70. लोगों को कलीसिया में ग्रहण करने के सिद्धांत

(1) जब तक कोई आवेदक स्‍वयं उसके द्वारा लिखित प्रतिबद्धता का वचन नहीं देता, और जब तक उसके आवेदन-पत्र को कलीसिया के अगुआओं और उपयाजकों की स्वीकृति नहीं मिल जाती, तब तक किसी को भी कलीसिया में स्‍वीकार नहीं किया जा सकता।

(2) कलीसिया को किसी बुरे या कपटी व्‍यक्ति को कभी भी नए सदस्‍य के रूप में स्‍वीकार नहीं करना चाहिए, न ही ऐसे लोगों को जो देखने में डरावने और बदसूरत हों और जो न तो गरिमापूर्ण हों न ही आकर्षक।

(3) जिन्‍होंने पहले अपनी सांसारिक इच्‍छाओं की खातिर कलीसिया को छोड़ दिया था और जो अब फिर से उसमें शामिल होना चाहते हैं, उनको तभी स्‍वीकार किया जा सकता है जब उन्‍होंने सच्‍चे मन से पश्‍चाताप कर लिया हो और जिनकी ज़मानत देने को कई लोग तैयार हों।

(4) जो लोग गिरफ्तार हो चुके हैं और जो पश्‍चाताप, गारंटी और उस अपराध से तौबा करने के रूप में तीन लिखित वक्तव्य दे चुके हैं, और जिनमें अब भी अच्छी मानवता है और जिन्‍हें अपने किए पर पछतावा है, उनको कलीसिया के सदस्‍यों के बहुमत की सहमति से फिर से प्रवेश दिया जा सकता है।

(5) अगर किसी को हटाया या निष्‍कासित किया जा चुका है, लेकिन उसने सच्‍चे मन से पश्‍चाताप किया है और वह सुसमाचार का प्रचार करके लोगों का दिल जीतना जारी रख सकता है, तो ऐसे लोग पुन:-प्रवेश के लिए आवेदन कर सकते हैं, और उन्‍हें स्‍वीकार किया जा सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

जब परमेश्वर द्वारा उद्धार का कार्य किया जा रहा होगा, उस समय यथासंभव हर उस व्यक्ति को बचा लिया जाएगा, जिसे बचाया जा सकता है, और उनमें से किसी को भी छोड़ा नहीं जाएगा, क्योंकि परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य मनुष्य को बचाना है। जो लोग परमेश्वर द्वारा उद्धार के दौरान अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं ला पाएँगे—और वे भी, जो पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं हो पाएँगे—वे दंड के भागी होंगे। कार्य का यह चरण—वचनों का कार्य—लोगों के लिए उन सभी तरीकों और रहस्यों को खोल देगा, जिन्हें वे नहीं समझते, ताकि वे परमेश्वर की इच्छा और स्वयं से परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझ सकें, और अपने अंदर परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने की पूर्वापेक्षाएँ पैदा करके अपने स्वभाव में परिवर्तन ला सकें। परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए केवल वचनों का उपयोग करता है, अगर लोग थोड़े विद्रोही हो जाएँ, तो वह उन्हें दंडित नहीं करता; क्योंकि यह उद्धार के कार्य का समय है। यदि विद्रोही ढंग से कार्य करने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाएगा, तो किसी को भी बचाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा; हर व्यक्ति दंडित होकर रसातल में जा गिरेगा। मनुष्य का न्याय करने वाले वचनों का उद्देश्य उन्हें स्वयं को जानने और परमेश्वर के प्रति समर्पित होने देना है; यह उन्हें इस तरह के न्याय से दंडित करना नहीं है। वचनों के कार्य के दौरान बहुत-से लोग देहधारी परमेश्वर के प्रति अपनी विद्रोहशीलता और अवहेलना, और साथ ही अपनी अवज्ञा भी उजागर करेंगे। फिर भी, वह उन्हें दंडित नहीं करेगा, बल्कि केवल उन लोगों को अलग कर देगा, जो पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके हैं और जिन्हें बचाया नहीं जा सकता। वह उनकी देह शैतान को दे देगा, और कुछ मामलों में, उनकी देह का अंत कर देगा। शेष लोग निपटे जाने और काट-छाँट किए जाने का अनुसरण और अनुभव करना जारी रखेंगे। यदि अनुसरण करते समय भी ये लोग निपटे जाने और काट-छाँट किए जाने को स्वीकार नहीं करते, और ज़्यादा पतित हो जाते हैं, तो वे उद्धार पाने के अपने अवसर से वंचित हो जाएँगे। वचनों द्वारा जीते जाने के लिए प्रस्तुत प्रत्येक व्यक्ति के पास उद्धार के लिए पर्याप्त अवसर होगा; उद्धार के समय परमेश्वर इन लोगों के प्रति परम उदारता दिखाएगा। दूसरे शब्दों में, उनके प्रति परम सहनशीलता दिखाई जाएगी। अगर लोग गलत रास्ता छोड़ दें और पश्चात्ताप करें, तो परमेश्वर उन्हें उद्धार प्राप्त करने का अवसर देगा। जब मनुष्य पहली बार परमेश्वर से विद्रोह करते हैं, तो वह उन्हें मृत्युदंड नहीं देना चाहता; बल्कि, वह उन्हें बचाने की पूरी कोशिश करता है। यदि किसी में वास्तव में उद्धार के लिए कोई गुंजाइश नहीं है, तो परमेश्वर उन्हें दर-किनार कर देता है। कुछ लोगों को दंडित करने में परमेश्वर थोड़ा धीमा इसलिए चलता है क्योंकि वह हर उस व्यक्ति को बचाना चाहता है, जिसे बचाया जा सकता है। वह केवल वचनों से लोगों का न्याय करता है, उन्हें प्रबुद्ध करता है और उनका मार्गदर्शन करता है, वह उन्हें मारने के लिए छड़ी का उपयोग नहीं करता। मनुष्य को उद्धार दिलाने के लिए वचनों का प्रयोग करना कार्य के अंतिम चरण का उद्देश्य और महत्त्व है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए' से उद्धृत

