106. कर्तव्य को निभाने और सेवा करने के बीच भेद के सिद्धांत

(1) सही मायने में अपने कर्तव्य को निभाने का एकमात्र तरीका यह है कि प्रत्येक सच्चाई परमेश्वर के अनुरोध के अनुसार अमल में लाई जाए, और अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को उठाया जाए;

(2) अपने कर्तव्य के निष्पादन में, केवल परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में आत्म-चिंतन करने, भ्रष्टता को दूर करने, और सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होकर ही कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य को संतोषजनक ढंग से निभा सकता है;

(3) आशीर्वादों की खातिर और महिमा का एक मुकुट पाने की आशा में अपने कर्तव्य को निभाना परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने का प्रयास है; सार में, यह परमेश्वर को सेवा प्रदान करना है;

(4) जो अपने कर्तव्य के निष्पादन में लगातार प्रतिष्ठा और पद चाहता है, और सत्य को ज़रा भी स्वीकार नहीं करता है, बल्कि जो लगातार असावधान और लापरवाह होता है, वह स्पष्ट रूप से एक सेवा-कर्मी है;

(5) अपने कर्तव्य को संतोषजनक ढंग से निभाने का एकमात्र तरीका यह है कि सभी मामलों में सच्चाई की तलाश करना और परमेश्वर को प्रेम करने और संतुष्ट करने के उद्देश्य से चीज़ों को करना और अंत तक वफ़ादार बने रहना।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर में आस्था रखने वाले हर व्यक्ति को परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिये। अपने कर्तव्य को सही ढंग से निभाने वाले लोग ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, परमेश्वर उन्हें जो काम सौंपता है, उसे पूरा करने से ही उनके कर्तव्यों का निर्वहन अपेक्षित मानक के बराबर होगा। परमेश्वर के आदेश की पूर्णता के मानक हैं। प्रभु यीशु ने कहा: "तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से, और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना।" परमेश्वर से प्रेम करना उसका एक पहलू है जिसकी परमेश्वर लोगों से अपेक्षा करता है। वास्तव में, जब परमेश्वर लोगों को एक आदेश देता है, जब वे अपने विश्वास से अपना कर्तव्य निभाते हैं, तो जिन मानकों की वह उनसे अपेक्षा करता है वे हैं: अपने पूर्ण हृदय से, अपने पूर्ण प्राण से, अपने पूरे दिमाग से, और अपनी पूरी ताक़त के साथ। यदि तू मौज़ूद तो है, लेकिन तेरा हृदय मौज़ूद नहीं है, यदि तू कार्यों के बारे में अपने दिमाग से सोचता है और उन्हें स्मृति में रख देता है, लेकिन तू अपना हृदय उन में नहीं लगाता है, और यदि तू अपनी क्षमताओं का उपयोग करके चीज़ों को पूरा करता है, तो क्या यह परमेश्वर के आदेश को पूरा करना है? तो अपने कर्तव्य को सही तरीके से करने और परमेश्वर ने तुझे जो कुछ भी सौंपा है, उसे पूरा करने के लिए और अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक निभाने के लिए किस तरह का मानक प्राप्त करना ही चाहिए? यह अपने कर्तव्य को पूरे हृदय से, अपने पूरे प्राण से, अपने पूरे मन से, अपनी पूरी ताक़त से करना है। अगर तुम्हारे अंदर परमेश्वर से प्रेम करने वाला दिल नहीं है, तो फिर अपने कर्तव्य को सही ढंग से निभाने की कोशिश करने से बात नहीं बनेगी। अगर परमेश्वर के लिये तुम्हारा प्रेम मज़बूत और अधिक सच्चा होता चला जाता है, तो स्वाभाविक रूप से तुम पूरे दिल से, पूरी आत्मा से, पूरे मन से, और पूरी शक्ति से अपने कर्तव्य का निर्वाह कर पाओगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन जीने के लिए लोग ठीक-ठीक किस पर भरोसा करते रहे हैं' से उद्धृत

भले ही तू किसी भी कर्तव्य को पूरा करे, तुझे हमेशा परमेश्वर की इच्छा को समझने की और यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि तेरे कर्तव्य को लेकर उसकी क्या अपेक्षा है; केवल तभी तू सैद्धान्तिक तरीके से मामलों को सँभाल पाएगा। अपने कर्तव्य को निभाने में, तू अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार बिल्कुल नहीं जा सकता है या तू जो चाहे मात्र वह नहीं कर सकता है, जिसे भी करने में तू खुश और सहज हो, वह नहीं कर सकता है, या ऐसा काम नहीं कर सकता जो तुझे अच्छे व्यक्ति के रूप में दिखाये। यदि तू परमेश्वर पर अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को बलपूर्वक लागू करता है या उन का अभ्यास ऐसे करता है मानो कि वे सत्य हों, उनका ऐसे पालन करता है मानो कि वे सत्य के सिद्धांत हों, तो यह कर्तव्य पूरा करना नहीं है, और इस तरह से तेरा कर्तव्य निभाना परमेश्वर के द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। कुछ लोग सत्य को नहीं समझते हैं, और वे नहीं जानते कि अपने कर्तव्यों को ठीक से पूरा करने का क्या अर्थ है। उन्हें लगता है कि चूँकि उन्होंने अपना दिल और अपना प्रयास इसमें लगाया है, और देहासक्ति का त्याग किया है और कष्ट उठाया है, इसलिए उनके कर्तव्य की पूर्ति मानकों पर खरी उतरेगी—पर फिर क्यों परमेश्वर हमेशा असंतुष्ट रहता है? इन लोगों ने कहाँ भूल की है? उनकी भूल यह थी कि उन्होंने परमेश्वर की अपेक्षाओं की तलाश नहीं की थी, बल्कि अपने ही विचारों के अनुसार काम किया था; उन्होंने अपनी ही इच्छाओं, पसंदों और स्वार्थी उद्देश्यों को सत्य मान लिया था और उन्होंने इनको वो मान लिया जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, मानो कि वे परमेश्वर के मानक और अपेक्षाएँ प हों। जिन बातों को वे सही, अच्छी और सुन्दर मानते थे, उन्हें सत्य के रूप में देखते थे; यह गलत है। वास्तव में, भले ही लोगों को कभी कोई बात सही लगे, लगे कि यह सत्य के अनुरूप है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि यह आवश्यक रूप से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। लोग जितना अधिक यह सोचते हैं कि कोई बात सही है, उन्हें उतना ही अधिक सावधान होना चाहिए और उतना ही अधिक सत्य को खोजना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उनकी सोच परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप है या नहीं। यदि यह उसकी अपेक्षाओं के विरुद्ध है और उसके वचनों के विरुद्ध है, तो तुम्हारा यह सोचना गलत है कि यह बात सही है, क्योंकि यह बस एक मानवीय विचार है और यह आवश्यक रूप से सत्य के अनुरूप नहीं होगा भले ही तुम्हें यह कितना भी सही लगे। सही और गलत का तुम्हारा निर्णय सिर्फ़ परमेश्वर के वचनों पर आधारित होना चाहिए, और तुम्हें कोई बात चाहे जितनी भी सही लगे, जबतक इसका आधार परमेश्वर के वचन न हों, तुम्हें इसे हटा देना चाहिए। कर्तव्य क्या है? यह परमेश्वर द्वारा लोगों को सौंपा गया एक आदेश है। तो तुम्हें अपना कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? व्यक्तिपरक मानवीय इच्छाओं के आधार पर नहीं बल्कि परमेश्वर की अपेक्षाओं और मानकों के अनुसार काम कर तथा सत्य के सिद्धांतों पर अपना व्यवहार आधारित कर। इस तरह तुम्हारा अपने कर्तव्य को करना मानकों के स्तर का होगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य के सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाया जा सकता है' से उद्धृत

