106. कर्तव्य को निभाने और सेवा करने के बीच भेद करने के सिद्धांत

(1) सही मायने में अपने कर्तव्य को निभाने का एकमात्र तरीका यह है कि प्रत्येक सत्य को परमेश्वर के अनुरोध के अनुसार अमल में लाया जाए, और अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को उठाया जाए।

(2) अपने कर्तव्य के निष्पादन में, केवल परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में आत्म-चिंतन करने, भ्रष्टता को दूर करने, और सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होकर ही कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य को संतोषजनक ढंग से निभा सकता है।

(3) आशीषों की खातिर और महिमा का मुकुट पाने की आशा में अपने कर्तव्य को निभाना परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने का प्रयास है; सार में, यह परमेश्वर को सेवा प्रदान करना है।

(4) जो अपने कर्तव्य के निष्पादन में लगातार प्रतिष्ठा और रुतबा चाहता है, और सत्य को जरा भी स्वीकार नहीं करता है, बल्कि लगातार असावधान और लापरवाह रहता है, वह स्पष्ट रूप से एक सेवा-कर्मी है।

(5) अपने कर्तव्य को संतोषजनक ढंग से निभाने का एकमात्र तरीका है सभी मामलों में सत्य की तलाश करना और परमेश्वर को प्रेम करने और संतुष्ट करने के उद्देश्य से चीजों को करना, और अंत तक निष्ठावान बने रहना।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मनुष्य द्वारा अपना कर्तव्य निभाना वास्तव में उस सबकी सिद्धि है, जो मनुष्य के भीतर अंतर्निहित है, अर्थात् जो मनुष्य के लिए संभव है। इसके बाद उसका कर्तव्य पूरा हो जाता है। मनुष्य की सेवा के दौरान उसके दोष उसके क्रमिक अनुभव और न्याय से गुज़रने की प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे कम होते जाते हैं; वे मनुष्य के कर्तव्य में बाधा या विपरीत प्रभाव नहीं डालते। वे लोग, जो इस डर से सेवा करना बंद कर देते हैं या हार मानकर पीछे हट जाते हैं कि उनकी सेवा में कमियाँ हो सकती हैं, वे सबसे ज्यादा कायर होते हैं। यदि लोग वह व्यक्त नहीं कर सकते, जो उन्हें सेवा के दौरान व्यक्त करना चाहिए या वह हासिल नहीं कर सकते, जो उनके लिए सहज रूप से संभव है, और इसके बजाय वे सुस्ती में समय गँवाते हैं और बेमन से काम करते हैं, तो उन्होंने अपना वह प्रयोजन खो दिया है, जो एक सृजित प्राणी में होना चाहिए। ऐसे लोग "औसत दर्जे के" माने जाते हैं; वे बेकार का कचरा हैं। इस तरह के लोग उपयुक्त रूप से सृजित प्राणी कैसे कहे जा सकते हैं? क्या वे भ्रष्ट प्राणी नहीं हैं, जो बाहर से तो चमकते हैं, परंतु भीतर से सड़े हुए हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से उद्धृत

सेवा करने और कर्तव्य निभाने में क्या अंतर है? सेवा-कर्म का अर्थ है कि तुम वह करो जो भी तुम करना चाहते हो, कम से कम, बशर्ते कि तुम जो करते हो उससे परमेश्वर के स्वभाव का अपमान न हो। जब तक कोई भी तुम्हारे कार्यों की जाँच-पड़ताल न करे और जब तक जो तुम करते हो वह ग्रहण करने योग्य है, तो यह काफी है। स्वभाव के बदलाव, सत्य-सिद्धांतों के अनुसार काम करने, परमेश्वर की इच्छा संतुष्ट करने, और यहाँ तक कि कैसे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना है या अपने कर्तव्य का कैसे अच्छे ढंग से निर्वाह करना है और उसका लेखा-जोखा कैसे परमेश्वर को देना है, इसके साथ तुम कोई मतलब नहीं रखते हो। तुम इनमें से किसी भी चीज़ पर ध्यान नहीं देते हो और इसे ही क्या सेवा-कर्म कहा जाता है। सेवा-कर्म का अर्थ है जो भी कुछ तुम्हारे पास है, उसके साथ अत्यधिक प्रयास करना और सुबह से रात तक इस तरह काम करना मानो तुम गुलाम थे। अगर तुम ऐसे व्यक्ति से पूछोगे कि, "इतने वर्षों के पीड़ादायक, कठिन परिश्रम जिसमें तुमने स्वयं को डुबोए रखा, यह सब किसके लिए था?" तब वह कहेगा, "क्यों, ताकि मैं आशीष प्राप्त कर सकूं।" अगर तुम उससे पूछोगे कि परमेश्वर में उसके इतने वर्षों तक विश्वास करने के परिणामस्वरूप उसके स्वभाव में कुछ बदलाव आया है, क्या परमेश्वर के अस्तित्व को लेकर वह निश्चित हो गया है, क्या उसके पास सृष्टिकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं की वास्तविक समझ या अनुभव का कुछ अंश है, तो इन सबका उत्तर स्पष्ट रूप से "ना" होगा और वह इनमें से किसी भी चीज़ के बारे में बोल नहीं पाएगा। जब स्वभाव में बदलावों से संबंधित किसी भी सूचक में कोई सुधार या प्रगति नहीं होती है, ऐसा व्यक्ति केवल लगातार सेवा प्रदान करता है। अगर एक व्यक्ति अनेक वर्षों तक सेवा करता है, और इसे जाने बिना, यह समझ लेता है कि वह एक भ्रष्ट स्वभाव धारण करता है, कि वह अकसर परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करता है, कि वह अकसर शिकायतें करता है, कि वह अकसर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने में असमर्थ है, कि वह अत्यधिक भ्रष्ट है, कि परमेश्वर की बात पर ध्यान दिए बगैर कि वह कैसे उसे उसके सामने समर्पण करने के लिए कहता है, वह ऐसा करने में असमर्थ है। वह स्वयं को संयमित करने का प्रयास करता है पर बात नहीं बनती, और न ही स्वयं को कोसने या शपथ लेने से बात बनती है। अंत में, उसे पता चलता हैः "वास्तव में मनुष्य एक भ्रष्ट स्वभाव धारण करता है और इसीलिए वह परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने में सक्षम है। जब भी कुछ होता है, लोगों के पास अपनी स्वयं की इच्छाएं होती हैं और वे हमेशा परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का अन्वेषण कर रहे होते हैं। हालाँकि वे अत्यधिक प्रयास करने को तैयार होते हैं, लेकिन जैसे ही कुछ उनके स्वभाव और उनकी अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं, इरादों और कामनाओं में उन्हें फँसाता है, वे उन्हें त्यागने या छोड़ पाने में असमर्थ हो जाते हैं। वे हमेशा उस तरीके से चीज़ें करना चाहते हैं, जो उन्हें संतुष्ट करती हैं। यह मैं हूँ और मुझे वास्तव में संभालना कठिन है! क्या किया जा सकता है?" अगर उन्होंने इन बातों पर विचार करना शुरू कर दिया है, तो उनके पास मानव तरीकों की कुछ थोड़ी समझ पहले से ही है। वे लोग जो सेवा-कर्म में संलग्न हैं अगर किसी समय पर असली कार्य करना शुरू कर देते हैं, वे स्वभाव के बदलावों पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाते हैं, यह समझ प्राप्त कर पाते हैं कि असल में उनका भी भ्रष्ट स्वभाव है, कि वे भी घमंडी हैं और परमेश्वर को समर्पण करने में अक्षम हैं और यह कि इस तरीके से काम नहीं चलेगा; जब समय आएगा कि वे इन चीज़ों के बारे में सोच पाएंगे, तब वे अपने में सुधार करना शुरू कर चुके होंगे और एक उम्मीद है कि हो सकता है उनका स्वभाव बदल जाए और यह कि हो सकता है उनका उद्धार हो जाए। मान लें कि कोई व्यक्ति इन सब चीज़ों के बारे में कभी भी नहीं सोचता और यह सोचकर कि उनके हाथ में जो काम है उसे समाप्त करना ही परमेश्वर के आदेश को पूरा करने के लिए आवश्यक है और इसलिए वे यही जानते हैं कि किस तरह श्रम करना है और यह कि एक बार उन्होंने अत्यधिक प्रयास कर लिया तो वे अपने कर्तव्य का निर्वाह उचित ढंग से कर चुके होंगे, इस बारे में वे कभी नहीं सोचते कि परमेश्वर की अपेक्षाएँ क्या हैं, कि सत्य क्या है या क्या उनकी गिनती ऐसे लोगों में होगी, जो परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं—वे कभी भी इन चीज़ों के बारे में विचार नहीं करते। क्या कोई व्यक्ति जो अपने कर्तव्य की पूर्ति इस तरीके से करता है, उद्धार पा सकता है? उत्तर है नहीं। उन्होंने उद्धार के मार्ग पर चलना शुरू नहीं किया है या परमेश्वर पर विश्वास करने के सही मार्ग पर नहीं हैं, न ही उन्होंने परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित किए हैं और फिर भी वे अत्यधिक प्रयास करते हैं और परमेश्वर के घर में सेवा-कर्म में संलग्न रहते हैं। इस तरह का व्यक्ति परमेश्वर के घर में सेवा करता है और परमेश्वर उनकी देखभाल और उनकी रक्षा करता है, लेकिन वह उन्हें बचाने की योजना नहीं बनाता है, न ही वह उनसे निपटता है और उनकी काट-छाँट करता है, न ही उनका न्याय और उन्हें ताड़ना देता है, न ही उनका परीक्षण या शोधन करता है; वह केवल उन्हें इस जीवनकाल में आशीषों को कुछ हद तक प्राप्त करने की अनुमति देता है और इससे ज़्यादा कुछ नहीं। अगर ऐसा समय आएगा, जब ये लोग जान जाएंगे कि इन चीज़ों पर विचार करना चाहिए और जो उपदेश वे सुनते हैं उन्हें समझ लेते हैं, तो उन्हें अहसास होगाः "तो, यही सब है परमेश्वर पर विश्वास करने का मतलब। फिर तो मुझे अवश्य ही उद्धार पाने की इच्छा करनी चाहिए। अगर मैं ऐसा नहीं करता हूँ और इसके बजाय सेवा प्रदान करना ही स्वीकार करता हूँ, तो उसका परमेश्वर पर विश्वास करने से कोई लेना-देना नहीं होगा।" फिर वे विचार करते हैं: "भ्रष्ट स्वभाव के कौन-से पहलू मैं धारण करता हूँ? वास्तव में यह क्या चीज़ है, यह भ्रष्ट स्वभाव? चाहे जो हो, सबसे पहले मुझे परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए!" ये चीज़ें सत्य से और स्वभाव के बदलावों से संबंधित हैं और उनके लिए एक उम्मीद है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाया जा सकता है' से उद्धृत

