55. विद्रूपताओं से बचने के सिद्धान्‍त

(1) परमेश्‍वर के वचनों को खाने और पीने तथा सत्‍य को तलाशने पर ध्‍यान केन्द्रित करो, और अपनी विचारणा या कल्‍पना से परमेश्‍वर के वचनों को समझाने की कोशिश मत करो, इसकी बजाय उनका अभ्‍यास करने, उन्‍हें अनुभव करने, और समझने पर ध्‍यान दो;

(2) जब तुम परमेश्‍वर के वचनों को खाते और पीते हो, तो उनके वास्‍तविक अर्थों को तलाशने और उनपर मनन करने का और अधिक उद्यम करते हो। उनकी छानबीन मत करो या उन्‍हें सन्‍दर्भ से मत काटो, बल्कि उनका कथन करने में निहित उसकी इच्‍छा को समझो;

(3) व्‍यक्ति को ऐसे लोगों के साथ बारबार संवाद करना चाहिए जिन्‍हें सत्‍य की स्‍पष्‍ट समझ है। केवल तभी व्‍यक्ति स्‍वयं को विद्रूपताओं और पूर्वग्रहों से छुटकारा दिलाकर स्‍पष्‍ट समझ और ज्ञान हासिल कर सकता है;

(4) उस मनुष्‍य के मार्गदर्शन और सिंचाई के प्रति आत्‍मसमर्पण करो जिसका पवित्र आत्‍मा इस्‍तेमाल करता है। सत्‍य की स्‍पष्‍ट समझ प्राप्‍त करो, और उसके प्रति समर्पण करना सीखो। पूर्वग्रहों और विद्रूपताओं को केवल इसी तरह सुधारा जा सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

मैं जो वचन कहता हूँ वे सत्य हैं और समूची मानवजाति के लिए हैं; केवल किसी विशिष्ट या खास किस्म के व्यक्ति के लिए नहीं हैं। इसलिए, तुम लोगों को मेरे वचनों को सत्य के नजरिए से समझने पर ध्यान देना चाहिए और पूरी एकाग्रता एवं ईमानदारी की प्रवृत्ति रखनी चाहिए; मेरे द्वारा बोले गए एक भी वचन या सत्य की उपेक्षा मत करो, और उन्हें हल्के में मत लो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

