84. अच्छे कर्मों की तैयारी के सिद्धांत

(1) उन सभी कर्तव्यों का जो तुम्हें निभाने चाहिए, अच्छी तरह और निष्ठा से निष्पादन करो। ज़िम्मेदारी लेने में ईमानदार रहो, हमेशा बेहतर बनने का प्रयास करो, असावधान या लापरवाह न बनो, और एक स्पष्ट जमीर रखो;

(2) अपना कर्तव्य निभाते समय जब भी कोई समस्या आए तो सत्य की तलाश करो। सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने के लिए तत्पर रहो, और एक बार और हमेशा के लिए उसके प्रति निष्ठावान बने रहो जो परमेश्वर ने तुम्हें सौंपा है;

(3) सत्य के सिद्धांत का पालन करो, अपने भाइयों और बहनों से प्रेम करो, उन गड़बड़ियों को उजागर करने और प्रतिबंधित करने में सक्षम रहो जो दुष्ट और मसीह-विरोधी लोग कलीसिया में भड़काते हैं, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों की रक्षा करो;

(4) व्यक्ति को अपने सम्पूर्ण शक्ति के साथ कलीसिया के कार्य की सुरक्षा करनी चाहिए, परमेश्वर के घर के सभी कार्यों को पूरा करने के लिए कोई प्रयास बाक़ी नहीं रखना चाहिए और जोखिमों को उठाने की हिम्मत के साथ, अंत तक वफ़ादार बने रहना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

अब वह समय आ गया है जब मैं प्रत्येक व्यक्ति के अंत को निर्धारित करता हूँ, यह वो चरण नहीं जिसमें मैंने मनुष्यों को आकार देना आरंभ किया था। मैं अपनी अभिलेख पुस्तक में एक-एक करके, प्रत्येक व्यक्ति के कार्यों और कथनों को, और साथ ही उस मार्ग को जिस पर चलकर उन्होंने मेरा अनुसरण किया है, उनके अंतर्निहित अभिलक्षणों को और उन लोगों ने कैसा आचरण किया है, इन सबको लिखता हूँ। इस तरह, किसी भी प्रकार का मनुष्य मेरे हाथ से नहीं बचेगा, और सभी लोग अपने जैसे लोगों के साथ होंगे, जैसा कि मैं उन्हें नियत करूँगा। मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंज़िल, उसकी आयु, वरिष्ठता, पीड़ा की मात्रा के आधार पर तय नहीं करता और जिस सीमा तक वे दया के पात्र होते हैं, उसके आधार पर तो बिल्कल भी तय नहीं करता बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि उनके पास सत्य है या नहीं। इसके अतिरक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम्हें यह अवश्य समझना चाहिए कि वे सब जो परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते हैं, दण्डित किए जाएँगे। यह एक अडिग तथ्य है। इसलिए, वे सब जो दण्ड पाते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता के कारण और अपने अनगिनत बुरे कार्यों के प्रतिफल के रूप में इस तरह के दण्ड पाते हैं। मैंने अपनी योजना के आरंभ से उसमें एक भी परिवर्तन नहीं किया है। बात केवल इतनी ही है कि जहाँ तक मनुष्य का संबंध है, ऐसा प्रतीत होता है कि जिनकी ओर मैं अपने वचनों को निर्देशित करता हूँ उनकी संख्या उसी तरह से घटती जा रही है जैसे कि उनकी संख्या घट रही है जिन्हें मैं सही मायनों में स्वीकार करता हूँ। लेकिन, मैं अभी भी यही कहता हूँ कि मेरी योजना में कभी बदलाव नहीं आया है; बल्कि, यह मनुष्य के विश्वास और प्रेम हैं जो हमेशा बदलते रहते हैं, सदैव कम होते हैं, इस हद तक कि प्रत्येक मनुष्य के लिए संभव है कि वह मेरी चापलूसी करने से लेकर मेरे प्रति उदासीन हो जाये या मुझे निकालकर बाहर कर दे। जब तक मैं चिढ़ न जाऊं या घृणा महसूस न करने लगूँ, और अंत में दण्ड न देने लगूँ, तब तक तुम लोगों के प्रति मेरी प्रवृत्ति न तो उत्साहपूर्ण होगी और न ही उत्साहहीन। हालाँकि, तुम लोगों के दंड के दिन भी मैं तुम लोगों को देखूँगा, परंतु तुम लोग अब से मुझे देखने में समर्थ नहीं होगे। चूँकि तुम लोगों के बीच जीवन पहले से ही थकाऊ और सुस्त हो गया है, इसलिए कहने की आवश्यकता नहीं कि मैंने रहने के लिये एक अलग परिवेश चुन लिया है ताकि बेहतर रहे कि तुम लोगों के अभद्र शब्दों की चोट से बचूँ और तुम लोगों के असहनीय रूप से गंदे व्यवहार से दूर रहूँ, ताकि तुम लोग मुझे अब और मूर्ख न बना सको या मेरे साथ लापरवाह ढंग से व्यवहार न कर सको। इसके पहले कि मैं तुम लोगों को छोड़कर जाऊँ, मुझे तुम लोगों को ऐसे कर्मों को करने से बचने के लिए आग्रह अवश्य करना चाहिए जो सत्य के अनुरूप नहीं हैं। बल्कि, तुम लोगों को वह करना चाहिए जो सबके लिए सुखद हो, जो सभी मनुष्यों को लाभ पहुँचाता हो, और जो तुम लोगों की अपनी मंज़िल के लिए लाभदायक हो, अन्यथा, आपदा के बीच दुःख उठाने वाला इंसान, और कोई नहीं बल्कि तुम ही होगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

