105. सत्य की तलाश और संभ्रमित विश्वास के बीच भेद करने के सिद्धांत

(1) यह निर्धारित करो कि क्या कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केंद्रित करता है और परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करता है, इस तरह से कि यह उसे सच्चे पश्चाताप और परिवर्तन की ओर ले जाए, या क्या वह लक्ष्यहीनता के साथ दूसरों की नकल करता है और इस प्रकार अपने दिनों को आलस्य में व्यर्थ कर देता है;

(2) यह निर्धारित करो कि क्या कोई अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाते और सच्चाई की वास्तविकता को जीते हुए, सत्य की एक समझ प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित करता है, या क्या वह बाह्यताओं पर, नियमों के अनुपालन पर, और मात्र धारणाओं और कल्पनाओं द्वारा निर्देशित कार्रवाई पर ही ध्यान केंद्रित करता है;

(3) यह निर्धारित करो कि क्या कोई व्यक्ति सभी मामलों में सत्य की तलाश करने, और अपनी भ्रष्टता को हल करने के लिए इसका उपयोग करने, पर ध्यान केंद्रित करता है, या क्या वह आराम चाहता है और अपने देह के सुख को भोगता है, और केवल सिद्धांत को समझ कर संतुष्ट है;

(4) यह निर्धारित करो कि क्या कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य को निभाने में सत्य की तलाश करने, उसे व्यवहार में लाने और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने पर ध्यान केंद्रित करता है, या क्या वह असावधान और लापरवाह है, मृत्यु तक पश्चाताप न करते हुए परमेश्वर को धोखा देने का प्रयास कर रहा है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

यद्यपि बहुत सारे लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन कुछ ही लोग समझते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने का क्या अर्थ है, और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप बनने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यद्यपि लोग "परमेश्वर" शब्द और "परमेश्वर का कार्य" जैसे वाक्यांशों से परिचित हैं, लेकिन वे परमेश्वर को नहीं जानते और उससे भी कम वे उसके कार्य को जानते हैं। तो कोई आश्चर्य नहीं कि वे सभी, जो परमेश्वर को नहीं जानते, उसमें अपने विश्वास को लेकर भ्रमित रहते हैं। लोग परमेश्वर में विश्वास करनेको गंभीरता से नहीं लेते और यह सर्वथा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर में विश्वास करना उनके लिए बहुत अनजाना, बहुत अजीब है। इस प्रकार वे परमेश्वर की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते। दूसरे शब्दों में, यदि लोग परमेश्वर और उसके कार्य को नहीं जानते, तो वे उसके इस्तेमाल के योग्य नहीं हैं, और उसकी इच्छा पूरी करने के योग्य तो बिलकुल भी नहीं। "परमेश्वर में विश्वास" का अर्थ यह मानना है कि परमेश्वर है; यह परमेश्वर में विश्वास की सरलतम अवधारणा है। इससे भी बढ़कर, यह मानना कि परमेश्वर है, परमेश्वर में सचमुच विश्वास करने जैसा नहीं है; बल्कि यह मजबूत धार्मिक संकेतार्थों के साथ एक प्रकार का सरल विश्वास है। परमेश्वर में सच्चे विश्वास का अर्थ यह है: इस विश्वास के आधार पर कि सभी वस्तुओं पर परमेश्वर की संप्रभुता है, व्यक्ति परमेश्वर के वचनों और कार्यों का अनुभव करता है, अपने भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करता है, परमेश्वर की इच्छा पूरी करता है और परमेश्वर को जान पाता है। केवल इस प्रकार की यात्रा को ही "परमेश्वर में विश्वास" कहा जा सकता है। फिर भी लोग परमेश्वर में विश्वास को अकसर बहुत सरल और हल्के रूप में लेते हैं। परमेश्वर में इस तरह विश्वास करने वाले लोग, परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ गँवा चुके हैं और भले ही वे बिलकुल अंत तक विश्वास करते रहें, वे कभी परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं करेंगे, क्योंकि वे गलत मार्ग पर चलते हैं। आज भी ऐसे लोग हैं, जो परमेश्वर में शब्दशः और खोखले सिद्धांत के अनुसार विश्वास करते हैं। वे नहीं जानते कि परमेश्वर में उनके विश्वास में कोई सार नहीं है और वे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं कर सकते। फिर भी वे परमेश्वर से सुरक्षा के आशीषों और पर्याप्त अनुग्रह के लिए प्रार्थना करते हैं। आओ रुकें, अपने हृदय शांत करें और खुद से पूछें: क्या परमेश्वर में विश्वास करना वास्तव में पृथ्वी पर सबसे आसान बात हो सकती है? क्या परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ परमेश्वर से अधिक अनुग्रह पाने से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता है? क्या परमेश्वर को जाने बिना उसमें विश्वास करने वाले या उसमें विश्वास करने के बावजूद उसका विरोध करने वाले लोग सचमुच उसकी इच्छा पूरी करने में सक्षम हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना' से उद्धृत

परमेश्वर में विश्वास रखने में मनुष्य का मूल उद्देश्य जीवन की तलाश है। यदि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो परंतु जीवन या सत्य या परमेश्वर के ज्ञान की खोज नहीं करते, तब परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास नहीं है! और क्या यह उचित है कि तुम अभी भी राज्य में राजा बनने के लिये प्रवेश करना चाहते हो? जीवन की खोज द्वारा परमेश्वर के लिए सच्चे प्रेम को प्राप्त करना ही वास्तविकता है; सत्य की तलाश और सत्य का अभ्यास―यह सब वास्तविकता है। परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हुए और इन वचनों का अनुभव करते हुए, तुम वास्तविक अनुभव के द्वारा परमेश्वर के ज्ञान को प्राप्त करोगे। यही सच्चे अर्थ में अनुसरण करना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

