35. सच्ची आस्था रखने के सिद्धांत

(1) सच्ची आस्था परमेश्वर के वचनों को अनुभव करने और समझने से आती है और यह सत्य को समझने और परमेश्वर के कार्य को जानने की नींव पर निर्मित होती है।

(2) परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में एकाग्रचित्त होना; परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को, उसके द्वारा काटे-छाँटे और निपटाए जाने को स्वीकार करना और उनके प्रति समर्पित होना; और उसके धर्मी स्वभाव को जानना आवश्यक है।

(3) अपना आवंटित कर्तव्य पूरा करना; सत्य को स्वीकार कर उसका अभ्यास करना, एक ईमानदार व्यक्ति बनना; और परमेश्वर के द्वारा जो भी व्यवस्था की जाती है, उसके प्रति समर्पण करना आवश्यक है।

(4) सभी मामलों में, प्रार्थना करो और सत्य की तलाश करो, नेकी से परमेश्वर के साथ संवाद करो, और परमेश्वर के कार्यों को और इसे देखते हुए कि उसका वचन सब कुछ पूरा कर देता है, सत्य समझने में सक्षम बनो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

जब मूसा ने चट्टान पर प्रहार किया, और यहोवा द्वारा प्रदान किया गया पानी उसमें से बहने लगा, तो यह उसके विश्वास के कारण ही था। जब दाऊद ने—आनंद से भरे अपने हृदय के साथ—मुझ यहोवा की स्तुति में वीणा बजायी तो यह उसके विश्वास की वजह से ही था। जब अय्यूब ने अपने पशुओं को जो पहाड़ों में भरे रहते थे और सम्पदा के गिने ना जा सकने वाले ढेरों को खो दिया, और उसका शरीर पीड़ादायक फोड़ों से भर गया, तो यह उसके विश्वास के कारण ही था। जब वह मुझ यहोवा की आवाज़ को सुन सका, और मुझ यहोवा की महिमा को देख सका, तो यह उसके विश्वास के कारण ही था। पतरस अपने विश्वास के कारण ही यीशु मसीह का अनुसरण कर सका था। उसे मेरे वास्ते सलीब पर चढ़ाया जा सका था और वह महिमामयी गवाही दे सका था, तो यह भी उसके विश्वास के कारण ही था। जब यूहन्ना ने मनुष्य के पुत्र की महिमामय छवि को देखा, तो यह उसके विश्वास के कारण ही था। जब उसने अंत के दिनों के दर्शन को देखा, तो यह सब और भी उसके विश्वास के कारण था। इतने सारे तथाकथित अन्य-जाति राष्ट्रों ने मेरा प्रकाशन प्राप्त कर लिया है, और जान गए हैं कि मैं मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने के लिए देह में लौट आया हूँ, यह भी उनके विश्वास के कारण ही है। वे सब जो मेरे कठोर वचनों के द्वारा मार खाते हैं और फिर भी वे उनसे सांत्वना पाते हैं, और बचाए जाते हैं—क्या उन्होंने ऐसा अपने विश्वास के कारण ही नहीं किया है? लोग अपने विश्वास के कारण बहुत कुछ पा चुके हैं और वो हमेशा आशीष नहीं होता। उन्हें शायद उस तरह की प्रसन्नता और आनन्द का अनुभव न हो, जो दाऊद ने अनुभव किया था, या यहोवा के द्वारा प्रदान किया गया वैसा जल प्राप्त न हो, जैसा मूसा ने प्राप्त किया था। उदाहरण के लिए, अय्यूब को उसके विश्वास की वजह से यहोवा द्वारा आशीष प्रदान किया गया था, लेकिन वह विपत्ति से भी पीड़ित हुआ। चाहे तुम्हें आशीष प्राप्त हो, या तुम किसी आपदा से पीड़ित हो, दोनों ही आशीषित घटनाएँ हैं। विश्वास के बिना, तुम यह विजय-कार्य प्राप्त नहीं कर सकते, आज अपनी आँखों से यहोवा के कार्य को देख पाना तो दूर की बात है। तुम देख भी नहीं पाओगे, प्राप्त करना तो दूर की बात है। ये विपत्तियाँ, ये आपदाएँ, और ये समस्त न्याय-यदि ये तुम पर न टूटते, तो क्या तुम आज यहोवा के कार्य को देखने में समर्थ होते? आज, यह विश्वास ही है, जो तुम्हें जीत लिए जाने देता है, और यह तुम्हारा जीता जाना ही है जो तुम्हें यहोवा के प्रत्येक कार्य पर विश्वास करने देता है। यह मात्र विश्वास के कारण ही है कि तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय पाते हो। इस ताड़ना और न्याय के द्वारा तुम जीते और पूर्ण किए जाते हो। आज, जिस प्रकार की ताड़ना और न्याय तुम पा रहे हो, उसके बिना तुम्हारा विश्वास व्यर्थ होगा, क्योंकि तुम परमेश्वर को नहीं जान पाओगे; इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम उसमें कितना विश्वास करते हो, तुम्हारा विश्वास फिर भी वास्तव में एक निराधार खाली अभिव्यक्ति ही होगी। जब तुम इस प्रकार के विजय कार्य को प्राप्त कर लेते हो, जो तुम्हें पूर्णत: आज्ञाकारी बनाता है, तभी तुम्हारा विश्वास सच्चा और विश्वसनीय बनता है और तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर फिर जाता है। भले ही तुम "आस्था", इस शब्द के कारण न्याय और शाप झेलो, फिर भी तुम्हारी आस्था सच्ची है, और तुम सबसे वास्तविक और सबसे बहुमूल्य वस्तु प्राप्त करते हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि न्याय के इस मार्ग में ही तुम परमेश्वर की सृष्टि की अन्तिम मंजिल को देखते हो; इस न्याय में ही तुम देखते हो कि सृष्टिकर्ता से प्रेम करना है; इस प्रकार के विजय-कार्य में तुम परमेश्वर के हाथ को देखते हो; इसी विजय-कार्य में तुम मानव जीवन को पूरी तरह समझते हो; इसी विजय-कार्य में तुम मानव-जीवन के सही मार्ग को प्राप्त करते हो, और "मनुष्य" के वास्तविक अर्थ को समझ जाते हो; इसी विजय में तुम सर्वशक्तिमान के धार्मिक स्वभाव और उसके सुन्दर, महिमामय मुखमण्डल को देखते हो; इसी विजय-कार्य में तुम मनुष्य की उत्पत्ति को जान पाते और समस्त मनुष्यजाति के पूरे "अनश्वर इतिहास" को समझते हो; इसी विजय में तुम मनुष्यजाति के पूर्वजों और मनुष्यजाति के भ्रष्टाचार के उद्गम को समझते हो; इसी विजय में तुम आनन्द और आराम के साथ-साथ अनन्त ताड़ना, अनुशासन और उस मनुष्यजाति के लिए सृष्टिकर्त्ता की ओर से फटकार के वचन प्राप्त करते हो, जिसे उसने बनाया है; इसी विजय-कार्य में तुम आशीष प्राप्त करते हो और तुम वे आपदाएँ प्राप्त करते हो, जो मनुष्य को प्राप्त होनी चाहिए...। क्या यह सब तुम्हारे थोड़े से विश्वास के कारण नहीं है? और इन चीज़ों को प्राप्त करने के पश्चात क्या तुम्हारा विश्वास बढ़ा नहीं है? क्या तुमने बहुत कुछ प्राप्त नहीं कर लिया है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई (1)' से उद्धृत

