8. परमेश्वर से प्रार्थना करने और उसकी उपासना करने के सिद्धांत

(1) जब कोई व्यक्ति प्रार्थना के दौरान पवित्र आत्मा के प्रबोधन और प्रकाश को प्राप्त कर लेता है, तो उसे परमेश्वर का धन्यवाद और उसकी प्रशंसा करनी चाहिए। पवित्र आत्मा के कार्य का आनंद लेते हुए, उसे परमेश्वर के सामने दंडवत होकर उसकी उपासना करनी चाहिए;

(2) परमेश्वर के वचनों को अक्सर पढ़ो। जब कोई सत्य को समझता है और परमेश्वर के प्रेम और आशीर्वाद को देखता है, तो उसे इनके लिए धन्यवाद और प्रशंसा की पेशकश करनी चाहिए। यह परमेश्वर की सच्ची उपासना है;

(3) जब परीक्षण और क्लेश का सामना करते समय भी व्यक्ति शिकायत नहीं करता है, बल्कि अपनी गवाही में दृढ़ बना रहता है, तो यह परमेश्वर की सुरक्षा का परिणाम होता है, और उसे परमेश्वर को धन्यवाद देना और उसकी प्रशंसा करना, चाहिए;

(4) जब परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के दौरान, किसी को अपने भ्रष्ट सार का ज्ञान होता है और वह परमेश्वर की धार्मिकता और पवित्रता को देख पाता है, तब उसे परमेश्वर की उपासना करनी चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

प्रार्थना एक गहन महत्व की चीज़ हैं! यदि तुम प्रार्थना करने का तरीका जानते हो और अक्सर प्रार्थना करते हो तो ऐसी अक्सर की जाने वाली, परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी और विवेकसम्मत प्रार्थनाओं के साथ, तुम्हारी आंतरिक दशा ज़्यादातर सामान्य रहेगी। वहीं, दूसरी ओर यदि तुम्हारी प्रार्थना में प्रायः कुछ दोहे ही होते हैं और तुम स्वयं पर कोई बोझ नहीं लेते और इस पर विचार नहीं करते कि प्रार्थना में क्या कहना विवेकसम्मत होगा और क्या नहीं, न ही यह सोचते हो कि क्या कहना सम्मानजनक नहीं होगा और इन मामलों को कभी गंभीरता से नहीं लेते तो तुम्हें अपनी प्रार्थना में कभी सफलता नहीं मिलेगी और तुम्हारी आंतरिक दशा हमेशा असामान्य ही रहेगी। तुम सामान्य समझ, सच्चा समर्पण, सच्ची आराधना और वह परिप्रेक्ष्य जिससे प्रार्थना की जानी चाहिए, इसके सबक को कभी गहराई से नहीं सीख पाओगे और न ही इनमें गहरे प्रवेश कर पाओगे। ये सभी गूढ़ मसले हैं। क्योंकि अधिक्तर लोगों का मेरे साथ बहुत कम सम्पर्क होता है, वे मात्र पवित्र आत्मा की उपस्थिति में आ सकते और प्रार्थना कर सकते हैं। जब तुम प्रार्थना करते हो, इसमें इस बात का समावेश होता है कि क्या तुम्हारे वचन तर्कसंगत हैं, क्या तुम्हारे वचन वास्तविक आराधना के बारे में हैं, क्या जो चीज़ें तुम माँगते हो उनके लिए परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा करता है, क्या तुम्हारे वचन लेन-देन के बारे में हैं, क्या तुम्हारे वचनों में मानवीय अशुद्धियाँ हैं, क्या तुम्हारे वचन, कार्य और दृढ़-निश्चय सत्य के अनुसार हैं; क्या तुममें परमेश्वर के प्रति श्रृद्धा, आदर और समर्पण है, और क्या तुम सब वास्तव में परमेश्वर से परमेश्वर की तरह व्यवहार करते हो। जब तुम सब मसीह की उपस्थिति में नहीं होते हो तो जिन वचनों के साथ तुम प्रार्थना करते हो उनमें तुम्हें गम्भीर और ईमानदार अवश्य होना चाहिए है। केवल इसी तरह से तुम मसीह की उपस्थिति में सामान्य हो सकते हो। यदि तुम पवित्रात्मा की उपस्थिति में गम्भीर नहीं हो, तो जब तुम सब मनुष्य (मसीह) की उपस्थिति में आओगे, तो तुम सदैव द्वन्द्व में होगे, या तुम्हारे वचन तर्क के साथ नहीं होंगे, या तुम अपने वचनों में ईमानदार नहीं होगे, या तुम सदैव अपने वचनों और कार्यों के साथ बाधा पहुँचाओगे। मसले के समाप्त होने के पश्चात, तुम सदैव स्वयं को धिक्कारते रहोगे। तुम सदैव स्वयं को क्यों धिक्कारते रहते हो? क्योंकि परमेश्वर की तुम्हारी आराधना में और परमेश्वर से तुम सब कैसा व्यवहार करते हो उसमें समान्यतः तुम्हें सत्य की कोई समझ नहीं है। इसलिए, जब तुम सब पर मसले आते हैं, तो तुम उलझन में पड़ जाते हो और नहीं जानते कि अभ्यास कैसे करना है, और तुम सदैव ग़लत चीज़ें ही करोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'प्रार्थना का महत्व और अभ्यास' से उद्धृत