मेरी दया उन पर होती है जो मुझसे प्रेम करते हैं और स्वयं को नकारते हैं। दुष्टों को मिला दण्ड निश्चित रूप से मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण है, और उससे भी बढ़कर, मेरे क्रोध का प्रमाण है। जब आपदा आएगी, तो उन सभी पर अकाल और महामारी आ पड़ेगी जो मेरा विरोध करते हैं और वे विलाप करेंगे। जो लोग सभी तरह के दुष्टतापूर्ण कर्म कर चुके हैं, किन्तु कई वर्षों तक मेरा अनुसरण किया है, वे अपने पापों का फल भुगतने से नहीं बचेंगे; वे भी लाखों वर्षों में शायद ही देखी गयी आपदा में डुबा दिये जाएँगे, और वे लगातार आंतक और भय की स्थिति में जीते रहेंगे। और केवल मेरे ऐसे अनुयायी जिन्होंने मेरे प्रति निष्ठा दर्शायी है, मेरी शक्ति का आनंद लेंगे और गुणगान करेंगे। वे अवर्णनीय तृप्ति का अनुभव करेंगे और ऐसे आनंद में रहेंगे जो मैंने मानवजाति को पहले कभी प्रदान नहीं किया है। क्योंकि मैं मनुष्यों के अच्छे कर्मों को सँजोकर रखता हूँ और उनके बुरे कर्मों से घृणा करता हूँ। जबसे मैंने सबसे पहले मानवजाति की अगुवाई करनी आरंभ की, तबसे मैं उत्सुकतापूर्वक मनुष्यों के ऐसे समूह को पाने की आशा करता रहा हूँ जो मेरे साथ एक मन वाले हों। इस बीच मैं उन लोगों को कभी नहीं भूलता हूँ जो मेरे साथ एक मन वाले नहीं हैं; अपने हृदय में मैं हमेशा उनसे घृणा करता हूँ, उन्हें प्रतिफल देने के अवसर की प्रतीक्षा करता हूँ, जिसे देखना मुझे आनंद देगा। अंततः आज मेरा दिन आ गया है, और मुझे अब और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

तुम लोगों में से प्रत्येक को अपना कर्तव्य अपनी पूरी क्षमता से, खुले और ईमानदार दिलों के साथ पूरा करना चाहिए, और जो भी कीमत ज़रूरी हो, उसे चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए। जैसा कि तुम लोगों ने कहा है, जब दिन आएगा, तो परमेश्वर ऐसे किसी भी व्यक्ति के प्रति लापरवाह नहीं रहेगा, जिसने उसके लिए कष्ट उठाए होंगे या कीमत चुकाई होगी। इस प्रकार का दृढ़ विश्वास बनाए रखने लायक है, और यह सही है कि तुम लोगों को इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। केवल इसी तरह से मैं तुम लोगों के बारे में निश्चिंत हो सकता हूँ। वरना तुम लोगों के बारे में मैं कभी निश्चिंत नहीं हो पाऊँगा, और तुम हमेशा मेरी घृणा के पात्र रहोगे। अगर तुम सभी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन सको और अपना सर्वस्व मुझे अर्पित कर सको, मेरे कार्य के लिए कोई कोर-कसर न छोड़ो, और मेरे सुसमाचार के कार्य के लिए अपनी जीवन भर की ऊर्जा अर्पित कर सको, तो क्या फिर मेरा हृदय तुम्हारे लिए अक्सरहर्ष से नहीं उछलेगा? इस तरह से मैं तुम लोगों के बारे में पूरी तरह से निश्चिंत हो सकूँगा, या नहीं? यह शर्म की बात है कि तुम लोग जो कर सकते हो, वह मेरी अपेक्षाओं का दयनीय रूप से एक बहुत छोटा-सा भाग है। ऐसे में, तुम लोग मुझसे वे चीज़ें पाने की धृष्टता कैसे कर सकते हो, जिनकी तुम आशा करते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'गंतव्य के बारे में' से उद्धृत

