83. परमेश्वर के चुने हुए लोगों को प्राप्त करने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के चुने हुए लोगों का प्रेमपूर्वक और सिद्धांतों के साथ स्वागत करना और कलीसिया की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए। कभी भी मसीह-विरोधियों, दुष्ट लोगों या बुरी आत्माओं को आने न दो;

(2) क्लेश के समय में, अगुवाओं और सेवाकर्मियों को, साथ ही भाइयों और बहनों को, सुरक्षित रखा जाना चाहिए। यह एक आत्म-सम्मान वाली ज़िम्मेदारी है, और यह एक अच्छा कर्म भी है;

(3) किसी गृहस्थी को वह करना चाहिए जो वे अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार कर सकें, जिसमें सादगी और सुविधा पर ध्यान दिया गया हो। असंयमित रूप से खाना-पीना वर्जित है; इसके बजाय, दूसरों को तृप्ति तक खाने देने के सिद्धांत द्वारा मार्गदर्शित रहो;

(4) यदि कोई यजमान परिवार कठिनाइयों का सामना करता है, तो कलीसिया को उन्हें हल करना चाहिए; यदि किसी मेजबान परिवार के वित्तीय मुद्दे हो, तो कलीसिया स्वागत की पूरी लागत का वहन कर सकता है।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"मैं तुम से सच सच कहता हूँ कि जो मेरे भेजे हुए को ग्रहण करता है, वह मुझे ग्रहण करता है; और जो मुझे ग्रहण करता है, वह मेरे भेजनेवाले को ग्रहण करता है" (यूहन्ना 13:20)।

"जो भविष्यद्वक्‍ता को भविष्यद्वक्‍ता जानकर ग्रहण करे, वह भविष्यद्वक्‍ता का बदला पाएगा; और जो धर्मी को धर्मी जानकर ग्रहण करे, वह धर्मी का बदला पाएगा" (मत्ती 10:41)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

चाहे तुम कोई भी कर्तव्य निभाओ, जो सिद्धांत तुम्हें समझने चाहिए और जो सत्य तुम्हें अभ्यास में लाना चाहिए, क्या वे एक समान हैं? चाहे तुम्हें एक अगुआ या कार्यकर्ता बनने को कहा जाए या चाहे तुम एक मेजबान के रूप में व्यंजन बना रहे हो या चाहे तुम्हें कलीसिया के बाहर कुछ मामलों का ध्यान रखने को कहा जाए या थोड़ा शारीरिक श्रम करने को कहा जाए, इन सभी कर्तव्यों को संचालित करने वाले सिद्धांत सत्य के आस-पास घूमते हैं। तो फिर इन सिद्धांतों में सबसे बड़ा और प्रमुख सिद्धांत कौन सा है? अपने कर्तव्यों का सही ढंग से निर्वहन करने और ऐसा करने में अपेक्षित मानकों को पूरा करने के लिए तुम्हें पता होना चाहिए कि कर्तव्य क्या है। वास्तव में कर्तव्य क्या है? क्या यह तुम्हारी आजीविका है? क्या तुम्हारे कर्तव्य को ऐसे आरंभ करना सही है मानो यह तुम्हारी आजीविका हो, यह सोचते हुए, "मुझे इसे अच्छी तरह करना है ताकि लोग देखें कि मैं कितना महान और सफल हूँ और तब क्या मेरे जीवन का अर्थ होगा"? (यह सही नहीं है।) बहुत से लोग नहीं जानते कि कर्तव्य सच में क्या है और इस दर्शन को अब स्पष्ट किया जाना चाहिए। कर्तव्य क्या है? कर्तव्य तुम लोगों द्वारा प्रबंधित नहीं है—यह तुम्हारा अपना कार्यक्षेत्र या तुम्हारी अपनी रचना भी नहीं है। इसकी बजाय, यह परमेश्वर का कार्य है। परमेश्वर के कार्य के लिए तुम लोगों के सहयोग की आवश्यकता है, जो तुम लोगों के कर्तव्य को उत्पन्न करता है। परमेश्वर के कार्य का वह हिस्सा जिसमें मनुष्य को अवश्य सहयोग करना चाहिए वह है उसका कर्तव्य। कर्तव्य परमेश्वर के कार्य का एक हिस्सा है—यह तुम्हारा कार्यक्षेत्र नहीं है, तुम्हारा घरेलू मामला नहीं है, और न ही यह तुम्हारा व्यक्तिगत मामला है। चाहे तुम्हारा कर्तव्य आंतरिक या बाहरी मामलों से निपटना हो, यह परमेश्वर के घर का कार्य है, यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना के एक हिस्से का निर्माण करता है, और यही वह आदेश है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है। यह तुम लोगों का व्यक्तिगत कारोबार नहीं है। तो फिर तुम्हें अपने कर्तव्य का निर्वहन कैसे करना चाहिए? इसलिए तुम मनमाने ढंग से अपना कर्तव्य निर्वहन नहीं कर सकते। ...