अतीत में, कुछ लोगों को बुरे कामों के लिए कलीसिया से निष्कासित किया जा चुका है, और उनके भाई और बहनों ने उन्हें ठुकरा दिया है। कुछ वर्ष इधर-उधर भटकने के बाद अब वे वापस आ गए हैं। यह अच्छी बात है कि उन्होंने परमेश्वर को पूरी तरह नहीं छोड़ा; इससे उन्हें बचाए जाने का अवसर और आशा मिलती है। अगर वे भाग खड़े होते और विश्वास करना छोड़ देते, अविश्वासियों जैसे बन जाते, तो वे पूरी तरह खत्म हो जाते। अगर वे अपने-आपको बदल सकते हैं, तो उनके लिए अब भी उम्मीद है; यह एक दुर्लभ और अनमोल बात है। चाहे परमेश्वर कैसा भी कदम उठाए, और चाहे वह लोगों के साथ कैसा भी व्यवहार करे, या उनसे घृणा करे या उन्हें नापसंद करे, अगर कोई ऐसा दिन आता है कि लोग खुद को बदल सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी; क्योंकि इसका मतलब यह होगा कि लोगों के मन में अभी भी परमेश्वर के लिए थोड़ा-सा स्थान तो है, कि उन्होंने अपनी मानवीय समझ या अपनी मानवता पूरी तरह से नहीं खोई है, कि वे अभी भी परमेश्वर में विश्वास करना चाहते हैं, और उसके अस्तित्व को स्वीकार करके उसके सम्मुख लौटने का कम-से-कम थोड़ा-बहुत इरादा रखते हैं। चाहे कोई परमेश्वर को छोडकर चला गया हो, यदि वे वापस आते हैं, और परिवार के सदस्य की तरह महसूस करते हैं, तो मैं थोड़ा भावुक होकर कुछ सांत्वना पाऊँगा। लेकिन अगर वे कभी वापस नहीं लौटते, तो मैं इसे दयनीय समझूँगा। यदि वे वापस आकर परमेश्वर पर ईमानदारी से विश्वास करना शुरू कर सकते हैं, तो मेरा दिल विशेष रूप से संतुष्टि से भर जाएगा। जब तुम दूर चले गए, तो तुम निश्चित रूप से काफी नकारात्मक थे, और तुम खराब अवस्था में थे; पर अगर तुम अब वापस आ सकते हो, तो इससे साबित होता है कि तुम्हें अभी भी परमेश्वर में आस्था है। लेकिन, तुम इसी तरह आगे भी चलते रह सकते हो या नहीं, यह अज्ञात है, क्योंकि लोग बहुत जल्दी बदल जाते हैं। अनुग्रह के युग में, यीशु में लोगों के लिए रहम और अनुग्रह था। यदि सौ में से एक भेड़ खो जाए, तो वह निन्यानबे को छोड़कर एक को खोजता था। यह पंक्ति किसी यांत्रिक विधि को नहीं दर्शाती है, न ही यह कोई नियम है, बल्कि यह मानव जाति के उद्धार को लेकर परमेश्वर के गहरे इरादे, और मानव जाति के लिए परमेश्वर के गहरे प्रेम को दर्शाता है। यह कोई काम करने का तरीका नहीं है, बल्कि यह उसका स्वभाव है और उसकी मानसिकता है। इसलिए, कुछ लोग छह महीने या साल भर के लिए चले जाते हैं, या बहुत-सी कमजोरियों या गलत धारणाओं के शिकार हैं, और फिर भी बाद में वास्तविकता के प्रति जागृत होने, ज्ञान प्राप्त करने, अपने-आपको बदलने और सही मार्ग पर लौटने की उनकी क्षमता मुझे खासतौर से सुकून देती है, और मुझे यह थोड़ा-सा आनंद देती है। आज के इस मौज-मस्ती और वैभवता के संसार में, और बुराई के इस युग में दृढ़ता से खड़े रहने के लिए सक्षम हो पाना, परमेश्वर को स्वीकार करने में सक्षम हो पाना, और सही रास्ते पर वापस लौट पाने में सक्षम हो पाना ऐसी चीजें हैं जो खुशी और रोमांच प्रदान करती हैं। उदाहरण के लिए बच्चों का पालन-पोषण करने को लो : चाहे तुम्हारे प्रति उनका व्यवहार संतानोचित हो या न हो, अगर वे तुम्हारा कोई संज्ञान लिए बिना घर छोड़कर चले जाएँ और कभी न लौटें, तो तुम्हें कैसा महसूस होगा? अपने दिल की गहराई में तुम तब भी उनकी चिंता करते रहोगे, और तुम हमेशा यह सोचोगे, "मेरा बेटा कब लौटेगा? मैं उसे देखना चाहता हूँ। आखिर वह मेरा बेटा है, और मैंने उसे यूं ही नहीं पाला-पोसा और प्यार किया।" तुम हमेशा इसी तरह सोचते रहे हो; तुम हमेशा उस दिन की बाट जोहते रहे हो। इस मामले में हर कोई इसी तरह महसूस करता है। आजकल लोगों की आध्यात्मिक कद-काठी बहुत छोटी है, पर वह दिन आएगा जब वे परमेश्वर की इच्छा को समझ जाएंगे, सिवा ऐसी स्थिति के कि उनमें विश्वास करने की रत्ती भर भी चाह न हो, और वे यह स्वीकार ही न करें कि वह परमेश्वर है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर से लगातार माँगते रहने वाले लोग सबसे कम विवेकशील होते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के दो सबसे महत्वपूर्ण पहलू क्या हैं? (गहरा क्रोध और अत्यधिक दया दिखाना।) लेकिन, इन चीजों का क्या मतलब है? क्रोध कौन सहता है? वे, जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, सत्य को अस्वीकार करते हैं और शैतान का अनुसरण करते हैं। परमेश्वर उन लोगों को नहीं चाहता, जो शैतान का अनुसरण करने के लिए दृढ़संकल्प हैं, और न ही वह गद्दारों और भगोड़ों को चाहता है। कुछ लोग कहते हैं, "कमजोरी के क्षण में मैंने अपना कर्तव्य न करना चुना, लेकिन मैं वास्तव में परमेश्वर को छोड़ना या शैतान के शिविर में जाना नहीं चाहता।" क्या यह स्वीकार्य है? इसे वर्जित नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसे प्रोत्साहित नहीं किया जाता। इससे मेरा क्या मतलब है? मेरा मतलब है कि स्थिति के आधार पर तुम्हारी कमजोरी से निपटने के दौरान परमेश्वर दया और सहनशीलता दिखा सकता है। परमेश्वर बड़ा दयालु है। लोग अपने भ्रष्ट स्वभावों के बीच रहते हैं, और कुछ परिस्थितियों में, यह अपरिहार्य है कि वे कमजोर, नकारात्मक या आलसी महसूस करें। परमेश्वर स्थिति के अनुसार न्याय करता है और पूरी सटीकता के साथ तुमसे निपटता है। अगर तुम भगोड़े नहीं हो, तो वह तुम्हारे साथ उस जैसा व्यवहार नहीं करेगा। अगर तुम कमजोर हो, तो वह तुम्हें तुम्हारी कमजोरी के अनुसार सँभालेगा। अगर तुम क्षणिक रूप से भ्रष्टाचार प्रकट करते हो, अगर तुम क्षणिक रूप से कमजोर हो, या अगर तुम अस्थायी रूप से अपना रास्ता खो देते हो, तो परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा और तुम्हारी सहायता करेगा। वह ऐसे लोगों को छोटे आध्यात्मिक कद का मानेगा, जो सत्य नहीं समझते, क्योंकि उनकी समस्या का संबंध उनकी प्रकृति और सार की नहीं है। परमेश्वर ऐसे लोगों को त्यागकर उनसे क्यों नहीं निपटता? ऐसा इसलिए है, क्योंकि उन्होंने उसे या सत्य को अस्वीकार नहीं किया है और वे शैतान का अनुसरण नहीं करना चाहते। वे केवल क्षणिक रूप से कमजोर हुए और कदम नहीं बढ़ा सके, इसलिए परमेश्वर उन्हें एक और मौका देता है। तो फिर, इन लोगों को कैसे सँभाला जाना चाहिए, जिन्होंने क्षणिक कमजोरी का अनुभव किया और अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर सके, लेकिन जो बाद में उन्हें पूरा करने के लिए लौट आए? उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए। प्रत्येक मामले की प्रकृति भिन्न होती है, इसलिए तुम सभी के साथ निपटने के लिए एक ही नियम लागू नहीं कर सकते। कुछ लोग कमजोरी के शिकार नहीं हैं; वे वास्तव में भगोड़े हैं। अगर तुम उन्हें वापस लेते हो, तो कुछ ऐसा ही होने पर वे फिर से भाग जाएँगे। ऐसा व्यक्ति कुछ पल के लिए भगोड़ा नहीं होता; वह हमेशा भगोड़ा ही रहेगा। इसलिए, परमेश्वर ऐसे लोगों को बाहर निकाल देता है और कभी वापस नहीं लेता। परमेश्वर अन्य किसी को भी बचा सकता है, पर इन्हें नहीं बचाता।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सुसमाचार का प्रसार करना सभी विश्वासियों का गौरवपूर्ण कर्तव्य है' से उद्धृत