भले ही तू किसी भी कर्तव्य को पूरा करे, तुझे हमेशा परमेश्वर की इच्छा को समझने की और यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि तेरे कर्तव्य को लेकर उसकी क्या अपेक्षा है; केवल तभी तू सैद्धान्तिक तरीके से मामलों को सँभाल पाएगा। अपने कर्तव्य को निभाने में, तू अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार बिल्कुल नहीं जा सकता है या तू जो चाहे मात्र वह नहीं कर सकता है, जिसे भी करने में तू खुश और सहज हो, वह नहीं कर सकता है, या ऐसा काम नहीं कर सकता जो तुझे अच्छे व्यक्ति के रूप में दिखाये। यदि तू परमेश्वर पर अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को बलपूर्वक लागू करता है या उन का अभ्यास ऐसे करता है मानो कि वे सत्य हों, उनका ऐसे पालन करता है मानो कि वे सत्य के सिद्धांत हों, तो यह कर्तव्य पूरा करना नहीं है, और इस तरह से तेरा कर्तव्य निभाना परमेश्वर के द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। कुछ लोग सत्य को नहीं समझते हैं, और वे नहीं जानते कि अपने कर्तव्यों को ठीक से पूरा करने का क्या अर्थ है। उन्हें लगता है कि चूँकि उन्होंने अपना दिल और अपना प्रयास इसमें लगाया है, और देहासक्ति का त्याग किया है और कष्ट उठाया है, इसलिए उनके कर्तव्य की पूर्ति मानकों पर खरी उतरेगी—पर फिर क्यों परमेश्वर हमेशा असंतुष्ट रहता है? इन लोगों ने कहाँ भूल की है? उनकी भूल यह थी कि उन्होंने परमेश्वर की अपेक्षाओं की तलाश नहीं की थी, बल्कि अपने ही विचारों के अनुसार काम किया था; उन्होंने अपनी ही इच्छाओं, पसंदों और स्वार्थी उद्देश्यों को सत्य मान लिया था और उन्होंने इनको वो मान लिया जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, मानो कि वे परमेश्वर के मानक और अपेक्षाएँ प हों। जिन बातों को वे सही, अच्छी और सुन्दर मानते थे, उन्हें सत्य के रूप में देखते थे; यह गलत है। वास्तव में, भले ही लोगों को कभी कोई बात सही लगे, लगे कि यह सत्य के अनुरूप है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि यह आवश्यक रूप से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। लोग जितना अधिक यह सोचते हैं कि कोई बात सही है, उन्हें उतना ही अधिक सावधान होना चाहिए और उतना ही अधिक सत्य को खोजना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उनकी सोच परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप है या नहीं। यदि यह उसकी अपेक्षाओं के विरुद्ध है और उसके वचनों के विरुद्ध है, तो तुम्हारा यह सोचना गलत है कि यह बात सही है, क्योंकि यह बस एक मानवीय विचार है और यह आवश्यक रूप से सत्य के अनुरूप नहीं होगा भले ही तुम्हें यह कितना भी सही लगे। सही और गलत का तुम्हारा निर्णय सिर्फ़ परमेश्वर के वचनों पर आधारित होना चाहिए, और तुम्हें कोई बात चाहे जितनी भी सही लगे, जबतक इसका आधार परमेश्वर के वचन न हों, तुम्हें इसे हटा देना चाहिए। कर्तव्य क्या है? यह परमेश्वर द्वारा लोगों को सौंपा गया एक आदेश है। तो तुम्हें अपना कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? व्यक्तिपरक मानवीय इच्छाओं के आधार पर नहीं बल्कि परमेश्वर की अपेक्षाओं और मानकों के अनुसार काम कर तथा सत्य के सिद्धांतों पर अपना व्यवहार आधारित कर। इस तरह तुम्हारा अपने कर्तव्य को करना मानकों के स्तर का होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य-सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाया जा सकता है' से उद्धृत