तुम जो भी कर्तव्य निभाते हो उसमें जीवन-प्रवेश शामिल होता है। तुम्हारा काम नियमित हो या अनियमित, नीरस हो या जीवंत, तुम्हें हमेशा जीवन-प्रवेश हासिल करना ही चाहिए। कुछ लोगों द्वारा किये गये काम एकरसता वाले होते हैं; वे हर दिन वही काम करते रहते हैं। मगर, इनको करते समय, ये लोग अपनी जो दशाएं प्रकट करते हैं वे सब एक-समान नहीं होतीं। कभी-कभार अच्छी मन:स्थिति में होने पर लोग थोड़े ज़्यादा चौकस होते हैं और बेहतर काम करते हैं। बाकी समय, किसी अनजान प्रभाव के चलते, उनका शैतानी स्वभाव उनमें शैतानी जगाता है जिससे उनमें अनुचित विचार उपजते हैं, वे बुरी हालत और मन:स्थिति में आ जाते हैं; परिणाम यह होता है कि वे अपना काम सतही ढंग से करते हैं। लोगों की आतंरिक दशाएं निरंतर बदलती रहती हैं; ये किसी भी स्थान पर किसी भी वक्त बदल सकती हैं। तुम्हारी दशा चाहे जैसे बदले, अपनी मन:स्थिति के अनुसार कर्म करना हमेशा ग़लत होता है। मान लो कि जब तुम अच्छी मन:स्थिति में होते हो, तो थोड़ा बेहतर करते हो, और बुरी मन:स्थिति में होते हो तो थोड़ा बदतर करते हो—क्या यह काम करने का कोई सैद्धांतिक ढंग है? क्या तुम इस प्रकार अपने कर्तव्य को संतोषजनक ढंग से निभा सकते हो? मन:स्थिति चाहे जैसी हो, लोगों को परमेश्वर के सामने प्रार्थना करना और खुद को संभालना आना चाहिए, और सत्य की खोज करना और सिद्धांत के साथ कर्म करना आना चाहिए, तभी वे अपनी मन:स्थिति द्वारा नियंत्रित होने, और उसके द्वारा इधर-उधर भटकाए जाने से बच सकते हैं। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें हमेशा खुद को जांच कर देखना चाहिए कि क्या तुम सिद्धांत के अनुसार काम कर रहे हो, तुम्हारा कर्तव्य निर्वाह सही स्तर का है या नहीं, कहीं तुम इसे सतही तौर पर तो नहीं कर रहे हो, कहीं तुमने अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने से जी चुराने की कोशिश तो नहीं की है, कहीं तुम्हारे रवैये और तुम्हारे सोचने के तरीके में कोई खोट तो नहीं। एक बार तुम्हारे आत्मचिंतन कर लेने और तुम्हारे सामने इन चीज़ों के स्पष्ट हो जाने से, अपना कर्तव्य निभाने में तुम्हें आसानी होगी। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हारा किसी भी चीज़ से सामना हो—नकारात्मकता और कमज़ोरी, या निपटान के बाद बुरी मन:स्थिति में होना—तुम्हें कर्तव्य के साथ ठीक से पेश आना चाहिए, और तुम्हें साथ ही सत्य को खोजना और परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए। ये काम करने से तुम्हारे पास अभ्यास करने का मार्ग होगा। अगर तुम अपना कर्तव्य निर्वाह बहुत अच्छे ढंग से करना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी मन:स्थिति से बिल्कुल प्रभावित नहीं होना चाहिए। तुम्हें चाहे जितनी निराशा या कमज़ोरी महसूस हो रही हो, तुम्हें अपने हर काम में पूरी सख्ती के साथ सत्य का अभ्यास करना चाहिए, और सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए। अगर तुम ऐसा करोगे, तो न सिर्फ दूसरे लोग तुम्हें स्वीकार करेंगे, बल्कि परमेश्वर भी तुम्हें पसंद करेगा। इस तरह, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे, जो ज़िम्मेदार है और दायित्व का निर्वहन करता है; तुम सचमुच में एक अच्छे व्यक्ति होगे, जो अपने कर्तव्य को सही स्तर पर निभाता है और जो पूरी तरह से एक सच्चे इंसान की तरह जीता है। ऐसे लोगों का शुद्धिकरण किया जाता है और वे अपना कर्तव्य निभाते समय वास्तविक बदलाव हासिल करते हैं, उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में ईमानदार कहा जा सकता है। केवल ईमानदार लोग ही सत्य का अभ्यास करने में डटे रह सकते हैं और सिद्धांत के साथ कर्म करने में सफल हो सकते हैं, और मानक स्तर के अनुसार कर्तव्य निभा सकते हैं। सिद्धांत पर चलकर कर्म करने वाले लोग अच्छी मन:स्थिति में होने पर अपना कर्तव्य ध्यान से निभाते हैं; वे सतही ढंग से कार्य नहीं करते, वे अहंकारी नहीं होते और दूसरे उनके बारे में ऊंचा सोचें इसके लिए दिखावा नहीं करते। बुरी मन:स्थिति में होने पर भी वे अपने रोज़मर्रा के काम को उतनी ही ईमानदारी और ज़िम्मेदारी से पूरा करते हैं और उनके कर्तव्य निर्वाह के लिए नुकसानदेह या उन पर दबाव डालने वाली या उनके काम में बाधा पहुँचाने वाली किसी चीज़ से सामना होने पर भी वे परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत रख पाते हैं और यह कहते हुए प्रार्थना करते हैं, "मेरे सामने चाहे जितनी बड़ी समस्या खड़ी हो जाए—भले ही आसमान फट कर गिर पड़े—जब तक परमेश्वर मुझे जीने देगा, अपना कर्तव्य निभाने की भरसक कोशिश करने का मैं दृढ़ संकल्प लेता हूँ। मेरे जीवन का प्रत्येक दिन वह दिन होगा जब मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए कड़ी मेहनत करूंगा ताकि मैं परमेश्वर द्वारा मुझे दिये गये इस कर्तव्य, और उसके द्वारा मेरे शरीर में प्रवाहित इस सांस के योग्य बना रहूँ। चाहे जितनी भी मुश्किलों में रहूँ, मैं उन सबको परे रख दूंगा क्योंकि कर्तव्य निर्वाह करना मेरे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है!" जो लोग किसी व्यक्ति, घटना, चीज़ या माहौल से प्रभावित नहीं होते, जो किसी मन:स्थिति या बाहरी हालात से नियंत्रित नहीं होते, और जो परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गये कर्तव्यों और आदेशों को सबसे आगे रखते हैं—वही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं और सच्चाई के साथ उसके सामने समर्पण करते हैं। ऐसे लोगों ने जीवन-प्रवेश हासिल किया है और सत्य की वास्तविकता में प्रवेश किया है। यह सत्य को जीने की सबसे व्यावहारिक और सच्ची अभिव्यक्तियों में से एक है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए' से उद्धृत

ज़्यादातर लोग इस मनोस्थिति में अपने कर्तव्यों को निभाते हैं : "यदि कोई अगुवाई करता है, तो मैं पीछे चलता हूँ। वे मुझे जहाँ भी ले जाएंगे, मैं उनका अनुसरण करूंगा और वे मुझसे जो भी करने को कहेंगे, मैं करूंगा।" दूसरी ओर, ज़िम्मेदारी या चिंता लेना या अतिरिक्त ध्यान देना, वे चीजें हैं जो उनके बस के बाहर हैं और जिनकी कीमत चुकाने के लिए वे तैयार नहीं हैं। शारीरिक प्रयास में उनकी हिस्सेदारी है, लेकिन वे ज़िम्मेदारी में हिस्सा नहीं लेते। यह वास्तव में अपना कर्तव्य निभाना नहीं है। तुम्हें अपने कर्तव्य में पूरा दिल लगाना सीखना चाहिए; यदि किसी के पास दिल है, तो उसे इसका उपयोग करना चाहिए। यदि कोई अपने दिल का उपयोग कभी नहीं करता, तो यह साबित होता है कि वह हृदयहीन है, और हृदयहीन लोग सत्य को प्राप्त नहीं कर सकते! वे सत्य क्यों प्राप्त नहीं कर सकते? वे नहीं जानते कि परमेश्वर के सामने कैसे आएँ; वे नहीं जानते कि परमेश्वर की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन को समझने में अपना दिल कैसे लगाएँ, या चिंतन में, या सत्य की खोज में, या परमेश्वर की इच्छा को खोजने, समझने और उसके प्रति विचारशीलता दिखाने में अपना दिल कैसे लगाएँ। क्या तुम लोगों को ऐसी अवस्थाओं का अनुभव है जिनमें तुम अक्सर परमेश्वर के सामने शांत रह सके हो, और चाहे कुछ भी हो जाए, और चाहे तुम्हारा कर्तव्य कुछ भी हो, तुम अक्सर परमेश्वर के सामने आकर उसके वचनों पर दिल लगाकर गौर किया हो, और सत्य की खोज में और कर्तव्य निभाने के तरीके पर विचार करने में अपना दिल लगाया हो? क्या ऐसे अवसर कई बार आए हैं? अपना कर्तव्य दिल लगाकर करने और इसकी ज़िम्मेदारी लेने के लिए तुम्हें पीड़ा सहने और एक कीमत चुकाने की ज़रूरत है। केवल इसके बारे में बात करना ही काफ़ी नहीं है। यदि तुम अपना कर्तव्य दिल लगाकर नहीं करते, बल्कि हमेशा शारीरिक प्रयास करना चाहते हो, तो तुम्हारा कर्तव्य निश्चित ही अच्छी तरह पूरा नहीं होगा। तुम बस एक ढर्रे पर काम करते रहोगे और कुछ नहीं, और तुम्हें पता नहीं होगा कि तुमने अपना कर्तव्य कितनी अच्छी तरह से निभाया। यदि तुम दिल लगाकर काम करोगे, तो तुम धीरे-धीरे सत्य को समझोगे; लेकिन अगर तुम ऐसा नहीं करोगे, तो तुम नहीं समझोगे। जब तुम दिल लगाकर अपना कर्तव्य निभाते हो और सत्य का पालन करते हो, तो तुम धीरे-धीरे परमेश्वर की इच्छा को समझने, स्वयं के भ्रष्टाचार और कमियों का पता लगाने और अपनी सभी विभिन्न अवस्थाओं में महारत हासिल करने में सक्षम हो जाते हो। यदि तुम खुद की जांच करने के लिए अपना दिल नहीं लगाते, लेकिन केवल बाहरी प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम अपने दिल में उत्पन्न होने वाली विभिन्न आवस्थाओं और विभिन्न बाहरी वातावरणों में अपनी सभी प्रतिक्रियाओं को जानने में असमर्थ होगे। अगर तुम खुद की जांच करने के लिए अपना दिल नहीं लगाते हो, तो तुम्हारे लिए अपने दिल की समस्याओं का हल करना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए, तुम्हें दिल लगाकर और ईमानदारी के साथ परमेश्वर की स्तुति और आराधना करनी चाहिए। दिल लगाकर और ईमानदारी के साथ परमेश्वर की आराधना करने के लिए तुम्हारे पास एक शांत और ईमानदार दिल होना चाहिए; अपने दिल की अथाह गहराईयों में, परमेश्वर की इच्छा और सत्य खोजना तुम्हें आना चाहिए, और तुम्हें चिंतन करना चाहिए कि तुम अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से कैसे करो, यह विचार करते हुए कि तुम अपने कर्तव्य के कौन-से हिस्सों को अभी तक समझ नहीं पाए हो और अपने कर्तव्य को बेहतर तरीके से कैसे निभाया जा सकता है। केवल इन बातों को अपने दिल में अक्सर सोचकर ही तुम सत्य को प्राप्त कर पाओगे। अगर ये बातें तुम अपने दिल में अक्सर नहीं सोचते, और इसके बजाय तुम्हारा दिल मन की या बाहर की चीज़ों से भरा है, या ऐसी चीज़ों ने यहाँ घर कर लिया है, जिनका दिल का इस्तेमाल करने और ईमानदारी के साथ परमेश्वर की आराधना करने से कोई सरोकार नहीं है—यानि इनका इसके साथ कुछ भी लेना-देना नहीं है—तो क्या तुम सत्य को प्राप्त कर पाओगे? क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा कोई रिश्ता है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है' से उद्धृत