ऐसे लोग हर जगह होते हैं : परमेश्वर के मार्ग के बारे में सुनिश्चित हो जाने के बाद, विभिन्न कारणों से, वे चुपचाप बिना अलविदा कहे चले जाते हैं और जो कुछ उनका दिल चाहता है वही करते हैं। फिलहाल, हम इस बात पर नहीं जाएँगे कि ऐसे लोग छोड़कर क्यों चले जाते हैं; पहले हम यह देखेंगे कि ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है। यह बिलकुल स्पष्ट है! जिस समय ऐसे लोग छोड़कर चले जाते हैं, परमेश्वर की नज़रों में, उनके विश्वास की अवधि समाप्त हो जाती है। इसे वो लोग नहीं, बल्कि परमेश्वर समाप्त करता है। ऐसे लोगों का परमेश्वर को छोड़कर जाने का अर्थ है कि उन्होंने पहले ही परमेश्वर को अस्वीकृत कर दिया है, यानी अब वे परमेश्वर को नहीं चाहते, अब उन्हें परमेश्वर का उद्धार स्वीकार्य नहीं है। चूँकि ऐसे लोग परमेश्वर को नहीं चाहते, तो क्या परमेश्वर तब भी उन्हें चाह सकता है? इसके अतिरिक्त, जब इस प्रकार के लोगों की प्रवृत्ति और दृष्टिकोण ऐसा है और वे परमेश्वर को छोड़ने पर अडिग हो चुके हैं, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने पहले ही परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर दिया है। इस तथ्य के बावजूद कि शायद आवेश में आकर, उन्होंने परमेश्वर को न कोसा हो, उनके व्यवहार में कोई नीचता या ज़्यादती न रही हो, और इस तथ्य के बावजूद कि ऐसे लोग सोच रहे हों, "यदि कभी ऐसा दिन आया जब मुझे बाहर भरपूर खुशियाँ मिलीं, या जब किसी चीज़ के लिए मुझे अभी भी परमेश्वर की आवश्यकता हुई, तो मैं वापस आ जाऊँगा। या कभी परमेश्वर मुझे बुलाए, तो मैं वापस आ जाऊँगा," या वे कहते हैं, "अगर मैं कभी बाहर की दुनिया में चोट खाऊँ, या कभी यह देखूँ कि बाहरी दुनिया अत्यंत अंधकारमय और दुष्ट है और अब मैं उस प्रवाह के साथ नहीं बहना चाहता, तो मैं परमेश्वर के पास वापस आ जाऊँगा।" भले ही ऐसे लोग अपने मन में इस तरह का हिसाब-किताब लगाएँ कि कब उन्हें वापस आना है, भले ही वे अपनी वापसी के लिए द्वार खुला छोड़कर रखने की कोशिश करें, फिर भी उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता कि वे चाहे जो सोचें और कैसी भी योजना बनाएँ, यह सब उनकी खुशफहमी है। उनकी सबसे बड़ी गलती यह है कि वे इस बारे में अस्पष्ट होते हैं कि जब वे छोड़कर जाना चाहते हैं तो परमेश्वर को कैसा महसूस होता है। जिस पल वे परमेश्वर को छोड़ने का निश्चय करते हैं, परमेश्वर उसी पल उन्हें पूरी तरह से छोड़ चुका होता है; परमेश्वर पहले ही अपने हृदय में उनका परिणाम निर्धारित कर चुका होता है। वह परिणाम क्या है? ऐसा व्यक्ति चूहों में से ही एक चूहा होगा और उन्हीं के साथ नष्ट हो जाएगा। इस प्रकार, लोग प्रायः इस प्रकार की स्थिति देखते हैं : कोई परमेश्वर का परित्याग कर देता है, लेकिन उसे दण्ड नहीं मिलता। परमेश्वर अपने सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है; कुछ चीज़ें देखने में आती हैं, और कुछ चीज़ें परमेश्वर के हृदय में ही तय होती हैं, इसलिए लोग परिणाम नहीं देख पाते। जो हिस्सा लोग देख पाते हैं वह आवश्यक नहीं कि चीज़ों का सही पक्ष हो, परन्तु दूसरा पक्ष होता है, जिसे तुम देख नहीं पाते—उसी में परमेश्वर के हृदय के सच्चे विचार और निष्कर्ष निहित होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