भले ही तू किसी भी कर्तव्य को पूरा करे, तुझे हमेशा परमेश्वर की इच्छा को समझने की और यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि तेरे कर्तव्य को लेकर उसकी क्या अपेक्षा है; केवल तभी तू सैद्धान्तिक तरीके से मामलों को सँभाल पाएगा। अपने कर्तव्य को निभाने में, तू अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार बिल्कुल नहीं जा सकता है या तू जो चाहे मात्र वह नहीं कर सकता है, जिसे भी करने में तू खुश और सहज हो, वह नहीं कर सकता है, या ऐसा काम नहीं कर सकता जो तुझे अच्छे व्यक्ति के रूप में दिखाये। यदि तू परमेश्वर पर अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को बलपूर्वक लागू करता है या उन का अभ्यास ऐसे करता है मानो कि वे सत्य हों, उनका ऐसे पालन करता है मानो कि वे सत्य के सिद्धांत हों, तो यह कर्तव्य पूरा करना नहीं है, और इस तरह से तेरा कर्तव्य निभाना परमेश्वर के द्वारा याद नहीं रखा जाएगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य के सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाया जा सकता है' से उद्धृत

6. वह करो जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए और अपने दायित्वों का पालन करो, अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करो और अपने कर्तव्य को धारण करो। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के कार्य में अपना योगदान देना चाहिए; यदि तुम नहीं देते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के योग्य नहीं हो और परमेश्वर के घर में रहने के योग्य नहीं हो।

छठवाँ विधान मनुष्‍य के कर्तव्‍यों से ताल्‍लुक रखता है। तुम्‍हारा पिछला जीवन कैसा ही क्‍यों न रहा हो या तुम्‍हारे निजी उद्यम जिस किसी भी दिशा में क्‍यों न विकसित होते रहे हों, और तुम्‍हारा बौद्धिक या मानवीय स्‍तर कितना भी उत्‍कृष्‍ट क्‍यों न रहा हो, अगर कलीसिया का काम तुमसे कोई माँग करता है, तो तुम्‍हें उसे करना चाहिए, भले उसे करने में कितनी मुश्किल क्‍यों न हो; अगर तुम नहीं करते, तो तुम परमेश्‍वर के घर में रहने लायक़ नहीं हो—परमेश्‍वर का घर तुम्‍हारी मुफ़्तख़ोरी के लिए नहीं है। परमेश्‍वर का घर मनुष्‍य से ज्‍़यादा किसी चीज़ की माँग नहीं करता : वह तुमसे यह माँग नहीं करता कि तुम्‍हारा बौद्धिक स्‍तर, तुम्‍हारी मानवीयता, तुम्‍हारी कार्य-कुशलता सहसा उत्‍कृष्‍ट हो जाए—लेकिन कम-से-कम तुम्‍हारा व्‍यवहार और आचरण तो सन्‍तोषजनक होना ही चाहिए। तुममें थोड़ा परमेश्वर का भय मानने वाला रवैया होना चाहिए और तुम्हें उसके प्रति तुम्हें समर्पण दिखाना चाहिए। अगर तुम यह भी नहीं कर सकते, तो तुम्हें जल्दी से घर लौट जाना चाहिए और परमेश्वर के घर में जैसे-तैसे काम करना बंद कर देना चाहिए, लेकिन तुम इनकार कर देते हो, और तुम बस परमेश्वर के घर में मुफ़्तखोरी करना चाहते हो, क्या यह किसी ऐसे इंसान का उदाहरण है जो ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करता है? मेरी नज़र में, ऐसा इंसान अविश्वासी माना जा सकता है और वह गैर-विश्वासी से थोड़ा भी अलग नहीं है। ऐसे लोगों को तो देखने से भी घिन आती है! अगर तुम परमेश्‍वर में विश्‍वास करने की इच्‍छा रखते हो, तो तुम्‍हें यह उचित ढंग से करना चाहिए; अगर तुम विश्‍वास नहीं करना चाहते, तो वैसा करने के लिए तुमसे कोई विनती नहीं कर रहा है। किसने तुमसे विश्वास करने के लिए कहा? ऐसा करना तुम्हारी अपनी मर्ज़ी थी। अगर तुम इतनी छोटी-सी चीज़ भी नहीं कर सकते, तो परमेश्‍वर में विश्‍वास करने के बारे में बात करने की भी क्‍या ज़रूरत है? अगर तुम धार्मिक व्‍यक्ति नहीं हो सकते, तो कम-से-कम एक अच्‍छे सांसारिक व्‍यक्ति तो बनो, ऐसा व्‍यक्ति जो कुछ भला करता हो; अगर तुम वह तक नहीं कर सकते, तो फिर तुम कचरे से भी ज्‍़यादा रद्दी हो। परमेश्‍वर के घर को रद्दी कचरे की कोई ज़रूरत नहीं है। यह कोई कूड़ाघर नहीं—ऐसा कचरा किसी काम का नहीं। जिन लोगों में लेशमात्र भी सत्य नहीं है, उन्हें हटा दिया जाना और फेंक देना चाहिए! तुम लोगों को ऐसे उपद्रव बिलकुल नहीं करना चाहिए; तुम्हें सिद्धांतों के अनुसार काम करना चाहिए। जो भी उपद्रव करेगा और परमेश्वर के घर के कार्य को बाधित करेगा या उसमें विघ्न डालेगा, उसे दूर किया और पूरी तरह हटा दिया जाएगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'राज्य के युग में परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं के बारे में वार्ता' से उद्धृत