सेवा-कर्म का अर्थ है कि तुम वह करो जो भी तुम करना चाहते हो, कम से कम, बशर्ते कि तुम जो करते हो उससे परमेश्वर के स्वभाव का अपमान न हो। जब तक कोई भी तुम्हारे कार्यों की जाँच-पड़ताल न करे और जब तक जो तुम करते हो वह ग्रहण करने योग्य है, तो यह काफी है। स्वभाव के बदलाव, सत्य-सिद्धांतों के अनुसार काम करने, परमेश्वर की इच्छा संतुष्ट करने, और यहाँ तक कि कैसे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना है या अपने कर्तव्य का कैसे अच्छे ढंग से निर्वाह करना है और उसका लेखा-जोखा कैसे परमेश्वर को देना है, इसके साथ तुम कोई मतलब नहीं रखते हो। तुम इनमें से किसी भी चीज़ पर ध्यान नहीं देते हो और इसे ही क्या सेवा-कर्म कहा जाता है। सेवा-कर्म का अर्थ है जो भी कुछ तुम्हारे पास है, उसके साथ अत्यधिक प्रयास करना और सुबह से रात तक इस तरह काम करना मानो तुम गुलाम थे। अगर तुम ऐसे व्यक्ति से पूछोगे कि, "इतने वर्षों के पीड़ादायक, कठिन परिश्रम जिसमें तुमने स्वयं को डुबोए रखा, यह सब किसके लिए था?" तब वह कहेगा, "क्यों, ताकि मैं आशीष प्राप्त कर सकूं।" अगर तुम उससे पूछोगे कि परमेश्वर में उसके इतने वर्षों तक विश्वास करने के परिणामस्वरूप उसके स्वभाव में कुछ बदलाव आया है, क्या परमेश्वर के अस्तित्व को लेकर वह निश्चित हो गया है, क्या उसके पास सृष्टिकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं की वास्तविक समझ या अनुभव का कुछ अंश है, तो इन सबका उत्तर स्पष्ट रूप से "ना" होगा और वह इनमें से किसी भी चीज़ के बारे में बोल नहीं पाएगा। जब स्वभाव में बदलावों से संबंधित किसी भी सूचक में कोई सुधार या प्रगति नहीं होती है, ऐसा व्यक्ति केवल लगातार सेवा प्रदान करता है। अगर एक व्यक्ति अनेक वर्षों तक सेवा करता है, और इसे जाने बिना, यह समझ लेता है कि वह एक भ्रष्ट स्वभाव धारण करता है, कि वह अकसर परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करता है, कि वह अकसर शिकायतें करता है, कि वह अकसर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने में असमर्थ है, कि वह अत्यधिक भ्रष्ट है, कि परमेश्वर की बात पर ध्यान दिए बगैर कि वह कैसे उसे उसके सामने समर्पण करने के लिए कहता है, वह ऐसा करने में असमर्थ है। वह स्वयं को संयमित करने का प्रयास करता है पर बात नहीं बनती, और न ही स्वयं को कोसने या शपथ लेने से बात बनती है। अंत में, उसे पता चलता हैः "वास्तव में मनुष्य एक भ्रष्ट स्वभाव धारण करता है और इसीलिए वह परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने में सक्षम है। जब भी कुछ होता है, लोगों के पास अपनी स्वयं की इच्छाएं होती हैं और वे हमेशा परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का अन्वेषण कर रहे होते हैं। हालाँकि वे अत्यधिक प्रयास करने को तैयार होते हैं, लेकिन जैसे ही कुछ उनके स्वभाव और उनकी अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं, इरादों और कामनाओं में उन्हें फँसाता है, वे उन्हें त्यागने या छोड़ पाने में असमर्थ हो जाते हैं। वे हमेशा उस तरीके से चीज़ें करना चाहते हैं, जो उन्हें संतुष्ट करती हैं। यह मैं हूँ और मुझे वास्तव में संभालना कठिन है! क्या किया जा सकता है?" अगर उन्होंने इन बातों पर विचार करना शुरू कर दिया है, तो उनके पास मानव तरीकों की कुछ थोड़ी समझ पहले से ही है। वे लोग जो सेवा-कर्म में संलग्न हैं अगर किसी समय पर असली कार्य करना शुरू कर देते हैं, वे स्वभाव के बदलावों पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाते हैं, यह समझ प्राप्त कर पाते हैं कि असल में उनका भी भ्रष्ट स्वभाव है, कि वे भी घमंडी हैं और परमेश्वर को समर्पण करने में अक्षम हैं और यह कि इस तरीके से काम नहीं चलेगा; जब समय आएगा कि वे इन चीज़ों के बारे में सोच पाएंगे, तब वे अपने में सुधार करना शुरू कर चुके होंगे और एक उम्मीद है कि हो सकता है उनका स्वभाव बदल जाए और यह कि हो सकता है उनका उद्धार हो जाए। मान लें कि कोई व्यक्ति इन सब चीज़ों के बारे में कभी भी नहीं सोचता और यह सोचकर कि उनके हाथ में जो काम है उसे समाप्त करना ही परमेश्वर के आदेश को पूरा करने के लिए आवश्यक है और इसलिए वे यही जानते हैं कि किस तरह श्रम करना है और यह कि एक बार उन्होंने अत्यधिक प्रयास कर लिया तो वे अपने कर्तव्य का निर्वाह उचित ढंग से कर चुके होंगे, इस बारे में वे कभी नहीं सोचते कि परमेश्वर की अपेक्षाएँ क्या हैं, कि सत्य क्या है या क्या उनकी गिनती ऐसे लोगों में होगी, जो परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं—वे कभी भी इन चीज़ों के बारे में विचार नहीं करते। क्या कोई व्यक्ति जो अपने कर्तव्य की पूर्ति इस तरीके से करता है, उद्धार पा सकता है? उत्तर है नहीं। उन्होंने उद्धार के मार्ग पर चलना शुरू नहीं किया है या परमेश्वर पर विश्वास करने के सही मार्ग पर नहीं हैं, न ही उन्होंने परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित किए हैं और फिर भी वे अत्यधिक प्रयास करते हैं और परमेश्वर के घर में सेवा-कर्म में संलग्न रहते हैं। इस तरह का व्यक्ति परमेश्वर के घर में सेवा करता है और परमेश्वर उनकी देखभाल और उनकी रक्षा करता है, लेकिन वह उन्हें बचाने की योजना नहीं बनाता है, न ही वह उनसे निपटता है और उनकी काट-छाँट करता है, न ही उनका न्याय और उन्हें ताड़ना देता है, न ही उनका परीक्षण या शोधन करता है; वह केवल उन्हें इस जीवनकाल में आशीषों को कुछ हद तक प्राप्त करने की अनुमति देता है और इससे ज़्यादा कुछ नहीं। अगर ऐसा समय आएगा, जब ये लोग जान जाएंगे कि इन चीज़ों पर विचार करना चाहिए और जो उपदेश वे सुनते हैं उन्हें समझ लेते हैं, तो उन्हें अहसास होगाः "तो, यही सब है परमेश्वर पर विश्वास करने का मतलब। फिर तो मुझे अवश्य ही उद्धार पाने की इच्छा करनी चाहिए। अगर मैं ऐसा नहीं करता हूँ और इसके बजाय सेवा प्रदान करना ही स्वीकार करता हूँ, तो उसका परमेश्वर पर विश्वास करने से कोई लेना-देना नहीं होगा।" फिर वे विचार करते हैं: "भ्रष्ट स्वभाव के कौन-से पहलू मैं धारण करता हूँ? वास्तव में यह क्या चीज़ है, यह भ्रष्ट स्वभाव? चाहे जो हो, सबसे पहले मुझे परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए!" ये चीज़ें सत्य से और स्वभाव के बदलावों से संबंधित हैं और उनके लिए एक उम्मीद है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य के सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाया जा सकता है' से उद्धृत