सगे-संबंधी जो विश्वास नहीं रखते (तुम्हारे बच्चे, तुम्हारे पति या पत्नी, तुम्हारी बहनें या तुम्हारे माता-पिता इत्यादि) उन्हें कलीसिया में आने को बाध्य नहीं करना चाहिए। परमेश्वर के घर में सदस्यों की कमी नहीं है और ऐसे लोगों से इसकी संख्या बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं, जिनका कोई उपयोग नहीं है। वे सभी जो ख़ुशी-ख़ुशी विश्वास नहीं करते, उन्हें कलीसिया में बिल्कुल नहीं ले जाना चाहिए। यह आदेश सब लोगों पर निर्देशित है। इस मामले में तुम लोगों को एक दूसरे की जाँच, निगरानी करनी चाहिए और याद दिलाना चाहिए; कोई भी इसका उल्लंघन नहीं कर सकता। यहाँ तक कि जब ऐसे सगे-संबंधी जो विश्वास नहीं करते, अनिच्छा से कलीसिया में प्रवेश करते हैं, उन्हें किताबें जारी नहीं की जानी चाहिए या नया नाम नहीं देना चाहिए; ऐसे लोग परमेश्वर के घर के नहीं हैं और कलीसिया में उनके प्रवेश पर जैसे भी ज़रूरी हो, रोक लगाई जानी चाहिए। यदि दुष्टात्माओं के आक्रमण के कारण कलीसिया पर समस्या आती है, तो तुम निर्वासित कर दिए जाओगे या तुम पर प्रतिबंध लगा दिये जाएँगे। संक्षेप में, इस मामले में हरेक का उत्तरदायित्व है, हालांकि तुम्हें असावधान नहीं होना चाहिए, न ही इसका इस्तेमाल निजी बदला लेने के लिए करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दस प्रशासनिक आदेश जो राज्य के युग में परमेश्वर के चुने लोगों द्वारा पालन किए जाने चाहिए' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