वह मानक क्या है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति के कर्मों का न्याय अच्छे या बुरे के रूप में किया जाता है? यह इस बात पर निर्भर करता है कि अपने विचारों, अभिव्यक्तियों और कार्यों में तुममें सत्य को व्यवहार में लाने और सत्य-वास्तविकता को जीने की गवाही है या नहीं। यदि तुम्हारे पास यह वास्तविकता नहीं है या तुम इसे नहीं जीते, तो इसमें कोई शक नहीं कि तुम कुकर्मी हो। परमेश्वर कुकर्मियों को किस नज़र से देखता है? तुम्हारे विचार और बाहरी कर्म परमेश्वर की गवाही नहीं देते, न ही वे शैतान को शर्मिंदा करते या उसे हरा पाते हैं; बल्कि वे परमेश्वर को शर्मिंदा करते हैं और ऐसे निशानों से भरे पड़े हैं जिनसे परमेश्वर शर्मिंदा होता है। तुम परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे रहे, न ही तुम परमेश्वर के लिये अपने आपको खपा रहे हो, तुम परमेश्वर के प्रति अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को भी पूरा नहीं कर रहे; बल्कि तुम अपने फ़ायदे के लिये काम कर रहे हो। "अपने फ़ायदे के लिए" से क्या अभिप्राय है? शैतान के लिये काम करना। इसलिये, अंत में परमेश्वर यही कहेगा, "हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।" परमेश्वर की नज़र में तुमने अच्छे कर्म नहीं किये हैं, बल्कि तुम्हारा व्यवहार दुष्टों वाला हो गया है। तुम्हें पुरस्कार नहीं दिया जाएगा और परमेश्वर तुम्हें याद नहीं रखेगा। क्या यह पूरी तरह से व्यर्थ नहीं है? अपने कर्तव्य को निभाने वालो, चाहे तुम सत्य को कितनी भी गहराई से क्यों न समझो, यदि तुम सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना चाहते हो, तो अभ्यास का सबसे सरल तरीका यह है कि तुम जो भी काम करो, उसमें परमेश्वर के घर के हित के बारे में सोचो, अपनी स्वार्थी इच्छाओं, व्यक्तिगत अभिलाषाओं, इरादों, सम्मान और हैसियत को त्याग दो। परमेश्वर के घर के हितों को सबसे आगे रखो—तुम्हें कम से कम यह तो करना ही चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकतर लोग उसके लिए स्वयं को सहर्ष खपाते और समर्पित करते हैं। किंतु सच्ची वास्तविकता केवल उन्हीं लोगों में होती है, जो वास्तविक भक्ति और बलिदान करने में सक्षम हैं। अधिकतर लोग खुशी से सत्य का अनुसरण करते हैं, किंतु अपेक्षाकृत कम लोग ही उसे व्यवहार में लाने या उसे हासिल करने के लिए कीमत चुकाने में सक्षम होते हैं। जब निर्णायक क्षण आता है और तुमसे बलिदान और त्याग करने के लिए कहा जाता है, तो तुम सहन नहीं कर सकते; यह अस्वीकार्य है और दिखाता है कि तुम परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं हो। कोई पल जितना अधिक संकटकालीन हो, यदि उसी के अनुसार लोग समर्पण करने में सक्षम हों और अपने स्वार्थ, मिथ्याभिमान और दंभ को त्याग सकें, तथा अपने कर्तव्यों को उचित रूप से पूरा कर सकें, केवल तभी वे परमेश्वर द्वारा याद किए जाएँगे। वे सभी अच्छे कर्म हैं! चाहे लोग जो भी करें, अधिक महत्वपूर्ण क्या है—उनका मिथ्याभिमान और दंभ, या परमेश्वर की महिमा? (परमेश्वर की महिमा)। क्या अधिक महत्वपूर्ण हैं—तुम्हारे दायित्व, या तुम्हारे स्वार्थ? तुम्हारे दायित्वों को पूरा करना अधिक महत्वपूर्ण है, और तुम उनके प्रति कर्तव्यबद्ध हो। यह कोई नारा नहीं है; यदि तुम जो सोचते हो वह गहरा है और तुम उस तरह से अभ्यास करने का प्रयास करते हो, तो क्या तुमने थोड़ी वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर लिया होगा? कम से कम, इसका यह मतलब है कि तुममें वास्तविकता का वह पहलू है। कुछ चीजों से सामना होने पर तुम्हारी अपनी क्षणभंगुर व्यक्तिपरक इच्छाएँ और तुम्हारा घमंड और अभिमान तुम्हारे रास्ते में खड़े होकर रोकेंगे और तुम पहली प्राथमिकता अपने कर्तव्य को दोगे, परमेश्वर की इच्छा को, उसके लिए गवाही देने को, और तुम्हारे अपने दायित्वों को दोगे। गवाही देने का यह एक शानदार तरीक़ा है, और यह शैतान को शर्मिंदा करता है! यह सब देखने के बाद शैतान क्या सोचता है? यदि तुम सच में परमेश्वर की गवाही देने के लिए वास्तविक क्रियाओं का उपयोग करते हुए सचमुच ऐसा करते हो और शैतान की तरफ पीठ कर लेते हो और तुम केवल नारे लगाने से ज्यादा कुछ कर रहे हो, तो शैतान को शर्मिंदा करने और परमेश्वर की गवाही देने का इससे बेहतर कोई तरीका नहीं है। परमेश्‍वर के लिए गवाही देने और शैतान को त्यागने और ठुकराने का अपना दृढ़ संकल्प उसे दिखाने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करना कितना अद्भुत है!