अपने कर्तव्य के प्रति तुम लोगों का नज़रिया यह होता है: मैं देखूँगा कि मैं कितना कम काम कर सकता हूँ, कितने से काम चल जाएगा; तुम धीरे-धीरे काम करते हो, तुम्हें कोई परवाह नहीं कि तुम्हारी वजह से कितनी देर होती है। लेकिन अगर तुम लोग चीज़ों को गंभीरता से लो, तो तुम उन्हें झट से पूरा करा सकोगे। कुछ चीज़ें हैं जिन्हें कैसे करना है यह तुम लोग नहीं जानते, इसलिए मैं तुम्हें सटीक निर्देश देता हूँ। तुम लोगों को सोचना नहीं है, तुम्हें बस सुनना है और काम शुरू कर देना है—पर तुम लोगों से यह भी नहीं होता है। तुम लोगों की वफ़ादारी कहाँ है? यह कहीं दिखाई नहीं देती! तुम लोग सिर्फ बातें करते हो, तुम्हारा दिल इसमें नहीं है। तुम्हारा दिल समझ भी ले तो भी, तुम कुछ करते नहीं हो। ऐसा व्यक्ति वो होता है जो सत्य से प्रेम नहीं करता! यदि तुम लोग इसे अपनी आँखों से देख सकते हो और अपने दिल में महसूस भी कर सकते हो, पर फिर भी कुछ नहीं करते, तो दिल होने का क्या फ़ायदा? तुम्हारा बेकार ज़मीर तुम्हारे कर्मों को नियंत्रित नहीं करता, यह तुम्हारे विचारों को निर्देशित नहीं करता—तो इसका क्या काम है? इसका होना, न होना बराबर है; यह तो सिर्फ दिखावे के लिए है। इंसान की आस्था वाक़ई दयनीय होती है! उसके बारे में क्या दयनीय होता है? जब वह सत्य को समझता भी है, तो वह इसे अभ्यास में नहीं डालता है। समस्या को देखकर भी वह कोशिश नहीं करता कि इसकी ज़िम्मेदारी उठा ले; वह जानता है कि यह उसकी ज़िम्मेदारी है, लेकिन वह इसमें अपना दिल नहीं लगाता है। यदि तुम उन ज़िम्मेदारियों को नहीं उठाते जो तुम्हारे दायरे में हैं, तो उन ज़रा-सी ज़िम्मेदारियों का क्या मोल है जो तुम उठाते हो? उनसे क्या फर्क़ पड़ता है? तुम केवल नाममात्र के लिए कोशिश करते हो, सिर्फ कहने के लिए कहते हो। तुम इसमें अपना दिल नहीं लगाते, इसमें अपनी पूरी ऊर्जा लगाने की बात तो छोड़ ही दो। यह एक स्वीकार्य मानक तक अपना कर्तव्य पूरा करना नहीं है, इसमें कोई निष्ठा नहीं है; तुम केवल अपने माथे के पसीने की खा रहे हो, जैसे-तैसे परमेश्वर के अनुयायी बने हुए हो। क्या ऐसी आस्था का कोई महत्त्व है? ऐसी आस्था बहुत तुच्छ होती है—इसका क्या मोल है? जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो तो तुम्हें एक क़ीमत चुकानी होती है। तुम्हें इसे गंभीरता से लेना होगा। गंभीरता से लेने का क्या अर्थ है? गंभीरता से लेने का अर्थ यह नहीं है कि थोड़ी-सी मेहनत कर लो, या कोई शारीरिक यातना झेल लो। मुख्य बात यह है कि तुम्हारे दिल में परमेश्वर, और एक दायित्व-भार हो। तुम्हारे दिल में तुम्हें अपने कर्तव्य के महत्त्व को तोलना चाहिए, और फिर इस भार को, इस दायित्व को अपने हर काम में उठाए रखना चाहिए और अपना दिल इसमें लगाना चाहिए। तुम्हें स्वयं को उस लक्ष्य के योग्य बनाना चाहिए जो परमेश्वर ने तुम्हें प्रदान किया है, साथ ही तुम्हें खुद को परमेश्वर ने तुम्हारे लिए जो कुछ भी किया है उसके योग्य, और तुमसे उसकी उम्मीदों के योग्य भी बनाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही गंभीर होना है। सिर्फ लापरवाही से काम करने से कुछ न होगा; तुम लोगों को छल सकते हो, पर तुम परमेश्वर को बेवकूफ़ नहीं बना सकते। यदि कर्तव्य को करते समय, कोई सच्चा मूल्य न हो, तुम्हारी कोई निष्ठा न हो, तो यह मानक के अनुसार नहीं है। यदि तुम परमेश्वर में अपनी आस्था को और तुम्हारे काम के निष्पादन को गंभीरता से नहीं लेते हो; यदि तुम हमेशा बिना मन लगाए काम करते हो और अपने कामों में लापरवाह रहते हो, उस अविश्वासी की तरह जो अपने मालिक के लिए काम करता है; यदि तुम केवल नाम-मात्र के लिए प्रयास करते हो, किसी तरह हर दिन गुज़ार देते हो, उन समस्याओं को देखकर उनसे आँखें फेरते हो, कुछ गड़बड़ी हो जाए तो उसकी ओर ध्यान नहीं देते हो, और विवेकशून्य तरीके से हर उस बात को ख़ारिज करते हो जो तुम्हारे व्यक्तिगत लाभ की नहीं—तो क्या यह समस्या नहीं है? ऐसा कोई व्यक्ति परमेश्वर के घर का सदस्य कैसे हो सकता है? ऐसे लोग बाहर के होते हैं; वे परमेश्वर के घर के नहीं हो सकते। अपने दिल में तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि अपने कर्तव्य को पूरा करते समय, क्या तुम एकनिष्ठ और गंभीर हो, और परमेश्वर भी तुम्हारा हिसाब रखता है। तो क्या तुमने कभी भी अपने कर्तव्य के निष्पादन को गंभीरता से लिया है? क्या तुमने इसे दिल लगाकर किया है? क्या तुमने इसे अपना दायित्व, अपनी बाध्यता माना है? क्या तुमने इसके स्वामित्व को अपनाया है? अपने कर्तव्य को करते समय जब तुम किसी समस्या को देखते हो, तो क्या कभी भी तुमने इस बारे में खुलकर बात की है? यदि तुमने समस्या का पता चलने के बाद भी कभी खुलकर बात नहीं की है, न ही इसके बारे में सोचा तक है, यदि तुम इन चीज़ों की चिंता करने से विमुख रहते हो, और सोचते हो कि जितना झंझट कम हो उतना ही अच्छा है—यदि तुमने उन बातों की ओर यह सिद्धांत अपनाया है, तो तुम अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रहे हो; तुम अपने माथे के पसीने की खा रहे हो, तुम बस सेवा कर रहे हो। सेवा करने वाले परमेश्वर के घर के अपने लोग नहीं होते। वे कर्मचारी होते हैं, अपना काम पूरा करके वे अपना वेतन लेते हैं और चले जाते हैं, हर कोई अपने रास्ते जाता है और वे सब एक दूसरे के लिए अज़नबी हो जाते हैं। उनका परमेश्वर के घर से ऐसा सम्बन्ध होता है। परमेश्वर के घर के सदस्य इससे भिन्न होते हैं: वे हर बात में जी-जान से काम करते हैं, वे ज़िम्मेदारी उठाते हैं, परमेश्वर के घर में कौन-सा काम ज़रूरी है यह उनकी आँखें देख लेती हैं और वे उन कामों को अपने दिमाग में रखते हैं, वे जो भी सोचें और देखें उसे याद रखते हैं, वे भार उठाते हैं, उनमें ज़िम्मेदारी का एक एहसास होता है—ऐसे लोग परमेश्वर के घर के सदस्य होते हैं। क्या तुम लोग इस बिंदु तक पहुँचे हो? (नहीं।) तो फिर तुम लोगों को अभी भी एक लम्बा रास्ता तय करना होगा, इसलिए तुम लोगों को अनुसरण करना ज़ारी रखना होगा! यदि तुम स्वयं को परमेश्वर के घर का सदस्य नहीं मानते हो—यदि तुम स्वयं को घर के बाहर का कोई व्यक्ति मानते हो—तो परमेश्वर तुम्हें किस तरह से देखता है? परमेश्वर तुम्हें बाहर का नहीं मानता, ये तुम ही हो जिसने अपने आप को उसके दरवाज़े के बाहर कर दिया है। तो अगर वस्तुगत भाव से देखें, तो तुम उसके घर में नहीं हो। परमेश्वर जो भी कहता है या जो भी निर्णय लेता है, उससे क्या इस बात का कोई सरोकार है? यह तुम ही हो जिसने अपना छोर, अपना स्थान परमेश्वर के घर के बाहर रखा है—इसके लिए और किसे दोष दिया जा सकता है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्य को अच्छी तरह निभाने के लिए कम से कम, एक जमीर का होना आवश्यक है' से उद्धृत