कलीसिया में नए विश्वासियों को स्वीकार करने के सिद्धांत इस प्रकार हैं: अगर वे सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो भले ही उनके बचाये जाने की उम्मीद या संभावना नहीं के बराबर हो, तब भी उन्हें कलीसिया में स्वीकार किया जाना चाहिए और कभी बाहर नहीं निकाला जाना चाहिए। कलीसिया में लोगों को स्वीकार करने के मानक बहुत ऊँचे नहीं होने चाहिए, क्योंकि पूरी मानवजाति को शैतान ने पहले ही बहुत गहराई तक भ्रष्ट कर दिया है और कुछ ही लोगों में इंसानियत बची है। अगर वे कुकर्मी या भ्रमित लोग नहीं हैं और सच्चे मन से यह मानते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर देहधारी परमेश्वर है, तो उन्हें कलीसिया में स्वीकार किया जाना चाहिए। चाहे वे कार्यकर्ता, किसान, शिक्षक, विज्ञान और टेक्नोलॉजी से जुड़े कर्मी हों या सरकारी कर्मचारी, हमें बिना किसी पक्षपात के उन सभी को एक समान मानना चाहिए। हमें खास तौर पर उन लोगों और विज्ञान एवं तकनीक या शिक्षा से जुड़े कर्मियों को परमेश्वर के वचनों के बारे में बताने और सत्य को समझने में उनका मार्गदर्शन करने में बहुत अधिक धैर्य रखना होगा। क्योंकि ऐसे लोगों का सत्य में प्रवेश करना अधिक मुश्किल होता है, उनसे हमारी अपेक्षाएं बहुत अधिक या सख्त नहीं होनी चाहिए। अगर हम सचमुच इन लोगों से प्रेम करते हैं, तो हमें बार-बार उनसे संपर्क करना चाहिए और उन्हें अपना सहयोग देना चाहिए। भले ही इन लोगों को अक्सर सत्य में प्रवेश करने और परमेश्वर में अपनी आस्था की नींव बनाने में आम लोगों के मुकाबले ज़्यादा समय लगता है, लेकिन एक बार जब वे वास्तविक रूप से सत्य में प्रवेश कर लेते हैं, तो वे सभी उपयोगी प्रतिभाएं बन जाते हैं। ऐसा करने के लिए कीमत चुकाए बिना प्रतिभा को पोषण देना कारगर साबित नहीं होगा।

जहां तक नए लोगों को कलीसिया में स्वीकार किये जाने की बात है, आम तौर पर कलीसिया के अगुआओं और उपयाजकों की अनुमति लेना पर्याप्त होता है। विशेष परिस्थितियों में, कलीसिया के सभी सदस्यों की मंज़ूरी ज़रूरी होती है। अगर कुछ लोग नये विश्वासी को स्वीकार किये जाने से सहमत नहीं होते हैं, तो विश्वासी को एक परिवीक्षा अवधि से गुज़रना होता है। जब वे परिवीक्षा अवधि में होते हैं, तो जिस व्यक्ति ने उनका परिचय कराया है या जिसने उन्हें सुसमाचार का उपदेश दिया है उसे लगातार उनके संपर्क में रहना चाहिए और उनके साथ सहभागिता करते रहना चाहिए। किसी भी आपसी संवाद के दौरान नये विश्वासी के बारे में पूरी जानकारी दी जानी चाहिए। अगर ऐसे व्यक्ति के रूप में उसकी पुष्टि की जाती है जो सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करता है, तो उसे कलीसिया में स्वीकार किया जा सकता है। कलीसिया में लोगों को स्वीकार किये जाने का काम बहुत सख्ती से नहीं किया जा सकता; केवल कुकर्मियों और भ्रमित लोगों को शामिल करने पर ही रोक लगाई जानी चाहिए। ज़्यादातर लोगों को स्वीकार किया जाना चाहिए; सिर्फ़ विशेष मामलों में आगे विचार-विमर्श करने और कलीसिया की मंज़ूरी लेने की ज़रूरत होनी चाहिए।

कलीसिया में लोगों को स्वीकार किये जाने का काम सावधानी से किया जाना चाहिए। ऐसे कुकर्मी जो कलीसिया से दूर रहना चाहते हैं, जो अक्सर व्यभिचार करते हैं या जो बहुत अधिक अहंकारी होते हैं, उन्हें कलीसिया में शामिल करने से रोका जाना चाहिए। ऐसे गैर-विश्वासी भी हैं जो सिर्फ़ इधर-उधर की बातें और मौज़-मस्ती करने के लिए कलीसिया आना चाहते हैं; ऐसे लोगों को भी कलीसिया में शामिल करने से रोका जाना चाहिए। क्योंकि ऐसे लोग सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, अगर उन्हें कलीसिया में शामिल भी कर लिया जाता है, तो वे अंत तक विश्वासी बने नहीं पाएंगे। कलीसिया में इस तरह के लोग आखिरकार छोड़कर चले जाते हैं। इसके अलावा, हमें कलीसिया में ऐसे लोगों की घुसपैठ को भी रोकना चाहिए जो जासूसी करने के लिए आते हैं। कलीसिया को मुख्य रूप से इन तीन प्रकार के लोगों को कलीसिया से जुड़ने से रोकना चाहिए: पहले प्रकार में ऐसे लोग शामिल हैं जो इतने अधिक दुष्ट, घिनौने और नीच होते हैं कि कलीसिया उन्हें बिल्कुल भी स्वीकार नहीं कर सकती; दूसरे प्रकार में जासूसी करने वाले लोग शामिल हैं जो कलीसिया में घुसपैठ करना चाहते हैं और जिसे कलीसिया बिल्कुल भी स्वीकार नहीं कर सकती; तीसरे प्रकार में ऐसे लोग शामिल हैं जो सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं। ऐसे लोगों को अगर कलीसिया में स्वीकार भी किया जाता है, तो ये सभी लोग कभी न कभी कलीसिया छोड़ ही देंगे। इसलिए, कलीसिया को ऐसे लोगों को स्वीकार नहीं करना चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

परमेश्वर के घर में अब एक नियम है : सभी नए विश्वासियों को कलीसिया में शामिल होने के लिए एक आवेदन लिखना होता है कि वे अपनी इच्छा से ऐसा कर रहे हैं, और ऐसा करने पर उन्हें कभी पछतावा नहीं होगा। इससे यह साबित होता है कि वे वास्तव में परमेश्वर में विश्वास रखते हैं। तुम्हारे द्वारा आवेदन लिखे जाने के बाद, परमेश्वर का घर तुम्हारे व्यवहार का उपयोग यह मूल्यांकन करने के लिए करेगा कि तुम्हें कलीसिया में शामिल होने की अनुमति है या नहीं। यदि तुम आवेदन-पत्र नहीं लिखते हो, तो परमेश्वर का घर तुमसे ऐसा करने का आग्रह नहीं करेगा, बल्कि वह तुम्हें मात्र एक ऐसा व्यक्ति मानेगा जिसने अभी तक अपना मन नहीं बनाया है। क्या परमेश्वर के घर के लिए ऐसा करना उचित नहीं है? ऐसा करने से लोगों को आस्था की पूर्ण स्वतंत्रता मिलती है, इससे चुनाव करना पूरी तरह से उनके हाथों में होता है, और उनके साथ किसी भी तरह की जबरदस्ती नहीं होती। अगर तुम सचमुच परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो एक बार यह समझ लेने के बाद कि इंसान का उद्धार करने के लिए परमेश्वर स्वयं देहधारी हुआ है, तुम्हें कलीसिया से जुड़ जाना चाहिए; तभी तुम्हें सचमुच परमेश्वर के सामने स्वर्गारोहित किया जाएगा और तभी परमेश्वर तुम्हें अपने घर का सदस्य मानेगा। अगर तुम कलीसिया से नहीं जुड़ते हो, तो परमेश्वर की नज़रों में तुम सिर्फ़ एक दर्शक हो, एक गैर-विश्वासी हो; तुम शायद कलीसिया के लिए कुछ छोटे-मोटे काम करने में सक्षम हो सकते हो, लेकिन तुम एक अस्थायी सेवाकर्मी ही बने रहोगे। यह कहना सही होगा कि जो लोग कलीसिया से जुड़ने के इच्छुक नहीं हैं वे सभी सचमुच परमेश्वर में विश्वास नहीं करते और परमेश्वर उन्हें मान्यता नहीं देता है।

— "जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

पहले, कलीसिया द्वारा भारी शोधन के दौरान, बहुत से लोगों को हटाया या निष्कासित किया गया था। यकीनन उनमें से कुछ लोग ऐसे हैं जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उनमें पश्चाताप के संकेत दिखते हैं, वे अभी भी अपनी आस्था में बने हुए हैं। कलीसिया को इन लोगों को एक और मौक़ा देना चाहिए; उन्हें फिर से स्वीकार किया जाना चाहिए। संदर्भ के लिए इन परिस्थितियों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

1. जिन लोगों को अपना कर्तव्य निर्वहन नहीं करने या अक्सर सभाओं में हिस्सा न लेने के कारण कलीसिया से निकाला गया था, अगर उनमें सच्चे पश्चाताप के संकेत दिखते हैं, तो उन्हें वापस कलीसिया में स्वीकार किया जा सकता है।

2. जो लोग सचमुच परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन जिन्हें कोई खास अपराध करने के कारण निष्कासित किया गया था (जो वास्तव में निष्कासित किये जाने के मानदंड को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है), उन्हें वापस कलीसिया में स्वीकार किया जा सकता है।

3. जिन लोगों को सत्य का अनुसरण नहीं करने और अपनी आस्था में भ्रमित हो जाने के कारण कलीसिया से निकाला गया था, अगर उनमें अपेक्षाकृत बेहतर इंसानियत है और वे दुष्ट लोग नहीं है; और उनमें फिलहाल सच्चे पश्चाताप के लक्षण दिख रहे हैं, तो उन्हें वापस कलीसिया में स्वीकार किया जा सकता है।

4. जिन लोगों को खराब इंसानियत होने और गलत व्यवहार करने के कारण कलीसिया से निष्कासित किया गया था, अगर वे अभी भी सुसमाचार का प्रचार करने के अपने काम में लगे हुए हैं और उनमें सच्चे पश्चाताप के लक्षण दिख रहे हैं, तो उन्हें वापस कलीसिया में स्वीकार किया जा सकता है। अगर ऐसे लोग कलीसिया में वापस आते हैं, तो उनका बर्ताव अच्छा होना ज़रूरी है; इसके अलावा, उनको अगुआ के रूप में काम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

उपरोक्त श्रेणियों के अंतर्गत आने वाले लोगों के संबंध में कलीसिया को उनके बारे में समझने और उनके हालत की जाँच करने के लिए किसी व्यक्ति को भेजना चाहिए। अगर ऐसे लोग सच्चे मन से कलीसिया में वापस आना चाहते हैं और ज़्यादातर सदस्य इससे सहमत होते हैं, तो उन्हें वापस आने की अनुमति दी जा सकती है। अगर सिर्फ़ कुछ ही लोग इस पर सहमति देते हैं तो ऐसे संभावित दावेदारों को कलीसिया में नहीं आने देना चाहिए। कलीसिया में लोगों को स्वीकार किये जाने के मामले में, सिद्धांतों का उल्लंघन बिल्कुल भी नहीं किया जा सकता। अतीत में, ज़्यादातर निष्कासन सही कारणों से किये गए थे; उनमें से सिर्फ़ कुछ ही लोगों को अनुचित तरीके से निष्कासित किया गया था। अनुचित तरीके से निष्कासित किये गए लोगों के मामले में पुनर्विचार करके दूसरा मौक़ा दिया जा सकता है। अगर कोई कलीसिया अपने निकाले या निष्कासित किये गए ज़्यादातर लोगों को वापस अपने साथ जोड़ती है, तो इससे बड़ी गड़बड़ियाँ पैदा हो सकती हैं। हर कलीसिया को इन सिद्धांतों को अच्छी तरह समझना चाहिए और इनसे दूर नहीं जाना चाहिए। किसी भी कलीसिया को वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार काम करना चाहिए, उसे लोगों के साथ सिद्धांतों के अनुसार बर्ताव करना चाहिए। जिस व्यक्ति ने अपराध किये हैं उसके साथ एक दुष्ट व्यक्ति जैसा बर्ताव नहीं करना चाहिए, बल्कि जो लोग लगातार बेलगाम बने रहते हैं और बार-बार अनुशासित किये जाने के बाद भी कभी नहीं बदलते, जो अक्सर भेंटों को चुराते और बेहद लालची होते हैं, जो हमेशा अहंकारी और दंभी बने रहते हैं, जो अव्यवस्थित और अनियंत्रित होते हैं, जो लगातार मतभेद और विवाद पैदा करते हैं, जो हमेशा सत्ता पाने के लिए संघर्ष करते हैं और रुतबा पाये बिना अपना कर्तव्य निर्वहन नहीं करना चाहते हैं—इन सभी लोगों को सुधारा नहीं जा सकता। दुष्ट लोग हमेशा दुष्ट ही रहते हैं; वे कभी सच्चा पश्चाताप नहीं करेंगे। इसलिए, किसी भी व्यक्ति के पास ऐसे लोगों को कलीसिया में वापस लाने का अधिकार नहीं है, अगर कोई ऐसा करता है तो ऐसे लोगों के साथ उसे भी कलीसिया से निष्कासित कर दिया जाएगा। जिन लोगों को कलीसिया में वापस लाया गया है उन्हें किसी भी तरह के नुकसान पहुँचाने वाले व्यवहार में बिल्कुल भी शामिल नहीं होना चाहिए, उन्हें ज़्यादातर लोगों के साथ अच्छा बर्ताव करना चाहिए। सिर्फ़ इसी तरह के लोग कलीसिया में वापस लाये जाने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त हैं। जो लोग कलीसिया के कार्य के लिए फ़ायदेमंद हैं या सुसमाचार का प्रचार करने की सेवा प्रदान करने में सक्षम हैं उनका ही कलीसिया में वापस स्वागत किया जा सकता है; जो लोग कलीसिया को नुकसान पहुंचा सकते हैं उन्हें वापस आने की अनुमति बिल्कुल भी नहीं दी जानी चाहिए। इस मामले में सभी स्तरों पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं को सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए, ताकि एक भी अच्छे व्यक्ति को इस मौके से वंचित न रखा जाये और एक भी बुरे व्यक्ति को कलीसिया में वापस न लाया जाये।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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