कार्य के इस चरण में हमसे परम आस्था और प्रेम की अपेक्षा की जाती है। थोड़ी-सी लापरवाही से हम लड़खड़ा सकते हैं, क्योंकि कार्य का यह चरण पिछले सभी चरणों से अलग है : परमेश्वर मानवजाति की आस्था को पूर्ण कर रहा है—जो कि अदृश्य और अमूर्त दोनों है। इस चरण में परमेश्वर वचनों को आस्था में, प्रेम में और जीवन में परिवर्तित करता है। लोगों को उस बिंदु तक पहुँचने की आवश्यकता है जहाँ वे सैकड़ों बार शुद्धिकरणों का सामना कर चुके हैं और अय्यूब से भी ज़्यादा आस्था रखते हैं। किसी भी समय परमेश्वर से दूर जाए बिना उन्हें अविश्वसनीय पीड़ा और सभी प्रकार की यातनाओं को सहना आवश्यक है। जब वे मृत्यु तक आज्ञाकारी रहते हैं, और परमेश्वर में अत्यंत विश्वास रखते हैं, तो परमेश्वर के कार्य का यह चरण पूरा हो जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मार्ग... (8)' से उद्धृत

परीक्षणों से गुज़रते हुए, लोगों का कमज़ोर होना, या उनके भीतर नकारात्मकता आना, या परमेश्वर की इच्छा पर या अभ्यास के लिए उनके मार्ग पर स्पष्टता का अभाव होना स्वाभाविक है। परन्तु हर हालत में, अय्यूब की ही तरह, तुम्हें परमेश्वर के कार्य पर भरोसा अवश्य होना चाहिए, और परमेश्वर को नकारना नहीं चाहिए। यद्यपि अय्यूब कमज़ोर था और अपने जन्म के दिन को धिक्कारता था, उसने इस बात से इनकार नहीं किया कि मनुष्य के जीवन में सभी चीजें यहोवा द्वारा प्रदान की गई थी, और यहोवा ही उन्हें वापस ले सकता है। चाहे उसकी कैसे भी परीक्षा ली गई, उसने अपना विश्वास बनाए रखा। अपने अनुभव में, तुम परमेश्वर के वचनों के द्वारा चाहे जिस भी प्रकार के शुद्धिकरण से गुज़रो, संक्षेप में, परमेश्वर को मानवजाति से जिसकी अपेक्षा है वह है, परमेश्वर में उनका विश्वास और प्रेम। इस तरह से, जिसे वो पूर्ण बनाता है वह है लोगों का विश्वास, प्रेम और अभिलाषाएँ। परमेश्वर लोगों पर पूर्णता का कार्य करता है, जिसे वे देख नहीं सकते, महसूस नहीं कर सकते; इन परिस्थितयों में तुम्हारे विश्वास की आवश्यकता होती है। लोगों के विश्वास की आवश्यकता तब होती है जब किसी चीज को नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता है, और तुम्हारे विश्वास की तब आवश्यकता होती है जब तुम अपनी स्वयं की धारणाओं को नहीं छोड़ पाते हो। जब तुम परमेश्वर के कार्यों के बारे में स्पष्ट नहीं होते हो, तो आवश्यकता होती है कि तुम विश्वास बनाए रखो और तुम दृढ़ रवैया रखो और गवाह बनो। जब अय्यूब इस स्थिति तक पहुँचा, तो परमेश्वर उसे दिखाई दिया और उससे बोला। अर्थात्, यह केवल तुम्हारे विश्वास के भीतर से ही है कि तुम परमेश्वर को देखने में समर्थ होगे, और जब तुम्हारे पास विश्वास है तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनायेगा। विश्वास के बिना, वह ऐसा नहीं कर सकता है। परमेश्वर तुम्हें वह सब प्रदान करेगा जिसको प्राप्त करने की तुम आशा करते हो। यदि तुम्हारे पास विश्वास नहीं है, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है और तुम परमेश्वर के कार्यों को देखने में असमर्थ होगे, उसकी सर्वसामर्थ्य को तो बिल्कुल भी नहीं देख पाओगे। जब तुम्हारे पास यह विश्वास होता है कि तुम अपने व्यवहारिक अनुभव में उसके कार्यों को देख सकते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे सामने प्रकट होगा और भीतर से वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। उस विश्वास के बिना, परमेश्वर ऐसा करने में असमर्थ होगा। यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास खो चुके हो, तो तुम कैसे उसके कार्य का अनुभव कर पाओगे? इसलिए, केवल जब तुम्हारे पास विश्वास है और तुम परमेश्वर पर संदेह नहीं करते हो, चाहे वो जो भी करे, अगर तुम उस पर सच्चा विश्वास करो, केवल तभी वह तुम्हारे अनुभवों में तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन कर देता है, और केवल तभी तुम उसके कार्यों को देख पाओगे। ये सभी चीजें विश्वास के माध्यम से ही प्राप्त की जाती हैं। विश्वास केवल शुद्धिकरण के माध्यम से ही आता है, और शुद्धिकरण की अनुपस्थिति में विश्वास विकसित नहीं हो सकता है। "विश्वास" यह शब्द किस चीज को संदर्भित करता है? विश्वास सच्चा भरोसा है और ईमानदार हृदय है जो मनुष्यों के पास होना चाहिए जब वे किसी चीज़ को देख या छू नहीं सकते हों, जब परमेश्वर का कार्य मनुष्यों के विचारों के अनुरूप नहीं होता हो, जब यह मनुष्यों की पहुँच से बाहर हो। इसी विश्वास के बारे में मैं बातें करता हूँ। मनुष्यों को कठिनाई और शुद्धिकरण के समय में विश्वास की आवश्यकता होती है, और विश्वास के साथ-साथ शुद्धिकरण आता है; विश्वास और शुद्धिकरण को अलग नहीं किया जा सकता। चाहे परमेश्वर कैसे भी कार्य करे या तुम्हारा परिवेश जैसा भी हो, तुम जीवन का अनुसरण करने में समर्थ होगे और सत्य की खोज करने और परमेश्वर के कार्यों के ज्ञान को तलाशने में समर्थ होगे, और तुममें उसके क्रियाकलापों की समझ होगी और तुम सत्य के अनुसार कार्य करने में समर्थ होगे। ऐसा करना ही सच्चा विश्वास रखना है, ऐसा करना यह दिखाता है कि तुमने परमेश्वर में अपना विश्वास नहीं खोया है। जब तुम शुद्धिकरण द्वारा सत्य का अनुसरण करने में समर्थ हो, तुम सच में परमेश्वर से प्रेम करने में समर्थ हो और उसके बारे में संदेहों को पैदा नहीं करते हो, चाहे वो जो भी करे, तुम फिर भी उसे संतुष्ट करने के लिए सत्य का अभ्यास करते हो, और तुम गहराई में उसकी इच्छा की खोज करने में समर्थ होते हो और उसकी इच्छा के बारे में विचारशील होते हो, केवल तभी इसका अर्थ है कि तुम्हें परमेश्वर में सच्चा विश्वास है। इससे पहले, जब परमेश्वर ने कहा कि तुम एक सम्राट के रूप में शासन करोगे, तो तुमने उससे प्रेम किया, और जब उसने स्वयं को खुलेआम तुम्हें दिखाया, तो तुमने उसका अनुसरण किया। परन्तु अब परमेश्वर छिपा हुआ है, तुम उसे देख नहीं सकते हो, और परेशानियाँ तुम पर आ गई हैं। तो इस समय, क्या तुम परमेश्वर पर आशा छोड़ देते हो? इसलिए हर समय तुम्हें जीवन की खोज अवश्य करनी चाहिए और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। यही सच्चा विश्वास कहलाता है, और यही सबसे सच्चा और सबसे सुंदर प्रकार का प्रेम है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