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्‍वर और सत्‍य को प्राप्‍त करना सबसे बड़ा सुख है' से उद्धृत

कभी-कभी, किसी काम को खत्म करने के बाद, तुम अपने दिल में कुछ असहज महसूस करते हो। करीब से निरीक्षण करने पर, तुम पाते हो कि वास्तव में कोई समस्या है। इसे हल करना होगा, जिसके बाद तुम चैन महसूस करोगे। तुम्हारी बेचैनी साबित करती है कि कोई समस्या है जिस पर तुम्हें अतिरिक्त समय देने की ज़रूरत है और जिस पर तुम्हें अधिक ध्यान देना चाहिए। यह अपने कर्तव्य निभाने के प्रति एक गंभीर, ज़िम्मेदार रवैया है। जब कोई व्यक्ति गंभीर, जिम्मेदार, समर्पित, और कड़ी मेहनत करने वाला होता है, तो काम सही तरीके से पूरा किया जाएगा। कभी-कभी तुम्हारा मन ऐसा नहीं होता और तुम साफ-साफ नज़र आने वाली गलती को भी ढूँढ या पकड़ नहीं पाते। अगर किसी का ऐसा मन हो तो पवित्र आत्मा की प्रेरणा और मार्गदर्शन से वह समस्या को पहचानने में सक्षम हो जाएगा। किंतु अगर पवित्र आत्मा तुम्हारा मार्गदर्शन करे और तुम्हें ऐसी जागरूकता दे, तुम्हें यह बोध कराए कि कुछ गलत है, पर फिर भी तुम्हारा मन ऐसा न हो, तो भी तुम समस्या को पहचान नहीं हो पाओगे। तो इससे क्या पता चलता है? लोगों का सहयोग बहुत ही महत्वपूर्ण है, उनके दिल बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, और वे अपने सोच और विचार को किस दिशा में ले जाते हैं, वह भी बहुत महत्वपूर्ण है। जहां तक लोगों के इरादों और कर्तव्यों के निर्वहन में उनके द्वारा किये जाने वाले प्रयासों की बात है, परमेश्वर इसकी जाँच करता है और इसे देख सकता है। यह महत्वपूर्ण है कि अपने कार्य करते समय लोग उसमें अपने पूरे दिल और पूरी शक्ति का प्रयोग करें। उनका सहयोग भी काफी महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति ने जिन कर्तव्यों को पूरा किया है उस पर और अपने पिछले कार्यों पर कोई पछतावा न हो, इसके लिए प्रयास करना और उस स्थिति तक पहुंचना, जहां उस पर परमेश्वर का कोई ऋण बाकी न रहे—अपना पूरा दिल और अपनी पूरी शक्ति लगाने का यही अर्थ है। अगर आज तुम अपना पूरा दिल और पूरी शक्ति नहीं लगाते हो, तो बाद में, जब कुछ गलत हो जाएगा, और उसके परिणाम सामने आएंगे, तो क्या तब पछतावा करने के लिए बहुत देर नहीं हो जाएगी? तुम हमेशा के लिए ऋणी बन जाओगे, और यह तुम्हारे ऊपर एक धब्बा बन जाएगा! धब्बा लगने का मतलब है अपने कर्तव्य पूरे करते समय लोगों द्वारा किया गया उल्लंघन। अपने कर्तव्य पूरे करते समय जो किया जाना चाहिये और जो करना ज़रूरी हो, उसके प्रति अपना पूरा दिल और पूरी शक्ति लगाने की कोशिश करो। अगर तुम बस लापरवाही से उन कार्यों को नहीं करते हो, और अगर तुम्हें कोई पछतावा नहीं है, तो इस समय के दौरान किये गये तुम्हारे कार्यों को याद रखा जाएगा। जिन कार्यों को याद रखा जाता है वे परमेश्वर के सामने अच्छे कर्म होते हैं। और कौन से कार्य हैं जिन्हें याद नहीं रखा जाता है? (उल्लंघन और बुरे कर्म।) उल्लंघनों को याद नहीं रखा जाता। ऐसा हो सकता है कि इस समय उन कार्यों का जिक्र करने पर लोग यह स्वीकार न करें कि वे बुरे कर्म हैं, लेकिन अगर ऐसा दिन आता है जब इस बात के गंभीर परिणाम सामने आते हैं, जब इसका नकारात्मक असर पड़ता है, तो उस समय तुम्हें यह महसूस होगा कि यह सिर्फ व्यवहार संबंधी उल्लंघन नहीं था, बल्कि यह एक बुरा कर्म था। जब तुम्हें इसका एहसास होगा, तुम अपने मन में विचार करोगे, "अगर मुझे पहले इसका एहसास हो गया होता, तो ऐसा नहीं हुआ होता! अगर मैंने इस पर थोड़ा और विचार कर लिया होता, अगर मैंने थोड़ा और प्रयास कर लिया होता, तो ऐसा नहीं होता।" कोई भी चीज़ तुम्हारे हृदय पर हमेशा के लिए लगे इस धब्बे को मिटा नहीं सकेगी। अगर यह एक अनंत ऋण बन जाता है, तो तुम परेशानी में पड़ जाओगे। इसलिए, आज, हर बार जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो, या किसी आज्ञा को स्वीकार करते हो, तो तुम सभी को इसे अपनी पूरी ताक़त और पूरे दिल से करने का प्रयास करना चाहिए। तुम लोगों को इसे इस तरह से करना चाहिए कि तुम अपराध-बोध और पछतावे से मुक्त रहो, ताकि इसे परमेश्वर द्वारा याद किया जाए, और यह एक अच्छा काम हो। असावधानी और लापरवाही से, एक आँख खुली और दूसरी बंद रखकर, काम न करो; तुम पछताओगे, और इसे सुधार नहीं पाओगे। यह अपराध होगा, और अंततः, तुम्हारे दिल में हमेशा अपराधबोध, ऋणग्रस्तता और आरोप बने रहेंगे। इन दोनों रास्तों में से कौन-सा सबसे अच्छा है? कौन-सा रास्ता सही मार्ग है? बिना किसी पछतावे के, अपने पूरे दिल और ताक़त के साथ अपना कर्तव्य निभाना और अच्छे कामों को तैयार और संचित करना। अपने अपराधों को जमा न होने दो, जिससे तुम्हें पछतावा करना और ऋणी होना पड़े। क्या होता है जब एक व्यक्ति ने बहुत सारे अपराध किए हों? वह परमेश्वर के सामने ही अपने प्रति उसके क्रोध को जगा रहा है! यदि तुम और भी अपराध करते जाते हो, और तुम्हारे प्रति परमेश्वर का क्रोध और भी बढ़ता है, तो, अंततः, तुम्हें दंडित किया जाएगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना कर्तव्‍य करते हुए गैरज़िम्‍मेदार और असावधान होने की समस्‍या का समाधान कैसे करें' से उद्धृत