लोग चाहे जो भी प्रतिभा, योग्यता, या कौशल धारण करते हों, यदि वे केवल चीज़ों को करते हैं और अपने कर्तव्य का पालन करने में ही अपनी ताक़त का उपयोग करते हैं; यदि वे चाहे जो कुछ भी करें, उसमें वे अपनी कल्पनाओं, अवधारणाओं या अपने सहज ज्ञान पर भरोसा करते हैं; यदि वे केवल अपनी ताक़त लगाते हैं, और कभी भी परमेश्वर की इच्छा की तलाश नहीं करते हैं, और उनके मन में कोई धारणा या आवश्यकता नहीं होती है, तो कहते हैं कि, "मुझे सत्य को व्यवहार में अवश्य लाना चाहिए। मैं अपना कर्तव्य कर रहा हूँ"; उनके विचार केवल अपने कार्य को अच्छी तरह से करने और अपने कार्य को पूरा करने से शुरू होते हैं, तो वे ऐसे लोग हैं जो पूरी तरह से अपनी योग्यता, प्रतिभा, क्षमता और कौशल के अनुसार जीते हैं? क्या इस तरह के बहुत से लोग हैं? विश्वास में, वे केवल स्वयं को परिश्रम में लगाने, अपने स्वयं के श्रम को बेचने, और अपने स्वयं के कौशलों को बेचने के बारे में सोचते हैं। विशेष रूप से जब परमेश्वर का घर उन्हें सामान्य कार्य करने के लिए देता है तब ज्यादातर लोग इस दृष्टिकोण से चीज़ों को करते हैं। वे बस खुद का बल लगाते हैं। कभी इसका अर्थ होता है अपने मुँह का उपयोग करना, कभी अपने हाथों का और शारीरिक शक्ति का उपयोग करना, और कभी इसका अर्थ दौड़-भाग करना होता है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि उन चीज़ों के अनुसार जीना अपनी ताक़त का उपयोग करना है, न कि सत्य को अभ्यास में लाना? किसी को परमेश्वर के घर द्वारा कोई कार्य दिया जाता है, और इसे प्राप्त करने पर, वह केवल यह सोचता है कि इस कार्य को कैसे यथाशीघ्र पूरा किया जाए ताकि वह कलीसिया के अगुवाओं को विवरण दे सके और उनकी प्रशंसा प्राप्त कर सके। ऐसे लोग एक कदम-दर-कदम योजना बना सकते हैं। वे बहुत ईमानदार प्रतीत होते हैं, लेकिन वे दिखावे के वास्ते कार्य को पूरा करने से ज्यादा किसी अन्य चीज़ पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हैं, या जब वे ऐसा कर रहे होते हैं, तो वे स्वयं के लिए अपने मानक निर्धारित करते हैं: इसे कैसे करें ताकि वे खुश और संतुष्ट महसूस करें, पूर्णता के उस स्तर को प्राप्त करना जिसके लिए वे प्रयास करते हैं। भले ही वे किसी भी मानक को निर्धारित करते हों, यदि इसका सत्य से कोई संबंध नहीं है, यदि वे सत्य की तलाश करने या इस बात को समझने और इसकी पुष्टि करने के बाद कि परमेश्वर उनसे क्या माँग करता है, कार्रवाई नहीं करते हैं, बल्कि इसके विपरीत, वे, उलझन में, आँखें मूँदकर कार्य करते हैं, तो यह केवल स्वयं का बल लगाना है। वे अपनी इच्छाओं के अनुसार, अपने दिमाग या योग्यता के अनुसार, या अपनी क्षमताओं और कौशलों के अनुसार कार्य कर रहे हैं। और इस तरह से उनके कार्य करने का परिणाम क्या होता है? हो सकता है कि कार्य पूरा हो गया हो, किसी ने कोई दोष नहीं निकाला हो, और हो सकता है कि तू इससे बहुत खुश हो। लेकिन ऐसा करने के दौरान, सबसे पहले तो: तूने परमेश्वर के इरादे को नहीं समझा; और उसके बाद: तूने इसे अपने पूरे हृदय से, अपने पूरे मन से, और अपनी पूरी ताक़त के साथ नहीं किया—तूने इसमें अपना पूरा हृदय नहीं लगाया। यदि तूने सत्य के सिद्धांतों की तलाश की होती, यदि तूने परमेश्वर की इच्छा की तलाश की होती, तो तू इसे पूरा करने में 90% प्रभावी होता, तू सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने में भी समर्थ होता, और तू ठीक से समझ गया होता कि तू जो कर रहा था वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। लेकिन यदि तू लापरवाह और बेतरतीब होता, तो भले ही कार्य पूरा हो गया हो, तब भी अपने हृदय में तू इस बारे में स्पष्ट नहीं होता कि तूने इसे कितनी अच्छी तरह से किया है। तेरे पास कोई मानदण्ड नहीं होगा, तुझे पता नहीं लगेगा कि यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है या नहीं, या यह सत्य के अनुरूप है या नहीं। इसलिए, जब भी इस तरह की स्थिति में कर्तव्यों का पालन किया जाता है, तो इसका चार शब्दों में उल्लेख किया जा सकता है—स्वयं का बल लगाना।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन जीने के लिए लोग ठीक-ठीक किस पर भरोसा करते रहे हैं' से उद्धृत

कुछ लोगों के लिए, भले ही वे अपने कर्तव्यों का पालन करते समय किसी भी समस्या का सामना क्यों न करें, वे सत्य की तलाश नहीं करते हैं और हमेशा अपने विचारों, अपनी अवधारणाओं, कल्पनाओं और इच्छाओं के अनुसार कार्य करते हैं। वे निरंतर अपनी स्वार्थी इच्छाओं को संतुष्ट करते हैं और उनके भ्रष्ट स्वभाव हमेशा उनके कार्यों पर नियंत्रण करते हैं। भले ही वे उन्हें सौंपे गए कर्तव्य को पूरा कर दें, फिर भी वे किसी सत्य को प्राप्त नहीं करते हैं। तो ऐसे लोग अपने कर्तव्य को करते समय किस पर निर्भर करते हैं? ऐसे व्यक्ति न तो सत्य पर निर्भर करते हैं, न ही परमेश्वर पर। जिस थोड़े से सत्य को वे समझते हैं, उसने उनके हृदयों में संप्रभुत्व हासिल नहीं किया है; वे इन कर्तव्यों को पूरा करने के लिए अपनी स्वयं की योग्यताओं और क्षमताओं पर, उस ज्ञान पर जो उन्होंने प्राप्त किया है और अपनी प्रतिभा पर, और साथ ही अपनी इच्छाशक्ति पर या नेक इरादों पर भरोसा कर रहे हैं। क्या यह अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना है? क्या यह अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से निभाना है? यद्यपि कभी-कभी तू अपने कर्तव्य को निभाने के लिए अपनी स्वाभाविकता, कल्पना, अवधारणाओं, ज्ञान और शिक्षा पर भरोसा करे, तेरे द्वारा की जाने वाली कुछ चीज़ों में सिद्धांत का कोई मुद्दा नहीं उभरता है। सतह पर ऐसा लगता है जैसे कि तूने गलत मार्ग नहीं अपनाया है, लेकिन एक ऐसी चीज़ है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है: अपने कर्तव्य को निभाने की प्रक्रिया के दौरान, यदि तेरी अवधारणाएँ, कल्पनाएँ और व्यक्तिगत इच्छाएँ कभी नहीं बदलती हैं और कभी भी सत्य के साथ प्रतिस्थापित नहीं की जाती हैं, यदि तेरे कार्य और कर्म कभी भी सत्य के सिद्धांतों के अनुसार नहीं किए जाते हैं, तो अंतिम परिणाम क्या होगा? तू एक सेवा करने वाला बन जाएगा। और ठीक यही बाइबल में लिखा है: "उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, 'मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ'" (मत्ती 7:22-23)। परमेश्वर अपने प्रयास लगाने वालों और सेवा प्रदान करने वालों को "अधर्म करने वाले" क्यों कहता है? एक बात पर हम निश्चित हो सकते हैं, और वह यह कि ये लोग चाहे कोई भी कर्तव्य निभाएँ या कोई भी काम करें, इन लोगों की अभिप्रेरणाएँ, बल, इरादे और विचार पूरी तरह से उनकी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं से पैदा होते हैं, पूरी तरह से उनके अपने विचारों और व्यक्तिगत हितों पर आधारित होते हैं, और उनके विचार और योजनाएँ पूरी तरह से उनकी शोहरत, रुतबे, अहंकार और भविष्य की संभावनाओं के चारों ओर घूमती हैं। उनके अंतरतम में, कोई सत्य नहीं होता, न ही वे सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हैं। इस प्रकार, अब तुम लोगों के लिए क्या खोजना अतिमहत्वपूर्ण है? (हम लोगों को सत्य की खोज करनी चाहिए और परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।) परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें विशेष रूप से क्या करना चाहिए? कोई काम करते समय तुम्हारे अंदर जो इरादे और विचार होते हैं, उनके संबंध में तुम्हें यह भेद करना ज़रूर सीखना चाहिए कि वे सत्य के अनुरूप हैं या नहीं, साथ ही तुम्हारे इरादे और विचार तुम्हारी अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति के लिए हैं या परमेश्वर के परिवार के हितों के लिए। अगर तुम्हारे इरादे और विचार सत्य के अनुरूप हैं, तो तुम अपनी सोच के अनुसार अपना कर्तव्य निभा सकते हो; लेकिन अगर वे सत्य के अनुरूप नहीं हैं, तो तुम्हें तुरंत पलटकर उस मार्ग का त्याग कर देना चाहिए। वह मार्ग सही नहीं है और तुम उस तरह से अभ्यास नहीं कर सकते; अगर तुम उस रास्ते पर चलते रहे, तो तुम अंत में दुष्टता कर बैठोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्यों में परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करें' से उद्धृत

इन दिनों, अधिकांश लोग इस तरह की स्थिति में हैं : "आशीष प्राप्त करने के लिए मुझे परमेश्वर के लिए खुद को खपाना होगा और परमेश्वर के लिए कीमत चुकानी होगी। आशीष पाने के लिए मुझे परमेश्वर के लिए सब-कुछ त्याग देना चाहिए; मुझे उसके द्वारा सौंपा गया काम पूरा करना चाहिए, और अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहिए।" इस पर आशीष प्राप्त करने का इरादा हावी है, जो अपने आपको पूरी तरह से परमेश्वर से पुरस्कार पाने और मुकुट हासिल करने के उद्देश्य से खपाने का उदाहरण है। ऐसे लोगों के दिल में सत्य नहीं होता, और निश्चित रूप से उनकी समझ केवल सिद्धांत के कुछ शब्दों से युक्त होती है, जिसका वे जहाँ भी जाते हैं, वहीं दिखावा करते हैं। उनका रास्ता पौलुस का रास्ता है। ऐसे लोगों का विश्वास निरंतर कठिन परिश्रम का कार्य है, और गहराई में उन्हें लगता है कि वे जितना अधिक करेंगे, परमेश्वर के प्रति उनकी निष्ठा उतनी ही अधिक सिद्ध होगी; वे जितना अधिक करेंगे, वह उनसे उतना ही अधिक संतुष्ट होगा; और जितना अधिक वे करेंगे, वे परमेश्वर के सामने मुकुट पाने के लिए उतने ही अधिक योग्य साबित होंगे, और उसके घर में निश्चित रूप से सबसे बड़ा आशीष प्राप्त करेंगे। वे सोचते हैं कि यदि वे पीड़ा सह सकें, उपदेश दे सकें और मसीह के लिए मर सकें, यदि वे अपने जीवन का त्याग कर सकें, और परमेश्वर द्वारा सौंपे गए सभी कर्तव्य पूरे कर सकें, तो वे परमेश्वर के सबसे धन्य लोगों में से होंगे—जो सबसे बड़ा आशीष प्राप्त करते हैं—और फिर उन्हें यकीनन मुकुट प्राप्त हो जाएगा। पौलुस ने भी यही कल्पना की थी और यही चाहा था; वह भी इसी मार्ग पर चला था, और ऐसे ही विचार लेकर उसने परमेश्वर की सेवा करने का काम किया था। क्या इन विचारों और इरादों की उत्पत्ति शैतानी प्रकृति से नहीं होती? यह सांसारिक मनुष्यों की तरह है, जो मानते हैं कि पृथ्वी पर रहते हुए उन्हें ज्ञान की खोज करनी चाहिए, और उसे प्राप्त करने के बाद ही वे भीड़ से अलग दिखायी दे सकते हैं, पदाधिकारी बनकर हैसियत प्राप्त कर सकते हैं; वे सोचते हैं कि जब उनके पास हैसियत हो जाएगी, तो वे अपनी महत्वाकांक्षाएँ पूरी कर सकते हैं और अपने घर और व्यवसाय को एक निश्चित मुकाम पर ले जा सकते हैं। क्या सभी अविश्वासी इसी मार्ग पर नहीं चलते? जिन लोगों पर इस शैतानी प्रकृति का वर्चस्व है, वे अपने विश्वास में केवल पौलुस की तरह हो सकते हैं : "मुझे परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की खातिर सब-कुछ छोड़ देना चाहिए; मुझे उसके समक्ष वफ़ादार होना चाहिए, और अंतत: मुझे सबसे शानदार मुकुट और सबसे बड़ा आशीष मिलेगा।" यह वही रवैया है, जो उन सांसारिक लोगों का होता है, जो सांसारिक चीज़ें पाने की कोशिश करते हैं; वे बिलकुल भी अलग नहीं हैं, और उसी प्रकृति के अधीन हैं। जब लोगों की शैतानी प्रकृति इस प्रकार की होगी, तो दुनिया में वे ज्ञान, हैसियत, शिक्षा प्राप्त करने और भीड़ से अलग दिखने की कोशिश करेंगे; परमेश्वर के घर में वे खुद को परमेश्वर के लिए खपाने, वफ़ादार होने और अंततः मुकुट और महान आशीष प्राप्त करने की कोशिश करेंगे। अगर परमेश्वर में विश्वास करने के बाद लोगों में सत्य न हो और वे अपने स्वभाव में बदलाव न लाएँ, तो निश्चित रूप से वे इसी मार्ग पर होंगे। इस वास्तविकता को कोई नहीं नकार सकता, यह एक ऐसा मार्ग है जो पतरस से एकदम विपरीत है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

पतरस का कार्य परमेश्वर के एक सृजित प्राणी के कर्तव्य का निर्वहन था। उसने प्रेरित की भूमिका में कार्य नहीं किया था, बल्कि परमेश्वर के प्रति प्रेम का अनुसरण करते हुए कार्य किया था। पौलुस के कार्य के क्रम में उसका व्यक्तिगत अनुसरण भी निहित था : उसका अनुसरण भविष्य की उसकी आशाओं, और एक अच्छी मंज़िल की उसकी इच्छा से अधिक किसी चीज़ के लिए नहीं था। उसने अपने कार्य के दौरान शुद्धिकरण स्वीकार नहीं किया था, न ही उसने काँट-छाँट और व्यवहार स्वीकार किया था। वह मानता था कि उसने जो कार्य किया वह जब तक परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करता था, और उसने जो कुछ किया वह सब जब तक परमेश्वर को प्रसन्न करता था, तब तक पुरस्कार अंततः उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। उसके कार्य में कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं थे—यह सब स्वयं उसके लिए था, और परिवर्तन के अनुसरण के बीच नहीं किया गया था। उसके कार्य में सब कुछ एक सौदा था, इसमें परमेश्वर के सृजित प्राणी का एक भी कर्तव्य या समर्पण निहित नहीं था। अपने कार्य के क्रम के दौरान, पौलुस के पुराने स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। उसका कार्य दूसरों की सेवा मात्र का था, और उसके स्वभाव में बदलाव लाने में असमर्थ था। पौलुस ने अपना कार्य सीधे, पूर्ण बनाए या निपटे बिना ही किया था, और वह पुरस्कार से प्रेरित था। पतरस भिन्न था : वह ऐसा व्यक्ति था जो काँट-छाँट और व्यवहार से गुज़रा था, और शुद्धिकरण से गुज़रा था। पतरस के कार्य का लक्ष्य और प्रेरणा पौलुस से कार्य के लक्ष्य और प्रेरणा से मूलतः भिन्न थे। यद्यपि पतरस ने बडी मात्रा में काम नहीं किया था, किंतु उसका स्वभाव कई बदलावों से होकर गुज़रा था, और उसने जिसकी खोज की, वह सत्य, और वास्तविक बदलाव था। उसका कार्य मात्र कार्य करने की ख़ातिर नहीं किया गया था। यद्यपि पौलुस ने बहुत कार्य किया था, किंतु वह सब पवित्र आत्मा का कार्य था, और यद्यपि पौलुस ने इस कार्य में सहयोग किया था, किंतु उसने इसका अनुभव नहीं किया था। पतरस ने बहुत कम कार्य किया तो केवल इसलिए कि पवित्र आत्मा ने उसके माध्यम से अधिक कार्य नहीं किया था। उनके कार्य की मात्रा ने यह निर्धारित नहीं किया कि उन्हें पूर्ण बनाया गया या नहीं बनाया गया; एक का अनुसरण पुरस्कार प्राप्त करने के लिए था, और दूसरे का अनुसरण परमेश्वर के प्रति सर्वोत्तम प्रेम प्राप्त करने के लिए, और परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के लिए था, इस हद तक कि परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए वह प्यारी-सी छवि जी सका था। बाहर से वे भिन्न थे, और इसलिए उनके सार भी भिन्न-भिन्न थे। इस आधार पर कि उन्होंने कितना कार्य किया था, तुम यह निर्धारित नहीं कर सकते कि उनमें से किसे पूर्ण बनाया गया था। पतरस ने प्रयास किया कि वह ऐसे व्यक्ति की छवि जिए जो परमेश्वर से प्रेम करता है, ऐसा व्यक्ति बने जो परमेश्वर की आज्ञा मानता था, ऐसा व्यक्ति बने जो व्यवहार और काँट-छाँट स्वीकार करता था, और ऐसा व्यक्ति बने जिसने परमेश्वर का सृजित प्राणी होने के नाते अपना कर्तव्य निभाया था। वह परमेश्वर के प्रति अपने को समर्पित करने, अपने को संपूर्णता में परमेश्वर के हाथों में सौंप देने, और मृत्युपर्यंत उसकी आज्ञा मानने में सक्षम था। यह वह था जो उसने करने का संकल्प लिया था, और इतना ही नहीं, यह वह था जिसे उसने प्राप्त किया था। यही वह मूलभूत कारण था जिससे उसका अंत पौलुस के अंत से अंततः भिन्न था। पवित्र आत्मा ने पतरस में जो कार्य किया था वह उसे पूर्ण बनाना था, और पवित्र आत्मा ने पौलुस में जो कार्य किया था वह उसका उपयोग करना था। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी प्रकृतियाँ और अनुसरण के प्रति उनके विचार एक समान नहीं थे। दोनों में पवित्र आत्मा का कार्य था। पतरस ने यह कार्य अपने पर लागू किया था, और इसे दूसरों को भी प्रदान किया था; जबकि पौलुस ने पवित्र आत्मा का समूचा कार्य दूसरों को प्रदान कर दिया था, और इसमें से कुछ भी स्वयं अपने लिए प्राप्त नहीं किया था। इस तरह, पवित्र आत्मा के कार्य का इतने अधिक वर्षों तक अनुभव कर चुकने के बाद भी, पौलुस में हुए बदलाव न के बराबर थे। वह अब भी लगभग अपनी प्राकृतिक अवस्था में ही था, और वह अब भी पहले का पौलुस ही था। बात बस इतनी थी कि कई वर्षों के कार्य की तक़लीफ़ सहने के बाद, उसने सीख लिया था कि कैसे "कार्य करना" है, और सहनशीलता सीख ली थी, किंतु उसकी पुरानी प्रकृति—उसकी अत्यधिक प्रतिस्पर्धात्मक और स्वार्थलोलुप प्रकृति—अब भी क़ायम थी। इतने वर्षों तक कार्य करने के बाद भी, वह अपना भ्रष्ट स्वभाव नहीं जानता था, न ही उसने स्वयं को अपने पुराने स्वभाव से मुक्त किया था, और यह उसके कार्य में अब भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता था। उसमें कार्य का अधिक अनुभव मुश्किल से ही था, किंतु इतना थोड़ा-सा अनुभव मात्र उसे बदलने में असमर्थ था और अस्तित्व या उसके अनुसरण के महत्व के बारे में उसके विचारों को नहीं बदल सकता था। हालाँकि उसने मसीह के लिए कई सालों तक कार्य किया था, और प्रभु यीशु को फिर कभी सताया नहीं था, लेकिन उसके हृदय में परमेश्वर के उसके ज्ञान में कोई परिवर्तन नहीं आया था। इसका अर्थ है कि उसने स्वयं को परमेश्वर के प्रति समर्पित करने के लिए कार्य नहीं किया, बल्कि इसके बजाय वह भविष्य की अपनी मंज़िल के ख़ातिर कार्य करने के लिए बाध्य था। क्योंकि, आरंभ में, उसने मसीह को सताया था, और मसीह के प्रति समर्पित नहीं हुआ था; वह सहज रूप से विद्रोही था जो जानबूझकर मसीह का विरोध करता था, और ऐसा व्यक्ति जिसे पवित्र आत्मा के कार्य का कोई ज्ञान नहीं था। जब उसका कार्य लगभग समाप्त हो गया था, तब भी वह पवित्र आत्मा का कार्य नहीं जानता था, और पवित्र आत्मा की इच्छा पर रत्ती भर भी ध्यान दिए बिना, स्वयं अपने चरित्र के अनुसार स्वयं अपनी इच्छा से काम करता था। और इसलिए उसकी प्रकृति मसीह के प्रति शत्रुतापूर्ण थी और सत्य का पालन नहीं करती थी। इस तरह का कोई व्यक्ति, जिसे पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा त्याग दिया गया था, जो पवित्र आत्मा का कार्य नहीं जानता था, और जो मसीह का विरोध भी करता था—ऐसे व्यक्ति को कैसे बचाया जा सकता था? मनुष्य को बचाया जा सकता है या नहीं, यह इस पर निर्भर नहीं करता है कि उसने कितना कार्य किया है, या वह कितना समर्पण करता है, बल्कि इसके बजाय इससे निर्धारित होता है कि वह पवित्र आत्मा के कार्य को जानता है या नहीं, वह सत्य को अभ्यास में ला सकता है या नहीं, और अनुसरण के प्रति उसके विचार सत्य की अनुरूपता में हैं या नहीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

