9. दैनिक भक्ति के अभ्यास के सिद्धांत

(1) जब किसी के भ्रष्ट स्वभाव को उजागर किया जाता है, तो उन्हें भक्ति करनी चाहिए। उन्हें आत्म-चिंतन में संलग्न होना चाहिए और परमेश्वर के वचनों में आधारित होकर खुद को जानना चाहिए, और अपने भ्रष्ट स्वभाव की अभिव्यक्ति को हल करना चाहिए;

(2) भक्तिपूर्ण आत्म-चिंतन के लिए परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करना आवश्यक होता है। केवल इसी तरह से कोई व्यक्ति परमेश्वर के लिए अपने दिल को पूरा खोल सकता है, जिससे पवित्र आत्मा का प्रबोधन हासिल किया जा सके और अपने स्वयं के विचलनों को जाना जा सके;

(3) परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में इन बातों पर चिंतन करना आवश्यक है कि जिस मार्ग पर कोई चलता है वह सही है या नहीं, कि कोई अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से निभा रहा है या नहीं, और उस कर्तव्य-पालन को स्वयं के कितने इरादे और उद्देश्य दूषित कर देते हैं।

(4) अपने कर्तव्य को निभाते समय, किसी व्यक्ति को अपनी भूलों और अपने अतिक्रमणों के साथ ही साथ अपनी प्रगति और लाभ की जाँच और उनका विश्लेषण भी करना होगा। केवल इस तरह के अभ्यास से जीवन में प्रगति होती है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर में विश्वास रखने के लिए एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन का होना आवश्यक है, जो कि परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और वास्तविकता में प्रवेश करने का आधार है। क्या तुम सबकी प्रार्थनाओं परमेश्वर के समीप आने, भजन-गायन, स्तुति, ध्यान और परमेश्वर के वचनों पर मनन-चिंतन का समस्त अभ्यास "सामान्य आध्यात्मिक जीवन" के बराबर है? ऐसा नहीं लगता कि तुम लोगों में से कोई भी इसका उत्तर जानता है। एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन प्रार्थना करने, भजन गाने, कलीसियाई जीवन में भाग लेने और परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने जैसे अभ्यासों तक सीमित नहीं है। बल्कि, इसमें एक नया और जीवंत आध्यात्मिक जीवन जीना शामिल है। जो बात मायने रखती है वो यह नहीं है कि तुम अभ्यास कैसे करते हो, बल्कि यह है कि तुम्हारे अभ्यास का परिणाम क्या होता है। अधिकांश लोगों का मानना है कि एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में आवश्यक रूप से प्रार्थना करना, भजन गाना, परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना या उसके वचनों पर मनन-चिंतन करना शामिल है, भले ही ऐसे अभ्यासों का वास्तव में कोई प्रभाव हो या न हो, चाहे वे सच्ची समझ तक ले जाएँ या न ले जाएँ। ये लोग सतही प्रक्रियाओं के परिणामों के बारे में सोचे बिना उन पर ध्यान केंद्रित करते हैं; वे ऐसे लोग हैं जो धार्मिक अनुष्ठानों में जीते हैं, वे ऐसे लोग नहीं हैं जो कलीसिया के भीतर रहते हैं, वे राज्य के लोग तो बिलकुल नहीं हैं। उनकी प्रार्थनाएँ, भजन-गायन और परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, सभी सिर्फ नियम-पालन हैं, जो प्रचलन में है उसके साथ बने रहने के लिए मजबूरी में किए जाने वाले काम हैं। ये अपनी इच्छा से या हृदय से नहीं किए जाते हैं। ये लोग कितनी भी प्रार्थना करें या गाएँ, उनके प्रयास निष्फल होंगे, क्योंकि वे जिनका अभ्यास करते हैं, वे केवल धर्म के नियम और अनुष्ठान हैं; वे वास्तव में परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं कर रहे हैं। वे अभ्यास किस तरह करते हैं, इस बात का बतंगड़ बनाने में ही उनका ध्यान लगा होता है और वे परमेश्वर के वचनों के साथ उन नियमों जैसा व्यवहार करते हैं जिनका पालन किया ही जाना चाहिए। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं ला रहे हैं; वे सिर्फ देह को तृप्त कर रहे हैं और दूसरे लोगों को दिखाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। धर्म के ये नियम और अनुष्ठान सभी मूल रूप से मानवीय हैं; वे परमेश्वर से नहीं आते हैं। परमेश्वर नियमों का पालन नहीं करता है, न ही वह किसी व्यवस्था के अधीन है। बल्कि, वह हर दिन नई चीज़ें करता है, व्यवहारिक काम पूरा करता है। थ्री-सेल्फ कलीसिया के लोग, हर दिन सुबह की प्रार्थना सभा में शामिल होने, शाम की प्रार्थना और भोजन से पहले आभार की प्रार्थना अर्पित करने, सभी चीज़ों में धन्यवाद देने जैसे अभ्यासों तक सीमित रहते हैं—वे इस तरह जितना भी कार्य करें और चाहे जितने लंबे समय तक ऐसा करें, उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। जब लोग नियमों के बीच रहते हैं और अपने हृदय अभ्यास के तरीकों में ही उलझाए रखते हैं, तो पवित्र आत्मा काम नहीं कर सकता, क्योंकि उनके हृदयों पर नियमों और मानवीय धारणाओं का कब्जा है। इस प्रकार, परमेश्वर हस्तक्षेप करने और उन पर काम करने में असमर्थ है, और वे केवल व्यवस्थाओं के नियंत्रण में जीते रह सकते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करने में सदा के लिए असमर्थ होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के विषय में' से उद्धृत

एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन परमेश्वर के सामने जिया जाने वाला जीवन है। प्रार्थना करते समय, एक व्यक्ति परमेश्वर के सामने अपना हृदय शांत कर सकता है, और प्रार्थना के माध्यम से वह पवित्र आत्मा के प्रबोधन की तलाश कर सकता है, परमेश्वर के वचनों को जान सकता है और परमेश्वर की इच्छा को समझ सकता है। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने से लोग उसके मौजूदा कार्य के बारे में अधिक स्पष्ट और अधिक गहन समझ प्राप्त कर सकते हैं। वे अभ्यास का एक नया मार्ग भी प्राप्त कर सकते हैं, और वे पुराने मार्ग से चिपके नहीं रहेंगे; जिसका वे अभ्यास करते हैं, वह सब जीवन में विकास हासिल करने के लिए होगा। जहाँ तक प्रार्थना की बात है, वह कुछ अच्छे लगने वाले शब्द बोलना या यह बताने के लिए तुम परमेश्वर के कितने ऋणी हो, उसके सामने फूट-फूटकर रोना नहीं है; बल्कि इसके बजाय इसका उद्देश्य, आत्मा के उपयोग में अपने आपको प्रशिक्षित करना है, परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत होने देना है, सभी मामलों में परमेश्वर के वचनों से मार्गदर्शन लेने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करना है, ताकि व्यक्ति का हृदय प्रतिदिन नई रोशनी की ओर आकर्षित हो सके, और वह निष्क्रिय या आलसी न हो और परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने के सही मार्ग पर कदम रखे। आजकल अधिकांश लोग अभ्यास के तरीकों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन वे यह सब सत्य का अनुसरण करने और जीवन के विकास को प्राप्त करने के लिए नहीं करते हैं। यहीं पर वे भटक जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो नई रोशनी प्राप्त करने में सक्षम हैं, लेकिन उनके अभ्यास के तरीके नहीं बदलते हैं। वे परमेश्वर के आज के वचनों को प्राप्त करने की इच्छा रखते हुए अपनी पुरानी धर्म-संबंधी धारणाओं को अपने साथ लाते हैं, इसलिए वे जो प्राप्त करते हैं वह अभी भी धर्म-संबंधी धारणाओं से रंगे सिद्धांत हैं; वे आज का प्रकाश प्राप्त कर ही नहीं रहे हैं। नतीजतन, उनके अभ्यास दागदार हैं; नए खोल में लिपटे वही पुराने अभ्यास हैं। वे कितने भी अच्छे ढंग से अभ्यास करें, वे फिर भी ढोंगी ही हैं। परमेश्वर हर दिन नई चीजें करने में लोगों की अगुवाआई करता है, माँग करता है कि प्रत्येक दिन वे नई अंतर्दृष्टि और समझ हासिल करें, और अपेक्षा करता है कि वे पुराने ढंग के और दोहराव करने वाले न हों। अगर तुमने कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, लेकिन फिर भी तुम्हारे अभ्यास के तरीके बिलकुल नहीं बदले हैं, अगर तुम अभी भी ईर्ष्यालु हो और बाहरी मामलों में ही उलझे हुए हो, अभी भी तुम्हारे पास परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने के वास्ते उसके सामने लाने के लिए एक शांत हृदय नहीं है तो तुम कुछ भी नहीं प्राप्त करोगे। जब परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने की बात आती है, तब यदि तुम अलग ढंग से योजना नहीं बनाते, अपने अभ्यास के लिए नए तरीके नहीं अपनाते और किसी नई समझ को पाने की कोशिश नहीं करते, बल्कि अभ्यास के अपने तरीके को बदले बिना, पुराने से चिपके रहते हो और केवल सीमित मात्रा में नया प्रकाश प्राप्त करते हो, तो तुम्हारे जैसे लोग केवल नाम के लिए इस धारा में हैं; वास्तविकता में, वे मज़हबी फरीसी हैं जो पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हैं।

सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए एक व्यक्ति को प्रतिदिन नई रोशनी प्राप्त करने और परमेश्वर के वचनों की समझ का अनुसरण करने में सक्षम होना चाहिए। एक व्यक्ति को सत्य स्पष्ट रूप से देखना चाहिए, सभी मामलों में अभ्यास का मार्ग तलाशना चाहिए, प्रतिदिन परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के माध्यम से नए प्रश्नों की खोज करनी चाहिए, और अपनी कमियों का एहसास करना चाहिए, ताकि उसके पास लालसा और प्रयास करने वाला हृदय हो सके जो उसके पूरे अस्तित्व को प्रेरित करे, वह हर समय परमेश्वर के सामने शांत रह सके और पीछे छूट जाने से बहुत भयभीत हो। इस तरह के लालायित और खोजी हृदय वाला व्यक्ति, जो लगातार प्रवेश पाने का इच्छुक है, वह आध्यात्मिक जीवन के सही मार्ग पर है। जो लोग पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाते हैं, जो बेहतर करने की इच्छा रखते हैं, जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के लिए प्रयास करने को तैयार हैं, जो परमेश्वर के वचनों की गहरी समझ के लिए लालायित हैं, जो अलौकिक का अनुसरण नहीं करते, बल्कि वास्तविक कीमत का भुगतान करते हैं, वास्तव में परमेश्वर की इच्छा की परवाह करते हैं, वास्तव में प्रवेश प्राप्त करते हैं ताकि उनके अनुभव अधिक विशुद्ध और वास्तविक हों, जो खोखले वचनों और सिद्धांतों का अनुसरण नहीं करते या अलौकिकता को महसूस करने का प्रयास नही करते हैं, जो किसी महान व्यक्तित्व की आराधना नहीं करते हैं—ये वे लोग हैं जिन्होंने एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश कर लिया है। वे जो कुछ भी करते हैं, उसका उद्देश्य जीवन में और अधिक विकास प्राप्त करना और स्वयं को आत्मा में ताज़ा और जीवंत बनाना है और वे हमेशा सक्रिय रूप से प्रवेश प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। बिना एहसास किए ही वे सत्य को समझने लगते हैं और वास्तविकता में प्रवेश करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के विषय में' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने से अधिक महत्वपूर्ण कदम कोई नहीं है। यह वह सबक है, जिसमें वर्तमान में सभी लोगों को प्रवेश करने की तत्काल आवश्यकता है। परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने में प्रवेश करने के निम्नलिखित मार्ग हैं :

1. अपने हृदय को बाहरी मामलों से हटा लो, परमेश्वर के समक्ष शांत रहो और अपना एकचित्त ध्यान परमेश्वर से प्रार्थना करने में लगाओ।

2. परमेश्वर के समक्ष शांत हृदय के साथ परमेश्वर के वचनों को खाओ, पीओ और उनका आनंद लो।

3. अपने हृदय में परमेश्वर के प्रेम पर ध्यान लगाओ और उस पर चिंतन करो और परमेश्वर के कार्य पर मनन करो।

सर्वप्रथम प्रार्थना के पहलू से आरंभ करो। एकचित्त होकर तथा नियत समय पर प्रार्थना करो। तुम्हारे पास समय की चाहे कितनी भी कमी हो, तुम कार्य में कितने भी व्यस्त हो, या तुम पर कुछ भी क्यों ना बीते, हर दिन सामान्य रूप से प्रार्थना करो, सामान्य रूप से परमेश्वर के वचनों को खाओ और पीओ। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते रहोगे, तब तक चाहे तुम्हारा परिवेश कैसा भी क्यों ना हो, तुम्हें बहुत आत्मिक आनंद मिलेगा, और तुम लोगों, घटनाओं या अपने आसपास की चीज़ों से प्रभावित नहीं होगे। जब तुम अपने हृदय में साधारण रूप से परमेश्वर का मनन करते हो, तो बाहर जो कुछ भी होता है, वह तुम्हें परेशान नहीं कर सकता। आध्यात्मिक कद काठी प्राप्त करने का यही अर्थ है। प्रार्थना से आरंभ करो : परमेश्वर के सामने शांति के साथ प्रार्थना करना बहुत फलदायक है। इसके पश्चात्, परमेश्वर के वचनों को खाओ और पीओ, उसके वचनों पर मनन करके उनसे प्रकाश पाने का प्रयास करो, अभ्यास करने का मार्ग ढूँढ़ो, परमेश्वर के वचनों को कहने में उसके उद्देश्य को जानो, और उन्हें बिना भटके समझो। साधारणतया, बाहरी चीज़ों से विक्षुब्ध हुए बिना तुम्हारे लिए अपने हृदय में परमेश्वर के निकट आने, परमेश्वर के प्रेम पर मनन करने और उसके वचनों पर चिंतन करने में समर्थ होना सामान्य होना चाहिए। जब तुम्हारा हृदय एक हद तक शांत हो जाएगा, तो चाहे जैसा भी तुम्हारा परिवेश हो, तुम चुपचाप ध्यान लगाने और अपने भीतर परमेश्वर के प्रेम पर मनन करने और वास्तव में परमेश्वर के निकट आने में सक्षम हो जाओगे, जब तक कि अंतत: तुम ऐसी स्थिति में नहीं पहुँच जाओगे जहाँ तुम्हारे हृदय में परमेश्वर के लिए प्रशंसा उमड़ने लगे, और यह प्रार्थना करने से भी बेहतर है। तब तुम एक निश्चित आध्यात्मिक कद काठी के हो जाओगे। यदि तुम ऊपर वर्णित अवस्थाओं में होने की स्थिति प्राप्त कर पाते हो, तो यह इस बात का प्रमाण होगा कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष सच में शांत है। यह पहला बुनियादी सबक है। जब लोग परमेश्वर के सामने शांत होने में सक्षम होते हैं, केवल तभी वे पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श, प्रबुद्ध और रोशन किए जा सकते हैं, और केवल तभी वे परमेश्वर के साथ सच्ची सहभागिता कर पाते हैं और साथ ही परमेश्वर की इच्छा और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन को समझ पाते हैं। तब वे अपने आध्यात्मिक जीवन में सही राह पर प्रवेश कर चुके होंगे। परमेश्वर के सामने रहने का उनका प्रशिक्षण जब एक निश्चित गहराई तक पहुँच जाता है, और वे अपने आपको त्यागने, अपना तिरस्कार करने और परमेश्वर के वचनों में जीने में समर्थ हो जाते हैं, तब उनके हृदय वास्तव में परमेश्वर के समक्ष शांत होते हैं। स्वयं का तिरस्कार करने, स्वयं को कोसने और स्वयं का त्याग करने में समर्थ होना, वह प्रभाव है जो परमेश्वर के कार्य द्वारा प्राप्त होता है, और लोगों के द्वारा अपने दम पर नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार, अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष शांत करने का अभ्यास वह सबक है, जिसमें लोगों को तत्काल प्रवेश करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में' से उद्धृत

यदि तुम सचमुच अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष शांत करना चाहते हो, तो तुम्हें समझदारी के साथ सहयोग का कार्य करना होगा। कहने का अर्थ यह है कि तुममें से प्रत्येक को अपने धार्मिक कार्यों के लिए समय निकालना होगा, ऐसा समय जब तुम लोगों, घटनाओं, और वस्तुओं को खुद किनारे कर देते हो, जब तुम अपने हृदय को शांत कर परमेश्वर के समक्ष स्वयं को मौन करते हो। हर किसी को अपने व्यक्तिगत धार्मिक कार्यों के नोट्स लिखने चाहिए, परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान को लिखना चाहिए और यह भी कि किस प्रकार उसकी आत्मा प्रेरित हुई है, इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए कि वे बातें गंभीर हैं या सतही। सभी को समझ-बूझके साथ परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करना चाहिए। यदि तुम दिन के दौरान एक या दो घंटे एक सच्चे आध्यात्मिक जीवन के प्रति समर्पित कर सकते हो, तो उस दिन तुम्हारा जीवन समृद्ध अनुभव करेगा और तुम्हारा हृदय रोशन और स्पष्ट होगा। यदि तुम प्रतिदिन इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन जीते हो, तब तुम्हारा हृदय परमेश्वर के पास लौटने में सक्षम होगा, तुम्हारी आत्मा अधिक से अधिक सामर्थी हो जाएगी, तुम्हारी स्थिति निरंतर बेहतर होती चली जाएगी, तुम पवित्र आत्मा की अगुआई वाले मार्ग पर चलने के और अधिक योग्य हो सकोगे, और परमेश्वर तुम्हें और अधिक आशीषें देगा। तुम लोगों के आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य समझ-बूझ के साथ पवित्र आत्मा की उपस्थिति को प्राप्त करना है। यह नियमों को मानना या धार्मिक परंपराओं को निभाना नहीं है, बल्कि सच्चाई के साथ परमेश्वर के सांमजस्य में कार्य करना और अपनी देह को अनुशासित करना है। मनुष्य को यही करना चाहिए, इसलिए तुम लोगों को ऐसा करने का भरसक प्रयास करना चाहिए। जितना बेहतर तुम्हारा सहयोग होगा और जितना अधिक तुम प्रयास करोगे, उतना ही अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर लौट पाएगा, और उतना ही अधिक तुम अपने हृदय को परमेश्वर के सामने शांत कर पाओगे। एक निश्चित बिन्दु पर परमेश्वर तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा। कोई भी तुम्हारे हृदय को हिला या जकड़ नहीं पाएगा। और तुम पूरी तरह से परमेश्वर के हो जाओगे। यदि तुम इस मार्ग पर चलते हो, तो परमेश्वर का वचन हर समय अपने आपको तुम पर प्रकट करेगा, और उन सभी चीज़ों के बारे में तुम्हें प्रबुद्ध करेगा जो तुम नहीं समझते—यह सब तुम्हारे सहयोग के द्वारा प्राप्त हो सकता है। इसीलिए परमेश्वर सदैव कहता है, "वे सब लोग जो मेरे साथ सांमजस्य में होकर कार्य करते हैं, मैं उन्हें दुगुना प्रतिफल दूंगा।" तुम लोगों को यह मार्ग स्पष्टता के साथ देखना चाहिए। यदि तुम सही मार्ग पर चलना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए वह सब करना होगा जो तुम कर सकते हो। तुम्हें आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने के लिए वह सब कुछ करना होगा जो तुम कर सकते हो। आरंभ में, तुम शायद इस कोशिश में ज्यादा अच्छे परिणाम प्राप्त न कर पाओ, परंतु तुम्हें अपने आपको नकारात्मकता में पीछे हटने या लड़खड़ाने नहीं देना है—तुम्हें कठिन परिश्रम करते रहना है! जितना अधिक आध्यात्मिक जीवन तुम जीओगे, उतना ही अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर के वचनों से भरा रहेगा, इन बातों के प्रति हमेशा चिंतनशील रहेगा और हमेशा इस बोझ को उठाएगा। उसके बाद, तुम अपने आध्यात्मिक जीवन के द्वारा अपने अंतरतम के सत्यों को परमेश्वर के सामने प्रकट करो, उसे बताओ कि तुम क्या करना चाहते हो, तुम किस विषय में सोच रहे हो, परमेश्वर के वचनों के बारे में अपनी समझ और उनके बारे में अपने दृष्टिकोण बताओ। कुछ भी न छुपाओ, थोडा-सा भी नहीं! अपने मन में परमेश्वर से वचनों को कहने का प्रयास करो, अपनी सच्ची भावनाएँ परमेश्वर के सामने व्यक्त करो; अगर कोई बात तुम्हारे मन में है तो वह बोलने से बिलकुल न हिचको। जितना अधिक तुम इस तरह बोलते हो, उतना अधिक तुम परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करोगे, और तुम्हारा हृदय भी परमेश्वर की ओर उतना ही अधिक आकर्षित होगा। जब ऐसा होता है, तो तुम अनुभव करोगे कि किसी और की अपेक्षा परमेश्वर तुम्हें अधिक प्रिय है। फिर चाहे कुछ भी हो जाए, तुम कभी भी परमेश्वर का साथ नहीं छोड़ोगे। यदि प्रतिदिन तुम इस प्रकार का आध्यात्मिक भक्तिमय समय बिताओ और इसे अपने मन से ओझल न होने दो, बल्कि इसे अपने जीवन की बड़ी महत्ता की वस्तु मानो, तो परमेश्वर का वचन तुम्हारे हृदय को भर देगा। पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श किए जाने का अर्थ यही है। यह ऐसा होगा मानो कि तुम्हारा हृदय हमेशा से परमेश्वर के पास हो, जैसे कि तुम जिससे प्रेम करते हो वह सदैव तुम्हारे हृदय में हो। कोई भी तुमसे उसे छीन नहीं सकता। जब ऐसा होता है, तो परमेश्वर सचमुच तुम्हारे भीतर वास करेगा और तुम्हारे हृदय में उसका एक स्थान होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन लोगों को सही मार्ग पर ले जाता है' से उद्धृत

जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हें इनके सामने अपनी स्थिति की वास्तविकता को मापना चाहिए। यानी, जब तुम्हें अपने वास्तविक अनुभव के दौरान अपनी कमियों का पता चले, तो तुम्हें अभ्यास का मार्ग ढूँढ़ने, गलत अभिप्रेरणाओं और धारणाओं से मुँह मोड़ने में सक्षम होना चाहिए। अगर तुम हमेशा इन बातों का प्रयास करो और इन बातों को हासिल करने में अपने दिल को उँड़ेल दो, तो तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए एक मार्ग होगा, तुम अपने अंदर खोखलापन महसूस नहीं करोगे, और इस तरह तुम एक सामान्य स्थिति बनाए रखने में सफल हो जाओगे। तब तुम ऐसे इंसान बन जाओगे जो अपने जीवन में भार वहन करता है, जिसमें आस्था है। ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, उन्हें अमल में नहीं ला पाते? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि वे सबसे अहम बात को समझ नहीं पाते? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि वे जीवन को गंभीरता से नहीं लेते? वे अहम बात को समझ नहीं पाते और उनके पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होता, उसका कारण यह है कि जब वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो वे उनसे अपनी स्थितियों को जोड़ नहीं पाते, न ही वे अपनी स्थितियों को अपने वश में कर पाते हैं। कुछ लोग कहते हैं : "मैं परमेश्वर के वचनों को पढ़कर उनसे अपनी स्थिति को जोड़ पाता हूँ, और मैं जानता हूँ कि मैं भ्रष्ट हूँ और मेरी क्षमता खराब है, लेकिन मैं परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के काबिल नहीं हूँ।" तुमने केवल सतह को ही देखा है; और भी बहुत-सी वास्तविक चीज़ें हैं जो तुम नहीं जानते : देह-सुख का त्याग कैसे करें, दंभ को दूर कैसे करें, स्वयं को कैसे बदलें, इन चीज़ों में कैसे प्रवेश करें, अपनी क्षमता कैसे बढ़ाएँ और किस पहलू से शुरू करें। तुम केवल सतही तौर पर कुछ चीज़ों को समझते हो, तुम बस इतना जानते हो कि तुम वाकई बहुत भ्रष्ट हो। जब तुम अपने भाई-बहनों से मिलते हो, तो तुम यह चर्चा करते हो कि तुम कितने भ्रष्ट हो, तो ऐसा लगता है कि तुम स्वयं को जानते हो और अपने जीवन के लिए एक बड़ा भार वहन करते हो। दरअसल, तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव बदला नहीं है, जिससे साबित होता है कि तुम्हें अभ्यास का मार्ग मिला नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

अपने दैनिक जीवन में तुम्हें यह समझना आवश्यक है कि तुम्हारे द्वारा कहे जाने वाले कौन-से शब्द और तुम्हारे द्वारा किए जाने वाले कौन-से कार्य परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं रहने देंगे, और फिर सही तरीका अपनाने के लिए स्वयं को सुधारो। हर वक्त अपने शब्दों, अपने कार्यों, अपने हर कदम और अपने समस्त विचारों और भावों की जाँच करो। अपनी वास्तविक स्थिति की सही समझ हासिल करो और पवित्र आत्मा के कार्य के तरीके में प्रवेश करो। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का यही एकमात्र तरीका है। इसका आकलन करके कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं, तुम अपने इरादों को सुधार पाओगे, मनुष्य की प्रकृति और सार को समझ पाओगे, और स्वयं को वास्तव में समझ पाओगे, और ऐसा करने पर तुम वास्तविक अनुभवों में प्रवेश कर पाओगे, स्वयं को सही रूप में त्याग पाओगे, और इरादे के साथ समर्पण कर पाओगे। जब तुम इस बात से संबंधित इन मामलों के तथ्य का अनुभव करते हो कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के अवसर प्राप्त करोगे और पवित्र आत्मा के कार्य की कई स्थितियों को समझने में सक्षम होगे। तुम शैतान की कई चालों को भी देख पाओगे और उसके षड्यंत्रों को समझ पाओगे। केवल यही मार्ग परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की ओर ले जाता है। परमेश्वर के साथ अपना संबंध सही करके तुम अपने आपको परमेश्वर के सभी प्रबंधनों के प्रति उनकी पूर्णता में समर्पित कर सकते हो, और वास्तविक अनुभवों में और भी गहराई से प्रवेश कर सकते हो और पवित्र आत्मा का कार्य और अधिक प्राप्त कर सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?' से उद्धृत

जब लोग एक भ्रष्ट स्वभाव को उजागर कर देते हैं; जब वे देह के भोगों में लिप्त होते और परमेश्वर से दूर हो जाते हैं; या जब परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है जो उनके अपने स्वयं के विचारों के विपरीत होता है, और उनके भीतर शिकायतें पैदा होती हैं, तो उन्हें तुरंत ही खुद को अवगत करा देना चाहिए कि यह एक समस्या है, और एक भ्रष्ट स्वभाव है; यह परमेश्वर के खिलाफ़ विद्रोह है, परमेश्वर का विरोध है; इसका सत्य के साथ मेल नहीं है, और परमेश्वर के प्रति यह अभिशाप है। जब लोगों को इन चीज़ों का एहसास होता है, तो उन्हें शिकायत नहीं करनी चाहिए, या नकारात्मक और आलसी नहीं हो जाना चाहिए, और उन्हें परेशान तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए; इसके बजाय, उन्हें अधिक गहरे आत्म-चिंतन और आत्म-ज्ञान के लिए सक्षम हो जाना चाहिए। इसके अलावा, उन्हें अग्रसक्रिय रूप से परमेश्वर के सामने आने में सक्षम होना चाहिए, और निष्क्रिय नहीं बनना चाहिए। उन्हें परमेश्वर की झिड़की और अनुशासन को स्वीकार करने के लिए परमेश्वर के सामने आने की पहल करनी चाहिए, और तुरंत अपनी स्थिति को पलट देना चाहिए, ताकि वे सत्य और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम हो जाएँ, और सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकें। इस तरह, परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता निरंतर सामान्यतर होता जाएगा, और साथ ही तुम्हारी अंदरूनी स्थिति भी। तुम भ्रष्ट स्वभावों, भ्रष्टता के सार, और शैतान की भिन्न कुरूप स्थितियों की पहचान एक बढ़ती स्पष्टता के साथ करने में सक्षम होगे। अब तुम इस तरह की मूर्खतापूर्ण और बचकानी बातें नहीं करोगे जैसे कि "यह शैतान था जो मेरे साथ दख़ल कर रहा था," या "यह एक ख़याल था जो शैतान ने मुझे दिया।" इसके बजाय, तुम्हें भ्रष्ट स्वभावों के बारे में, परमेश्वर के प्रति लोगों के विरोध के और शैतान के सार के बारे में, सटीक जानकारी होगी। तुम्हारे पास इन चीज़ों को हल करने का एक अधिक सटीक तरीका होगा, और ये चीज़ें तुम्हें विवश नहीं करेंगी। जब तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव के एक छोटे से अंश को प्रकट करोगे, या अपराध करोगे, या अपने कर्तव्य को बेपरवाही से निभाओगे, या जब तुम अक्सर खुद को एक निष्क्रिय, नकारात्मक स्थिति में पाओगे, तब भी तुम कमज़ोर नहीं बनोगे और परमेश्वर और उसके उद्धार में विश्वास नहीं खो दोगे। तुम इस तरह की परिस्थितियों के बीच नहीं रहोगे, बल्कि अपने स्वयं के भ्रष्ट स्वभाव का सही ढंग से सामना करोगे, और तुम एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के लिए सक्षम होगे, और, जब कभी तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव उजागर होगा, तो तुम तुरंत इसे उलट पाओगे, फ़ौरन परमेश्वर के सामने जिओगे और उसके अनुशासन और फटकार की तलाश करोगे। न तो तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव से, न शैतान के सार के द्वारा, और न ही तुम्हारी विभिन्न नकारात्मक और निष्क्रिय स्थितियों के द्वारा नियंत्रित होगे, बल्कि सत्य, उद्धार, और परमेश्वर के न्याय, उसकी ताड़ना, उसके अनुशासन और तिरस्कार की स्वीकृति की तलाश में अपनी आस्था को विकसित करोगे। इस तरह, क्या लोग स्वतंत्र रूप से नहीं जी पाएँगे? यह सत्य का अभ्यास करने और उसे प्राप्त करने का मार्ग है, और वैसे ही, यह उद्धार का मार्ग भी है। भ्रष्ट स्वभावों ने लोगों के भीतर गहरी जड़ें जमा ली हैं; शैतान का सार और उसकी प्रकृति उनके विचारों, व्यवहार और मानसिकता को नियंत्रित करते हैं; फिर भी, सत्य के, परमेश्वर के कार्य के, और उसके उद्धार के होते हुए, इसमें से कोई भी चिंता का विषय नहीं होता है, और इससे कोई कठिनाइयाँ सामने नहीं आती हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना कर्तव्‍य करते हुए गैरज़िम्‍मेदार और असावधान होने की समस्‍या का समाधान कैसे करें' से उद्धृत

कुछ लोग अपनी खोज में बहुत जोश भर देते हैं और फिर भी सही मार्ग में प्रवेश नहीं कर पाते। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि वे बेहद लापरवाह होते हैं और आध्यात्मिक चीज़ों पर कोई ध्यान नहीं देते। उन्हें इस बात का कोई पता नहीं होता कि परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करना है, और उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि पवित्र आत्मा का कार्य और उसकी उपस्थिति क्या होती है। ऐसे लोग उत्साही तो होते हैं, लेकिन मूर्ख भी होते हैं; वे जीवन का अनुसरण नहीं करते। क्योंकि तुम्हें आत्मा का ज्ञान ज़रा-सा भी नहीं है, तुम्हें पवित्र आत्मा के निरंतर चल रहे कार्य के विकास की कोई जानकारी नहीं है, और तुम स्वयं अपनी आत्मा की स्थिति के बारे में अनजान हो। क्या इस तरह के लोगों की आस्था मूर्खतापूर्ण किस्म की आस्था नहीं है? ऐसे लोगों की खोज अंतत: कुछ हासिल नहीं करती। परमेश्वर में अपनी आस्था में विकास प्राप्त करने की मुख्य कुँजी है यह जानना कि परमेश्वर तुम्हारे अनुभव में क्या कार्य करता है, परमेश्वर की मनोहरता का अवलोकन करना और परमेश्वर की इच्छा को समझना, इस हद तक कि तुम परमेश्वर की सारी व्यवस्थाओं को मान लो, परमेश्वर के वचनों को अपने अंदर गढ़ लो ताकि वे तुम्हारा जीवन बन जाएँ और फलस्वरूप परमेश्वर को संतुष्ट करें। अगर तुम्हारी आस्था मूर्खतापूर्ण आस्था है, अगर तुम आध्यात्मिक बातों और अपने जीवन-स्वभाव में आए बदलावों पर कोई ध्यान नहीं देते, अगर तुम सत्य के लिए कोई प्रयास नहीं करते, तो क्या तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ पाओगे? अगर तुम यह नहीं समझते कि परमेश्वर क्या चाहता है, तो तुम अनुभव करने के नाकाबिल होगे, और इस तरह तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होगा। जब तुम परमेश्वर के वचनों का अनुभव करो, तो तुम्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वे तुम्हारे अंदर क्या प्रभाव पैदा कर रहे हैं, ताकि तुम परमेश्वर को उसके वचनों से जान सको। अगर तुम मात्र परमेश्वर के वचनों को पढ़ना जानते हो, लेकिन यह नहीं जानते कि उनका अनुभव कैसे करना है, तो क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि तुम आध्यात्मिक मामलों से अनजान हो? इस समय, अधिकतर लोग परमेश्वर के वचनों का अनुभव कर पाने में असमर्थ हैं और इस तरह वे परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। क्या यह उनका अपने अभ्यास में विफल होना नहीं है? अगर वे ऐसे ही करते रहे, तो वे किस मुकाम पर जाकर चीज़ों को उनकी पूर्णता में अनुभव कर पाने में सक्षम होंगे और अपने जीवन में विकास प्राप्त कर पाएँगे। क्या यह महज़ खोखली बातें करना नहीं है? तुम लोगों में से बहुत लोग ऐसे हैं जो सिद्धांत पर ध्यान देते हैं, जिन्हें आध्यात्मिक मामलों का कोई ज्ञान नहीं है, और फिर भी वे चाहते हैं कि परमेश्वर उनका कोई बड़ा इस्तेमाल करे और उन्हें आशीष दे। यह एकदम अवास्तविक बात है! इस तरह, तुम लोगों को इस नाकामी का अंत करना चाहिए, ताकि तुम सब अपने आध्यात्मिक जीवन के सही मार्ग में प्रवेश कर सको, वास्तविक अनुभव ले सको और सचमुच परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सको।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य अवस्था में प्रवेश कैसे करें' से उद्धृत

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