मेरे वचनों में रहस्य हैं, जो मनुष्य की समझ से बाहर हैं। केवल वे ही मुझे व्यक्त कर सकते हैं, जिन्हें मैं प्रेम करता हूँ, कोई अन्य नहीं; यह मेरे द्वारा निर्धारित किया गया है, और कोई इसे नहीं बदल सकता। मेरे वचन समृद्ध, व्यापक और अथाह हैं। सभी को मेरे वचनों पर बहुत श्रम करना चाहिए, अकसर उन पर विचार करने का प्रयास करना चाहिए, और एक भी वचन या वाक्य नहीं छोड़ना चाहिए—अन्यथा लोग त्रुटि के तहत श्रम करेंगे, और मेरे वचनों को ग़लत समझा जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 119' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ पाना कोई सरल बात नहीं है। इस तरह मत सोच : "मैं परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर सकता हूँ, और हर कोई मेरी व्याख्या को अच्छा कहता है और मुझे शाबाशी देता है, तो इसका अर्थ है कि मैं परमेश्वर के वचनों को समझता हूँ।" यह परमेश्वर के वचनों को समझने के समान नहीं है। यदि तूने परमेश्वर के कथनों के भीतर से कुछ प्रकाश प्राप्त किया है और तूने उसके वचनों के वास्तविक अर्थ को महसूस किया है, यदि तू उसके वचनों के पीछे के इरादे को और वे अंततः जो प्रभाव प्राप्त करेंगे, उसको व्यक्त कर सकता है, तो एक बार इन सब बातों की स्पष्ट समझ हो जाने पर, यह माना जा सकता है कि तुम्हारे पास कुछ अंश तक परमेश्वर के वचनों की समझ है। इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों को समझना इतना आसान नहीं है। सिर्फ इसलिए कि तू परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की एक लच्छेदार व्याख्या दे सकता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि तू इन्हें समझता है। तू चाहे उनके शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर पाये, तेरी व्याख्या तब भी मनुष्य की कल्पना और उसके सोचने के तरीके पर आधारित होगी। यह बेकार है! तुम परमेश्वर के वचनों को कैसे समझ सकते हो? मुख्य बात है कि उनके भीतर से सत्य को खोजना; केवल तभी तुम सच में समझ पाओगे कि परमेश्वर क्या कहता है। जब भी परमेश्वर बोलता है, तो वह निश्चित रूप से केवल सामान्यताओं में बात नहीं करता है। उसके द्वारा कथित प्रत्येक वाक्य के भीतर ऐसे विवरण होते हैं जो परमेश्वर के वचनों में निश्चित रूप से प्रकट किए जाने हैं, और वे अलग तरीके से व्यक्त किये जा सकते हैं। जिस तरीके से परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करता है मनुष्य उसकी थाह नहीं पा सकता। परमेश्वर के कथन बहुत गहरे हैं और मनुष्य के सोचने के तरीके के माध्यम से उसे समझा नहीं जा सकता है। जब तक लोग प्रयास करते रहेंगे, तब तक वे सत्य के हर पहलू का पूरा अर्थ समझ सकते हैं; अगर तुम ऐसा करते हो, तो तुम इन्हें अनुभव कर सकते हो, शेष बचा विवरण पूरी तरह से तब भर दिया जाएगा जब पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, इस प्रकार वह तुम्हें इन ठोस अवस्थाओं की समझ देगा। एक हिस्सा है परमेश्वर के वचनों को समझना, उन्हें पढ़ने के द्वारा उनकी विशिष्ट सामग्री को ढूंढना। दूसरा हिस्सा अनुभव के माध्यम से और पवित्र आत्मा से प्रबोधन प्राप्त करके परमेश्वर के वचनों के निहितार्थ को समझना है। मुख्य रूप से इन दोनों तरीकों से ही परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ हासिल की जाती है। यदि तू उसके वचनों की व्याख्या शाब्दिक रूप से या अपनी स्वयं की सोच या कल्पना के चश्मे से करता है, तो परमेश्वर के वचनों की तेरी समझ वास्तविक नहीं है, भले ही तू कितनी भी वाक्पटुता से इनकी व्याख्या कर सकता हो। यह संभव है कि तू संदर्भ से बाहर भी उनका अर्थ निकाल ले और उनका ग़लत अर्थ निकाले, यह करना और भी अधिक तकलीफ़देह है। इस प्रकार, सत्य मुख्य रूप से परमेश्वर के वचनों का ज्ञान हासिल करने के माध्यम से पवित्र आत्मा से प्रबुद्धता प्राप्त करके प्राप्त किया जाता है। उसके वचनों के शाब्दिक अर्थ को समझना या उन्हें समझाने में सक्षम होना यह सत्य को प्राप्त करने के रूप में नहीं गिना जाता है। यदि तुझे केवल उसके वचनों की शाब्दिक व्याख्या करने की आवश्यकता होती, तो पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता का मतलब ही क्या होता? अगर ऐसा होता तो तुझे बस कुछ निश्चित स्तर की शिक्षा की आवश्यकता होती, और अशिक्षित काफी कठिन परिस्थितियों में होते। परमेश्वर का कार्य कुछ ऐसा नहीं है जिसे मानव मस्तिष्क द्वारा समझा जा सकता है। परमेश्वर के वचनों की एक सच्ची समझ मुख्य रूप से पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता पाने पर निर्भर करती है; सत्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया ऐसी ही है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्‍वर के वचनों में सत्य को समझने का सबसे महत्‍वपूर्ण भाग है परमेश्‍वर को उसके ही वचनों के भीतर समझना, उसके वचनों के भीतर मानव जीवन को समझना, उसके वचनों के भीतर सत्य के सभी पहलुओं को समझना, जैसे स्‍वयं अपनी सच्ची समझ और परमेश्‍वर के वचनों के भीतर मानवता के अस्तित्‍व के अर्थ खोजना। समस्‍त सत्य परमेश्‍वर के वचनों के भीतर है। तुम सत्य में तब तक प्रवेश नहीं कर सकते जबतक कि प्रवेश परमेश्‍वर के वचनों के ज़रिए न किया जाए। वह मुख्‍य परिणाम जो तुम्हें प्राप्त करना है, यह जानना है कि परमेश्‍वर के वचनों की वास्‍तविक समझ और ज्ञान से युक्त होना क्‍या होता है। परमेश्‍वर के वचनों की वास्‍तविक समझ के साथ, तुम फिर सत्य को समझ सकते हो। यह सबसे बुनियादी बात है। कुछ लोग कार्य और प्रचार करते हैं, हालाँकि वे सतही तौर पर परमेश्वर के वचनों पर सहभागिता करते नज़र आते हैं, मगर वे परमेश्वर के वचनों पर मात्र शाब्दिक चर्चा कर रहे होते हैं, उनकी बातों में सार्थक कुछ नहीं होता। उनके उपदेश किसी भाषा की पाठ्य-पुस्तक की शिक्षा की तरह होते हैं,मद-दर-मद, पहलू-दर-पहलू क्रम-बद्ध किये हुए, और जब वे बोल लेते हैं, तो यह कहकर हर कोई उनका स्तुति गान करता है: "इस व्यक्ति में वास्तविकता है। उसने इतने अच्छे ढंग से और इतने विस्तार से समझाया।" जब उनका उपदेश देना समाप्त हो जाता है, तो ये लोग दूसरे लोगों से इन सारी चीज़ों को इकट्ठा करके सभी को भेज देने के लिये कहते हैं। उनके कृत्य दूसरों का कपट बन जाते हैं और वे लोग जिन बातों का प्रचार करते हैं, वे सब भ्राँतियाँ होती हैं। देखने में ऐसा लगता है, जैसे ये लोग मात्र परमेश्वर के वचनों का प्रचार कर रहे हैं और यह सत्य के अनुरूप दिखता है। लेकिन अगर अधिक गौर से समझेंगे तो तुम देखोगे कि यह शब्दों और सिद्धांतों के अलावा कुछ नहीं है। यह सब इंसानी कल्पनाओं और धारणाओं के साथ झूठी विवेक-बुद्धि है, साथ ही कुछ हिस्सा ऐसा है जो परमेश्वर को सीमांकित करता है। क्या इस तरह का उपदेश परमेश्वर के कार्य में बाधा नहीं है? यह एक ऐसी सेवा है जो परमेश्वर का विरोध करती है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