तुम लोगों के लिए प्रार्थना का अत्यधिक महत्व है। जब तुम प्रार्थना करते हो और पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करते हो, तो तुम्हारा हृदय परमेश्वर द्वारा प्रेरित होगा, और तुम्हें तब परमेश्वर से प्रेम करने की ताकत मिलेगी। यदि तुम हृदय से प्रार्थना नहीं करते, यदि तुम पूरे खुले हृदय से परमेश्वर से संवाद नहीं करते, तो परमेश्वर के पास तुममें कार्य करने का कोई तरीका नहीं होगा। यदि प्रार्थना करने और अपने हृदय की बात कहने के बाद, परमेश्वर के आत्मा ने अपना काम शुरू नहीं किया है, और तुम्हें कोई प्रेरणा नहीं मिली है, तो यह दर्शाता है कि तुम्हारे हृदय में ईमानदारी की कमी है, तुम्हारे शब्द असत्य और अभी भी अशुद्ध हैं। यदि प्रार्थना करने के बाद तुम्हें संतुष्टि का एहसास हो, तो तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर को स्वीकार्य हैं और परमेश्वर का आत्मा तुममें काम कर रहा है। परमेश्वर के सामने सेवा करने वाले के तौर पर तुम प्रार्थना से रहित नहीं हो सकते। यदि तुम वास्तव में परमेश्वर के साथ संवाद को ऐसी चीज़ के रूप में देखते हो, जो सार्थक और मूल्यवान है, तो क्या तुम प्रार्थना को त्याग सकते हो? कोई भी परमेश्वर के साथ संवाद किए बिना नहीं रह सकता। प्रार्थना के बिना तुम देह में जीते हो, शैतान के बंधन में रहते हो; सच्ची प्रार्थना के बिना तुम अँधेरे के प्रभाव में रहते हो। मुझे आशा है कि तुम सब भाई-बहन हर दिन सच्ची प्रार्थना करने में सक्षम हो। यह नियमों का पालन करने के बारे में नहीं है, बल्कि एक निश्चित परिणाम प्राप्त करने के बारे में है। क्या तुम सुबह की प्रार्थनाएँ करने और परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने के लिए, अपनी थोड़ी-सी नींद का त्याग करने को तैयार हो? यदि तुम शुद्ध हृदय से प्रार्थना करते हो और इस तरह परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो, तो तुम उसे अधिक स्वीकार्य होगे। यदि हर सुबह तुम ऐसा करते हो, यदि हर दिन तुम परमेश्वर को अपना हृदय देने का अभ्यास करते हो, उससे संवाद और उससे जुडने की कोशिश करते हो, तो निश्चित रूप से परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान बढ़ेगा, और तुम परमेश्वर की इच्छा को समझने में अधिक सक्षम हो पाओगे। तुम कहते हो : "हे परमेश्वर! मैं अपना कर्तव्य पूरा करने को तैयार हूँ। केवल तुम्हें ही मैं अपने पूरा अस्तित्व समर्पित करता हूँ, ताकि तुम हममें महिमामंडित हो सको, ताकि तुम हमारे इस समूह द्वारादी गई गवाही का आनंद ले सको। मैं तुमसे हममें कार्य करने की विनती करता हूँ, ताकि मैं तुमसे सच्चा प्यार करने और तुम्हें संतुष्ट करने और तुम्हारा अपने लक्ष्य के रूप में अनुसरण करने में सक्षम हो सकूँ।" जैसे ही तुम यह दायित्व उठाते हो, परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें पूर्ण बनाएगा। तुम्हें केवल अपने फायदे के लिए ही प्रार्थना नहीं करनी चाहिए, बल्कि परमेश्वर की इच्छा का पालन करने और उससे प्यार करने के लिए भी तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए। यह सबसे सच्ची तरह की प्रार्थना है। क्या तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर की इच्छा का पालन करने के लिए प्रार्थना करता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