पहले ऐसा होता था कि लोग परमेश्वर के सामने अपने सारे संकल्प करते और कहते : "अगर कोई अन्य परमेश्वर से प्रेम नहीं भी करता है, तो भी मुझे अवश्य परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए।" परन्तु अब, शुद्धिकरण तुम पर पड़ता है। यह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, इसलिए तुम परमेश्वर में विश्वास को खो देते हो। क्या यह सच्चा प्रेम है? तुमने अय्यूब के कर्मों के बारे में कई बार पढ़ा है—क्या तुम उनके बारे में भूल गए हो? सच्चा प्रेम केवल विश्वास के भीतर ही आकार ले सकता है। तुम अपने शुद्धिकरण के माध्यम से परमेश्वर के लिए वास्तविक प्रेम विकसित करते हो, अपने वास्तविक अनुभवों में तुम अपने विश्वास के माध्यम से ही परमेश्वर की इच्छा के बारे में विचारशील हो पाते हो, और विश्वास के माध्यम से तुम अपने देह-सुख को त्याग देते हो और जीवन का अनुसरण करते हो; लोगों को यही करना चाहिए। यदि तुम ऐसा करोगे तो तुम परमेश्वर के कार्यों को देखने में समर्थ हो सकोगे, परन्तु यदि तुम में विश्वास का अभाव है तो तुम देखने में समर्थ नहीं होगे और तुम उसके कार्यों का अनुभव करने में समर्थ नहीं होगे। यदि तुम परमेश्वर के द्वारा उपयोग और पूर्ण किए जाना चाहते हो, तो तुम में हर चीज मौज़ूद अवश्य होनी चाहिए : पीड़ा सहने की इच्छाशक्ति, विश्वास, सहनशीलता, तथा आज्ञाकारिता और साथ ही परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने, परमेश्वर की इच्छा की समझ और उसके दुःख के बारे में विचारशीलता प्राप्त करने की योग्यता, इत्यादि। किसी व्यक्ति को पूर्ण बनाना आसान नहीं है, और तुम्हारे द्वारा अनुभव किए गए प्रत्येक शुद्धिकरण में तुम्हारे विश्वास और प्यार की आवश्यकता होती है। यदि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाना चाहते हो, तो केवल मार्ग पर दौड़ कर आगे चले जाना पर्याप्त नहीं है, न ही केवल स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना ही पर्याप्त है। तुम्हें एक ऐसा व्यक्ति बनने के लिए, जिसे परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जाता है, बहुत सी चीज़ों से सम्पन्न अवश्य होना चाहिए। जब तुम कष्टों का सामना करते हो तो तुम्हें देह पर विचार नहीं करने और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत नहीं करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। जब परमेश्वर अपने आप को तुमसे छिपाता है, तो तुम्हें उसका अनुसरण करने के लिए, अपने पिछले प्यार को लड़खड़ाने या मिटने न देते हुए उसे बनाए रखने के लिए, तुम्हें विश्वास रखने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर क्या करता है, तुम्हें उसके मंसूबे के प्रति समर्पण अवश्य करना चाहिए, और उसके विरूद्ध शिकायत करने की अपेक्षा अपनी स्वयं की देह को धिक्कारने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब तुम्हारा परीक्षणों से सामना होता है तो तुम्हें अपनी किसी प्यारी चीज़ से अलग होने की अनिच्छा, या बुरी तरह रोने के बावजूद तुम्हें अवश्य परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। केवल यही सच्चा प्यार और विश्वास है। तुम्हारी वास्तविक कद-काठी चाहे जो भी हो, तुममें सबसे पहले कठिनाई को भुगतने की इच्छा और सच्चा विश्वास, दोनों ही अवश्य होना चाहिए और तुममें देह-सुख को त्याग देने की इच्छा अवश्य होनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के उद्देश्य से व्यक्तिगत कठिनाइयों का सामना करने और अपने व्यक्तिगत हितों का नुकसान उठाने के लिए तैयार होना चाहिए। तुम्हें अपने हृदय में अपने बारे में पछतावा महसूस करने में भी अवश्य समर्थ होना चाहिए : अतीत में तुम परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर पाते थे, और अब तुम स्वयं पर पछतावा कर सकते हो। इनमें से किसी भी एक का अभाव तुममें बिलकुल नहीं होना चाहिए—परमेश्वर इन चीज़ों के द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाएगा। यदि तुम इन कसौटियों पर खरे नहीं उतरते हो, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