पहले, लोग जिस तरीके से अनुभव करते थे, उसमें बहुत सारे भटकाव और बेतुकापन था। उन्हें परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों की समझ थी ही नहीं, इसलिए ऐसे बहुत से क्षेत्र थे जिनमें लोगों के अनुभव उलट-पलट हो जाते थे। परमेश्वर इंसान से यह अपेक्षा करता है कि वह सामान्य मानवीयता को जिए। मिसाल के तौर पर, लोगों का खाने-कपड़ों के मामलों में आधुनिक रीति-रिवाजों को अपनाना, सूट या टाई पहनना, आधुनिक कला के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी हासिल कर लेना और खाली समय में कला, संस्कृति और मनोरंजन का आनंद लेना, ठीक है। वे कुछ यादगार तस्वीरें खींच सकते हैं, पढ़कर कुछ उपयोगी ज्ञान हासिल कर सकते हैं और अपेक्षाकृत अच्छे परिवेश में रह सकते हैं। ये सारी ऐसी बातें हैं जो सामान्य मानवीयता के अनुकूल हैं, फिर भी लोग इन्हें परमेश्वर द्वारा घृणा की जाने वाली चीज़ों के रूप में देखते हैं और वे इन कामों को करने से स्वयं को दूर रखते हैं। उनके अभ्यास में मात्र नियमों का पालन करना शामिल होता है, जिसके कारण उनका जीवन निहायत ही नीरस और एकदम निरर्थक हो जाता है। दरअसल, परमेश्वर ने कभी नहीं चाहा कि लोग इस तरह से कार्य करें। लोग स्वयं ही अपने स्वभावों को कम करना चाहते हैं, परमेश्वर के अधिक निकट आने के लिए निरंतर अपनी आत्माओं में प्रार्थना करते रहते हैं, उनके मन में लगातार उधेड़-बुन चलती रहती है कि परमेश्वर क्या चाहता है, उनकी आँखें सतत किसी न किसी बात पर टिकी रहती हैं, इस भयानक डर में कि किसी कारण से परमेश्वर से उनका संबंध-विच्छेद हो जाएगा। ये तमाम निष्कर्ष लोगों ने अपने आप ही निकाल लिए हैं; लोगों ने स्वयं ही ये नियम अपने लिए तय कर लिए हैं। अगर तुम खुद ही अपनी प्रकृति और सार के बारे में नहीं जानते और इस बात को नहीं समझते कि तुम्हारे अभ्यास का स्तर कहाँ तक पहुँच सकता है, तो तुम्हारे पास इस बात के लिए निश्चित होने का कोई रास्ता नहीं होगा कि परमेश्वर को इंसान से किन मानकों की अपेक्षा है और न ही तुम्हारे पास अभ्यास का कोई सटीक मार्ग होगा। चूँकि तुम्हें इस बात की समझ ही नहीं है कि वास्तव में परमेश्वर को इंसान से क्या अपेक्षा है, तो तुम्हारा मन हमेशा मंथन करता रहता है, तुम परमेश्वर के इरादों का विश्लेषण करने में अपना दिमाग खपाते रहते हो और अनाड़ीपन से पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित और प्रबुद्ध किए जाने की राह ढूँढते हो। नतीजतन, तुम अभ्यास के कुछ ऐसे मार्ग विकसित कर लेते हो जिन्हें तुम उपयुक्त मानते हो। तुम्हें इस बात का पता ही नहीं कि परमेश्वर को इंसान से वास्तव में क्या अपेक्षाएँ हैं; तुम प्रसन्नतापूर्वक बस अपने तय किए हुए अभ्यासों को ही करते रहते हो, परिणाम की परवाह नहीं करते और इस बात की तो बिल्कुल भी चिंता नहीं करते कि तुम्हारे अभ्यास में कोई भटकाव या त्रुटियाँ तो नहीं हैं। इस तरह, तुम्हारे अभ्यास में स्वाभाविक तौर पर सटीकता की कमी होती है और वह सिद्धांतहीन होता है। विशेष रूप से उसमें उचित मानवीय विवेक और अंतरात्मा का अभाव होता है, साथ ही उसमें परमेश्वर की सराहना और पवित्र आत्मा की परिपुष्टि की कमी होती है। अपने ही बनाए रास्ते पर चलने में बहुत ज़्यादा आसानी होती है। इस तरह का अभ्यास महज़ नियमों का अनुसरण करना है या स्वयं को प्रतिबंधित और नियंत्रित करने के लिए जानबूझकर अधिक भार उठाना है। फिर भी तुम्हें लगता है कि तुम्हारा अभ्यास एकदम सही और सटीक है, इस बात से अनजान कि तुम्हारे अभ्यास का अधिकतर हिस्सा अनावश्यक प्रक्रियाओं और अनुपालनों से बना है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो मूलत: अपने स्वभावों में बिना कोई बदलाव लाए, बिना किसी नयी समझ के, बिना नए प्रवेश के, बरसों तक इसी तरह से अभ्यास करते हैं। वे अनजाने में वही गलती बार-बार करके अपनी पाशविक प्रकृतियों को खुली छूट देते हैं, ऐसा इस हद तक करते हैं जहाँ बहुत बार वे अविवेकी, अमानवीय कृत्य कर बैठते हैं और इस प्रकार व्यवहार करते हैं कि लोग अपना सिर खुजलाते और हक्के-बक्के रह जाते हैं। क्या ऐसे लोगों के बारे कहा जा सकता है कि उन्होंने स्वभावगत बदलाव का अनुभव कर लिया है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (1)' से उद्धृत

