में तुम खुशी महसूस करोगे। तुम अपनी इच्छा से अपने आपको बेनकाब करोगे, अपनी खुद की कुरूपता को उजागर करोगे और ऐसा करके तुम अंदर से अच्छा महसूस करोगे और तुम अपने आपको बेहतर मानसिक स्थिति में महसूस करोगे। इसलिये, अपने स्वभाव में बदलाव लाने की कोशिश का पहला चरण परमेश्वर के वचनों को समझने की कोशिश करना और सत्य में प्रवेश करना है। केवल सत्य को समझकर ही तुम्हारे अंदर विवेक आएगा; केवल विवेक से ही तुम चीज़ों को पूरी तरह समझ पाओगे; चीज़ों को पूरी तरह समझकर ही तुम देह की इच्छाओं का त्याग कर सकते हो और परमेश्वर में अपने विश्वास के साथ तुम कदम-दर-कदम सही मार्ग पर आगे बढ़ पाओगे। यह इस बात से जुड़ा है कि सत्य का अनुसरण करते समय लोग कितने दृढ़ होते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

कुछ लोग विशेष रूप से पौलुस को आदर्श मानते हैं। उन्हें बाहर जा कर भाषण देना और कार्य करना पसंद होता है, उन्हें सभाओं में भाग लेना और प्रचार करना पसंद होता है; उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उन्हें सुनते हैं, उनकी आराधना करते हैं और उनके चारों ओर घूमते हैं। उन्हें पसंद होता है कि दूसरों के मन में उनकी एक हैसियत हो, और जब दूसरे उनके द्वारा प्रदर्शित छवि को महत्व देते हैं, तो वे उसकी सराहना करते हैं। आओ हम इन व्यवहारों से उनकी प्रकृति का विश्लेषण करें: उनकी प्रकृति कैसी है? यदि वे वास्तव में इस तरह से व्यवहार करते हैं, तो यह इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि वे अहंकारी और दंभी हैं। वे परमेश्वर की आराधना तो बिल्कुल नहीं करते हैं; वे ऊँची हैसियत की तलाश में रहते हैं और दूसरों पर अधिकार रखना चाहते हैं, उन पर अपना कब्ज़ा रखना चाहते हैं, उनके दिमाग में एक हैसियत प्राप्त करना चाहते हैं। यह शैतान की विशेष छवि है। उनकी प्रकृति के पहलू जो अलग से दिखाई देते हैं, वे हैं उनका अहंकार और दंभ, परेमश्वर की आराधना करने की अनिच्छा, और दूसरों के द्वारा आराधना किए जाने की इच्छा। ऐसे व्यवहारों से तुम उनकी प्रकृति को स्पष्ट रूप से देख सकते हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

कुछ लोग कहते हैं कि उनका स्वभाव भ्रष्ट नहीं है, कि वे अभिमानी नहीं हैं। ये कौन-से लोग हैं? वे सबसे अहंकारी लोग हैं। वास्तव में, वे किसी से भी अधिक अभिमानी और विद्रोही हैं; जो व्यक्ति जितना अधिक यह कहता है कि वह भ्रष्ट नहीं है, वह उतना ही अधिक अभिमानी और आत्म-संतुष्ट होता है। दूसरे लोग खुद को क्यों जान पाते हैं और अपनी स्थिति का अनुमान लगा पाते हैं, और तुम क्यों ऐसा नहीं कर पाते? क्या तुम कोई अपवाद हो? कोई संत हो? क्या तुम शून्य में रहते हो? तुम यह स्वीकार नहीं करते कि मानवजाति को शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया है, कि लोगों का स्वभाव भ्रष्ट है, और इसलिए तुम सबसे अधिक विद्रोही और अभिमानी हो। तुम्हारे अनुसार दुनिया में बहुत सारे लोग अच्छे हैं—तो यह दुनिया अंधकार से क्यों भरी है, गंदगी और भ्रष्टाचार से क्यों भरी है, संघर्ष से क्यों भरी है? मनुष्य की दुनिया में हर कोई एक-दूसरे से छीना-झपटी क्यों करता है? परमेश्वर में विश्वास रखने वाले भी कुछ अलग नहीं हैं : वे भी हमेशा एक-दूसरे से लड़ाई-झगड़ा करते रहते हैं। और इस कलह का जन्म कहाँ से होता है? अहंकार से। संक्षेप में, यह अहंकार से अविभाज्य है, जो मनुष्य के भ्रष्टाचार का सार है; यह मनुष्य की प्रकृति के अहंकार और विद्रोहशीलता का उद्गार है। ऐसा क्यों होता है कि लोग परमेश्वर में विश्वास तो रखते हैं, फिर भी सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ होते हैं? ऐसा क्यों होता है कि वे परमेश्वर में विश्वास तो रखते हैं, फिर भी वे परमेश्वर के साथ तालमेल नहीं रख पाते? यह भी लोगों की अहंकारी प्रकृति से ही निर्धारित होता है। मानवजाति हमेशा से ही परमेश्वर का प्रतिरोध और उससे विद्रोह करती रही है, और यह कोई परमेश्वर के अन्याय के कारण नहीं है, यह इसलिए नहीं है कि परमेश्वर में सत्य की कमी है, बल्कि इसलिए है कि मनुष्य को शैतान द्वारा बहुत अधिक भ्रष्ट कर दिया गया है, और मनुष्य बहुत अहंकारी है, उसे बहुत कम समझ है, वह सत्य को बिलकुल स्वीकार नहीं करता, और इसीलिए मनुष्य कभी भी परमेश्वर के अनुकूल नहीं हो सकता, वह हमेशा परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा होता है, और परमेश्वर से असहमत होता है। मनुष्य और परमेश्वर का संबंध अब किस मुकाम पर आ पहुँचा है? मनुष्य परमेश्वर का शत्रु बन गया है, परमेश्वर का विरोधी बन गया है। परमेश्वर