पतरस जिस चीज़ की परवाह करता था वह उसके हृदय के भीतर सच्चा प्रेम था, और वह था जो व्यावहारिक था और जिसे प्राप्त किया जा सकता था। उसने इसकी परवाह नहीं की कि उसे पुरस्कार मिलेगा या नहीं, बल्कि इसकी परवाह की कि उसके स्वभाव को बदला जा सकता है या नहीं। पौलुस ने और भी कड़ी मेहनत करने की परवाह की थी, उसने बाहरी कार्य और समर्पण की, और सामान्य लोगों द्वारा अनुभव नहीं किए गए सिद्धांतों की परवाह की थी। वह न तो अपने भीतर गहराई में बदलावों की और न ही परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम की परवाह करता था। पतरस के अनुभव परमेश्वर का सच्चा प्रेम और सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए थे। उसके अनुभव परमेश्वर से निकटतर संबंध पाने के लिए, और व्यावहारिक जीवन यापन करने के लिए थे। पौलुस का कार्य इसलिए किया गया था क्योंकि यह यीशु के द्वारा उसे सौंपा गया था, और उन चीज़ों को पाने के लिए था जिनकी वह लालसा करता था, फिर भी ये स्वयं अपने और परमेश्वर के विषय में उसके ज्ञान से असंबद्ध थे। उसका कार्य केवल ताड़ना और न्याय से बचने के लिए था। पतरस ने जिसकी खोज की वह शुद्ध प्रेम था, और पौलुस ने जिसकी खोज की वह धार्मिकता का मुकुट था। पतरस ने पवित्र आत्मा के कार्य का कई वर्षों का अनुभव प्राप्त किया था, और उसे मसीह का व्यावहारिक ज्ञान, साथ ही स्वयं अपना अथाह ज्ञान भी था। और इसलिए, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम शुद्ध था। कई वर्षों के शुद्धिकरण ने यीशु और जीवन के उसके ज्ञान को उन्नत बना दिया था, और उसका प्रेम बिना शर्त प्रेम था, यह स्वतःस्फूर्त प्रेम था, और उसने बदले में कुछ नहीं माँगा, न ही उसने किसी लाभ की आशा की थी। पौलुस ने कई वर्ष काम किया, फिर भी उसने मसीह का अत्यधिक ज्ञान प्राप्त नहीं किया, और स्वयं अपने विषय में उसका ज्ञान भी दयनीय रूप से थोड़ा ही था। उसमें मसीह के प्रति कोई प्रेम ही नहीं था, और उसका कार्य और जिस राह पर वह चला निर्णायक कीर्ति पाने के लिए थे। उसने जिसकी खोज की वह श्रेष्ठतम मुकुट था, शुद्धतम प्रेम नहीं। उसने सक्रिय रूप से नहीं, बल्कि निष्क्रिय रूप से खोज की; वह अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर रहा था, बल्कि पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा पकड़ लिए जाने के बाद अपने अनुसरण में बाध्य था। और इसलिए, उसका अनुसरण यह साबित नहीं करता है कि वह परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी था; यह पतरस था जो परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी था जिसने अपना कर्तव्य निभाया था। मनुष्य सोचता है कि उन सभी को जो परमेश्वर के लिए कोई न कोई योगदान देते हैं पुरस्कार मिलना चाहिए, और योगदान जितना अधिक होता है, उतना ही अधिक यह मान लिया जाता है कि उन्हें परमेश्वर की कृपा प्राप्त होनी चाहिए। मनुष्य के दृष्टिकोण का सार लेन-देन से संबंधित है, और वह परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने की सक्रिय रूप से खोज नहीं करता है। परमेश्वर के लिए, लोग परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम की और परमेश्वर के प्रति संपूर्ण आज्ञाकारिता की जितनी अधिक खोज करते हैं, जिसका अर्थ परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने की खोज करना भी है, उतनी ही अधिक वे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर पाते हैं। परमेश्वर का दृष्टिकोण यह माँग करना है कि मनुष्य अपना मूल कर्तव्य और हैसियत पुनः प्राप्त करे। मनुष्य परमेश्वर का सृजित प्राणी है और इसलिए मनुष्य को परमेश्वर से कोई भी माँग करके अपनी सीमा नहीं लाँघनी चाहिए, और परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने से अधिक कुछ नहीं करना चाहिए। पतरस और पौलुस की मंज़िलों को, उनके योगदान के आकार के अनुसार नहीं, बल्कि इस बात के अनुसार आँका गया था कि परमेश्वर के सृजित प्राणियों के रूप में वे अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकते थे या नहीं; उनकी मंजिलें उससे निर्धारित हुई थीं जिसकी उन्होंने शुरुआत से खोज की थी, इसके अनुसार नहीं कि उन्होंने कितना कार्य किया था, या अन्य लोगों का आँकलन क्या था। और इसलिए, परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य सक्रिय रूप से निभाना ही सफलता का पथ है; परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम के पथ की खोज करना ही सबसे सही पथ है; अपने पुराने स्वभाव में बदलावों की खोज करना, और परमेश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम की खोज करना ही सफलता का पथ है। सफलता का ऐसा ही पथ मूल कर्तव्य की पुनः प्राप्ति का और साथ ही परमेश्वर के सृजित प्राणी के मूल प्रकटन का पथ भी है। यह पुनः प्राप्ति का पथ है, और यह आरंभ से अंत तक परमेश्वर के समस्त कार्य का लक्ष्य भी है। यदि मनुष्य का अनुसरण व्यक्तिगत असंयमी माँगों और विवेकहीन लालसाओं से कलंकित है, तो प्राप्त किया गया प्रभाव मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन नहीं होगा। यह पुनः प्राप्ति के कार्य के विपरीत है। यह निस्संदेह पवित्र आत्मा द्वारा किया गया कार्य नहीं है, और इसलिए यह साबित करता है कि इस प्रकार का अनुसरण परमेश्वर द्वारा स्वीकृत नहीं है। उस अनुसरण का भला क्या महत्व है जो परमेश्वर द्वारा स्वीकृत नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

पतरस ने जो खोज की थी, वह सब परमेश्वर के हृदय का अनुसरण था। उसने परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की कोशिश की थी, और पीड़ा तथा प्रतिकूल परिस्थितियों पर ध्यान दिए बिना वह परमेश्वर की इच्छा पूरी करने का इच्छुक था। परमेश्वर के किसी विश्वासी द्वारा इससे बड़ा कोई अनुसरण नहीं है। पौलुस ने जो खोज की थी, वह उसकी अपनी देह, अपनी अवधारणाओं, और उसकी अपनी योजनाओं तथा षडयंत्रों से कलंकित थी। वह किसी भी तरह परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी नहीं था, ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसने परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की कोशिश की थी। परतस ने परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित होने का प्रयास किया था, और यद्यपि उसने जो कार्य किया वह बड़ा नहीं था, फिर भी उसके अनुसरण के पीछे की प्रेरणा और जिस पथ पर वह चला, सही थे; यद्यपि वह बहुत सारे लोगों को प्राप्त नहीं कर पाया, फिर भी वह सत्य के मार्ग का अनुसरण कर सका था। इसी कारण से कहा जा सकता है कि वह परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी था। आज, यदि तुम कार्यकर्ता नहीं हो, तब भी तुम्हें परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने और परमेश्वर के समस्त आयोजनों के प्रति समर्पित होने की कोशिश करने में सक्षम होना चाहिए। परमेश्वर जो भी कहता है तुम्हें उसका पालन कर पाना, और सभी प्रकार के क्लेशों और शुद्धिकरण का अनुभव कर पाना, और यद्यपि तुम कमज़ोर हो, फिर भी तुम्हें अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम कर पाना चाहिए। जो स्वयं अपने जीवन की ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हैं वे परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने के इच्छुक होते हैं, और अनुसरण के बारे में ऐसे लोगों का दृष्टिकोण सही होता है। यही वे लोग हैं जिनकी परमेश्वर को ज़रूरत है। यदि तुमने बहुत सारा कार्य किया है, और दूसरों ने तुम्हारी शिक्षाएँ प्राप्त की हैं, किंतु तुम स्वयं नहीं बदले हो, और कोई गवाही नहीं दी है, या कोई सच्चा अनुभव नहीं लिया है, यहाँ तक कि अपने जीवन के अंत में भी, तुमने जो कुछ किया उसमें से किसी कार्य ने भी गवाही नहीं दी है, तो क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो बदल चुका है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अनुसरण करता है? उस समय, पवित्र आत्मा ने तुम्हारा उपयोग किया था, किंतु जब उसने तुम्हारा उपयोग किया, तब उसने तुम्हारे उस भाग का उपयोग किया था जिसका कार्य के लिए उपयोग किया जा सकता था, और उसने तुम्हारे उस भाग का उपयोग नहीं किया जिसका उपयोग नहीं किया जा सकता था। यदि तुम बदलने की कोशिश करते, तो तुम्हें उपयोग करने की प्रक्रिया के दौरान धीरे-धीरे पूर्ण बनाया गया होता। परंतु पवित्र आत्मा इस बात की ज़िम्मेदारी नहीं लेता कि तुम्हें अंततः प्राप्त किया जाएगा या नहीं, और यह तुम्हारे अनुसरण के तरीक़े पर निर्भर करता है। यदि तुम्हारे व्यक्तिगत स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आए हैं, तो इसलिए क्योंकि अनुसरण के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण ग़लत है। यदि तुम्हें कोई पुरस्कार नहीं दिया गया है, तो यह तुम्हारी अपनी समस्या है, और इसलिए कि तुमने स्वयं सत्य को अभ्यास में नहीं लाया और तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में असमर्थ हो। और इसलिए, तुम्हारे व्यक्तिगत अनुभवों से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है, और तुम्हारे व्यक्तिगत प्रवेश से अधिक अत्यावश्यक कुछ भी नहीं है! कुछ लोग अंततः कहेंगे, "मैंने तुम्हारे लिए इतना अधिक कार्य किया है, और मैंने कोई प्रशंसनीय उपलब्धियाँ भले प्राप्त न की हों, फिर भी मैंने पूरी मेहनत से अपने प्रयास किए हैं। क्या तुम मुझे जीवन के फल खाने के लिए बस स्वर्ग में प्रवेश करने नहीं दे सकते?" तुम्हें जानना ही चाहिए कि मैं किस प्रकार के लोगों को चाहता हूँ; वे जो अशुद्ध हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, वे जो अशुद्ध हैं उन्हें पवित्र भूमि को मैला करने की अनुमति नहीं है। तुमने भले ही बहुत कार्य किया हो, और कई सालों तक कार्य किया हो, किंतु अंत में यदि तुम अब भी बुरी तरह मैले हो, तो यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय होगा कि तुम मेरे राज्य में प्रवेश करना चाहते हो! संसार की स्थापना से लेकर आज तक, मैंने अपने राज्य में उन लोगों को कभी आसान प्रवेश नहीं दिया है जो अनुग्रह पाने के लिए मेरे साथ साँठ-गाँठ करते हैं। यह स्वर्गिक नियम है, और कोई इसे तोड़ नहीं सकता है! तुम्हें जीवन की खोज करनी ही चाहिए। आज, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा वे उसी प्रकार के हैं जैसा पतरस था : ये वे लोग हैं जो स्वयं अपने स्वभाव में परिवर्तनों की तलाश करते हैं, और जो परमेश्वर के लिए गवाही देने, और परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के इच्छुक होते हैं। केवल ऐसे लोगों को ही पूर्ण बनाया जाएगा। यदि तुम केवल पुरस्कारों की प्रत्याशा करते हो, और स्वयं अपने जीवन स्वभाव को बदलने की कोशिश नहीं करते, तो तुम्हारे सारे प्रयास व्यर्थ होंगे—यह अटल सत्य है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

भविष्य में, जो लोग विश्राम की अवस्था में जीवित बचेंगे, उन सभी ने क्लेश के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये वे सब लोग होंगे, जिन्होंने अपने कर्तव्य पूरे किए हैं और जिन्होंने जानबूझकर परमेश्वर को समर्पण किया है। जो केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने की इच्छा के साथ सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं, उन्हें रहने नहीं दिया जाएगा। परमेश्वर के पास प्रत्येक व्यक्ति के परिणामों के प्रबंधन के लिए उचित मानक हैं; वह केवल यूँ ही किसी के शब्दों या आचरण के अनुसार ये निर्णय नहीं लेता, न ही वह एक अवधि के दौरान किसी के व्यवहार के अनुसार निर्णय लेता है। अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गई किसी सेवा की वजह से वह किसी के दुष्ट व्यवहार के प्रति नर्मी कतई नहीं करेगा, न ही वह परमेश्वर के लिए एक बार स्वयं को खपाने के कारण किसी को मृत्यु से बचाएगा। कोई भी अपनी दुष्टता के लिए प्रतिफल से नहीं बच सकता, न ही कोई अपने दुष्ट आचरण को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि लोग वास्तव में अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे अनंतकाल तक परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हैं और उन्हें इसकी परवाह नहीं होती कि उन्हें आशीष मिलते हैं या वे दुर्भाग्य से पीड़ित होते हैं, वे पुरस्कार की तलाश नहीं करते। यदि लोग तब परमेश्वर के लिए वफ़ादार हैं, जब उन्हें आशीष दिखते हैं और जब उन्हें आशीष नहीं दिखाई देते, तो अपनी वफ़ादारी खो देते हैं और अगर अंत में भी वे परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ रहते हैं या उन कर्तव्यों को करने में असमर्थ रहते हैं जिसके लिए वे ज़िम्मेदार हैं, तो पहले वफ़ादारी से की गई परमेश्वर की सेवा के बावजूद वे विनाश की वस्तु बनेंगे। संक्षेप में, दुष्ट लोग अनंतकाल तक जीवित नहीं रह सकते, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग ही विश्राम के अधिकारी हैं। जब मानवता सही मार्ग पर होगी, लोग सामान्य मानवीय जीवन जिएँगे। वे सब अपने-अपने कर्तव्य निभाएँगे और परमेश्वर के प्रति पूर्णतः वफ़ादार होंगे। वे अपनी अवज्ञा और अपने भ्रष्ट स्वभाव को पूरी तरह छोड़ देंगे और वे अवज्ञा और प्रतिरोध दोनों के बिना परमेश्वर के लिए और परमेश्वर के कारण जिएंगे। वे पूर्णतः परमेश्वर को समर्पित होने में सक्षम होंगे। यही परमेश्वर और मानवता का जीवन होगा; यह राज्य का जीवन होगा और यह विश्राम का जीवन होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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