7. परमेश्वर से प्रार्थना और याचना के सिद्धांत

(1) सारी कठिनाइयों का सामना करते समय, या दुर्दशा में और दुविधा का सामना करते हुए, व्यक्ति को परमेश्वर से उसकी अगुआई और मार्गदर्शन पाने हेतु प्रार्थना और याचना में अपना दिल पूरी तरह से खोल देना चाहिए।

(2) परमेश्वर से प्रार्थना करते समय, याचना करने के साथ-साथ, व्यक्ति को उसके साथ अक्सर संवाद भी करना चाहिए; सरल, खुले शब्दों में अपना दिल खोलना चाहिए; और उसकी इच्छा को समझना सीखना चाहिए।

(3) विशेष रूप से परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, व्यक्ति को परमेश्वर से सत्य को पाने का प्रयास करना चाहिए और उसके वचनों के भीतर प्रार्थना करना और उसके साथ संवाद करना सीखना चाहिए। यह सत्य को समझने का सबसे प्रभावी तरीका है।

(4) व्यक्ति को परमेश्वर से श्रद्धापूर्ण हृदय से और साथ ही अच्छे विवेक से प्रार्थना करनी चाहिए। न तो उससे कुछ माँगना चाहिए और न ही उसके साथ जबरदस्ती करने या उसका लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए, न ही परमेश्वर के साथ सौदा करने का प्रयास करना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

प्रार्थना उन तरीकों में से एक है, जिनमें मनुष्य परमेश्वर से सहयोग करता है, यह एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को पुकारता है, और यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य को परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किया जाता है। यह कहा जा सकता है कि जो लोग प्रार्थना नहीं करते, वे मृत लोग हैं जो आत्मा से रहित हैं, जिससे साबित होता है कि उनके पास परमेश्वर द्वारा प्रेरित किए जाने की योग्यता की कमी है। प्रार्थना के बिना सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीना असंभव होगा, पवित्र आत्मा के कार्य के साथ बने रहने की बात तो छोड़ ही दो। प्रार्थना से रहित होना परमेश्वर के साथ अपना संबंध तोड़ना है, और उसके बिना परमेश्वर की प्रशंसा पाना असंभव होगा। परमेश्वर के विश्वासी के तौर पर, व्यक्ति जितना अधिक प्रार्थना करता है, अर्थात् व्यक्ति परमेश्वर द्वारा जितना अधिक प्रेरित किया जाता है, उतना ही अधिक वह संकल्प से भर जाएगा और परमेश्वर से नई प्रबुद्धता प्राप्त करने में अधिक सक्षम होगा। नतीजतन, इस तरह के व्यक्ति को पवित्र आत्मा द्वारा बहुत जल्दी पूर्ण बनाया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

प्रार्थना किसी प्रकार की रस्म नहीं है; यह एक व्यक्ति और परमेश्वर के बीच एक सच्चा संपर्क है, इसका गहन महत्व है। लोगों की प्रार्थनाओं से देखा जा सकता है कि वे सीधे परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं। यदि तुम प्रार्थना को एक रस्म के रूप में देखते हो, तब यह निश्चित है कि तुम परमेश्वर की सेवा अच्छी तरह से नहीं कर सकोगे। यदि तुम्हारी प्रार्थनाएँ ईमानदारी या निष्कपटता से नहीं की जाती हैं, तो ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के दृष्टिकोण से, तुम एक व्यक्ति के रूप में अस्तित्व में नहीं हो। तो फिर तुम अपने पर पवित्र आत्मा का कार्य कैसे करवाओगे? परिणामस्वरूप, कुछ समयावधि तक कार्य करने के बाद तुम थक जाओगे। अब से, प्रार्थना के बिना, तुम कार्य नहीं कर पाओगे। यह प्रार्थना ही है जो कार्य लाती है, और प्रार्थना ही है जो सेवा लाती है। यदि तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो एक अगुआ है और परमेश्वर की सेवा करता है, मगर तुमने स्वयं को कभी भी प्रार्थना के प्रति समर्पित नहीं किया है, यहाँ तक कि तुम अपनी प्रार्थनाओं में भी कभी गम्भीर नहीं रहे हो तो जिस तरीके तुम से सेवा करते हो उसके कारण तुम असफल हो जाओगे। लोग ऐसा क्यों महसूस करने लगते हैं कि उन्हें प्रार्थना न करने का हक है? क्या उन्होंने इसलिए प्रार्थना करनी बंद कर दी है क्योंकि परमेश्वर देहधारी है? यह कोई कारण नहीं है; कभी-कभी मैं भी प्रार्थना करता हूँ! जब प्रभु यीशु देह में था, और संकटपूर्ण मसलों के समय वह भी प्रार्थना करता था। वह पर्वतों पर, नावों पर और बागों में प्रार्थना करता था; प्रार्थना करने के लिए वह अपने शिष्यों की भी अगुवाई करता था। यदि तुम प्रायः परमेश्वर के सामने आकर उससे प्रार्थना कर सकते हो, तो यह प्रमाणित करता है कि तुम परमेश्वर को परमेश्वर के रूप में मानते हो। यदि तुम अक्सर प्रार्थना करने की उपेक्षा करते हो, अपने से चीज़ें करने की कोशिश करते हो, उसकी पीठ पीछे कुछ न कुछ करते रहते हो, तो तुम परमेश्वर की सेवा नहीं कर रहे हो; तुम बस अपने कारोबार में लगे हुए हो। इस तरह क्या तुम्हारी निन्दा नहीं की जाएगी? बाहर से देखने पर, ऐसा प्रतीत नहीं होगा मानो कि तुमने कुछ हानिकारक किया है, न ही ऐसा प्रतीत होगा कि तुमने परमेश्वर की ईशनिन्दा की है, बल्कि तुम बस अपना स्वयं का ही कार्य कर रहे होगे। ऐसा करने में, क्या तुम बाधा नहीं डाल रहे हो? भले ही, सतही तौर पर ऐसा लगता है कि तुम बाधा नहीं डाल रहे हो, किन्तु सारभूत रूप से तुम परमेश्वर का विरोध कर रहे हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'प्रार्थना के मायने और उसका अभ्यास' से उद्धृत

सच्ची प्रार्थना क्या है? प्रार्थना परमेश्वर को यह बताना है कि तुम्हारे हृदय में क्या है, परमेश्वर की इच्छा को समझकर उससे बात करना है, परमेश्वर के वचनों के माध्यम से उसके साथ संवाद करना है, स्वयं को विशेष रूप से परमेश्वर के निकट महसूस करना है, यह महसूस करना है कि वह तुम्हारे सामने है, और यह विश्वास करना है कि तुम्हें उससे कुछ कहना है। तुम्हें लगेगा कि तुम्हारा हृदय प्रकाश से भर गया है और तुम्हें महसूस होगा कि परमेश्वर कितना प्यारा है। तुम विशेष रूप से प्रेरित महसूस करते हो, और तुम्हारी बातें सुनकर तुम्हारे भाइयों और बहनों को संतुष्टि मिलती है। उन्हें लगेगा कि जो शब्द तुम बोल रहे हो, वे उनके मन की बात है, उन्हें लगेगा कि जो वे कहना चाहते हैं, उसी बात को तुम अपने शब्दों के माध्यम से कह रहे हो। यही सच्ची प्रार्थना है। एक बार जब तुम सच्चे मन से प्रार्थना करने लगोगे, तुम्हारा दिल शांत हो जाएगा और संतुष्टि का एहसास होगा। परमेश्वर से प्रेम करने की शक्ति बढ़ सकती है, और तुम महसूस करोगे कि जीवन में परमेश्वर से प्रेम करने से अधिक मूल्यवान या अर्थपूर्ण और कुछ नहीं है। इससे साबित होता है कि तुम्हारी प्रार्थना प्रभावी रही है। क्या तुमने कभी इस तरह से प्रार्थना की है?

और प्रार्थना की विषयवस्तु के बारे में क्या खयाल है? तुम्हारी प्रार्थना तुम्हारे हृदय की सच्ची अवस्था और पवित्र आत्मा के कार्य के अनुरूप धीरे-धीरे बढ़नी चाहिए; तुम परमेश्वर से उसकी इच्छा और मनुष्य से क्या अपेक्षा रखता है, इसके अनुसार उसके साथ संवाद करते हो। जब तुम प्रार्थना का अभ्यास शुरू करो, तो सबसे पहले अपना हृदय परमेश्वर को दे दो। परमेश्वर की इच्छा को समझने का प्रयास न करो—केवल अपने हृदय में ही परमेश्वर से बात करने की कोशिश करो। जब तुम परमेश्वर के समक्ष आते हो, तो इस तरह बोलो : "हे परमेश्वर, आज ही मुझे एहसास हुआ कि मैं तुम्हारी अवज्ञा करता था। मैं वास्तव में भ्रष्ट और नीच हूँ। मैं केवल अपना जीवन बर्बाद करता रहा हूँ। आज से मैं तुम्हारे लिए जीऊँगा। मैं एक अर्थपूर्ण जीवन जीऊँगा और तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा। तुम्हारा आत्मा मुझे लगातार रोशन और प्रबुद्ध करता हुआ हमेशा मेरे अंदर काम करे। मुझे अपने सामने मज़बूत और ज़बर्दस्त गवाही देने दो। शैतान को हमारे भीतर प्रकाशित तुम्हारी महिमा, तुम्हारी गवाही और तुम्हारी विजय का प्रमाण देखने दो।" जब तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, तो तुम्हारा हृदय पूरी तरह से मुक्त हो जाएगा। इस तरह से प्रार्थना करने के बाद तुम्हारा हृदय परमेश्वर के ज्यादा करीब हो जाएगा, और यदि तुम अकसर इस तरह से प्रार्थना कर सको, तो पवित्र आत्मा तुममें अनिवार्य रूप से काम करेगा। यदि तुम हमेशा इस तरह से परमेश्वर को पुकारोगे, और उसके सामने अपना संकल्प करोगे, तो एक दिन आएगा परमेश्वर के सामने जब तुम्हारा संकल्प स्वीकृत हो जाएगा, जब तुम्हारा हृदय और तुम्हारा पूरा अस्तित्व परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिया जायेगा, और तुम अंततः उसके द्वारा पूर्ण कर दिए जाओगे। तुम लोगों के लिए प्रार्थना का अत्यधिक महत्व है। जब तुम प्रार्थना करते हो और पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करते हो, तो तुम्हारा हृदय परमेश्वर द्वारा प्रेरित होगा, और तुम्हें तब परमेश्वर से प्रेम करने की ताकत मिलेगी। यदि तुम हृदय से प्रार्थना नहीं करते, यदि तुम पूरे खुले हृदय से परमेश्वर से संवाद नहीं करते, तो परमेश्वर के पास तुममें कार्य करने का कोई तरीका नहीं होगा। यदि प्रार्थना करने और अपने हृदय की बात कहने के बाद, परमेश्वर के आत्मा ने अपना काम शुरू नहीं किया है, और तुम्हें कोई प्रेरणा नहीं मिली है, तो यह दर्शाता है कि तुम्हारे हृदय में ईमानदारी की कमी है, तुम्हारे शब्द असत्य और अभी भी अशुद्ध हैं। यदि प्रार्थना करने के बाद तुम्हें संतुष्टि का एहसास हो, तो तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर को स्वीकार्य हैं और परमेश्वर का आत्मा तुममें काम कर रहा है। परमेश्वर के सामने सेवा करने वाले के तौर पर तुम प्रार्थना से रहित नहीं हो सकते। यदि तुम वास्तव में परमेश्वर के साथ संवाद को ऐसी चीज़ के रूप में देखते हो, जो सार्थक और मूल्यवान है, तो क्या तुम प्रार्थना को त्याग सकते हो? कोई भी परमेश्वर के साथ संवाद किए बिना नहीं रह सकता। प्रार्थना के बिना तुम देह में जीते हो, शैतान के बंधन में रहते हो; सच्ची प्रार्थना के बिना तुम अँधेरे के प्रभाव में रहते हो। मुझे आशा है कि तुम सब भाई-बहन हर दिन सच्ची प्रार्थना करने में सक्षम हो। यह नियमों का पालन करने के बारे में नहीं है, बल्कि एक निश्चित परिणाम प्राप्त करने के बारे में है। क्या तुम सुबह की प्रार्थनाएँ करने और परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने के लिए, अपनी थोड़ी-सी नींद का त्याग करने को तैयार हो? यदि तुम शुद्ध हृदय से प्रार्थना करते हो और इस तरह परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो, तो तुम उसे अधिक स्वीकार्य होगे। यदि हर सुबह तुम ऐसा करते हो, यदि हर दिन तुम परमेश्वर को अपना हृदय देने का अभ्यास करते हो, उससे संवाद और उससे जुडने की कोशिश करते हो, तो निश्चित रूप से परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान बढ़ेगा, और तुम परमेश्वर की इच्छा को समझने में अधिक सक्षम हो पाओगे। तुम कहते हो : "हे परमेश्वर! मैं अपना कर्तव्य पूरा करने को तैयार हूँ। मैं केवल तुम्हें ही अपना पूरा अस्तित्व समर्पित करता हूँ, ताकि तुम हमसे महिमा प्राप्त कर सको, ताकि तुम हमारे इस समूह द्वारा दी गई गवाही का आनंद ले सको। मैं तुमसे हममें कार्य करने की विनती करता हूँ, ताकि मैं तुमसे सच्चा प्यार करने और तुम्हें संतुष्ट करने और तुम्हारा अपने लक्ष्य के रूप में अनुसरण करने में सक्षम हो सकूँ।" जैसे ही तुम यह दायित्व उठाते हो, परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें पूर्ण बनाएगा। तुम्हें केवल अपने फायदे के लिए ही प्रार्थना नहीं करनी चाहिए, बल्कि परमेश्वर की इच्छा का पालन करने और उससे प्यार करने के लिए भी तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए। यह सबसे सच्ची तरह की प्रार्थना है। क्या तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर की इच्छा का पालन करने के लिए प्रार्थना करता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

प्रार्थना करते समय तुम्हारे पास ऐसा हृदय होना चाहिए, जो परमेश्वर के सामने शांत रहे, और तुम्हारे पास एक ईमानदार हृदय होना चाहिए। तुम सही अर्थों में परमेश्वर के साथ संवाद और प्रार्थना कर रहे हो—तुम्हें प्रीतिकर वचनों से परमेश्वर को फुसलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। प्रार्थना उस पर केंद्रित होनी चाहिए, जिसे परमेश्वर अभी संपन्न करना चाहता हो। प्रार्थना करते समय परमेश्वर से तुम्हें अधिक प्रबुद्ध बनाने और रोशन करने के लिए कहो और अपनी वास्तविक अवस्थाओं और अपनी परेशानियाँ उसके सामने रखो, और साथ ही वह संकल्प भी, जो तुमने परमेश्वर के सामने लिया था। प्रार्थना का अर्थ प्रक्रिया का पालन करना नहीं है; उसका अर्थ है सच्चे हृदय से परमेश्वर को खोजना। मांगो कि परमेश्वर तुम्हारे हृदय की रक्षा करे, ताकि तुम्हारा हृदय अकसर उसके सामने शांत हो सके; कि जिस परिवेश में उसने तुम्हें रखा है, उसमें तुम खुद को जान पाओ, खुद से घृणा करो, और खुद को त्याग सको, और इस प्रकार तुम परमेश्वर के साथ एक सामान्य रिश्ता बना पाओ और वास्तव में ऐसे व्यक्ति बन पाओ, जो परमेश्वर से प्रेम करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

लोग प्रार्थना का अभ्यास करने और प्रार्थना के महत्व को समझने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन प्रार्थना का प्रभावी होना कोई सरल बात नहीं है। प्रार्थना केवल यन्त्रवत् ढंग से करना, प्रक्रिया का पालन करना, या परमेश्वर के वचनों का पाठ करना नहीं है। दूसरे शब्दों में, प्रार्थना कुछ वचनों को रटना नहीं है और यह दूसरों की नकल करना नहीं है। प्रार्थना में व्यक्ति को उस स्थिति तक पहुँचना चाहिए, जहाँ अपना हृदय परमेश्वर को दिया जा सके, जहाँ वह अपना हृदय खोलकर रख सके, ताकि वह परमेश्वर द्वारा प्रेरित हो सके। यदि प्रार्थना को प्रभावी होना है, तो उसे परमेश्वर के वचन पढ़ने पर आधारित होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचनों के भीतर से प्रार्थना करने से ही व्यक्ति अधिक प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर सकता है। सच्ची प्रार्थना की अभिव्यक्तियाँ हैं : एक ऐसा हृदय होना, जो उस सबके लिए तरसता है जो परमेश्वर चाहता है, और यही नहीं, जो वह माँगता है उसे पूरा करने की इच्छा रखता है; उससे घृणा करना जिससे परमेश्वर घृणा करता है, और फिर इस आधार पर इसकी कुछ समझ प्राप्त करना, और परमेश्वर द्वारा प्रतिपादित सत्यों के बारे में कुछ ज्ञान और स्पष्टता हासिल करना। प्रार्थना के बाद यदि संकल्प, विश्वास, ज्ञान और अभ्यास का मार्ग हो, केवल तभी उसे सच्ची प्रार्थना कहा जा सकता है, और केवल इस प्रकार की प्रार्थना ही प्रभावी हो सकती है। फिर भी प्रार्थना को परमेश्वर के वचनों के आनंद पर निर्मित किया जाना चाहिए, उसे परमेश्वर के साथ उसके वचनों में, संवाद करने की नींव पर स्थापित होना चाहिए, और हृदय को परमेश्वर की खोज करने और उसके समक्ष शांत होने में सक्षम होना चाहिए। इस तरह की प्रार्थना पहले ही परमेश्वर के साथ सच्चे संवाद के चरण में प्रवेश कर चुकी है।

प्रार्थना के बारे में सबसे बुनियादी ज्ञान:

1. जो भी मन में आए, उसे बिना सोचे-समझे न कहो। तुम्हारे हृदय पर एक दायित्व होना चाहिए, यानी प्रार्थना करते समय तुम्हारे पास एक उद्देश्य होना चाहिए।

2. प्रार्थना में परमेश्वर के वचन शामिल होने चाहिए; उसे परमेश्वर के वचनों पर आधारित होना चाहिए।

3. प्रार्थना करते समय तुम्हें पुरानी या बीती बातों को उसमें नहीं मिलाना चाहिए। तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के वर्तमान वचनों से संबंधित होनी चाहिए, और जब तुम प्रार्थना करो, तो परमेश्वर को अपने अंतरतम विचार बताओ।

4. समूह-प्रार्थना एक केंद्र के इर्दगिर्द घूमनी चाहिए, जो आवश्यक रूप से, पवित्र आत्मा का वर्तमान कार्य है।

5. सभी लोगों को मध्यस्थतापरक प्रार्थना सीखनी है। यह परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशीलता दिखाने का एक तरीका भी है।

व्यक्ति का प्रार्थना का जीवन, प्रार्थना के महत्व की समझ और प्रार्थना के मूलभूत ज्ञान पर आधारित है। दैनिक जीवन में, बार-बार अपनी कमियों के लिए प्रार्थना करो, जीवन में अपने स्वभाव में बदलाव लाने के लिए प्रार्थना करो, और परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान के आधार पर प्रार्थना करो। प्रत्येक व्यक्ति को प्रार्थना का अपना जीवन स्थापित करना चाहिए, उन्हें परमेश्वर के वचनों को जानने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के कार्य का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। परमेश्वर के सामने अपनी व्यक्तिगत परिस्थितियाँ खोलकर रख दो और तुम जिस ढंग से प्रार्थना करते हो, उसकी चिंता किए बिना अपने वास्तविक स्वरूप में रहो, और सच्ची समझ और परमेश्वर के वचनों का वास्तविक अनुभव प्राप्त करना ही मुख्य बात है। आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश का अनुसरण करने वाले व्यक्ति को कई अलग-अलग तरीकों से प्रार्थना करने में सक्षम होना चाहिए। मौन प्रार्थना, परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करना, परमेश्वर के कार्य को जानना—ये सभी सामान्य आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक संगति के उद्देश्यपूर्ण कार्य के उदाहरण हैं, जो हमेशा परमेश्वर के सामने व्यक्ति की अवस्थाओं में सुधार करते हैं और व्यक्ति को जीवन में और अधिक प्रगति करने के लिए प्रेरित करते हैं। संक्षेप में, तुम जो कुछ भी करते हो, चाहे वह परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना हो, या चुपचाप प्रार्थना करना हो, या जोर-जोर से घोषणा करना हो, वह तुम्हें परमेश्वर के वचनों, उसके कार्य और जो कुछ वह तुममें हासिल करना चाहता है, उसे स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम बनाने के लिए है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम जो कुछ भी करते हो, वह परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों तक पहुँचने और अपने जीवन को नई ऊँचाइयों तक ले जाने के लिए किया जाता है। परमेश्वर की मनुष्य से न्यूनतम अपेक्षा यह है कि मनुष्य अपना हृदय उसके प्रति खोल सके। यदि मनुष्य अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को देता है और उसे अपने हृदय की सच्ची बात बताता है, तो परमेश्वर उसमें कार्य करने को तैयार होता है। परमेश्वर मनुष्य के कलुषित हृदय की नहीं, बल्कि शुद्ध और ईमानदार हृदय की चाह रखता है। यदि मनुष्य परमेश्वर से अपने हृदय को खोलकर बात नहीं करता है, तो परमेश्वर उसके हृदय को प्रेरित नहीं करेगा या उसमें कार्य नहीं करेगा। इसलिए, प्रार्थना का मर्म है, अपने हृदय से परमेश्वर से बात करना, अपने आपको उसके सामने पूरी तरह से खोलकर, उसे अपनी कमियों या विद्रोही स्वभाव के बारे में बताना; केवल तभी परमेश्वर को तुम्हारी प्रार्थनाओं में रुचि होगी, अन्यथा वह तुमसे मुँह मोड़ लेगा। प्रार्थना का न्यूनतम मानदंड यह है कि तुम्हें परमेश्वर के सामने अपना हृदय शांत रखने में सक्षम होना चाहिए, और उसे परमेश्वर से अलग नहीं हटना चाहिए। यह हो सकता है कि इस चरण के दौरान तुम्हें एक नई या उच्च अंतर्दृष्टि प्राप्त न हो, लेकिन फिर तुम्हें यथास्थिति बनाए रखने के लिए प्रार्थना का उपयोग करना चाहिए—तुम्हें पीछे नहीं हटना चाहिए। कम से कम इसे तो तुम्हें प्राप्त करना ही चाहिए। यदि तुम यह भी नहीं कर सकते, तो इससे साबित होता है कि तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन सही रास्ते पर नहीं है। परिणामस्वरूप, तुम्हारे पास पहले जो दृष्टि थी, उसे बनाए रखने में तुम असमर्थ होगे, तुम परमेश्वर में विश्वास खो दोगे, और तुम्हारा संकल्प इसके बाद नष्ट हो जाएगा। तुमने आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश किया है या नहीं, इसका एक चिह्न यह देखना है कि क्या तुम्हारी प्रार्थना सही रास्ते पर है। सभी लोगों को इस वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए; उन सभी को प्रार्थना में स्वयं को लगातार सजगता से प्रशिक्षित करने का काम करना चाहिए, निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा करने के बजाय, सचेत रूप से पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने का प्रयास करना चाहिए। तभी वे वास्तव में परमेश्वर की तलाश करने वाले लोग होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

तुम पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने की कोशिश कैसे करते हो? अत्यंत महत्वपूर्ण है परमेश्वर के वर्तमान वचनों में जीना और परमेश्वर की अपेक्षाओं की नींव पर प्रार्थना करना। इस तरह प्रार्थना कर चुकने के बाद, पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें स्पर्श करना निश्चित है। यदि तुम आज परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों की नींव के आधार पर कोशिशनहीं करते, तो यह व्यर्थ है। तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए और कहना चाहिए: "हे परमेश्वर! मैं तुम्हारा विरोध करता हूँ और मैं तुम्हारा बहुत ऋणी हूँ; मैं बहुत ही अवज्ञाकारी हूँ और तुम्हें कभी भी संतुष्ट नहीं कर सकता। हे परमेश्वर, मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे बचा लो, मैं अंत तक तुम्हारी सेवा करना चाहता हूँ, मैं तुम्हारे लिए मर जाना चाहता हूँ। तुम मुझे न्याय और ताड़ना देते हो और मुझे कोई शिकायत नहीं है; मैं तुम्हारा विरोध करता हूँ और मैं मर जाने लायक हूँ ताकि मेरी मृत्यु में सभी लोग तुम्हारा धार्मिक स्वभाव देख सकें।" जब तुम इस तरह अपने दिल से प्रार्थना करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारी सुनेगा और तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा; यदि तुम आज पवित्र आत्मा के वचनों के आधारपर प्रार्थना नहीं करते, तो पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें छूने की कोई संभावना नहीं है। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार और आज परमेश्वर जो करना चाहते हैं, उसके अनुसार प्रार्थना करते हो, तो तुम कहोगे "हे परमेश्वर! मैं तुम्हारे आदेशों को स्वीकार करना चाहता हूँ और तुम्हारे आदेशों के प्रति निष्ठा रखना चाहता हूँ, और मैं अपना पूरा जीवन तुम्हारी महिमा को समर्पित करने के लिए तैयार हूँ ताकि मैं जो कुछ भी करता हूँ वह परमेश्वर के लोगों के मानकों तक पहुँच सके। काश मेरा दिल तुम्हारे स्पर्श को पा ले। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी आत्मा सदैव मेरा प्रबोधन करे ताकि मैं जो कुछ भी करूँ वह शैतान को शर्मिंदा करे ताकि मैं अंततः तुम्हारे द्वारा प्राप्त किया जाऊँ।" यदि तुम इस तरह प्रार्थना करते हो, परमेश्वर की इच्छा के आसपास केंद्रित रहकर, तो पवित्र आत्मा अपरिहार्य रूप से तुम में कार्य करेगी। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि तुम्हारी प्रार्थनाओं में कितने शब्द हैं—कुंजी यह है कि तुम परमेश्वर की इच्छा समझते हो या नहीं। तुम सभी के पास निम्नलिखित अनुभव हो सकता है: कभी-कभी किसीसभा में प्रार्थना करते समय, पवित्र आत्मा के कार्य का गति-सिद्धांत अपने चरम बिंदु तक पहुँच जाता है, जिससे सभी की ताकत बढ़ती है। परमेश्वर के सामने पश्चाताप से अभिभूत होकर कुछ लोग फूट-फूटकर रोते हैं और प्रार्थना करते हुए आँसू बहाते हैं, तो कुछ लोग अपना संकल्प दिखाते हैं और प्रतिज्ञा करते हैं। पवित्र आत्मा के कार्य से प्राप्त होने वाला प्रभाव ऐसा है। आज यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सभी लोग परमेश्वर के वचनों में पूरी तरह अपना मन लगाएँ। उन शब्दों पर ध्यान न दो, जो पहले बोले गए थे; यदि तुम अभी भी उसे थामे रहोगे जो पहले आया था, तो पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य नहीं करेगी। क्या तुम देखते हो कि यह कितना महत्वपूर्ण है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

जब तुम प्रार्थना करना शुरू करो, तो अत्यधिक महत्वाकाँक्षी बनने की कोशिश मत करो और एक ही झटके में सबकुछ हासिल करने की उम्मीद मत करो। तुम इस बात की उम्मीद रखते हुए अतिशय माँगें नहीं कर सकते कि जैसे ही तुम माँगोगे, तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित कर दिया जाएगा, या कि तुम्हें प्रबुद्धता और रोशनी मिल जाएगी, या कि परमेश्वर तुम पर अनुग्रह बरसा देगा। ऐसा नहीं होगा; परमेश्वर अलौकिक चीजें नहीं करता। परमेश्वर अपने अनुसार लोगों की प्रार्थनाओं को स्वीकार करता है, और कभी-कभी वह यह देखने के लिए कि तुम उसके प्रति वफ़ादार हो या नहीं, तुम्हारे विश्वास को परखता है। जब तुम प्रार्थना करते हो, तो तुममें विश्वास, दृढ़ता और संकल्प होना चाहिए। अधिकांश लोग प्रशिक्षित होना शुरू करते ही हिम्मत हार जाते हैं, क्योंकि वे पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित होने में विफल रहते हैं। इससे काम नहीं चलेगा! तुम्हें दृढ़ रहना चाहिए; तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने का एहसास करने और तलाश और खोज करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। कभी-कभी तुम्हारे अभ्यास का मार्ग सही नहीं होता, और कभी-कभी तुम्हारे व्यक्तिगत उद्देश्य और धारणाएँ परमेश्वर के सामने टिक नहीं पातीं, और इसलिए परमेश्वर का आत्मा तुम्हें प्रेरित करने में विफल रहता है। अन्य समय में, परमेश्वर यह देखता है कि तुम वफ़ादार हो या नहीं। संक्षेप में, प्रशिक्षण में तुम्हें ऊँची कीमत चुकानी चाहिए। यदि तुम्हें पता चलता है कि तुम अपने अभ्यास के मार्ग से हट रहे हो, तो तुम अपना प्रार्थना करने का तरीका बदल सकते हो। जब तक तुम सच्चे हृदय से खोज करते हो और प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हो, पवित्र आत्मा तुम्हें निश्चित रूप से इस वास्तविकता में ले जाएगा। कभी-कभी तुम सच्चे हृदय से प्रार्थना करते हो, लेकिन ऐसा महसूस नहीं करते कि तुम विशेष रूप से प्रेरित किए गए हो। ऐसे समय में तुम्हें आस्था पर भरोसा रखना चाहिए, इस बात पर विश्वास करना चाहिए कि परमेश्वर तुम्हारी प्रार्थनाओं को देख रहा है; तुम्हें अपनी प्रार्थनाओं में दृढ़ रहना चाहिए।

ईमानदार व्यक्ति बनो; अपने हृदय में व्याप्त धोखे से छुटकारा दिलाने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करो। हर समय प्रार्थना के माध्यम से अपने आपको शुद्ध करो, प्रार्थना के माध्यम से परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाओ, और तुम्हारा स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा। सच्चा आध्यात्मिक जीवन प्रार्थना का जीवन है—यह एक ऐसा जीवन है, जिसे पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किया जाता है। पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने की प्रक्रिया मनुष्य के स्वभाव को बदलने की प्रक्रिया है। पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित न किया जाने वाला जीवन आध्यात्मिक जीवन नहीं, बल्कि केवल धार्मिक अनुष्ठान का जीवन है। केवल उन्हीं लोगों ने, जो पवित्र आत्मा द्वारा अकसर प्रेरित किए जाते हैं, और पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और रोशन किए जाते हैं, आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश किया है। मनुष्य जब प्रार्थना करता है, तो उसका स्वभाव लगातार बदलता जाता है। परमेश्वर का आत्मा जितना अधिक उसे प्रेरित करता है, वह उतना ही अग्रसक्रिय और आज्ञाकारी बन जाता है। इसलिए, उसका हृदय भी धीरे-धीरे शुद्ध होगा, और उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा। ऐसा है सच्ची प्रार्थना का प्रभाव।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

किसी भी समस्या के आने पर सबसे पहले प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना केवल बेमन से बड़बड़ करना नहीं है; उससे कोई समस्या हल नहीं होगी। हो सकता है आठ-दस बार प्रार्थना करने पर भी, तुम कुछ हासिल न कर पाओ, लेकिन हतोत्साहित मत हो—तुम्हें प्रार्थना करते रहना चाहिए। जब तुम्हारे साथ कुछ हो जाए, तो पहले प्रार्थना करो, पहले परमेश्वर को बताओ, परमेश्वर को सँभालने दो, परमेश्वर को मदद करने दो, परमेश्वर को अगुआई करने दो और उसे राह दिखाने दो। इससे साबित होता है कि तुमने परमेश्वर को पहले स्थान पर रखा है, वह तुम्हारे हृदय में है। कोई समस्या सामने आने पर अगर पहले तुम प्रतिरोध करते हो, क्रोधित हो जाते हो, आगबबूला हो जाते हो—यदि तुम तुरंत, सबसे पहले नकारात्मक हो जाते हो—तो इससे यह ज़ाहिर होता है कि तुम्हारे हृदय में परमेश्वर नहीं है। जब भी तुम्हारे साथ कुछ घटे, तो तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए। सबसे पहले तुम्हें घुटने टेककर प्रार्थना करनी चाहिए—यह महत्त्वपूर्ण है। प्रार्थना परमेश्वर की उपस्थिति में उसके प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण को प्रदर्शित करती है। अगर परमेश्वर तुम्हारे हृदय में नहीं होगा, तो तुम ऐसा नहीं करोगे। कुछ लोग कहते हैं, "मैं प्रार्थना करता हूँ, लेकिन परमेश्वर फिर भी मुझे प्रबुद्ध नहीं करता!" तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए। पहले देखो कि प्रार्थना के लिए तुम्हारी प्रेरणाएँ सही हैं या नहीं; यदि तुम वास्तव में सत्य की खोज करते हो और अक्सर परमेश्वर से प्रार्थना करते हो, तो वह किसी मामले में तुम्हें अच्छी तरह प्रबुद्ध करेगा, ताकि तुम समझ सको—संक्षेप में कहें तो परमेश्वर तुम्हें समझा देगा। परमेश्वर की प्रबुद्धता के बिना तुम अपने आप नहीं समझ सकते : तुममें कुशाग्रता की कमी है, तुम्हारे पास इसके लिए बुद्धि नहीं है, और यह मानव-बुद्धि द्वारा अप्राप्य है। जब तुम समझ जाते हो, तो क्या वह समझ तुम्हारे मन से पैदा होती है? यदि तुम पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध नहीं किए जाते, तो तुम जिस किसी से भी पूछोगे, वह नहीं जानता होगा कि आत्मा के कार्य का क्या अर्थ है या परमेश्वर का क्या अर्थ है; जब स्वयं परमेश्वर तुम्हें इसका अर्थ बताएगा, तभी तुम जान पाओगे। इसलिए, जब तुम्हारे साथ कुछ होता है, तो सबसे पहले प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना के लिए एक खोजी दृष्टिकोण के साथ जाँच-पड़ताल, और अपने विचार, मत और दृष्टिकोण व्यक्त करने की आवश्यकता होती है—ये चीज़ें उसमें शामिल होनी चाहिए। केवल बेमन से काम करने का कोई परिणाम नहीं होगा, इसलिए तुम्हें प्रबुद्ध न करने के लिए पवित्र आत्मा को दोष न दो। मैंने पाया है कि कुछ लोग परमेश्वर पर अपनी आस्था में, विश्वास तो करते रहते हैं, लेकिन परमेश्वर केवल उनके होंठों पर रहता है। परमेश्वर उनके दिलों में नहीं रहता, वे आत्मा के कार्य को नकारते हैं, और वे प्रार्थना को भी नकारते हैं; वे केवल परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। क्या इसे परमेश्वर में विश्वास कहा जा सकता है? वे तब तक विश्वास करते रहते हैं, जब तक कि परमेश्वर उनके विश्वास से पूरी तरह से गायब नहीं हो जाता। विशेष रूप से, ऐसे लोग भी हैं, जो अक्सर सामान्य मामले सँभालते हैं और महसूस करते हैं कि वे बहुत व्यस्त हैं, और अपने समस्त प्रयासों के लिए कुछ प्राप्त नहीं करते। यह लोगों द्वारा परमेश्वर पर अपने विश्वास में सही मार्ग पर न चलने का मामला है। क्या सही मार्ग पर चलना मुश्किल काम नहीं है? बहुत से सिद्धांत समझने के बाद भी वे इस मार्ग पर चलने में विफल रहते हैं और उनके पतन के मार्ग की ओर ही उन्मुख होने की संभावना होती है। इसलिए जब तुम्हारे साथ कुछ घटे, तो प्रार्थना करने और खोजने में अधिक समय लगाओ—कम से कम इतना तो तुम्हें करना ही चाहिए। परमेश्वर की इच्छा और पवित्र आत्मा के इरादों को जानना ही कुंजी है। यदि परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग इस प्रकार अनुभव और अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो वे कुछ भी हासिल नहीं कर पाएँगे, और उनका विश्वास अर्थहीन होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'हर चीज को सत्य की आँखों से देखो' से उद्धृत

धार्मिक अनुष्ठान की प्रार्थनाओं से ज़्यादा परमेश्वर किसी भी दूसरी चीज़ से अधिक घृणा नहीं करता है। परमेश्वर से की गयी प्रार्थनाएँ तभी स्वीकार होती हैं जब वे सच्ची होती हैं। अगर तुम्हारे पास ईमानदारी से कहने को कुछ नहीं है, तो चुप रहो; उसे धोखा देने की कोशिश करते हुए, उससे कितना प्रेम करते हो और उसके प्रति कितने निष्ठावान बने रहना चाहते हो, यह बताते हुए हमेशा झूठे शब्द न बोलो और परमेश्वर के सामने आँख मूँद कर शपथ मत लो। अगर तुम अपनी इच्छाएँ पूरी करने के काबिल नहीं हो, तुममें यह दृढ़ निश्चय और आध्यात्मिक कद नहीं है, तो किसी भी हालत में, परमेश्वर के सामने ऐसी प्रर्थना मत करो। यह उपहास होता है। उपहास का मतलब किसी का मखौल उड़ाना, उसके साथ तुच्छता से पेश आना होता है। जब लोग इस प्रकार के स्वभाव के साथ परमेश्वर के सामने प्रार्थना करते हैं, तो यह धोखे से कम कुछ नहीं होता। बदतर यह है कि अगर तुम अक्सर ऐसा करते हो, तो तुम बहुत घिनौने चरित्र वाले हो। यदि परमेश्वर को तुम्हें इन कर्मों के लिए दंड देना हो, तो इन्हें ईश-निंदा कहा जाएगा! लोगों में परमेश्वर के प्रति आदर नहीं है, वे उसका सम्मान करना नहीं जानते, या नहीं जानते कि उससे प्रेम कैसे करें, उसे कैसे संतुष्ट करें। यदि वे सत्य को स्पष्ट रूप से नहीं समझते, या उनका स्वभाव भ्रष्ट है, तो परमेश्वर इसे जाने देगा। लेकिन वे ऐसे चरित्र के साथ परमेश्वर के सामने चले आते हैं, और परमेश्वर से ऐसे पेश आते हैं जैसे कि अविश्वासी दूसरे लोगों के साथ पेश आते हैं। यही नहीं, वे सत्यनिष्ठा से परमेश्वर के सामने प्रार्थना में घुटने टेकते हैं, इन शब्दों का उपयोग करके उसकी खुशामद करने की कोशिश करते हैं, और सब कर लेने पर उन्हें आत्मनिंदा तो महसूस होती नहीं, बल्कि उन्हें अपने कर्मों की गंभीरता का भी एहसास नहीं होता। स्थिति ऐसी होने पर, क्या परमेश्वर उनके साथ होता है? क्या कोई इंसान जिसके पास परमेश्वर की मौजूदगी है ही नहीं, वह प्रबुद्ध और प्रकाशित हो सकता है? क्या वह सत्य से प्रबुद्ध हो सकता है? (नहीं, नहीं हो सकता।) फिर वे मुसीबत में हैं। क्या तुम लोगों ने कई बार ऐसी प्रार्थना की है? क्या तुम ऐसा अक्सर करते हो? जब लोग बहुत लंबा समय बाहर की दुनिया में बिताते हैं, तो उनसे समाज की गंदगी की बू आती है, उनकी नीच प्रकृति में बढ़ोत्तरी होती है, और उनमें शैतानी ज़हर और जीवनशैली भर जाती है; उनके मुँह से सिर्फ झूठ और छल-कपट के शब्द निकलते हैं, वे बिना सोचे बोलते हैं, या ऐसे शब्द बोलते हैं जिनमें हमेशा उनकी मंशाओं और लक्ष्यों के अलावा कुछ नहीं होता, उनमें विरले ही उचित मंसूबे होते हैं। ये गंभीर समस्याएँ हैं। जब लोग इन शैतानी फलसफों और जीवन शैलियों को ले कर परमेश्वर के सामने जाते हैं, तो क्या वे परमेश्वर के स्वभाव का अपमान नहीं करते? और इसका परिणाम क्या होगा? सतही तौर पर, ये प्रार्थनाएँ परमेश्वर को धोखा देने और मूर्ख बनाने के प्रयास होती हैं, और उसकी इच्छा और आवश्यकताओं के साथ ये असंगत होती हैं। मौलिक रूप से कहें तो, यह मानव स्वभाव के कारण होता है; यह भ्रष्टता का कोई क्षणिक प्रकटन नहीं होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानकर ही तुम सत्‍य की खोज कर सकते हो' से उद्धृत

मैंने एक ऐसी समस्या पाई है जो सभी लोगों के साथ होती है: जब उनके साथ कुछ होता है तो वे प्रार्थना करने परमेश्वर के सामने आते हैं लेकिन उनके लिए प्रार्थना एक बात है और वो मसला अलग बात। वे मानते हैं कि उनके साथ क्या चल रहा है, यह उन्हें प्रार्थना में नहीं बोलना चाहिए। तुम लोग कभी-कभार ही दिल खोलकर प्रार्थना करते हो और कुछ लोग तो यह भी नहीं जानते हैं कि प्रार्थना कैसे करें। वस्तुतः, प्रार्थना उस बारे में बोलना है जो तुम्हारे हृदय में है, मानो कि तुम सामान्य तौर पर बोल रहे हों। लेकिन, ऐसे लोग भी हैं जो प्रार्थना शुरू करते ही अपनी जगह भूल जाते हैं; वे इस पर ज़ोर देने लगते हैं कि परमेश्वर उन्हें कुछ प्रदान करे, बिना इसकी परवाह किए कि यह उसकी इच्छा के अनुरूप है या नहीं और नतीजतन, उनकी प्रार्थना, प्रार्थना के दौरान ही कमज़ोर पड़ जाती है। जब तुम प्रार्थना करते हो, तो अपने दिल में तुम जो कुछ भी माँग रहे हों, जिसकी भी तुम्हें ख्वाइश हो; या भले ही ऐसा कोई मुद्दा हो जिसे तुम संबोधित करना चाहते हों, लेकिन जिसे लेकर तुम्हारे पास अंतर्दृष्टि नहीं है और तुम परमेश्वर से बुद्धि और सामर्थ्य माँग रहे हों या यह कि वह तुम्हें प्रबुद्ध करे—तुम्हारा अनुरोध कुछ भी हो, उसके विन्यास को लेकर तुम्हें समझदार होना चाहिए। यदि तुम समझदार नहीं हो, और घुटनों के बल बैठकर कहते हो, "परमेश्वर, मुझे सामर्थ्य दे; मैं अपनी प्रकृति देख सकूँ; मैं तुझसे काम के लिए निवेदन करता हूँ; मैं तुझसे इस या उस चीज़ के लिए निवेदन करता हूँ; मैं तुझसे निवेदन करता हूँ कि तू मुझे फलां-फलां बना दे..." तुम्हारे उस "निवेदन करता हूँ" में ज़बरदस्ती वाला तत्त्व है; यह परमेश्वर पर दबाव डालने का प्रयास है, उसे वह करने को मजबूर करना है जो तुम चाहते हो—जिसकी शर्तें तुमने आश्चर्यजनक रूप से पहले ही एकतरफ़ा तय कर ली हैं। जैसा कि पवित्र आत्मा इसे देखता है, तो ऐसी प्रार्थना का क्या प्रभाव हो सकता है जबकि तुमने शर्तें पहले ही निर्धारित कर दी हैं और यह तय कर लिया है कि तुम्हें क्या करना है? प्रार्थना एक खोजपूर्ण, आज्ञाकारी दिल से की जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, जब तुम पर कोई विपत्ति आ गयी हो, और तुम समझ न पा रहे हो कि उसे कैसे संभालो, तो तुम कह सकते हो, "हे परमेश्वर! मैं नहीं जानता कि इस बारे में क्या करूँ। इस मामले में मैं तुझे सन्तुष्ट करना चाहता हूँ और तेरी इच्छा जानना चाहता हूँ। यह तेरी इच्छानुसार ही हो। मैं तेरी इच्छानुसार कार्य करना चाहता हूँ, अपनी इच्छानुसार नहीं। तू जानता है कि मनुष्य की इच्छा तेरी इच्छा के विपरीत होती है; वह तेरा विरोध करती है और सत्य के अनुरूप नहीं होती। मैं चाहता हूँ कि तू मुझे प्रबुद्ध करे, इस मामले में मेरा मार्गदर्शन करे और मैं तुझे नाराज़ न कर दूँ..." यह लहज़ा प्रार्थना के लिए उपयुक्त है। यदि तुम मात्र यह कहते हो: "हे परमेश्वर, मैं तुझसे मदद और मार्गदर्शन माँगता हूँ, मुझे सही माहौल और सही लोगों का साथ दे और मुझे अपना कार्य अच्छी तरह से करने के योग्य बना...," तो तुम्हारी प्रार्थना खत्म हो जाने पर भी तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ पाये होंगे क्योंकि तुम परमेश्वर से अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने को कह रहे होंगे।

अब तुम लोगों को यह ज़रूर तय करना चाहिए कि क्या प्रार्थना में तुम्हारे द्वारा प्रयोग किए जा रहे शब्द विवेकसम्मत हैं। अगर तुम्हारी प्रार्थनाएँ विवेकसम्मत नहीं हैं, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि ऐसा तुम्हारी मूर्खता के कारण है या प्रार्थना के वाक्य विन्यास के कारण, पवित्र आत्मा तुम पर कार्य नहीं करेगा। इसलिए, जब तुम प्रार्थना करते हो, तो तुम्हें उपयुक्त लहज़े में विवेकसम्मत तरीके से बोलना चाहिए। तुम यह कहो : "हे परमेश्वर! तू मेरी कमज़ोरी और मेरे विद्रोहीपन को जानता है। मैं बस इतना ही माँगता हूँ कि तू मुझे सामर्थ्य प्रदान करे और अपनी परिस्थितियों को सहन कर पाने में मेरी मदद करे, लेकिन केवल अपनी इच्छा के अनुसार। मैं बस इतना ही माँगता हूँ। मैं नहीं जानता कि तेरी इच्छा क्या है, परन्तु मैं तेरी इच्छा जस-की-तस पूर्ण होने की अभिलाषा करता हूँ। चाहे मुझसे सेवा करवाई जाए या विषमता के रूप में मेरा प्रयोग किया जाए, मैं ऐसा स्वेच्छा से करूँगा। मैं तुझसे सामर्थ्य और बुद्धि माँगता हूँ ताकि इस मामले में तुझे संतुष्ट कर सकूँ। मैं बस तेरी व्यवस्था के प्रति समर्पण करने का इच्छूक हूँ..." इस तरह से प्रार्थना करने के पश्चात् तुम्हारे दिल को सुकून मिलेगा। यदि तुम लगातार सिर्फ़ माँगने में ही लगे रहते हो, तो भले ही तुम कितना भी बोलो, ये सब सिर्फ़ खोखले शब्द ही रह जाएँगे; परमेश्वर तुम्हारी दलील पर कार्य नहीं करेगा क्योंकि तुम पहले ही तय कर चुके होंगे कि तुम्हें क्या चाहिए। जब तुम प्रार्थना करने के लिए घुटनों के बल बैठते हो, तो यह कहो: "हे परमेश्वर! तू मनुष्य की कमज़ोरियों और उसकी स्थितियों को जानता है। मैं यह माँगता हूँ कि इस मसले पर तू मुझे प्रबुद्ध करे। मुझे तेरी इच्छा जानने दे। मैं मात्र तेरी समस्त व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने की अभिलाषा करता हूँ; मेरा हृदय तेरी आज्ञा मानने का इच्छुक है..." इस प्रकार प्रार्थना करो और पवित्र आत्मा तुम्हें द्रवित कर देगा। यदि तुम्हारा प्रार्थना करने का तरीका सही नहीं है, तो तुम्हारी प्रार्थना घिसी-पिटी होगी और पवित्र आत्मा तुम्हें द्रवित नहीं करेगा। अपने ही बारे में बोलते हुए बकबक मत करते रहो—ऐसा करना और कुछ नहीं बल्कि असावधानी और लापरवाही है। यदि तुम असावधान और लापरवाह रहते हो तो क्या पवित्र आत्मा कार्य करेगा? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के सामने आता है तो उसे पवित्र दृष्टिकोण के साथ सही और उचित होना चाहिए, व्यवस्था युग के याजकों की तरह जो सभी बलि देते हुए घुटनों के बल बैठते थे। प्रार्थना करना कोई साधारण बात नहीं है। किसी व्यक्ति के लिए यह कैसे व्यावहार्य हो सकता है कि वह परमेश्वर के सामने अपने तीखे दाँत दिखाते और अपने पंजों का प्रदर्शन करते हुए आए, या अपनी रज़ाई में दुबककर लेटे-लेटे ही प्रार्थना करे और यह माने कि परमेश्वर उसे सुन सकता है? यह धर्मनिष्ठा नहीं है! इस बातचीत में मेरा उद्देश्य यह माँग करना नहीं है कि लोग किसी विशेष नियम का अनुसरण करें; कम से कम, उनके हृदय तो परमेश्वर उन्मुख होने चाहिए और उसके सामने पवित्र दृष्टिकोण के साथ आना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'प्रार्थना के मायने और उसका अभ्यास' से उद्धृत

हालाँकि, प्रार्थना के लिए घुटनों के बल बैठना परमेश्वर के साथ दिल खोलकर बात करना है, यह जान लो: लोगों की प्रार्थनाएँ पवित्र आत्मा के कार्य की वाहिकाएँ भी होती हैं। जब कोई सही दशा वाला व्यक्ति प्रार्थना करता है या कुछ माँगता है, तो पवित्र आत्मा भी कार्य कर रहा होता है। यह परमेश्वर और मनुष्य के बीच दो भिन्न नज़रियों से अच्छा तालमेल है या यह भी कहा जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के कुछ मसलों को सुलझाने में उसकी मदद करता है और जब लोग परमेश्वर के सामने आते हैं तो यह एक तरह का सहयोग होता है। यह उन तरीकों में से भी एक है जिनसे परमेश्वर लोगों को बचाता है और उन्हें स्वच्छ बनाता है और उससे भी ज़्यादा, यह सामान्य जीवन प्रवेश का एक मार्ग है। यह कोई रस्म नहीं है। प्रार्थना केवल एक ऐसी चीज़ नहीं है जो कि लोगों को ऊर्जा देती है; अगर ऐसा होता तो इसे लापरवाही से निपटाना और कुछ दोहों का उच्चारण करना भी काफ़ी होता और तब परमेश्वर से किसी भी चीज़ के लिए प्रार्थना करने, या आराधना या धर्मनिष्ठा की ज़रूरत ही नहीं होती। प्रार्थना एक गहन महत्व की चीज़ हैं! अगर तुम प्रार्थना करने का तरीका जानते हो और अक्सर प्रार्थना करते हो तो ऐसी अक्सर की जाने वाली, परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी और विवेकसम्मत प्रार्थनाओं के साथ, तुम्हारी आंतरिक दशा ज़्यादातर सामान्य रहेगी। वहीं, दूसरी ओर अगर तुम्हारी प्रार्थना में प्रायः कुछ दोहे ही होते हैं और तुम स्वयं पर कोई बोझ नहीं लेते और इस पर विचार नहीं करते कि प्रार्थना में क्या कहना विवेकसम्मत होगा और क्या नहीं, न ही यह सोचते हो कि क्या कहना सम्मानजनक नहीं होगा और इन मामलों को कभी गंभीरता से नहीं लेते तो तुम्हें अपनी प्रार्थना में कभी सफलता नहीं मिलेगी और तुम्हारी आंतरिक दशा हमेशा असामान्य ही रहेगी। तुम सामान्य समझ, सच्चा समर्पण, सच्ची आराधना और वह परिप्रेक्ष्य जिससे प्रार्थना की जानी चाहिए, इसके सबक को कभी गहराई से नहीं सीख पाओगे और न ही इनमें गहरे प्रवेश कर पाओगे। ये सभी गूढ़ मसले हैं। चूँकि तुममें से अधिकतर लोग शायद ही कभी मुझसे सीधे बातचीत करते हैं, इसलिए तुम आत्मा के सामने प्रार्थना करने तक ही सीमित रहते हो, और जब तुम प्रार्थना करना शुरू करते हो तो यह सवाल उठ खड़ा होता है कि तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्द विवेकसंगत हैं या नहीं; क्या तुम सच में श्रद्धालु हो; क्या तुम जो माँग रहे हो उसे परमेश्वर की स्वीकृति मिल सकती है; क्या तुम्हारी प्रार्थना में कोई लेन-देन वाला तत्त्व है या क्या उसमें मानवीय अशुद्धियों की मिलावट है; क्या तुम्हारी वाणी, व्यवहार और निर्णय सत्य के अनुरूप हैं; क्या तुम्हारे मन में परमेश्वर के प्रति विशेष श्रद्धा, आदर और आज्ञाकारिता है; और क्या तुम वास्तव में परमेश्वर को परमेश्वर मानकर उसके साथ व्यवहार करते हो। प्रार्थना में जो कुछ व्यक्ति अकेले में कहता है, उसे गंभीरता से लेना चाहिए, और उसके प्रति गंभीर दृष्टिकोण अपनाना चाहिए; केवल इसी तरह मसीह के सामने आने पर तुममें सामान्य बोध हो सकता है। अगर तुम इसे आत्मा के सामने गंभीरता से नहीं लेते, तो मसीह के सामने आने पर तुम हमेशा प्रतिरोधी होगे, या तुम अनुचित बात करोगे, या बेईमानी से बोलोगे, या लगातार अपनी वाणी और कार्यों से व्यवधान पैदा करोगे, और बाद में तुम हमेशा तिरस्कृत महसूस करोगे। तुम हमेशा तिरस्कृत क्यों महसूस करोगे? क्योंकि आम तौर पर तुम्हें परमेश्वर की आराधना या उसके साथ व्यवहार करने के ढंग से संबंधित सत्यों का जरा-भी ज्ञान नहीं है, इसलिए जब तुम किसी समस्या का सामना करते हो तो तुम भ्रमित होते हो, और नहीं जानते कि अभ्यास कैसे करें, और लगातार गलतियाँ करते हो। परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों को उसकी उपस्थिति में कैसे आना चाहिए? प्रार्थना के माध्यम से जाँच करने के लिए व्यक्ति को विवेक के साथ कैसे बोलना है, व्यक्ति को उस स्थिति से कैसे बोलना है जिसमें मनुष्य को होना चाहिए, आज्ञाकारिता की स्थिति से कैसे बोलना है, जब व्यक्ति आंतरिक उथल-पुथल महसूस कर रहा हो या जब वह यह न कह पाए कि उसका क्या मतलब है, तब कैसे बोलना है, और दिल से कैसे बोलना है या सच कैसे बोलना है। जब तुम कुछ समय के लिए इसका अभ्यास करने के बाद परमेश्वर की उपस्थिति में आओगे, तो तुम इसमें बहुत बेहतर होगे। सामान्यतया, आत्मा की उपस्थिति में तुम्हारी प्रार्थनाएँ विवेकसंगत नहीं होतीं—तुमने इसे कभी कोई महत्व नहीं दिया है, और तुम यह तक मानते हो कि परमेश्वर ध्यान नहीं देता, इसलिए तुम जो चाहे कह सकते हो, और अगर तुम कुछ गलत कहते हो तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। तुम दिन भर लापरवाह और भ्रमित रहते हो, और परिणामस्वरूप, जब तुम मसीह की उपस्थिति में आते भी हो, तो तुम डरते हो कि कुछ गलत न कह या कर दो। लेकिन जितना अधिक तुम चीजों को गलत करने से डरते हो, उतना ही तुम उन्हें गलत कर देते हो, और तुम इसे कभी भी ठीक नहीं कर सकते। और चूँकि तुम मसीह के सतत संपर्क में नहीं रह सकते या मसीह को खुद से आमने-सामने बात करते हुए नहीं सुन सकते, इसलिए तुम केवल इतना ही कर पाते हो कि प्रार्थना, खोज और आत्मसमर्पण के लिए अक्सर आत्मा की उपस्थिति में आते हो। ऐसा इसलिए है, क्योंकि अगर मैं तुमसे आमने-सामने बात कर भी लूँ, तो भी तुम्हें इस मार्ग पर चलने के लिए खुद पर भरोसा करना होगा। अब से तुम लोगों को इस पर अधिक ध्यान देना चाहिए कि प्रार्थना करते समय तुम क्या कहते हो। धीरे-धीरे, समय के साथ प्रार्थना करने, विचार करने और महसूस करने का प्रयास करो, और फिर, जब पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध कर देगा, तो तुम इस संबंध में प्रगति कर चुके होगे। जब पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध करता है, तब तुम्हें जो अनुभूति होती है, वह विशेष रूप से सूक्ष्म होती है। ऐसी कुछ सूक्ष्म अनुभूतियाँ और सूक्ष्म ज्ञान होने के बाद अगर तुम कुछ करते हो, या मसीह के संपर्क में आते हुए कुछ चीजों का ध्यान रखते हो, तो तुम यह पहचानने में सक्षम होगे कि कौन-से शब्द अच्छे भाव से बोले जाते हैं और कौन-से नहीं, कौन-सी चीजें अच्छी भावना के साथ की जाती हैं और कौन-सी नहीं। तुमने प्रार्थना के उद्देश्य प्राप्त कर लिए होंगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'प्रार्थना के मायने और उसका अभ्यास' से उद्धृत

प्रार्थना मुख्य रूप से ईमानदारी से बोलना है। "हे परमेश्वर! तुम मनुष्य के भ्रष्टाचार को जानते हो। आज मैंने एक और अनुचित काम किया है। मेरे मन में एक मंशा थी—मैं एक धोखेबाज व्यक्ति हूँ। मैं तुम्हारी इच्छा या सत्य के अनुसार काम नहीं कर रहा था। मैंने अपनी मर्जी से काम किया और खुद को सही ठहराने की कोशिश की। अब मैं अपने भ्रष्टाचार को पहचान गया हूँ। मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे और अधिक प्रबुद्ध करो और मुझे सत्य समझाओ, ताकि मैं इसे व्यवहार में लाऊँ और इन भ्रष्टाचारों का त्याग करूँ।" इस तरह बोलो; तथ्यात्मक मामलों का तथ्यात्मक लेखा-जोखा दो। अधिकांश लोग वास्तव में ज़्यादातर समय प्रार्थना नहीं करते हैं; अपने मन में अपर्याप्त ज्ञान और पश्चाताप की इच्छा लेकर वे केवल अतीत के बारे में सोचते हैं, फिर भी उन्होंने न तो सत्य पर चिंतन-मनन किया होता है और न ही उसकी थाह ली होती है। प्रार्थना करते समय परमेश्वर के वचनों पर चिंतन-मनन करना और सत्य की तलाश करना, केवल अनुस्मरण और ज्ञान से कहीं अधिक गहरा होता है। पवित्र आत्मा के कार्य से तुम्हारे भीतर हुआ मंथन और परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पवित्र आत्मा के कार्य से तुम्हें मिली प्रबुद्धता और प्रकाश, तुम्हें सच्चे ज्ञान और सच्चे पश्चाताप की ओर ले जाते हैं; वे मानवीय विचारों और ज्ञान की तुलना में बहुत अधिक गहन होते हैं। यह एक ऐसी चीज़ है जिसे तुम्हें अच्छी तरह से जानना चाहिए। यदि तुम केवल सतही, बेतरतीब सोच और जाँच में संलग्न रहते हो, यदि तुम्हारे पास अभ्यास करने का कोई उपयुक्त मार्ग नहीं है, और तुम सच्चाई की ओर बहुत कम प्रगति करते हो, तो तुम परिवर्तन के लिए अक्षम रहोगे। उदाहरण के लिए, ऐसे मौके होते हैं जब लोग खुद को परमेश्वर के लिए गंभीरता से खपाने और उसके प्रेम के बदले प्रेम देने का संकल्प लेते हैं—फिर भी, हो सकता है कि इस इच्छा के साथ भी तुम खुद को अधिक ऊर्जा के साथ खपा न सको, और तुम्हारा दिल पूरी तरह प्रयास करने के लिए प्रतिबद्ध न हो। बहरहाल, यदि, प्रार्थना करके और द्रवित होकर तुम एक निश्चय करते हो और कहते हो, "परमेश्वर, मैं कष्ट सहने को तैयार हूँ; मैं तुम्हारे परीक्षणों को स्वीकार करने और पूरी तरह से तुम्हारे प्रति समर्पित होने के लिए तैयार हूँ। चाहे मेरी पीड़ा कितनी भी बड़ी क्यों न हो, मैं तुम्हारे प्रेम का ऋण चुकाने के लिए तैयार हूँ। मैं तुम्हारे महान प्रेम का आनंद लेता हूँ, और तुमने मुझे ऐसे ही बड़ा किया है—इसके लिए, मैं तहेदिल से तुम्हें धन्यवाद देता हूँ, और तुम्हें सारी महिमा अर्पित करता हूँ," तो इस तरह की प्रार्थना करने के बाद, तुम्हारा पूरा शरीर सशक्त हो जाएगा, और तुम्हारे पास अभ्यास करने के लिए एक मार्ग होगा। प्रार्थना का प्रभाव ऐसा होता है। एक व्यक्ति के प्रार्थना करने के बाद, पवित्र आत्मा उस पर काम करने लगता है, उसे प्रबुद्ध, प्रकाशित और मार्गदर्शित करता है, और सत्य को व्यवहार में लाने के लिए आवश्यक आस्था और साहस प्रदान करता है। ऐसे लोग हैं जो इस तरह के किसी परिणाम को प्राप्त किए बिना प्रतिदिन परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, फिर भी, उन्हें पढ़ने के बाद, जब वे उनके बारे में संगति करते हैं, तो उनके दिल उज्ज्वल हो जाते हैं, और उन्हें आगे बढ़ने का कोई मार्ग मिल जाता है। यदि, इसके अतिरिक्त, पवित्र आत्मा तुम्हें थोड़ा द्रवित करता है और तुम्हें थोड़ा मार्गदर्शन देता है, साथ ही थोड़ा दायित्व भी देता है, तो परिणाम वास्तव में बहुत भिन्न होंगे। जब तुम परमेश्वर के वचनों को अपने आप पढ़ते हो, तो तुम कुछ हद तक द्रवित हो सकते हो, और तुम रो सकते हो, (लेकिन) बस थोड़ी देर बाद ही यह भावना चली जाती है। बहरहाल, यदि तुम एक आँसू-भरी प्रार्थना, एक ईमानदार प्रार्थना, या एक सच्ची और नेक प्रार्थना प्रस्तुत करते हो, तो तुम्हें ऐसी ऊर्जा दी जाएगी जो कई दिनों तक बनी रह सकती है। प्रार्थना का प्रभाव ऐसा होता है। प्रार्थना का उद्देश्य यह होता है कि लोग परमेश्वर के सामने आएँ और उसे स्वीकार करें जो वह उन्हें देगा। यदि तुम अक्सर प्रार्थना करते हो, और परमेश्वर के साथ बात-चीत करने के लिए अक्सर उसके सामने आते हो, और उसके साथ एक सामान्य संबंध रखते हो, तो तुम हमेशा उसके द्वारा अंदर से द्रवित किए जाओगे, और हमेशा उसके प्रावधानों को प्राप्त करोगे—और जो हमेशा परमेश्वर के प्रावधानों को पाता है, उसमें बदलाव आ जाता है, और उसकी स्थितियों में निरंतर सुधार होता रहता है। विशेष रूप से, जब भाई-बहन मिलकर प्रार्थना करते हैं, तो उसके बाद एक विशेष रूप से महान ऊर्जा पैदा होती है, और उन्हें लगता है कि उन्होंने बहुत कुछ हासिल किया है। हकीक़त में, हो सकता है कि उन्होंने संगति में मिलकर अपना अधिक समय न बिताया हो; यह तो प्रार्थना थी जिसने उन्हें जगाया, इस तरह से कि मानो वे अपने परिवार और इस दुनिया को त्यागने के लिए एक पल का भी और इंतज़ार नहीं कर सकते थे, वे कुछ भी नहीं चाहते थे, और केवल परमेश्वर का होना ही पर्याप्त था। कितनी महान आस्था है यह! पवित्र आत्मा के कार्य से मनुष्य को जो शक्ति मिलती है वह अनंत आनंद दे सकती है! खुद को तानकर और गर्दन अकड़ कर चलते हुए या अपनी दृढ़ता और इच्छाशक्ति पर निर्भर करते हुए, उस शक्ति पर भरोसा किए बिना, तुम कितनी दूर जा सकते हो? वो जगह ज़्यादा दूर न होगी जहाँ तुम गिर पड़ोगे और अपमानित होगे; चलते-चलते तुम्हारी ताक़त चूक जाएगी। लोगों को अंत तक परमेश्वर के साथ संपर्क बनाए रखना चाहिए! फिर भी मनुष्य, चलते-चलते, परमेश्वर से बहुत दूर भटक जाता है। परमेश्वर तो परमेश्वर है, मनुष्य मनुष्य है, और ये अपने-अपने मार्ग पर चलते हैं; परमेश्वर, परमेश्वर के वचनों को बोलता है, और मनुष्य, अपनी राह पकड़ता है, जो परमेश्वर की राह नहीं होती है। जब कोई व्यक्ति परमेश्वर में अपने विश्वास की शक्ति खो देता है, तो वह परमेश्वर के सामने प्रार्थना में चंद शब्दों को कहने और कुछ शक्ति उधार लेने आता है। कुछ ऊर्जा मिलने के बाद, वह एक बार फिर चल देता है। कुछ समय बाद, उसका ईंधन ख़त्म होने लगता है, और कुछ अधिक के लिए वह परमेश्वर के पास वापस आता है। इस तरह से काम करते हुए, कोई व्यक्ति लंबे समय तक इसे निभा नहीं सकता है; यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को छोड़ देता है, तो उसके पास आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'प्रार्थना के मायने और उसका अभ्यास' से उद्धृत

मैं देखता हूँ कि कई लोगों में अब खुद पर संयम रखने की क्षमता की विशेष रूप से कमी होती है। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे कभी प्रार्थना नहीं करते। जब लोग प्रार्थना नहीं करते, तो वे दुर्व्यसनी हो जाते हैं, और जब लोग दुर्व्यसनी होते हैं, तो वे अपने शील और अपनी विनम्रता को खो देते हैं। वे मानवता, सत्यनिष्ठा और स्वयं के भ्रष्ट स्वभाव को जानने की केवल बातें ही करते हैं। जहाँ तक प्रश्न यह है कि पवित्र आत्मा वस्तुतः कैसे कार्य करता है, वह लोगों को कैसे द्रवित करता है, और लोगों को अपने दैनिक जीवन में कैसे परमेश्वर की इच्छा की तलाश करनी चाहिए—ये सभी चीज़ें लुप्त हो जाती हैं। लोग अपने दिलों में बस यह विश्वास रखते हैं कि सचमुच एक परमेश्वर है, और उनके विश्वास में जो कुछ भी बचता है, वह परमेश्वर को मानना है; आत्मा के जीवन के मामले महत्व खो देते हैं। उनका विश्वास केवल भौतिक दुनिया तक होता है और वे आत्मा के मामलों से इनकार करते हैं, और इसलिए, जब वे अपने ही दम पर चलते हैं, तो वे भटक जाते हैं और गिर पड़ते हैं। जब कोई ऐसा व्यक्ति जो प्रार्थना नहीं करता, सत्य का अभ्यास करता है तो वह केवल एक निश्चित दायरे में ही किसी सिद्धांत को थामे रह सकता है—ये सब नियम मात्र होते हैं। हालाँकि, हो सकता है कि तुम अपने कार्यों में ऊपर से आई व्यवस्थाओं का पालन करते हो और परमेश्वर को नाराज नहीं करते हो, लेकिन फिर भी तुम केवल नियमों का पालन ही कर रहे हो। लोगों की आत्माएँ अब बहुत जड़ और शिथिल हैं। परमेश्वर के साथ मनुष्य के संबंधों में कई जटिल बातें होती हैं, जैसे कि आत्मा द्वारा द्रवित और प्रबुद्ध होना। मनुष्य इन चीज़ों को महसूस नहीं कर पाता—वह बहुत जड़ हो गया है! मनुष्य परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ता, वह आत्मा के जीवन के मामलों के संपर्क में नहीं है, और वह स्वयं अपनी स्थिति का नियंत्रण हासिल नहीं कर सकता है। आत्मा के जीवन की अपनी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए, प्रार्थना नहीं करने से बात नहीं बनेगी, और न ही कलीसिया का जीवन न जीने से कोई बात बनेगी। क्या तुम लोगों को ऐसा महसूस होता है? परमेश्वर में विश्वास करने के लिए, व्यक्ति को प्रार्थना करनी होगी; प्रार्थना के बिना, परमेश्वर में विश्वास की कोई सदृशता नहीं होती है। मैं कहता हूँ, तुम्हें नियमों से चिपके रहने की आवश्यकता नहीं है—तुम कहीं भी और कभी भी प्रार्थना कर सकते हो—और इसलिए कुछ ऐसे हैं जो शायद ही कभी प्रार्थना करते हैं। वे सुबह उठने पर प्रार्थना नहीं करते हैं, बल्कि परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश मात्र पढ़ते हैं और भजन सुनते हैं। दिन में, वे खुद को बाहरी मामलों में व्यस्त रखते हैं, और रात को सोने के लिए लेटने से पहले भी वे प्रार्थना नहीं करते हैं। क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता? यदि तुम परमेश्वर के वचनों को केवल पढ़ते हो और प्रार्थना नहीं करते हो, तो क्या तुम उसके वचनों को पढ़ रहे किसी अविश्वासी की तरह नहीं हो, जिसमें ये वचन आत्मसात नहीं होते? प्रार्थना के बिना, हृदय संलग्न नहीं होता, और व्यक्ति की आत्मा में कोई सूक्ष्म भावनाएँ या हलचल नहीं होती। व्यक्ति जड़ और शिथिल रहता है; वह स्वभाव के परिवर्तन से संबंधित बातों को सतही रूप से कहता है, और वह परमेश्वर में विश्वास करता हुआ प्रतीत तो होता है, फिर भी उसकी आत्मा की गहराई में उसकी भावना इतनी प्रबल नहीं होती है। वह उन लोगों की तरह ही होता है जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते। चाहे वह कैसे भी प्रार्थना करने की कोशिश करे, उसके मुँह से शब्द ही नहीं निकलते। यह बहुत ख़तरनाक है—इसका मतलब यह होता है कि तुम परमेश्वर से बहुत दूर हो, और वह अब तुम्हारे दिल में नहीं है। वस्तुतः, बाहरी मामलों और काम को संभालने, और प्रार्थना करने की भावना में लौट आने, के बीच कोई टकराव नहीं होता है। इनमें न केवल कोई टकराव नहीं होता, बल्कि प्रार्थना करना वास्तव में व्यक्ति के कार्य के लिए अधिक फायदेमंद होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'प्रार्थना के मायने और उसका अभ्यास' से उद्धृत

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