भविष्य में, जो लोग विश्राम की अवस्था में जीवित बचेंगे, उन सभी ने क्लेश के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये वे सब लोग होंगे, जिन्होंने अपने कर्तव्य पूरे किए हैं और जिन्होंने जानबूझकर परमेश्वर को समर्पण किया है। जो केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने की इच्छा के साथ सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं, उन्हें रहने नहीं दिया जाएगा। परमेश्वर के पास प्रत्येक व्यक्ति के परिणामों के प्रबंधन के लिए उचित मानक हैं; वह केवल यूँ ही किसी के शब्दों या आचरण के अनुसार ये निर्णय नहीं लेता, न ही वह एक अवधि के दौरान किसी के व्यवहार के अनुसार निर्णय लेता है। अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गई किसी सेवा की वजह से वह किसी के दुष्ट व्यवहार के प्रति नर्मी कतई नहीं करेगा, न ही वह परमेश्वर के लिए एक बार स्वयं को खपाने के कारण किसी को मृत्यु से बचाएगा। कोई भी अपनी दुष्टता के लिए प्रतिफल से नहीं बच सकता, न ही कोई अपने दुष्ट आचरण को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि लोग वास्तव में अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे अनंतकाल तक परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हैं और उन्हें इसकी परवाह नहीं होती कि उन्हें आशीष मिलते हैं या वे दुर्भाग्य से पीड़ित होते हैं, वे पुरस्कार की तलाश नहीं करते। यदि लोग तब परमेश्वर के लिए वफ़ादार हैं, जब उन्हें आशीष दिखते हैं और जब उन्हें आशीष नहीं दिखाई देते, तो अपनी वफ़ादारी खो देते हैं और अगर अंत में भी वे परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ रहते हैं या उन कर्तव्यों को करने में असमर्थ रहते हैं जिसके लिए वे ज़िम्मेदार हैं, तो पहले वफ़ादारी से की गई परमेश्वर की सेवा के बावजूद वे विनाश की वस्तु बनेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