तुम लोग तभी प्रार्थना करते हो जब तुम्हारे पास मसले या कठिनाइयाँ होती हैं, परन्तु क्या तुम लोग उस समय प्रार्थना करते हो जब तुम्हारी परिस्थितियाँ अच्छी होती हैं, या जब तुम महसूस करते हो कि तुम्हारी सभा सफल हुई? तो तुम लोगों में से अधिकतर प्रार्थना नहीं करते हैं! यदि तुमने कोई सफल सभा की, तो तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए; तुम्हें स्तुति की एक प्रार्थना करनी चाहिए। यदि कोई तुम्हारी प्रशंसा करता है, तो तुम अहंकारी हो जाते हो, तुम महसूस करते हो कि तुम्हारे पास सत्य है, तुम ग़लत परिस्थिति में गिर जाते हो, और तुम्हारा हृदय प्रसन्न होता है. तुम्हारे पास स्तुति की एक प्रार्थना नहीं होती है, धन्यवाद की प्रार्थना तो बिल्कुल भी नहीं होती है। तुम्हारे इस परिस्थिति में गिरने का परिणाम यह होता है कि तुम्हारी अगली सभा नीरस होगी, तुम्हारे पास कहने के लिए शब्द नहीं होंगे, और पवित्र आत्मा कार्य नहीं करेगा। लोग अपनी ही परिस्थिति को नहीं समझ सकते, वे थोड़ा सा कार्य करते हैं, और फिर अपने उस कार्य के फल का आनन्द लेते हैं। एक नकारात्मक परिस्थिति में, यह बताना कठिन है कि ठीक होने के लिए उन्हें कितने दिनों की आवश्यकता होगी। इस प्रकार की परिस्थिति सब से खतरनाक है। तुम सब लोग प्रार्थना करते हो जब तुम्हारा कोई मसला होता है या जब तुम्हें चीज़ें स्पष्ट रूप से नहीं दिखाई देती हैं; तुम लोग उस समय प्रार्थना करते हो जब तुम्हें किसी के बारे में सन्देह और असमंजस होते हैं या तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव उजागर हो जाता है। तुम लोग मात्र उस समय प्रार्थना करते हो जब तुम लोग किसी चीज़ की ज़रूरत में होते हो। तुम लोगों को उस समय भी अवश्य प्रार्थना करनी चाहिए, जब तुम लोग अपने कार्य में कुछ सफलता प्राप्त करते हो। जब तुम अपने कार्य में कुछ परिणाम प्राप्त करते हो, तुम उत्तेजित हो जाते हो, और एक बार जब तुम उत्तेजित हो जाते हो, तो तुम प्रार्थना नहीं करते हो; तुम सर्वदा प्रसन्न होते हो और भीतर ही भीतर सर्वदा फँसे रहते हो। तुम लोगों में से कुछ लोग इस समय अनुशासन प्राप्त करते हैं: जब तुम खरीदारी के लिए बाहर जाते हो, और तुम किसी समस्या में फँस जाते हो और तुम्हारे साथ कुछ ग़लत हो जाता है; दुकानदार तुम्हें बहुत से कठोर वचन कहता है और तुम असहज और दबाव महसूस करते हो, और तुम अभी भी नहीं जानते कि तुमने किस तरह से परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है। वस्तुतः, तुम्हें अनुशासित करने के लिए परमेश्वर कई बार बाहरी वातावरण का उपयोग करता है; उदाहरण के लिए, वह इस प्रकार की बातों का उपयोग करता है जैसे कि कोई अविश्वासी तुम्हें कोस रहा है, या तुम्हें बेचैन करने के लिए तुम्हारा पैसा चोरी हो गया है। अन्त में, प्रार्थना करने के लिए तुम परमेश्वर की उपस्थिति में आओगे, और जब तुम्हारे प्रार्थना करते समय कुछ शब्द बाहर आएँगे। तुम पहचान जाओगे कि तुम्हारी परिस्थिति सही नहीं थी, उदाहरण के लिए, तुम स्वयं से सन्तुष्ट और प्रसन्न थे..., फिर तुम अपनी आत्म-सन्तुष्टि से घृणा महसूस करोगे। तुम्हारी प्रार्थना में वचनों के साथ-साथ तुम्हारे अन्दर की ग़लत परिस्थिति भी बदल जाएगी। जैसे ही तुम प्रार्थना करोगे, पवित्र आत्मा तुम पर कार्य करेगा; वह तुम्हें एक प्रकार की अनुभूति प्रदान करेगा और तुम्हें उस गलत परिस्थति से बाहर ले आएगा। प्रार्थना खोजने के बारे में ही नहीं है। यह ऐसा नहीं है कि जब तुम्हें परमेश्वर की आवश्यकता हो, तो तुम प्रार्थना करो, और जब तुम्हें परमेश्वर की आवश्यकता न हो तो प्रार्थना न करो। क्या तुम लोगों ने देखा है कि यदि तुम लोग बिना प्रार्थना किए एक लम्बा समय निकाल देते हो, तो यद्यपि तुम लोगों के पास ऊर्जा होती है और तुम लोग नकारात्मक भी नहीं होते हो, या तुम लोग को लगता है कि भीतर से तुम लोगों की एक विशेष रूप से सामान्य स्थिति है, तो तुम लोगों को महसूस होगा मानो कि तुम लोग स्वयं ही कार्य कर रहे हो और तुम लोग जो कुछ करते हो उसके कोई परिणाम नहीं हैं?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'प्रार्थना का महत्व और अभ्यास' से उद्धृत