अय्यूब ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था, परंतु वह अपने विश्वास के प्रति सच्चा रह पाता था, जो कोई अन्य व्यक्ति नहीं कर पाता था। दूसरे लोग ऐसा क्यों नहीं कर पाते थे? ऐसा इसलिए था क्योंकि परमेश्वर ने अय्यूब से बात नहीं की या उसके सामने प्रकट नहीं हुआ, और यदि उसने सच्चे अर्थ में विश्वास नहीं किया होता, तो वह परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर न तो आगे बढ़ा सकता था, न ही उसे दृढ़ता से थामे रह सकता था। क्या यह सच नहीं है? जब तुम अय्यूब को ये वचन कहते पढ़ते हो तब तुम कैसा महसूस करते हो? क्या तुम्हें लगता है कि अय्यूब की पूर्णता और खरापन, और परमेश्वर के समक्ष उसकी धार्मिकता सच हैं, और परमेश्वर की ओर से की गई कोई अतिशयोक्ति नहीं हैं? परमेश्वर ने अय्यूब के साथ भले ही अन्य लोगों के समान ही व्यवहार किया था, और उसके सामने प्रकट नहीं हुआ या उससे बात नहीं की थी, तब भी अय्यूब अपनी सत्यनिष्ठा को दृढ़ता से थामे रहा था, तब भी परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास करता था, और इससे बढ़कर, वह परमेश्वर को नाराज़ करने के अपने भय के फलस्वरूप परमेश्वर के समक्ष बारंबार होमबलि चढ़ाता था और प्रार्थना करता था। परमेश्वर को देखे बिना परमेश्वर का भय मानने की अय्यूब की क्षमता में, हम देखते हैं कि वह सकारात्मक चीज़ों से कितना प्रेम करता था, और उसका विश्वास कितना दृढ़ और वास्तविक था। इसलिए कि परमेश्वर उससे छिपा हुआ था उसने परमेश्वर के अस्तित्व को नकारा नहीं, न ही इसलिए कि उसने उसे कभी देखा नहीं था उसने अपना विश्वास खोया और परमेश्वर को त्यागा। इसके बजाय, सभी चीज़ों पर शासन करने के परमेश्वर के छिपे हुए कार्य के बीच, उसने परमेश्वर के अस्तित्व का अहसास किया था, और परमेश्वर की संप्रभुता और सामर्थ्य को महसूस किया था। इसलिए कि परमेश्वर उससे छिपा हुआ था उसने खरा होना नहीं छोड़ा, न ही इसलिए कि परमेश्वर उसके सामने प्रकट नहीं हुआ था उसने परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग त्यागा। अय्यूब ने कभी नहीं कहा कि अपना अस्तित्व सिद्ध करने के लिए परमेश्वर उसके सामने खुलकर प्रकट हो, क्योंकि उसने सभी चीज़ों के बीच परमेश्वर की संप्रभुता के दर्शन पहले ही कर लिए थे, और वह विश्वास करता था कि उसने वे आशीष और अनुग्रह प्राप्त कर लिए थे जिन्हें अन्य लोगों ने प्राप्त नहीं किया था। यद्यपि परमेश्वर उससे छिपा रहा, फिर भी परमेश्वर में अय्यूब का विश्वास कभी डगमगाया नहीं था। इस प्रकार, उसने वह फसल काटी जो अन्य किसी ने नहीं काटी थी : परमेश्वर की स्वीकृति और परमेश्वर का आशीष।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, समस्त पदार्थों का मुखिया, अपने सिंहासन से अपनी राजसी शक्ति का निर्वहन करता है। वह समस्त ब्रह्माण्ड और सब वस्तुओं पर राज और सम्पूर्ण पृथ्वी पर हमारा मार्गदर्शन करता है। हम हर क्षण उसके समीप होंगे, और एकांत में उसके सम्मुख आयेंगे, एक पल भी नहीं खोयेंगे और हर समय कुछ न कुछ सीखेंगे। हमारे इर्द-गिर्द के वातावरण से लेकर लोग, विभिन्न मामले और वस्तुएँ, सबकुछ उसके सिंहासन की अनुमति से अस्तित्व में हैं। किसी भी वजह से अपने दिल में शिकायतें मत पनपने दो, अन्यथा परमेश्वर तुम्हें अनुग्रह प्रदान नहीं करेगा। बीमारी का होना परमेश्वर का प्रेम ही है और निश्चित ही उसमें उसके नेक इरादे निहित होते हैं। हालाँकि, हो सकता है कि तुम्हारे शरीर को कुछ पीड़ा सहनी पड़े, लेकिन कोई भी शैतानी विचार मन में मत लाओ। बीमारी के मध्य परमेश्वर की स्तुति करो और अपनी स्तुति के मध्य परमेश्वर में आनंदित हो। बीमारी की हालत में निराश न हो, खोजते रहो और हिम्मत न हारो, और परमेश्वर तुम्हें अपने प्रकाश से रोशन करेगा। अय्यूब का विश्वास कैसा था? सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक सर्वशक्तिशाली चिकित्सक है! बीमारी में रहने का मतलब बीमार होना है, परन्तु आत्मा में रहने का मतलब स्वस्थ होना है। जब तक तुम्हारी एक भी सांस बाकी है, परमेश्वर तुम्हें मरने नहीं देगा।