किसी के पास चाहे जो भी प्रतिभा, योग्यता, या कौशल हो, यदि वह अपना कर्तव्य करते हुए केवल कार्रवाई करे और खुद को खपाए; और वह चाहे जो कुछ भी करे, खुद को खपाते हुए वह अपनी कल्पनाओं, धारणाओं या अपने सहज ज्ञान पर भरोसा करे; और कभी भी परमेश्वर की इच्छा की तलाश न करे, और उसके मन में ऐसी कोई धारणा या आवश्यकता न हो, जो कहे, "मुझे सत्य को व्यवहार में अवश्य लाना चाहिए। मैं अपना कर्तव्य कर रहा हूँ"; और उसका सारा आवेग यही है कि वह अपने कार्य को अच्छी तरह से करे और अपने कार्य को पूरा करे, तो क्या ऐसे लोग वे नहीं हैं जो पूरी तरह से अपनी योग्यता, प्रतिभा, क्षमता और कौशल के अनुसार जीते हैं? क्या इस तरह के बहुत से लोग हैं? आस्था में, वे केवल स्वयं को खपाने, अपने स्वयं के श्रम को बेचने, और अपने कौशलों को बेचने के बारे में सोचते हैं। विशेष रूप से जब परमेश्वर का घर लोगों को सामान्य कार्य करने के लिए देता है, तब ज्यादातर लोग उसे करने में ऐसा दृष्टिकोण अपनायेंगे। वे बस खुद को खपाते हैं। कभी इसका अर्थ होता है थोड़ा-बहुत बोलने के लिए अपने मुँह का उपयोग करना; कभी इसका अर्थ होता है अपने हाथों और शारीरिक शक्ति का उपयोग करना; और कभी इसका अर्थ दौड़ने-भागने के लिए अपने पैरों का इस्तेमाल करना। ऐसा क्यों कहा जाता है कि उन चीजों के भरोसे जीना, सत्य को अभ्यास में लाना नहीं बल्कि अपनी ताकत का उपयोग करना है? जब कोई परमेश्वर के घर द्वारा दिये गए कार्य को स्वीकार करता है, तो वह केवल यह सोचता है कि इसे कैसे यथाशीघ्र पूरा किया जाए, ताकि वह अपने अगुआओं को विवरण दे सके और उनकी प्रशंसा प्राप्त कर सके। ऐसे लोग कदम-दर-कदम योजना भी बना सकते हैं और वे काफी ईमानदार प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन वे बस कार्य को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं ताकि दूसरे इसे देखें, या जब वे ऐसा कर रहे होते हैं, तो वे अपने प्रदर्शन को मापने के लिए खुद के मानक निर्धारित करते हैं, इस आधार पर कि वे किस प्रकार काम करें ताकि वे खुशी और संतुष्टि पाएँ, और पूर्णता के उस स्तर को प्राप्त करें जिसके लिए वे प्रयास करते हैं। भले ही वे अपने लिए कोई भी मानक निर्धारित करें, लेकिन यदि वे सत्य से संबंधित नहीं हैं, और सत्य की तलाश नहीं करते, या कार्रवाई करने के पहले परमेश्वर उनसे जो माँग करता है, उसे समझते नहीं और उसकी पुष्टि नहीं करते हैं, बल्कि उलझन में, आँखें मूँदकर कार्य करते हैं, तो वे केवल परिश्रम कर रहे हैं। वे अपनी इच्छाओं के अनुसार, अपने दिमाग या योग्यता के द्वारा, या अपनी क्षमताओं या कौशलों के बल पर कार्य कर रहे हैं। इस तरह से कार्य करने का परिणाम क्या होता है? हो सकता है कि कार्य पूरा हो गया हो, और शायद किसी को कोई दोष न मिला हो, और हो सकता है कि तू इससे बहुत आनंदित हो—लेकिन, ऐसा करने के दौरान, सबसे पहले तो तूने परमेश्वर की इच्छा नहीं समझी; दूसरे, तूने अपने पूरे हृदय से, अपने पूरे मन से, और अपनी पूरी ताकत के साथ काम नहीं किया—तूने इसमें अपना पूरा हृदय नहीं लगाया। यदि तूने सत्य-सिद्धांतों की तलाश की होती, और परमेश्वर की इच्छा की तलाश की होती, तो तूने इसे लगभग पूरा कर लिया होता, और तू सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने में भी समर्थ होता, और तू सही ढंग से समझ गया होता कि तू जो कर रहा था वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। लेकिन यदि तू लापरवाह और बेतरतीब ढंग से कार्य करता, तो भले ही कार्य पूरा हो जाए, तब भी तू अपने हृदय में नहीं जान पाता कि यह कितनी अच्छी तरह से किया गया है। तेरे पास कोई मानदण्ड नहीं होगा, तुझे पता नहीं लगेगा कि यह परमेश्वर की इच्छा या सत्य के अनुरूप है या नहीं। इसलिए, ऐसी स्थिति में निभाए गए कर्तव्यों का उल्लेख करने के लिए तीन शब्द ही काफी होंगे—स्वयं को खपाना।

परमेश्वर में विश्वास रखने वाले हर व्यक्ति को परमेश्वर की इच्छा समझनी चाहिये। अपने कर्तव्य को सही ढंग से निभाने वाले लोग ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, परमेश्वर व्यक्ति को जो काम सौंपता है, उसे पूरा करने से ही उसके कर्तव्यों का निर्वहन संतोषजनक हो सकता है। परमेश्वर के आदेश की पूर्णता के मानक हैं। प्रभु यीशु ने कहा: "तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से, और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना।" परमेश्वर से प्रेम करना उसका एक पहलू है जिसकी परमेश्वर लोगों से अपेक्षा करता है। वास्तव में, जब तक परमेश्वर ने लोगों को एक आदेश दिया है, और जब तक वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और अपना कर्तव्य निभाते हैं, तो परमेश्वर उनसे इन मानकों की अपेक्षा करता है : वे अपने पूर्ण हृदय से, अपने पूर्ण प्राण से, अपने पूरे दिमाग से, और अपनी पूरी ताकत के साथ काम करें। यदि तू मौजूद तो है, लेकिन तेरा हृदय मौजूद नहीं है—यदि तेरे दिमाग की स्मृति और विचार मौजूद हैं, लेकिन तेरा हृदय नहीं—और यदि तू अपनी क्षमताओं द्वारा चीजें पूरी करता है, तो क्या तू परमेश्वर का आदेश पूरा कर रहा है? तो, परमेश्वर के आदेश को पूरा करने के लिए और अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक और अच्छे ढंग से निभाने के लिए किस तरह का मानक प्राप्त करना चाहिए? यह मानक है अपने कर्तव्य को पूरे हृदय से, अपने पूरे प्राण से, अपने पूरे मन से, और अपनी पूरी ताकत से करना। अगर परमेश्वर के लिए प्रेम से भरे हृदय के बिना तुम अपने कर्तव्य को सही ढंग से निभाने की कोशिश करते हो, तो बात नहीं बनेगी। अगर परमेश्वर के लिये तुम्हारा प्रेम मजबूत होता जाए और अधिक सच्चा होता जाए, तो स्वाभाविक रूप से तुम पूरे दिल से, पूरे प्राण से, पूरे मन से, और पूरी शक्ति से अपना कर्तव्य निभा पाओगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन जीने के लिए लोग ठीक-ठीक किस पर भरोसा करते रहे हैं' से उद्धृत

ज़्यादातर लोग इस मनोस्थिति में अपने कर्तव्यों को निभाते हैं : "यदि कोई अगुवाई करता है, तो मैं पीछे चलता हूँ। वे मुझे जहाँ भी ले जाएंगे, मैं उनका अनुसरण करूंगा और वे मुझसे जो भी करने को कहेंगे, मैं करूंगा।" दूसरी ओर, ज़िम्मेदारी या चिंता लेना या अतिरिक्त ध्यान देना, वे चीजें हैं जो उनके बस के बाहर हैं और जिनकी कीमत चुकाने के लिए वे तैयार नहीं हैं। शारीरिक प्रयास में उनकी हिस्सेदारी है, लेकिन वे ज़िम्मेदारी में हिस्सा नहीं लेते। यह वास्तव में अपना कर्तव्य निभाना नहीं है। तुम्हें अपने कर्तव्य में पूरा दिल लगाना सीखना चाहिए; यदि किसी के पास दिल है, तो उसे इसका उपयोग करना चाहिए। यदि कोई अपने दिल का उपयोग कभी नहीं करता, तो यह साबित होता है कि वह हृदयहीन है, और हृदयहीन लोग सत्य को प्राप्त नहीं कर सकते! वे सत्य क्यों प्राप्त नहीं कर सकते? वे नहीं जानते कि परमेश्वर के सामने कैसे आएँ; वे नहीं जानते कि परमेश्वर की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन को समझने में अपना दिल कैसे लगाएँ, या चिंतन में, या सत्य की खोज में, या परमेश्वर की इच्छा को खोजने, समझने और उसके प्रति विचारशीलता दिखाने में अपना दिल कैसे लगाएँ। क्या तुम लोगों को ऐसी अवस्थाओं का अनुभव है, चाहे कुछ भी हो जाए, और चाहे तुम्हारा कर्तव्य कुछ भी हो, तुम अक्सर परमेश्वर के सामने शांत रह पाते हो, उसके वचनों पर दिल लगाकर गौर किया हो, और सत्य की खोज में और कर्तव्य निभाने के तरीके पर विचार करने में अपना दिल लगाया हो? क्या ऐसे अवसर कई बार आए हैं? अपना कर्तव्य दिल लगाकर करने और इसकी ज़िम्मेदारी लेने के लिए तुम्हें पीड़ा सहने और एक कीमत चुकाने की ज़रूरत है। केवल इसके बारे में बात करना ही काफ़ी नहीं है। यदि तुम अपना कर्तव्य दिल लगाकर नहीं करते, बल्कि हमेशा शारीरिक प्रयास करना चाहते हो, तो तुम्हारा कर्तव्य निश्चित ही अच्छी तरह पूरा नहीं होगा। तुम बस एक ढर्रे पर काम करते रहोगे और कुछ नहीं, और तुम्हें पता नहीं होगा कि तुमने अपना कर्तव्य कितनी अच्छी तरह से निभाया। यदि तुम दिल लगाकर काम करोगे, तो तुम धीरे-धीरे सत्य को समझोगे; लेकिन अगर तुम ऐसा नहीं करोगे, तो तुम नहीं समझोगे। जब तुम दिल लगाकर अपना कर्तव्य निभाते हो और सत्य का पालन करते हो, तो तुम धीरे-धीरे परमेश्वर की इच्छा को समझने, स्वयं के भ्रष्टाचार और कमियों का पता लगाने और अपनी सभी विभिन्न अवस्थाओं में महारत हासिल करने में सक्षम हो जाते हो। यदि तुम खुद की जांच करने के लिए अपना दिल नहीं लगाते, लेकिन केवल बाहरी प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम अपने दिल में उत्पन्न होने वाली विभिन्न आवस्थाओं और विभिन्न बाहरी वातावरणों में अपनी सभी प्रतिक्रियाओं को जानने में असमर्थ होगे। अगर तुम खुद की जांच करने के लिए अपना दिल नहीं लगाते हो, तो तुम्हारे लिए अपने दिल की समस्याओं का हल करना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए, तुम्हें दिल लगाकर और ईमानदारी के साथ परमेश्वर की स्तुति और आराधना करनी चाहिए। दिल लगाकर और ईमानदारी के साथ परमेश्वर की आराधना करने के लिए तुम्हारे पास एक शांत और ईमानदार दिल होना चाहिए; अपने दिल की अथाह गहराईयों में, परमेश्वर की इच्छा और सत्य खोजना तुम्हें आना चाहिए, और तुम्हें चिंतन करना चाहिए कि तुम अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से कैसे करो, यह विचार करते हुए कि तुम अपने कर्तव्य के कौन-से हिस्सों को अभी तक समझ नहीं पाए हो और अपने कर्तव्य को बेहतर तरीके से कैसे निभाया जा सकता है। केवल इन बातों को अपने दिल में अक्सर सोचकर ही तुम सत्य को प्राप्त कर पाओगे। अगर ये बातें तुम अपने दिल में अक्सर नहीं सोचते, और इसके बजाय तुम्हारा दिल मन की या बाहर की चीज़ों से भरा है, या ऐसी चीज़ों ने यहाँ घर कर लिया है, जिनका दिल का इस्तेमाल करने और ईमानदारी के साथ परमेश्वर की आराधना करने से कोई सरोकार नहीं है—यानि इनका इसके साथ कुछ भी लेना-देना नहीं है—तो क्या तुम सत्य को प्राप्त कर पाओगे? क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा कोई रिश्ता है?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है' से उद्धृत

अपने कर्तव्य के प्रति तुम लोगों का नज़रिया यह होता है: "मैं देखूँगा कि मैं कितना कम काम कर सकता हूँ, कितने से काम चल जाएगा"; तुम धीरे-धीरे काम करते हो, तुम्हें कोई परवाह नहीं कि तुम्हारी वजह से कितनी देर होती है। लेकिन अगर तुम लोग चीज़ों को गंभीरता से लो, तो तुम उन्हें झट से पूरा करा सकोगे। कुछ चीज़ें हैं जिन्हें कैसे करना है यह तुम लोग नहीं जानते, इसलिए मैं तुम्हें सटीक निर्देश देता हूँ। तुम लोगों को सोचना नहीं है, तुम्हें बस सुनना है और काम शुरू कर देना है—पर तुम लोगों से यह भी नहीं होता है। तुम लोगों की वफ़ादारी कहाँ है? यह कहीं दिखाई नहीं देती! तुम लोग सिर्फ बातें करते हो, तुम्हारा दिल इसमें नहीं है। तुम्हारा दिल समझ भी ले तो भी, तुम कुछ करते नहीं हो। ऐसा व्यक्ति वो होता है जो सत्य से प्रेम नहीं करता! यदि तुम लोग इसे अपनी आँखों से देख सकते हो और अपने दिल में महसूस भी कर सकते हो, पर फिर भी कुछ नहीं करते, तो दिल होने का क्या फ़ायदा? तुम्हारा बेकार ज़मीर तुम्हारे कर्मों को नियंत्रित नहीं करता, यह तुम्हारे विचारों को निर्देशित नहीं करता—तो इसका क्या काम है? इसका होना, न होना बराबर है; यह तो सिर्फ दिखावे के लिए है। इंसान की आस्था वाक़ई दयनीय होती है! उसके बारे में क्या दयनीय होता है? जब वह सत्य को समझता भी है, तो वह इसे अभ्यास में नहीं डालता है। समस्या को पूरी तरह से समझकर भी वह उसकी ज़िम्मेदारी नहीं उठाता; वह जानता है कि यह उसकी ज़िम्मेदारी है, लेकिन वह इसमें अपना दिल नहीं लगाता है। यदि तुम उन ज़िम्मेदारियों को नहीं उठाते जो तुम्हारे दायरे में हैं, तो उन ज़रा-सी ज़िम्मेदारियों का क्या मोल है जो तुम उठाते हो? उनसे क्या फर्क़ पड़ता है? तुम केवल नाममात्र के लिए कोशिश करते हो, सिर्फ कहने के लिए कहते हो। तुम इसमें अपना दिल नहीं लगाते, इसमें अपनी पूरी ऊर्जा लगाने की बात तो छोड़ ही दो। यह एक स्वीकार्य मानक तक अपना कर्तव्य पूरा करना नहीं है, इसमें कोई निष्ठा नहीं है; तुम केवल अपने माथे के पसीने की खा रहे हो, जैसे-तैसे परमेश्वर के अनुयायी बने हुए हो। क्या ऐसी आस्था का कोई महत्त्व है? ऐसी आस्था बहुत तुच्छ होती है—इसका क्या मोल है? जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो तो तुम्हें एक क़ीमत चुकानी होती है। तुम्हें इसे गंभीरता से लेना होगा। गंभीरता से लेने का क्या अर्थ है? गंभीरता से लेने का अर्थ यह नहीं है कि थोड़ी-सी मेहनत कर लो, या कोई शारीरिक यातना झेल लो। मुख्य बात यह है कि तुम्हारे दिल में परमेश्वर, और एक दायित्व-भार हो। तुम्हारे दिल में तुम्हें अपने कर्तव्य के महत्त्व को तोलना चाहिए, और फिर इस भार को, इस दायित्व को अपने हर काम में उठाए रखना चाहिए और अपना दिल इसमें लगाना चाहिए। तुम्हें स्वयं को उस लक्ष्य के योग्य बनाना चाहिए जो परमेश्वर ने तुम्हें प्रदान किया है, साथ ही तुम्हें खुद को परमेश्वर ने तुम्हारे लिए जो कुछ भी किया है उसके योग्य, और तुमसे उसकी उम्मीदों के योग्य भी बनाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही गंभीर होना है। सिर्फ लापरवाही से काम करने से कुछ न होगा; तुम लोगों को छल सकते हो, पर तुम परमेश्वर को बेवकूफ़ नहीं बना सकते। यदि कर्तव्य को करते समय, कोई सच्चा मूल्य न हो, तुम्हारी कोई निष्ठा न हो, तो यह मानक के अनुसार नहीं है। यदि तुम परमेश्वर में अपनी आस्था को और तुम्हारे काम के निष्पादन को गंभीरता से नहीं लेते हो; यदि तुम हमेशा बिना मन लगाए काम करते हो और अपने कामों में लापरवाह रहते हो, उस अविश्वासी की तरह जो अपने मालिक के लिए काम करता है; यदि तुम केवल नाम-मात्र के लिए प्रयास करते हो, किसी तरह हर दिन गुज़ार देते हो, उन समस्याओं को देखकर उनसे आँखें फेरते हो, कुछ गड़बड़ी हो जाए तो उसकी ओर ध्यान नहीं देते हो, और विवेकशून्य तरीके से हर उस बात को ख़ारिज करते हो जो तुम्हारे व्यक्तिगत लाभ की नहीं—तो क्या यह समस्या नहीं है? ऐसा कोई व्यक्ति परमेश्वर के घर का सदस्य कैसे हो सकता है? ऐसे लोग बाहर के होते हैं; वे परमेश्वर के घर के नहीं हो सकते। अपने दिल में तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि अपने कर्तव्य को पूरा करते समय, क्या तुम एकनिष्ठ और गंभीर हो, और परमेश्वर भी तुम्हारा हिसाब रखता है। तो क्या तुमने कभी भी अपने कर्तव्य के निष्पादन को गंभीरता से लिया है? क्या तुमने इसे दिल लगाकर किया है? क्या तुमने इसे अपना दायित्व, अपनी बाध्यता माना है? क्या तुमने इसके स्वामित्व को अपनाया है? अपने कर्तव्य को करते समय जब तुम किसी समस्या को देखते हो, तो क्या कभी भी तुमने इस बारे में खुलकर बात की है? यदि तुमने समस्या का पता चलने के बाद भी कभी खुलकर बात नहीं की है, न ही इसके बारे में सोचा तक है, यदि तुम इन चीज़ों की चिंता करने से विमुख रहते हो, और सोचते हो कि जितना झंझट कम हो उतना ही अच्छा है—यदि तुमने उन बातों की ओर यह सिद्धांत अपनाया है, तो तुम अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रहे हो; तुम अपने माथे के पसीने की खा रहे हो, तुम बस सेवा कर रहे हो। सेवा करने वाले परमेश्वर के घर के अपने लोग नहीं होते। वे कर्मचारी होते हैं, अपना काम पूरा करके वे अपना वेतन लेते हैं और चले जाते हैं, हर कोई अपने रास्ते जाता है और वे सब एक दूसरे के लिए अज़नबी हो जाते हैं। उनका परमेश्वर के घर से ऐसा सम्बन्ध होता है। परमेश्वर के घर के सदस्य इससे भिन्न होते हैं: वे परमेश्वर के घर में हर काम जी-जान से करते हैं, वे ज़िम्मेदारी उठाते हैं, परमेश्वर के घर में कौन-सा काम ज़रूरी है यह उनकी आँखें देख लेती हैं और वे उन कामों को अपने दिमाग में रखते हैं, वे जो भी सोचें और देखें उसे याद रखते हैं, वे भार उठाते हैं, उनमें ज़िम्मेदारी का एक एहसास होता है—ऐसे लोग परमेश्वर के घर के सदस्य होते हैं। क्या तुम लोग इस बिंदु तक पहुँचे हो? (नहीं।) तो फिर तुम लोगों को अभी भी एक लम्बा रास्ता तय करना होगा, इसलिए तुम लोगों को अनुसरण करना ज़ारी रखना होगा! यदि तुम स्वयं को परमेश्वर के घर का सदस्य नहीं मानते और स्वयं को हटा लेते हो—तो परमेश्वर तुम्हें किस तरह से देखता है? परमेश्वर तुम्हें बाहर का नहीं मानता, ये तुम ही हो जिसने अपने आप को उसके दरवाज़े के बाहर कर दिया है। तो अगर वस्तुगत भाव से देखें, तो सही मायने में तुम किस तरह के इंसान हो? तुम उसके घर में नहीं हो। परमेश्वर जो भी कहता है या जो भी निर्णय लेता है, उससे क्या इस बात का कोई सरोकार है? यह तुम ही हो जिसने अपना छोर, अपना स्थान परमेश्वर के घर के बाहर रखा है—इसके लिए और किसे दोष दिया जा सकता है?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्य को अच्छी तरह निभाने के लिए कम से कम, एक जमीर का होना आवश्यक है' से उद्धृत

सतही तौर, कुछ लोगों में कोई गंभीर समस्या प्रतीत नहीं होती। वे न तो कोई विघ्न पैदा करते हैं और न ही कोई परेशानी खड़ी करते हैं, वे कोई ऐसा काम भी नहीं करते जो दुष्ट करते हैं और वे मसीह-विरोधी मार्ग पर भी नहीं चलते। अपने कर्तव्य-निर्वहन में उनके सामने कोई सैद्धांतिक त्रुटि या समस्या भी नहीं आती, फिर भी, उन्हें एहसास भी नहीं होता और वे उजागर हो जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? लोगों को कोई समस्या नहीं दिखती, लेकिन परमेश्वर उनके अंतरतम हृदय की जाँच करके जान लेता है कि कोई समस्या है। समय बीतता जाता है और वे प्रायश्चित नहीं करते, इसलिए उन्हें उजागर किया जाना चाहिए। प्रायश्चित न करने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि उनके काम करने का रवैया गलत होता है, लापरवाही से भरा होता है, अनमना होता है, चीजों को हल्के में लेने वाला रवैया होता है, वे कर्तव्यनिष्ठ भी नहीं होते, समर्पित होने की तो बात ही छोड़ दो। वे शायद थोड़ा-बहुत प्रयास करते हों, लेकिन वे बेमन से काम करते हैं। वे पूरे दिल से काम नहीं करते और उनके अपराधों का कोई अंत नहीं होता। परमेश्वर ने, अपनी प्रधान-स्थिति से, कभी भी उन्हें पश्चाताप करते या अपने लापरवाही और बेमन से काम करने वाले रवैये को बदलते नहीं देखा—अर्थात, वे अपने हाथों की बुराई को छोड़कर परमेश्वर के आगे पश्चाताप नहीं करते। परमेश्वर उनमें पश्‍चाताप की मनोवृत्ति नहीं देखता और वह उनकी मनोवृत्ति में कोई बदलाव भी नहीं देखता। वे इसी मनोवृत्ति और पद्धति से अपने कर्तव्य और परमेश्वर के आदेश के संबंध में अड़ियल बने रहते हैं। उनके इस जिद्दी और दुराग्रही स्वभाव में कभी कोई बदलाव नहीं आता। इससे भी बढ़कर, वे कभी भी परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ महसूस नहीं करते, उन्हें कभी नहीं लगता कि उनकी लापरवाही और बेमन से किया गया काम अपराध और दुष्टता है। उनके मन में न तो कोई कृतज्ञता का भाव होता है, न वे खुद को दोषी महसूस करते हैं, न उनमें कोई खेद का भाव आता है, अपराध-बोध आने की तो बात ही छोड़ दो। जैसे-जैसे समय बीतता है, परमेश्वर देखता है कि यह व्यक्ति लाइलाज है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर की बात की परवाह नहीं करता, वह चाहे जितने भी उपदेश सुन ले या उसे सत्य की कितनी भी समझ हो, उसका दिल प्रेरित नहीं होता और उसके रवैये में न कोई बदलाव आता है, न ही यह पूरी तरह परिवर्तित होता है। परमेश्वर कहता है : "इस व्यक्ति से अब कोई आशा नहीं है। मेरी कोई भी बात उसके दिल को छूती नहीं है, मेरी किसी भी बात से उसके अंदर बदलाव नहीं आता है। उसे बदलने का कोई उपाय नहीं है। यह व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाने के लिए अयोग्य है और मेरे घर में सेवा करने योग्य नहीं हैं।" और ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि जब वे अपना कर्तव्य निभाते हैं और काम करते हैं, तो चाहे उनके प्रति कितनी भी सहनशीलता और धैर्य दिखाया जाए, इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता और न ही उनमें कोई बदलाव आ पाता है। यह उन्हें बेहतर करने योग्य नहीं बना पाता, और न ही उन्हें सच में सत्य के मार्ग पर चलने की शुरुआत करने दे सकता है। ऐसा व्यक्ति लाइलाज होता है। जब परमेश्वर यह निर्धारित कर लेता है कि कोई व्यक्ति लाइलाज है, तो क्या वह तब भी उस व्यक्ति को मजबूती से पकड़े रहेगा? नहीं, वह ऐसा नहीं करता। परमेश्वर उसे जाने देगा। कुछ लोग हमेशा याचना करते हैं, "परमेश्वर, मुझ पर दया करो, मुझे पीड़ा मत पहुँचाओ, मुझे अनुशासित मत करो। मुझे थोड़ी आजादी दो! मुझे चीजों को थोड़ी-बहुत लापरवाही और बेमन से करने दो! मुझे थोड़ा स्वच्छंद होने दो!" वे नियंत्रित नहीं होना चाहते। परमेश्वर कहता है, "चूँकि तुम सही रास्ते पर नहीं चलना चाहते, तो मैं तुम्हें जाने दूँगा। मैं तुम्हें पूरी आजादी दूँगा। जाओ और वही करो जो करना चाहते हो। मैं तुम्हें नहीं बचाऊँगा, क्योंकि तुम लाइलाज हो।" जो लोग लाइलाज होते हैं, क्या उनमें कोई विवेकपूर्ण भावना होती है? क्या उनमें कृतज्ञता की कोई भावना होती है? क्या उनमें अपने आपको दोषी महसूस करने का कोई भाव होता है? क्या वे परमेश्वर की भर्त्सना, अनुशासन, प्रहार और न्याय को समझ पाते हैं? नहीं, वे इसे महसूस नहीं कर पाते। वे इन तमाम चीजों से अनभिज्ञ होते हैं; ये बातें उनके मन में या तो बहुत धुँधली होती हैं या मौजूद ही नहीं होतीं। जब कोई व्यक्ति इस अवस्था में आ जाता है कि उसके हृदय में परमेश्वर का वास ही नहीं होता, तो क्या वह उद्धार प्राप्त कर सकता है? कहना कठिन है। जब किसी की आस्था ऐसी स्थिति में आ जाती है, तो वह संकट में पड़ जाता है। क्या तुम लोग जानते हो कि तुम्हें कैसे अनुसरण करना चाहिए, कैसे अभ्यास करना चाहिए और कौन-सा मार्ग चुनना चाहिए ताकि इस परिणाम से बचते हुए यह सुनिश्चित किया जा सके कि ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो? पहले, सबसे महत्वपूर्ण है सही रास्ता चुनना, और फिर उस कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने पर ध्यान देना जो तुम्हें वर्तमान में करना चाहिए। यही सबसे महत्वपूर्ण है। वह चीज़ जो सबसे प्रत्यक्ष और गोचर रूप से उस बंधन को दर्शाती है जो तुम्हें परमेश्वर से जोड़ता है, वो यह है कि तुम परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपे जाने वाले मामलों और कार्यों का निपटान कैसे करते हो और तुम्हारा रवैया कैसा है। जो सबसे अधिक प्रत्यक्ष रूप से नज़र आता है, वह यही मुद्दा है। जब तुमने इस महत्वपूर्ण मुद्दे को समझ लिया हो और परमेश्वर ने तुम्हें जो आज्ञा दी है, उसे पूरा कर लिया हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा सम्बन्ध सामान्य होगा। जब परमेश्वर तुम्हें एक कार्य सौंपे, या तुम्हें किसी एक कर्तव्य को पूरा करने के लिए कहे, तब यदि तुम्हारा दृष्टिकोण सतही और उदासीन हो, और तुम इसे एक प्राथमिकता के रूप में नहीं देखते हो, तो क्या यह अपने पूरे दिल और पूरी ताक़त को लगा देने के ठीक विपरीत नहीं होता है? इसलिए, अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हारा रवैया निर्णायक महत्व का होता है, वैसे ही जैसे कि तुम्हारे द्वारा चुना गया तरीका और मार्ग होते हैं। अपने कर्तव्य को सरसरी तौर पर और जल्दबाज़ी में करने, और इसे महत्व न देने का परिणाम क्या होता है? इसका परिणाम है कि तुम अपना कर्तव्य ठीक ढंग से नहीं निभाओगे, भले ही तुम इसे अच्छी तरह से करने के योग्य हो। तुम्हारा कार्य-निष्पादन कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा, और परमेश्वर तुम्हारे कर्तव्य के प्रति तुम्हारे रवैये से संतुष्ट नहीं होगा। यदि, आरंभ से ही, तुमने सामान्य रूप से खोज की होती और सहयोग दिया होता; यदि तुमने अपने सभी विचारों को इसके लिए समर्पित कर दिया होता; यदि तुमने अपना दिल और अपनी आत्मा इसे करने में लगा दी होती, और अपना सारा प्रयास इसी में जुटा दिया होता, और एक अवधि का श्रम, अपनी मेहनत, और अपने विचारों को इसके लिए समर्पित कर दिया होता, या संदर्भ की सामग्री के लिए कुछ समय दिया होता, और अपने पूरे तन-मन को इसके लिए प्रतिबद्ध कर दिया होता; यदि तुम इस तरह का सहयोग देने में सक्षम होते, तो परमेश्वर तुम्हारी अगुवाई करता, तुम्हारा मार्गदर्शन करता। तुम्हें ज़्यादा प्रयत्न करने की ज़रूरत नहीं है; जब तुम सहयोग देने में कोई कसर नहीं छोड़ते, तो परमेश्वर पहले से ही तुम्हारे लिए सब कुछ व्यवस्थित कर देगा। यदि तुम मक्कार और विश्वासघाती हो, और काम के दौरान ही तुम्हारा हृदय परिवर्तन हो जाता है और तुम भटक जाते हो, तो परमेश्वर तुम में कोई रुचि नहीं लेगा; तुम इस अवसर को खो चुके होगे, और परमेश्वर कहेगा, "तुम योग्य नहीं हो; तुम बेकार हो। दूर खड़े हो जाओ। तुम्हें आलसी बने रहना पसंद है, है न? तुम धोखेबाज़ी और मक्कारी पसंद करते हो, है न? तुम आराम करना पसंद करते हो? ठीक है, फिर आराम करो।" परमेश्वर यह अनुग्रह और अवसर अगले व्यक्ति को दे देगा। तुम लोग क्या कहते हो : यह नुकसान है या फ़ायदा? यह बहुत बड़ा नुकसान है!

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

कुछ लोगों के लिए, भले ही वे अपने कर्तव्यों का पालन करते समय किसी भी समस्या का सामना क्यों न करें, वे सत्य की तलाश नहीं करते हैं और हमेशा अपने विचारों, अपनी अवधारणाओं, कल्पनाओं और इच्छाओं के अनुसार कार्य करते हैं। वे निरंतर अपनी स्वार्थी इच्छाओं को संतुष्ट करते हैं और उनके भ्रष्ट स्वभाव हमेशा उनके कार्यों पर नियंत्रण करते हैं। भले ही वे उन्हें सौंपे गए कर्तव्य को पूरा कर दें, फिर भी वे किसी सत्य को प्राप्त नहीं करते हैं। तो ऐसे लोग अपने कर्तव्य को करते समय किस पर निर्भर करते हैं? ऐसे व्यक्ति न तो सत्य पर निर्भर करते हैं, न ही परमेश्वर पर। जिस थोड़े से सत्य को वे समझते हैं, उसने उनके हृदयों में संप्रभुत्व हासिल नहीं किया है; वे इन कर्तव्यों को पूरा करने के लिए अपनी स्वयं की योग्यताओं और क्षमताओं पर, उस ज्ञान पर जो उन्होंने प्राप्त किया है और अपनी प्रतिभा पर, और साथ ही अपनी इच्छाशक्ति पर या नेक इरादों पर भरोसा कर रहे हैं। क्या यह अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना है? क्या यह अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से निभाना है? यद्यपि कभी-कभी तू अपने कर्तव्य को निभाने के लिए अपनी स्वाभाविकता, कल्पना, अवधारणाओं, ज्ञान और शिक्षा पर भरोसा करे, तेरे द्वारा की जाने वाली कुछ चीज़ों में सिद्धांत का कोई मुद्दा नहीं उभरता है। सतह पर ऐसा लगता है जैसे कि तूने गलत मार्ग नहीं अपनाया है, लेकिन एक ऐसी चीज़ है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है: अपने कर्तव्य को निभाने की प्रक्रिया के दौरान, यदि तेरी अवधारणाएँ, कल्पनाएँ और व्यक्तिगत इच्छाएँ कभी नहीं बदलती हैं और कभी भी सत्य के साथ प्रतिस्थापित नहीं की जाती हैं, यदि तेरे कार्य और कर्म कभी भी सत्य के सिद्धांतों के अनुसार नहीं किए जाते हैं, तो अंतिम परिणाम क्या होगा? तू एक सेवा करने वाला बन जाएगा। और ठीक यही बाइबल में लिखा है: "उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, 'मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ'" (मत्ती 7:22-23)। परमेश्वर अपने प्रयास लगाने वालों और सेवा प्रदान करने वालों को "अधर्म करने वाले" क्यों कहता है? एक बात पर हम निश्चित हो सकते हैं, और वह यह कि ये लोग चाहे कोई भी कर्तव्य निभाएँ या कोई भी काम करें, इन लोगों की अभिप्रेरणाएँ, बल, इरादे और विचार पूरी तरह से उनकी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं से पैदा होते हैं, पूरी तरह से उनके अपने विचारों और व्यक्तिगत हितों पर आधारित होते हैं, और उनके विचार और योजनाएँ पूरी तरह से उनकी शोहरत, रुतबे, अहंकार और भविष्य की संभावनाओं के चारों ओर घूमती हैं। उनके अंतरतम में, कोई सत्य नहीं होता, न ही वे सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हैं। इस प्रकार, अब तुम लोगों के लिए क्या खोजना अतिमहत्वपूर्ण है? (हम लोगों को सत्य की खोज करनी चाहिए और परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।) परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें विशेष रूप से क्या करना चाहिए? कोई काम करते समय तुम्हारे अंदर जो इरादे और विचार होते हैं, उनके संबंध में तुम्हें यह भेद करना ज़रूर सीखना चाहिए कि वे सत्य के अनुरूप हैं या नहीं, साथ ही तुम्हारे इरादे और विचार तुम्हारी अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति के लिए हैं या परमेश्वर के परिवार के हितों के लिए। अगर तुम्हारे इरादे और विचार सत्य के अनुरूप हैं, तो तुम अपनी सोच के अनुसार अपना कर्तव्य निभा सकते हो; लेकिन अगर वे सत्य के अनुरूप नहीं हैं, तो तुम्हें तुरंत पलटकर उस मार्ग का त्याग कर देना चाहिए। वह मार्ग सही नहीं है और तुम उस तरह से अभ्यास नहीं कर सकते; अगर तुम उस रास्ते पर चलते रहे, तो तुम अंत में दुष्टता कर बैठोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्यों में परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करें' से उद्धृत

पतरस को व्यवहार और शुद्धिकरण का अनुभव करने के माध्यम से पूर्ण बनाया गया था। उसने कहा था, "मुझे हर समय परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करना ही चाहिए। मैं जो भी करता हूँ उस सबमें मैं केवल परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने की तलाश करता हूँ, और चाहे मुझे ताड़ना मिले, या मेरा न्याय किया जाए, तो भी मैं ऐसा करके प्रसन्न हूँ।" पतरस ने अपना सब कुछ परमेश्वर को दे दिया था, और उसका कार्य, वचन, और संपूर्ण जीवन सब परमेश्वर को प्रेम करने के लिए थे। वह ऐसा व्यक्ति था जो पवित्रता की खोज करता था, और जितना अधिक उसने अनुभव किया, उसके हृदय की गहराई के भीतर परमेश्वर के लिए उसका प्रेम उतना ही अधिक बढ़ता गया। इसी समय, पौलुस ने बस बाहरी कार्य ही किया था, और यद्यपि उसने भी कड़ी मेहनत की थी, किंतु उसका परिश्रम अपना कार्य उचित ढंग से करने और इस तरह पुरस्कार पाने के लिए था। अगर वह जानता कि उसे कोई पुरस्कार नहीं मिलेगा, तो उसने अपने काम छोड़ दिया होता। पतरस जिस चीज़ की परवाह करता था वह उसके हृदय के भीतर सच्चा प्रेम था, और वह था जो व्यावहारिक था और जिसे प्राप्त किया जा सकता था। उसने इसकी परवाह नहीं की कि उसे पुरस्कार मिलेगा या नहीं, बल्कि इसकी परवाह की कि उसके स्वभाव को बदला जा सकता है या नहीं। पौलुस ने और भी कड़ी मेहनत करने की परवाह की थी, उसने बाहरी कार्य और समर्पण की, और सामान्य लोगों द्वारा अनुभव नहीं किए गए सिद्धांतों की परवाह की थी। वह न तो अपने भीतर गहराई में बदलावों की और न ही परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम की परवाह करता था। पतरस के अनुभव परमेश्वर का सच्चा प्रेम और सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए थे। उसके अनुभव परमेश्वर से निकटतर संबंध पाने के लिए, और व्यावहारिक जीवन यापन करने के लिए थे। पौलुस का कार्य इसलिए किया गया था क्योंकि यह यीशु के द्वारा उसे सौंपा गया था, और उन चीज़ों को पाने के लिए था जिनकी वह लालसा करता था, फिर भी ये स्वयं अपने और परमेश्वर के विषय में उसके ज्ञान से असंबद्ध थे। उसका कार्य केवल ताड़ना और न्याय से बचने के लिए था। पतरस ने जिसकी खोज की वह शुद्ध प्रेम था, और पौलुस ने जिसकी खोज की वह धार्मिकता का मुकुट था। पतरस ने पवित्र आत्मा के कार्य का कई वर्षों का अनुभव प्राप्त किया था, और उसे मसीह का व्यावहारिक ज्ञान, साथ ही स्वयं अपना अथाह ज्ञान भी था। और इसलिए, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम शुद्ध था। कई वर्षों के शुद्धिकरण ने यीशु और जीवन के उसके ज्ञान को उन्नत बना दिया था, और उसका प्रेम बिना शर्त प्रेम था, यह स्वतःस्फूर्त प्रेम था, और उसने बदले में कुछ नहीं माँगा, न ही उसने किसी लाभ की आशा की थी। पौलुस ने कई वर्ष काम किया, फिर भी उसने मसीह का अत्यधिक ज्ञान प्राप्त नहीं किया, और स्वयं अपने विषय में उसका ज्ञान भी दयनीय रूप से थोड़ा ही था। उसमें मसीह के प्रति कोई प्रेम ही नहीं था, और उसका कार्य और जिस राह पर वह चला निर्णायक कीर्ति पाने के लिए थे। उसने जिसकी खोज की वह श्रेष्ठतम मुकुट था, शुद्धतम प्रेम नहीं। उसने सक्रिय रूप से नहीं, बल्कि निष्क्रिय रूप से खोज की; वह अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर रहा था, बल्कि पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा पकड़ लिए जाने के बाद अपने अनुसरण में बाध्य था। और इसलिए, उसका अनुसरण यह साबित नहीं करता है कि वह परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी था; यह पतरस था जो परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी था जिसने अपना कर्तव्य निभाया था। मनुष्य सोचता है कि उन सभी को जो परमेश्वर के लिए कोई न कोई योगदान देते हैं पुरस्कार मिलना चाहिए, और योगदान जितना अधिक होता है, उतना ही अधिक यह मान लिया जाता है कि उन्हें परमेश्वर की कृपा प्राप्त होनी चाहिए। मनुष्य के दृष्टिकोण का सार लेन-देन से संबंधित है, और वह परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने की सक्रिय रूप से खोज नहीं करता है। परमेश्वर के लिए, लोग परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम की और परमेश्वर के प्रति संपूर्ण आज्ञाकारिता की जितनी अधिक खोज करते हैं, जिसका अर्थ परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने की खोज करना भी है, उतनी ही अधिक वे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर पाते हैं। परमेश्वर का दृष्टिकोण यह माँग करना है कि मनुष्य अपना मूल कर्तव्य और हैसियत पुनः प्राप्त करे। मनुष्य परमेश्वर का सृजित प्राणी है और इसलिए मनुष्य को परमेश्वर से कोई भी माँग करके अपनी सीमा नहीं लाँघनी चाहिए, और परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने से अधिक कुछ नहीं करना चाहिए। पतरस और पौलुस की मंज़िलों को, उनके योगदान के आकार के अनुसार नहीं, बल्कि इस बात के अनुसार आँका गया था कि परमेश्वर के सृजित प्राणियों के रूप में वे अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकते थे या नहीं; उनकी मंजिलें उससे निर्धारित हुई थीं जिसकी उन्होंने शुरुआत से खोज की थी, इसके अनुसार नहीं कि उन्होंने कितना कार्य किया था, या अन्य लोगों का आँकलन क्या था। और इसलिए, परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य सक्रिय रूप से निभाना ही सफलता का पथ है; परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम के पथ की खोज करना ही सबसे सही पथ है; अपने पुराने स्वभाव में बदलावों की खोज करना, और परमेश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम की खोज करना ही सफलता का पथ है। सफलता का ऐसा ही पथ मूल कर्तव्य की पुनः प्राप्ति का और साथ ही परमेश्वर के सृजित प्राणी के मूल प्रकटन का पथ भी है। यह पुनः प्राप्ति का पथ है, और यह आरंभ से अंत तक परमेश्वर के समस्त कार्य का लक्ष्य भी है। यदि मनुष्य का अनुसरण व्यक्तिगत असंयमी माँगों और विवेकहीन लालसाओं से कलंकित है, तो प्राप्त किया गया प्रभाव मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन नहीं होगा। यह पुनः प्राप्ति के कार्य के विपरीत है। यह निस्संदेह पवित्र आत्मा द्वारा किया गया कार्य नहीं है, और इसलिए यह साबित करता है कि इस प्रकार का अनुसरण परमेश्वर द्वारा स्वीकृत नहीं है। उस अनुसरण का भला क्या महत्व है जो परमेश्वर द्वारा स्वीकृत नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

भविष्य में, जो लोग विश्राम की अवस्था में जीवित बचेंगे, उन सभी ने क्लेश के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये वे सब लोग होंगे, जिन्होंने अपने कर्तव्य पूरे किए हैं और जिन्होंने जानबूझकर परमेश्वर को समर्पण किया है। जो केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने की इच्छा के साथ सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं, उन्हें रहने नहीं दिया जाएगा। परमेश्वर के पास प्रत्येक व्यक्ति के परिणामों के प्रबंधन के लिए उचित मानक हैं; वह केवल यूँ ही किसी के शब्दों या आचरण के अनुसार ये निर्णय नहीं लेता, न ही वह एक अवधि के दौरान किसी के व्यवहार के अनुसार निर्णय लेता है। अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गई किसी सेवा की वजह से वह किसी के दुष्ट व्यवहार के प्रति नर्मी कतई नहीं करेगा, न ही वह परमेश्वर के लिए एक बार स्वयं को खपाने के कारण किसी को मृत्यु से बचाएगा। कोई भी अपनी दुष्टता के लिए प्रतिफल से नहीं बच सकता, न ही कोई अपने दुष्ट आचरण को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि लोग वास्तव में अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे अनंतकाल तक परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हैं और उन्हें इसकी परवाह नहीं होती कि उन्हें आशीष मिलते हैं या वे दुर्भाग्य से पीड़ित होते हैं, वे पुरस्कार की तलाश नहीं करते। यदि लोग तब परमेश्वर के लिए वफ़ादार हैं, जब उन्हें आशीष दिखते हैं और जब उन्हें आशीष नहीं दिखाई देते, तो अपनी वफ़ादारी खो देते हैं और अगर अंत में भी वे परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ रहते हैं या उन कर्तव्यों को करने में असमर्थ रहते हैं जिसके लिए वे ज़िम्मेदार हैं, तो पहले वफ़ादारी से की गई परमेश्वर की सेवा के बावजूद वे विनाश की वस्तु बनेंगे। संक्षेप में, दुष्ट लोग अनंतकाल तक जीवित नहीं रह सकते, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग ही विश्राम के अधिकारी हैं। जब मानवता सही मार्ग पर होगी, लोग सामान्य मानवीय जीवन जिएँगे। वे सब अपने-अपने कर्तव्य निभाएँगे और परमेश्वर के प्रति पूर्णतः वफ़ादार होंगे। वे अपनी अवज्ञा और अपने भ्रष्ट स्वभाव को पूरी तरह छोड़ देंगे और वे अवज्ञा और प्रतिरोध दोनों के बिना परमेश्वर के लिए और परमेश्वर के कारण जिएंगे। वे पूर्णतः परमेश्वर को समर्पित होने में सक्षम होंगे। यही परमेश्वर और मानवता का जीवन होगा; यह राज्य का जीवन होगा और यह विश्राम का जीवन होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

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वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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