कभी-कभी, जब तुम परमेश्वर के वचनों का आनंद ले रहे होते हो, तुम्हारी आत्मा द्रवित हो जाती है और तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर से प्रेम किए बिना नहीं रह सकते, कि तुम्हारे भीतर काफ़ी ताकत है और ऐसा कुछ नहीं जिसे तुम छोड़ नहीं सकते। यदि तुम ऐसा महसूस करते हो, तो परमेश्वर की आत्मा ने तुम्हें स्पर्श कर लिया है, और तुम्हारा दिल पूरी तरह से परमेश्वर उन्मुख हो चुका है और तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे और कहोगे: "हे परमेश्वर! हम वास्तव में तुम्हारे द्वारा पूर्वनिर्धारित और चुने गए हैं। तुम्हारी महिमा में मुझे गौरव मिलता है, और तुम्हारे लोगों में से एक होना मुझे महिमामयलगता है। तुम्हारी इच्छा पर चलने के लिए मैं कुछ भी व्यय कर दूंगा और कुछ भी दे दूंगा और अपने सभी वर्ष और पूरे जीवन के प्रयासों को तुम्हें समर्पित कर दूंगा।" जब तुम इस तरह प्रार्थना करते हो, तो तुम्हारे दिल में परमेश्वर के प्रति अनंत प्रेम और सच्ची आज्ञाकारिता होगी। क्या तुम्हें कभी ऐसा अनुभव हुआ है? यदि लोगों को अक्सर परमेश्वर की आत्मा द्वारा छुआ जाता है, तो वो अपनी प्रार्थनाओं में खुद को परमेश्वर के प्रति विशेष रूप से समर्पित करने के इच्छुकहोते हैं: "हे परमेश्वर! मैं तुम्हारी महिमा का दिन देखना चाहता हूँ, और तुम्हारे लिए जीना चाहता हूँ—तुम्हारे लिए जीने के मुकाबले कुछ भी ज्यादा योग्य या सार्थक नहीं है और मेरी शैतान और देह के लिए जीने की ज़रा भी इच्छा नहीं है। तुम आज मुझे तुम्हारे लिए जीने हेतु सक्षम बनाकर मुझे ऊपर उठाओबड़ा करो।" जब तुमने इस तरह प्रार्थना की है, तो तुम्हें महसूस होगा कि तुम परमेश्वर को अपना दिल दिए बिना नहीं रह सकते, कि तुम्हें परमेश्वर को पाना चाहिए और तुम जब तक जीवित हो, परमेश्वर को पाए बिना मर जाने से नफ़रत करोगे। ऐसी प्रार्थना करने के बाद, तुम्हारे भीतर एक अक्षय ताकत आएगी और तुम नहीं जान पाओगे कि यह कहां से आती है; तुम्हारे हृदय के अंदर असीम शक्ति होगी और तुम्हें आभास होगा कि परमेश्वर बहुत सुंदर है, और वह प्रेम करने के योग्य है। यह तब होगा जब तुम परमेश्वर द्वारा छू लिए जा चुके होंगे। जिन सभी लोगों को इस तरह का अनुभव हुआ है, वो सभी परमेश्वर द्वारा छू लिए गए हैं। जिन लोगों को परमेश्वर अक्सर स्पर्श करता है, उनके जीवन में परिवर्तन होते हैं, वो अपने संकल्प को बनाने में सक्षम होते हैं और परमेश्वर को पूरी तरह से प्राप्त करने के लिए तैयार होते हैं, उनके दिल में परमेश्वर के लिए प्रेम अधिक मज़बूत होता है, उनके दिल पूरी तरह से परमेश्वर उन्मुख होचुके होते हैं, उन्हें परिवार, दुनिया, उलझनों या अपने भविष्य की कोई परवाह नहीं होती और वो परमेश्वर के लिए जीवन भर के प्रयासों को समर्पित करने के लिए तैयार होते हैं। वे सभी जिन्हें परमेश्वर कीआत्मा ने छुआ है, वो ऐसे लोग होते हैं, जो सत्य का अनुसरण करते हैं और जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की आशा रखते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

आज के युग में पवित्र आत्मा अभी लोगों को प्रेरित करता है कि वे आनंदित महसूस करें और वह इंसान के साथ रहता है। तुम्हारे जीवन में अक्सर होने वाली उन[क] विशेष, आनंददायक भावनाओं का स्रोत यही है। कभी-कभार कोई दिन आता है जब तुम्हें महसूस होता है कि परमेश्वर बहुत ही मनोहर है और तुम अपने आपको उसकी प्रार्थना करने से रोक नहीं पाते : "हे परमेश्वर! तेरा प्रेम बहुत ही सुंदर और तेरी छवि बहुत ही महान है। मैं चाहता हूँ कि मैं तुझे और गहराई से प्रेम करूँ। मैं अपने समग्र जीवन को खपा देने के लिए स्वयं को पूर्णत: अर्पित कर देना चाहता हूँ। अगर यह तेरे लिए है, अगर मैं तुझे प्रेम कर पाऊँ, तो मैं अपना सर्वस्व तुझे समर्पित कर दूँगा...।" यह सुख की एक भावना है जो तुम्हें पवित्र आत्मा ने दी है। यह न तो प्रबोधन है, न ही प्रकाशन है; यह प्रेरित होने का अनुभव है। कभी न कभी इस तरह के अनुभव होते रहेंगे : कभी-कभी जब तुम काम पर जा रहे होते हो, तो तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और उसके करीब आ जाते हो, और तुम इस हद तक प्रेरित हो जाते हो कि तुम्हारी आँखों में आँसू आ जाते हैं, अपने आप पर तुम्हारा नियंत्रण नहीं रहता और तुम एक ऐसे उपयुक्त स्थान की तलाश के लिए बेचैन हो जाते हो जहाँ तुम अपने दिल की तीव्र भावनाओं को व्यक्त कर सको...। कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि तुम किसी सार्वजनिक स्थान पर हो और महसूस करो कि तुम्हें परमेश्वर का प्रेम बहुत अधिक मिलता है, तुम्हें लगे कि तुम्हारी स्थिति मामूली नहीं है, यहाँ तक कि तुम दूसरों से अधिक सार्थक जीवन जी रहे हो। तुम्हें गहराई से महसूस होगा कि परमेश्वर ने तुम्हारा उत्कर्ष किया है और यह तुम्हारे लिए परमेश्वर का महान प्रेम है। अपने दिल के किसी गहनतम कोने में तुम्हें महसूस होगा कि परमेश्वर के अंदर इस प्रकार का प्रेम है जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता और जिसकी थाह नहीं पायी जा सकती, मानो तुम जानते तो हो मगर तुम उसका वर्णन नहीं कर सकते, यह तुम्हें सोचने के लिए हमेशा एक विराम देता है लेकिन तुम बिल्कुल भी व्यक्त नहीं कर पाते हो। कभी-कभी ऐसे समय में, तुम यह भी भूल जाओगे कि तुम कहाँ हो और पुकार उठोगे : "हे परमेश्वर! तू कितना अथाह और मनोहर है!" इससे लोग उलझन में पड़ जाएंगे, लेकिन ये तमाम चीज़ें अक्सर होती हैं। तुमने ऐसी बातों का अनुभव किया है। आज पवित्र आत्मा ने तुम्हें यह जीवन प्रदान किया है और अब तुम्हें यही जीवन जीना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (1)' से उद्धृत

अब तुम्हें उस मार्ग को स्पष्ट रूप से देखने में समर्थ हो जाना चाहिए, जिस पर पतरस चला था। यदि तुम पतरस के मार्ग को स्पस्ट रूप देख सको, तो तुम उस कार्य के बारे में निश्चित होगे जो आज किया जा रहा है, इसलिए तुम शिकायत नहीं करोगे या निष्क्रिय नहीं होगे, या किसी भी चीज़ की लालसा नहीं करोगे। तुम्हें पतरस की उस समय की मनोदशा का अनुभव करना चाहिए : वह दुख से त्रस्त था; उसने फिर कोई भविष्य या आशीष नहीं माँगा। उसने सांसारिक लाभ, प्रसन्नता, प्रसिद्धि या धन-दौलत की कामना नहीं की; उसने केवल सर्वाधिक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहा, जो कि परमेश्वर के प्रेम को चुकाने और परमेश्वर को अपनी सबसे अधिक बहुमूल्य वस्तु समर्पित करने के लिए था। तब वह अपने हृदय में संतुष्ट होता। उसने प्रायः इन शब्दों में यीशु से प्रार्थना की : "प्रभु यीशु मसीह, मैंने एक बार तुझे प्रेम किया था, किंतु मैंने तुझे वास्तव में प्रेम नहीं किया था। यद्यपि मैंने कहा था कि मुझे तुझ पर विश्वास है, किंतु मैंने तुझे कभी सच्चे हृदय से प्रेम नहीं किया। मैंने केवल तुझे देखा, तुझे सराहा, और तुझे याद किया, किंतु मैंने कभी तुझे प्रेम नहीं किया, न ही तुझ पर वास्तव में विश्वास किया।" अपना संकल्प करने के लिए उसने लगातार प्रार्थना की, और वह यीशु के वचनों से हमेशा प्रोत्साहित होता और उनसे प्रेरणा प्राप्त करता। बाद में, एक अवधि तक अनुभव करने के बाद, यीशु ने अपने लिए उसमें और अधिक तड़प पैदा करते हुए उसकी परीक्षा ली। उसने कहा : "प्रभु यीशु मसीह! मैं तुझे कितना याद करता हूँ, और तुझे देखने के लिए कितना लालायित रहता हूँ। मुझमें बहुत कमी है, और मैं तेरे प्रेम का बदला नहीं चुका सकता। मैं तुझसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे शीघ्र ले जा। तुझे मेरी कब आवश्यकता होगी? तू मुझे कब ले जाएगा? मैं कब एक बार फिर तेरा चेहरा देखूँगा? मैं भ्रष्ट होते रहने के लिए इस शरीर में अब और नहीं जीना चाहता, न ही अब और विद्रोह करना चाहता हूँ। मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब मैं यथाशीघ्र तुझे समर्पित करने के लिए तैयार हूँ, और अब मैं तुझे और दुखी नहीं करना चाहता।" उसने इसी तरह से प्रार्थना की, किंतु उस समय वह नहीं जानता था कि यीशु उसमें क्या पूर्ण करेगा। उसकी परीक्षा की पीड़ा के दौरान, यीशु पुनः उसके सामने प्रकट हुआ और बोला : "पतरस, मैं तुझे पूर्ण बनाना चाहता हूँ, इस तरह कि तू फल का एक टुकड़ा बन जाए, जो मेरे द्वारा तेरी पूर्णता का ठोस रूप हो, और जिसका मैं आनंद लूँगा। क्या तू वास्तव में मेरे लिए गवाही दे सकता है? क्या तूने वह किया, जो मैं तुझे करने के लिए कहता हूँ? क्या तूने मेरे कहे वचनों को जिया है? तूने एक बार मुझे प्रेम किया, किंतु यद्यपि तूने मुझे प्रेम किया, पर क्या तूने मुझे जिया है? तूने मेरे लिए क्या किया है? तू महसूस करता है कि तू मेरे प्रेम के अयोग्य है, पर तूने मेरे लिए क्या किया है?" पतरस ने देखा कि उसने यीशु के लिए कुछ नहीं किया था, और परमेश्वर को अपना जीवन देने की पिछली शपथ स्मरण की। और इसलिए, उसने अब और शिकायत नहीं की, और तब से उसकी प्रार्थनाएँ और अधिक बेहतर हो गईं। उसने यह कहते हुए प्रार्थना की : "प्रभु यीशु मसीह! एक बार मैंने तुझे छोड़ा था, और एक बार तूने भी मुझे छोड़ा था। हमने अलग होकर, और साहचर्य में एक-साथ, समय बिताया है। फिर भी तू मुझे अन्य सभी की अपेक्षा सबसे ज्यादा प्रेम करता है। मैंने बार-बार तेरे विरुद्ध विद्रोह किया है और तुझे बार-बार दुःखी किया है। ऐसी बातों को मैं कैसे भूल सकता हूँ? जो कार्य तूने मुझ पर किया है और जो कुछ तूने मुझे सौंपा है, मैं उसे हमेशा मन में रखता हूँ, और कभी नहीं भूलता। जो कार्य तूने मुझ पर किया है, उसके लिए मैंने वह सब किया है, जो मैं कर सकता हूँ। तू जानता है कि मैं क्या कर सकता हूँ, और तू यह भी जानता है कि मैं क्या भूमिका निभा सकता हूँ। मैं तेरे आयोजनों को समर्पित होना चाहता हूँ और मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब मैं तुझे समर्पित कर दूँगा। केवल तू ही जानता है कि मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूँ। यद्यपि शैतान ने मुझे बहुत मूर्ख बनाया और मैंने तेरे विरुद्ध विद्रोह किया, किंतु मुझे विश्वास है कि तू मुझे उन अपराधों के लिए स्मरण नहीं करता, और कि तू मेरे साथ उनके आधार पर व्यवहार नहीं करता। मैं अपना संपूर्ण जीवन तुझे समर्पित करना चाहता हूँ। मैं कुछ नहीं माँगता, और न ही मेरी अन्य आशाएँ या योजनाएँ हैं; मैं केवल तेरे इरादे के अनुसार कार्य करना चाहता हूँ और तेरी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ। मैं तेरे कड़वे कटोरे में से पीऊँगा और मैं तेरे आदेश के लिए हूँ।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस ने यीशु को कैसे जाना' से उद्धृत

मैंने उसके अनगिनत परीक्षण लिए, स्वभाविक रूप से उन्होंने उसे अधमरा कर दिया, परन्तु इन सैकड़ों परीक्षणों के मध्य, उसने कभी भी मुझमें अपनी आस्था नहीं खोई या मुझसे मायूस नहीं हुआ। जब मैंने उससे कहा कि मैंने उसे त्याग दिया है, तो भी वह निराश नहीं हुआ और पहले के अभ्यास के सिद्धांतों के अनुसार एवं व्यावहारिक ढंग से मुझे प्रेम करना जारी रखा। जब मैंने उससे कहा कि भले ही वह मुझ से प्रेम करता है, तो भी मैं उसकी प्रशंसा नहीं करूँगा, अंत में मैं उसे शैतान के हाथों में दे दूँगा। लेकिन ऐसे परीक्षण जो उसकी देह ने नहीं भोगे, मगर जो वचनों के परीक्षण थे, उन परीक्षणों के मध्य भी उसने मुझसे प्रार्थना की और कहा : "हे परमेश्वर! स्वर्ग, पृथ्वी और सभी वस्तुओं के मध्य, क्या ऐसा कोई मनुष्य है, कोई प्राणी है, या कोई ऐसी वस्तु है जो तुझ सर्वशक्तिमान के हाथों में न हो? जब तू मुझे अपनी दया दिखाता है, तब मेरा हृदय तेरी दया से बहुत आनन्दित होता है। जब तू मेरा न्याय करता है, तो भले ही मैं उसके अयोग्य रहूँ, फिर भी मैं तेरे कर्मों के अथाहपन की और अधिक समझ प्राप्त करता हूँ, क्योंकि तू अधिकार और बुद्धि से परिपूर्ण है। हालाँकि मेरा शरीर कष्ट सहता है, लेकिन मेरी आत्मा में चैन है। मैं तेरी बुद्धि और कर्मों की प्रशंसा कैसे न करूँ? यदि मैं तुझे जानने के बाद मर भी जाऊँ, तो भी मैं उसके लिए सहर्ष और प्रसन्नता से तैयार रहूँगा। हे सर्वशक्तिमान! क्या तू सचमुच नहीं चाहता है कि मैं तुझे देखूँ? क्या मैं सच में तेरे न्याय को प्राप्त करने के अयोग्य हूँ? कहीं मुझ में ऐसा कुछ तो नहीं जो तू नहीं देखना चाहता?" इस प्रकार के परीक्षणों के मध्य, भले ही पतरस मेरी इच्छा को सटीकता से समझने में असफल रहता था, लेकिन यह स्पष्ट था कि वह मेरे द्वारा उपयोग किए जाने के कारण खुद को बहुत गर्वान्वित और सम्मानित महसूस करता था (भले ही उसने मेरा न्याय इसलिए पाया ताकि मनुष्य मेरा प्रताप और क्रोध देख सके), और वह इन परीक्षणों के कारण बिल्कुल भी निरुत्साहित नहीं हुआ। मेरे समक्ष उसकी निष्ठा के कारण, और उस पर मेरे आशीषों के कारण, वह हज़ारों सालों के लिए मनुष्यों के लिए एक उदाहरण और आदर्श बना हुआ है। क्या तुम लोगों को उसकी इसी बात का अनुकरण नहीं करना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 6' से उद्धृत