पुनरुत्थित मसीह का जीवन हमारे भीतर है। निस्संदेह, परमेश्वर की उपस्थिति में हममें विश्वास की कमी रहती है : परमेश्वर हममें सच्चा विश्वास जगाये। परमेश्वर के वचन निश्चित ही मधुर हैं! परमेश्वर के वचन गुणकारी दवा हैं! वे दुष्टों और शैतान को शर्मिन्दा करते हैं! परमेश्वर के वचनों को समझने से हमें सहारा मिलता है। उसके वचन हमारे हृदय को बचाने के लिए शीघ्रता से कार्य करते हैं! वे शेष सब बातों को दूर कर सर्वत्र शान्ति बहाल करते हैं। विश्वास एक ही लट्ठे से बने पुल की तरह है: जो लोग घृणास्पद ढंग से जीवन से चिपके रहते हैं उन्हें इसे पार करने में परेशानी होगी, परन्तु जो आत्म बलिदान करने को तैयार रहते हैं, वे बिना किसी फ़िक्र के, मज़बूती से कदम रखते हुए उसे पार कर सकते हैं। अगर मनुष्य कायरता और भय के विचार रखते हैं तो ऐसा इसलिए है कि शैतान ने उन्हें मूर्ख बनाया है क्योंकि उसे इस बात का डर है कि हम विश्वास का पुल पार कर परमेश्वर में प्रवेश कर जायेंगे। शैतान अपने विचारों को हम तक पहुँचाने में हर संभव प्रयास कर रहा है। हमें हर पल परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें अपने प्रकाश से रोशन करे, अपने भीतर मौजूद शैतान के ज़हर से छुटकारा पाने के लिए हमें हर पल परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए। हमें हमेशा अपनी आत्मा के भीतर यह अभ्यास करना चाहिए कि हम परमेश्वर के निकट आ सकें और हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व पर परमेश्वर का प्रभुत्व होने देना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 6' से

परमेश्वर में सच्ची आस्था रखने वालों में क्या अभिव्यक्त होता है? वे लोग उसके वचनों में विश्वास करते हैं और अपने जीवन में उसके वचनों की वास्तविकता को जीने में सक्षम होते हैं। वे परमेश्वर के अस्तित्व और संप्रभुता में विश्वास करते हैं, और न केवल इन बातों में विश्वास ही करते हैं, बल्कि अपने रोजमर्रा के जीवन में भी इस व्यवस्था का पालन कर पाते हैं, और परमेश्वर की संप्रभुता एवं आयोजनों की निरंतर खोज, पालन और प्रतीक्षा करते हैं। वे अपने तरीके से आगे नहीं बढ़ते और अपने तरीके से काम नहीं करते, वे जो खुद चाहते हैं उसे किसी भी सूरत में पाने पर आमादा नहीं होते, और वे परमेश्वर के अस्तित्व और संप्रभुता पर सवाल नहीं उठाते या जब परमेश्वर उनकी इच्छाएँ पूरी नहीं करता, तो वे शिकायत या परमेश्वर की बातों की गलत व्याख्या नहीं करते। जब वे सत्य या परमेश्वर के वचन, जिनमें तुम विश्वास करते हो और जिन्हें तुम मानते हो, तुम्हारी वास्तविकता बन जाते हैं और तुम्हारे विचारों, भावों और जीवन का मार्गदर्शन करते हैं और तुम्हारे पूरे जीवन के मार्ग की दिशा दिखाते हैं, तब तुम परमेश्वर में सच्चा विश्वास करने में सक्षम हो जाते हो। जब तुममें ऐसा सच्चा विश्वास होता है जो सच्ची आस्था और सच्ची आज्ञाकारिता से पैदा होता है, तब परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास सच्चा विश्वास होता है! लोग इसी तरह सच्चा विश्वास हासिल करते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल अगर व्यक्ति आज्ञाकारी है तभी उसमें सच्चा विश्वास हो सकता है' से उद्धृत

