22. सत्य का अनुसरण करने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के वचनों को अक्सर खाने-पीने, उसके साथ सच्चा संवाद करने, उसके वचनों में सत्य की तलाश करने, सत्य को व्यवहार में लाने और वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम होना आवश्यक है।

(2) परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करना और उसके न्याय और उसकी ताड़ना को, उसके द्वारा काट-छाँट और निपटारे को स्वीकार करना आवश्यक है। अपने भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के लिए एक व्यक्ति का आत्म-चिंतन और आत्म-बोध में सक्षम होना भी आवश्यक है।

(3) परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध स्थापित करना और उसके लिए अपने आप को ईमानदारी से खपाना आवश्यक है। केवल इसी प्रकार पवित्र आत्मा के कार्य की अगुवाई और पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है।

(4) पतरस की राह पर चलना, सत्य की तलाश करना और सभी मामलों में स्वयं पर चिंतन करना, अपने स्वभाव में एक बदलाव लाने पर ध्यान केंद्रित करना, और परमेश्वर से सच्चा प्रेम करने वाला व्यक्ति बनना आवश्यक है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

सत्य सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता है। यह इंसान का जीवन और उसकी यात्रा की दिशा बन सकता है; यह उसके भ्रष्ट स्वभाव को दूर करने में, परमेश्वर का भय मानने और बुराई को दूर करने में, एक ऐसा व्यक्ति बनने में जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हो तथा जो एक योग्य सृजित प्राणी हो, और जिसे परमेश्वर का प्रेम और अनुग्रह प्राप्त हो, उसकी अगुवाई कर सकता है। इसकी बहुमूल्यता को देखते हुए, परमेश्वर के वचनों और सत्य के प्रति किसी व्यक्ति का क्या दृष्टिकोण और परिप्रेक्ष्य होना चाहिए? यह बिल्कुल स्पष्ट है: जो लोग परमेश्वर में सचमुच विश्वास करते हैं और उसके प्रति एक श्रद्धापूर्ण हृदय रखते हैं, उनके लिए उसके वचन उनके जीवन के प्राण होते हैं। इंसान को परमेश्वर के वचनों को संजोए रखना चाहिए, उन्हें खाना और पीना चाहिए, उनका आनंद लेना चाहिए, और उन्हें अपने जीवन के रूप में, उस दिशा के रूप में जिसमें उसे चलना है, और उसके लिए तैयार उपादान और प्रावधान के रूप में, स्वीकार करना चाहिए; इंसान को सत्य के कथनों और आवश्यकताओं के अनुसार जीना, अभ्यास करना और अनुभव करना चाहिए, सत्य की माँगों के प्रति, उसे प्रदत्त प्रत्येक कथन और अपेक्षा के प्रति, समर्पण करना चाहिए, बजाय इसके कि उसका अध्ययन, विश्लेषण, उस पर अटकलबाज़ी या संदेह किया जाए। चूँकि सत्य इंसान के लिए एक तैयार सहायता, उसका तैयार प्रावधान है, और यह उसका जीवन हो सकता है, उसे सत्य को सबसे अनमोल मानना चाहिए, क्योंकि उसे जीने के लिए, परमेश्वर की माँगों को पूरा करने के लिए, उसका भय मानने और बुराई से दूर रहने के लिए और अपने दैनिक जीवन के भीतर अभ्यास के मार्ग को खोजने के लिए, सत्य पर भरोसा करना चाहिए, उसे अभ्यास के सिद्धांतों को समझना और परमेश्वर के प्रति समर्पित होना चाहिए। इंसान को अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्यागने के लिए भी, एक ऐसा व्यक्ति बनने के लिए जिसे बचाया गया हो और जो एक योग्य सृजित प्राणी हो, सत्य पर भरोसा करना करना चाहिए।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे सत्य से घृणा करते हैं, सिद्धांतों की खुले आम धज्जियाँ उड़ाते हैं और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की उपेक्षा करते हैं (भाग सात)' से उद्धृत

अभी परमेश्वर अंत के दिनों का न्याय कार्य करता है, और उसने बहुत-से वचन व्यक्त किए हैं। परमेश्वर में आस्था के मार्ग में सत्य से जुड़ी बहुत-सी बातें हमारे सामने आई हैं। अगर हम सत्य की खोज नहीं करते तो कोई मार्ग नहीं है, इसलिए हमें लिए सत्य का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, और जब हम परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, तो हमें उन्हें वास्तविकता से जोड़ना चाहिए। परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं और उन्हें व्यक्तिगत रूप से अनुभव करना चाहिए। लोगों के जन्म लेने से लेकर उनके वयस्क होने, काम करना शुरू करने, घर बसाने और एक कैरियर जमाने तक, उनके पूरे जीवन के दौरान—जिसमें उनके सामने आने वाले लोग, घटनाएँ, चीजें और उनके साथ होने वाली सभी अन्य बातें शामिल हैं—ऐसा कुछ भी नहीं होता जो सत्य को स्पर्श करता हो, उनके द्वारा सत्य के माध्यम से कुछ समझना तो दूर की बात है। इसलिए, हर व्यक्ति सत्य के लिए अजनबी है। और ठीक इसलिए, क्योंकि हम सबमें सत्य का अभाव है, आज से शुरु करते हुए हमें सत्य को खोजना चाहिए; यह परम आवश्यक है। अगर तुम्हें अभी तक यह अहसास नहीं हुआ कि परमेश्वर में विश्वास करने पर तुम्हारे लिए सत्य की खोज करना आवश्यक है, और सिर्फ सत्य ही तुम्हें बदल सकता है, तुम्हें पूर्ण बना सकता है, तुम्हें बचा सकता है, और तुम्हें सही अर्थों में परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है, तो फिर तुम्हारी सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं हो सकती, और इसलिए तुम उसकी खोज करने में अक्षम हो। कुछ लोग कहते हैं, "यही काफी है कि परमेश्वर में अपनी आस्था में मैं परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने में, कलीसियाई जीवन जीने में, अपना कर्तव्य निभाने में, और सुसमाचार का उपदेश देने में संकोच नहीं करता—तो फिर मेरे लिए सत्य की खोज करना भी क्यों जरूरी है? मैं आम तौर से कभी कोई पाप या परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं करता, न ही मैं मसीह-विरोधी हूँ। मैं दुष्टों से दूर रहता हूँ। मुझे अपने मार्गदर्शन और मदद के लिए बस थोड़े-से सरल नियमों की जरूरत है; मुझे किसी गूढ़ सत्य की खोज करने की जरूरत नहीं है।" क्या यह चीजों को देखने का सही तरीका है? (नहीं।) क्यों नहीं? (क्योंकि लोग परमेश्वर द्वारा तभी बचाए जा सकते हैं, जब वे सत्य को प्राप्त कर चुके हों।) इस समय, कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें यह अस्पष्ट-सा बोध है कि उनके उद्धार के लिए सत्य कितना महत्वपूर्ण है, कि वह एक अच्छी चीज है। पर यह बोध जड़ पकड़ सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम बाद में सत्य की खोज कैसे करते हो। सत्य की खोज करना बहुत महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, जब तुम नकारात्मक और दुर्बल होते हो, तो क्या तुम सत्य की मदद और पोषण के बिना दृढ़ बन सकते हो? क्या तुम अपनी दुर्बलता से उबर सकते हो? क्या तुम यह समझ पाने में सक्षम होते हो कि तुम नकारात्मक और दुर्बल क्यों रहे हो? निश्चित रूप से नहीं। जब तुम अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए ढीले और लापरवाह होते हो, तो क्या तुम अपनी भ्रष्टता के इस पहलू को सत्य की खोज के बिना ठीक कर सकते हो? क्या तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होने में सक्षम होते हो? अगर लोग सत्य की खोज नहीं करते, तो क्या वे स्वयं को जान सकते हैं और अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान कर सकते हैं? नहीं। जब लोग परमेश्वर के बारे में लगातार धारणाएँ रखते हैं, और उसे हमेशा अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से मापते हैं, तो क्या इन चीजों का सत्य के बिना कोई समाधान हो सकता है? नहीं हो सकता। उन बहुत-सी चीजों में, जिनका हम सामना करते हैं—हमारे दैनिक जीवन के मामलों समेत—अगर हमारे पास सत्य नहीं है, हम सत्य की खोज नहीं करते, और इससे भी बढ़कर, हम सत्य को समझते नहीं, और अगर हम इस बात से अनजान हैं कि इन चीजों के बारे में परमेश्वर क्या कहता है और उसकी क्या इच्छा है, तो हम अपने साथ होने वाली चीजों से कैसे निपटेंगे? जो लोग थोड़े बेहतर हैं, वे अपने परिचित वचनों, वाक्यांशों और नियमों में या फिर मानवीय तरीकों का प्रयोग करके हल ढूँढ़ने की कोशिश कर सकते हैं, पर क्या ये समस्याओं को हल करने में सत्य की जगह ले सकते हैं? अगर हम सत्य की खोज नहीं करते, तो ऐसा कहा जा सकता है कि हमारे जीवन में किसी भी मामले में कोई सिद्धांत नहीं है, न ही हमारे पास अभ्यास का कोई मार्ग है, कोई उद्देश्य या दिशा होना तो दूर की बात है। अगर यह मामला है, तो हम जो कुछ भी करते हैं, वह परमेश्वर का विरोध और उसके साथ विश्वासघात है। तो क्या तब वह हमारे हर कृत्य से घृणा नहीं करेगा और उसे कोसेगा नहीं? क्या हमारे कृत्य उसके न्याय और ताड़ना का सामना नहीं करेंगे? इसलिए, इस बात की संभावना है कि सत्य को सही अर्थों में समझने से पहले हर व्यक्ति परमेश्वर के कुछ न्याय, ताड़ना, फटकार और अनुशासन का सामना करेगा—जिन सबका उद्देश्य लोगों को सत्य प्राप्त करवाना है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग' से उद्धृत

जीवन का अनुसरण करने में, तुम्‍हें दो बातों पर ज़रूर ध्‍यान देना चाहिए : पहली, परमेश्‍वर के वचनों के भीतर के सत्य को समझना; दूसरी, परमेश्‍वर के वचनों के भीतर स्‍वयं को समझना। ये दो बातें सबसे बुनियादी हैं। परमेश्‍वर के वचनों के बाहर कोई जीवन या सत्य नहीं है। अगर तुम परमेश्‍वर के वचनों के भीतर सत्य को नहीं खोजते हो, तो फिर तुम उसे खोजने कहाँ जा सकते हो? दुनिया में सत्य कहाँ है? संसार की सारी पुस्तकें दुष्ट शैतान के सिद्धांतों से संकलित की गई हैं, नहीं क्या? उनमें लेशमात्र भी सत्य नहीं है! परमेश्‍वर के वचनों में सत्य को समझने का सबसे महत्‍वपूर्ण भाग है परमेश्‍वर को उसके ही वचनों के भीतर समझना, उसके वचनों के भीतर मानव जीवन को समझना, उसके वचनों के भीतर सत्य के सभी पहलुओं को समझना, जैसे स्‍वयं अपनी सच्ची समझ और परमेश्‍वर के वचनों के भीतर मानवता के अस्तित्‍व के अर्थ खोजना। समस्‍त सत्य परमेश्‍वर के वचनों के भीतर है। तुम सत्य में तब तक प्रवेश नहीं कर सकते जबतक कि प्रवेश परमेश्‍वर के वचनों के ज़रिए न किया जाए। वह मुख्‍य परिणाम जो तुम्हें प्राप्त करना है, यह जानना है कि परमेश्‍वर के वचनों की वास्‍तविक समझ और ज्ञान से युक्त होना क्‍या होता है। परमेश्‍वर के वचनों की वास्‍तविक समझ के साथ, तुम फिर सत्य को समझ सकते हो। यह सबसे बुनियादी बात है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

सारांश में, अपने विश्वास में पतरस के मार्ग को अपनाने का अर्थ है, सत्य को खोजने के मार्ग पर चलना, जो वास्तव में स्वयं को जानने और अपने स्वभाव को बदलने का मार्ग भी है। केवल पतरस के मार्ग पर चलने के द्वारा ही कोई परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने के मार्ग पर होगा। किसी को भी इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तव में कैसे पतरस के मार्ग पर चलना है साथ ही कैसे इसे अभ्यास में लाना है। सबसे पहले, किसी को भी अपने स्वयं के इरादों, अनुचित कार्यों, और यहाँ तक कि अपने परिवार और अपनी स्वयं की देह की सभी चीज़ों को एक ओर रखना होगा। एक व्यक्ति को पूर्ण हृदय से समर्पित अवश्य होना चाहिए, अर्थात्, स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, सत्य की खोज पर ध्यान लगाना, और परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज पर अवश्य ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, और हर चीज़ में परमेश्वर की इच्छा को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह अभ्यास की सबसे बुनियादी और प्राणाधार पद्धति है। यह वही था जो पतरस ने यीशु को देखने के बाद किया था, और केवल इस तरह से अभ्यास करने से ही कोई सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर के वचनों के प्रति हार्दिक समर्पण में मुख्यत: सत्य की खोज करना, परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज करना, परमेश्वर की इच्छा को समझने पर ध्यान केन्द्रित करना, और परमेश्वर के वचनों से सत्य को समझना तथा और अधिक प्राप्त करना शामिल है। उसके वचनों को पढ़ते समय, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था और धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने पर तो उसका ध्यान और भी केंद्रित नहीं था; इसके बजाय, उसने सत्य को समझने और परमेश्वर की इच्छा को समझने पर, साथ ही उसके स्वभाव और उसकी सुंदरता की समझ को प्राप्त करने पर ध्यान लगाया था। पतरस ने परमेश्वर के वचनों से मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट अवस्थाओं के साथ ही मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति को तथा मनुष्य की वास्तविक कमियों को समझने का भी प्रयास किया, और इस प्रकार परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए, उसकी इंसान से अपेक्षाओं के सभी पहलुओं को प्राप्त किया। पतरस के पास ऐसे बहुत से अभ्यास थे जो परमेश्वर के वचनों के अनुरूप थे; यह परमेश्वर की इच्छा के सर्वाधिक अनुकूल था, और यह वो सर्वोत्त्म तरीका था जिससे कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए सहयोग कर सकता है। परमेश्वर से सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव करते समय, पतरस ने मनुष्य के लिए परमेश्वर के न्याय के प्रत्येक वचन, मनुष्य के प्रकाशन के परमेश्वर के प्रत्येक वचन और मनुष्य की उसकी माँगों के प्रत्येक वचन के विरुद्ध सख्ती से स्वयं की जाँच की, और उन वचनों के अर्थ को जानने का पूरा प्रयास किया। उसने उस हर वचन पर विचार करने और याद करने की ईमानदार कोशिश की जो यीशु ने उससे कहे थे, और बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त किए। अभ्यास करने के इस तरीके के माध्यम से, वह परमेश्वर के वचनों से स्वयं की समझ प्राप्त करने में सक्षम हो गया था, और वह न केवल मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट स्थितियों को समझने लगा, बल्कि मनुष्य के सार, प्रकृति और विभिन्न कमियों को समझने लगा—स्वयं को वास्तव में समझने का यही अर्थ है। परमेश्वर के वचनों से, पतरस ने न केवल स्वयं की सच्ची समझ प्राप्त की, बल्कि परमेश्वर के वचनों में व्यक्त की गई बातों—परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव, उसके स्वरूप, परमेश्वर की अपने कार्य के लिए इच्छा, मनुष्यजाति से उसकी माँगें—से इन वचनों से उसे परमेश्वर के बारे में पूरी तरह से पता चला। उसे परमेश्वर का स्वभाव, और उसका सार पता चला; उसे परमेश्वर के स्वरूप का ज्ञान और समझ मिली, साथ ही परमेश्वर की प्रेममयता और मनुष्य से परमेश्वर की माँगें पता चलीं। भले ही परमेश्वर ने उस समय उतना नहीं बोला, जितना आज वह बोलता है, किन्तु पतरस में इन पहलुओं में परिणाम उत्पन्न हुआ था। यह एक दुर्लभ और बहुमूल्य चीज़ थी। पतरस सैकड़ों परीक्षाओं से गुज़रा लेकिन उसका कष्‍ट सहना व्‍यर्थ नहीं हुआ। न केवल उसने परमेश्‍वर के वचनों और कार्यों से स्‍वयं को समझ लिया बल्कि उसने परमेश्‍वर को भी जान लिया। इसके साथ ही, उसने परमेश्‍वर के वचनों में इंसानियत से उसकी सभी अपेक्षाओं पर विशेष ध्‍यान दिया। परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप होने के लिए मनुष्‍य को जिस भी पहलू से परमेश्‍वर को संतुष्ट करना चाहिए, पतरस उन पहलुओं में पूरा प्रयास करने में और पूर्ण स्‍पष्‍टता प्राप्‍त करने में समर्थ रहा; ख़ुद उसके प्रवेश के लिए यह अत्‍यंत लाभकारी था। परमेश्‍वर ने चाहे जिस भी विषय में कहा, जब तक वे वचन जीवन बन सकते थे और सत्य हैं, तब तक उसने उन्‍हें अपने हृदय में रचा-बसा लिया ताकि अक्‍सर उन पर विचार कर सके और उनकी सराहना कर सके। यीशु के वचनों को सुनने के बाद, वह उन्‍हें अपने हृदय में उतार सका, जिससे पता चलता है कि उसका ध्‍यान विशेष रूप से परमेश्‍वर के वचनों पर था, और अंत में उसने वास्‍तव में परिणाम प्राप्‍त कर लिये। अर्थात्, वह परमेश्‍वर के वचनों पर खुलकर व्‍यवहार कर सका, सत्‍य पर सही ढंग से अमल कर सका और परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप हो सका, पूरी तरह परमेश्‍वर की मर्ज़ी के अनुसार कार्य कर सका, और अपने निजी मतों और कल्‍पनाओं का त्‍याग कर सका। इस तरह, पतरस परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सका। पतरस की सेवा परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुसार मुख्‍य रूप से इसीलिए हो सकी क्‍योंकि उसने ऐसा किया था।

यदि कोई अपना कर्तव्य पूरा करते हुए परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है, और अपने कार्यों और क्रियाकलापों में सैद्धांतिक है और सत्य के समस्त पहलुओं की वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया गया है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य और उसके वचन ऐसे लोगों के लिए पूरी तरह से प्रभावी हो गए हैं, कि परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन गए हैं, उन्होंने सच्चाई को प्राप्त कर लिया है, और वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने में समर्थ हैं। इसके बाद, उनके देह की प्रकृति—अर्थात, उनके मूल अस्तित्व की नींव—हिलकर अलग हो जाएगी और ढह जाएगी। जब लोग परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में धारण कर लेंगे, तो वे नए लोग बन जाएंगे। अगर परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन जाते हैं; परमेश्वर के कार्य का दर्शन, मानवता से उसकी अपेक्षाएँ, मनुष्यों को उसके प्रकाशन, और एक सच्चे जीवन के वे मानक जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि वे प्राप्त करें, उनका जीवन बन जाते हैं, अगर वे इन वचनों और सच्चाइयों के अनुसार जीते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों द्वारा सिद्ध बनाए जाते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पुनर्जन्म लेते हैं और नए लोग बन गए हैं। यह वह मार्ग है जिसके द्वारा पतरस ने सत्य का अनुसरण किया; यह सिद्ध बनाए जाने, परमेश्वर के वचनों से पूर्ण बनाए जाने, और परमेश्वर के वचनों से जीवन को पाने का मार्ग था। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य उसका जीवन बन गया, और केवल तभी वह एक ऐसा व्यक्ति बना जिसने सत्य को प्राप्त किया।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

पतरस ने जो खोज की थी, वह सब परमेश्वर के हृदय का अनुसरण था। उसने परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की कोशिश की थी, और पीड़ा तथा प्रतिकूल परिस्थितियों पर ध्यान दिए बिना वह परमेश्वर की इच्छा पूरी करने का इच्छुक था। परमेश्वर के किसी विश्वासी द्वारा इससे बड़ा कोई अनुसरण नहीं है। पौलुस ने जो खोज की थी, वह उसकी अपनी देह, अपनी अवधारणाओं, और उसकी अपनी योजनाओं तथा षडयंत्रों से कलंकित थी। वह किसी भी तरह परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी नहीं था, ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसने परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की कोशिश की थी। परतस ने परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित होने का प्रयास किया था, और यद्यपि उसने जो कार्य किया वह बड़ा नहीं था, फिर भी उसके अनुसरण के पीछे की प्रेरणा और जिस पथ पर वह चला, सही थे; यद्यपि वह बहुत सारे लोगों को प्राप्त नहीं कर पाया, फिर भी वह सत्य के मार्ग का अनुसरण कर सका था। इसी कारण से कहा जा सकता है कि वह परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी था। आज, यदि तुम कार्यकर्ता नहीं हो, तब भी तुम्हें परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने और परमेश्वर के समस्त आयोजनों के प्रति समर्पित होने की कोशिश करने में सक्षम होना चाहिए। परमेश्वर जो भी कहता है तुम्हें उसका पालन कर पाना, और सभी प्रकार के क्लेशों और शुद्धिकरण का अनुभव कर पाना, और यद्यपि तुम कमज़ोर हो, फिर भी तुम्हें अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम कर पाना चाहिए। जो स्वयं अपने जीवन की ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हैं वे परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने के इच्छुक होते हैं, और अनुसरण के बारे में ऐसे लोगों का दृष्टिकोण सही होता है। यही वे लोग हैं जिनकी परमेश्वर को ज़रूरत है। यदि तुमने बहुत सारा कार्य किया है, और दूसरों ने तुम्हारी शिक्षाएँ प्राप्त की हैं, किंतु तुम स्वयं नहीं बदले हो, और कोई गवाही नहीं दी है, या कोई सच्चा अनुभव नहीं लिया है, यहाँ तक कि अपने जीवन के अंत में भी, तुमने जो कुछ किया उसमें से किसी कार्य ने भी गवाही नहीं दी है, तो क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो बदल चुका है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अनुसरण करता है? उस समय, पवित्र आत्मा ने तुम्हारा उपयोग किया था, किंतु जब उसने तुम्हारा उपयोग किया, तब उसने तुम्हारे उस भाग का उपयोग किया था जिसका कार्य के लिए उपयोग किया जा सकता था, और उसने तुम्हारे उस भाग का उपयोग नहीं किया जिसका उपयोग नहीं किया जा सकता था। यदि तुम बदलने की कोशिश करते, तो तुम्हें उपयोग करने की प्रक्रिया के दौरान धीरे-धीरे पूर्ण बनाया गया होता। परंतु पवित्र आत्मा इस बात की ज़िम्मेदारी नहीं लेता कि तुम्हें अंततः प्राप्त किया जाएगा या नहीं, और यह तुम्हारे अनुसरण के तरीक़े पर निर्भर करता है। यदि तुम्हारे व्यक्तिगत स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आए हैं, तो इसलिए क्योंकि अनुसरण के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण ग़लत है। यदि तुम्हें कोई पुरस्कार नहीं दिया गया है, तो यह तुम्हारी अपनी समस्या है, और इसलिए कि तुमने स्वयं सत्य को अभ्यास में नहीं लाया और तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में असमर्थ हो। और इसलिए, तुम्हारे व्यक्तिगत अनुभवों से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है, और तुम्हारे व्यक्तिगत प्रवेश से अधिक अत्यावश्यक कुछ भी नहीं है! कुछ लोग अंततः कहेंगे, "मैंने तुम्हारे लिए इतना अधिक कार्य किया है, और मैंने कोई प्रशंसनीय उपलब्धियाँ भले प्राप्त न की हों, फिर भी मैंने पूरी मेहनत से अपने प्रयास किए हैं। क्या तुम मुझे जीवन के फल खाने के लिए बस स्वर्ग में प्रवेश करने नहीं दे सकते?" तुम्हें जानना ही चाहिए कि मैं किस प्रकार के लोगों को चाहता हूँ; वे जो अशुद्ध हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, वे जो अशुद्ध हैं उन्हें पवित्र भूमि को मैला करने की अनुमति नहीं है। तुमने भले ही बहुत कार्य किया हो, और कई सालों तक कार्य किया हो, किंतु अंत में यदि तुम अब भी बुरी तरह मैले हो, तो यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय होगा कि तुम मेरे राज्य में प्रवेश करना चाहते हो! संसार की स्थापना से लेकर आज तक, मैंने अपने राज्य में उन लोगों को कभी आसान प्रवेश नहीं दिया है जो अनुग्रह पाने के लिए मेरे साथ साँठ-गाँठ करते हैं। यह स्वर्गिक नियम है, और कोई इसे तोड़ नहीं सकता है! तुम्हें जीवन की खोज करनी ही चाहिए। आज, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा वे उसी प्रकार के हैं जैसा पतरस था : ये वे लोग हैं जो स्वयं अपने स्वभाव में परिवर्तनों की तलाश करते हैं, और जो परमेश्वर के लिए गवाही देने, और परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के इच्छुक होते हैं। केवल ऐसे लोगों को ही पूर्ण बनाया जाएगा। यदि तुम केवल पुरस्कारों की प्रत्याशा करते हो, और स्वयं अपने जीवन स्वभाव को बदलने की कोशिश नहीं करते, तो तुम्हारे सारे प्रयास व्यर्थ होंगे—यह अटल सत्य है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

सत्य की खोज एक व्यावहारिक समस्या और एक व्यावहारिक सबक दोनों है। हम अपनी कल्पना, विचारों, धारणाओं या ज्ञान की रद्दी पर निर्भर करके सत्य की समझ प्राप्त नहीं कर सकते, न ही हम उसे अभ्यास में ला सकते हैं; यह इतना आसान नहीं है। हमें वास्तव में उसका मूल्य चुकाना, और अपने दैनिक जीवन में उसके अनुभव, उसकी खोज, उसके चिंतन-मनन, उसकी संगति और उस पर काम करने का प्रयास करना आवश्यक है; केवल तभी, थोड़ा-थोड़ा करके हम कुछ प्रवेश प्राप्त करेंगे और परमेश्वर के वचनों और सत्य के संबंध में कुछ हासिल करेंगे। जब वह दिन आता है, जब तुम यह समझ जाते हो कि सत्य और उसका सार क्या है, जब तुम्हें यह बोध हो जाता है कि देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन वे सिद्धांत हैं, जिन्हें हमें वास्तव में अपने सामने आने वाली हर चीज में व्यवहार में लाना चाहिए और कि वे हमारे जीवन के उद्देश्य और दिशा हैं, तब, उस समय, तुम देखोगे कि परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला हर कार्य कितना अर्थपूर्ण है, और हमारे लिए देहधारी परमेश्वर कितना महत्वपूर्ण और मूल्यवान है! परमेश्वर द्वारा कही गई हर बात के पीछे का उद्देश्य, उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य के हर कदम, उसके हर कथन, हर कृत्य, हर चाल, और उसके हर भाव, दृष्टिकोण और विचार का उद्देश्य मनुष्य का उद्धार करना और लोगों को बचाना है। इनमें से कोई भी खोखला नहीं है; हरेक असली और वास्तविक है। इसलिए, भले ही लोग अनुग्रह के युग से हों या वे अविश्वासियों में से, उन सभी को सपने देखना छोड़ देना चाहिए; उन्हें अपनी कल्पनाओं के चश्मे से परमेश्वर में विश्वास करना छोड़ देना चाहिए, और अपने आदर्शवाद के खोखले विचारों में जीना छोड़ देना चाहिए। परमेश्वर का असली और वास्तविक कार्य हमसे उसका असली और वास्तविक अनुभव करने और उसका मूल्य चुकाने की माँग करता है; सिर्फ तभी अनुभव द्वारा प्राप्त किया गया सत्य हमारा जीवन बन पाएगा। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते समय हमें सबसे ज्यादा सत्य को प्राप्त करना चाहिए। जब तुम सत्य को प्राप्त कर लेते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे ह्रदय में जगह बना लेता है—वह ठीक यही हासिल करना चाहता है। जब तुम सत्य को समझ लेते हो और तुम्हें यह बोध हो जाता है कि वह क्या है, और तुम्हारे हृदय में उसके जड़ें जमा लेने के बाद, भीतर बहुत गहराई में, परनेश्वर के वचन सच में तुम्हारा जीवन बन जाते हैं। क्या यह प्रक्रिया वास्तविक है? बिल्कुल है। तो इस प्रक्रिया में हमें क्‍या करने की आवश्यकता है? सबसे पहले, हमें परमेश्‍वर के वचनों की वास्तविकता का अनुभव करना और उसमें प्रवेश करना चाहिए। हमें इस बात से अवगत होना चाहिए कि वह हमारे भीतर क्‍या करना चाहता है और कौन-से परिणाम हासिल करना चाहता है। परमेश्वर हमारे भीतर मुख्यतः दो परिणाम हासिल करना चाहता है : पहला, हम खुद को जान जाएँ, और दूसरा, हम परमेश्‍वर को जान जाएँ।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग' से उद्धृत

मनुष्य को परमेश्वर पर केवल विश्वास ही नहीं करना है, बल्कि उसे परमेश्वर से प्रेम करना है, उसका अनुसरण और उसकी आराधना करनी है। यदि आज तुम अनुसरण नहीं करोगे, तो वह दिन आएगा जब तुम कहोगे, "मैंने पहले सही तरीके से परमेश्वर का अनुसरण क्यों नहीं किया, उसे सही ढंग से संतुष्ट क्यों नहीं किया, मैं अपने जीवन-स्वभाव में परिवर्तन क्यों नहीं लाया? उस समय परमेश्वर के प्रति समर्पित होने, और परमेश्वर के वचन का ज्ञान पाने का प्रयास न करने के कारण आज मैं कितना पछता रहा हूँ। उस समय परमेश्वर ने कितना कुछ कहा था; मैंने अनुसरण क्यों नहीं किया? मैं कितना मूर्ख था!" तुम कुछ हद तक अपने-आपसे नफरत करोगे। आज, तुम मेरी बातों पर विश्वास नहीं करते, और उन पर ध्यान नहीं देते; जब इस कार्य को फैलाने का दिन आएगा, और तुम उसकी संपूर्णता को देखोगे, तब तुम्हें अफसोस होगा, और उस समय तुम भौंचक्के रह जाओ। आशीषें हैं, फिर भी तुम्हें उनका आनंद लेना नहीं आता, सत्य है, फिर भी तुम्हें उसका अनुसरण करना नहीं आता। क्या तुम अपने-आप पर अवमानना का दोष नहीं लाते? आज, यद्यपि परमेश्वर के कार्य का अगला कदम अभी शुरू होना बाकी है, फिर भी तुमसे जो कुछ अपेक्षित है और तुम्हें जिन्हें जीने के लिए कहा जाता है, उनमें कुछ भी असाधारण नहीं है। इतना सारा कार्य है, इतने सारे सत्य हैं; क्या वे इस योग्य नहीं हैं कि तुम उन्हें जानो? क्या परमेश्वर की ताड़ना और न्याय तुम्हारी आत्मा को जागृत करने में असमर्थ हैं? क्या परमेश्वर की ताड़ना और न्याय तुममें खुद के प्रति नफरत पैदा करने में असमर्थ हैं? क्या तुम शैतान के प्रभाव में जी कर, और शांति, आनंद और थोड़े-बहुत दैहिक सुख के साथ जीवन बिताकर संतुष्ट हो? क्या तुम सभी लोगों में सबसे अधिक निम्न नहीं हो? उनसे ज्यादा मूर्ख और कोई नहीं है जिन्होंने उद्धार को देखा तो है लेकिन उसे प्राप्त करने का प्रयास नहीं करते; वे ऐसे लोग हैं जो पूरी तरह से देह-सुख में लिप्त होकर शैतान का आनंद लेते हैं। तुम्हें लगता है कि परमेश्वर में अपनी आस्था के लिए तुम्‍हें चुनौतियों और क्लेशों या कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ेगा। तुम हमेशा निरर्थक चीजों के पीछे भागते हो, और तुम जीवन के विकास को कोई अहमियत नहीं देते, बल्कि तुम अपने फिजूल के विचारों को सत्य से ज्यादा महत्व देते हो। तुम कितने निकम्‍मे हो! तुम सूअर की तरह जीते हो—तुममें और सूअर और कुत्ते में क्या अंतर है? जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, बल्कि शरीर से प्यार करते हैं, क्या वे सब पूरे जानवर नहीं हैं? क्या वे मरे हुए लोग जिनमें आत्मा नहीं है, चलती-फिरती लाशें नहीं हैं? तुम लोगों के बीच कितने सारे वचन कहे गए हैं? क्या तुम लोगों के बीच केवल थोड़ा-सा ही कार्य किया गया है? मैंने तुम लोगों के बीच कितनी आपूर्ति की है? तो फिर तुमने इसे प्राप्त क्यों नहीं किया? तुम्हें किस बात की शिकायत है? क्या यह बात नहीं है कि तुमने इसलिए कुछ भी प्राप्त नहीं किया है क्योंकि तुम देह से बहुत अधिक प्रेम करते हो? क्योंकि तुम्‍हारे विचार बहुत ज्यादा निरर्थक हैं? क्योंकि तुम बहुत ज्यादा मूर्ख हो? यदि तुम इन आशीषों को प्राप्त करने में असमर्थ हो, तो क्या तुम परमेश्वर को दोष दोगे कि उसने तुम्‍हें नहीं बचाया? तुम परमेश्वर में विश्वास करने के बाद शांति प्राप्त करना चाहते हो—ताकि अपनी संतान को बीमारी से दूर रख सको, अपने पति के लिए एक अच्छी नौकरी पा सको, अपने बेटे के लिए एक अच्छी पत्नी और अपनी बेटी के लिए एक अच्छा पति पा सको, अपने बैल और घोड़े से जमीन की अच्छी जुताई कर पाने की क्षमता और अपनी फसलों के लिए साल भर अच्छा मौसम पा सको। तुम यही सब पाने की कामना करते हो। तुम्‍हारा लक्ष्य केवल सुखी जीवन बिताना है, तुम्‍हारे परिवार में कोई दुर्घटना न हो, आँधी-तूफान तुम्‍हारे पास से होकर गुजर जाएँ, धूल-मिट्टी तुम्‍हारे चेहरे को छू भी न पाए, तुम्‍हारे परिवार की फसलें बाढ़ में न बह जाएं, तुम किसी भी विपत्ति से प्रभावित न हो सको, तुम परमेश्वर के आलिंगन में रहो, एक आरामदायक घरौंदे में रहो। तुम जैसा डरपोक इंसान, जो हमेशा दैहिक सुख के पीछे भागता है—क्या तुम्‍हारे अंदर एक दिल है, क्या तुम्‍हारे अंदर एक आत्मा है? क्या तुम एक पशु नहीं हो? मैं बदले में बिना कुछ मांगे तुम्‍हें एक सत्य मार्ग देता हूँ, फिर भी तुम उसका अनुसरण नहीं करते। क्या तुम उनमें से एक हो जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं? मैं तुम्‍हें एक सच्चा मानवीय जीवन देता हूँ, फिर भी तुम अनुसरण नहीं करते। क्या तुम कुत्ते और सूअर से भिन्न नहीं हो? सूअर मनुष्य के जीवन की कामना नहीं करते, वे शुद्ध होने का प्रयास नहीं करते, और वे नहीं समझते कि जीवन क्या है। प्रतिदिन, उनका काम बस पेट भर खाना और सोना है। मैंने तुम्‍हें सच्चा मार्ग दिया है, फिर भी तुमने उसे प्राप्त नहीं किया है: तुम्‍हारे हाथ खाली हैं। क्या तुम इस जीवन में एक सूअर का जीवन जीते रहना चाहते हो? ऐसे लोगों के जिंदा रहने का क्या अर्थ है? तुम्‍हारा जीवन घृणित और ग्लानिपूर्ण है, तुम गंदगी और व्यभिचार में जीते हो और किसी लक्ष्य को पाने का प्रयास नहीं करते हो; क्या तुम्‍हारा जीवन अत्यंत निकृष्ट नहीं है? क्या तुम परमेश्वर की ओर देखने का साहस कर सकते हो? यदि तुम इसी तरह अनुभव करते रहे, तो क्या केवल शून्य ही तुम्हारे हाथ नहीं लगेगा? तुम्हें एक सच्चा मार्ग दे दिया गया है, किंतु अंततः तुम उसे प्राप्त कर पाओगे या नहीं, यह तुम्हारी व्यक्तिगत खोज पर निर्भर करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

मनुष्य को अर्थपूर्ण जीवन जीने का प्रयास अवश्य करना चाहिए और उसे अपनी वर्तमान परिस्थितियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। पतरस की छवि के अनुरूप अपना जीवन जीने के लिए, उसमें पतरस के ज्ञान और अनुभवों का होना जरूरी है। मनुष्य को ज़्यादा ऊँची और गहन चीजों के लिए अवश्य प्रयास करना चाहिए। उसे परमेश्वर को अधिक गहराई एवं शुद्धता से प्रेम करने का, और एक ऐसा जीवन जीने का प्रयास अवश्य करना चाहिए जिसका कोई मोल हो और जो सार्थक हो। सिर्फ यही जीवन है; तभी मनुष्य पतरस जैसा बन पाएगा। तुम्हें सकारात्मक तरीके से प्रवेश के लिए सक्रिय होने पर ध्यान देना चाहिए, और अधिक गहन, विशिष्ट और व्यावहारिक सत्यों को नजरअंदाज करते हुए क्षणिक आराम के लिए पीछे नहीं हट जाना चाहिए। तुम्हारा प्रेम व्यावहारिक होना चाहिए, और तुम्हें जानवरों जैसे इस निकृष्ट और बेपरवाह जीवन को जीने के बजाय स्वतंत्र होने के रास्ते ढूँढ़ने चाहिए। तुम्हें एक ऐसा जीवन जीना चाहिए जो अर्थपूर्ण हो और जिसका कोई मोल हो; तुम्हें अपने-आपको मूर्ख नहीं बनाना चाहिए या अपने जीवन को एक खिलौना नहीं समझना चाहिए। परमेश्वर से प्रेम करने की चाह रखने वाले व्यक्ति के लिए कोई भी सत्य अप्राप्य नहीं है, और ऐसा कोई न्याय नहीं जिस पर वह अटल न रह सके। तुम्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए और इस प्रेम का उपयोग करके उसकी इच्छा को कैसे संतुष्ट करना चाहिए? तुम्हारे जीवन में इससे बड़ा कोई मुद्दा नहीं है। सबसे बढ़कर, तुम्हारे अंदर ऐसी आकांक्षा और कर्मठता होनी चाहिए, न कि तुम्हें एक रीढ़विहीन और निर्बल प्राणी की तरह होना चाहिए। तुम्हें सीखना चाहिए कि एक अर्थपूर्ण जीवन का अनुभव कैसे किया जाता है, तुम्हें अर्थपूर्ण सत्यों का अनुभव करना चाहिए, और अपने-आपसे लापरवाही से पेश नहीं आना चाहिए। यह अहसास किए बिना, तुम्हारा जीवन तुम्हारे हाथ से निकल जाएगा; क्या उसके बाद तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने का दूसरा अवसर मिलेगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तुम्हारे अंदर पतरस के समान ही आकांक्षाएँ और चेतना होनी चाहिए; तुम्हारा जीवन अर्थपूर्ण होना चाहिए, और तुम्हें अपने साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए! एक मनुष्य के रूप में, और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले एक व्यक्ति के रूप में, तुम्हें इस योग्य होना होगा कि तुम बहुत ध्यान से यह विचार कर सको कि तुम्हें अपने जीवन के साथ कैसे पेश आना चाहिए, तुम्हें अपने-आपको परमेश्वर के सम्मुख कैसे अर्पित करना चाहिए, तुममें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण विश्वास कैसे होना चाहिए और चूँकि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तुम्हें उससे कैसे प्रेम करना चाहिए कि वह ज्यादा पवित्र, ज्यादा सुंदर और बेहतर हो। आज, तुम केवल इस बात से संतुष्ट नहीं हो सकते कि तुम पर किस प्रकार विजय पाई जाती है, बल्कि तुम्हें उस पथ पर भी विचार करना होगा जिस पर तुम भविष्य में चलोगे। तुम पूर्ण बनाए जा सको, इसके लिए तुम्हारे अंदर आकांक्षाएँ और साहस होना चाहिए, और तुम्हें हमेशा यह नहीं सोचते रहना चाहिए कि तुम असमर्थ हो। क्या सत्य के भी अपने चहेते होते हैं? क्या सत्य जानबूझकर लोगों का विरोध कर सकता है? यदि तुम सत्य का अनुसरण करते हो, तो क्या यह तुम पर हावी हो सकता है? यदि तुम न्याय के लिए मजबूती से खड़े रहते हो, तो क्या यह तुम्हें चित कर देगा? यदि जीवन की तलाश सच में तुम्हारी आकांक्षा है, तो क्या जीवन तुम्हें चकमा दे सकता है? यदि तुम्हारे अंदर सत्य नहीं है, तो इसका कारण यह नहीं है कि सत्य तुम्हें नजरअंदाज करता है, बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम सत्य से दूर रहते हो; यदि तुम न्याय के लिए मजबूती से खड़े नहीं हो सकते हो, तो इसका कारण यह नहीं है कि न्याय के साथ कुछ गड़बड़ है, बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम यह मानते हो कि यह तथ्यों के साथ मेल नहीं खाता; कई सालों तक जीवन की तलाश करने पर भी यदि तुमने जीवन प्राप्त नहीं किया है, तो इसका कारण यह नहीं है कि जीवन की तुम्हारे प्रति कोई चेतना नहीं है, बल्कि इसका कारण यह है कि तुम्हारे अंदर जीवन के प्रति कोई चेतना नहीं है, और तुमने जीवन को स्वयं से दूर कर दिया है; यदि तुम प्रकाश में जीते हो, लेकिन प्रकाश को पाने में असमर्थ रहे हो, तो इसका कारण यह नहीं है कि प्रकाश तुम्हें प्रकाशित करने में असमर्थ है, बल्कि यह है कि तुमने प्रकाश के अस्तित्व पर कोई ध्यान नहीं दिया है, और इसलिए प्रकाश तुम्हारे पास से खामोशी से चला गया है। यदि तुम अनुसरण नहीं करते हो, तो यही कहा जा सकता है कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो किसी काम का नहीं है, तुम्हारे जीवन में बिलकुल भी साहस नहीं है, और तुम्हारे अंदर अंधकार की ताकतों का विरोध करने का हौसला नहीं है। तुम बहुत कमजोर हो! तुम उन शैतानी ताकतों से बचने में असमर्थ हो जिन्होंने तुम्हारी घेराबंदी कर रखी है, तुम ऐसा ही सकुशल और सुरक्षित जीवन जीना और अपनी अज्ञानता में मर जाना चाहते हो। जो तुम्हें हासिल करना चाहिए वह है जीत लिए जाने का तुम्हारा प्रयास; यह तुम्हारा परम कर्तव्य है। यदि तुम स्वयं पर विजय पाए जाने से संतुष्ट हो जाते हो तो तुम प्रकाश के अस्तित्व को दूर हटाते हो। तुम्हें सत्य के लिए कष्ट उठाने होंगे, तुम्हें सत्य के लिए समर्पित होना होगा, तुम्हें सत्य के लिए अपमान सहना होगा, और अधिक सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अधिक कष्ट उठाने होंगे। यही तुम्हें करना चाहिए। एक शांतिपूर्ण पारिवारिक जीवन के लिए तुम्हें सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए, और क्षणिक आनन्द के लिए तुम्हें अपने जीवन की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुम्हें उस सबका अनुसरण करना चाहिए जो खूबसूरत और अच्छा है, और तुम्हें अपने जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तुम एक घिनौना जीवन जीते हो और किसी भी उद्देश्य को पाने की कोशिश नहीं करते हो तो क्या तुम अपने जीवन को बर्बाद नहीं कर रहे हो? ऐसे जीवन से तुम क्या हासिल कर पाओगे? तुम्हें एक सत्य के लिए देह के सभी सुखों को छोड़ देना चाहिए, और थोड़े-से सुख के लिए सारे सत्यों का त्याग नहीं कर देना चाहिए। ऐसे लोगों में कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं होता!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

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