मेरा अंतिम कार्य न केवल मनुष्यों को दण्ड देने के लिए है बल्कि मनुष्य की मंज़िल की व्यवस्था करने के लिए भी है। इससे भी अधिक, यह इसलिए है कि सभी लोग मेरे कर्मों और कार्यों को अभिस्वीकार करें। मैं चाहता हूँ कि हर एक मनुष्य देखे कि जो कुछ मैंने किया है, वह सही है, और जो कुछ मैंने किया है वह मेरे स्वभाव की अभिव्यक्ति है। यह मनुष्य का कार्य नहीं है, और उसकी प्रकृति तो बिल्कुल भी नहीं है, जिसने मानवजाति की रचना की है, यह तो मैं हूँ जो सृष्टि में हर जीव का पोषण करता है। मेरे अस्तित्व के बिना, मानवजाति केवल नष्ट होगी और विपत्तियों के दंड को भोगेगी। कोई भी मानव सुन्दर सूर्य और चंद्रमा या हरे-भरे संसार को फिर कभी नहीं देखेगा; मानवजाति केवल शीत रात्रि और मृत्यु की छाया की निर्मम घाटी को देखेगी। मैं ही मनुष्यजाति का एकमात्र उद्धार हूँ। मैं ही मनुष्यजाति की एकमात्र आशा हूँ और, इससे भी बढ़कर, मैं ही वह हूँ जिस पर संपूर्ण मानवजाति का अस्तित्व निर्भर करता है। मेरे बिना, मानवजाति तुरंत रुक जाएगी। मेरे बिना मानवजाति तबाही झेलेगी और सभी प्रकार के भूतों द्वारा कुचली जाएगी, इसके बावजूद कोई भी मुझ पर ध्यान नहीं देता है। मैंने वह काम किया है जो किसी दूसरे के द्वारा नहीं किया जा सकता है, मेरी एकमात्र आशा है कि मनुष्य कुछ अच्छे कर्मों के साथ मेरा कर्ज़ा चुका सके। यद्यपि कुछ ही लोग मेरा कर्ज़ा चुका पाये हैं, तब भी मैं मनुष्यों के संसार में अपनी यात्रा पूर्ण करूँगा और विकास के अपने कार्य के अगले चरण को आरंभ करूंगा, क्योंकि इन अनेक वर्षों में मनुष्यों के बीच मेरे आने और जाने की सारी भागदौड़ फलदायक रही है, और मैं अति प्रसन्न हूँ। मैं जिस चीज़ की परवाह करता हूँ वह मनुष्यों की संख्या नहीं, बल्कि उनके अच्छे कर्म हैं। किसी भी स्थिति में, मुझे आशा है कि तुम लोग अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्म तैयार करोगे। तब मुझे संतुष्टि होगी; अन्यथा तुम लोगों में से कोई भी उस आपदा से नहीं बचेगा जो तुम लोगों पर पड़ेगी। आपदा मेरे द्वारा उत्पन्न की जाती है और निश्चित रूप से मेरे द्वारा ही आयोजित की जाती है। यदि तुम लोग मेरी नज़रों में अच्छे इंसान के रूप में नहीं दिखाई दे सकते हो, तो तुम लोग आपदा भुगतने से नहीं बच सकते। गहरी पीड़ा के बीच में, तुम लोगों के कार्य और कर्म पूरी तरह से उचित नहीं माने गए थे, क्योंकि तुम लोगों का विश्वास और प्रेम खोखला था, और तुम लोगों ने स्वयं को केवल डरपोक या कठोर दिखाया। इस सन्दर्भ में, मैं केवल भले या बुरे का ही न्याय करूँगा। मेरी चिंता तुम लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति के कार्य करने और अपने आप को व्यक्त करने के तरीके को लेकर बनी रहती है, जिसके आधार पर मैं तुम लोगों का अंत निर्धारित करूँगा। हालाँकि, मुझे यह स्पष्ट अवश्य कर देना चाहिए कि मैं उन लोगों पर अब और दया नहीं करूँगा जिन्होंने गहरी पीड़ा के दिनों में मेरे प्रति रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दिखाई है, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी ही दूर तक है। इसके अतिरिक्त, मुझे ऐसा कोई इंसान पसंद नहीं है जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो, ऐसे लोगों के साथ जुड़ना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है जो अपने मित्रों के हितों को बेच देते हैं। चाहे व्यक्ति जो भी हो, मेरा स्वभाव यही है। मुझे तुम लोगों को अवश्य बता देना चाहिए कि जो कोई भी मेरा दिल तोड़ता है, उसे दूसरी बार मुझसे क्षमा प्राप्त नहीं होगी, और जो कोई भी मेरे प्रति निष्ठावान रहा है वह सदैव मेरे हृदय में बना रहेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

बीस अच्छे कर्म जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को अवश्य तैयार करने चाहिए

1. कलीसिया के जीवन में परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए समस्याओं को हल करने के लिए सत्य का अक्सर संवाद करो, लगातार उन लोगों का समर्थन करो जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें सत्य को समझने और वास्तविकता में प्रवेश करने में सहायता करो। यह एक अच्छा कर्म है। असली प्रेम यही है।

2. अगर, अपने कर्तव्य करने में, तुम इसे लेन-देन पर आधारित नहीं करते या इसे पुरस्कार के लिए नहीं करते, तुम्हारी कोई दूसरी मंशा नहीं होती है और तुम सिर्फ़ ऊपर-ऊपर से काम नहीं करते हो, और व्यावहारिक परिणाम हासिल होते हैं, तो यह एक अच्छा कर्म है। जो लोग इस तरह अपना कर्तव्य करते हैं वे ही वास्तव में परमेश्वर के लिए खुद को खपा रहे हैं।

3. यदि वे लोग जो गलती से कलीसिया से अलग या निष्कासित कर दिये गए हैं, अच्छे पाए जाते हैं, उन्हें मदद करने का प्रयास करो, और उनका समर्थन करो और उन्हें वापस कलीसिया में स्वीकार कर लो। यह एक अच्छा कर्म है। दूसरे स्थानों से कलीसिया की तलाश करने वाले भाइयों और बहनों को स्वीकार करना और उनके साथ परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना और मिलकर कलीसियाई जीवन जीना, एक अच्छा कर्महै।

4. परमेश्वर के चुने हुए सच्चे विश्वासी सत्य को समझ सकें, वास्तविकता में प्रवेश कर सकें और जीवन में तरक्की पा सकें, इसके लिये भोजन और नींद की परवाह किये बिना कड़ी मेहनत करना और श्रमसाध्य प्रयास करना—यह एक अच्छा कर्म है। यह वास्तविकता उन व्यक्तियों में होनी चाहिए जो परमेश्वर की सेवा करने में परमेश्वर के इरादों के प्रति सचमुच विचारशील हैं।

5. सुसमाचार फैलाने पर ध्यान दो, जब भी तुम्हें किसी उपयुक्त व्यक्ति से मिलने का मौका मिले, तो परमेश्वर के कार्य की गवाही दो। अधिक से अधिक लोगों को पाने के लिए सुसमाचार का यथासंभव प्रचार करो। यह एक अच्छा कर्म है। यदि तुम कुछ अच्छे लोगों को परमेश्वर के सामने ला सको जो सचमुच परमेश्वर में विश्वास करते हों और जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करने में सक्षम हों, तो यह एक और भी अच्छा कर्म है।

6. किसी दुष्ट व्यक्ति द्वारा कलीसिया में गड़बड़ी किये जाने का पता लगने पर उसे बुराई करने से रोकने और प्रतिबंधित करने के लिए हर तरह के विवेक का प्रयोग करो, अव्यवस्था सुधारने और कलीसियाई जीवन की सहजता को बनाए रखने के लिए सत्य और विवेक का उपयोग करो। यह एक अच्छा कर्म है।

7. चाहे कलीसिया में कोई भी समस्या उत्पन्न हो, परमेश्वर के पक्ष में खड़े होकर उसके कार्य की सुरक्षा करना, परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन-प्रवेश की रक्षा करना एक अच्छा कर्म है। यदि तुम सत्य का उपयोग करने में सक्षम हो ताकि समस्याएँ सुलझ सकें और परमेश्वर के चुने हुए लोग सत्य को समझ सकें और वे बुराई से भलाई को अलग कर सकें, तो यह और भी बहुत अच्छा कर्म है।

8. उन दुष्टों को कठोरता से उजागर करने और उनका खंडन करने में सक्षम होना जो पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग में लाये गए व्यक्ति की आलोचना करने, उस पर हमला और उसका विरोध करने की हिम्मत करते हैं, और परमेश्वर के कार्य को कायम रखना, एक अच्छा कर्म है। यदि कोई व्यक्ति सभी प्रकार के दुष्ट लोगों और मसीह-विरोधियों द्वारा पैदा की गई बाधाओं को दूर करने के लिए सत्य का उपयोग करता है, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को लाभ पहुंचाता है, तो यह एक अच्छा कर्म है।

9. कलीसिया में सभी तरह की भ्रांतियों और पाखंडों का पता लगने पर सत्य की तलाश करो और परमेश्वर के वचनों के अनुसार उनका खंडन और उनकी निंदा करो, ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोग नुकसान से बचे रहें और उन्हें जीवन में आत्मिक उन्नति और विकास पाने में मदद मिल सके। यह एक अच्छा कर्म है।

10. यदि यह पता चलता है कि जो लोग परमेश्वर पर सच्चा विश्वास करते हैं और सत्य का अनुसरण करने के इच्छुक हैं, उन्हें धोखा दिया गया है या नियंत्रित किया गया है, तो उन्हें बचाने के लिए हर संभव प्रयास करना, सत्य के बारे में धैर्यपूर्वक सहभागिता करना और उन्हें दुष्टों के हाथों से बाहर निकालना, ताकि वे वास्तव में परमेश्वर के पास लौट सकें और प्रकाश के लिए अंधेरे को त्याग सकें, यह एक अच्छा कर्म है।

11. यदि यह पाया जाता है कि वास्तव में कोई एक झूठा अगुवा या मसीह-विरोधी है जो दूसरों पर हुकूमत करता है और अपना एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, तो इसकी तुरंत इसकी रिपोर्ट की जाए और उन लोगों से संपर्क किया जाए जो सत्य को समझते हैं, ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोगों को दुष्ट शैतान के नुकसान से बचाया जा सके। यह बेशक एक अच्छा कर्म होगा।