जब पतरस को परमेश्वर द्वारा ताड़ना दी जा रही थी, तो उसने प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! मेरी देह अवज्ञाकारी है, और तू मुझे ताड़ना देकर मेरा न्याय कर रहा है। मैं तेरी ताड़ना और न्याय से खुश हूँ, अगर तू मुझे न भी चाहे, तो भी मैं तेरे न्याय में तेरा पवित्र और धार्मिक स्वभाव देखता हूँ। जब तू मेरा न्याय करता है, ताकि अन्य लोग तेरे न्याय में तेरा धार्मिक स्वभाव देख सकें, तो मैं संतुष्टि का एहसास करता हूँ। अगर यह तेरा धार्मिक स्वभाव प्रकट कर सके, सभी प्राणी तेरा धार्मिक स्वभाव देख सकें, और अगर यह तेरे लिए मेरे प्रेम को और शुद्ध बना सके ताकि मैं एक धार्मिक व्यक्ति की तरह बन सकूँ, तो तेरा न्याय अच्छा है, क्योंकि तेरी अनुग्रहकारी इच्छा ऐसी ही है। मैं जानता हूँ कि अभी भी मेरे भीतर बहुत कुछ ऐसा है जो विद्रोही है, और मैं अभी भी तेरे सामने आने के योग्य नहीं हूँ। मैं चाहता हूँ कि तू मेरा और भी अधिक न्याय करे, चाहे क्रूर वातावरण के जरिए करे या घोर क्लेश के जरिए; तू मेरा न्याय कैसे भी करे, यह मेरे लिए बहुमूल्य है। तेरा प्यार बहुत गहरा है, और मैं बिना कोई शिकायत किए स्वयं को तेरे आयोजन पर छोड़ने को तैयार हूँ।" यह परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लेने के बाद का पतरस का ज्ञान है, यह परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम की गवाही भी है। ... पूर्ण बना दिए जाने पर, अपने जीवन के आखिरी पलों में, पतरस ने कहा "हे परमेश्वर! यदि मैं कुछ वर्ष और जीवित रहता, तो मैं तेरे और ज्यादा शुद्ध और गहरे प्रेम को हासिल करने की कामना करता।" जब उसे क्रूस पर चढ़ाया जा रहा था, तो उसने मन ही मन प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! अब तेरा समय आ गया है, तूने मेरे लिए जो समय तय किया था वह आ गया है। मुझे तेरे लिए क्रूस पर चढ़ना चाहिए, मुझे तेरे लिए यह गवाही देनी चाहिए, मुझे उम्मीद है मेरा प्रेम तेरी अपेक्षाओं को संतुष्ट करेगा, और यह और ज्यादा शुद्ध बन सकेगा। आज, तेरे लिए मरने में सक्षम होने और क्रूस पर चढ़ने से मुझे तसल्ली मिल रही है और मैं आश्वस्त हो रहा हूँ, क्योंकि तेरे लिए क्रूस पर चढ़ने में सक्षम होने और तेरी इच्छाओं को संतुष्ट करने, स्वयं को तुझे सौंपने और अपने जीवन को तेरे लिए अर्पित करने में सक्षम होने से बढ़कर कोई और बात मुझे तृप्त नहीं कर सकती। हे परमेश्वर! तू कितना प्यारा है! यदि तू मुझे और जीवन बख्श देता, तो मैं तुझसे और भी अधिक प्रेम करना चाहता। मैं आजीवन तुझसे प्रेम करूँगा, मैं तुझसे और गहराई से प्रेम करना चाहता हूँ। तू मेरा न्याय करता है, मुझे ताड़ना देता है, और मेरी परीक्षा लेता है क्योंकि मैं धार्मिक नहीं हूँ, क्योंकि मैंने पाप किया है। और तेरा धार्मिक स्वभाव मेरे लिए और अधिक स्पष्ट होता जाता है। यह मेरे लिए एक आशीष है, क्योंकि मैं तुझे और भी अधिक गहराई से प्रेम कर सकता हूँ, अगर तू मुझसे प्रेम न भी करे तो भी मैं तुझसे इसी तरह से प्रेम करने को तैयार हूँ। मैं तेरे धार्मिक स्वभाव को देखने की इच्छा करता हूँ, क्योंकि यह मुझे अर्थपूर्ण जीवन जीने के और ज्यादा काबिल बनाता है। मुझे लगता है कि अब मेरा जीवन और भी अधिक सार्थक हो गया है, क्योंकि मैं तेरे लिए क्रूस पर चढ़ा हूँ, और तेरे लिए मरना सार्थक है। फिर भी मुझे अब तक संतुष्टि का एहसास नहीं हुआ है, क्योंकि मैं तेरे बारे में बहुत थोड़ा जानता हूँ, मैं जानता हूँ कि मैं तेरी इच्छाओं को संपूर्ण रूप से पूरा नहीं कर सकता, और मैंने बदले में तुझे बहुत ही कम लौटाया है। मैं अपने जीवन में तुझे अपना सब कुछ नहीं लौटा पाया हूँ; मैं इससे बहुत दूर हूँ। इस घड़ी पीछे मुड़कर देखते हुए, मैं तेरा बहुत ऋणी महसूस करता हूँ, और अपनी सारी गलतियों की भरपाई करने और सारे बकाया प्रेम को चुकाने के लिए मेरे पास यही एक घड़ी है।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

फुटनोट :

क. मूल पाठ में "ये कुछ हैं" लिखा है।

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