मनुष्य को बचाने और उजागर करने के लिए सत्य व्यक्त करता है, लेकिन मनुष्य उसे स्वीकार नहीं करता और उस पर कोई ध्यान नहीं देता। परमेश्वर मनुष्य से जो करने को कहता है, वह मनुष्य नहीं करता; बल्कि मनुष्य वह करता है, जो परमेश्वर को वीभत्स और घृणित लगता है। परमेश्वर सत्य है, फिर मनुष्य उसे अस्वीकार करता है। परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का न्याय करता है और उसे ताड़ना देता है, फिर भी मनुष्य उसे पहचान नहीं पाता। इंसान कितना अहंकारी है? पहले ऐसे लोग थे, जो कहते रहते थे कि वे राजा की तरह राज करेंगे। यह अहंकार का लक्षण है, यह मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव है। परमेश्वर ने मनुष्य को बचाने के लिए देहधारण किया, लेकिन परमेश्वर की अगवानी करने के बदले में लोग उससे जीने के लिए खर्च, पुरस्कार, आशीर्वाद माँगने लगे, यहाँ तक कि वे उसकी अगवानी करने के बारे में डींगें मारने लगे और कहने लगे कि वे तो परमेश्वर के प्रिय हैं, ताकि लोग उन्हें आदर से देखें। कुछ लोग तो स्पष्ट रूप से इस बात को जानते थे कि उन्होंने परमेश्वर की अगवानी की है, फिर भी उन्होंने बदले में कलीसियाओं से पैसे माँगे। ये अभिमानी लोग कहते हैं कि उनका स्वभाव भ्रष्ट नहीं है, और कि उनका विश्वास अन्य लोगों से श्रेष्ठतर है, कि परमेश्वर के प्रति उनका समर्पण दूसरों से अधिक है और वे दूसरों से बेहतर कार्य करते हैं। क्या तुम वास्तव में इतना अच्छा कार्य करते हो? यदि तुम वास्तव में अच्छे हो, तो फिर अहंकार से भरे कार्य क्यों करते हो? तुम मानवोचित कार्य करने में सक्षम क्यों नहीं हो? तुम्हारे अंदर थोड़ी-सी भी इंसानियत क्यों नहीं है? लोगों में इस हद तक अहंकार है कि उन्हें सब-कुछ चाहिए, लेकिन उन्हें परमेश्वर नहीं चाहिए, वे हर नीच और घृणित काम करेंगे, लेकिन वे परमेश्वर की आराधना और आज्ञापालन नहीं करेंगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अहंकारी स्वभाव ही परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध की जड़ है' से उद्धृत

अगुआओं के रूप में सेवा करने वाले कुछ लोग हमेशा अलग होने की कोशिश करना चाहते हैं, बाकी सब से बेहतर होना चाहते हैं, और कुछ नई तरकीबें पाना चाहते हैं, जो परमेश्वर को यह दिखा सकें कि वे वास्तव में कितने सक्षम हैं। लेकिन वे सत्य को समझने और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते; हमेशा दिखावा करने की कोशिश करते हैं। क्या यह ठीक एक अहंकारी प्रकृति का प्रकटन नहीं है? कुछ तो यह भी कहते हैं : "अगर मैं ऐसा करता हूँ, तो मुझे विश्वास है कि इससे परमेश्वर बहुत प्रसन्न होगा; वह वास्तव में इसे पसंद करेगा। इस बार मैं परमेश्वर को दिखा दूँगा, मैं उसे एक अच्छा आश्चर्य दूँगा।" इस "आश्चर्य" के परिणामस्वरूप, वे पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हैं और परमेश्वर द्वारा हटा दिए जाते हैं। जो भी तुम्हारे मन में आए, उसे उतावलेपन से न करो। यदि तुम अपने कार्यों के परिणामों पर विचार नहीं करते, तो चीजें ठीक कैसे हो सकती हैं? जब तुम परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करते हो और उसके प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करते हो, और बाद में हटा दिए जाते हो, तो तुम्हारे पास कहने के लिए कुछ नहीं बचेगा। चाहे तुम्हारी मंशा कुछ भी हो और चाहेतुम ऐसा जानबूझकर करते हो या अनजाने में, यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव और उसकी इच्छा को नहीं समझते, तो तुम उसे आसानी अपमानित कर दोगे और उसके प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन कर बैठोगे; यह ऐसी चीज है, जिसे लेकर प्रत्येक को सतर्क रहना चाहिए। जब तुम ईश्वर के प्रशासनिक आदेशों का गंभीरता से उल्लंघन कर देते हो या परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित कर देते हो, तो परमेश्वर यह विचार नहीं करेगा कि तुमने यह जानबूझकर किया या अनजाने में। यह एक ऐसा मामला है, जिसे तुम्हें स्पष्ट रूप से देखने की आवश्यकता है। यदि तुम इस मुद्दे को समझ नहीं कर सकते, तो तुम्हारा समस्याएँ पैदा करना निश्चित है। परमेश्वर की सेवा करने में लोग अच्छी प्रगति करना, अच्छी चीजें करना, अच्छी बातें बोलना, अच्छे कार्य करना, अच्छी बैठकें आयोजित करना और अच्छे अगुआ बनना चाहते हैं। यदि तुम हमेशा ऐसी उच्च महत्वाकांक्षाएँ रखते हो, तो तुम परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करोगे; जो लोग ऐसा करते हैं, वे शीघ्र ही मर जाएँगे। यदि तुम परमेश्वर की सेवा में सदाचारी, धर्मनिष्ठ और विवेकशील नहीं हो, तो तुम देर-सबेर उसके स्वभाव का अपमान कर दोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य से रहित होकर कोई परमेश्वर को नाराज़ करने का भागी होता है' से उद्धृत