12. प्रतिकूल परिस्थितियां उत्पन्न होने पर, यदि कोई परमेश्वर के चुने हुए लोगों की रक्षा करने के लिए हर संभव प्रयास कर सकता है, परमेश्वर के घर के धन और सामान के लिए उचित व्यवस्था कर सकता है और परमेश्वर के चढ़ावे को शैतान और बड़े लाल अजगर के हाथों में पड़ने से बचा सकता है, तो ऐसा करने वाला व्यक्ति परमेश्वर के कार्य की रक्षा करता है और परमेश्वर के प्रति वास्तव में वफ़ादार होता है।

13. जो वास्तव में परमेश्वर पर सच्चा विश्वास करते हैं उन लोगों को गिरफ्तारी से बचाना और जिन भाइयों और बहनों को गिरफ्तार कर लिया गया है उन्हें छुड़ाने के लिए सभी संपर्कों का उपयोग करना एक अच्छा कर्म है। कलीसियाई जीवन को बनाए रखने और परमेश्वर के चुने हुए लोगों की रक्षा करने के लिए विवेक का उपयोग करना और भी अच्छा कर्म है।

14. जो भाई और बहनें सचमुच खुद को परमेश्वर के लिए खपाते हैं और जब कठिनाइयाँ और परेशानियाँ उत्पन्न होती हैं तब भी सत्य का अनुसरण करते हैं, उन्हें मदद देने के लिए हर संभव प्रयास करना एक अच्छा कर्म है। उन अगुवाओं और सेवाकर्मियों की मदद करना जो स्वयं को परमेश्वर के लिए पूरे समय खपाते हैं और जिनके परिवार कठिनाई में हैं, एक अच्छा कर्म है।

15. यदि कोई व्यक्ति बिना खतरों से डरे या कीमत अदा करने से बेखौफ, उन भाइयों और बहनों को स्वीकार करता है और उनकी हर संभव मदद करने की कोशिश करता है जिनका पीछा किया जा रहा है और जो वांछितों की सूची में है, और इसके अलावा, यदि वह परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने कर्तव्य के निर्वाह के दौरान लोगों की आलोचना, घृणा और मुसीबतों को सहन कर सकता है तो यह एक अच्छा कर्म है।

16. उन भाइयों और बहनों को जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के लिए एकत्रित करना, सत्य के बारे में उनसे सहभागिता करना और परीक्षणों में कलीसियाई जीवन जीना-एक अच्छा कर्म है। सत्य को समझने में, परीक्षणों और आपदाओं के दौरान गवाह के रूप में खड़े होने में, कमज़ोर भाइयों और बहनों का समर्थन करना एक अच्छा कर्म है।

17. उन बुरे लोगों को बेनक़ाब करना और उनकी शिकायत करना जो चढ़ावे की चोरी करते हैं और परमेश्वर के घर की संपत्ति का गबन करते हैं, एक अच्छा कर्म है। इससे परमेश्वर के चढ़ावे और परमेश्वर के घर के धन की हानि को रोका जा सकता है। परमेश्वर के चढ़ावे को दुष्टों के हाथों में पड़ने से और कुत्सित इरादों वाले लोगों द्वारा गबन किये जाने से बचाना भी एक अच्छा कर्म है।

18. यदि पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए इंसान की कार्य-व्यवस्थाओं को अंजाम देने में सहयोग किया जाए और कलीसिया में परमेश्वर के चुने हुए लोगों की सभी प्रकार की व्यावहारिक समस्याओं को हल करने के लिए कड़ी मेहनत की जाए, तथा परमेश्वर के कार्य की रक्षा करने एवं परमेश्वर के चुने हुए लोगों को परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग पर लाने के लिए काफ़ी व्यावहारिक काम किया जाए, तो यह एक अच्छा कर्म है।

19. पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति के नेतृत्व और उसकी चरवाही में सक्रिय सहयोग करना, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को परमेश्वर पर विश्वास करने के सही मार्ग पर लाने के लिए झूठे अगुवाओं और मसीह-विरोधियों के साथ बिना किसी डर के संघर्ष शुरू करना, परमेश्वर के कार्य की रक्षा करने के लिए कीमत चुकाना और परिणाम प्राप्त करना—ये सब अच्छे कर्मों के रूप में वर्गीकृत किये जाते हैं।

20. कार्य की व्यवस्थाओं के अनुसार झूठे अगुवाओं और मसीह-विरोधियों को पहचानना और उन्हें अलग करना, उन्हें सत्य के अनुसार उजागर करना, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को अधिक नुकसान से बचाने की खातिर उन्हें इस्तीफा देने के लिए राजी करना एक अच्छा कर्म है। जिन लोगों ने भूल की है लेकिन वास्तविक पश्चाताप करने में सक्षम हैं और जिनमें अपने कर्तव्यों को जारी रखने की भली मानवता है, उन अगुवाओं की मदद और रक्षा करना एक अच्छा कर्म है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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