107. सत्य के अभ्यास और अच्छे व्यवहार के बीच भेद के सिद्धांत

(1) यह निर्धारित करो कि क्या कोई अभ्यास परमेश्वर के वचनों पर आधारित है या पवित्र आत्मा के प्रबोधन और प्रकाश के अनुसार किया जाता है, या क्या यह एक ऐसी क्रिया है जो मनुष्य की भावनाओं, प्राथमिकताओं, धारणाओं या कल्पनाओं, या उसके अनुभव पर निर्भर करती है;

(2) यह निर्धारित करो कि कोई उन सच्चाइयों के आधार पर जिन्हें वह समझता है, और सिद्धांतों के अनुरूप, कार्य कर रहा है, या क्या वह बस नियमों से चिपका हुआ है, हरक़तें किए जा रहा है, बाह्यताओं पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, और धारणाओं और कल्पनाओं के बीच जी रहा है;

(3) यह निर्धारित करो कि क्या कोई सचमुच सत्य के अपने अभ्यास में परमेश्वर को समर्पण कर देता है, या क्या वह छोटी-छोटी तुच्छ बातों पर भारी उपद्रव करता है और दूसरों को एक गलत धारणा देता है, जिसके द्वारा वह उन्हें धोखा देता है और परमेश्वर को चकमा देने का प्रयास करता है;

(4) जब कोई अपने कर्तव्य का पालन करता है, तो यह निर्धारित करो कि क्या वह सच्चे दिल से परमेश्वर के लिए खुद को खपाता है, उसके लिए गवाही देने आता है, या क्या उसका काम असावधानीपूर्ण और लापरवाह होता है, वह केवल हरक़तें करता है, और वह परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने के उद्देश्य से कपट और चालबाज़ी में लगा हुआ है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर के वचन को समझो और उसे अभ्यास में लाओ। अपने सारे कामकाज में सिद्धांतवादी बनो, इसका अर्थ नियम में बंधना या बेमन से बस दिखावे के लिए ऐसा करना नहीं है; बल्कि, इसका अर्थ सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के वचन में जीवन व्यतीत करना है। केवल इस प्रकार का अभ्यास ही परमेश्वर को संतुष्ट करता है। जो काम परमेश्वर को प्रसन्न करता हो वह कोई नियम नहीं बल्कि सत्य का अभ्यास होता है। कुछ लोगों में अपनी ओर ध्यान खींचने की प्रवृत्ति होती है। अपने भाई-बहनों की उपस्थिति में वे भले ही कहें कि वे परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हैं, परंतु उनकी पीठ पीछे वे सत्य का अभ्यास नहीं करते और पूरी तरह अलग ही व्यवहार करते हैं। क्या वे धार्मिक फरीसी नहीं हैं? एक ऐसा व्यक्ति जो सच में परमेश्वर से प्यार करता है और जिसमें सत्य है वह परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होता है, परंतु वह बाहर से इसका दिखावा नहीं करता। अगर कभी इस तरह के हालात पैदा हों, तो वह सत्य का अभ्यास करने को तैयार रहता है और अपने विवेक के विरुद्ध जाकर नहीं बोलता है या कार्य नहीं करता। चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, जब कोई बात होती है तो वह अपनी बुद्धि से कार्य करता है और अपने सिद्धांतों पर टिका रहता है। इस तरह का व्यक्ति ही सच्ची सेवा कर सकता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ज़बानी जमा खर्च करते हैं; दिनभर चिंता में भौंहें चढ़ाए अपना समय गँवाते रहते हैं, अच्छा व्यक्ति होने का नाटक करते हैं, और दया के पात्र होने का दिखावा करते हैं। कितनी घिनौनी हरकत है! यदि तुम उनसे पूछो कि "क्या तुम बता सकते हो कि तुम परमेश्वर के ऋणी कैसे हो?" तो वे निरुत्तर हो जाते। यदि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो, तो इस बारे में सार्वजनिक रूप से चर्चा मत करो; बल्कि परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम वास्तविक अभ्यास से दर्शाओ और सच्चे हृदय से उससे प्रार्थना करो। जो लोग परमेश्वर से केवल मौखिक रूप से और बेमन से व्यवहार करते हैं वे सभी पाखंडी हैं, कुछ लोग जब भी प्रार्थना करते हैं, तो परमेश्वर के प्रति आभार व्यक्त करते और पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किए बिना ही रोना आरंभ कर देते हैं। इस तरह के लोग धार्मिक रिवाजों और धारणाओं से ग्रस्त होते हैं; वे लोग हमेशा इन धार्मिक रिवाजों और धारणाओं के साथ जीते हैं, और मानते हैं कि इन कामों से परमेश्वर प्रसन्न होता है और सतही धार्मिकता या दुःखभरे आँसुओं को पसंद करता है। ऐसे बेतुके लोगों से कौन-सी भलाई हो सकती है? कुछ लोग अपनी विनम्रता का प्रदर्शन करने के लिए, दूसरों के सामने बोलते समय अपनी अनुग्रहशीलता का दिखावा करते हैं। कुछ लोग दूसरों के सामने जानबूझकर किसी नितान्त शक्तिहीन मेमने की तरह चापलूसी करते हैं। क्या यह तौर–तरीका राज्य के लोगों के लिए उचित है? राज्य के व्यक्ति को जीवंत और स्वतंत्र, भोला-भाला और स्पष्ट, ईमानदार और प्यारा होना चाहिए, और एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो स्वतंत्रता की स्थिति में जिये। उसमें सत्यनिष्ठा और गरिमा होनी चाहिए, और वो जहाँ भी जाए, वहीँ गवाही दे; ऐसे लोग परमेश्वर और मनुष्य दोनों को प्रिय होते हैं। जो लोग विश्वास में नौसिखिये होते हैं, वो बहुत सारे अभ्यास दिखावे के लिए करते हैं; उन्हें सबसे पहले निपटारे और कष्टों से गुज़रना चाहिए। जिन लोगों के हृदय में परमेश्वर का विश्वास है, वे ऊपरी तौर पर दूसरों से अलग नहीं दिखते, किन्तु उनके कामकाज प्रशंसनीय होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को ही परमेश्वर के वचनों को जीने वाला इंसान समझा जा सकता है। यदि तुम विभिन्न लोगों को उद्धार में लाने के लिए प्रतिदिन सुसमाचार का उपदेश देते हो, लेकिन अंतत:, तुम नियमों और सिद्धांतों में ही जीते रहते हो, तो तुम परमेश्वर को गौरवान्वित नहीं कर सकते। ऐसे लोग धार्मिक पाखंडी होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इंसान को अपनी आस्था में, वास्तविकता पर ध्यान देना चाहिए, धार्मिक रीति-रिवाजों में लिप्त रहना आस्था नहीं है' से उद्धृत

अधिकांश लोग परमेश्वर पर अपने विश्वास में व्यवहार पर विशेष ज़ोर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके व्यवहार में कुछ निश्चित परिवर्तन आते हैं। परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ करने के बाद वे दूसरों के साथ वाद-विवाद करना, लोगों को अपमानित करना और उनके साथ लड़ना-झगड़ना, धूम्रपान और मद्यपान करना, कोई भी सार्वजनिक संपत्ति—चाहे वह एक कील या लकड़ी का तख्ता ही क्यों न हो—चुराना बंद कर देते हैं, और वे इस सीमा तक जाते हैं कि जब भी उन्हें नुकसान उठाने पड़ते हैं या उनके साथ गलत बर्ताव किया जाता है, वे उसे अदालतों में नहीं ले जाते। निस्संदेह, उनके व्यवहार में कुछ परिवर्तन ज़रूर आते हैं। चूँकि, एक बार परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, सच्चा मार्ग स्वीकार करना लोगों को विशेष रूप से अच्छा महसूस करवाता है, और चूँकि अब उन्होंने पवित्र आत्मा के कार्य के अनुग्रह का स्वाद भी चख लिया है, वे विशेष रूप से उत्साहित हैं, और यहाँ तक कि कुछ भी ऐसा नहीं होता है जिसका वे त्याग नहीं कर सकते या जिसे वे सहन नहीं कर सकते। लेकिन फिर भी तीन, पांच, दस या तीस साल तक विश्वास करने के बाद, जीवन-स्वभावों में कोई परिवर्तन न होने के कारण, वे पुराने तौर-तरीके फिर से अपना लेते हैं; उनका अहंकार और घमंड बढ़कर और अधिक मुखर हो जाता है, वे सत्ता और मुनाफे के लिए होड़ करना शुरू कर देते हैं, वे कलीसिया के धन के लिए ललचाते हैं, वे स्वयं अपने हितसाधन के लिए कुछ भी करते हैं, वे रुतबे और सुख-सुविधाओं के लिए लालायित रहते हैं, और वे परमेश्वर के घर के परजीवी बन गए हैं। खासकर अगुआओं के रूप में सेवा करने वाले अधिकांश व्यक्तियों को लोगों द्वारा त्याग दिया जाता है। और ये तथ्य क्या साबित करते हैं? महज व्यवाहारिक बदलाव देर तक नहीं टिकते हैं; अगर लोगों के जीवन-स्वभाव में कोई बदलाव नहीं होता है, तो देर-सबेर उनके पतित पक्ष स्वयं को दिखाएंगे। क्योंकि उनके व्यवहार में परिवर्तन का स्रोत उत्साह है। पवित्र आत्मा द्वारा उस समय किये गए कुछ कार्य का साथ पाकर, उनके लिए उत्साही बनना या अस्थायी दयालुता दिखाना बहुत आसान होता है। जैसा कि अविश्वासी लोग कहते हैं, "एक अच्छा कर्म करना आसान है; मुश्किल तो यह है कि जीवन भर अच्छे कर्म किए जाएँ।" लोग आजीवन अच्छे कर्म करने में असमर्थ होते हैं। एक व्यक्ति का व्यवहार जीवन द्वारा निर्देशित होता है; जैसा भी उसका जीवन है, उसका व्यवहार भी वैसा ही होता है, और केवल जो स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है वही जीवन का, साथ ही व्यक्ति की प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है। जो चीजें नकली हैं, वे टिक नहीं सकतीं। जब परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए कार्य करता है, यह मनुष्य को अच्छे व्यवहार का गुण देने के लिए नहीं होता—परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य लोगों के स्वभाव को रूपांतरित करना, उन्हें नए लोगों के रूप में पुनर्जीवित करना है। इस प्रकार, परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, परीक्षण, और मनुष्य का परिशोधन, ये सभी उसके स्वभाव को बदलने के वास्ते हैं, ताकि वह परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और धर्मनिष्ठा पा सके, और परमेश्वर की सामान्य ढंग से उपासना कर सके। यही परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य है। अच्छी तरह से व्यवहार करना परमेश्वर के प्रति समर्पित होने के समान नहीं है, और यह मसीह के अनुरूप होने के बराबर तो और भी नहीं है। व्यवहार में परिवर्तन सिद्धांत पर आधारित होते हैं, और उत्साह से पैदा होते हैं; वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान पर या सत्य पर आधारित नहीं होते हैं, पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन पर आश्रित होना तो दूर की बात है। यद्यपि ऐसे मौके होते हैं जब लोग जो भी करते हैं, उसमें से कुछ पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, यह जीवन की अभिव्यक्ति नहीं है, और यह बात परमेश्वर को जानने के समान तो और भी नहीं है; चाहे किसी व्यक्ति का व्यवहार कितना भी अच्छा हो, वह इसे साबित नहीं करता कि वे परमेश्वर के प्रति समर्पित हैं, या वे सत्य का अभ्यास करते हैं। व्यवहारात्मक परिवर्तन क्षणिक भ्रम के अलावा कुछ नहीं हैं; वे जोशो-ख़रोश का प्रस्फुटन हैं। उन्हें जीवन की अभिव्यक्ति नहीं माना जा सकता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर' से उद्धृत

भले ही किसी व्यक्ति ने परमेश्वर में आस्था पैदा होने के बाद कितने ही अच्छे काम किए हों, फिर भी कई मामले उनके लिए अब भी अस्पष्ट हो सकते हैं और सत्य की उनकी समझ तो और भी कम हो सकती है—फिर भी, अपने बहुत-से अच्छे कामों के कारण, उन्हें लगता है कि वे परमेश्वर के वचनों में जीने लगे हैं, और उसके प्रति समर्पित हैं, और उसकी इच्छा को पूरी तरह संतुष्ट कर चुके हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि जब कोई प्रतिकूल परिस्थितियाँ पैदा नहीं होतीं, तो तुम वही करते हो जो तुम्हें कहा जाता है; तुम्हें किसी भी कर्तव्य का पालन करने में कोई झिझक नहीं होती, और तुम प्रतिरोध नहीं करते। जब तुम्हें सुसमाचार फैलाने के लिए कहा जाता है तो तुम इस कष्ट को सहन कर लेते हो, और कोई शिकायत नहीं करते, और जब तुम्हें इधर-उधर भागदौड़ करने के लिए कहा जाता है, या कोई शारीरिक श्रम करने के लिए कहा जाता है, तो तुम यह भी कर देते हो। इन दिखावों के कारण तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर के प्रति समर्पित हो और सत्य के एक सच्चे खोजी हो। फिर भी, अगर कोई तुमसे ज्यादा गहराई में जाकर प्रश्न करे और तुमसे पूछे, “क्या तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो? क्या तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसने सच्चे मन से परमेश्वर को समर्पण किया है? एक बदले हुए स्वभाव वाला व्यक्ति?” तो, इस तरह पूछे जाने के बाद, इस तरह जांच के लिए सत्य की कसौटी पर कसे जाने पर तुम में—बल्कि कहना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति में—कमी पाई जाएगी, और न ही कोई व्यक्ति सत्य के अनुसार अभ्यास करने में सचमुच सक्षम है। इसलिए, जब मनुष्य के सभी कृत्यों और कर्मों के मूल, और साथ ही, उसके कृत्यों के सार और प्रकृति को सत्य पर कसा जाता है, तो सभी दोषी ठहराए जाते हैं। इसका क्या कारण है? इसका कारण यह है कि मनुष्य अपने-आपको जानता नहीं है; वह परमेश्वर पर हमेशा अपने तरीके से विश्वास करता है, अपना कर्तव्य अपने तरीके से निभाता है, और अपने तरीके से ही परमेश्वर की सेवा करता है। इससे भी बढ़कर, उसे लगता है कि वह आस्था और तर्कशीलता से भरपूर है, और, आखिर में, उसे लगता है कि उसने बहुत कुछ पा लिया है। वह अनजाने में ही यह समझने लगता है कि वह पहले से ही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप चल रहा है और इसे पूरी तरह से संतुष्ट कर चुका है, और यह कि वह पहले से ही परमेश्वर की अपेक्षाओं पर खरा उतर चुका है और उसकी इच्छा का अनुसरण कर रहा है। अगर तुम इसी तरह महसूस करते हो, या अगर, परमेश्वर में अपने बहुत-से वर्षों के विश्वास में, तुम्हें लगता है कि तुमने कुछ पा लिया है, तब तो तुम्हें अपने बारे में चिंतन के लिए और भी ज्यादा परमेश्वर के सम्मुख लौट आना चाहिए। तुम्हें उस रास्ते पर नजर दौड़ानी चाहिए जिस पर तुम इतने वर्षों की अपनी आस्था के दौरान चलते रहे हो, और यह देखना चाहिए कि क्या परमेश्वर के सम्मुख तुम्हारे सभी कृत्य और तुम्हारा व्यवहार पूरी तरह उसके हृदय के अनुरूप रहे हैं, तुम ऐसा क्या करते हो जो परमेश्वर का प्रतिरोध है, तुम ऐसा क्या करते हो जो परमेश्वर को संतुष्ट करता है, और क्या जो कुछ तुम करते हो वह परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार है और पूरी तरह उसकी इच्छा के अनुरूप है—तुम्हें इन सभी चीजों को लेकर स्पष्ट होना चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

कुछ ऐसे लोग हैं जो खुद को बेहद दयालु मानते हैं। वे कभी दूसरों से नफ़रत या उनका नुकसान नहीं करते, और वे हमेशा ऐसे भाई या बहन की मदद करते हैं जिनका परिवार ज़रूरतमंद होता है, कि कहीं ऐसा न हो कि उनकी समस्या अनसुलझी रह जाये; उनके पास बहुत सद्भावना है, और वे हर किसी की मदद करने की भरसक कोशिश करते हैं। ऐसी मदद का परिणाम क्या है? उन्होंने अपने जीवन को रोक रखा है, फिर भी वे खुद से काफी प्रसन्न हैं, और उस सबसे बेहद संतुष्ट हैं जो उन्होंने किया है। इतना ही नहीं, वे इसमें बहुत गर्व का अनुभव करते हैं, यह विश्वास करते हुए कि उन्होंने जो कुछ किया है, वह सब निश्चित रूप से परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए पर्याप्त है, और वे परमेश्वर के सच्चे विश्वासी हैं। वे अपनी स्वाभाविक दयालुता को ऐसी वस्तु के रूप में देखते हैं, जिसका लाभ उठाया जा सकता है, और जैसे ही वे उसे उस रूप में देखते हैं, वे अनिवार्य रूप से इसे सत्य समझने लगते हैं। वास्तव में, वे जो कुछ भी करते हैं, वह मानवीय भलाई है। उन्होंने सत्य की ज़रा भी तलाश नहीं की है, और उनके सभी कार्य व्यर्थ हैं, क्योंकि वे उन्हें मनुष्य के सामने करते हैं, परमेश्वर के सामने नहीं, और वे परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य के अनुसार अभ्यास तो बिलकुल भी नहीं करते। उनका कोई भी कार्य सत्य का अभ्यास नहीं है, और कोई भी कार्य परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं है, वे उसकी इच्छा का पालन तो बिलकुल भी नहीं करते; बल्कि वे मानवीय दया और अच्छे व्यवहार का उपयोग दूसरों की मदद करने के लिए करते हैं। संक्षेप में, वे अपने कार्यों में परमेश्वर की इच्छा की तलाश नहीं करते, न ही वे उसकी अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करते हैं। इसलिए, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, मनुष्य के अच्छे व्यवहार की निंदा की जाती है, और वह परमेश्वर द्वारा स्मरण किए जाने योग्य नहीं होता।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