किसी भी व्यक्ति को स्वयं को पूर्ण या प्रतिष्ठित और कुलीन या दूसरों से भिन्न नहीं समझना चाहिए; यह सब मनुष्य के अभिमानी स्वभाव और अज्ञानता से उत्पन्न होता है। हमेशा अपने तुम को विशिष्ट समझना—यह एक अभिमानी स्वभाव है; कभी भी अपनी कमी को स्वीकार नहीं कर पाना, और कभी भी अपनी भूलों एवं असफलताओं का सामना नहीं कर पाना—अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; वह कभी भी दूसरों को अपने से ऊँचा नहीं होने देता है, या अपने से बेहतर नहीं होने देता है—ऐसा उसके अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; दूसरों को खुद से श्रेष्ठ या ताकतवर न होने देना—यह एक अहंकारी स्वभाव के कारण होता है; कभी दूसरों को किसी भी विषय पर अपने से बेहतर विचार, सुझाव और दृष्टिकोण न रखने देना, और, ऐसा होने पर नकारात्मक हो जाना, बोलने की इच्छा न रखना, व्यथित और निराश महसूस करना, तथा परेशान हो जाना—ये सभी चीजें उसके अभिमानी स्वभाव के ही कारण होती हैं। अभिमानी स्वभाव तुमको अपनी प्रतिष्ठा को सँजोने वाला बना सकता है, दूसरों के मार्गदर्शन को स्वीकार करने, अपनी कमियों का सामना करने, तथा अपनी असफलताओं और गलतियों को स्वीकार करने में असमर्थ बना सकता है। इसके अतिरिक्त, जब कोई व्यक्ति तुमसे बेहतर होता है, तो यह तुम्हारे दिल में उस व्यक्ति के प्रति घृणा और जलन पैदा कर सकता है, और तुम स्वयं को विवश महसूस कर सकते हो, कुछ इस तरह कि अब तुम्हारे कर्तव्य निभाना नहीं चाहते और इसे करने में लापरवाह हो जाते हो। अभिमानी स्वभाव के कारण तुम्हारे अंदर ये व्यवहार और आदतें उत्पन्न हो जाती हैं। यदि तुम लोग थोड़ा-थोड़ा करके इन सभी चीजों में अंर्तदृष्टि हासिल करने में सक्षम हो जाते हो, और इनकी समझ विकसित कर लेते हो, तथा इनकी गहराई में उतरते हो; इसके बाद अगर तुम धीरे-धीरे इन विचारों तथा समझ तथा यहाँ तक कि इन व्यवहारों को त्यागने में सक्षम हो जाते हो, और इनसे विवश नहीं होते हो; और यदि अपना कर्तव्य पालन करते समय तुम अपने लिए सही पद प्राप्त करने में सक्षम हो जाते हो, तथा सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हो, एवं उस कर्तव्य का निर्वाह करते हो जो तुम कर सकते हो तथा जो तुम्हें करना चाहिए; तो कुछ समय के बाद, तुम अपने कर्तव्यों का बेहतर ढंग से निर्वाह करने में सक्षम हो जाओगे। यह सत्य-वास्तविकता में प्रवेश है। यदि तुम सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर पाते हो, तो दूसरों को प्रतीत होगा कि तुममें मानवीय समानता है, और लोग कहेंगे, "यह व्यक्ति अपने पद के अनुसार आचरण करता है, और वो अपना कर्तव्य बुनियादी तरीके से निभा रहा है। ऐसे लोग अपना कर्तव्य निभाने में स्वाभाविकता पर, जोश पर, या अपने भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव पर भरोसा नहीं करते। वे संयम से कार्य करते हैं, उनके पास एक दिल है जो परमेश्वर को पूजता है, उन्हें सत्य से प्यार है, और उनके व्यवहार और भावों से यह पता चलता है कि उन्होंने अपने सुखों और प्राथमिकताओं का त्याग कर दिया है।" ऐसा आचरण करना कितना अद्भुत है! ऐसे अवसर पर जब दूसरे तुम्हारी कमियों को सामने लाते हैं, तो तुम न केवल उन्हें स्वीकार करने में सक्षम होते हो, बल्कि तुम आशावादी हो तथा अपनी कमियों एवं दोषों का आत्मविश्वास के साथ सामना करते हो। तुम्हारी मनोस्थिति बिल्कुल सामान्य है, एवं अत्याधिकता और जोशीलेपन से मुक्त है। क्या मानवीय समानता का होना यही नहीं होता? केवल ऐसे लोगों में ही अच्छी समझ होती है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'व्यक्ति के आचरण का मार्गदर्शन करने वाले सिद्धांत' से उद्धृत

लोग अपना स्वभाव स्वयं परिवर्तित नहीं कर सकते; उन्हें परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना, पीड़ा और शोधन से गुजरना होगा, या उसके वचनों द्वारा निपटाया, अनुशासित किया जाना और काँटा-छाँटा जाना होगा। इन सब के बाद ही वे परमेश्वर के प्रति विश्वसनीयता और आज्ञाकारिता प्राप्त कर सकते हैं और उसके प्रति बेपरवाह होना बंद कर सकते हैं। परमेश्वर के वचनों के शोधन के द्वारा ही मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन आ सकता है। केवल उसके वचनों के संपर्क में आने से, उनके न्याय, अनुशासन और निपटारे से, वे कभी लापरवाह नहीं होंगे, बल्कि शांत और संयमित बनेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे परमेश्वर के मौजूदा वचनों और उसके कार्यों का पालन करने में सक्षम होते हैं, भले ही यह मनुष्य की धारणाओं से परे हो, वे इन धारणाओं को नज़रअंदाज करके अपनी इच्छा से पालन कर सकते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं' से उद्धृत