प्रवेश करने की कोशिश करते समय, हर मामले की जाँच होनी चाहिए। सभी मामलों पर परमेश्वर के वचन और सत्य के अनुसार पूरी तरह से चिंतन किया जाना चाहिए ताकि तुम यह जान सको कि कैसे उन्हें इस तरह से करना है कि वो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो। अपनी इच्छा से उत्पन्न होने वाली चीज़ें फिर त्यागी जा सकती हैं। तुम जानोगे कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चीज़ों को कैसे करें, और फिर तुम जाकर उन्हें करोगे; ऐसा लगेगा कि जैसे हर चीज़ अपना स्वाभाविक रूप ले रही है, और यह अत्यंत आसान प्रतीत होगा। सत्य से युक्त लोग चीज़ों को ऐसे करते हैं। तब तुम वास्तव में दूसरों को दिखा सकोगे कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है, और वे देखेंगे कि तुमने वाकई कुछ अच्छे काम किए हैं, तुम सिद्धांतों के अनुसार काम करते हो, और तुम हर काम सही ढंग से करते हो। ऐसा व्यक्ति वो होता है जो सत्य को समझता है और जिसके पास वास्तव में कुछ मानवीय सदृशता है। निश्चित रूप से, परमेश्वर के वचन ने लोगों में परिणाम हासिल किये हैं। एक बार जब लोग सत्य को सचमुच में समझ लेते हैं, तो वे अपने अस्तित्व की अवस्थाओं को समझ सकते हैं, जटिल मामलों की तह तक जा सकते हैं और अभ्यास करने का उचित तरीका जान सकते हैं। अगर तुम सत्य को नहीं समझते, तो तुम अपने अस्तित्व की अवस्था को नहीं समझ पाओगे। तुम खुद के खिलाफ विद्रोह करना चाहोगे, लेकिन तुम्हें यह मालूम नहीं होगा कि विद्रोह कैसे करें और तुम किसके खिलाफ विद्रोह कर रहे हो। तुम अपने हठ को त्यागना चाहोगे, लेकिन अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारा हठ सत्य के अनुरूप है, तो फिर तुम उसे कैसे त्याग सकते हो? तुम्हें शायद यह भी लगे कि इसे पवित्र आत्मा ने प्रबुद्ध किया है, और इसलिए चाहे जो भी हो, तुम उसे त्यागने से इनकार कर दोगे। इस प्रकार, जब लोग सत्य को धारण नहीं करते, तो उनका यह सोचना काफी मुमकिन है कि जो कुछ उनकी मनमानी, उनकी मानवीय अशुद्धियों, नेक इरादों, उनके इंसानी उलझन-भरे प्रेम, और मानवीय अभ्यास से उपजता है, वो सही है, और सत्य के अनुरूप है। तो फिर तुम इन चीज़ों के खिलाफ विद्रोह कैसे कर सकते हो? अगर तुम सत्य को नहीं समझते या नहीं जानते कि सत्य पर अमल करने का अर्थ क्या होता है, अगर तुम्हारी आँखेँ धुँधलाई हुई हैं और तुम्हें नहीं मालूम कि किस तरफ मुड़ना है, इसलिए तुम उसी आधार पर काम करते हो जो तुम्हें सही लगता है, तो तुम कुछ ऐसे कार्य करोगे, जो सही दिशा में नहीं होंगे और ग़लत होंगे। इनमें से कुछ कार्य नियमों के अनुरूप होंगे, कुछ उत्साह से उपजे हुए होंगे, कुछ शैतान से निकले हुए होंगे और वे गड़बड़ी पैदा करेंगे। जो लोग सत्य धारण नहीं करते, वे इस तरह से कार्य करते हैं : थोड़ा बायीं ओर, फिर थोड़ा दायीं तरफ; एक पल सही, दूसरे पल भटके हुए; बिल्कुल भी कोई सत्यता नहीं। जो लोग सत्य धारण नहीं करते, वे सभी चीज़ों में एक बेतुका नज़रिया अपनाते हैं। ऐसे में, वे मामलों को सही ढंग से कैसे संभाल सकते हैं? वे किसी समस्या को कैसे सुलझा सकते हैं? सत्य को समझना कोई आसान काम नहीं है। परमेश्वर के वचन समझने योग्य होना सत्य की समझ पर निर्भर है, और लोग जो सत्य समझ सकते हैं उसकी सीमा होती है। लोग अपनी पूरी ज़िंदगी परमेश्वर में विश्वास रखेँ, तब भी परमेश्वर के वचनों की उनकी समझ सीमित ही होगी। जो लोग अपेक्षाकृत थोड़े अनुभवी हैं वे भी ज़्यादा-से-ज़्यादा उस स्थिति तक पहुँच सकते हैं जहां वे ऐसे काम बंद कर सकें जिनसे स्पष्ट रूप से परमेश्वर का प्रतिरोध होता है, ऐसे काम बंद कर सकें जो स्पष्ट रूप से बुरे हों और जो किसी भी व्यक्ति को लाभ नहीं पहुंचाते। उनके लिए उस अवस्था में पहुँचना मुमकिन नहीं है, जहां उनके हठ का कोई अंश शामिल न हो। ऐसा इसलिए क्योंकि लोग सामान्य बातें सोचते हैं, और उनकी थोड़ी सोच परमेश्वर के वचनों के अनुरूप होती है, और समझ-बूझ के एक ऐसे पहलू से संबंधित होती है जिसे हठ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। फिर भी, मुख्य बात हठ के उन अंशों को समझना है जो परमेश्वर के वचनों के विरुद्ध हैं, सत्य के विरुद्ध हैं, और पवित्र आत्मा के प्रबोधन के विरुद्ध हैं। इसलिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जानने का प्रयास करना चाहिए, सत्य को समझ कर ही तुम विवेक पा सकते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

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