इंसान के दिखावटी काम क्या दर्शाते हैं? वे देह की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, यहाँ तक कि दिखावे के सर्वोत्तम अभ्यास भी जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करते, वे केवल तुम्हारी अपनी व्यक्तिगत मनोदशा को दर्शा सकते हैं। मनुष्य के बाहरी अभ्यास परमेश्वर की इच्छा को पूरा नहीं कर सकते। तुम निरतंर परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता की बातें करते रहते हो, लेकिन तुम दूसरों में जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकते या परमेश्वर से प्रेम करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते। क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे ऐसे कार्य परमेश्वर को संतुष्ट करेंगे? तुम्हें लगता है कि तुम्हारे कार्य परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं, और वे आत्मिक हैं, किन्तु सच में वे सब बेतुके हैं! तुम मानते हो कि जो तुम्हें अच्छा लगता है और जो तुम करना चाहते हो, वे ठीक वही चीजें हैं जिनसे परमेश्वर आनंदित होता है। क्या तुम्हारी पसंद परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है? क्या मनुष्य का चरित्र परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जो चीज़ तुम्हें अच्छी लगती है, परमेश्वर उसी से घृणा करता है, और तुम्हारी आदतें ऐसी हैं जिन्हें परमेश्वर नापसंद और अस्वीकार करता है। यदि तुम खुद को कृतज्ञ महसूस करते हो, तो परमेश्वर के सामने जाओ और प्रार्थना करो; इस बारे में दूसरों से बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम परमेश्वर के सामने प्रार्थना करने के बजाय दूसरों की उपस्थिति में निरंतर अपनी ओर ध्यान आकर्षित करवाते हो, तो क्या इससे परमेश्वर की इच्छा को पूरा किया जा सकता है? यदि तुम्हारे काम सदैव दिखावे के लिए ही हैं, तो इसका अर्थ है कि तुम एकदम नाकारा हो। ऐसे लोग किस तरह के होते हैं जो दिखावे के लिए तो अच्छे काम करते हैं लेकिन वास्तविकता से रहित होते हैं? ऐसे लोग सिर्फ पाखंडी फरीसी और धार्मिक लोग होते हैं। यदि तुम लोग अपने बाहरी अभ्यासों को नहीं छोड़ते और परिवर्तन नहीं कर सकते, तो तुम लोग और भी ज़्यादा पाखंडी बन जाओगे। जितने ज़्यादा पाखंडी बनोगे, उतने ही ज़्यादा परमेश्वर का विरोध करोगे। और अंत में, इस तरह के लोग निश्चित रूप से हटा दिए जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इंसान को अपनी आस्था में, वास्तविकता पर ध्यान देना चाहिए, धार्मिक रीति-रिवाजों में लिप्त रहना आस्था नहीं है' से उद्धृत

हो सकता है कि परमेश्वर में अपने इतने वर्षों के विश्वास के कारण तुमने कभी किसी को कोसा न हो और न ही कोई बुरा कार्य किया हो, फिर भी अगर मसीह के साथ अपनी संगति में तुम सच नहीं बोल सकते, सच्चाई से कार्य नहीं कर सकते, या मसीह के वचन का पालन नहीं कर सकते; तो मैं कहूँगा कि तुम संसार में सबसे अधिक कुटिल और कपटी व्यक्ति। हो सकता है तुम अपने रिश्तेदारों, मित्रों, पत्नी (या पति), बेटों और बेटियों, और माता पिता के प्रति अत्यंत स्नेहपूर्ण और निष्ठावान हो, और कभी दूसरों का फायदा नहीं उठाते हो, लेकिन अगर तुम मसीह के अनुरूप नहीं पाते हो और उसके साथ समरसता के साथ व्यवहार नहीं कर पाते हो, तो भले ही तुम अपने पड़ोसियों की सहायता के लिए अपना सब कुछ खपा दो या अपने माता-पिता और घरवालों की अच्छी देखभाल करो, तब भी मैं कहूँगा कि तुम धूर्त हो, और साथ में चालाक भी हो। सिर्फ इसलिए कि तुम दूसरों के साथ अच्छा तालमेल बिठा लेते हो या कुछ अच्छे काम कर लेते हो, तो यह न सोचो कि तुम मसीह के अनुरूप हो। क्या तुम लोग सोचते हो कि तुम्हारी उदारता स्वर्ग की आशीष बटोर सकती है? क्या तुम सोचते हो कि थोड़े-से अच्छे काम कर लेना तुम्हारी आज्ञाकारिता का स्थान ले सकता है? तुम लोगों में से कोई भी निपटारा और काट-छांट स्वीकार नहीं कर पाता, और तुम सभी को मसीह की सरल मानवता को अंगीकार करने में कठिनाई होती है। फिर भी तुम सब परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का निरंतर ढोल पीटते रहते हो। तुम्हारी इस तरह की आस्था का तुम पर उचित प्रतिकार फूटेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे सभी जो मसीह से असंगत हैं निश्चित ही परमेश्वर के विरोधी हैं' से उद्धृत

कुछ लोग कठिनायाँ सह सकते हैं; वे कीमत चुका सकते हैं; उनका बाहरी आचरण बहुत अच्छा होता है, वे बहुत आदरणीय होते हैं; और लोग उनकी सराहना करते हैं। क्या तुम लोग इस प्रकार के बाहरी आचरण को, सत्य को अभ्यास में लाना कह सकते हो? क्या तुम लोग कह सकते हो कि ऐसे लोग परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कररहे हैं? लोग बार-बार ऐसे व्यक्तियों को देखकर ऐसा क्यों समझ लेते हैं कि वे परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, वे सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चल रहे हैं, और वे परमेश्वर के मार्ग पर चल रहे हैं? क्यों कुछ लोग इस प्रकार सोचते हैं? इसका केवल एक ही स्पष्टीकरण है। और वह स्पष्टीकरण क्या है? स्पष्टीकरण यह है कि बहुत से लोगों को, ऐसे प्रश्न—जैसे कि सत्य को अभ्यास में लाना क्या है, परमेश्वर को संतुष्ट करना क्या है, और यथार्थ में सत्य-वास्तविकता से युक्त होना क्या है—ये बहुत स्पष्ट नहीं हैं। अतः कुछ लोग अक्सर ऐसे लोगों के हाथों धोखा खा जाते हैं जो बाहर से आध्यात्मिक, कुलीन, ऊँचे और महान प्रतीत होते हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो वाक्पटुता से शाब्दिक और सैद्धांतिक बातें कर सकते हैं, और जिनके भाषण और कार्यकलाप सराहना के योग्य प्रतीत होते हैं, तो जो लोग उनके हाथों धोखा खा चुके हैं उन्होंने उनके कार्यकलापों के सार को, उनके कर्मों के पीछे के सिद्धांतों को, और उनके लक्ष्य क्या हैं, इसे कभी नहीं देखा है। उन्होंने यह कभी नहीं देखा कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं या नहीं, वे लोग सचमुच परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहते हैं या नहीं हैं। उन्होंने इन लोगों के मानवता के सार को कभी नहीं पहचाना। बल्कि, उनसे परिचित होने के साथ ही, थोड़ा-थोड़ा करके वे उन लोगों की तारीफ करने, और आदर करने लगते हैं, और अंत में ये लोग उनके आदर्श बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों के मन में, वे आदर्श जिनकी वे उपासना करते हैं, मानते हैं कि वे अपने परिवार एवं नौकरियाँ छोड़ सकते हैं, और सतही तौर पर कीमत चुका सकते हैं—ये आदर्श ऐसे लोग हैं जो वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, और एक अच्छा परिणाम और एक अच्छी मंज़िल प्राप्त कर सकते हैं। उन्हें मन में लगता है कि परमेश्वर इन आदर्श लोगों की प्रशंसा करता है। उनके ऐसे विश्वास की वजह क्या है? इस मुद्दे का सार क्या है? इसके क्या परिणाम हो सकते हैं? आओ, हम सबसे पहले इसके सार के मामले पर चर्चा करें।

लोगों का दृष्टिकोण, उनका अभ्यास, लोग अभ्यास करने के लिए किन सिद्धांतों को चुनते हैं, और लोग किस चीज़ पर जोर देता है, इन सब बातों का लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाओं का कोई लेना-देना नहीं है। चाहे लोग सतही मसलों पर ध्यान दें या गंभीर मसलों पर, शब्दों एवं सिद्धांतों पर ध्यान दें या वास्तविकता पर, लेकिन लोग उसके मुताबिक नहीं चलते जिसके मुताबिक उन्हें सबसे अधिक चलना चाहिए, और उन्हें जिसे सबसे अधिक जानना चाहिए, उसे जानते नहीं। इसका कारण यह है कि लोग सत्य को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते; इसलिए, लोग परमेश्वर के वचन में सिद्धांतों को खोजने और उनका अभ्यास करने के लिए समय लगाने एवं प्रयास करने को तैयार नहीं है। इसके बजाय, वे छोटे रास्तों का उपयोग करने को प्राथमिकता देते हैं, और जिन्हें वे समझते हैं, जिन्हें वे जानते हैं, उसे अच्छा अभ्यास और अच्छा व्यवहार मान लेते हैं; तब यही सारांश, खोज करने के लिए उनका लक्ष्य बन जाता है, जिसे वे अभ्यास में लाए जाने वाला सत्य मान लेते हैं। इसका प्रत्यक्ष परिणाम ये होता है कि लोग अच्छे मानवीय व्यवहार को, सत्य को अभ्यास में लाने के विकल्प के तौर पर उपयोग करते हैं, इससे परमेश्वर की कृपा पाने की उनकी अभिलाषा भी पूरी हो जाती है। इससे लोगों को सत्य के साथ संघर्ष करने का बल मिलता है जिसे वे परमेश्वर के साथ तर्क करने तथा स्पर्धा करने के लिए भी उपयोग करते हैं। साथ ही, लोग अनैतिक ढंग से परमेश्वर को भी दरकिनार कर देते हैं, और जिन आदर्शों को वे सराहते हैं उन्हें परमेश्वर के स्थान पर रख देते हैं। लोगों के ऐसे अज्ञानता भरे कार्य और दृष्टिकोण का, या एकतरफा दृष्टिकोण और अभ्यास का केवल एक ही मूल कारण है, आज मैं तुम लोगों को उसके बारे में बताऊँगा : कारण यह है कि भले ही लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हों, प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हों, और प्रतिदिन परमेश्वर के कथन पढ़ते हों, फिर भी वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते। और यही समस्या की जड़ है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के हृदय को समझता है, और जानता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है, किस चीज़ से वो घृणा करता है, वो क्या चाहता है, किस चीज़ को वो अस्वीकार करता है, किस प्रकार के व्यक्ति से परमेश्वर प्रेम करता है, किस प्रकार के व्यक्ति को वो नापसंद करता है, लोगों से अपेक्षाओं के उसके क्या मानक हैं, मनुष्य को पूर्ण करने के लिए वह किस प्रकार की पद्धति अपनाता है, तो क्या तब भी उस व्यक्ति का व्यक्तिगत विचार हो सकता है? क्या वह यूँ ही जा कर किसी अन्य व्यक्ति की आराधना कर सकता है? क्या कोई साधारण व्यक्ति लोगों का आदर्श बन सकता है? जो लोग परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं, उनका दृष्टिकोण इसकी अपेक्षा थोड़ा अधिक तर्कसंगत होता है। वे मनमाने ढंग से किसी भ्रष्ट व्यक्ति की आदर्श के रूप में आराधना नहीं करेंगे, न ही वे सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चलते हुए, यह विश्वास करेंगे कि मनमाने ढंग से कुछ साधारण नियमों या सिद्धांतों के मुताबिक चलना सत्य को अभ्यास में लाने के बराबर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

कुछ लोग कहते हैं, "मुझे लगता है अब मैं कुछ सत्यों को व्यवहार में शामिल करने में सक्षम हूँ, ऐसा नहीं है कि मैं सत्य को व्यवहार में ला ही नहीं सकता हूँ। कुछ परिवेशों में, मैं चीजों को सत्य के अनुसार कर सकता हूँ, इसका मतलब है कि मेरी गिनती ऐसे व्यक्तियों में है जो सत्य को व्यवहार में लाते हैं और मेरी गिनती ऐसे व्यक्तियों में हैं जिनके पास सत्य है।" वास्तव में, पहले की में, या जब तुमने पहली बार परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया उसकी तुलना में, इस तरह की परिस्थिति में तुमने थोड़े-बहुत बदलाव का प्रदर्शन किया है। अतीत में, तुम कुछ नहीं समझते थे, न ही तुम जानते थे कि सत्य क्या है या भ्रष्ट स्वभाव क्या है। अब तुम कुछ-कुछ जानने लगे हो और कुछ बढ़िया अभ्यास के तरीके पाने में सक्षम हो गए हो, लेकिन यह बदलाव का बहुत छोटा हिस्सा है; यह में तुम्हारे स्वभाव का सच्चा रुपांतरण नहीं है क्योंकि तुम अपनी प्रकृति से संबंधित उन्नत और गहन सत्यों को अभ्यास में लाने में असमर्थ हो। तुम्हारे अतीत के विपरीत, तुममें निश्चय ही कुछ बदलाव हुआ है, लेकिन यह रूपान्तरण तुम्हारी मानवता में केवल एक छोटा बदलाव है; जब इसकी तुलना सत्य की सर्वोच्च अवस्था से की जाती है, तो तुम लक्ष्य से बहुत दूर नजर आते हो। अर्थात तुम सत्य को व्यवहार में शामिल करने के मामले में लक्ष्य से दूर हो।

कभी-कभी लोग इस प्रकार की अवस्था में होते हैं : भीतर से, वे नकारात्मक नहीं होते, उनमें कुछ उत्साह बाकी होता है परंतु जब बात सत्य के उनके ज्ञान की हो और उसे अमल में लाने की हो, तो उन्हें लगता है कि आगे बढ्ने के लिए उनके पास कोई रास्ता नहीं है और उन्हें इस पहलू में कोई दिलचस्पी नहीं है। यह कैसे हो सकता है? कभी-कभी तुम इस अवस्था को बहुत स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते हो और बाहर से ऐसा वैसा करने के लिए मजबूर होते हो, मगर तुम्हारी वास्तविक कठिनाइयाँ अनसुलझी रह जाती हैं। तुम यह भो सोचते हो : "मैंने कर दिखाया है और अब पूरी तरह समर्पित हो गया हूँ; फिर भी मैं आश्वस्त क्यों महसूस नहीं करता?" यह इसलिए क्योंकि तुम्हारे आचरण और कर्म तुम्हारे अच्छे इरादों पर आधारित हैं; वे व्यक्तिपरक परिश्रम से किए जाते हैं। परंतु तुमने परमेश्वर की इच्छा के तलाशने का प्रयास नहीं किया है और तुमने सत्य की आवश्यकताओं के अनुसार चीजों को नहीं किया है। तुमबहुत-सी बातों में मानक से दूर हो, जिसके परिणास्वरूप तुम हमेशा परमेश्वर की अपेक्षाओं से दूर महसूस करते हो। तुममें आत्मविश्वास नहीं रह जाता, तुम अनजाने में नकारात्मक हो जाते हो। निजी व्यक्तिपरक इच्छाएँ और परिश्रम सत्य की अपेक्षाओं से बहुत अलग हैं; वे अपनी प्रकृति के संबंध में भिन्नता लिए हुए हैं। लोगों के बाहरी कर्म सत्य का स्थान नहीं ले सकते हैं, और ऐसे कार्य पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के अनुसार नहीं किए जाते हैं; बल्कि, सत्य ही ईश्वर की इच्छा की सही अभिव्यक्ति है। कुछ लोग जो सुसमाचार का प्रचार प्रसार करते हैं वे सोचते हैं, "मैंनिष्क्रिय नहीं हूँ। तुम कैसे कह सकते हो कि मैं सत्य को व्यवहार में नहीं लाता हूँ?" मैं तुमसे यह पूछता हूँ : तुम्हारे हृदय में कितना सत्य है? सुसमाचार का प्रचार-प्रसार करते समय, क्या तुमने सत्य के अनुसार काम किए हैं? क्या तुम परमेश्वर की इच्छा को समझते हो? तुम यह भी नहीं कह सकते कि तुम केवल काम कर रहे हो या सत्य को व्यवहार में ला रहे हो, क्योंकि तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने और परमेश्वर को खुश करने के लिए केवल अपने अभ्यास पर ज़ोर दे रहे हो। तुम "परमेश्वर को संतुष्ट करने और सत्य के अनुरूप होने के लिए सभी कामों में परमेश्वर की इच्छा को तलाशने" के दृढ़ निश्चय के साथ परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान बिलकुल नहीं करते। अगर तुम कहते हो कि तुम सत्य को व्यवहार में ला रहे हो, तो फिर इस दौरान तुम्हारे स्वभाव में कितना परिवर्तन हुआ है? ईश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कितना अधिक बढ़ा है? इन बातों से अपनी तुलना करना यह निर्धारित कर सकता है कि तुम सत्य को व्यवहार में ला रहे हो या नहीं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी प्रकृति को समझना और सत्य को व्यवहार में लाना' से उद्धृत

सही मायनों में सत्य को अमल में लाने के क्या मानदंड हैं? तुम सत्य को अमल में ला रहे हो या नहीं, इसे कैसे मापा और परिभाषित किया जाता है? परमेश्वर कैसे तय करता है कि तुम उसके वचनों को सुनकर उन्हें स्वीकार करने वाले इंसान हो? वह यह देखता है कि उसमें आस्था रखने और उसके उपदेशों को सुनने के दौरान तुम्हारी आंतरिक अवस्था में, उसके प्रति तुम्हारी अवज्ञा में और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव के विभिन्न आयामों के सार में कोई परिवर्तन आया है या नहीं। वह देखता है कि तुम्हारे अंदर उनका स्थान सत्य ने लिया है या नहीं और क्या तुम्हारे बाहरी बर्ताव और कार्यकलापों में या तुम्हारे दिल की गहराई में छिपे भ्रष्ट स्वभाव के सार में कोई बदलाव आया है या नहीं। परमेश्वर तुम्हें इन मानदंडों पर कसता है। इन तमाम वर्षों में उपदेश सुनकर और परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से तुम में आया बदलाव मात्र सतही है या आधारभूत? क्या तुम्हारे स्वभाव में बदलाव आए हैं? परमेश्वर के बारे में तुम्हारी गलतफहमियों में, परमेश्वर के प्रति तुम्हारी अवज्ञा में और परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपे गए आदेशों और कर्तव्यों के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण में बदलाव आए हैं या नहीं? परमेश्वर के विरुद्ध तुम्हारी अवज्ञा में कोई कमी आई है या नहीं? किसी घटना के घट जाने पर, जब तुम्हारी अवज्ञा उजागर हो जाती है, तो क्या तुम आत्म-चिंतन करते हो? क्या तुम अवज्ञाकारी हो? क्या परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपे जाने वाले आदेशों और कर्तव्यों के प्रति तुम और अधिक निष्ठावान हो गए हो और क्या यह निष्ठा शुद्ध है? उपदेश सुनने के दौरान, क्या तुम्हारी अभिप्रेरणाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, इच्छाएँ और इरादे शुद्ध हुए हैं? क्या ये मापने के पैमाने नहीं हैं? फिर, परमेश्वर के बारे में तुम्हारी गलतफहमियाँ भी हैं: क्या तुम अभी भी अपनी पुरानी धारणाओं, अज्ञात और अमूर्त कल्पनाओं और निष्कर्षों से चिपके रहते हो? क्या अब भी तुम्हारे अंदर शिकायतें और नकारात्मक भावनाएँ हैं? क्या इन चीज़ों को लेकर तुम में बदलाव आए हैं? यदि इन पहलुओं में कोई बदलाव नहीं आया है, तो फिर तुम किस प्रकार के इंसान हो? इससे एक बात तो सिद्ध होती है: तुम सत्य पर अमल करने वाले इंसान नहीं हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्‍वर के वचनों पर अमल कर के ही स्‍वभाव में बदलाव हो सकता है' से उद्धृत

स्वभाव में रूपांतरण कोई रातोंरात नहीं होता, और न ही इसका मतलब यह है कि सत्य को समझकर तुम प्रत्येक वातावरण में सत्य को अभ्यास में ला पाओगे। इससे मनुष्य की प्रकृति जुड़ी हुई है। ऐसा लग सकता है जैसे तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो, लेकिन वास्तव में, तुम्हारे कृत्यों की प्रकृति यह नहीं दर्शाती कि तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो। कई लोगों के बाहरी व्यवहार निश्चित प्रकार के होते हैं, जैसे, अपने परिवार और काम-धंधे का त्याग करके अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर पाना, इसलिए वो मानते हैं कि वो सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। लेकिन परमेश्वर नहीं मानता कि वो सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। अगर तुम्हारे हर काम के पीछे व्यक्तिगत इरादे हों और यह दूषित हो, तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर रहे हो; तुम्हारा आचरण केवल बाहरी दिखावा है। सच कहें, तो परमेश्वर तुम्हारे आचरण की निंदा करेगा; वह इसकी प्रशंसा नहीं करेगा या इसे याद नहीं रखेगा। इसका आगे विश्लेषण करें तो, तुम दुष्टता कर रहे हो, तुम्हारा व्यवहार परमेश्वर के विरोध में है। बाहर से देखने पर तो तुम किसी चीज़ में अवरोध या व्यवधान नहीं डाल रहे हो और तुमने वास्तविक क्षति नहीं पहुंचाई है या किसी सत्य का उल्लंघन नहीं किया है। यह न्यायसंगत और उचित लगता है, मगर तुम्हारे कृत्यों का सार दुष्टता करने और परमेश्वर का विरोध करने से संबंधित है। इसलिए परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में अपने कृत्यों के पीछे के अभिप्रायों को देखकर तुम्हें निश्चित करना चाहिए कि क्या तुम्हारे स्वभाव में कोई परिवर्तन हुआ है, क्या तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो। यह इस इंसानी नज़रिए पर निर्भर नहीं करता कि तुम्हारे कृत्य इंसानी कल्पनाओं और इरादों के अनुरूप हैं या नहीं या वो तुम्हारी रुचि के उपयुक्त हैं या नहीं; ऐसी चीज़ें महत्वपूर्ण नहीं हैं। बल्कि, यह इस बात पर आधारित है कि परमेश्वर की नज़रों में तुम उसकी इच्छा के अनुरूप चल रहे हो या नहीं, तुम्हारे कृत्यों में सत्य-वास्तविकता है या नहीं, और वे उसकी अपेक्षाओं और मानकों को पूरा करते हैं या नहीं। केवल परमेश्वर की अपेक्षाओं से तुलना करके अपने आपको मापना ही सही है। स्वभाव में रूपांतरण और सत्य को अभ्यास में लाना उतना सहज और आसान नहीं है जैसा लोग सोचते हैं। क्या तुम लोग अब इस बात को समझ गए? क्या इसका तुम सबको कोई अनुभव है? जब समस्या के सार की बात आती है, तो शायद तुम लोग इसे नहीं समझ सकोगे; तुम्हारा प्रवेश बहुत ही उथला रहा है। तुम लोग सुबह से शाम तक भागते-दौड़ते हो, तुम लोग जल्दी उठते हो और देर से सोते हो, फिर भी तुम्हारा स्वभाव रूपांतरित नहीं हुआ है, और तुम इस बात को समझ नहीं सकते कि इस रूपांतरण में क्या-क्या चीज़ें शामिल हैं। इसका अर्थ है कि तुम्हारा प्रवेश बहुत ही उथला है, है न? भले ही तुम अधिक समय से परमेश्वर में आस्था रखते आ रहे हो, लेकिन हो सकता है कि तुम लोग स्वभाव में रूपांतरण हासिल करने के सार और उसकी गहराई को महसूस न कर सको। क्या यह कहा जा सकता है कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है? तुम कैसे जानते हो कि परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा करता है या नहीं? कम से कम, तुम अपने हर काम में ज़बर्दस्त दृढ़ता महसूस करोगे और तुम महसूस करोगे कि जब तुम अपने कर्तव्यों को पूरा कर रहे हो, परमेश्वर के घर में कोई काम कर रहे हो, या सामान्य तौर पर भी, पवित्र आत्मा तुम्हारा मार्गदर्शन और प्रबोधन कर रहा है और तुममें कार्य कर रहा है। तुम्हारा आचरण परमेश्वर के वचनों के अनुरूप होगा, और जब तुम्हारे पास कुछ हद तक अनुभव हो जाएगा, तो तुम महसूस करोगे कि अतीत में तुमने जो कुछ किया वह अपेक्षाकृत उपयुक्त था। लेकिन अगर कुछ समय तक अनुभव प्राप्त करने के बाद, तुम महसूस करो कि अतीत में तुम्हारे द्वारा किए गए कुछ काम उपयुक्त नहीं थे, तुम उनसे असंतुष्ट हो, और वास्तव में तुम्हारे द्वारा किए गए कार्यों में कोई सत्यता नहीं थी, तो इससे यह साबित होता है कि तुमने जो कुछ भी किया, वह परमेश्वर के विरोध में था। यह साबित करता है कि तुम्हारी सेवा विद्रोह, प्रतिरोध और मानवीय व्यवहार से भरी हुई थी।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए' से उद्धृत

यदि लोगों को परमेश्वर के बारे में कुछ जानकारी है, वे जानते हैं कि एक सार्थक जीवन कैसे जीना है, और वे परमेश्वर को संतुष्ट करने वाली कुछ चीजें कर सकते हैं, तो वे महसूस करेंगे कि यही वास्तविक जीवन है, केवल इसी तरह से रहने से उनके जीवन का अर्थ होगा, और परमेश्वर को थोड़ी संतुष्टि प्रदान करने और कृतज्ञ महसूस करने के लिए उन्हें इसी तरह से रहना होगा। यदि वे सजगतापूर्वक परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, सत्य को व्यवहार में ला सकते हैं, स्वयं को त्याग सकते हैं, अपने विचारों को छोड़ सकते हैं, और परमेश्वर की इच्छा के प्रति आज्ञाकारी और विचारशील हो सकते हैं—यदि वे इन सभी चीजों को सजगतापूर्वक करने में सक्षम हैं—तो सत्य को सटीक रूप से व्यवहार में लाने, और सत्य को वास्तव में व्यवहार में लाने का यही अर्थ है, और यह उनकी कल्पनाओं पर उनकी पिछली निर्भरता और सिद्धांतों और नियमों से चिपके रहने से बिलकुल भिन्न है। वास्तव में, जब वे सत्य को नहीं समझते तो उनका कुछ भी करना थकाऊ है, सिद्धांतों और नियमों से चिपके रहना थकाऊ है, और कोई लक्ष्य न होना और चीज़ों को आँखें मूँदकर करते रहना थकाऊ है। केवल सत्य के साथ ही वे मुक्त हो सकते हैं—यह कोई झूठ नहीं है—और उसके साथ वे चीज़ों को आसानी से और खुशी से कर सकते हैं। ऐसी स्थिति वाले लोग वे लोग हैं, जिनके पास सत्य है; वे ही हैं जिनके स्वभाव बदल दिए गए हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

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