जिन लोगों ने परमेश्वर के वचनों का अनुभव किया है और जो उनसे गुज़रे हैं, वे इस बात को समझते हैं कि उनमें से प्रत्येक वचन क्या संकेत करता है, परमेश्वर लोगों में कैसे कार्य करता है, परमेश्वर के वचन कैसे पूरे होते और कैसे सच हो जाते हैं। ये लोग व्यावहारिक अनुभव से ऐसी चीज़ों के विवरण को समझ पाए हैं। वे जानते हैं कि कैसे परमेश्वर इंसान पर शासन करता और इंसान का मार्गदर्शन करता है; वे इस तरह की विस्तृत बातें भी जानते हैं कि परमेश्वर किसी विशेष मामले में लोगों को कैसे अनुशासित करता है; कैसे, वास्तविक जीवन में, परमेश्वर लोगों को वह प्रदान करता है जिसे उन्हें प्रत्येक दिन समझना चाहिए; और वह कैसे लोगों का, सभी चीज़ों में उसके वचनों का अनुभव करने के लिए और परमेश्वर के सत्य और ज्ञान की समझ प्राप्त करने के लिए, मार्गदर्शन करता है। वे इन विस्तृत प्रक्रियाओं की बात कर सकते हैं। उनके पास कोई ऊँचे सिद्धांत या सुंदर शब्द नहीं होते हैं, लेकिन वे जो कुछ भी कहते हैं वह वास्तविक होता है, और सत्य के साथ उसका मेल होता है। अर्थात, वे जो शब्द बोलते हैं वे अनुभव से सीखे जाते हैं, वास्तविकता से और उनके अपने जीवन से अनुभव किए जाते हैं, और वे जो कुछ भी कहते हैं वह वास्तविक, व्यावहारिक और आधार-संपन्न होता है; यह कोरी कल्पनाओं पर आधारित नहीं होता। जब तुम इन लोगों से पूछते हो कि सटीक रूप से परमेश्वर कहाँ है या वह कौन है, तब हो सकता है कि वे तुम्हें विशेष रूप से कोई विस्तृत विवरण देने में सक्षम न हों, पर वे तुम्हें यह बताने के लिए अनुभव की भाषा का उपयोग करेंगे कि क्यों परमेश्वर ही सत्य है और क्यों परमेश्वर ही मार्ग है। परमेश्वर का सार क्या है और वह कहाँ है, तुम्हें यह बताने के लिए वे तथ्यों और अपने व्यक्तिगत अनुभवों का उपयोग करेंगे, और वे परमेश्वर के कार्यों की गवाही देने के लिए; इस बात की गवाही देने के लिए कि परमेश्वर ही सत्य, मार्ग, और जीवन है; और यह प्रमाणित करने के लिए कि परमेश्वर इंसान के भाग्य पर कैसे शासन करता है, और वह लोगों के दैनिक जीवन में कैसे उनका मार्गदर्शन करता है, जिससे हर मामले में वे कठिनाइयों से सुरक्षित गुज़र जाएँ, वे अपने व्यावहारिक अनुभव का उपयोग करेंगे। क्या यह काफ़ी प्रामाणिक नहीं है? क्या ऐसे लोगों को परमेश्वर में आस्था नहीं है? उनकी आस्था किस नींव पर निर्मित हुई है? परमेश्वर और उसके मार्गदर्शन से और यहाँ तक कि उसके तिरस्कार और अनुशासन के माध्यम से जगाए जाना क्या होता है, इसे उन्होंने अपनी आँखों से देखा है, अपने कानों से सुना है, अपने व्यक्तित्व से इसका सामना किया है, और अपने शरीर से अनुभव किया है। उसी तरह उन्होंने परमेश्वर की संप्रभुता और उसके आयोजन का अनुभव किया है। जब लोग कमज़ोर होते हैं, तो परमेश्वर किस तरह लोगों को प्रोत्साहित करने, प्रेरित करने, सांत्वना देने और उनका मार्गदर्शन करने के लिए अपने वचनों का इस्तेमाल करता है, इसका उन्होंने अनुभव किया है। उन्होंने यह अनुभव किया होता है कि जब लोग परमेश्वर के खिलाफ़ विद्रोह करते है, तो वह उन्हें कैसे अनुशासित करता है, कैसे उनका न्याय करता है और उन्हें ताड़ना देता है, और उन्होंने उसके वचनों में से कौन-से सुने हैं, और किन वचनों का अनुभव किया है। उन्होंने यह भी अनुभव किया होता है कि जब कोई समस्या किसी व्यक्ति पर आ पड़ती है, और वे हतप्रभ और चकित रह जाते हैं, वे यह नहीं जानते कि उन्हें क्या करना है, जब वे परमेश्वर के सामने प्रार्थना करने और खोज करने के लिए आते हैं, तो किस तरह का प्रबोधन, और किस तरह का मार्गदर्शन और समर्थन, परमेश्वर उन्हें प्रदान करता है, ताकि ऐसे मामले में अभ्यास के सिद्धांतों की समझ हासिल करने के लिए उनकी अगुवाई की जा सके। क्या ये चीज़ें परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में लोगों द्वारा प्राप्त की गई सभी चीज़ों में से सबसे क़ीमती नहीं होती हैं? इन चीज़ों से, तुम्हें परमेश्वर में सच्ची आस्था होगी, और, इस सच्ची आस्था के साथ, तुम वास्तव में उस पर विश्वास करोगे।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