कुछ लोग बेहद स्वार्थी होते हैं, और इस तरह का चरम स्तर उनके स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है। हर कोई कुछ हद तक स्वार्थी है, लेकिन एक अंतर है। दूसरों के साथ मेलजोल करते हुए, कुछ लोग उनकी देखरेख और देखभाल कर सकते हैं, उनके बारे में चिंतित रह सकते हैं, और जो भी वे करते हैं उन सभी चीज़ों में उनकी फ़िक्र करते हैं। अन्य लोग इस तरह नहीं होते हैं; उस स्त्री पर विचार करें जो दूसरों की मेज़बानी करते समय विशेष रूप से स्वार्थी होती है: उसका अपना परिवार सबसे अच्छा भोजन खाता है, लेकिन जब भाई और बहन आते हैं तो उन्हें वह निम्न कोटि का भोजन परोसती है। जब अच्छी चीज़ें होती हैं तो वह उन्हें अपने बच्चों, पति या अपने परिवार के सामने रखती है। जब भाई और बहन आते हैं तो उन्हें ज़मीन पर सुलाती है, लेकिन जब उसके रिश्तेदार आते हैं तो वह उनके लिए हर चीज़ के साथ सबसे आरामदायक व्यवस्था करती है। इस तरह का व्यक्ति अन्य लोगों के बारे में बिल्कुल नहीं सोचता है। उसके लिए यही बहुत है कि जब वे लोग आते हैं तो उन्हें रहने की अनुमति दे, और इसलिए जब वे बीमार पड़ते हैं या कुछ अन्य कठिनाई आती है, तो वह इसके बारे में सोचती भी नहीं है, और ऐसा बर्ताव करती है कि जैसे उसने देखा ही नहीं हो। उसे दूसरों की बिल्कुल भी चिंता या फ़िक्र नहीं होती है। वह केवल अपनी और अपने रिश्तेदारों की परवाह करती है। उसका यह स्वार्थी स्वभाव यह निर्धारित करता है कि वह दूसरों की देखभाल करने के लिए तैयार नहीं है। उसे लगता है कि दूसरों की देखभाल करना उसके लिए एक नुकसान और परेशानी है। हो सकता है कि कुछ लोग यह तर्क रखेंगे, "एक स्वार्थी व्यक्ति को नहीं पता कि दूसरों की देखभाल कैसे करें? तो फिर वे अपने रिश्तेदारों के साथ इतना अच्छा व्यवहार क्यों करते हैं, और वे पूरी तरह उनकी ज़रूरतों का ख्याल क्यों रखते हैं? उन्हें कैसे मालूम कि उनके पास किस चीज़ की कमी है और किसी निश्चित समय पर क्या पहनना या क्या खाना उपयुक्त है? वे दूसरों के लिए ऐसे क्यों नहीं हो सकते?" दरअसल, वे यह सब समझते हैं, लेकिन वे स्वार्थी हैं, और यह उनके स्वभाव से निर्धारित होता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

कुछ लोग परमेश्वर में विश्वास करने को लेकर लोकप्रिय होने के बावजूद, अभी भी ऐसे भाई-बहनों को शामिल करने और उनकी रक्षा करने का जोखिम उठाते हैं जिन्हें वांछित अपराधी बताया गया है और जिनकी गिरफ़्तारी के लिए तलाश की जा रही है। कुछ लोग विश्वासियों जैसे लोकप्रिय नहीं होते हैं, इसलिए जब वे लोगों को शामिल करते हैं, वे ज़्यादा जोखिम में नहीं होते हैं; वे कुछ ऐसे भाई-बहनों की रक्षा करने में सक्षम होने की शर्त को पूरा करते हैं जो छिपते फिर रहे हैं, लेकिन वे सिर्फ़ इसलिए उन्हें शामिल नहीं करना चाहते हैं क्योंकि उन्हें यह चिंता रहती है कि ऐसा करने से उनके लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी। क्या ऐसे लोग अच्छे कर्म करने वाले हैं? वे परमेश्वर में विशवास करने के लिए ज़रा सा भी जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। ऐसे लोग विशेष रूप से स्वार्थी और नीच होते हैं, वे दुर्भावनापूर्ण वाले होते हैं। इसलिए, परमेश्वर में उनका विश्वास खोखला होता है; उन्हें परमेश्वर की प्रशंसा बिल्कुल भी नहीं मिलेगी। तुम में से कुछ लोग तो अन्य लोगों को शामिल करने के लिए बड़े लाल अजगर का पतन होने तक इंतज़ार करना चाहते हो, मगर तब तक तुम्हारी ज़रूरत ही नहीं होगी। बारिश ख़त्म होने पर छाता खोलने का कोई मतलब नहीं, क्योंकि ऐसा करना बेकार है! परमेश्वर धार्मिक है। तुम ये मामूली सी सेवा के लिए भी खुद को तैयार नहीं कर पाते हो, फिर भी आशीष पाना चाहते हो! परमेश्वर का घर किस तरह के नेक कर्मों को सबसे अधिक महत्व देता है? मुख्यभूमि चीन में ऐसे बहुत से भाई-बहन हैं जिनका पीछा किया जा रहा है और बड़े लाल अजगर ने उन्हें गिरफ़्तारी के लिए वांछित बताया है, उनके पास छिपने की कोई जगह नहीं है। कुछ भाई-बहन उन्हें शामिल करने और सुरक्षा देने का जोखिम उठा रहे हैं; ये ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हैं और उसका आशीष पा सकते हैं। नेक कर्म करने के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि लोग सत्य को कितना समझते हैं; सबसे अहम बात है कि क्या वे हृदय से सदाचारी हैं, क्या वे परमेश्वर की इच्छा पर विचार करते हैं, और उनके दिलों में परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए सच्चा प्यार है या नहीं। यही बात सबसे अहम है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

कुछ लोग दूसरों को शामिल करने का काम करते हैं और इस प्रक्रिया में, वे सत्य पर अमल कर सकते हैं और भाई-बहनों को शामिल कर सकते हैं। वे यह सब परमेश्वर से प्रेम करने और उसे संतुष्ट करने की सोच के साथ करते हैं। आखिर में, उन भाई-बहनों को उनमें परमेश्वर का प्रेम दिखता है, वे इंसान के लिए परमेश्वर की दया को देखते हैं, वे सच्ची इंसानियत को देखते हैं जिसके साथ लोगों को जीना चाहिए, वे उस विवेक और समझ को देखते हैं जो इंसानों में होनी चाहिए, वे यह जान पाते हैं कि उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिए। हालांकि ऐसे लोग कलीसिया अगुआ नहीं भी हो सकते हैं, दूसरे लोग उनसे कुछ काफ़ी लाभ लेते हैं। क्योंकि ऐसे लोग सत्य का अनुसरण करते हैं, परमेश्वर की इच्छा पर विचार कर पाने में सक्षम होते हैं और उससे प्रेम करते हैं, वे भाई-बहनों के प्रति सहनशील और धैर्यवान हो सकते हैं। चाहे भाई-बहन कैसी भी भ्रष्टता का ख़ुलासा करें, ये लोग उनके ख़िलाफ़ नहीं जाते हैं; वे हमेशा परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर पर भरोसा करते हैं, समाधान ढूंढने के लिए सत्य की खोज करते हैं और फिर भी दूसरों के लिए अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकते हैं, अर्थात सत्य पर सहभागिता कर सकते हैं और अपने अनुभवों से जुड़ी गवाहियां साझा कर सकते हैं, ताकि दूसरों को लाभ हो सके। इस तरह, वे जो कर्तव्य निभाते हैं वह पूरी तरह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होता है और वे स्वयं ऐसे लोग भी होते हैं जो परमेश्वर की इच्छा का पालन करते हैं।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

पिछला: 82. नवागंतुकों के सिंचन के सिद्धांत

अगला: 84. अच्छे कर्मों की तैयारी के सिद्धांत

क्या आप जानना चाहते हैं कि सच्चा प्रायश्चित करके परमेश्वर की सुरक्षा कैसे प्राप्त करनी है? इसका तरीका खोजने के लिए हमारे ऑनलाइन समूह में शामिल हों।

संबंधित सामग्री

610 प्रभु यीशु का अनुकरण करो

Iपूरा किया परमेश्वर के आदेश को यीशु ने,हर इंसान के छुटकारे के काम को,क्योंकि उसने परमेश्वर की इच्छा की परवाह की,इसमें न उसका स्वार्थ था, न...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति अंत के दिनों के मसीह—उद्धारकर्ता का प्रकटन और कार्य राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें