47. वास्‍तविक आत्‍म-ज्ञान के सिद्धांत

(1) अगर तुम आत्‍म-चिंतन करते हो और खुद को समझते हो और परमेश्‍वर के वचनों के न्‍यायों और प्रकाशनों के मुताबिक अपना आकलन करते हो, तो तुम अपनी खुद की कुरूपता और बुराई को देख सकोगे।

(2) जो आत्‍म–ज्ञान व्‍यक्ति को परीक्षणों और शोधन के दौरान, साथ ही काट-छाँट तथा निपटे जाने के दौरान, उसके भ्रष्‍ट स्‍वभाव के उजागर होने से प्राप्‍त होता है, वह सबसे सच्‍चा आत्‍म-ज्ञान होता है, और, उसके माध्‍यम से व्‍यक्ति पूरी तरह से आश्वस्त हो सकता है।

(3) कठिनाइयों को झेलते समय स्‍पष्‍ट ढंग से जाँच-पड़ताल करो कि वह तुम्‍हारी विफलता और पतन का कारण क्या है, साथ ही तुम्‍हारी किस रुकावट की वजह से इस तरह का नतीजा सामने आया है। अपनी प्रकृति और सार को समझने के योग्‍य बनो।

(4) अपनी प्रकृति-सार को, और अपने भ्रष्‍ट स्‍वभाव के उजागर हुए हिस्‍सों को स्‍पष्‍ट तौर पर देखने का सबसे आसान उपाय यह है कि तुम जिस मार्ग पर चलते हो उस पर मनन करो और उस चीज पर भी जो तुम्‍हें तुम्‍हारे कर्तव्‍य-पालन के लिए प्रेरित करती है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

भ्रष्टाचार के हजारों सालों बाद, मनुष्य संवेदनहीन और मूर्ख बन गया है; वह एक दुष्ट आत्मा बन गया है जो परमेश्वर का विरोध करती है, इस हद तक कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की विद्रोहशीलता इतिहास की पुस्तकों में दर्ज की गई है, यहाँ तक कि मनुष्य खुद भी अपने विद्रोही आचरण का पूरा लेखा-जोखा देने में असमर्थ है—क्योंकि मनुष्य शैतान के द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट किया जा चुका है, और शैतान के द्वारा रास्ते से भटका दिया गया है इसलिए वह नहीं जानता कि कहाँ जाना है। आज भी, मनुष्य परमेश्वर को धोखा देता है : जब मनुष्य परमेश्वर को देखता है, तो वह उसे धोखा देता है, और जब वह परमेश्वर को नहीं देख पाता, तब भी वह उसे धोखा देता है। कुछ ऐसे भी हैं, जो परमेश्वर के श्रापों और परमेश्वर के कोप का अनुभव करने के बाद भी उसे धोखा देते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य की समझ ने अपने मूल प्रकार्य को खो दिया है, और मनुष्य की अंतरात्मा ने भी, अपने मूल प्रकार्य को खो दिया है। मनुष्य जिसे मैं देखता हूँ, वह मानव रूप में एक जानवर है, वह एक जहरीला साँप है, मेरी आँखों के सामने वह कितना भी दयनीय बनने की कोशिश करे, मैं उसके प्रति कभी भी दयावान नहीं बनूँगा, क्योंकि मनुष्य को काले और सफेद के बीच, सत्य और असत्य के बीच अन्तर की समझ नहीं है, मनुष्य की समझ बहुत ही सुन्न हो गई है, फिर भी वह आशीषें पाने की कामना करता है; उसकी मानवता बहुत नीच है फिर भी वह एक राजा के प्रभुत्व को पाने की कामना करता है। ऐसी समझ के साथ, वह किसका राजा बन सकता है? ऐसी मानवता के साथ, कैसे वह सिंहासन पर बैठ सकता है? सचमुच में मनुष्य को कोई शर्म नहीं है! वह नीच ढोंगी है! तुम सब जो आशीषें पाने की कामना करते हो, मैं सुझाव देता हूँ कि पहले शीशे में अपना बदसूरत प्रतिबिंब देखो—क्या तू एक राजा बनने लायक है? क्या तेरे पास एक ऐसा चेहरा है जो आशीषें पा सकता है? तेरे स्वभाव में ज़रा-सा भी बदलाव नहीं आया है और तूने किसी भी सत्य का अभ्यास नहीं किया, फिर भी तू एक बेहतरीन कल की कामना करता है। तू अपने आप को भुलावे में रख रहा है! ऐसी गन्दी जगह में जन्म लेकर, मनुष्य समाज के द्वारा बुरी तरह संक्रमित किया गया है, वह सामंती नैतिकता से प्रभावित किया गया है, और उसे "उच्च शिक्षा के संस्थानों" में सिखाया गया है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन पर मतलबी दृष्टिकोण, जीने के लिए तिरस्कार-योग्य दर्शन, बिल्कुल बेकार अस्तित्व, पतित जीवन शैली और रिवाज—इन सभी चीज़ों ने मनुष्य के हृदय में गंभीर रूप से घुसपैठ कर ली है, और उसकी अंतरात्मा को बुरी तरह खोखला कर दिया है और उस पर गंभीर प्रहार किया है। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से और अधिक दूर हो गया है, और परमेश्वर का और अधिक विरोधी हो गया है। दिन-प्रतिदिन मनुष्य का स्वभाव और अधिक शातिर बन रहा है, और एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग करे, एक भी व्यक्ति नहीं जो स्वेच्छा से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करे, इसके अलावा, न ही एक भी व्यक्ति ऐसा है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रकटन की खोज करे। इसकी बजाय, इंसान शैतान की प्रभुता में रहकर, कीचड़ की धरती पर बस सुख-सुविधा में लगा रहता है और खुद को देह के भ्रष्टाचार को सौंप देता है। सत्य को सुनने के बाद भी, जो लोग अन्धकार में जीते हैं, इसे अभ्यास में लाने का कोई विचार नहीं करते, यदि वे परमेश्वर के प्रकटन को देख लेते हैं तो इसके बावजूद उसे खोजने की ओर उन्मुख नहीं होते हैं। इतनी पथभ्रष्ट मानवजाति को उद्धार का मौका कैसे मिल सकता है? इतनी पतित मानवजाति प्रकाश में कैसे जी सकती है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

यदि तुम्हारे आत्मज्ञान में केवल सतही चीजों की सरसरी पहचान शामिल है—अगर तुम केवल कहते हो कि तुम अभिमानी और दंभी हो, कि तुम परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करते हो और उसका विरोध करते हो—तो यह सच्चा ज्ञान नहीं है, बल्कि सिद्धांत है। तुम्हें इसमें तथ्य एकीकृत करने चाहिए : तुम जिस भी पहलू में भ्रामक विचार या गलत राय रखते हो, उसमें तुम्हें सहभागिता और विश्लेषण के लिए अपने भीतर की प्रेरणाओं को प्रकाश में लाना चाहिए। केवल यही वास्तव में ज्ञान का होना है। तुम्हें अपनी प्रेरणाओं और अपने सार के स्रोत को जानने पर ध्यान देना चाहिए। तुम्हें केवल अपने कार्यों से समझ हासिल नहीं करनी चाहिए; तुम्हें उसके मर्म को समझना चाहिए और समस्या की जड़ का समाधान करना चाहिए। कुछ समय बीतने के बाद तुम्हें आत्मचिंतन करना चाहिए, और सारांश निकालना चाहिए कि तुमने किन समस्याओं का समाधान किया है, कौन-सी समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं, और उन्हें कैसे हल करना चाहिए। इसलिए तुम्हें सत्य की भी तलाश करनी चाहिए। तुम्हें हमेशा दूसरों को अपनी अगुआई नहीं करने देनी चाहिए; जीवन में प्रवेश के लिए तुम्हारे पास अपना रास्ता होना चाहिए। तुम्हें बार-बार अपनी जाँच करनी चाहिए : ऐसी कौन-सी चीजें हैं जो तुम गलत कर रहे हो और जो सत्य के विपरीत हैं, तुम्हारे कौन-से शब्द और प्रेरणाएँ गलत हैं, तुम कौन-से स्वभाव प्रकट कर रहे हो। अगर तुम इसी तरह लगातार प्रवेश करो, और खुद से सख्त माँगें करो, तो धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से, तुम इस संबंध में अधिक समझ हासिल कर लोगे; अंतत: तुम यह सब एक-साथ जोड़कर देखोगे कि तुम किसी काम के नहीं हो। जब वह दिन आएगा कि तुम्हारे पास वास्तव में ऐसा ज्ञान होगा, फिर तुम अहंकार करने में सक्षम नहीं रहोगे। अभी क्या महत्वपूर्ण है? सहभागिता और विश्लेषण के बाद लोग इन चीजों से अवगत हो जाते हैं और इनके बारे में जान जाते हैं, लेकिन वे अभी भी खुद को नहीं जानते। कुछ लोग कहते हैं : "ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं अपने आप को नहीं जानता? मैं उन मामलों से अवगत हूँ, जिनमें मैं अहंकार प्रकट करता हूँ।" अगर तुम अवगत हो, तो तुम कैसे नहीं जानते कि तुम्हारा स्वभाव अहंकारी है? कई बार ऐसा क्यों होता है, जब तुम व्यक्तिगत उन्नति चाहते हो, जब तुम हैसियत पाने और विशिष्ट होने की लालसा रखते हो? इसका मतलब है कि तुम्हारा अहंकारी स्वभाव नष्ट नहीं हुआ है! इसलिए, परिवर्तन तुम्हारे कार्यों के पीछे की प्रेरणाओं, दृष्टिकोणओं और मतों से शुरू होना चाहिए। क्या तुम लोग स्वीकार करते हो कि लोग जो कुछ भी कहते हैं, वह चुभने वाला और विषैला होता है, कि उनके स्वर में अहंकार का तत्व होता है? उनके शब्दों में उनकी प्रेरणाएँ और व्यक्तिगत मत होते हैं; यह उनकी बातों से देखा जा सकता है। ऐसे लोग भी होते हैं, जो जब अहंकार प्रकट नहीं करते, तो उनके बोलने और अभिव्यक्त करने का एक निश्चित तरीका होता है, लेकिन जब उनका अहंकार प्रकट होता है, तो उनकी प्रस्तुति बदल जाती है—शैतान का बदसूरत चेहरा खुद को जाहिर कर देता है। सभी लोग प्रेरणाएँ रखते हैं। उन्हें लो, जो शातिर हैं : वे हमेशा फुसफुसाते हैं और बोलते समय कनखी से देखते हैं; इसमें प्रेरणाएँ निहित हैं। कुछ लोग धीमी आवाज में, चुपके से बोलते हैं; उनके शब्दों में षड्यंत्र निहित होते हैं, लेकिन वे स्वर या चेहरे से कुछ पता नहीं लगने देते। ऐसे लोग और भी ज्यादा विश्वासघाती होते हैं, और उन्हें बचाना बहुत मुश्किल है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नए युग में प्रवेश के लिए कैसे पार जाएँ' से उद्धृत

तुम लोग अब कुछ हद तक स्वयं द्वारा प्रकट भ्रष्ट स्वभाव को पहचानने में सक्षम हो—कौन-सी भ्रष्ट चीजें तुम्हारे द्वारा अभी भी प्रकट किए जाने की संभावना है, कौन-सी चीजें तुम्हारे द्वारा अभी भी की जानी संभव हैं। यह सब तुम जानते हो। लेकिन सबसे कठिन चीज है अपने आप को नियंत्रित करने में सक्षम होना। तुम नहीं जानते कि तुम कब कुछ कर बैठोगे या कौन-सी गंभीर चीजें करने में तुम सक्षम हो। शायद ऐसी चीजें हैं, जिन्हें तुमने सोचा था कि तुम कभी नहीं करोगे या ऐसे शब्द, जिन्हें तुमने सोचा था कि तुम कभी नहीं कहोगे, लेकिन एक दिए गए समय या परिवेश में तुमने वास्तव में उन्हें किया या कहा। लोग इन अप्रत्याशित चीजों को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं हैं। यह कैसे हो सकता है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोग अपनी प्रकृति और सार को पूरी तरह से नहीं समझते; इनके बारे में उनके ज्ञान की गहराई अपर्याप्त है, इसलिए सत्य को अभ्यास में लाना उनके लिए बहुत कठिन है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग बहुत धोखेबाज, वचन और कर्म में बेईमान होते हैं, लेकिन अगर तुम उनसे पूछो कि उनका भ्रष्टाचार किस संबंध में सबसे गंभीर है, तो वे कहेंगे, "मैं थोड़ा धोखेबाज हूँ।" वे केवल इतना कहेंगे कि वे थोड़े धोखेबाज हैं, लेकिन वे यह नहीं कहते कि उनकी प्रकृति ही धोखा है, और वे यह नहीं कहते कि वे धोखेबाज व्यक्ति हैं। वे अपनी प्रकृति को उतनी गहराई से नहीं देखते, और उसे कोई गंभीर चीज नहीं मानते, और न ही उसे उतनी गहराई से देखते हैं जितनी गहराई से दूसरे देखते हैं। दूसरे देखते हैं कि यह व्यक्ति बहुत धोखेबाज और बहुत कुटिल है, कि इसके हर शब्द में कपट है, कि इसके शब्द और कार्य कभी ईमानदार नहीं होते—लेकिन वे अपने आप को इतनी गहराई से नहीं देख सकते। उनके पास जो भी ज्ञान होता है, वह केवल सतही होता है। जब भी वे बोलते और कार्य करते हैं, तो वे अपनी प्रकृति में कुछ प्रकट करते हैं, लेकिन वे इससे अनजान होते हैं। उन्हें लगता है कि वे जो कुछ कर रहे हैं, उसमें वे ईमानदार हैं और वे सत्य के अनुसार कार्य कर रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि लोगों की अपनी प्रकृति के बारे में जो समझ है वह बहुत ही सतही है, और इसके तथा परमेश्वर के न्याय और प्रकाशन के वचनों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। परमेश्वर जो प्रकट करता है उसमें कोई ग़लती नहीं है, बल्कि मानवजाति की अपनी स्वयं की प्रकृति की समझ की भारी कमी है। लोगों को स्वयं की मौलिक या ठोस समझ नहीं है, इसके बजाय, वे अपनी ऊर्जा को अपने कार्यों और बाहरी अभिव्यक्तियों पर केंद्रित और समर्पित करते हैं। भले ही किसी ने कभी कभार स्वयं को समझने के बारे में कुछ कहा हो, यह बहुत अधिक गहरा नहीं होगा। किसी ने कभी भी नहीं सोचा है कि इस प्रकार की चीज़ के होने के कारण या कुछ प्रकट करने के कारण वह इस तरह का व्यक्ति है या उसकी इस प्रकार की प्रकृति है। परमेश्वर ने मनुष्य की प्रकृति और सार को प्रकट किया है, परंतु मनुष्य समझते हैं कि उनका चीज़ों को करने का तरीका और बोलने का तरीका दोषपूर्ण और ख़राब है; इसलिए लोगों के लिए सत्य को अभ्यास में लाना बहुत श्रमसाध्य कार्य होता है। लोग सोचते हैं कि उनकी गलतियाँ बस क्षणिक अभिव्यक्तियाँ हैं, जो उनकी प्रकृति के प्रकटन होने की बजाय लापरवाही से प्रकट हो जाती हैं। जो लोग इस तरह सोचते हैं वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते हैं, क्योंकि वे सत्य को सत्य की तरह स्वीकार नहीं कर पाते हैं और सत्य के प्यासे नहीं होते हैं; इसलिए, सत्य को अभ्यास में लाते समय, वे केवल लापरवाही से नियमों का पालन करते हैं। लोग अपनी स्वयं की प्रकृतियों को अत्यधिक भ्रष्ट के रूप में नहीं देखते हैं, और मानते हैं कि वे इतने बुरे नहीं है कि उन्हें नष्ट या दंडित किया जाना चाहिए। उन्हें लगता है कि कभी-कभी झूठ बोलना कोई बड़ी बात नहीं है, और वे स्वयं को अतीत की अपेक्षा बहुत बेहतर मानते हैं; हालाँकि, वास्तव में, वे मानकों के आसपास भी नहीं हैं, क्योंकि लोगों के केवल कुछ कृत्य होते हैं जो बाहर से सत्य का उल्लंघन नहीं करते हैं, जब वे सत्य को वास्तव में अभ्यास में नहीं ला रहे होते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी प्रकृति को समझना और सत्य को व्यवहार में लाना' से उद्धृत

परमेश्वर ने कई अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया है ताकि लोग खुद को जान सकें। वह लोगों को अनुभव के माध्यम से धीरे-धीरे खुद को जानने देता है। चाहे परीक्षण हो, न्याय या ताड़ना हो, परमेश्वर अपने वचनों में, और वास्तविक तथ्यों में, लोगों को बिना रुके अनुभव करने देता है। लोग परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना और अनुशासन का अनुभव करते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों के प्रबोधन और प्रकाश का भी अनुभव करते हैं। साथ ही, वह लोगों को अपनी भ्रष्टता, अपने विद्रोह और अपनी प्रकृति को पहचानने की अनुमति देता है। तो इन सबका अंतिम लक्ष्य क्या है? यह अंतिम लक्ष्य है उस प्रत्येक व्यक्ति को जो परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, यह जानने देना कि लोग क्या हैं। "लोग क्या हैं" इसमें कौन-सी बातें शामिल हैं? इसमें लोगों को अपनी पहचान, स्थिति, अपने कर्तव्य और दायित्व को पहचानने की अनुमति देना शामिल है। यह तुम्हें यह जानने देने के लिए है कि लोग कौन हैं और तुम स्वयं कौन हो। परमेश्वर द्वारा लोगों को स्वयं को जानने देने का अंतिम लक्ष्य यही है।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त करने की कुंजी, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना है, और यह अवश्य परमेश्वर से प्रकाशनों के अनुसार होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचन में ही कोई व्यक्ति अपने स्वयं के घृणास्पद स्वभाव को जान सकता है, अपने स्वभाव में शैतान के विभिन्न विषों को पहचान सकता है, जान सकता है कि वह मूर्ख और अज्ञानी है, और अपने स्वयं के स्वभाव में कमजोर और नकारात्मक तत्वों को पहचान सकता है। ये पूरी तरह से ज्ञात हो जाने के बाद, और तुम्हारे वास्तव में स्वयं से पूरी तरह से नफ़रत करने और शरीर से मुँह मोड़ने में सक्षम हो जाने पर, लगातार परमेश्वर के वचन का पालन करो, और पवित्र आत्मा और परमेश्वर के वचन के प्रति पूरी तरह से समर्पित होने की इच्छा रखो, तब तुम पतरस के मार्ग पर चलना शुरू कर चुके होगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानना मुख्यतः मानवीय प्रकृति को जानना है' से उद्धृत

खुद को जानने के लिए, तुम्हें अपनी भ्रष्टता की अभिव्यक्तियों के बारे में पता होना चाहिए, अपनी महत्वपूर्ण कमज़ोरियों, अपने स्वभाव, अपनी प्रकृति और सार के बारे में पता होना चाहिए। तुम्हें बहुत विस्तार से उन चीज़ों के बारे में भी पता होना चाहिए जो तुम्हारे दैनिक जीवन में सामने आती हैं—तुम्हारे इरादे, तुम्हारे नज़रिए और हर एक बात में तुम्हारा रवैया—चाहे तुम घर पर हो या बाहर, चाहे जब तुम सभाओं में होते हो, या जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, या किसी भी मुद्दे का सामना करते हो। इन बातों के माध्यम से तुम्हें खुद को जानना होगा। खुद को एक अधिक गहरे स्तर पर जानने के लिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को एकीकृत करना होगा; केवल उसके वचनों के आधार पर स्वयं को जानकर ही तुम परिणाम हासिल कर सकते हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था और धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने पर तो उसका ध्यान और भी केंद्रित नहीं था; इसके बजाय, उसने सत्य को समझने और परमेश्वर की इच्छा को समझने पर, साथ ही उसके स्वभाव और उसकी सुंदरता की समझ को प्राप्त करने पर ध्यान लगाया था। पतरस ने परमेश्वर के वचनों से मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट अवस्थाओं के साथ ही मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति को तथा मनुष्य की वास्तविक कमियों को समझने का भी प्रयास किया, और इस प्रकार परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए, उसकी इंसान से अपेक्षाओं के सभी पहलुओं को प्राप्त किया। पतरस के पास ऐसे बहुत से अभ्यास थे जो परमेश्वर के वचनों के अनुरूप थे; यह परमेश्वर की इच्छा के सर्वाधिक अनुकूल था, और यह वो सर्वोत्त्म तरीका था जिससे कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए सहयोग कर सकता है। परमेश्वर से सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव करते समय, पतरस ने मनुष्य के लिए परमेश्वर के न्याय के प्रत्येक वचन, मनुष्य के प्रकाशन के परमेश्वर के प्रत्येक वचन और मनुष्य की उसकी माँगों के प्रत्येक वचन के विरुद्ध सख्ती से स्वयं की जाँच की, और उन वचनों के अर्थ को जानने का पूरा प्रयास किया। उसने उस हर वचन पर विचार करने और याद करने की ईमानदार कोशिश की जो यीशु ने उससे कहे थे, और बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त किए। अभ्यास करने के इस तरीके के माध्यम से, वह परमेश्वर के वचनों से स्वयं की समझ प्राप्त करने में सक्षम हो गया था, और वह न केवल मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट स्थितियों को समझने लगा, बल्कि मनुष्य के सार, प्रकृति और विभिन्न कमियों को समझने लगा—स्वयं को वास्तव में समझने का यही अर्थ है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

पतरस ने स्वयं को जानने का और यह देखने का प्रयत्न किया था कि परमेश्वर के वचनों के शुद्धिकरण से और परमेश्वर द्वारा उसके लिए उपलब्ध कराए गए विभिन्न परीक्षणों के भीतर उसमें क्या प्रकट हुआ था। जब वह वास्तव में खुद को समझने लगा, तो पतरस को एहसास हुआ कि मनुष्य कितनी गहराई तक भ्रष्ट हैं, वे परमेश्वर की सेवा करने की दृष्टि से कितने बेकार और अयोग्य हैं, और कि वे परमेश्वर के समक्ष जीने के लायक नहीं है। पतरस तब परमेश्वर के सामने दंडवत हो गया। अंतत:, उसने सोचा, "परमेश्वर को जानना सबसे मूल्यवान है! अगर मैं परमेश्वर को जानने से पहले मर गया, तो यह बहुत दयनीय होगा; मुझे लगता है कि परमेश्वर को जानना सबसे महत्त्वपूर्ण, सबसे अर्थपूर्ण बात है। यदि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता, तो वह जीने के योग्य नहीं है, और उसके पास कोई जीवन नहीं है।" जब तक पतरस का अनुभव इस बिंदु तक पहुँचा, तब तक वह अपनी प्रकृति को जान गया था और उसने उसकी अपेक्षाकृत अच्छी समझ हासिल कर ली थी। हालाँकि वह शायद इसे उतनी अच्छी तरह नहीं समझा पाता जितनी स्पष्टता के साथ आजकल लोग समझाने में सक्षम होंगे, लेकिन वह निस्संदेह इस स्थिति में पहुँच गया था। इसलिए, जीवन की खोज करने और परमेश्वर से पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के वचनों के भीतर से अपने स्वभाव की गहरी समझ प्राप्त करने, और साथ ही अपनी प्रकृति के पहलुओं को समझने और शब्दों में उसका सटीक रूप से वर्णन करने, स्पष्ट और सादे ढंग से बोलने की ज़रूरत है। सही मायने में खुद को जानना यही है और फिर तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित परिणाम प्राप्त कर लोगे। यदि तुम्हारा ज्ञान इस बिंदु तक नहीं पहुँचा है, फिर भी तुम खुद को समझने का दावा करते हो और कहते हो कि तुमने जीवन प्राप्त कर लिया है, तो क्या तुम केवल डींग नहीं मार रहे हो? तुम खुद को नहीं जानते, और न ही तुम यह जानते हो कि तुम परमेश्वर के सामने क्या हो, तुमने वास्तव में एक इंसान होने के मानक पूरे कर लिए हैं या नहीं, या तुम्हारे भीतर अभी भी कितने शैतानी तत्त्व हैं। तुम अभी भी इस बारे में अस्पष्ट हो कि तुम किससे संबंधित हो, और तुम्हारे पास कोई आत्म-ज्ञान नहीं है—फिर परमेश्वर के सामने तुम्हारे पास विवेक कैसे हो सकता है? जब पतरस जीवन की खोज कर रहा था, तो उसने खुद को समझने और अपने परीक्षणों के दौरान अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान केंद्रित किया, और उसने परमेश्वर को जानने का प्रयास किया, और अंत में उसने सोचा, "लोगों को जीवन में परमेश्वर की समझ पाने की कोशिश करनी चाहिए; उसे जानना सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। अगर मैं परमेश्वर को नहीं जानता, तो मरने पर मुझे शांति नहीं मिलेगी। परमेश्वर को जान लेने के बाद, अगर वह मुझे मरने देता है, तो भी मैं ऐसा करने में सर्वाधिक कृतज्ञ महसूस करूँगा; मैं ज़रा भी शिकायत नहीं करूँगा, और मेरा पूरा जीवन सफल हो चुका होगा।" पतरस समझ का यह स्तर हासिल करने या इस बिंदु पर पहुँचने में परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू करने के तुरंत बाद ही सक्षम नहीं हो गया था; पहले उसे बहुत परीक्षणों से गुज़रना पड़ा था। परमेश्वर को जानने का मूल्य समझ सकने से पहले उसके अनुभव को एक निश्चित मील-पत्थर तक पहुँचना पड़ा था, और उसे खुद को पूरी तरह से समझना पड़ा था। इसलिए, पतरस ने जो मार्ग अपनाया, वह जीवन पाने और पूर्ण किए जाने का मार्ग था; उसका विशिष्ट अभ्यास मुख्य रूप से इसी पहलू पर केंद्रित था।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

तुम मानव प्रकृति को कैसे समझते हो? अपनी प्रकृति को समझने का वास्तविक अर्थ है अपनी आत्मा की गहराई का विश्लेषण करना; इसमें वह शामिल है जो तुम्हारे जीवन में है। यही शैतान का तर्क और शैतान के दृष्टिकोण हैं जिनके अनुसार तुम जीते आ रहे हो। केवल अपने आत्मा के गहरे हिस्सों को निकाल करके ही तुम अपनी प्रकृति को समझ सकते हो। इन चीज़ों को कैसे निकाला जा सकता है? मात्र एक या दो घटनाओं द्वारा, उन्हें निकाला और विश्लेषित नहीं किया जा सकता; कई बार काम ख़त्म कर लेने के बाद भी तुम्हारे पास कोई समझ नहीं होती। थोड़ी-सी भी पहचान और समझ प्राप्त कर सकने में तीन या पाँच वर्ष लग सकते हैं। बहुत सी परिस्थितियों में, तुम्हें खुद पर मनन कर खुद को जानना चाहिए। जब तुम गहराई तक खोदने का अभ्यास करोगे तभी तुम परिणाम पाओगे। जैसे-जैसे सत्य की तुम्हारी समझ ज़्यादा से ज़्यादा गहरी होती जायेगी, तुम धीरे-धीरे अपने सार और प्रकृति को आत्म-मंथन एवं आत्मज्ञान द्वारा जान जाओगे। अपनी प्रकृति को समझने के लिए, तुम्हें कुछ चीज़ों को अवश्य करना चाहिए: सबसे पहले, तुम्हें इस बात की स्पष्ट समझ होनी चाहिए कि तुम्हें क्या पसंद है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि तुम क्या खाना या पहनना पसंद करते हो; बल्कि इसका मतलब है कि तुम किस तरह की चीज़ों का आनन्द लेते हो, किन चीज़ों से तुम ईर्ष्या करते हो, किन चीज़ों की तुम आराधना करते हो, किन चीज़ों की तुम्हें तलाश है, और किन चीज़ों की ओर तुम अपने हृदय में ध्यान देते हो, जिस प्रकार के लोगों के संपर्क में आने का तुम आनन्द लेते हो, जिस प्रकार की चीज़ें तुम करना चाहते हो, और जिस प्रकार के लोगों को तुम अपने हृदय में आदर्श मानते हो। उदाहरण के लिए, ज्यादातर लोग ऐसे लोगों को पसंद करते हैं जो महान हों, जो अपनी बोल-चाल में शानदार हों, या ऐसे हों जो वाक्पटु चापलूसी से बात करते हों या कुछ लोग ऐसे व्यक्तियों को पसंद करते हैं जो एक ढोंग करते हैं। यह पूर्वोक्त उस बारे में है कि वे कैसे लोगों के साथ बातचीत करना पसंद करते हैं। जहाँ तक लोग जिन चीज़ों को पसंद करते हैं इस बात का प्रश्न है, इसमें शामिल है कुछ चीज़ों को करने के लिए तैयार होना जिन्हें करना आसान है, उन चीज़ों को करने का आनन्द लेना जिन्हें दूसरे अच्छा मानते हैं, और जिनके कारण लोगों की प्रशंसा और सराहनाएँ मिलेंगी। लोगों की प्रकृति में, जिन चीज़ों को वे पसंद करते हैं, उनकी एक जैसी विशिष्टता होती है। अर्थात, वे उन लोगों, घटनाओं और चीज़ों को पसंद करते हैं जिनके बाहरी दिखावे की वजह से अन्य लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं, वे उन लोगों, घटनाओं और चीजों को पसंद करते हैं जो सुंदर और शानदार दिखते हैं, और वे उन लोगों, घटनाओं और चीज़ों को पसंद करते हैं जो अपनी दिखावट के कारण अन्य लोगों से अपनी आराधना करवाते हैं। ये चीज़ें जिन्हें लोग अत्यधिक पसंद करते हैं वे बढ़िया, चमकदार, भव्य और आलीशान होती हैं। सभी लोग इन चीज़ों की आराधना करते हैं। यह देखा जा सकता है कि लोगों में कोई सच्चाई नहीं होती है, न ही उनमें वास्तविक मानव की सदृशता होती है। इन चीज़ों की आराधना करने का लेशमात्र भी महत्व नहीं है, मगर लोग तब भी इन चीजों को पसंद करते हैं। ये चीजें, जिन्हें लोग पसंद करते हैं, उन लोगों को विशेष रूप से अच्छी लगती प्रतीत होती हैं, जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, और वे इन चीजों का विशेष रूप से अनुसरण करने के इच्छुक होते हैं। ... इन चीजों की आकांक्षा करना सांसारिक लोगों के साथ कीचड़ में लोटना है। परमेश्वर इससे घृणा करता है। इसमें सत्य का अभाव है, इसमें मानवता का अभाव है, और यह शैतानी है। यह किसी व्यक्ति की प्रकृति का उसकी प्राथमिकताओं के भीतर से पता लगाना है। लोगों की पसंद उनके कपड़े पहनने के तरीके से देखी जा सकती है : कुछ लोग ध्यान खींचने वाले रंगीन कपड़े या विचित्र पोशाक पहनने के इच्छुक होते हैं। वे ऐसी चीजें ले जाएँगे, जो पहले किसी और ने नहीं लीं, और वे ऐसी चीजें पसंद करते हैं जो विपरीत लिंग को आकर्षित कर सकें। उनका ये कपड़े और चीजें पहनना उनके जीवन और दिल की गहराइयों में इन चीजों के लिए उनकी प्राथमिकता दर्शाता है। जो चीजें वे पसंद करते हैं, वे गरिमापूर्ण या शालीन नहीं होतीं। वे असल में वास्तविक व्यक्ति की चीजें नहीं होतीं। उनके द्वारा इन चीजों को पसंद करने में अधार्मिकता है। उनका दृष्टिकोण ठीक वैसा ही है, जैसा सांसारिक लोगों का होता है। व्यक्ति उनमें जरा भी सच्चाई नहीं देख सकता। इसलिए, तुम क्या पसंद करते हो, तुम किस पर ध्यान केंद्रित करते हो, तुम किसकी आराधना करते हो, तुम किसकी ईर्ष्या करते हो, और रोज तुम अपने दिल में क्या सोचते हो, ये सब तुम्हारी अपनी प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह इसे साबित करने के लिए पर्याप्त है कि तुम्हारी प्रकृति अधार्मिकता की शौकीन है, और गंभीर परिस्थितियों में, तुम्हारी प्रकृति बुरी और असाध्य है। तुम्हें इस तरह अपनी प्रकृति का विश्लेषण करना चाहिए; अर्थात्, यह जाँचो कि तुम क्या पसंद करते हो और तुम अपने जीवन में क्या त्यागते हो। शायद तुम कुछ समय के लिए किसी के प्रति अच्छे हो, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि तुम उन के चाहने वाले हो। जिसके तुम वाकई शौकीन हो, वह ठीक वो है जो तुम्हारी प्रकृति में है; भले ही तुम्हारी हड्डियाँ टूट गयी हों, तुम फिर भी उसका आनंद लोगे और कभी भी इसे त्याग नहीं पाओगे। इसे बदलना आसान नहीं है। उदाहरण के लिए एक साथी को ढूँढने की बात लो। यदि कोई महिला वास्तव में किसी के प्यार में पड़ जाए, तो कोई भी उसे रोक नहीं पाएगा। यहाँ तक कि अगर उसकी टांग भी तोड़ दी जाये, तब भी वह उसके साथ ही रहना चाहेगी; अगर उसे उसके साथ विवाह करने का अर्थ उस महिला की मृत्यु हो तो भी वह विवाह करना चाहेगी। यह कैसे हो सकता है? इसका कारण यह है कि कोई भी व्यक्ति उसे नहीं बदल सकता जो लोगों के अंदर गहराई में होता है। यहाँ तक कि अगर कोई मर भी जाए, तो भी उसकी आत्मा बस वही चीज़ें ले जाएगी; ये चीजें मानव प्रकृति की हैं, और वे किसी व्यक्ति के सार का प्रतिनिधित्व करती हैं। लोग जिन चीज़ों के शौक़ीन होते हैं, उनमें कुछ अधार्मिकता होती है। कुछ लोग उन चीज़ों के अपने शौक में स्पष्ट होते हैं और कुछ नहीं होते; कुछ तो उन्हें अत्यधिक पसंद करते हैं और कुछ नहीं करते; कुछ लोगों में आत्म-नियंत्रण होता है और कुछ स्वयं को नियंत्रित नहीं कर पाते। कुछ लोग अंधकारपूर्ण चीजों में डूबने के आदी होते हैं, जिससे साबित होता है कि उनके पास जीवन का लेश मात्र भी नहीं है। यदि लोग उन चीजों के वशीभूत और उनसे नियंत्रित न होने में समर्थ होते हैं, तो इससे साबित होता है कि उनके स्वभाव में थोड़ा बदलाव आया है और उनके पास थोड़ा कद है। कुछ लोग कुछ सत्य समझते हैं और महसूस करते हैं कि उनके पास जीवन है और वे परमेश्वर से प्यार करते हैं। वास्तव में, यह अभी भी बहुत जल्दी है, और अपने स्वभाव को बदलना कोई आसान बात नहीं है। क्या अपनी प्रकृति को समझना आसान है? अगर तुम इसे थोड़ा समझ भी गए, तो भी इसे बदलना आसान नहीं होगा। यह लोगों के लिए एक कठिन काम है। तुम्हारे इर्द-गिर्द लोग, मामले या चीजें चाहे कैसे भी बदलें, और चाहे दुनिया कैसे भी उलट-पुलट हो जाए, अगर सत्य तुम्हारा भीतर से मार्गदर्शन कर रहा है, यदि उसने तुम्हारे भीतर जड़ें जमा ली हैं और परमेश्वर के वचन तुम्हारे जीवन का, तुम्हारी प्राथमिकताओं का, तुम्हारे अनुभवों और तुम्हारे अस्तित्व का मार्गदर्शन करते हैं, तो उस बिंदु पर तुम वास्तव में बदल गए होगे। अब यह तथाकथित रूपांतरण केवल लोगों में थोड़े सहयोग, थोड़े उत्साह और विश्वास का होना है, लेकिन इसे रूपांतरण नहीं माना जा सकता और इससे यह साबित नहीं होता कि लोगों के पास जीवन है; ये सिर्फ लोगों की प्राथमिकताएँ हैं—और कुछ नहीं।

अपनी प्रकृति में लोग जिन चीज़ों को पसंद करते हैं, उन्हें उजागर करने के अलावा, उनकी प्रकृति से संबंधित अन्य पहलुओं को भी उजागर करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, चीज़ों पर लोगों के दृष्टिकोण, लोगों के तरीके और जीवन के लक्ष्य, लोगों के जीवन के मूल्य और जीवन पर दृष्टिकोण, साथ ही सच्चाई से संबंधित सभी चीजों पर उनकी राय। ये सभी चीजें लोगों की आत्मा के भीतर गहरी समाई हुई हैं और स्वभाव में परिवर्तन के साथ उनका एक सीधा संबंध है। तो फिर, भ्रष्ट मनुष्य का क्या जीवन दृष्टिकोण है? इसे इस तरह कहा जा सकता है : "हर कोई बस अपनी चिंता करे, और जो पीछे रह गए, उन्हें भले ही शैतान ले जाए।" सभी लोग अपने लिए जीते हैं; अधिक स्पष्टता से कहें तो, वे देह-सुख के लिए जी रहे हैं। वे केवल अपने मुँह में भोजन डालने के लिए जीते हैं। उनका यह अस्तित्व जानवरों के अस्तित्व से किस तरह भिन्न है? इस तरह जीने का कोई मूल्य नहीं है, उसका कोई अर्थ होने की तो बात ही छोड़ दो। व्यक्ति के जीवन का दृष्टिकोण इस बारे में होता है कि दुनिया में जीने के लिए तुम किस पर भरोसा करते हो, तुम किसके लिए जीते हो, और किस तरह जीते हो—और इन सभी चीज़ों का मानव-प्रकृति के सार से लेना-देना है। लोगों की प्रकृति का विश्लेषण करके तुम देखोगे कि सभी लोग परमेश्वर का विरोध कर रहे हैं। वे सभी शैतान हैं और वास्तव में कोई भी अच्छा व्यक्ति नहीं है। केवल लोगों की प्रकृति का विश्लेषण करके ही तुम वास्तव में मनुष्य के सार और उसकी भ्रष्टता को जान सकते हो और समझ सकते हो कि लोग वास्तव में किससे संबंध रखते हैं, उनमें वास्तव में क्या कमी है, उन्हें किस चीज़ से लैस होना चाहिए, और उन्हें मानवीय सदृशता को कैसे जीना चाहिए। व्यक्ति की प्रकृति का वास्तव में विश्लेषण कर पाना आसान नहीं है, और वह परमेश्वर के वचनों का अनुभव किए बिना या वास्तविक अनुभव प्राप्त किए बिना नहीं किया जा सकता।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए' से उद्धृत

जब मनुष्य की प्रकृति को पहचानने की बात आती है, तो सबसे महत्वपूर्ण बात इसे मनुष्य के विश्व दृष्टिकोण, जीवन के दृष्टिकोण, और मूल्यों के परिप्रेक्ष्य से देखना है। जो लोग शैतान के हैं वे स्वयं के लिए जीते हैं। उनके जीवन के दृष्टिकोण और सिद्धांत मुख्यत: शैतान की कहावतों से आते हैं, जैसे कि "स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं।" पृथ्वी के उन पिशाच राजाओं, महान लोगों और दार्शनिकों द्वारा बोले गए वचन मनुष्य का जीवन बन गए हैं। विशेष रूप से, कन्फ़्यूशियस, जिसके बारे में चीनी लोगों द्वारा "ऋषि" के रूप में शेखी बघारी जाती है, के अधिकांश वचन, मनुष्य का जीवन बन गए हैं। बौद्ध धर्म और ताओवाद की मशहूर कहावतें, और प्रसिद्ध व्यक्तियों की अक्सर उद्धृत की गई विशेष कहावते हैं; ये सभी शैतान के फ़लसफों और शैतान की प्रकृति की रूपरेखाएँ हैं। वे शैतान की प्रकृति के सबसे अच्छे उदाहरण और स्पष्टीकरण भी हैं। ये विष, जिन्हें मनुष्य के हृदय में डाल दिया गया है, सब शैतान से आते हैं; उनमें से एक छोटा सा अंश भी परमेश्वर से नहीं आता है। ये शैतानी वचन भी परमेश्वर के वचन के बिल्कुल विरुद्ध हैं। यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता परमेश्वर से आती है, और वे सभी नकारात्मक चीज़ें जो मनुष्य में विष भरती हैं, वे शैतान से आती हैं। इसलिए, तुम किसी व्यक्ति की प्रकृति को और वह किससे संबंधित है इस बात को उसके जीवन के दृष्टिकोण और मूल्यों से जान सकते हो। शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और प्रभाव के माध्यम से लोगों को दूषित करता है। उनके शैतानी शब्द मनुष्य के जीवन-प्रकृति बन गए हैं। "स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं" एक प्रसिद्ध शैतानी कहावत है जिसे हर किसी में डाल दिया गया है और यह मनुष्य का जीवन बन गया है। जीने के लिए दर्शन के कुछ अन्य शब्द भी हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान प्रत्येक देश की उत्तम पारंपरिक संस्कृति के माध्यम से लोगों को शिक्षित करता है और मानवजाति को विनाश की विशाल खाई में गिरने और उसके द्वारा निगल लिए जाने पर मजबूर कर देता है, और अंत में परमेश्वर लोगों को नष्ट कर देता है क्योंकि वे शैतान की सेवा करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। कल्पना करो कि समाज में कई वर्षों से सक्रिय व्यक्ति से कोई यह प्रश्न पूछे : "चूँकि तुम इतने लंबे समय से दुनिया में रहे हो और इतना कुछ हासिल किया है, ऐसी कौन-सी मुख्य प्रसिद्ध कहावतें हैं जिनके अनुसार तुम लोग जीते हो?" शायद वह कहे, "सबसे महत्वपूर्ण कहावतें यह हैं कि 'अधिकारी उपहार देने वालों को नहीं मार गिराते, और जो चापलूसी नहीं करते हैं वे कुछ भी हासिल नहीं करते हैं।'" क्या ये शब्द उस व्यक्ति की प्रकृति के स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं? पद पाने के लिए अनैतिक साधनों का इस्तेमाल करना उसकी प्रकृति बन गयी है, और अधिकारी होना ही उसे जीवन देता है। अभी भी लोगों के जीवन में, और उनके आचरण और व्यवहार में कई शैतानी विष उपस्थित हैं—उनमें बिलकुल भी कोई सत्य नहीं है। उदाहरण के लिए, उनके जीवन दर्शन, काम करने के उनके तरीके, और उनकी सभी कहावतें बड़े लाल अजगर के विष से भरी हैं, और ये सभी शैतान से आते हैं। इस प्रकार, सभी चीजें जो लोगों की हड्डियों और रक्त में बहें, वह सभी शैतान की चीज़ें हैं। उन सभी अधिकारियों, सत्ताधारियों और प्रवीण लोगों के सफलता पाने के अपने ही मार्ग और रहस्य होते हैं, तो क्या ऐसे रहस्य उनकी प्रकृति का उत्तम रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं? वे दुनिया में कई बड़ी चीज़ें कर चुके हैं और उन के पीछे उनकी जो चालें और षड्यंत्र हैं उन्हें कोई समझ नहीं पाता है। यह दिखाता है कि उनकी प्रकृति आखिर कितनी कपटी और विषैली है। शैतान ने मनुष्य को गंभीर ढंग से दूषित कर दिया है। शैतान का विष हर व्यक्ति के रक्त में बहता है, और यह देखा जा सकता है कि मनुष्य की प्रकृति दूषित, बुरी और प्रतिक्रियावादी है, शैतान के दर्शन से भरी हुई और उसमें डूबी हुई है—अपनी समग्रता में यह प्रकृति परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती है। इसीलिए लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं और परमेश्वर के विरूद्ध खड़े रहते हैं। अगर इस तरह मनुष्य की प्रकृति का विश्लेषण किया जा सके तो वह आसानी से खुद को जान सकेगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

तुम यह कैसे बता सकते हो कि किसी व्यक्ति का सार क्या है? यदि कोई व्यक्ति कुछ भी न करे या कोई मामूली काम करे तो तुम यह नहीं बता सकते कि उस व्यक्ति की प्रकृति और उसका सार क्या है। इन्हें उनके द्वारा उन बातों में दिखाया जाता है जिन्हें वे निरंतर उनके कार्यों के पीछे रहे इरादों में, वे जो भी करते हैं उनके पीछे रहे उद्देश्यों में, वे जो इच्छाएं रखते हैं और वे जिस राह पर चलते हैं उसमें दिखाया जाता है। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि इन चीज़ों को उन प्रतिक्रियाओं में दिखाया जाता है जो वे तब देते हैं जब वे परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित किसी परिवेश का सामना करते हैं, जब परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से उनके साथ कुछ जाता है, जब उनका परीक्षण और शुद्धिकरण किया जाता है, या उनसे निपटा जाता है या उनकी काट-छाँट की जाती है, या जब परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से उनका प्रकाशन और मार्गदर्शन करता है। यह सब किन बातों से संबंधित है? यह एक व्यक्ति के कार्यों, उनके जीने के तरीक़ों और उन सिद्धांतों से संबंधित है जिनके द्वारा वे स्वयं का संचालन करते हैं। यह उनकी खोज की दिशा और लक्ष्यों से, और उन साधनों से जिनके माध्यम से वे आगे बढ़ते हैं से संबंधित है। दूसरे शब्दों में, यह उस राह से जिस पर वे चलते हैं, कैसे जीते हैं, वे किसके सहारे जीते हैं, और उनके अस्तित्व का आधार क्या है, इन सभी बातों से भी संबंधित है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पौलुस के प्रकृति-स्‍वभाव को कैसे पहचाना जाए' से उद्धृत

आजकल, ज़्यादातर लोगों की अपने बारे में समझ बहुत सतही है। वे उन चीज़ों को बिलकुल भी ठीक से नहीं जान पाये हैं जो उनकी प्रकृति का हिस्सा हैं। उन्हें सिर्फ़ कुछ भ्रष्ट स्थितियों, अपने द्वारा की जाने वाली संभावित चीज़ों, या अपनी कुछ कमियों का ज्ञान है और इस वजह से उन्हें लगता है कि वे ख़ुद को जानते हैं। इसके अलावा, अगर वे कुछ नियमों का पालन करते हैं, कुछ क्षेत्रों में गलतियां न करना सुनिश्चित करते हैं, और कुछ पापों को करने से खुद को रोक लेते हैं, फिर तो वे मानने लगते हैं कि परमेश्वर में उनके विश्वास में उनके पास वास्तविकता है और उन्हें बचा लिया जाएगा। यह पूरी तरह से मानवीय कल्पना है। अगर तुम उन चीज़ों का पालन करते हो, तो क्या तुम सच में किसी भी पाप को करने से बच पाओगे? क्या तुमने सच में अपने स्वभाव में सच्चा बदलाव हासिल कर लिया होगा? क्या तुम सच में इंसान की समानता को जी पाओगे? क्या इस तरह तुम सच में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे? बिल्कुल नहीं, और यह बात तय है। परमेश्वर में विश्वास तभी काम करता है जब किसी व्यक्ति के मानकों का स्तर ऊँचा हो और उसने सत्य को हासिल किया हो और उसके जीवन स्वभाव में कुछ परिवर्तन आया हो। इसलिए, यदि लोगों का स्वयं के बारे में ज्ञान बहुत उथला है, तो समस्याओं को हल करना उनके लिए असंभव होगा, और उसका जीवन स्वभाव नहीं बदलेगा। स्वयं को एक गहरे स्तर पर जानना आवश्यक है, जिसका अर्थ है कि अपनी स्वयं की प्रकृति को जानना : उस प्रकृति में कौन से तत्व शामिल हैं, ये कैसे पैदा हुए और वे कहाँ से आये। इसके अलावा, क्या तुम इन चीजों से वास्तव में घृणा कर पाते हो? क्या तुमने अपनी स्वयं की कुरूप आत्मा और अपनी बुरी प्रकृति को देखा है? यदि तुम सच में सही अर्थों में स्वयं के बारे में सत्य को देख पाओगे, तो तुम स्वयं से घृणा करना शुरू कर दोगे। जब तुम स्वयं से घृणा करते हो और फिर परमेश्वर के वचन का अभ्यास करते हो, तो तुम देह को त्यागने में सक्षम हो जाओगे और तुम्हारे पास बिना कठिनाई के सत्य को कार्यान्वित करने की शक्ति होगी। क्यों कई लोग अपनी दैहिक प्राथमिकताओं का अनुसरण करते हैं? क्योंकि वे स्वयं को बहुत अच्छा मानते हैं, उन्हें लगता है कि उनके कार्यकलाप सही और न्यायोचित हैं, कि उनमें कोई दोष नहीं है, और यहाँ तक कि वे पूरी तरह से सही हैं, इसलिए वे इस धारणा के साथ कार्य करने में समर्थ हैं कि न्याय उनके पक्ष में है। जब कोई यह जान लेता है कि उसकी असली प्रकृति क्या है—कितना कुरूप, कितना घृणित और कितना दयनीय है—तो फिर वह स्वयं पर बहुत गर्व नहीं करता है, उतना बेतहाशा अहंकारी नहीं होता है, और स्वयं से उतना प्रसन्न नहीं होता है जितना वह पहले होता था। ऐसा व्यक्ति महसूस करता है, कि "मुझे ईमानदार और व्यवहारिक होना चाहिए, और परमेश्वर के कुछ वचनों का अभ्यास करना चाहिए। यदि नहीं, तो मैं इंसान होने के स्तर के बराबर नहीं होऊँगा, और परमेश्वर की उपस्थिति में रहने में शर्मिंदा होऊँगा।" तब कोई वास्तव में अपने आपको क्षुद्र के रूप में, वास्तव में महत्वहीन के रूप में देखता है। इस समय, उसके लिए सच्चाई का पालन करना आसान होता है, और वह थोड़ा-थोड़ा ऐसा दिखाई देता है जैसा कि किसी इंसान को होना चाहिए। जब लोग वास्तव में स्वयं से घृणा करते हैं केवल तभी वे शरीर को त्याग पाते हैं। यदि वे स्वयं से घृणा नहीं करते हैं, तो वे देह को नहीं त्याग पाएँगे। स्वयं से घृणा करने में कुछ चीजों का समावेश है: सबसे पहले, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना; और दूसरा, स्वयं को अभावग्रस्त और दयनीय के रूप में समझना, स्वयं को अति तुच्छ और महत्वहीन समझना, और स्वयं की दयनीय और गंदी आत्मा को समझना। जब कोई पूरी तरह से देखता है कि वह वास्तव में क्या है, और यह परिणाम प्राप्त हो जाता है, तब वह स्वयं के बारे में वास्तव में ज्ञान प्राप्त करता है, और ऐसा कहा जा सकता है कि किसी ने अपने आपको पूरी तरह से जान लिया है। केवल तभी कोई स्वयं से वास्तव में घृणा कर सकता है, इतना कि स्वयं को शाप दे, और वास्तव में महसूस करे कि उसे शैतान के द्वारा अत्यधिक गहराई तक भ्रष्ट किया गया है इस तरह से कि वह अब इंसान के समान नहीं है। तब एक दिन, जब मृत्यु का भय दिखाई देगा, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, "यह परमेश्वर की धार्मिक सजा है; परमेश्वर वास्तव में धार्मिक है; मुझे वास्तव में मर जाना चाहिए!" इस बिन्दु पर, वह कोई शिकायत दर्ज नहीं करेगा, परमेश्वर को दोष देने की तो बात ही दूर है, वह बस यही महसूस करेगा कि वह बहुत ज़रूरतमंद और दयनीय है, वो इतना गंदा है कि उसे परमेश्वर द्वारा मिटा दिया जाना चाहिए, और उसके जैसी आत्मा पृथ्वी पर रहने के योग्य नहीं है। इस बिन्दु पर, यह व्यक्ति परमेश्वर का विरोध नहीं करेगा, परमेश्वर के साथ विश्वासघात तो बिल्कुल नहीं करेगा। यदि कोई स्वयं को नहीं जानता है, और तब भी स्वयं को बहुत अच्छा मानता है, तो जब मृत्यु दस्तक देते हुए आएगी, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, कि "मैंने अपनी आस्था में इतना अच्छा किया है। मैंने कितनी मेहनत से खोज की है! मैंने इतना अधिक दिया है, मैंने इतने कष्ट झेले हैं, मगत अंततः, अब परमेश्वर मुझे मरने के लिए कहता है। मुझे नहीं पता कि परमेश्वर की धार्मिकता कहाँ है? वह मुझे मरने के लिए क्यों कह रहा है? यदि मेरे जैसे व्यक्ति को भी मरना पड़ता है, तो किसे बचाया जाएगा? क्या मानव जाति का अंत नहीं हो जाएगा?" सबसे पहले, इस व्यक्ति की परमेश्वर के बारे में धारणाएँ हैं। दूसरा, यह व्यक्ति शिकायत कर रहा है, और किसी प्रकार का समर्पण नहीं दर्शा रहा है। यह ठीक पौलुस की तरह है: जब वह मरने वाला था, तो वह स्वयं को नहीं जानता था और जब तक परमेश्वर से दण्ड निकट आया, तब तक पश्चाताप करने के लिए बहुत देर हो चुकी थी।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानना मुख्यतः मानवीय प्रकृति को जानना है' से उद्धृत

तुम अपनी भ्रष्टता का पता लगाने में जितने अधिक सक्षम होते हो, यह खोज उतनी ही अधिक सटीक होती है, और उतना ही अधिक तुम अपने स्वयं के सार के बारे में जान सकते हो, फिर उतनी ही अधिक संभावना होती है कि तुम्हें बचा लिया जाएगा और तुम उद्धार के और अधिक करीब आ जाओगे; जितना ही अधिक तुम अपनी समस्याओं का पता लगाने में अक्षम होते हो, उतना ही अधिक तुम सोचते हो कि तुम अच्छे व्यक्ति, खासे महान व्यक्ति हो, फिर तुम उद्धार के पथ से और अधिक दूर होते जाते हो, और तुम अब भी बड़े खतरे में होते हो। जो भी व्यक्ति सारा दिन स्वयं का दिखावा करने में बिताता है—अपनी उपलब्धियों को घमंड से दिखाना, कहना कि वे वाक्पटु, तर्कशील हैं, कि वे सत्य को समझते हैं और सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं, और त्याग करने में सक्षम हैं—वह विशेष रूप से छोटे कद का व्यक्ति होता है। किस प्रकार के व्यक्ति में उद्धार की अधिक आशा होती है, एवं उद्धार के पथ पर चलने में सक्षम होता है। वे जो असल में अपना भ्रष्ट स्वभाव जानते हैं। उनका ज्ञान जितना अधिक अथाह होता है, वे उद्धार के उतने ही अधिक पास आ जाते हैं। अपने भ्रष्ट स्वभाव को जानना, जानना कि तुम कुछ नहीं, बेकार हो, कि तुम जीते-जागते शैतान हो—जब तुम सच में अपना सार जानते हो, तब यह गंभीर समस्या नहीं होती। यह अच्छी बात है, बुरी बात नहीं है। क्या कोई है जो स्वयं को जितना अधिक जानता है, उतना ही अधिक नकारात्मक होता जाता है, मन ही मन सोचते हुए : "सब समाप्त हो गया, मुझ पर ईश्वर के न्याय और दंड की गाज़ गिरी है, यह सज़ा एवं प्रतिशोध है, परमेश्वर मुझे नहीं चाहता एवं मेरा उद्धार होने की कोई आशा नहीं है"? क्या इन लोगों को ऐसे भ्रम होते हैं? असल में, लोगों को जितनी अधिक पहचान होगी कि वे कितने निराशाजनक हैं, उनके लिए आशा उतनी ही अधिक होगी; उन्हें नकारात्मक नहीं होना चाहिए एवं हार नहीं माननी चाहिए। स्वयं को जानना अच्छी बात है—यह वह रास्ता है जिस पर उद्धार के लिए चलना ही होगा। यदि तुम अपने ही भ्रष्ट स्वभाव से एवं अपने सार से, जो ईश्वर के प्रति अपने विरोध में बहुविध है, पूर्णतः अनभिज्ञ हो, एवं यदि तुम्हारे पास परिवर्तन की अब भी कोई योजना नहीं हैं, तो तुम संकट में हो; ऐसे लोग पहले ही सुन्न हो चुके हैं, वे मृत हैं। क्या मृतक को पुनः जीवित किया जा सकता है? बिल्कुल नहीं, वे पहले ही मृत हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानकर ही तुम सत्‍य की खोज कर सकते हो' से उद्धृत

उन लोगों में जो जीवन की तलाश करते हैं, पौलुस ऐसा व्यक्ति था जो स्वयं अपना सार नहीं जानता था। वह किसी भी तरह विनम्र या आज्ञाकारी नहीं था, न ही वह अपना सार जानता था, जो परमेश्वर के विरुद्ध था। और इसलिए, वह ऐसा व्यक्ति था जो विस्तृत अनुभवों से नहीं गुज़रा था, और ऐसा व्यक्ति था जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाया था। पतरस भिन्न था। वह परमेश्वर का सृजित प्राणी होने के नाते अपनी अपूर्णताएँ, कमज़ोरियाँ, और अपना भ्रष्ट स्वभाव जानता था, और इसलिए उसके पास अभ्यास का एक मार्ग था जिसके माध्यम से वह अपने स्वभाव को बदल सके; वह उन लोगों में से नहीं था जिनके पास केवल सिद्धांत था किंतु जो वास्तविकता से युक्त नहीं थे। वे लोग जो परिवर्तित होते हैं नए लोग हैं जिन्हें बचा लिया गया है, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण करने की योग्यता से संपन्न हैं। वे लोग जो नहीं बदलते हैं उन लोगों में आते हैं जो स्वाभाविक रूप से पुराने और बेकार हैं; ये वे लोग हैं जिन्हें बचाया नहीं गया है, अर्थात्, वे लोग जिनसे परमेश्वर घृणा करता है और जिन्हें ठुकरा चुका है। उनका कार्य चाहे जितना भी बड़ा हो, उन्हें परमेश्वर द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। जब तुम इसकी तुलना स्वयं अपने अनुसरण से करते हो, तब यह स्वतः स्पष्ट हो जानना चाहिए कि तुम अंततः उसी प्रकार के व्यक्ति हो या नहीं जैसे पतरस या पौलुस थे। यदि तुम जो खोजते हो उसमें अब भी कोई सत्य नहीं है, और यदि तुम आज भी उतने ही अहंकारी और अभद्र हो जितना पौलुस था, और अब भी उतने ही बकवादी और शेखीबाज हो जितना वह था, तो तुम बिना किसी संदेह के पतित व्यक्ति हो जो विफल होता है। यदि तुम पतरस के समान खोज करते हो, यदि तुम अभ्यासों और सच्चे बदलावों की खोज करते हो, और अहंकारी या उद्दंड नहीं हो, बल्कि अपना कर्तव्य निभाने की तलाश करते हो, तो तुम परमेश्वर के सृजित प्राणी होगे जो विजय प्राप्त कर सकता है। पौलुस स्वयं अपना सार या भ्रष्टता नहीं जानता था, वह अपनी अवज्ञाकारिता तो और भी नहीं जानता था। उसने मसीह के प्रति अपनी कुत्सित अवज्ञा का कभी उल्लेख नहीं किया, न ही वह बहुत अधिक पछतावे से भरा था। उसने बस एक स्पष्टीकरण दिया, और, अपने हृदय की गहराई में, उसने परमेश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पण नहीं किया था। यद्यपि वह दमिश्क के रास्ते पर गिर पड़ा था, फिर भी उसने अपने भीतर गहराई से झाँककर नहीं देखा था। वह मात्र काम करते रहने से ही संतुष्ट था, और वह स्वयं को जानने और अपना पुराना स्वभाव बदलने को सबसे महत्वपूर्ण विषय नहीं मानता था। वह तो बस सत्य बोलकर, स्वयं अपने अंतःकरण के लिए औषधि के रूप में दूसरों को पोषण देकर, और अपने अतीत के पापों के लिए अपने को सांत्वना देने और अपने को माफ़ करने की ख़ातिर यीशु के शिष्यों को अब और न सताकर ही संतुष्ट था। उसने जिस लक्ष्य का अनुसरण किया वह भविष्य के मुकुट और क्षणिक कार्य से अधिक कुछ नहीं था, उसने जिस लक्ष्य का अनुसरण किया वह भरपूर अनुग्रह था। उसने पर्याप्त सत्य की खोज नहीं की थी, न ही उसने उस सत्य की अधिक गहराई में जाने की खोज की थी जिसे उसने पहले नहीं समझा था। इसलिए स्वयं के विषय में उसके ज्ञान को झूठ कहा जा सकता है, और उसने ताड़ना और न्याय स्वीकार नहीं किया था। वह कार्य करने में सक्षम था इसका अर्थ यह नहीं है कि वह स्वयं अपनी प्रकृति या सार के ज्ञान से युक्त था; उसका ध्यान केवल बाहरी अभ्यासों पर था। यही नहीं, उसने जिसके लिए कठिन परिश्रम किया था वह बदलाव नहीं, बल्कि ज्ञान था। उसका कार्य पूरी तरह दमिश्क के मार्ग पर यीशु के प्रकटन का परिणाम था। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जिसे उसने मूल रूप से करने का संकल्प लिया था, न ही यह वह कार्य था जो उसके द्वारा अपने पुराने स्वभाव की काँट-छाँट स्वीकार करने के बाद हुआ था। उसने चाहे जिस प्रकार कार्य किया, उसका पुराना स्वभाव नहीं बदला था, और इसलिए उसके कार्य ने उसके अतीत के पापों का प्रायश्चित नहीं किया बल्कि उस समय की कलीसियाओं के मध्य एक निश्चित भूमिका मात्र निभाई थी। इस जैसे व्यक्ति के लिए, जिसका पुराना स्वभाव नहीं बदला था—कहने का तात्पर्य यह, जिसने उद्धार प्राप्त नहीं किया था, तथा सत्य से और भी अधिक रहित था—वह प्रभु यीशु द्वारा स्वीकार किए गए लोगों में से एक बनने में बिलकुल असमर्थ था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

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