सारी मानवजाति शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी है, और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना मनुष्य का स्वभाव है। किंतु, शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए सभी मनुष्यों में कुछ ऐसे भी हैं, जो परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित हो सकते हैं और सत्य को स्वीकार कर सकते हैं; ये वे हैं जो सत्य को प्राप्त कर सकते हैं और अपने स्वभाव में परिवर्तन कर सकते हैं। ऐसे लोग भी हैं, जो सत्य की तलाश पर ध्यान केंद्रित नहीं करते। वे केवल सिद्धांतों को समझने से संतुष्ट हैं; वे अच्छे सिद्धांत को सुनते हैं और उसे रख लेते हैं, और उसे समझने के बाद, वे अपने कर्तव्य निभा सकते हैं—एक बिंदु तक। ये लोग वही करते हैं, जो उन्हें बताया जाता है और उनमें औसत दर्जे की मानवता होती है। वे एक निश्चित सीमा तक स्वयं को खपाने, सांसारिकता को त्यागने और दुख सहने के लिए तैयार होते हैं। किंतु वे सत्य के बारे में ईमानदार नहीं होते; वे मानते हैं कि यही काफ़ी है कि वे कोई पाप नहीं करते, और वे कभी भी सत्य के सार को समझ पाने में समर्थ नहीं होते। यदि ऐसे लोग अंत में स्थिर खड़े हो सकते हैं, तो उन्हें भी बख्शा जा सकता है, लेकिन वे अपने स्वभाव को रूपांतरित नहीं कर सकते। अगर तुम भ्रष्टता से शुद्ध होना चाहते हो और अपने जीवन-स्वभाव में बदलाव से गुज़रते हो, तो तुममें सत्य के लिए प्रेम करने और सत्य को स्वीकार करने की योग्यता होनी ही चाहिए। सत्य को स्वीकार करने का क्या अर्थ है? सत्य को स्वीकार करना यह इंगित करता है कि चाहे तुममें किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचारी स्वभाव हो या बड़े लाल अजगर के जो भी विष तुम्हारी प्रकृति में हों, तुम उसे तब स्वीकार कर लेते हो जब यह परमेश्वर के वचन द्वारा प्रकट किया जाता है और इन वचनों के प्रति समर्पित होते हो; तुम इसे बेशर्त स्वीकार करते हो, तुम बहाने नहीं बनाते या चुनने की कोशिश नहीं करते और खुद को इस आधार पर जान जाते हो कि परमेश्वर क्या कहता है। परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने का यही अर्थ है। चाहे वह कुछ भी कहे, चाहे उसके कथन तुम्हारे दिल को कितना भी भेद दें, चाहे वह किन्हीं भी वचनों का उपयोग करे, तुम इन्हें तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि वह जो भी कहता है वह सत्य है, और तुम इन्हें तब तक स्वीकार कर सकते हो जब तक कि वे वास्तविकता के अनुरूप हैं। इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम परमेश्वर के वचनों को कितनी गहराई से समझते हो, तुम इनके प्रति समर्पित हो सकते हो, तुम उस रोशनी को स्वीकार कर सकते हो और उसके प्रति समर्पित हो सकते हो जो पवित्र आत्मा द्वारा प्रकट की गयी है और जिसकी तुम्हारे भाई-बहनों द्वारा सहभागिता की गयी है। जब ऐसा व्यक्ति सत्य का अनुसरण एक निश्चित बिंदु तक कर लेता है, तो वह सत्य को प्राप्त कर सकता है और अपने स्वभाव के रूपान्तरण को प्राप्त कर सकता है। यद्यपि सत्य से प्रेम न करने वाले लोगों में शिष्ट इंसानियत हो, लेकिन जब सत्य की बात आती है, वे भ्रमित होते हैं और इसे गंभीरता से नहीं लेते। भले ही वे कुछ अच्छे कर्म करने में समर्थ हों, खुद को परमेश्वर के लिए खपा सकते हों, और त्याग करने में समर्थ हों, पर वे स्वभाव में बदलाव नहीं ला सकते।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

सारांश में, अपने विश्वास में पतरस के मार्ग को अपनाने का अर्थ है, सत्य को खोजने के मार्ग पर चलना, जो वास्तव में स्वयं को जानने और अपने स्वभाव को बदलने का मार्ग भी है। केवल पतरस के मार्ग पर चलने के द्वारा ही कोई परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने के मार्ग पर होगा। किसी को भी इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तव में कैसे पतरस के मार्ग पर चलना है साथ ही कैसे इसे अभ्यास में लाना है। सबसे पहले, किसी को भी अपने स्वयं के इरादों, अनुचित कार्यों, और यहाँ तक कि अपने परिवार और अपनी स्वयं की देह की सभी चीज़ों को एक ओर रखना होगा। एक व्यक्ति को पूर्ण हृदय से समर्पित अवश्य होना चाहिए, अर्थात्, स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, सत्य की खोज पर ध्यान लगाना, और परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज पर अवश्य ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, और हर चीज़ में परमेश्वर की इच्छा को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह अभ्यास की सबसे बुनियादी और प्राणाधार पद्धति है। यह वही था जो पतरस ने यीशु को देखने के बाद किया था, और केवल इस तरह से अभ्यास करने से ही कोई सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर के वचनों के प्रति हार्दिक समर्पण में मुख्यत: सत्य की खोज करना, परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज करना, परमेश्वर की इच्छा को समझने पर ध्यान केन्द्रित करना, और परमेश्वर के वचनों से सत्य को समझना तथा और अधिक प्राप्त करना शामिल है। उसके वचनों को पढ़ते समय, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था और धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने पर तो उसका ध्यान और भी केंद्रित नहीं था; इसके बजाय, उसने सत्य को समझने और परमेश्वर की इच्छा को समझने पर, साथ ही उसके स्वभाव और उसकी सुंदरता की समझ को प्राप्त करने पर ध्यान लगाया था। पतरस ने परमेश्वर के वचनों से मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट अवस्थाओं के साथ ही मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति को तथा मनुष्य की वास्तविक कमियों को समझने का भी प्रयास किया, और इस प्रकार परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए, उसकी इंसान से अपेक्षाओं के सभी पहलुओं को प्राप्त किया। पतरस के पास ऐसे बहुत से अभ्यास थे जो परमेश्वर के वचनों के अनुरूप थे; यह परमेश्वर की इच्छा के सर्वाधिक अनुकूल था, और यह वो सर्वोत्त्म तरीका था जिससे कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए सहयोग कर सकता है। परमेश्वर से सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव करते समय, पतरस ने मनुष्य के लिए परमेश्वर के न्याय के प्रत्येक वचन, मनुष्य के प्रकाशन के परमेश्वर के प्रत्येक वचन और मनुष्य की उसकी माँगों के प्रत्येक वचन के विरुद्ध सख्ती से स्वयं की जाँच की, और उन वचनों के अर्थ को जानने का पूरा प्रयास किया। उसने उस हर वचन पर विचार करने और याद करने की ईमानदार कोशिश की जो यीशु ने उससे कहे थे, और बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त किए। अभ्यास करने के इस तरीके के माध्यम से, वह परमेश्वर के वचनों से स्वयं की समझ प्राप्त करने में सक्षम हो गया था, और वह न केवल मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट स्थितियों को समझने लगा, बल्कि मनुष्य के सार, प्रकृति और विभिन्न कमियों को समझने लगा—स्वयं को वास्तव में समझने का यही अर्थ है। परमेश्वर के वचनों से, पतरस ने न केवल स्वयं की सच्ची समझ प्राप्त की, बल्कि परमेश्वर के वचनों में व्यक्त की गई बातों—परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव, उसके स्वरूप, परमेश्वर की अपने कार्य के लिए इच्छा, मनुष्यजाति से उसकी माँगें—से इन वचनों से उसे परमेश्वर के बारे में पूरी तरह से पता चला। उसे परमेश्वर का स्वभाव, और उसका सार पता चला; उसे परमेश्वर के स्वरूप का ज्ञान और समझ मिली, साथ ही परमेश्वर की प्रेममयता और मनुष्य से परमेश्वर की माँगें पता चलीं। भले ही परमेश्वर ने उस समय उतना नहीं बोला, जितना आज वह बोलता है, किन्तु पतरस में इन पहलुओं में परिणाम उत्पन्न हुआ था। यह एक दुर्लभ और बहुमूल्य चीज़ थी। पतरस सैकड़ों परीक्षाओं से गुज़रा लेकिन उसका कष्‍ट सहना व्‍यर्थ नहीं हुआ। न केवल उसने परमेश्‍वर के वचनों और कार्यों से स्‍वयं को समझ लिया बल्कि उसने परमेश्‍वर को भी जान लिया। इसके साथ ही, उसने परमेश्‍वर के वचनों में इंसानियत से उसकी सभी अपेक्षाओं पर विशेष ध्‍यान दिया। परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप होने के लिए मनुष्‍य को जिस भी पहलू से परमेश्‍वर को संतुष्ट करना चाहिए, पतरस उन पहलुओं में पूरा प्रयास करने में और पूर्ण स्‍पष्‍टता प्राप्‍त करने में समर्थ रहा; ख़ुद उसके प्रवेश के लिए यह अत्‍यंत लाभकारी था। परमेश्‍वर ने चाहे जिस भी विषय में कहा, जब तक वे वचन जीवन बन सकते थे और सत्य हैं, तब तक उसने उन्‍हें अपने हृदय में रचा-बसा लिया ताकि अक्‍सर उन पर विचार कर सके और उनकी सराहना कर सके। यीशु के वचनों को सुनने के बाद, वह उन्‍हें अपने हृदय में उतार सका, जिससे पता चलता है कि उसका ध्‍यान विशेष रूप से परमेश्‍वर के वचनों पर था, और अंत में उसने वास्‍तव में परिणाम प्राप्‍त कर लिये। अर्थात्, वह परमेश्‍वर के वचनों पर खुलकर व्‍यवहार कर सका, सत्‍य पर सही ढंग से अमल कर सका और परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप हो सका, पूरी तरह परमेश्‍वर की मर्ज़ी के अनुसार कार्य कर सका, और अपने निजी मतों और कल्‍पनाओं का त्‍याग कर सका। इस तरह, पतरस परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सका।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

पतरस के जीवन की ऐसी कोई भी चीज़ जो परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करती थी उसे असहज महसूस करवाती थी। यदि वह परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करती, तो वह ग्लानि से भरा महसूस करता, और ऐसे उपयुक्त रास्ते की तलाश करता जिसके द्वारा वह परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए पूरा ज़ोर लगा पाता। अपने जीवन के छोटे से छोटे और महत्वहीन पहलुओं में भी, वह अब भी परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने की स्वयं से अपेक्षा करता था। जब उसके पुराने स्वभाव की बात आती तब भी वह स्वयं से ज़रा भी कम अपेक्षा नहीं करता था, सत्य में अधिक गहराई तक आगे बढ़ने के लिए स्वयं से अपनी अपेक्षाओं में सदैव अत्यधिक कठोर होता था। ... परमेश्वर में अपने विश्वास में, पतरस ने प्रत्येक चीज़ में परमेश्वर को संतुष्ट करने की चेष्टा की थी, और उस सब की आज्ञा मानने की चेष्टा की थी जो परमेश्वर से आया था। रत्ती भर शिकायत के बिना, वह ताड़ना और न्याय, साथ ही शुद्धिकरण, घोर पीड़ा और अपने जीवन की वंचनाओं को स्वीकार कर पाता था, जिनमें से कुछ भी परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदल नहीं सका था। क्या यह परमेश्वर के प्रति सर्वोत्तम प्रेम नहीं था? क्या यह परमेश्वर के सृजित प्राणी के कर्तव्य की पूर्ति नहीं थी? चाहे ताड़ना में हो, न्याय में हो, या घोर पीड़ा में हो, तुम मृत्यु पर्यंत आज्ञाकारिता प्राप्त करने में सदैव सक्षम होते हो, और यह वह है जो परमेश्वर के सृजित प्राणी को प्राप्त करना चाहिए, यह परमेश्वर के प्रति प्रेम की शुद्धता है। यदि मनुष्य इतना प्राप्त कर सकता है, तो वह परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी है, और ऐसा कुछ भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की इच्छा को इससे बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता हो। कल्पना करो कि तुम परमेश्वर के लिए कार्य कर पाते हो, किंतु तुम परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते हो, और परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करने में असमर्थ हो। इस तरह, तुमने न केवल परमेश्वर के सृजित प्राणी के अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया होगा, बल्कि तुम्हें परमेश्वर द्वारा निंदित भी किया जाएगा, क्योंकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य से युक्त नहीं है, जो परमेश्वर का आज्ञापालन करने में असमर्थ है, और जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी है। तुम केवल परमेश्वर के लिए कार्य करने की परवाह करते हो, और सत्य को अभ्यास में लाने, या स्वयं को जानने की परवाह नहीं करते हो। तुम सृष्टिकर्ता को समझते या जानते नहीं हो, और सृष्टिकर्ता का आज्ञापालन या उससे प्रेम नहीं करते हो। तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के प्रति स्वाभाविक रूप से अवज्ञाकारी है, और इसलिए ऐसे लोग सृष्टिकर्ता के प्रिय नहीं हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

आज ऐसे बहुत से लोग हैं जो भ्रमित तरीके से आस्था रखते हैं। तुम लोगों के अंदर जिज्ञासा बहुत अधिक है, आशीषों को प्राप्त करने की इच्छा बहुत अधिक है, और जीवन खोजने की आकांक्षा बहुत कम है। आजकल, लोग यीशु में अपने विश्वास को लेकर उत्साह से भरे हुए हैं। यीशु उन्हें वापस स्वर्गिक घर में ले जाने वाला है, तो वे विश्वास कैसे न करें? कुछ लोग जीवन भर विश्वासी रहे हैं; चालीस या पचास वर्षों तक विश्वास रखने के बाद भी वे बाइबल पढ़ते हुए कभी थकते नहीं। इसका कारण यह है कि उनका मानना है[क] कि चाहे कुछ भी हो जाए, जब तक उनमें आस्था है, तब तक वे स्वर्ग जा पाएंगे। तुम लोग केवल कुछ ही सालों से इस पथ पर परमेश्वर के पीछे चल रहे हो, लेकिन तुम्हारे कदम पहले ही लड़खड़ा गए हैं; तुम लोगों ने सहनशीलता खो दी है, क्योंकि आशीष प्राप्त करने की तुम लोगों की इच्छा कुछ ज़्यादा ही मज़बूत है। तुम लोगों का इस सच्ची राह पर चलना, आशीष प्राप्त करने की तुम्हारी इच्छा और तुम्हारी जिज्ञासा द्वारा संचालित है। तुम लोगों को कार्य के इस चरण के विषय में बहुत समझ नहीं है। आज जो कुछ मैं कह रहा हूँ वह अधिकतर उन लोगों पर लक्षित नहीं है जो यीशु में विश्वास रखते हैं, न ही मैं यह उनकी धारणाओं का विरोध करने के लिए कह रहा हूँ। वास्तव में, जिन धारणाओं का खुलासा किया गया है ये वही हैं जो तुम लोगों के अंदर मौजूद हैं, क्योंकि तुम लोग समझते नहीं कि बाइबल को क्यों त्याग दिया गया है, मैं क्यों कहता हूँ कि यहोवा का कार्य पुराना हो गया है, या मैं क्यों कहता हूँ कि यीशु का कार्य पुराना हो गया है। बात यह है कि तुम लोग कई धारणाएं पाले हुए हो जिन्हें तुम लोगों ने अब तक खुलकर कहा नहीं है, साथ ही तुम लोगों के दिल की गहराई में कई विचार बंद हैं, और तुम लोग बस भीड़ के पीछे चलते हो। क्या तुम लोगों को सच में लगता है कि तुम लोगों ने कई धारणाएं नहीं पाल रखी हैं? बात बस इतनी-सी है कि तुम लोग उनके बारे में बोलते नहीं हो! दरअसल, तुम लोग केवल बेमन से परमेश्वर का अनुसरण करते हो, और सही राह की खोज करने की कोशिश नहीं करते, तुम जीवन को प्राप्त करने के इरादे से नहीं आए हो। तुम लोगों का रवैया बस ये है कि देखें क्या होता है। क्योंकि तुम लोगों ने अपनी कई पुरानी धारणाओं को छोड़ा नहीं है, तुम लोगों में से ऐसा कोई भी नहीं है जो स्वयं को पूरी तरह से अर्पित करने में सक्षम हो। इस बिंदु पर पहुंचने के बाद भी, दिन और रात तुम्हारे अंदर विचार उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं, तुम लोग अभी भी अपनी नियति के बारे में चिंतित बने रहते हो और कभी भी इसे छोड़ नहीं पाते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को कार्य को समझना चाहिए—भ्रम में अनुसरण मत करो!' से उद्धृत

कुछ लोग साथ-साथ अनुसरण करते हैं और ऊर्जा के साथ खोज करते हैं, और जब परमेश्वर बोलता है तब अभ्यास करने के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन जब परमेश्वर नहीं बोलता, तो वे और आगे नहीं बढ़ते। लोगों ने अभी भी परमेश्वर की इच्छा को अपने दिल में नहीं समझा है और उनमें परमेश्वर के लिए स्वत:स्फूर्त प्रेम नहीं है; अतीत में उन्होंने परमेश्वर का अनुसरण इसलिए किया था, क्योंकि वे मजबूर थे। अब कुछ लोग हैं, जो परमेश्वर के कार्य से थक गए हैं। क्या ऐसे लोग खतरे में नहीं हैं? बहुत सारे लोग सिर्फ निभाने की स्थिति में रहते हैं। यद्यपि वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं और उससे प्रार्थना करते हैं, पर वे ऐसा आधे-अधूरे मन से करते हैं, और उनमें अब वह सहज प्रवृत्ति नहीं है जो उनमें कभी थी। अधिकतर लोग शुद्धिकरण और पूर्ण बनाने के परमेश्वर के कार्य में रुचि नहीं रखते, और वास्तव में यह ऐसा है, मानो वे लगातार किसी अंत:प्रेरणा से रहित हों। जब वे पापों के वशीभूत हो जाते हैं, तो वे परमेश्वर के प्रति ऋणी महसूस नहीं करते, न ही उनमें पश्चात्ताप अनुभव करने की जागरूकता होती है। वे सत्य की खोज नहीं करते और न ही कलीसिया को छोड़ते हैं, इसके बजाय वे केवल अस्थायी सुख ढूँढ़ते हैं। ये लोग मूर्ख हैं, एकदम मूढ़! समय आने पर वे बहिष्कृत कर दिए जाएँगे, और किसी एक को भी नहीं बचाया जाएगा! क्या तुम्हें लगता है कि यदि किसी को एक बार बचाया गया है, तो उसे हमेशा बचाया जाएगा? यह विश्वास शुद्ध धोखा है! जो लोग जीवन में प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते, उन सभी को ताड़ना दी जाएगी। अधिकतर लोगों की जीवन में प्रवेश करने में, दर्शनों में, या सत्य का अभ्यास करने में बिलकुल भी रुचि नहीं है। वे प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते, और वे अधिक गहराई से प्रवेश करने का प्रयास तो निश्चित रूप से नहीं करते। क्या वे स्वयं को बरबाद नहीं कर रहे? अभी कुछ लोग हैं, जिनकी स्थितियाँ लगातार बेहतर हो रही हैं। पवित्र आत्मा जितना अधिक कार्य करता है, उतना ही अधिक आत्मविश्वास उनमें आता है, और जितना अधिक वे अनुभव करते हैं, उतना ही अधिक वे परमेश्वर के कार्य के गहन रहस्य का अनुभव करते हैं। जितना गहरे वे प्रवेश करते हैं, उतना ही अधिक वे समझते हैं। वे अनुभव करते हैं कि परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और वे अपने भीतर स्थिर और प्रबुद्ध महसूस करते हैं। उन्हें परमेश्वर के कार्य की समझ है। ये ही वे लोग हैं, जिनमें पवित्र आत्मा कार्य कर रहा है। कुछ लोग कहते हैं : "यद्यपि परमेश्वर की ओर से कोई नए वचन नहीं हैं, फिर भी मुझे सत्य में और गहरे जाने का प्रयास करना चाहिए, मुझे अपने वास्तविक अनुभव में हर चीज के बारे में ईमानदार होना चाहिए और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए।" इस तरह के व्यक्ति में पवित्र आत्मा का कार्य होता है। यद्यपि परमेश्वर अपना चेहरा नहीं दिखाता और हर एक व्यक्ति से छिपा रहता है, और यद्यपि वह एक भी वचन नहीं बोलता और कई बार लोग कुछ आंतरिक शुद्धिकरण का अनुभव करते हैं, फिर भी परमेश्वर ने लोगों को पूरी तरह से नहीं छोड़ा है। यदि कोई व्यक्ति उस सत्य को बरकरार नहीं रख सकता, जिसका उसे पालन करना चाहिए, तो उसके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। शुद्धिकरण की अवधि के दौरान, परमेश्वर के स्वयं को नहीं दिखाने के दौरान, यदि तुम्हारे भीतर आत्मविश्वास नहीं होता और तुम डरकर दुबक जाते हो, यदि तुम उसके वचनों का अनुभव करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, तो तुम परमेश्वर के कार्य से भाग रहे होते हो। बाद में, तुम उन लोगों में से एक होगे, जिनका बहिष्कार किया जाता है। जो लोग परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने का प्रयास नहीं करते, वे संभवतः उसके गवाह के रूप में खड़े नहीं हो सकते। जो लोग परमेश्वर के लिए गवाही देने और उसकी इच्छा पूरी करने में सक्षम हैं, वे सभी पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों का अनुसरण करने की अपनी अंत:प्रेरणा पर निर्भर हैं। परमेश्वर द्वारा लोगों में किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से उन्हें सत्य प्राप्त करवाने के लिए है, तुमसे जीवन का अनुसरण करवाना तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए है, और यह सब तुम्हें परमेश्वर के उपयोग हेतु उपयुक्त बनाने के लिए है। अभी तुम सभी जो कुछ अनुसरण कर रहे हो, वह है रहस्यों को सुनना, परमेश्वर के वचनों को सुनना, अपनी आँखों को आनंदित करना और आसपास यह देखना कि कोई नई चीज़ या रुझान है या नहीं, और उससे अपनी जिज्ञासा संतुष्ट करना। यदि यही इरादा तुम्हारे दिल में है, तो तुम्हारे पास परमेश्वर की आवश्यकताएँ पूरी करने का कोई रास्ता नहीं है। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे अंत तक अनुसरण नहीं कर सकते। अभी, ऐसा नहीं है कि परमेश्वर कुछ नहीं कर रहा है, बल्कि लोग उसके साथ सहयोग नहीं कर रहे, क्योंकि वे उनके कार्य से थक गए हैं। वे केवल उन वचनों को सुनना चाहते हैं, जो वह आशीष देने के लिए बोलता है, और वे उसके न्याय और ताड़ना के वचनों को सुनने के अनिच्छुक हैं। इसका क्या कारण है? इसका कारण यह है कि लोगों की आशीष प्राप्त करने की इच्छा पूरी नहीं हुई है और इसलिए वे नकारात्मक और कमजोर हो गए हैं। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर जानबूझकर लोगों को अपना अनुसरण नहीं करने देता, और न ऐसा है कि वह जानबूझकर मानवजाति पर आघात कर रहा है। लोग नकारात्मक और कमजोर केवल इसलिए हैं, क्योंकि उनके इरादे गलत हैं। परमेश्वर तो परमेश्वर है, जो मनुष्य को जीवन देता है, और वह मनुष्य को मृत्यु में नहीं ला सकता। लोगों की नकारात्मकता, कमजोरी, और पीछे हटना सब उनकी अपनी करनी के नतीजे हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

अगर तुम्हें परमेश्वर के काम का ज्ञान नहीं है, तो तुम्हें यह नहीं पता होगा कि परमेश्वर के साथ सहयोग कैसे करना है। अगर तुम परमेश्वर के काम के सिद्धांतों को नहीं जानते और इस बात से अनजान हो कि शैतान मनुष्य पर कैसे काम करता है, तो तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होगा। मात्र उत्साह भरा अनुसरण तुम्हें वे परिणाम नहीं पाने देगा, जिनकी माँग परमेश्वर करता है। अनुभव करने का यह तरीका लॉरेंस के तरीके के समान है : किसी तरह का कोई फर्क न करना और केवल अनुभव पर ध्यान केंद्रित करना, इन बातों से पूरी तरह से अनजान रहना कि शैतान का क्या काम है, पवित्र आत्मा का क्या काम है, परमेश्वर की उपस्थिति के बिना मनुष्य किस स्थिति में होता है, और किस तरह के लोगों को परमेश्वर पूर्ण बनाना चाहता है। विभिन्न प्रकार के लोगों से व्यवहार करते हुए किन सिद्धांतों को अपनाना चाहिए, वर्तमान में परमेश्वर की इच्छा को कैसे समझें, परमेश्वर के स्वभाव को कैसे जानें, और परमेश्वर की दया, उसकी महिमा और धार्मिकता किन लोगों, परिस्थितियों और युग पर निर्देशित की जाती हैं—वह इनमें से किसी में अंतर नहीं करता। अगर लोगों के पास अपने अनुभवों के लिए नींव के रूप में अनेक दर्शन नहीं हैं, तो जीवन नामुमकिन है, और अनुभव उससे भी ज्यादा नामुमकिन; वे मूर्खतापूर्ण ढंग से किसी के भी प्रति समर्पित होते रहते हैं और सब-कुछ सहते रहते हैं। ऐसे लोगों को पूर्ण बनाया जाना बहुत मुश्किल है। यह कहा जा सकता है कि अगर तुम्हारे पास उपर्युक्त में से कोई दर्शन नहीं है, तो यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि तुम महामूर्ख हो, नमक के खंभे के समान, जो हमेशा इजराइल में खड़ा रहता है। ऐसे लोग बेकार और निकम्मे हैं! कुछ लोग केवल आँख मूँदकर समर्पण कर देते हैं, वे हमेशा अपने आपको जानते हैं और नए मामलों से निपटने के लिए हमेशा आचार-व्यवहार के अपने ही तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, या उल्लेख के भी योग्य न होने वाले तुच्छ मामलों से निपटने के लिए "बुद्धि" का उपयोग करते हैं। ऐसे लोग विवेकहीन होते हैं, मानो उनका स्वभाव ही चुने जाने से इनकार कर देने वाला हो, और वे हमेशा एक जैसे रहते हैं, कभी नहीं बदलते। ऐसे लोग मूर्ख होते हैं, जिनके पास थोड़ा भी विवेक नहीं होता। वे कभी भी परिस्थितियों या विभिन्न लोगों के लिए उपयुक्त उपाय करने की कोशिश नहीं करते। ऐसे लोगों के पास अनुभव नहीं है। मैंने कुछ ऐसे लोगों को देखा है, जो स्वयं के ज्ञान से इतने बँधे हुए हैं कि जब उनका बुरी आत्माओं के काम से जुड़े लोगों से सामना होता है, तो वे अपना सिर झुका लेते हैं और पाप स्वीकार कर लेते हैं, खड़े होकर उनकी निंदा करने का साहस नहीं करते। और जब उनका ज़ाहिर तौर पर पवित्र आत्मा के कार्य से सामना होता है, तो वे उसका पालन करने की हिम्मत नहीं करते। वे यह विश्वास करते हैं कि बुरी आत्माएँ भी परमेश्वर के हाथों में हैं, और उनमें खड़े होकर उनका विरोध करने का ज़रा-सा भी साहस नहीं होता। ऐसे लोग परमेश्वर पर अपमान लाते हैं, और वे उसके लिए भारी बोझ सहन कर पाने में बिलकुल असमर्थ हैं। ऐसे मूर्ख किसी प्रकार का भेद नहीं करते। अनुभव करने के इस तरह के तरीके को इसलिए त्याग दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह परमेश्वर की दृष्टि में असमर्थनीय है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अनुभव पर' से उद्धृत

कुछ लोग अपनी खोज में बहुत जोश भर देते हैं और फिर भी सही मार्ग में प्रवेश नहीं कर पाते। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि वे बेहद लापरवाह होते हैं और आध्यात्मिक चीज़ों पर कोई ध्यान नहीं देते। उन्हें इस बात का कोई पता नहीं होता कि परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करना है, और उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि पवित्र आत्मा का कार्य और उसकी उपस्थिति क्या होती है। ऐसे लोग उत्साही तो होते हैं, लेकिन मूर्ख भी होते हैं; वे जीवन का अनुसरण नहीं करते। क्योंकि तुम्हें आत्मा का ज्ञान ज़रा-सा भी नहीं है, तुम्हें पवित्र आत्मा के निरंतर चल रहे कार्य के विकास की कोई जानकारी नहीं है, और तुम स्वयं अपनी आत्मा की स्थिति के बारे में अनजान हो। क्या इस तरह के लोगों की आस्था मूर्खतापूर्ण किस्म की आस्था नहीं है? ऐसे लोगों की खोज अंतत: कुछ हासिल नहीं करती। परमेश्वर में अपनी आस्था में विकास प्राप्त करने की मुख्य कुँजी है यह जानना कि परमेश्वर तुम्हारे अनुभव में क्या कार्य करता है, परमेश्वर की मनोहरता का अवलोकन करना और परमेश्वर की इच्छा को समझना, इस हद तक कि तुम परमेश्वर की सारी व्यवस्थाओं को मान लो, परमेश्वर के वचनों को अपने अंदर गढ़ लो ताकि वे तुम्हारा जीवन बन जाएँ और फलस्वरूप परमेश्वर को संतुष्ट करें। अगर तुम्हारी आस्था मूर्खतापूर्ण आस्था है, अगर तुम आध्यात्मिक बातों और अपने जीवन-स्वभाव में आए बदलावों पर कोई ध्यान नहीं देते, अगर तुम सत्य के लिए कोई प्रयास नहीं करते, तो क्या तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ पाओगे? अगर तुम यह नहीं समझते कि परमेश्वर क्या चाहता है, तो तुम अनुभव करने के नाकाबिल होगे, और इस तरह तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होगा। जब तुम परमेश्वर के वचनों का अनुभव करो, तो तुम्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वे तुम्हारे अंदर क्या प्रभाव पैदा कर रहे हैं, ताकि तुम परमेश्वर को उसके वचनों से जान सको। अगर तुम मात्र परमेश्वर के वचनों को पढ़ना जानते हो, लेकिन यह नहीं जानते कि उनका अनुभव कैसे करना है, तो क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि तुम आध्यात्मिक मामलों से अनजान हो? इस समय, अधिकतर लोग परमेश्वर के वचनों का अनुभव कर पाने में असमर्थ हैं और इस तरह वे परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। क्या यह उनका अपने अभ्यास में विफल होना नहीं है? अगर वे ऐसे ही करते रहे, तो वे किस मुकाम पर जाकर चीज़ों को उनकी पूर्णता में अनुभव कर पाने में सक्षम होंगे और अपने जीवन में विकास प्राप्त कर पाएँगे। क्या यह महज़ खोखली बातें करना नहीं है? तुम लोगों में से बहुत लोग ऐसे हैं जो सिद्धांत पर ध्यान देते हैं, जिन्हें आध्यात्मिक मामलों का कोई ज्ञान नहीं है, और फिर भी वे चाहते हैं कि परमेश्वर उनका कोई बड़ा इस्तेमाल करे और उन्हें आशीष दे। यह एकदम अवास्तविक बात है! इस तरह, तुम लोगों को इस नाकामी का अंत करना चाहिए, ताकि तुम सब अपने आध्यात्मिक जीवन के सही मार्ग में प्रवेश कर सको, वास्तविक अनुभव ले सको और सचमुच परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सको।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य अवस्था में प्रवेश कैसे करें' से उद्धृत

प्रतिदिन होने वाली सभी चीज़ें, चाहे वे बड़ी हों या छोटी, जो तुम्हारे संकल्प को डगमगा सकती हैं, तुम्हारे दिल पर कब्ज़ा कर सकती हैं, या कर्तव्य-पालन की तुम्हारी क्षमता और आगे की प्रगति को सीमित कर सकती हैं, परिश्रमयुक्त उपचार माँगती हैं; उनकी सावधानीपूर्वक जाँच होनी चाहिए और उनकी सच्चाई का पता लगाया जाना चाहिए। ये सभी वे चीजें हैं, जो अनुभव के क्षेत्र में घटित होती हैं। कुछ लोगों पर जब नकारात्मकता आ पड़ती है, तो वे अपने कर्तव्यों को त्याग देते हैं, और प्रत्येक नाकामयाबी के बाद वे घिसटकर वापस अपने पैरों पर उठ खड़े होने में असमर्थ होते हैं। ये सभी लोग मूर्ख हैं, जो सत्य से प्रेम नहीं करते, और वे जीवन भर के विश्वास के बाद भी उसे हासिल नहीं करेंगे। ऐसे मूर्ख अंत तक अनुसरण कैसे कर सकते थे? यदि तुम्हारे साथ एक ही बात दस बार होती है, लेकिन तुम उससे कुछ हासिल नहीं करते, तो तुम एक औसत दर्जे के, निकम्मे व्यक्ति हो। दक्ष और सच्ची योग्यता वाले लोग, जो आध्यात्मिक मामलों को समझते हैं, सत्य के अन्वेषक होते हैं; यदि उनके साथ कुछ दस बार घटित होता है, तो शायद उनमें से आठ मामलों में वे कुछ प्रेरणा प्राप्त करने, कुछ सबक सीखने, कुछ प्रबोधन हासिल करने, और कुछ प्रगति कर पाने में समर्थ होंगे। जब चीज़ें दस बार किसी मूर्ख पर पड़ती हैं—किसी ऐसे पर, जो आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझता है—तो इससे एक बार भी उनके जीवन को लाभ नहीं होगा, एक बार भी यह उन्हें नहीं बदलेगा, और न ही एक बार भी यह उनके लिए अपनी प्रकृति को समझने का कारण बनेगा, और यही उनके लिए अंत है। हर बार जब उनके साथ कुछ घटित होता है, तो वे गिर पड़ते हैं, और हर बार जब वे गिर पड़ते हैं, तो उन्हें समर्थन और दिलासा देने के लिए किसी और की ज़रूरत होती है; बिना सहारे और दिलासे के वे उठ नहीं सकते। अगर, हर बार जब कुछ होता है, तो उन्हें गिरने का खतरा होता है, और अगर, हर बार उन्हें अपमानित होने का खतरा होता है, तो क्या उनके लिए यही अंत नहीं है? क्या ऐसे निकम्मे लोगों के बचाए जाने का कोई और आधार बचा है? परमेश्वर द्वारा मानवजाति का उद्धार उन लोगों का उद्धार है, जो सत्य से प्रेम करते हैं, उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिसमें इच्छा-शक्ति और संकल्प हैं, और उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिनके दिल में सत्य और धार्मिकता के लिए तड़प है। किसी व्यक्ति का संकल्प उसके दिल का वह हिस्सा है, जो धार्मिकता, भलाई और सत्य के लिए तरसता है, और विवेक से युक्त होता है। परमेश्वर लोगों के इस हिस्से को बचाता है, और इसके माध्यम से, वह उनके भ्रष्ट स्वभाव को बदलता है, ताकि वे सत्य को समझ सकें और हासिल कर सकें, ताकि उनकी भ्रष्टता परिमार्जित हो सके, और उनका जीवन-स्वभाव रूपांतरित किया जा सके। यदि तुम्हारे भीतर ये चीज़ें नहीं हैं, तो तुमको बचाया नहीं जा सकता। यदि तुम्हारे भीतर सत्य के लिए कोई प्रेम या धार्मिकता और प्रकाश के लिए कोई आकांक्षा नहीं है; यदि, जब भी तुम बुराई का सामना करते हो, तब तुम्हारे पास न तो बुरी चीज़ों को दूर फेंकने की इच्छा-शक्ति होती है और न ही कष्ट सहने का संकल्प; यदि, इसके अलावा, तुम्हारा जमीर सुन्न है; यदि सत्य को प्राप्त करने की तुम्हारी क्षमता भी सुन्न है, और तुम सत्य के साथ और उत्पन्न होने वाली घटनाओं के साथ लयबद्ध नहीं हो; और यदि तुम सभी मामलों में विवेकहीन हो, और अपने दम पर चीजों को संभालने या हल करने में असमर्थ हो, तो तुम्हें बचाए जाने का कोई रास्ता नहीं है। ऐसे व्यक्ति के पास अपनी सिफ़ारिश करवाने के लिए कुछ भी नहीं होता, उस पर कार्य किए जा सकने लायक कुछ भी नहीं होता। उनका जमीर सुन्न होता है, उनका मन मैला होता है, और वे सत्य से प्रेम नहीं करते, न ही अपने दिल की गहराई में वे धार्मिकता के लिए तरसते हैं, और परमेश्वर चाहे कितने ही स्पष्ट या पारदर्शी रूप से सत्य की बात करे, वे प्रतिक्रिया नहीं करते, मानो वे पहले से ही मृत हों। क्या उनके लिए खेल ख़त्म नहीं हो गया है? किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसकी साँस बाक़ी हो, कृत्रिम श्वसन द्वारा बचाया जा सकता है, लेकिन अगर वह पहले से ही मर चुका हो और उसकी आत्मा उसे छोड़कर जा चुकी है, तो कृत्रिम श्वसन कुछ नहीं कर पाएगा। यदि कभी किसी समस्या का सामना करने पर तुम उससे कतराते हो और उससे बचने की कोशिश करते हो, तो इसका मतलब है कि तुमने गवाही नहीं दी है; इस तरह, तुम्हें कभी नहीं बचाया जा सकता, और तुम्हारा काम तमाम हो चुका है। जब कोई समस्या आ पड़ती है, तो तुम्हारा दिमाग ठंडा और रवैया सही होना चाहिए, और तुम्हें कोई विकल्प चुनना चाहिए। समस्या को हल करने के लिए तुम्हें सत्य का उपयोग करना सीखना चाहिए। सामान्य स्थिति में, कुछ सत्यों को समझने का क्या उपयोग है? यह तुम्हारा पेट भरने के लिए नहीं होता, और यह तुम्हें केवल कहने को कुछ देने के लिए नहीं है, और न ही यह दूसरों की समस्याओं को हल करने के लिए है। ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इसका उपयोग तुम्हारी अपनी समस्याओं, अपनी कठिनाइयों को हल करने के लिए है—खुद की कठिनाइयों को सुलझाने के बाद ही तुम दूसरों की कठिनाइयों को हल कर सकते हो। ऐसा क्यों कहा जाता है कि पतरस एक फल है? क्योंकि उसमें मूल्यवान चीज़ें हैं, पूर्ण किए जाने योग्य चीज़ें; वह सत्य की तलाश करने के लिए कृतसंकल्प था और दृढ़ इच्छा-शक्ति वाला था; उसमें विवेक था, वह कष्ट सहने को तैयार था, और अपने दिल में वह सत्य से प्रेम करता था, और जो कुछ भी होता था, उसे वह यूँ ही गुज़र जाने नहीं देता था। ये सभी ठोस बातें हैं। यदि तुम्हारे पास इन ठोस बातों में से एक भी नहीं है, तो इसका मतलब परेशानी है। तुम अनुभव करने में असमर्थ हो, और तुम्हारे पास कोई अनुभव नहीं है, और तुम दूसरों की कठिनाइयों को हल नहीं कर सकते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि तुम नहीं जानते कि प्रवेश कैसे करें। जब चीज़ें तुम पर आ पड़ती हैं, तो तुम भ्रमित हो जाते हो; तुम व्यथित महसूस करते हो, रोते हो, नकारात्मक हो जाते हो, भाग जाते हो, और चाहे तुम कुछ भी करो, तुम उन्हें सही ढंग से संभाल नहीं पाते।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रमित लोगों को बचाया नहीं जा सकता' से उद्धृत

जब परमेश्वर में तुम लोगों के विश्वास की बात आती है, तो अपने कर्तव्य को सही तरीके से निभाने के अलावा, सत्य समझना, सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना और जीवन में प्रवेश करने के लिए अधिक प्रयास करना महत्वपूर्ण होता है। जब तुम्हारे साथ कुछ घट जाए तो उस अवसर को अपने हाथ से जाने मत दो; अगर तुम्हारे सामने कोई समस्या आ जाए और कोई विचार मन में आए या तुम कोई खास तरह का व्यवहार करने लगो, तुम्हें लगे कि कुछ गड़बड़ है लेकिन तुम्हें समझ में न आए कि यह क्या हो रहा है और जान न पाओ कि इस मामले में कैसे अभ्यास करना है, तो तुम्हें इस बारे में बोलना चाहिए और सभी के साथ संगति करनी चाहिए; यदि तुम्हें पता चलता है कि कोई समस्या है, तो तुम्हें उस पर संगति करनी चाहिए। अगर तुम उस पर संगति करोगे, तो अनजाने में ही तुम्हारे सवाल और शंकाएँ कम होती चली जाएँगी और तुम अधिक से अधिक सत्य समझने लगोगे, और इस तरह, अनजाने में ही तुम्हारा आध्यात्मिक कद बढ़ता चला जाएगा। जब बात सत्य की हो, तो तुम्हें कड़ी मेहनत करनी चाहिए, तुम्हें अपनी पूरी शक्ति लगा देनी चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, "मैं बरसों से परमेश्वर में विश्वास करता आया हूँ और मैंने बहुत सारे सिद्धांत समझ लिए हैं। अब मेरे पास एक आधार है। अब विदेशों में हमारा कलीसियाई जीवन अच्छा है, भाई-बहन परमेश्वर में विश्वास के मामलों में संगति के लिए दिन भर इकट्ठा होते हैं। इस तरह मुझे अनजाने में ही पोषण मिलता रहता है और इतना पर्याप्त है। मुझे अपने प्रवेश की समस्याओं या अपने विद्रोह की समस्याओं को दूर करने का प्रयास नहीं करना पड़ता। मैं हर दिन प्रार्थना करने, परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने, भजन गाने और अपने कर्तव्य का निर्वहन करने के लिए अपने कार्यक्रम का पालन करता हूँ। मैं हर वो काम करता हूँ जो मुझे करना चाहिए। इस तरह, अनजाने में ही मेरा जीवन विकसित हो रहा है।" अपने विश्वास में संभ्रमित लोग ऐसा ही सोचते हैं। परमेश्वर में विश्वास का मार्ग सभी मार्गों में सबसे यथार्थवादी मार्ग है; जो लोग बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं, लेकिन असलियत में कभी कुछ नहीं करते, उन्हें कुछ हासिल नहीं होता। कौन लोग होते हैं जिन्हें कुछ हासिल होता है? जो लोग सरल होते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर में अपनी आस्था के मार्ग पर कुछ महत्वपूर्ण चीजें समझने योग्य हो जाते हैं, वे लोग व्यावहारिक होते हैं, हर काम को करते समय सरल होते हैं, जब वे किसी भी काम पर विचार करते हैं, किसी समस्या से रूबरू होते हैं और जब किसी भी सत्य में प्रवेश करते हैं। वे लोग बड़बोले नहीं होते या केवल काम करने पर ही उनका ध्यान नहीं होता। बल्कि वे हर चीज को अपने दिल से अनुभव करते हैं, वे जो कुछ भी करते हैं, जी-जान से करते हैं, उसके बाद जो कुछ भी होता है, उससे वे समझ हासिल करते हैं। जब किसी बात पर उनकी राय अलग होती है या किसी असाधारण परिस्थिति में, वे कुछ न कुछ सीखते हैं। ऐसे लोगों में हृदय होता है और ऐसा ही व्यक्ति अंततः सत्य हासिल करता है। जो लोग अनमनी अवस्था में रहते हैं, वे अंततः सत्य प्राप्त नहीं कर पाते; वे लोग केवल शारीरिक श्रम में लगे रहते हैं, काम में जुटे रहते हैं, दिखावा करते हैं, उन्हें सत्य हासिल करने में बहुत कठिनाई उठानी पड़ती है। जरा इस पर विचार करो : किस तरह का व्यक्ति सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर पाता है? जो लोग स्थिर-बुद्धि के होते हैं, जो लोग अपने दिल का इस्तेमाल करते हैं, जिनके पास दिल होता है। एक तरह से, ऐसे लोग वास्तविकता पर अधिक ध्यान देते हैं, ऐसी चीजों पर जो वास्तविक होती हैं; इसके अलावा, वे अधिक व्यावहारिक होते हैं, वे सकारात्मक चीजें पसंद करते हैं, वे सत्य से प्रेम करते हैं और उन्हें ऐसी चीजें प्रिय होती हैं जो वास्तविक हों। ऐसे लोग अंततः सत्य को समझने और हासिल करने योग्य होते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर में आस्था के लिए सर्वाधिक आवश्यक है जीवन में प्रवेश' से उद्धृत

परमेश्वर तुम लोगों में से प्रत्येक को पूर्ण बनाने का इच्छुक है। वर्तमान में, लंबे समय से अधिकांश लोगों ने पहले ही परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है, लेकिन उन्होंने अपने आपको मात्र परमेश्वर के अनुग्रह में आनंद लेने तक सीमित कर लिया है, और वे केवल उससे देह के कुछ सुख पाने के लिए लालायित हैं, उससे अधिक और उच्चतर खुलासे प्राप्त करने के इच्छुक नहीं है। इससे पता चलता है कि मनुष्य का हृदय अभी भी हमेशा बाहरी बातों में लगा रहता है। भले ही मनुष्य के कार्य, उसकी सेवा और परमेश्वर के लिए उसके प्रेमी हृदय में कुछ अशुद्धताएँ कम हों, पर जहाँ तक उसके भीतरी सार और उसकी पिछड़ी सोच का संबंध है, मनुष्य अभी भी निरंतर देह की शांति और आनंद की खोज में लगा है और परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाए जाने की शर्तों और प्रयोजनों की जरा भी परवाह नहीं करता। और इसलिए, ज्यादातर लोगों का जीवन अभी भी असभ्य और पतनशील है। उनका जीवन जरा भी नहीं बदला है; वे स्पष्टत: परमेश्वर में विश्वास को कोई महत्वपूर्ण मामला नहीं मानते, बल्कि ऐसा लगता है जैसे वे बस दूसरों की खातिर परमेश्वर में विश्वास करते हैं, प्रेरणाओं से संचालित हैं, और निष्प्रयोजन अस्तित्व में भटकते हुए लापरवाही से जी रहे हैं। कुछ ही हैं, जो सब चीज़ों में परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने की कोशिश कर पाते हैं, अधिक और कीमती वस्तुएँ पाते हैं, परमेश्वर के घर में आज बड़े धनी बन गए हैं, और परमेश्वर के अधिक आशीष पा रहे हैं। यदि तुम सब चीज़ों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो, और पृथ्वी पर परमेश्वर ने जो देने का वादा किया है, उसे प्राप्त करने में समर्थ हो; यदि तुम सब चीज़ों में परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध होना चाहते हो और वर्षों को बेकार गुज़रने नहीं देते, तो सक्रियता से प्रवेश करने का यह आदर्श मार्ग है। केवल इसी तरह से तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य और पात्र बनोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रतिज्ञाएँ उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं' से उद्धृत

फुटनोट:

क. मूल पाठ में, "उनका मानना है" यह वाक्यांश नहीं है।

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