इस क्षण तुम लोगों में अपने कर्तव्य को पूरा करने का बहुत उत्साह है, लेकिन क्या उत्साह का मतलब अनिवार्य रूप से यह है कि तुममें आस्था है? क्या सच्ची आस्था इसके घटकों में से एक है? क्या इसमें ऐसी स्थितियाँ शामिल हैं जो आवेगात्मक हैं, उत्साह का क्षणिक प्रस्फुटन? आस्था से भरा हृदय किस चीज से सबसे ज्यादा भयभीत होता है? यह जिस चीज से सबसे ज्यादा भयभीत होता है, वह है वास्तविकता का आगमन; यह जिस चीज से सबसे ज्यादा भयभीत होता है, वह है शुद्धिकरण। तो किस तरह के शुद्धिकरण से यह पता चल सकता है कि किसी में सच्ची आस्था है? तुममें वह क्या होना चाहिए, जो परमेश्वर को तुम्हारी सच्ची आस्था दिखा सके और तुम्हें परमेश्वर के सामने रहने, उसकी आज्ञा मानने और उसका अनुसरण करने के लिए उस आस्था पर निर्भर होने में सक्षम बनाए। तुममें वह क्या होना चाहिए, जिससे तुम परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित होने में सक्षम हो सको, ऐसे कि वे तुम्हें समस्याओं जैसे न लगें, चाहे वह कुछ भी करे, और चाहे तुम पर किसी भी तरह की कठिनाइयाँ, क्लेश और कष्ट क्यों न आ पड़ें—यहाँ तक कि वे भी, जो तुम्हारी मंजिल और भविष्य के लिए चिंताजनक हों—और जिससे यह सिद्ध हो कि तुममें सच्ची आस्था है? अर्थात् जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा लेता है, जब वह तुम्हें किसी खास परिवेश में रखता है, जब वह तुम्हारा परीक्षण और शुद्धिकरण करता है, जब वह तुमसे चीजें ले लेता है, और जब वह जो कुछ करता है वह तुम्हारी धारणाओं के विपरीत होता है, तो यह साबित करने के लिए कि तुम्हारी आस्था सच्ची है और कि तुममें सच्ची आस्था है, वे क्या चीजें हैं जिनसे तुम जी सकते हो और जिन्हें तुम धारण कर सकते हो? कम से कम तुम्हें यह वास्तव में समझना चाहिए कि सभी मामले और चीजें, और मनुष्य की मंजिल, परमेश्वर द्वारा अपने हाथों से नियंत्रित की जाती हैं, कि इन सबमें उसके आयोजन और व्यवस्थाएँ हैं, और कि इन्हें मनुष्य के हाथ तय नहीं करते, न ही इनकी गणना करना या इनकी योजना बनाना मनुष्य के हाथों में है। सबसे पहले इन चीजों को समझो। किसी व्यक्ति में सच्ची आस्था की अभिव्यक्ति का यह एक पहलू है। तुममें और क्या चीजें और सत्य होने चाहिए यह सिद्ध करने के लिए कि तुममें सच्ची आस्था है? (परीक्षणों और शुद्धिकरण से गुजरते समय उनमें परमेश्वर का हाथ देख पाना; यह देख पाना कि परमेश्वर सब-कुछ अच्छा ही करता है और वह सब हमें बदलने और शुद्ध करने के लिए है। यह सब उद्धार है।) यह एक भाग है। जहाँ तक लोगों की बात है, परमेश्वर जो भी करता है, उन्हें शुद्ध करने और बचाने के लिए करता है और उस सबमें सत्य है, और वह उन्हें लाभ पहुँचाता है। तो क्या तुमने इन चीजों का अनुभव किया है? इस क्षण क्या तुम उनके बारे में केवल जानते हो या उनमें से कुछ का पहले ही अनुभव कर चुके हो? तुम्हारे अनुभव की सीमा तुम्हारी आस्था की सीमा है। तुमने जिस मात्रा में न्याय, ताड़ना, परीक्षणों और शुद्धिकरण का अनुभव किया है, वह तुममें उतनी ही मात्रा में आस्था को जन्म देती है। आस्था अनुभव से आती है। यह सत्य की समझ के जरिये हासिल की जाती है, और यह परमेश्वर को जानने से उपजती है; यह धर्मशास्त्र पढ़ने से नहीं आती। यदि तुम्हारे मुँह से निकलने वाली बातें तुम्हारे द्वारा दूसरे लोगों से सुनी हुई बातें हैं, तो जरूरी नहीं है कि वह तुम्हारा वास्तविक अनुभव या तुम्हारी सच्ची आस्था हो। तुम्हें इन चीजों का व्यक्तिगत रूप से अनुभव करना होगा, तुम्हें उन्हें खुद पाना होगा, यह सत्यापित करते हुए कि "यह परमेश्वर द्वारा किया गया है। ऐसी परमेश्वर की संप्रभुता है, और ऐसे परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्थाएँ हैं।" केवल यही तुम्हारी सच्ची कद-काठी और तुम्हारी सच्ची आस्था का स्रोत है। यदि तुम्हारे अनुभव इस स्तर तक नहीं पहुँचे हैं—यदि तुम सिर्फ दूसरों की बातें सुनते हो और सोचते हो कि उनके वचन सही और सत्य हैं, और तुम जो भी सुनते हो उसे स्वीकार कर लेते हो, बिना उसे देखे और बिना उससे गुजरे केवल मान लेते हो—तो यह तुम्हारी सच्ची आस्था नहीं है। यह दूसरे लोगों की सच्ची आस्था हो सकती है, तुम्हारी नहीं। तुम लोगों ने अब तक किस सीमा तक प्राप्त किया है? तुम उपदेश देने में सक्षम हो, और तुम दूसरों का समर्थन और उनकी सहायता करने के लिए और उनका भरण-पोषण करने के लिए इन वचनों और सही सिद्धांतों का उपयोग करने में सक्षम हो—लेकिन जब तुम उनका भरण-पोषण करते हो, तो क्या तुमने कभी सोचा है कि क्या ये चीजें तुम्हारा भरण-पोषण कर सकती हैं? जब किसी दिन तुम ऐसी कठिनाइयों का सामना करोगे—उदाहरण के लिए, उसी तरह के परीक्षणों से गुजरोगे जिनका सामना अय्यूब ने किया था—तो क्या तुम अय्यूब की ही तरह परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का रास्ता चुन पाओगे? (हम नहीं चुन पाएँगे।) इस क्षण तुम ऐसा करने में अक्षम हो, और यह एक समस्या है। परमेश्वर के कार्य का अनुभव किए बिना ही उसमें आस्था रखने से नहीं चलेगा; यह सच्ची आस्था उत्पन्न करने में असमर्थ है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सच्‍ची आस्‍था को प्राप्‍त करने के लिए किस चीज़ का होना अनिवार्य है' से उद्धृत

