83. परमेश्वर के चुने हुए लोगों को ग्रहण करने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के चुने हुए लोगों का प्रेमपूर्वक और सिद्धांतों के साथ ग्रहण करना और कलीसिया की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए। कभी भी मसीह-विरोधियों, दुष्ट लोगों या बुरी आत्माओं को आने न दो।

(2) क्लेश के समय में, अगुवाओं और सेवाकर्मियों को, साथ ही भाई-बहनों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए। यह एक नैतिक बाध्यता वाली जिम्मेदारी है और यह एक अच्छा कर्म भी है।

(3) किसी गृहस्थी को वह करना चाहिए जो वे अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार कर सकें, जिसमें सादगी और सुविधा पर ध्यान दिया गया हो। असंयमित रूप से खाना-पीना वर्जित है; इसके बजाय, दूसरों को तृप्ति तक खाने देने के सिद्धांत द्वारा मार्गदर्शित रहो।

(4) यदि कोई मेजबान परिवार कठिनाइयों का सामना करता है, तो कलीसिया को उन्हें हल करना चाहिए; यदि किसी मेजबान परिवार के वित्तीय मुद्दे हों, तो कलीसिया अगवानी की पूरी लागत का वहन कर सकता है।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

"मैं तुम से सच सच कहता हूँ कि जो मेरे भेजे हुए को ग्रहण करता है, वह मुझे ग्रहण करता है; और जो मुझे ग्रहण करता है, वह मेरे भेजनेवाले को ग्रहण करता है" (यूहन्ना 13:20)।

"जो भविष्यद्वक्‍ता को भविष्यद्वक्‍ता जानकर ग्रहण करे, वह भविष्यद्वक्‍ता का बदला पाएगा; और जो धर्मी को धर्मी जानकर ग्रहण करे, वह धर्मी का बदला पाएगा" (मत्ती 10:41)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

चाहे तुम कोई भी कर्तव्य निभाओ, जो सिद्धांत तुम्हें समझने चाहिए और जो सत्य तुम्हें अभ्यास में लाना चाहिए, क्या वे एक समान हैं? चाहे तुम्हें एक अगुआ या कार्यकर्ता बनने को कहा जाए या चाहे तुम एक मेजबान के रूप में व्यंजन बना रहे हो या चाहे तुम्हें कलीसिया के बाहर कुछ मामलों का ध्यान रखने को कहा जाए या थोड़ा शारीरिक श्रम करने को कहा जाए, इन सभी कर्तव्यों को संचालित करने वाले सिद्धांत सत्य के आस-पास घूमते हैं। तो फिर इन सिद्धांतों में सबसे बड़ा और प्रमुख सिद्धांत कौन सा है? अपने कर्तव्यों का सही ढंग से निर्वहन करने और ऐसा करने में अपेक्षित मानकों को पूरा करने के लिए तुम्हें पता होना चाहिए कि कर्तव्य क्या है। वास्तव में कर्तव्य क्या है? क्या यह तुम्हारी आजीविका है? क्या तुम्हारे कर्तव्य को ऐसे आरंभ करना सही है मानो यह तुम्हारी आजीविका हो, यह सोचते हुए, "मुझे इसे अच्छी तरह करना है ताकि लोग देखें कि मैं कितना महान और सफल हूँ और तब क्या मेरे जीवन का अर्थ होगा"? (यह सही नहीं है।) बहुत से लोग नहीं जानते कि कर्तव्य सच में क्या है और इस दर्शन को अब स्पष्ट किया जाना चाहिए। कर्तव्य क्या है? कर्तव्य तुम लोगों द्वारा प्रबंधित नहीं है—यह तुम्हारा अपना कार्यक्षेत्र या तुम्हारी अपनी रचना भी नहीं है। इसकी बजाय, यह परमेश्वर का कार्य है। परमेश्वर के कार्य के लिए तुम लोगों के सहयोग की आवश्यकता है, जो तुम लोगों के कर्तव्य को उत्पन्न करता है। परमेश्वर के कार्य का वह हिस्सा जिसमें मनुष्य को अवश्य सहयोग करना चाहिए वह है उसका कर्तव्य। कर्तव्य परमेश्वर के कार्य का एक हिस्सा है—यह तुम्हारा कार्यक्षेत्र नहीं है, तुम्हारा घरेलू मामला नहीं है, और न ही यह तुम्हारा व्यक्तिगत मामला है। चाहे तुम्हारा कर्तव्य आंतरिक या बाहरी मामलों से निपटना हो, यह परमेश्वर के घर का कार्य है, यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना के एक हिस्से का निर्माण करता है, और यही वह आदेश है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है। यह तुम लोगों का व्यक्तिगत कारोबार नहीं है। तो फिर तुम्हें अपने कर्तव्य का निर्वहन कैसे करना चाहिए? इसलिए तुम मनमाने ढंग से अपना कर्तव्य निर्वहन नहीं कर सकते। ...

भले ही तू किसी भी कर्तव्य को पूरा करे, तुझे हमेशा परमेश्वर की इच्छा को समझने की और यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि तेरे कर्तव्य को लेकर उसकी क्या अपेक्षा है; केवल तभी तू सैद्धान्तिक तरीके से मामलों को सँभाल पाएगा। अपने कर्तव्य को निभाने में, तू अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार बिल्कुल नहीं जा सकता है या तू जो चाहे मात्र वह नहीं कर सकता है, जिसे भी करने में तू खुश और सहज हो, वह नहीं कर सकता है, या ऐसा काम नहीं कर सकता जो तुझे अच्छे व्यक्ति के रूप में दिखाये। यदि तू परमेश्वर पर अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को बलपूर्वक लागू करता है या उन का अभ्यास ऐसे करता है मानो कि वे सत्य हों, उनका ऐसे पालन करता है मानो कि वे सत्य के सिद्धांत हों, तो यह कर्तव्य पूरा करना नहीं है, और इस तरह से तेरा कर्तव्य निभाना परमेश्वर के द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। कुछ लोग सत्य को नहीं समझते हैं, और वे नहीं जानते कि अपने कर्तव्यों को ठीक से पूरा करने का क्या अर्थ है। उन्हें लगता है कि चूँकि उन्होंने अपना दिल और अपना प्रयास इसमें लगाया है, और देहासक्ति का त्याग किया है और कष्ट उठाया है, इसलिए उनके कर्तव्य की पूर्ति मानकों पर खरी उतरेगी—पर फिर क्यों परमेश्वर हमेशा असंतुष्ट रहता है? इन लोगों ने कहाँ भूल की है? उनकी भूल यह थी कि उन्होंने परमेश्वर की अपेक्षाओं की तलाश नहीं की थी, बल्कि अपने ही विचारों के अनुसार काम किया था; उन्होंने अपनी ही इच्छाओं, पसंदों और स्वार्थी उद्देश्यों को सत्य मान लिया था और उन्होंने इनको वो मान लिया जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, मानो कि वे परमेश्वर के मानक और अपेक्षाएँ प हों। जिन बातों को वे सही, अच्छी और सुन्दर मानते थे, उन्हें सत्य के रूप में देखते थे; यह गलत है। वास्तव में, भले ही लोगों को कभी कोई बात सही लगे, लगे कि यह सत्य के अनुरूप है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि यह आवश्यक रूप से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। लोग जितना अधिक यह सोचते हैं कि कोई बात सही है, उन्हें उतना ही अधिक सावधान होना चाहिए और उतना ही अधिक सत्य को खोजना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उनकी सोच परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप है या नहीं। यदि यह उसकी अपेक्षाओं के विरुद्ध है और उसके वचनों के विरुद्ध है, तो तुम्हारा यह सोचना गलत है कि यह बात सही है, क्योंकि यह बस एक मानवीय विचार है और यह आवश्यक रूप से सत्य के अनुरूप नहीं होगा भले ही तुम्हें यह कितना भी सही लगे। सही और गलत का तुम्हारा निर्णय सिर्फ़ परमेश्वर के वचनों पर आधारित होना चाहिए, और तुम्हें कोई बात चाहे जितनी भी सही लगे, जबतक इसका आधार परमेश्वर के वचन न हों, तुम्हें इसे हटा देना चाहिए। कर्तव्य क्या है? यह परमेश्वर द्वारा लोगों को सौंपा गया एक आदेश है। तो तुम्हें अपना कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? व्यक्तिपरक मानवीय इच्छाओं के आधार पर नहीं बल्कि परमेश्वर की अपेक्षाओं और मानकों के अनुसार काम कर तथा सत्य के सिद्धांतों पर अपना व्यवहार आधारित कर। इस तरह तुम्हारा अपने कर्तव्य को करना मानकों के स्तर का होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाया जा सकता है' से उद्धृत

6. वह करो जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए और अपने दायित्वों का पालन करो, अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करो और अपने कर्तव्य को धारण करो। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के कार्य में अपना योगदान देना चाहिए; यदि तुम नहीं देते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के योग्य नहीं हो और परमेश्वर के घर में रहने के योग्य नहीं हो।

छठवाँ विधान मनुष्‍य के कर्तव्‍यों से ताल्‍लुक रखता है। तुम्‍हारा पिछला जीवन कैसा ही क्‍यों न रहा हो या तुम्‍हारी निजी खोज जिस दिशा में भी क्‍यों न विकसित होती रही हो, और तुम्‍हारा बौद्धिक या मानवीय स्‍तर कितना भी उत्‍कृष्‍ट क्‍यों न रहा हो, अगर कलीसिया का काम तुमसे कोई माँग करता है, तो तुम्‍हें उसे करना चाहिए, भले ही उसे करने में कितनी ही मुश्किल क्‍यों न हो; अगर तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम परमेश्‍वर के घर में रहने लायक नहीं हो—परमेश्‍वर का घर तुम्‍हारे मुफ्त में रहने के लिए नहीं है। परमेश्‍वर का घर मनुष्‍य से ज्यादा किसी चीज की माँग नहीं करता : वह तुमसे यह माँग नहीं करता कि तुम्‍हारा बौद्धिक स्‍तर, तुम्‍हारी मानवीयता, तुम्‍हारी कार्य-कुशलता सहसा उत्‍कृष्‍ट हो जाए—लेकिन कम-से-कम तुम्‍हारा व्‍यवहार और आचरण तो स्वीकार्य होना चाहिए। तुममें थोड़ा परमेश्वर का भय मानने वाला रवैया होना चाहिए और तुम्हें उसके प्रति समर्पण दिखाना चाहिए। अगर तुम यह भी नहीं कर सकते, तो तुम्हें जल्दी से घर लौट जाना चाहिए और परमेश्वर के घर में जैसे-तैसे काम करना बंद कर देना चाहिए, लेकिन तुम इनकार कर देते हो, और तुम बस परमेश्वर के घर में मुफ्तखोरी करना चाहते हो, क्या यह किसी ऐसे इंसान का उदाहरण है जो ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करता है? मेरी नजर में, ऐसा इंसान अविश्वासी माना जा सकता है और वह गैर-विश्वासी से थोड़ा भी अलग नहीं है। ऐसे लोगों को तो देखने से भी घिन आती है! अगर तुम परमेश्‍वर में विश्‍वास करने की इच्‍छा रखते हो, तो तुम्‍हें यह उचित ढंग से करना चाहिए; अगर तुम विश्‍वास नहीं करना चाहते, तो वैसा करने के लिए तुमसे कोई विनती नहीं कर रहा है। किसने तुमसे विश्वास करने के लिए कहा? ऐसा करना तुम्हारी अपनी इच्छा थी। अगर तुम इतनी छोटी-सी चीज भी नहीं कर सकते, तो परमेश्‍वर में विश्‍वास करने के बारे में बात करने की भी क्‍या जरूरत है? अगर तुम धार्मिक व्‍यक्ति नहीं हो सकते, तो कम-से-कम एक अच्‍छे सांसारिक व्‍यक्ति तो बनो, ऐसा व्‍यक्ति जो कुछ भला करता हो; अगर तुम वह तक नहीं कर सकते, तो फिर तुम कचरे की तरह रद्दी हो। परमेश्‍वर के घर को रद्दी कचरे की कोई जरूरत नहीं है। यह कोई कूड़ाघर नहीं—ऐसा कचरा किसी काम का नहीं है। जिन लोगों में लेशमात्र भी सत्य नहीं है, उन्हें हटा दिया जाना चाहिए और बाहर फेंक दिया जाना चाहिए! तुम लोगों को ऐसे उल्लंघन बिलकुल नहीं करने चाहिए; तुम्हें सिद्धांतों के अनुसार काम करना चाहिए। जो भी ऐसे उल्लंघन करेगा और परमेश्वर के घर के कार्य को बाधित करेगा या उसमें विघ्न डालेगा, उसे दूर कर दिया जाएगा और पूरी तरह से हटा दिया जाएगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'राज्य के युग में परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं के बारे में वार्ता' से उद्धृत

कुछ लोग भयानक रूप से स्वार्थी होते हैं—चरम स्तर तक स्वार्थी—और यह चरम स्तर उनके स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है। हर कोई कुछ हद तक स्वार्थी होता है, लेकिन एक अंतर होता है। दूसरों के साथ मेलजोल करते हुए, कुछ लोग उनकी देखरेख और देखभाल कर सकते हैं, उनके बारे में चिंतित रह सकते हैं, और जो भी वे करते हैं उन सभी चीजों में उनकी फिक्र करते हैं; जबकि अन्य लोग इस तरह नहीं होते। एक ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचो जो विशेष रूप से स्वार्थी है, और जो अपने भाई-बहनों की मेजबानी करते समय अपने परिवार को सबसे अच्छा भोजन देता है, लेकिन जब भाई और बहनें आते हैं तो उन्हें वह निम्न कोटि का और थोड़ा-थोड़ा भोजन परोसता है। जब उसके अपने संबंधी आते हैं तो वह उनके लिए बढ़िया-से-बढ़िया प्रबंध करता है और सब कुछ सलीके से करता है; लेकिन जब भाई और बहनें आते हैं तो वह उन्हें जमीन पर सुलाता है। जब उसके भाई-बहनें बीमार पड़ते हैं या किसी दूसरी मुसीबत में होते हैं, तो वह उनके बारे में सोचता तक नहीं, और ऐसा व्यवहार करता है जैसे उसे पता तक नहीं। उसके लिए यही बहुत है कि जब वे लोग आते हैं तो वह उन्हें रहने की अनुमति दे देता है। ऐसे लोगों को दूसरों की बिल्कुल भी चिंता या परवाह नहीं होती है। वे केवल अपनी और अपने रिश्तेदारों की परवाह करते हैं। उनका यह स्वार्थी स्वभाव यह निर्धारित करता है कि वे दूसरों की देखभाल करने के इच्छुक नहीं हैं। उन्हें लगता है कि दूसरों की देखभाल करना उनके लिए नुकसानदायक और परेशानी का काम है। हो सकता है कि कुछ लोग यह तर्क दें, "एक स्वार्थी व्यक्ति को नहीं पता होता कि दूसरों की देखभाल कैसे करें।" तो फिर वे अपने रिश्तेदारों के साथ इतना अच्छा व्यवहार क्यों करते हैं, और वे पूरी तरह उनकी जरूरतों का ख्याल क्यों रखते हैं? उन्हें कैसे मालूम कि उनके पास किस चीज की कमी है और किसी निश्चित समय पर क्या पहनना या क्या खाना उपयुक्त है? वे दूसरों के लिए ऐसे क्यों नहीं हो सकते? दरअसल, वे यह सब समझते हैं, लेकिन वे स्वार्थी हैं, और यह उनके स्वभाव से निर्धारित होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

अच्छे कर्म तैयार करने का अर्थ यह है कि तुम स्वयं अपना कर्तव्य पूरा करो। यदि तुम अपना कर्तव्य पूर्णरूपेण परमेश्वर की इच्छा के अनुसार पूरा करते हो और परिणाम हासिल कर लेते हो, तो जितना अधिक तुम अपना कर्तव्य पूरा करोगे, उतने ही अधिक अच्छे कर्म तुम तैयार करोगे। परंतु यदि तुम जो करते हो, वह परमेश्वर की इच्छा और सिद्धांत के अनुसार नहीं है, तो वह अच्छा कर्म नहीं है। उदाहरण के लिए, जब हम दूसरों की मेजबानी करते हैं, उनकी मदद करते हैं और उन्हें भिक्षा देते हैं, तो हम ये सब किसके लिए करते हैं? ये हम उनके लिए करते हैं, जो ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करते हों और सत्य की खोज करते हों। उन्हें परमेश्वर के चुने हुए लोगों को दिया जाना चाहिए। यदि जिन्हें तुम आपूर्ति देते हो, जिन्हें भिक्षा देते हो और जिनकी मदद करते हो, वे ये लोग नहीं हैं, बल्कि वे अविश्वासी, गैर-विश्वासी, मसीह-विरोधी और कुकर्मी हैं, तो यह परेशानी की बात है, और ये अच्छे कर्म नहीं हैं। वे अच्छे कर्म तभी कहलाएँगे, जब तुम उन्हें उनके लिए करो जो परमेश्वर के हृदय के अनुरूप हैं, जिन्हें परमेश्वर बचाएगा, अर्थात् परमेश्वर के सच्चे चुने हुए लोग। कुछ लोगों में झूठे अगुआओं को पहचानने की क्षमता की कमी होती है—वे झूठे नेताओं के शब्दों और सिद्धांत को आध्यात्मिक कहते हैं, और फिर वे उनकी चाटुकारिता करेंगे, उनकी मेजबानी करेंगे, उन्हें सबसे अच्छा भोजन कराएँगे और उन्हें बेहतरीन कपड़े देंगे। यहाँ समस्या क्या है? क्या ऐसा करना एक अच्छा कर्म है? यह आँख मूँदकर और सिद्धांतविहीन होकर कार्य करना है। इस तरह के लोग बाहरी तौर पर तो बहुत-से अच्छे कर्म करते दिखाई पड़ते हैं, लेकिन उनमें से एक को भी परमेश्वर का आशीष नहीं मिलता और उनमें से एक भी परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं होता। यह सारा प्रयास पैसे की बरबादी है, यह उसका सही उपयोग नहीं है। इसलिए जो लोग मेजबानी करते हैं या भिक्षा देते हैं, उनमें सिद्धांत और विवेक होना चाहिए। यदि तुम उन लोगों की मेजबानी करते हो या उन लोगों को दान देते हो, जो दुष्ट मानवता वाले हैं, जो कलीसिया में बुरा व्यवहार करते हैं, जो कलीसिया को धोखा देकर खाते-पीते हैं, जो सत्य पर सहभागिता नहीं कर सकते, और जिनके पास अनुभव की कोई सच्ची गवाही नहीं होती, तो ये लोग झूठे अगुआ और मसीह-विरोधी हैं, जो कलीसिया पर बोझ बनकर जीते हैं। उनकी मेजबानी मत करो। ऐसे लोगों को परमेश्वर के घर से हटा दिया जाएगा। जब तुम ऐसे लोगों से मिलो, तो तुम्हें विवेकशील होना चाहिए और उनसे बचने के लिए तुम्हें बुद्धि का उपयोग करना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, "मैं इस व्यक्ति से पहले कभी नहीं मिला, और मुझे इस बारे में कोई समझ नहीं है। क्या मुझे उसका आतिथ्य करने से मना कर देना चाहिए?" ऐसी परिस्थितियों में, पहले तो उसकी मेजबानी करो और फिर सही इरादे से इस व्यक्ति को उजागर करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करो। और जिस दिन तुम स्पष्ट रूप से उसकी असलियत देख लो, उस दिन तुम कह सकते हो, "अब मैंने जान लिया है कि तुम सत्य से प्रेम करने वाले व्यक्ति नहीं हो और तुम सत्य की खोज नहीं करते। तुम हमेशा लोगों को शब्दों और सिद्धांतों का भाषण देते और उनसे उन्हें विवश करते हो। तुम झूठे विश्वासी, झूठे अगुआ और झूठे कार्यकर्ता हो। तुम यहाँ इतने लंबे समय से हो, लेकिन तुमने सत्य-सिद्धांत को जरा भी समझने में हमारी अगुआई नहीं की है, तुम्हारे पास कोई सच्ची गवाही नहीं है और हमें तुमसे कोई लाभ नहीं हुआ है। मैंने गलत व्यक्ति की मेजबानी की है, और परमेश्वर मुझे तुम्हारी मेजबानी करने पर आशीष नहीं देता, इसलिए मैं अब तुम्हारी मेजबानी नहीं करूँगा।" ऐसा करने में कुछ भी गलत नहीं है, क्योंकि तुमने एक झूठे अगुआ का पता लगा लिया है। यदि तुम्हारा कोई सच्चा भाई-बहन है, भले ही उनमें कुछ भ्रष्टता उजागर हुई हो, यदि वे सत्य पर सहभागिता करने और स्वयं को जानने में सक्षम हैं, तो तुम्हें उनके साथ सही व्यवहार करना चाहिए। इस पर विचार करो कि कुछ अगुआ और कार्यकर्ता कुछ भ्रष्टता प्रकट करते हैं, लेकिन वे सत्य, काट-छाँट और निपटे जाने को स्वीकार करते हैं। वे अच्छे लोग हैं, ऐसे लोग जिनकी मेजबानी की जानी चाहिए। यदि उनमें बहुत अधिक भ्रष्टता प्रकट होती है और उन्हें अपनी थोड़ी-सी भी समझ नहीं है, और इस बीच वे लगातार दूसरों को भाषण देते रहते हैं, और अगर तुम उनके बारे में नकारात्मक राय रखते हो या उन्हें समस्याएँ बताते हो, और वे तुम्हें दुश्मन समझें और तुम्हें कुकर्मी कहकर तुम पर हमला करें, तो समझो तुम्हारा सामना किसी मसीह-विरोधी या कुकर्मी से हुआ है। ऐसे लोगों को अस्वीकार कर देना चाहिए और उनकी मेजबानी नहीं करनी चाहिए। ऐसे लोग बहुत दुष्ट होते हैं, और वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं होते।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

अच्छे कर्म परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ही तैयार करने चाहिए। अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु ने कहा था, "मैं तुम से सच कहता हूँ कि तुमने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया" (मत्ती 25:40)। अगर तुम्हारे छोटे-से-छोटे भाई-बहनों में, जो अगुआ या कार्यकर्ता नहीं हैं, सच्चा विश्वास हो, वे अच्छे लोग हों, और वे कुकर्मी, कलीसिया पर बोझ, मसीह-विरोधी या अविश्वासी न हों, तो जो कुछ भी तुम उनके लिए करते हो, वह प्रभु के लिए करने के समान है, और उसका प्रतिफल भी वैसा ही मिलता है। इसलिए, परमेश्वर में विश्वास करने वालों को पर्याप्त मात्रा में अच्छे कर्म तैयार करने चाहिए और उन्हें ऐसा करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाहिए। मुख्य भूमि चीन में कई भाई-बहनों का बड़े लाल अजगर द्वारा पीछा किया जाता और उन्हें खोजा जाता है, और उनके पास छिपने के लिए कोई जगह नहीं होती। कुछ भाई-बहन उनकी मेजबानी करने और उनको छिपाने का जोखिम उठाते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के प्रति वफादार होते हैं और उन्हें परमेश्वर का आशीष प्राप्त होता है। ऐसे भाई-बहन भी हैं, जिनके लिए घर लौटना मुश्किल होता है। उनके घर पर बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल करने वाला कोई नहीं होता, और उनके परिवारों को गुजारा तक करने में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लेकिन कुछ भाई-बहन हैं, जो उनके साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करते हैं और उनकी ओर मदद का हाथ बढ़ाते हैं। यह वास्तव में एक अच्छा कर्म है। यदि किसी भाई-बहन की गिरफ्तारी के बाद हम देखते हैं कि उसका परिवार कठिनाइयों से घिरा हुआ है और फिर भी हम उसकी परवाह या चिंता नहीं करते, यदि हम केवल अपनी ही परवाह करते हैं, तो कलीसिया में परमेश्वर के कोई सच्चे चुने हुए लोग नहीं हैं—केवल अविश्वासी ही हैं। ऐसे लोग अच्छे कर्म नहीं करते, और उनके दिलों में प्रेम नहीं होता। कुछ लोग सत्ता के प्रति आकर्षित रहते हैं और हमेशा सोचते हैं, "केवल उच्चस्तरीय अगुआओं की मेजबानी करना ही प्रभु के लिए काम करना है, और मुझे केवल परमेश्वर की मेजबानी करने पर ही पुरस्कृत किया जाएगा, इसलिए मुझे सामान्य भाई-बहनों की कोई परवाह नहीं, मैं उनकी मेजबानी नहीं करूँगा।" यहाँ क्या समस्या है? जब तुम्हें पता चल जाए कि कोई व्यक्ति सच्चा भाई या बहन नहीं है, उसे सत्य से प्रेम नहीं है, और वह नाममात्र का ही विश्वासी है, केवल तभी तुम उसकी मेजबानी करने से इनकार कर सकते हो। अगर कोई सच्चा विश्वासी है, तो भले ही वह कुछ भ्रष्टता प्रकट करता हो, यह सामान्य है, कोई भी पूर्ण नहीं होता, और तुम्हें उसकी मेजबानी करनी चाहिए। कुछ लोग मेजबानी के अपने कर्तव्य का पालन करते समय सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होते हैं। वे परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम और उसे संतुष्ट करने की इच्छा से भाई-बहनों की मेजबानी करने में सक्षम होते हैं। अंतत:, भाई-बहन ऐसे लोगों में परमेश्वर के प्रेम के साथ-साथ लोगों के प्रति परमेश्वर की दया, सच्ची इंसानियत को जीना, लोगों में अपेक्षित अंतरात्मा और विवेक देखते हैं, और वे जानते हैं कि व्यक्ति को कैसा व्यवहार करना चाहिए। यद्यपि ऐसे लोग कलीसिया के अगुआ नहीं होते, फिर भी अन्य लोग उनसे बहुत लाभ उठा सकते हैं। चूँकि ऐसे लोग सत्य की खोज करते हैं, परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होते हैं, और उनके पास परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय होता है, इसलिए वे अपने भाई-बहनों के साथ सहिष्णु और धैर्यवान होते हैं। भाई-बहन चाहे कैसी भी भ्रष्टता प्रकट करें, वे उनसे घृणा नहीं करते, वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर पर भरोसा करते हैं और समस्याएँ सुलझाने के लिए सत्य की तलाश करते हैं। वे अन्य लोगों के प्रति अपना कर्तव्य भी निभाते हैं—उन्हें लाभ पहुँचाने के लिए सत्य पर और अपने अनुभव की गवाही पर सहभागिता करते हैं। इस तरह से अपना कर्तव्य निभाना पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होता है, और ऐसे लोग परमेश्वर के दिल के अनुरूप भी होते हैं।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

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