जब तुम थोड़ी सी बाधा या कठिनाई से पीड़ित होते हो, तो ये तुम लोगों के लिए अच्छा है; यदि तुम लोगों को एक मौज करने का समय दिया गया होता, तो तुम लोग बर्बाद हो जाते, और तब तुम्हारी रक्षा कैसे की जाती? आज तुम लोगों को इसलिए सुरक्षा दी जाती है क्योंकि तुम लोगों को दंडित किया जाता है, शाप दिया जाता है, तुम लोगों का न्याय किया जाता है। क्योंकि तुम लोगों ने काफी कष्ट उठाया है इसलिए तुम्हें संरक्षण दिया जाता है। नहीं तो, तुम लोग बहुत समय पहले ही दुराचार में गिर गए होते। यह जानबूझ कर तुम लोगों के लिए चीज़ों को मुश्किल बनाना नहीं है—मनुष्य की प्रकृति को बदलना मुश्किल है, और उनके स्वभाव को बदलना भी ऐसा ही है। आज, तुम लोगों के पास वो समझ भी नहीं है जो पौलुस के पास थी, और न ही तुम लोगों के पास उसका आत्म-बोध है। तुम लोगों की आत्माओं को जगाने के लिए तुम लोगों पर हमेशा दबाव डालना पड़ता है, और तुम लोगों को हमेशा ताड़ना देनी पड़ती है और तुम्हारा न्याय करना पड़ता है। ताड़ना और न्याय ही वह चीज़ हैं जो तुम लोगों के जीवन के लिए सर्वोत्तम हैं। और जब आवश्यक हो, तो तुम पर आ पड़ने वाले तथ्यों की ताड़ना भी होनी ही चाहिए; केवल तभी तुम लोग पूरी तरह से समर्पण करोगे। तुम लोगों की प्रकृतियाँ ऐसी हैं कि ताड़ना और शाप के बिना, तुम लोग अपने सिरों को झुकाने और समर्पण करने के अनिच्छुक होगे। तुम लोगों की आँखों के सामने तथ्यों के बिना, तुम पर कोई प्रभाव नहीं होगा। तुम लोग चरित्र से बहुत नीच और बेकार हो। ताड़ना और न्याय के बिना, तुम लोगों पर विजय प्राप्त करना कठिन होगा, और तुम लोगों की अधार्मिकता और अवज्ञा को जीतना मुश्किल होगा। तुम लोगों का पुराना स्वभाव बहुत गहरी जड़ें जमाए हुए है। यदि तुम लोगों को सिंहासन पर बिठा दिया जाए, तो तुम लोगों को स्वर्ग की ऊँचाई और पृथ्वी की गहराई के बारे में कोई अंदाज़ न हो, तुम लोग किस ओर जा रहे हो इसके बारे में तो बिल्कुल भी अंदाज़ा न हो। यहाँ तक कि तुम लोगों को यह भी नहीं पता कि तुम सब कहाँ से आए हो, तो तुम लोग सृष्टि के प्रभु को कैसे जान सकते हो? आज की समयोचित ताड़ना और शाप के बिना तुम लोगों के अंतिम दिन बहुत पहले आ चुके होते। तुम लोगों के भाग्य के बारे में तो कुछ कहना ही नहीं—क्या यह और भी निकटस्थ खतरे की बात नहीं है? इस समयोचित ताड़ना और न्याय के बिना, कौन जाने कि तुम लोग कितने घमंडी हो गए होते, और कौन जाने तुम लोग कितने पथभ्रष्ट हो जाते। इस ताड़ना और न्याय ने तुम लोगों को आज के दिन तक पहुँचाया है, और इन्होंने तुम लोगों के अस्तित्व को संरक्षित रखा है। जिन तरीकों से तुम लोगों के "पिता" को "शिक्षित" किया गया था, यदि उन्हीं तरीकों से तुम लोगों को भी "शिक्षित" किया जाता, तो कौन जाने तुम लोग किस क्षेत्र में प्रवेश करते! तुम लोगों के पास स्वयं को नियंत्रित करने और आत्म-चिंतन करने की बिलकुल कोई योग्यता नहीं है। तुम जैसे लोग, अगर कोई हस्तक्षेप या गड़बड़ी किए बगैर मात्र अनुसरण करें, आज्ञापालन करें, तो मेरे उद्देश्य पूरे हो जाएंगे। क्या तुम लोगों के लिए बेहतर नहीं होगा कि तुम आज की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करो? तुम लोगों के पास और क्या विकल्प हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (6)' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा इंसानों पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद, उनमें समझदारी का जो बुनियादी गुण होना चाहिए वह है अहंकार के साथ बात न करने का ध्यान रखना। उन्हें अपना रुतबा बहुत छोटा समझना चाहिए, "जमीन पर पड़े गोबर के समान," और ऐसी बातें कहनी चाहिए जो सत्य हों। विशेष रूप से परमेश्वर की गवाही देते हुए, अगर तुम कोई खोखली या बड़ी बात किए बगैर, कोई काल्पनिक झूठ बोले बगैर, अपने हृदय से कोई गहरी बात कह सकते हो, तो फिर तुम्हारा स्वभाव बदल चुका होगा, और परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाने के बाद तुममें यही बदलाव आना चाहिए। अगर तुम इतनी भी समझदारी नहीं रख सकते हो, तो तुम्हारे अंदर एक मनुष्य जैसी कोई बात नहीं है। भविष्य में जब सभी राष्ट्र और क्षेत्र परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाएँगे, तो परमेश्वर के गुणगान के लिए एकत्र भारी भीड़ में तुम्हारे द्वारा फिर से अहंकारपूर्वक कार्य करना आरंभ कर देने परतुम हटाकर फेंक दिए जाओगे। इसके बाद तुम्हें हमेशा उचित ढंग से व्यवहार करना चाहिए, अपनी हैसियत और स्थिति को पहचानना चाहिए, और अपने पुराने रंग-ढंग में नहीं लौटना चाहिए। शैतान की छवि सबसे मुखर ढंग से मानव के अहंकार और दंभ में प्रकट होती है। अपने इस पहलू को बदले बगैर, तुम कभी भी एक मनुष्य जैसे नहीं हो सकते और हमेशा शैतान का चेहरा धारण किए रहोगे। इस विषय में मात्र ज्ञान होना पूर्ण परिवर्तन हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। तुम्हें तब भी बहुत सारे सुधारों से गुजरना होगा। बगैर किसी निपटान और काट-छांट के, दीर्घकाल में, तुम फिर भी खतरे में घिरे रहोगे। भविष्य में, जब परमेश्वर के चुने हुए लोग अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करेंगे और कहेंगे, "हमें बहुत पहले ही प्रबुद्ध किया गया है कि परमेश्वर ने चीन में विजेताओं का एक समूह प्राप्त कर लिया है," और जब तुम लोग यह सुनोगे, तो तुम सोचोगे : "हमारे पास शेखी बघारने के लिए कुछ नहीं है, सब-कुछ परमेश्वर के अनुग्रह से दिया गया है। हम विजेता कहलाने के योग्य नहीं हैं।" लेकिन समय के साथ जब तुम स्वयं को कुछ कहने के लिए सक्षम होते देखना शुरू करते हो, और यह सुनना शुरू करते हो कि यहाँ-वहाँ के परदेसी प्रबुद्धता प्राप्त कर रहे हैं, तो तुम विचार करोगे : "पवित्र आत्मा ऐसे ही प्रबुद्धता प्रदान करता है, हम परदेसियों से कहीं अधिक जानते हैं, इसलिए हमें विजेता माना जाना चाहिए!" अब तुम अपने हृदय में इस स्वीकृति को चुपचाप अनुमति दे दोगे, और निस्संदेह बाद में सार्वजनिक स्वीकृति दोगे। मनुष्य प्रशंसा किए जाने और हैसियत द्वारा परीक्षा लिए जाने पर टिक नहीं पाते। अगर तुम्हारी हमेशा प्रशंसा की जाती है, तो तुम खतरे में हो। जिन लोगों का स्वभाव नहीं बदला, वे दृढ़ नहीं रह सकते।

अपने पुराने रंग-ढंग में वापस लौटने से बचने के लिए पहले तुम्हें यह पहचानना चाहिए कि तुम्हारा स्वभाव अभी तक बदला नहीं है और परमेश्वर से विश्वासघात करने की तुम्हारी प्रकृति अभी भी तुम्हारे भीतर गहरी जड़ें जमाए हुए है। तुम अभी भी परमेश्वर से विश्वासघात करने के बड़े खतरे में हो और तुम विनाश की संभावना का निरंतर सामना कर रहे हो। तीन अन्य प्रमुख बिंदु हैं : पहला, तुम अभी भी परमेश्वर को नहीं जान पाए हो; दूसरा, तुम्हारा स्वभाव नहीं बदला है; तीसरा, तुम्हें अभी भी इंसानियत प्राप्त करना बाकी है, और अच्छे लोगों में तुम सबसे निचले पायदान पर हो। हर किसी को इन बिंदुओं की स्पष्ट समझ होनी चाहिए। लोगों को इस आदर्श वाक्य के साथ तैयार रहना चाहिए, और इसे खुदवा या लिखवा लेना चाहिए : "मैं दानव हूँ," या "मैं अकसर अपने पुराने रंग-ढंग में लौट जाता हूँ," या "मैं हमेशा खतरे में रहता हूँ," या "मैं जमीन पर पड़ा हुआ गोबर हूँ।" शायद इस आदर्श वाक्य से स्वयं को लगातार प्रोत्साहित करते रहने का कुछ प्रभाव पड़े, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम्हें परमेश्वर के वचनों को अधिक पढ़ना होगा और अपनी प्रकृति को समझना होगा। केवल वास्तविक बदलाव हासिल करके ही तुम सुरक्षित होगे। दूसरी चीज यह है कि कभी भी ऐसे व्यक्ति का स्थान न लो, जो परमेश्वर का साक्षी हो। तुम केवल निजी अनुभव के बारे में बात कर सकते हो। तुम इस बारे में बात कर सकते हो कि परमेश्वर ने तुम लोगों को कैसे बचाया, इस बारे में संगति कर सकते हो कि परमेश्वर ने तुम लोगों को कैसे जीता, और यह बता सकते हो कि उसने तुम लोगों को कौन-सा अनुग्रह प्रदान किया। यह कभी मत भूलो कि तुम लोग सबसे अधिक भ्रष्ट व्यक्ति हो, तुम गोबर की खाद और कचरा हो। केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम्हारा उत्थान हुआ है। चूँकि तुम लोग सबसे भ्रष्ट और सबसे गंदे हो, इसलिए तुम्हें देहधारी परमेश्वर द्वारा बचाया गया है, और उसने तुम्हें इतना बड़ा अनुग्रह प्रदान किया है। इसलिए तुम लोगों में शेखी बघारने के लायक कुछ नहीं है और तुम केवल परमेश्वर की प्रशंसा कर सकते हो और उसे धन्यवाद दे सकते हो। तुम लोगों का उद्धार विशुद्ध रूप से परमेश्वर के अनुग्रह के कारण है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

ऐसा मत सोचो कि तुम एक स्वाभाविक रूप से जन्मी विलक्षण प्रतिभा हो, जो स्वर्ग से थोड़ी ही निम्न, किंतु पृथ्वी से कहीं अधिक ऊँची है। तुम किसी भी अन्य से ज्यादा होशियार होने से बहुत दूर हो—यहाँ तक कि यह भी कहा जा सकता है कि पृथ्वी पर जितने भी विवेकशील लोग हैं, उनसे तुम्हारा कहीं ज्यादा मूर्ख होना बड़ा प्यारा है, क्योंकि तुम खुद को बहुत ऊँचा समझते हो, और तुममें कभी भी हीनता की भावना नहीं रही, मानो तुम मेरे कार्यों की छोटी से छोटी बात पूरी तरह समझ सकते हो। वास्तव में, तुम ऐसे व्यक्ति हो, जिसके पास विवेक की मूलभूत रूप से कमी है, क्योंकि तुम्हें इस बात का कुछ पता नहीं है कि मेरा इरादा क्या करने का है, और उससे भी कम तुम्हें इस बात की जानकारी है कि मैं अभी क्या कर रहा हूँ। और इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम जमीन पर कड़ी मेहनत करने वाले किसी बूढ़े किसान के बराबर भी नहीं हो, ऐसा किसान, जिसे मानव-जीवन की थोड़ी-भी समझ नहीं है और फिर भी जो जमीन पर खेती करते हुए अपना पूरा भरोसा स्वर्ग के आशीषों पर रखता है। तुम अपने जीवन के संबंध में एक पल भी विचार नहीं करते, तुम्हें यश के बारे में कुछ नहीं पता, और तुम्हारे पास आत्म-ज्ञान तो बिलकुल नहीं है। तुम इतने "सर्वोत्कृष्ट" हो! ... मैं तुम्हें एक सत्य बता दूँ : आज यह बहुत कम महत्त्व रखता है कि तुम्हारे पास श्रद्धापूर्ण हृदय है या नहीं; उसके बारे में मैं न तो उत्सुक हूँ और न ही चिंतित। लेकिन मुझे तुम्हें यह भी बताना होगा : तुम, जो "प्रतिभा के धनी" हो, जो सीखते नहीं और अज्ञानी बने रहते हो, अंतत: अपनी आत्म-प्रशंसात्मक क्षुद्र चतुराई द्वारा नीचे गिरा दिए जाओगे—तुम वह होगे, जो दुःख भोगता है और जिसे ताड़ना दी जाती है। मैं इतना बेवकूफ नहीं हूँ कि जब तुम नरक में दुःख भुगतोगे तो मैं तुम्हारा साथ दूँगा, क्योंकि मैं तुम्हारे जैसा नहीं हूँ। यह मत भूलो कि तुम एक सृजित प्राणी हो, जिसे मेरे द्वारा श्राप दिया गया है, लेकिन जिसे मेरे द्वारा सिखाया और बचाया भी जाता है, और तुममें ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे मैं छोड़ने का अनिच्छुक हूँ। मैं जिस भी समय अपना काम करता हूँ, कोई भी व्यक्ति, घटना या वस्तु मुझे बाधित नहीं कर सकती। मानवजाति के प्रति मेरा रवैया और दृष्टिकोण हमेशा एक-से रहे हैं। मैं तुम्हारी ओर विशेष रूप से बहुत प्रवृत नहीं हूँ, क्योंकि तुम मेरे प्रबंधन के लिए एक संलग्नक हो, और किसी भी अन्य प्राणी से अधिक विशेष होने से बहुत दूर हो। तुम्हें मेरी यह सलाह है : हर समय यह याद रखो, कि तुम परमेश्वर द्वारा सृजित प्राणी से अधिक कुछ नहीं हो! भले ही तुम अपना अस्तित्व मेरे साथ साझा कर सकते हो, लेकिन तुम्हें अपनी पहचान पता होनी चाहिए; अपने बारे में बहुत ऊँची राय मत रखो। अगर मैं नहीं भी फटकारता, या तुमसे नहीं निपटता, और मुस्कुराहट के साथ तुमसे मिलता हूँ, तो यह ये साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि तुम मेरे समान ही हो। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम सत्य का अनुसरण करने वालों में से एक हो, न कि स्वयं सत्य हो! तुम्हें मेरे वचनों के साथ-साथ बदलने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। तुम इससे बच नहीं सकते। मैं तुमसे आग्रह करता हूँ, इस मूल्यवान समय के दौरान, जब तुम्हारे पास यह दुर्लभ अवसर है, कुछ सीखने का प्रयास करो। मुझे मूर्ख मत बनाओ; इसकी आवश्यकता नहीं है कि तुम मुझे धोखा देने के लिए चापलूसी का उपयोग करो। जब तुम मुझे खोजते हो, तो यह पूरी तरह मेरे लिए नहीं होता, बल्कि तुम्हारे खुद के लिए होता है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो लोग सीखते नहीं और अज्ञानी बने रहते हैं : क्या वे जानवर नहीं हैं?' से उद्धृत

यदि लोगों का स्वयं के बारे में ज्ञान बहुत उथला है, तो समस्याओं को हल करना उनके लिए असंभव होगा, और उसका जीवन स्वभाव नहीं बदलेगा। स्वयं को एक गहरे स्तर पर जानना आवश्यक है, जिसका अर्थ है कि अपनी स्वयं की प्रकृति को जानना : उस प्रकृति में कौन से तत्व शामिल हैं, ये कैसे पैदा हुए और वे कहाँ से आये। इसके अलावा, क्या तुम इन चीजों से वास्तव में घृणा कर पाते हो? क्या तुमने अपनी स्वयं की कुरूप आत्मा और अपनी बुरी प्रकृति को देखा है? यदि तुम सच में सही अर्थों में स्वयं के बारे में सत्य को देख पाओगे, तो तुम स्वयं से घृणा करना शुरू कर दोगे। जब तुम स्वयं से घृणा करते हो और फिर परमेश्वर के वचन का अभ्यास करते हो, तो तुम देह को त्यागने में सक्षम हो जाओगे और तुम्हारे पास बिना कठिनाई के सत्य को कार्यान्वित करने की शक्ति होगी। क्यों कई लोग अपनी दैहिक प्राथमिकताओं का अनुसरण करते हैं? क्योंकि वे स्वयं को बहुत अच्छा मानते हैं, उन्हें लगता है कि उनके कार्यकलाप सही और न्यायोचित हैं, कि उनमें कोई दोष नहीं है, और यहाँ तक कि वे पूरी तरह से सही हैं, इसलिए वे इस धारणा के साथ कार्य करने में समर्थ हैं कि न्याय उनके पक्ष में है। जब कोई यह जान लेता है कि उसकी असली प्रकृति क्या है—कितना कुरूप, कितना घृणित और कितना दयनीय है—तो फिर वह स्वयं पर बहुत गर्व नहीं करता है, उतना बेतहाशा अहंकारी नहीं होता है, और स्वयं से उतना प्रसन्न नहीं होता है जितना वह पहले होता था। ऐसा व्यक्ति महसूस करता है, कि "मुझे ईमानदार और व्यवहारिक होना चाहिए, और परमेश्वर के कुछ वचनों का अभ्यास करना चाहिए। यदि नहीं, तो मैं इंसान होने के स्तर के बराबर नहीं होऊँगा, और परमेश्वर की उपस्थिति में रहने में शर्मिंदा होऊँगा।" तब कोई वास्तव में अपने आपको क्षुद्र के रूप में, वास्तव में महत्वहीन के रूप में देखता है। इस समय, उसके लिए सच्चाई का पालन करना आसान होता है, और वह थोड़ा-थोड़ा ऐसा दिखाई देता है जैसा कि किसी इंसान को होना चाहिए। जब लोग वास्तव में स्वयं से घृणा करते हैं केवल तभी वे शरीर को त्याग पाते हैं। यदि वे स्वयं से घृणा नहीं करते हैं, तो वे देह को नहीं त्याग पाएँगे। स्वयं से घृणा करने में कुछ चीजों का समावेश है: सबसे पहले, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना; और दूसरा, स्वयं को अभावग्रस्त और दयनीय के रूप में समझना, स्वयं को अति तुच्छ और महत्वहीन समझना, और स्वयं की दयनीय और गंदी आत्मा को समझना। जब कोई पूरी तरह से देखता है कि वह वास्तव में क्या है, और यह परिणाम प्राप्त हो जाता है, तब वह स्वयं के बारे में वास्तव में ज्ञान प्राप्त करता है, और ऐसा कहा जा सकता है कि किसी ने अपने आपको पूरी तरह से जान लिया है। केवल तभी कोई स्वयं से वास्तव में घृणा कर सकता है, इतना कि स्वयं को शाप दे, और वास्तव में महसूस करे कि उसे शैतान के द्वारा अत्यधिक गहराई तक भ्रष्ट किया गया है इस तरह से कि वह अब इंसान के समान नहीं है। तब एक दिन, जब मृत्यु का भय दिखाई देगा, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, "यह परमेश्वर की धार्मिक सजा है; परमेश्वर वास्तव में धार्मिक है; मुझे वास्तव में मर जाना चाहिए!" इस बिन्दु पर, वह कोई शिकायत दर्ज नहीं करेगा, परमेश्वर को दोष देने की तो बात ही दूर है, वह बस यही महसूस करेगा कि वह बहुत ज़रूरतमंद और दयनीय है, वो इतना गंदा है कि उसे परमेश्वर द्वारा मिटा दिया जाना चाहिए, और उसके जैसी आत्मा पृथ्वी पर रहने के योग्य नहीं है। इस बिन्दु पर, यह व्यक्ति परमेश्वर का विरोध नहीं करेगा, परमेश्वर के साथ विश्वासघात तो बिल्कुल नहीं करेगा। यदि कोई स्वयं को नहीं जानता है, और तब भी स्वयं को बहुत अच्छा मानता है, तो जब मृत्यु दस्तक देते हुए आएगी, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, कि "मैंने अपनी आस्था में इतना अच्छा किया है। मैंने कितनी मेहनत से खोज की है! मैंने इतना अधिक दिया है, मैंने इतने कष्ट झेले हैं, मगत अंततः, अब परमेश्वर मुझे मरने के लिए कहता है। मुझे नहीं पता कि परमेश्वर की धार्मिकता कहाँ है? वह मुझे मरने के लिए क्यों कह रहा है? यदि मेरे जैसे व्यक्ति को भी मरना पड़ता है, तो किसे बचाया जाएगा? क्या मानव जाति का अंत नहीं हो जाएगा?" सबसे पहले, इस व्यक्ति की परमेश्वर के बारे में धारणाएँ हैं। दूसरा, यह व्यक्ति शिकायत कर रहा है, और किसी प्रकार का समर्पण नहीं दर्शा रहा है। यह ठीक पौलुस की तरह है: जब वह मरने वाला था, तो वह स्वयं को नहीं जानता था और जब तक परमेश्वर से दण्ड निकट आया, तब तक पश्चाताप करने के लिए बहुत देर हो चुकी थी।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानना मुख्यतः मानवीय प्रकृति को जानना है' से उद्धृत

परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की, उसमें जीवन श्वास फूंकी और उसे अपनी कुछ बुद्धि, अपनी योग्यताएँ और वह दिया जो वह स्वयं है और उसके पास है। जब परमेश्वर ने मनुष्य को ये सब चीज़ें दीं, उसके बाद मनुष्य स्वतंत्र रूप से कुछ चीज़ों को करने और अपने आप सोचने के योग्य हो गया। यदि मनुष्य जो सोचता है और जो करता है, वह परमेश्वर की नज़रों में अच्छा है, तो परमेश्वर उसे स्वीकार करता है और हस्तक्षेप नहीं करता। जो कुछ मनुष्य करता है यदि वह सही है, तो परमेश्वर उसे रहने देगा। अतः वह वाक्यांश "जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया" क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि परमेश्वर ने विभिन्न जीवित प्राणियों के नामों में कोई बदलाव करने की ज़रूरत नहीं समझी। आदम उनका जो भी नाम रखता, परमेश्वर कहता "ऐसा ही हो" और प्राणी के नाम की पुष्टि करता। क्या परमेश्वर ने कोई राय व्यक्त की? नहीं, निश्चित ही नहीं। तो तुम लोग इससे क्या नतीजा निकालते हो? परमेश्वर ने मनुष्य को बुद्धि दी और मनुष्य ने कार्यों को अंजाम देने के लिए अपनी परमेश्वर-प्रदत्त बुद्धि का उपयोग किया। यदि जो कुछ मनुष्य करता है, वह परमेश्वर की नज़रों में सकारात्मक है, तो इसे बिना किसी मूल्यांकन या आलोचना के परमेश्वर के द्वारा पुष्ट, मान्य एवं स्वीकार किया जाता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई व्यक्ति या दुष्ट आत्मा या शैतान नहीं कर सकता। क्या तुम लोग यहाँ परमेश्वर के स्वभाव का प्रकाशन देखते हो? क्या एक मानव, एक भ्रष्ट किया गया मानव या शैतान अपने नाम पर किसी को अपनी नाक के नीचे कुछ करने देगा? निश्चित ही नहीं! क्या वे इस पद के लिए उस अन्य व्यक्ति या अन्य शक्ति से लड़ेंगे, जो उनसे अलग है? निश्चित ही, वे लड़ेंगे! उस घड़ी, यदि वह एक भ्रष्ट किया गया व्यक्ति या शैतान आदम के साथ होता, तो जो कुछ आदम कर रहा था, उन्होंने निश्चित रूप से उसे ठुकरा दिया होता। यह साबित करने के लिए कि उनके पास स्वतंत्र रूप से सोचने की योग्यता है और उनके पास अपनी अनोखी अंतर्दृष्टि हैं, उन्होंने हर उस चीज़ को बिल्कुल नकार दिया होता, जो आदम ने किया था : "क्या तुम इसे यह कहकर बुलाना चाहते हो? ठीक है, मैं इसे यह कहकर नहीं बुलाने वाला, मैं इसे वह कहकर बुलाने वाला हूँ; तुमने इसे सीता कहा था लेकिन मैं इसे गीता कहकर बुलाने वाला हूँ। मुझे दिखाना है कि मैं कितना चतुर हूँ।" यह किस प्रकार का स्वभाव है? क्या यह अनियंत्रित रूप से अहंकारी होना नहीं है? और परमेश्वर का क्या? क्या उसका स्वभाव ऐसा है? जो आदम कर रहा था, क्या उसके प्रति परमेश्वर की कुछ असामान्य आपत्तियाँ थीं? स्पष्ट रूप से उत्तर है नहीं! उस स्वभाव को लेकर जिसे परमेश्वर प्रकाशित करता है, उसमें जरा भी वाद-विवाद, अहंकार या आत्म-तुष्टता का आभास नहीं है। इतना तो यहाँ स्पष्ट है। यह बस एक छोटी सी बात लग सकती है, लेकिन यदि तुम परमेश्वर के सार को नहीं समझते हो, यदि तुम्हारा हृदय यह पता लगाने की कोशिश नहीं करता कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है और उसका रवैया क्या है, तो तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानोगे या परमेश्वर के स्वभाव की अभिव्यक्ति एवं प्रकाशन को नहीं जानोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

मैं तुम लोगों से प्रशासनिक आज्ञाओं के विषय की बेहतर समझ हासिल करने और परमेश्वर के स्वभाव को जानने का प्रयास करने का आग्रह करता हूँ। अन्यथा, तुम लोग अपनी जबान बंद नहीं रख पाओगे और बड़ी-बड़ी बातें करोगे, तुम अनजाने में परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करके अंधकार में जा गिरोगे और पवित्र आत्मा एवं प्रकाश की उपस्थिति को गँवा दोगे। चूँकि तुम्हारे काम के कोई सिद्धांत नहीं हैं, तुम्हें जो नहीं करना चाहिए वह करते हो, जो नहीं बोलना चाहिए वह बोलते हो, इसलिए तुम्हें यथोचित दंड मिलेगा। तुम्हें पता होना चाहिए कि, हालाँकि कथन और कर्म में तुम्हारे कोई सिद्धांत नहीं हैं, लेकिन परमेश्वर इन दोनों बातों में अत्यंत सिद्धांतवादी है। तुम्हें दंड मिलने का कारण यह है कि तुमने परमेश्वर का अपमान किया है, किसी इंसान का नहीं। यदि जीवन में बार-बार तुम परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध अपराध करते हो, तो तुम नरक की संतान ही बनोगे। इंसान को ऐसा प्रतीत हो सकता है कि तुमने कुछ ही कर्म तो ऐसे किए हैं जो सत्य के अनुरूप नहीं हैं, और इससे अधिक कुछ नहीं। लेकिन क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर की निगाह में, तुम पहले ही एक ऐसे इंसान हो जिसके लिए अब पाप करने की कोई और छूट नहीं बची है? क्योंकि तुमने एक से अधिक बार परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन किया है और फिर तुममें पश्चाताप के कोई लक्षण भी नहीं दिखते, इसलिए तुम्हारे पास नरक में जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, जहाँ परमेश्वर इंसान को दंड देता है। परमेश्वर का अनुसरण करते समय, कुछ थोड़े-से लोगों ने कुछ ऐसे कर्म कर दिए जिनसे सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ, लेकिन निपटारे और मार्गदर्शन के बाद, उन्होंने धीरे-धीरे अपनी भ्रष्टता का अहसास किया, उसके बाद वास्तविकता के सही मार्ग में प्रवेश किया, और आज वे एक ठोस जमीन पर खड़े हैं। वे ऐसे लोग हैं जो अंत तक बने रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

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