यदि लोगों में आत्मविश्वास नहीं है, तो उनके लिए इस मार्ग पर चलते रहना आसान नहीं है। अब हर कोई देख सकता है कि परमेश्वर का कार्य लोगों की अवधारणाओं के अनुरूप जरा सा भी नहीं है। परमेश्वर ने इतना अधिक कार्य किया है और इतने सारे वचनों को कहा है, जो इंसानी अवधारणाओं से पूर्णत: भिन्न हैं। इसलिए लोगों में उस चीज के साथ खड़े होने का आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति होनी चाहिए, जिसे वे पहले ही देख चुके हैं और अपने अनुभवों से प्राप्त कर चुके हैं। भले ही परमेश्वर लोगों में कुछ भी कार्य करे, उन्हें वह बनाए रखना चाहिए जो उनके पास है, उन्हें परमेश्वर के सामने ईमानदार होना चाहिए, और उसके प्रति बिलकुल अंत तक समर्पित रहना चाहिए। यह मनुष्य का कर्तव्य है। लोगों को जो करना चाहिए, उसे उन्हें बनाए रखना चाहिए। परमेश्वर पर विश्वास के लिए उसका आज्ञापालन करना और उसके कार्य का अनुभव करना आवश्यक है। परमेश्वर ने बहुत कार्य किया है—यह कहा जा सकता है कि लोगों के लिए यह सब पूर्ण बनाना, शुद्धिकरण, और इससे भी बढ़कर, ताड़ना है। परमेश्वर के कार्य का एक भी चरण ऐसा नहीं रहा है, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप रहा हो; लोगों ने जिस चीज का आनंद लिया है, वह है परमेश्वर के कठोर वचन। जब परमेश्वर आता है, तो लोगों को उसके प्रताप और उसके कोप का आनंद लेना चाहिए। हालाँकि उसके वचन चाहे कितने ही कठोर क्यों न हों, वह मानवजाति को बचाने और पूर्ण करने के लिए आता है। प्राणियों के रूप में लोगों को वे कर्तव्य पूरे करने चाहिए, जो उनसे अपेक्षित हैं, और शुद्धिकरण के बीच परमेश्वर के लिए गवाह बनना चाहिए। हर परीक्षण में उन्हें उस गवाही पर कायम रहना चाहिए, जो कि उन्हें देनी चाहिए, और परमेश्वर के लिए उन्हें ऐसा ज़बरदस्त तरीके से करना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति विजेता होता है। परमेश्वर चाहे कैसे भी तुम्हें शुद्ध करे, तुम आत्मविश्वास से भरे रहते हो और परमेश्वर पर से कभी विश्वास नहीं खोते। तुम वह करते हो, जो मनुष्य को करना चाहिए। परमेश्वर मनुष्य से इसी की अपेक्षा करता है, और मनुष्य का दिल पूरी तरह से उसकी ओर लौटने तथा हर पल उसकी ओर मुड़ने में सक्षम होना चाहिए। ऐसा होता है विजेता। जिन लोगों का उल्लेख परमेश्वर "विजेताओं" के रूप में करता है, वे लोग वे होते हैं, जो तब भी गवाह बनने और परमेश्वर के प्रति अपना विश्वास और भक्ति बनाए रखने में सक्षम होते हैं, जब वे शैतान के प्रभाव और उसकी घेरेबंदी में होते हैं, अर्थात् जब वे स्वयं को अंधकार की शक्तियों के बीच पाते हैं। यदि तुम, चाहे कुछ भी हो जाए, फिर भी परमेश्वर के समक्ष पवित्र दिल और उसके लिए अपना वास्तविक प्यार बनाए रखने में सक्षम रहते हो, तो तुम परमेश्वर के सामने गवाह बनते हो, और इसी को परमेश्वर "विजेता" होने के रूप में संदर्भित करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

पिछला: 34. शैतान के प्रभाव से बच निकलने के सिद्धांत

अगला: 36. मसीह का अनुसरण करने के सिद्धांत

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

संबंधित सामग्री

610 प्रभु यीशु का अनुकरण करो

1पूरा किया परमेश्वर के आदेश को यीशु ने, हर इंसान के छुटकारे के काम को,क्योंकि उसने परमेश्वर की इच्छा की परवाह की,इसमें न उसका स्वार्थ था, न...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें