78. अपने कर्तव्य को पर्याप्त रूप से निष्पादित करने के सिद्धांत

(1) सभी मुद्दों में, सत्य की तलाश करना, उसे समझ लेना, और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना आवश्यक है। केवल ऐसा करने से ही व्यक्ति सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करता है और अपने कर्तव्य को संतोषजनक ढंग से निभाता है;

(2) यह समझना आवश्यक है कि परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षा क्या है। स्पष्ट रूप से देखो कि यह वही है जो तुम्हें तुम्हारे कर्तव्य सौंपता है, और यह स्वर्ग के आदेश द्वारा ठहराया गया और पृथ्वी द्वारा स्वीकार किया गया है कि तुम इसे अच्छी तरह से करो;

(3) परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करना और, आत्म-चिंतन के माध्यम से, अपने स्वभाव और अपने सार को जानना आवश्यक है, ताकि तुम्हारी भ्रष्टता को साफ़ किया जा सके। केवल इसी प्रकार कोई सत्य का अभ्यास कर सकता है और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभा सकता है;

(4) एक ईमानदार व्यक्ति होने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करना आवश्यक है। समस्त धोखाधड़ी और बनावट को, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव की सभी गड़बड़ी और लापरवाही को, सुधारो और अपने कर्तव्यों का पालन करते समय, सिद्धांतों के अनुसार कार्य करो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

"कर्तव्य का पर्याप्त निष्पादन," वाक्यांश में "पर्याप्त" शब्द पर ज़ोर दिया गया है। तो, "पर्याप्त" को कैसे परिभाषित किया जाना चाहिए? इसमें भी, तलाश करने के लिए सत्य है। क्या केवल काम चलाऊ कार्य करना ही पर्याप्त है? "पर्याप्त" शब्द को कैसे समझना और उस पर विचार करना है, इसके विशिष्ट विवरण के लिए, तुम्हें अनेक सत्य समझने होंगे और बहुत से सत्यों पर और अधिक संगति करनी चाहिए। अपने कर्तव्य को पूरा करने में, तुम्हें सत्य और उसके सिद्धांतों को समझना चाहिए; तभी तुम कर्तव्य का पर्याप्त निर्वहन कर सकते हो। लोगों को अपने कर्तव्यों का निर्वहन क्यों करना चाहिए? एक बार जब वे परमेश्वर में विश्वास करके उसके आदेश को स्वीकार कर लेते हैं, तो परमेश्वर के घर के काम में और परमेश्वर के कार्य-स्थल के प्रति ज़िम्मेदारी और दायित्व में लोगों की भी हिस्सेदारी होती है और बदले में, इस ज़िम्मेदारी और दायित्व के कारण, वे परमेश्वर के कार्य का एक प्रमुख हिस्सा बन जाते हैं—उसके कार्य के उद्देश्यों का एक प्रमुख हिस्सा और उसके उद्धार के उद्देश्यों का एक प्रमुख हिस्सा। इस प्रकार, लोगों के उद्धार और वे कैसे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, उन दोनों के बीच काफी गहरा संबंध है, क्या वे उनका निर्वहन अच्छी तरह से कर सकते हैं और क्या वे उनका निर्वहन पर्याप्त रूप से कर सकते हैं। चूँकि, तुम परमेश्वर के घर का एक हिस्सा बन गए हो और उसका आदेश स्वीकार कर लिया है, तुम्हारे पास अब कर्तव्य है। तुम्हें यह नहीं बताना है कि तुम्हें इस कर्तव्य को कैसे पूरा करना चाहिए; यह बताना परमेश्वर का कार्य है और यह सत्य के मानकों द्वारा निर्धारित किया जाता है। इसलिए, लोगों को यह समझना और इस बात पर स्पष्ट होना चाहिए कि परमेश्वर द्वारा चीजों का आकलन कैसे किया जाता है—यह तलाश करने के लिए एक उपयुक्त चीज़ है। परमेश्वर के कार्य में, अलग-अलग लोगों को अलग-अलग कर्तव्य मिलते हैं। अर्थात, लोगों को उनके गुणों, काबिलियत, उम्र, स्थितियों और युग के आधार पर कार्य सौंपे जाते हैं। तुम्हें चाहे कोई भी कार्य दिया जाए, उसे प्राप्त करने का युग या परिस्थितियां चाहे जो हों, कार्य केवल कार्य होता है; इसका प्रबंधन कोई इंसान नहीं करता है। अंतत: परमेश्वर का तुमसे अपेक्षा का मानक यह है कि तुम पर्याप्त रूप से अपने कर्तव्य का निर्वहन करो। "पर्याप्त रूप से" शब्द को कैसे समझाया जाए? इसका मतलब है तुम्हें परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करके उसे संतुष्ट करना चाहिए, और परमेश्वर तुम्हारे कार्य को पर्याप्त कहकर स्वीकृति प्रदान करे; तभी पर्याप्त रूप से तुम्हारे कर्तव्य का निर्वहन होगा। यदि परमेश्वर कहता है कि तुम्हारा काम अपर्याप्त है, तो फिर तुमने अपना कार्य अच्छी तरह से पूरा नहीं किया है। यद्यपि तुम अपना कर्तव्य निभा रहे हो और वह स्वीकार भी करता है कि तुमने ऐसा किया है, लेकिन यदि तुम इसे पर्याप्त रूप से नहीं करते हो, तो इसके परिणाम क्या होंगे? गंभीर मामलों में, लोगों की उद्धार की उम्मीदें मिट्टी में मिल सकती हैं; कम गंभीर मामलों में, उन्हें कर्तव्यों के निर्वहन के अधिकार से वंचित किया जा सकता है। ऐसे अधिकारों से वंचित करके, कुछ लोगों को दर-किनार कर दिया जाता है, जिसके बाद उनका अलग से ख्याल रखकर व्यवस्था की जाती है। क्या अलग से ख्याल रखने और व्यवस्था करने का मतलब है कि वे हटा दिए गए हैं? ऐसा ज़रूरी नहीं है; परमेश्वर प्रतीक्षा करेगा और देखेगा कि ये लोग कैसे कार्य करते हैं। इसलिए, कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य का निर्वहन कैसे करता है, यह महत्वपूर्ण है। लोगों का व्यवहार विवेकपूर्ण होना चाहिए और उन्हें इसे गंभीरता से लेना चाहिए तथा इसे अपने जीवन में प्रवेश और उद्धार-प्राप्ति में अत्यधिक महत्व का विषय मानना चाहिए; उन्हें इसे लापरवाही से नहीं लेना चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'कर्तव्‍य का समुचित निर्वहन क्‍या है?' से उद्धृत

परमेश्वर में आस्था रखने वाले हर व्यक्ति को परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिये। अपने कर्तव्य को सही ढंग से निभाने वाले लोग ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, परमेश्वर उन्हें जो काम सौंपता है, उसे पूरा करने से ही उनके कर्तव्यों का निर्वहन अपेक्षित मानक के बराबर होगा। परमेश्वर के आदेश की पूर्णता के मानक हैं। प्रभु यीशु ने कहा: "तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से, और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना।" परमेश्वर से प्रेम करना उसका एक पहलू है जिसकी परमेश्वर लोगों से अपेक्षा करता है। वास्तव में, जब परमेश्वर लोगों को एक आदेश देता है, जब वे अपने विश्वास से अपना कर्तव्य निभाते हैं, तो जिन मानकों की वह उनसे अपेक्षा करता है वे हैं: अपने पूर्ण हृदय से, अपने पूर्ण प्राण से, अपने पूरे दिमाग से, और अपनी पूरी ताक़त के साथ। यदि तू मौज़ूद तो है, लेकिन तेरा हृदय मौज़ूद नहीं है, यदि तू कार्यों के बारे में अपने दिमाग से सोचता है और उन्हें स्मृति में रख देता है, लेकिन तू अपना हृदय उन में नहीं लगाता है, और यदि तू अपनी क्षमताओं का उपयोग करके चीज़ों को पूरा करता है, तो क्या यह परमेश्वर के आदेश को पूरा करना है? तो अपने कर्तव्य को सही तरीके से करने और परमेश्वर ने तुझे जो कुछ भी सौंपा है, उसे पूरा करने के लिए और अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक निभाने के लिए किस तरह का मानक प्राप्त करना ही चाहिए? यह अपने कर्तव्य को पूरे हृदय से, अपने पूरे प्राण से, अपने पूरे मन से, अपनी पूरी ताक़त से करना है। अगर तुम्हारे अंदर परमेश्वर से प्रेम करने वाला दिल नहीं है, तो फिर अपने कर्तव्य को सही ढंग से निभाने की कोशिश करने से बात नहीं बनेगी। अगर परमेश्वर के लिये तुम्हारा प्रेम मज़बूत और अधिक सच्चा होता चला जाता है, तो स्वाभाविक रूप से तुम पूरे दिल से, पूरी आत्मा से, पूरे मन से, और पूरी शक्ति से अपने कर्तव्य का निर्वाह कर पाओगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन जीने के लिए लोग ठीक-ठीक किस पर भरोसा करते रहे हैं' से उद्धृत

भले ही तू किसी भी कर्तव्य को पूरा करे, तुझे हमेशा परमेश्वर की इच्छा को समझने की और यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि तेरे कर्तव्य को लेकर उसकी क्या अपेक्षा है; केवल तभी तू सैद्धान्तिक तरीके से मामलों को सँभाल पाएगा। अपने कर्तव्य को निभाने में, तू अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार बिल्कुल नहीं जा सकता है या तू जो चाहे मात्र वह नहीं कर सकता है, जिसे भी करने में तू खुश और सहज हो, वह नहीं कर सकता है, या ऐसा काम नहीं कर सकता जो तुझे अच्छे व्यक्ति के रूप में दिखाये। यदि तू परमेश्वर पर अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को बलपूर्वक लागू करता है या उन का अभ्यास ऐसे करता है मानो कि वे सत्य हों, उनका ऐसे पालन करता है मानो कि वे सत्य के सिद्धांत हों, तो यह कर्तव्य पूरा करना नहीं है, और इस तरह से तेरा कर्तव्य निभाना परमेश्वर के द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। कुछ लोग सत्य को नहीं समझते हैं, और वे नहीं जानते कि अपने कर्तव्यों को ठीक से पूरा करने का क्या अर्थ है। उन्हें लगता है कि चूँकि उन्होंने अपना दिल और अपना प्रयास इसमें लगाया है, और देहासक्ति का त्याग किया है और कष्ट उठाया है, इसलिए उनके कर्तव्य की पूर्ति मानकों पर खरी उतरेगी—पर फिर क्यों परमेश्वर हमेशा असंतुष्ट रहता है? इन लोगों ने कहाँ भूल की है? उनकी भूल यह थी कि उन्होंने परमेश्वर की अपेक्षाओं की तलाश नहीं की थी, बल्कि अपने ही विचारों के अनुसार काम किया था; उन्होंने अपनी ही इच्छाओं, पसंदों और स्वार्थी उद्देश्यों को सत्य मान लिया था और उन्होंने इनको वो मान लिया जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, मानो कि वे परमेश्वर के मानक और अपेक्षाएँ प हों। जिन बातों को वे सही, अच्छी और सुन्दर मानते थे, उन्हें सत्य के रूप में देखते थे; यह गलत है। वास्तव में, भले ही लोगों को कभी कोई बात सही लगे, लगे कि यह सत्य के अनुरूप है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि यह आवश्यक रूप से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। लोग जितना अधिक यह सोचते हैं कि कोई बात सही है, उन्हें उतना ही अधिक सावधान होना चाहिए और उतना ही अधिक सत्य को खोजना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उनकी सोच परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप है या नहीं। यदि यह उसकी अपेक्षाओं के विरुद्ध है और उसके वचनों के विरुद्ध है, तो तुम्हारा यह सोचना गलत है कि यह बात सही है, क्योंकि यह बस एक मानवीय विचार है और यह आवश्यक रूप से सत्य के अनुरूप नहीं होगा भले ही तुम्हें यह कितना भी सही लगे। सही और गलत का तुम्हारा निर्णय सिर्फ़ परमेश्वर के वचनों पर आधारित होना चाहिए, और तुम्हें कोई बात चाहे जितनी भी सही लगे, जबतक इसका आधार परमेश्वर के वचन न हों, तुम्हें इसे हटा देना चाहिए। कर्तव्य क्या है? यह परमेश्वर द्वारा लोगों को सौंपा गया एक आदेश है। तो तुम्हें अपना कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? व्यक्तिपरक मानवीय इच्छाओं के आधार पर नहीं बल्कि परमेश्वर की अपेक्षाओं और मानकों के अनुसार काम कर तथा सत्य के सिद्धांतों पर अपना व्यवहार आधारित कर। इस तरह तुम्हारा अपने कर्तव्य को करना मानकों के स्तर का होगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य के सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाया जा सकता है' से उद्धृत

कुछ लोगों के लिए, भले ही वे अपने कर्तव्यों का पालन करते समय किसी भी समस्या का सामना क्यों न करें, वे सत्य की तलाश नहीं करते हैं और हमेशा अपने विचारों, अपनी अवधारणाओं, कल्पनाओं और इच्छाओं के अनुसार कार्य करते हैं। वे निरंतर अपनी स्वार्थी इच्छाओं को संतुष्ट करते हैं और उनके भ्रष्ट स्वभाव हमेशा उनके कार्यों पर नियंत्रण करते हैं। भले ही वे उन्हें सौंपे गए कर्तव्य को पूरा कर दें, फिर भी वे किसी सत्य को प्राप्त नहीं करते हैं। तो ऐसे लोग अपने कर्तव्य को करते समय किस पर निर्भर करते हैं? ऐसे व्यक्ति न तो सत्य पर निर्भर करते हैं, न ही परमेश्वर पर। जिस थोड़े से सत्य को वे समझते हैं, उसने उनके हृदयों में संप्रभुत्व हासिल नहीं किया है; वे इन कर्तव्यों को पूरा करने के लिए अपनी स्वयं की योग्यताओं और क्षमताओं पर, उस ज्ञान पर जो उन्होंने प्राप्त किया है और अपनी प्रतिभा पर, और साथ ही अपनी इच्छाशक्ति पर या नेक इरादों पर भरोसा कर रहे हैं। क्या यह अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना है? क्या यह अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से निभाना है? यद्यपि कभी-कभी तू अपने कर्तव्य को निभाने के लिए अपनी स्वाभाविकता, कल्पना, अवधारणाओं, ज्ञान और शिक्षा पर भरोसा करे, तेरे द्वारा की जाने वाली कुछ चीज़ों में सिद्धांत का कोई मुद्दा नहीं उभरता है। सतह पर ऐसा लगता है जैसे कि तूने गलत मार्ग नहीं अपनाया है, लेकिन एक ऐसी चीज़ है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है: अपने कर्तव्य को निभाने की प्रक्रिया के दौरान, यदि तेरी अवधारणाएँ, कल्पनाएँ और व्यक्तिगत इच्छाएँ कभी नहीं बदलती हैं और कभी भी सत्य के साथ प्रतिस्थापित नहीं की जाती हैं, यदि तेरे कार्य और कर्म कभी भी सत्य के सिद्धांतों के अनुसार नहीं किए जाते हैं, तो अंतिम परिणाम क्या होगा? तू एक सेवा करने वाला बन जाएगा। और ठीक यही बाइबल में लिखा है: "उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, 'मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ'" (मत्ती 7:22-23)। परमेश्वर अपने प्रयास लगाने वालों और सेवा प्रदान करने वालों को "अधर्म करने वाले" क्यों कहता है? एक बात पर हम निश्चित हो सकते हैं, और वह यह कि ये लोग चाहे कोई भी कर्तव्य निभाएँ या कोई भी काम करें, इन लोगों की अभिप्रेरणाएँ, बल, इरादे और विचार पूरी तरह से उनकी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं से पैदा होते हैं, पूरी तरह से उनके अपने विचारों और व्यक्तिगत हितों पर आधारित होते हैं, और उनके विचार और योजनाएँ पूरी तरह से उनकी शोहरत, रुतबे, अहंकार और भविष्य की संभावनाओं के चारों ओर घूमती हैं। उनके अंतरतम में, कोई सत्य नहीं होता, न ही वे सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हैं। इस प्रकार, अब तुम लोगों के लिए क्या खोजना अतिमहत्वपूर्ण है? (हम लोगों को सत्य की खोज करनी चाहिए और परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।) परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें विशेष रूप से क्या करना चाहिए? कोई काम करते समय तुम्हारे अंदर जो इरादे और विचार होते हैं, उनके संबंध में तुम्हें यह भेद करना ज़रूर सीखना चाहिए कि वे सत्य के अनुरूप हैं या नहीं, साथ ही तुम्हारे इरादे और विचार तुम्हारी अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति के लिए हैं या परमेश्वर के परिवार के हितों के लिए। अगर तुम्हारे इरादे और विचार सत्य के अनुरूप हैं, तो तुम अपनी सोच के अनुसार अपना कर्तव्य निभा सकते हो; लेकिन अगर वे सत्य के अनुरूप नहीं हैं, तो तुम्हें तुरंत पलटकर उस मार्ग का त्याग कर देना चाहिए। वह मार्ग सही नहीं है और तुम उस तरह से अभ्यास नहीं कर सकते; अगर तुम उस रास्ते पर चलते रहे, तो तुम अंत में दुष्टता कर बैठोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्यों में परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करें' से उद्धृत

लापरवाही से काम करना कर्तव्य के लिए अभिशाप है। यदि तुम केवल बिना मन लगाए काम करते हो, तो सही तरह से अपना कर्तव्य नहीं निभा पाओगे। तुम्हें इसमें अपना दिल लगाना होगा! किसी को अपना कर्तव्य निभाने का मौका मिलना एक दुर्लभ चीज़ है, और अगर वे परमेश्वर का दिया ऐसा मौका हाथ से जाने देते हैं, तो वह खो जाता है। यदि वे किसी दिन फिर से अपना कर्तव्य निभाने का मौका तलाशते हैं, तो यह आसान नहीं होगा; वास्तव में, यह भी हो सकता है कि वैसा अवसर बिलकुल भी न आए। परमेश्वर का काम किसी का इंतजार नहीं करता, न कर्तव्य निभाने का अवसर ही किसी का इंतजार करता है। जीवन में कई अवसर नहीं मिलते, इसलिए तुम्हें उन्हें हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। जब तुम्हारे सामने एक ऐसा कर्तव्य आता है, जिसके लिए तुम्हारे प्रयास और तुम्हारे खुद को खपाने की आवश्यकता होती है, और जिसके लिए तुम्हें अपने तन, मन और समय को समर्पित करने की आवश्यकता होती है, तो तुम्हें कोई संकोच नहीं करना चाहिए, किसी तरह की तुच्छ चालाकी नहीं करनी चाहिए, और कोई कसर नहीं छोडनी चाहिए। यदि तुमने कोई कसर छोड़ी, या तुम मतलबी, मक्कार या विश्वासघाती बनते हो, तो तुम निश्चित ही एक ख़राब काम करोगे। तुम कह सकते हो, "किसी ने मुझे चालाकी से काम करते हुए नहीं देखा। क्या बात है!" यह किस तरह की सोच है? तुम्हें लगता है कि तुमने लोगों की आँखों में धूल झोंकी, और परमेश्वर की आँखों में भी। हालांकि, वास्तविकता में, तुमने जो किया वो परमेश्वर जानता है या नहीं? (वह जानता है।) आम तौर पर, जो लोग लंबे समय से तुम्हारे साथ बातचीत करते रहे हैं, उन्हें भी पता चल जाएगा, और वे कहेंगे कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो हमेशा मक्कारी दिखाता है, कभी दिल लगाकर मेहनत नहीं करता, और उसका प्रयास केवल पचास या साठ प्रतिशत होता है, या ज़्यादा से ज़्यादा अस्सी प्रतिशत। वे कहेंगे कि तुम सब कुछ बहुत ही उलझे हुए तरीके से करते हो, और जो कुछ भी कर रहे हो उसपर एक नज़र भी नहीं डालते; तुम अपने काम में बिलकुल ईमानदार नहीं हो। जब तुम्हें कुछ करने के लिए ज़ोर दिया जाता है, तभी तुम थोड़ा-सा प्रयास करते हो; अगर तुम्हारे आसपास कोई निगरानी कर रहा है कि काम ठीक से हो रहा है या नहीं, तो तुम थोड़ा बेहतर काम करते हो—लेकिन अगर कोई निगरानी करने के लिए नहीं है, तो तुम थोड़ा सुस्त पड़ जाते हो। अगर कोई तुमसे निपटा जाता है, तो तुम काम में अपना दिल लगाते हो; वरना तुम काम करते हुए लगातार ऊंघते रहते हो और जितना कम हो सके उतना ही काम करने की कोशिश करते हो, यह मानकर कि कोई नहीं देखेगा। समय के साथ, लोग ध्यान देने लगते हैं। वे कहते हैं, "यह व्यक्ति अविश्वसनीय है और भरोसे के लायक नहीं है; यदि तुम उसे कोई महत्वपूर्ण काम सौंपते हो, तो उसपर निगरानी रखने की आवश्यकता होगी। वह साधारण कार्य कर सकता है और ऐसे काम जिनका सिद्धांतों से कोई सरोकार नहीं है, लेकिन यदि तुम उसे कोई महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए दोगे, तो यह बहुत ही संभव है कि वह इसे चौपट कर देगा, और फिर तुम उसके धोखे का शिकार हो जाओगे।" लोग उसकी सही फितरत पहचान लेंगे, और वह पूरी गरिमा और ईमानदारी को त्याग चुका होगा। अगर कोई उस पर भरोसा नहीं कर सकता, तो परमेश्वर कैसे कर सकता है? क्या परमेश्वर उसे कोई बड़े काम सौंपेगा? ऐसा व्यक्ति भरोसे के लायक नहीं है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए' से उद्धृत

कुछ लोग अपने कर्तव्यपालन के तरीके में ग़ैरज़िम्मेदार होते हैं। इसका परिणाम घटिया कार्य होता है, जिसे हमेशा दोबारा करना पड़ता है, जिसका आगे की प्रगति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। क्या अनुभव की कमी और व्यावसायिक अयोग्यता के अतिरिक्त भी इसके और कोई कारण होते हैं? व्यावसयिक कुशलता और अनुभव धीरे-धीरे सीखे और बढ़ाए जा सकते हैं, लेकिन यदि समस्या लोगों के स्वभाव में निहित हो, तो इस समस्या का हल कैसे निकाला जाना चाहिए? इसके लिए ज़रूरी है कि लोगों की काट-छाँट की जाए और उनसे निपटा जाए; इसके लिए ज़रूरी है कि लोग एक-दूसरे की निगरानी करें और सत्य की तलाश करें। सबसे बड़ी समस्या, जो कर्तव्य के पालन में किसी कार्य को हमेशा दोबारा किए जाने का कारण बनती है, वह व्यावसयिक अयोग्यता नहीं है और न ही वह अपर्याप्त अनुभव है; इसका कारण यह है कि लोग अत्यधिक आत्म-संतुष्ट और अभिमानी हैं, और वे सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग नहीं करते, बल्कि अकेले और मनमाने ढंग से काम करते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि जब वे कोई चीज़ पूरी करते हैं, तो उनका कार्य अपनी योग्यता के बल पर खड़ा होने में असमर्थ होता है, और इसलिए उनका प्रयास व्यर्थ हो जाता है। इसके पीछे सबसे गंभीर समस्या क्या है? (मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव।) भ्रष्ट स्वभाव अपने साथ बहुत बड़ी रुकावटें लेकर आता है। और भ्रष्ट स्वभाव के कौन-से पहलू लोगों के कर्तव्य-पालन के परिणाम को प्रभावित करते हैं? (अहंकार और आत्म-संतुष्टि।) अहंकार और आत्म-संतुष्टि व्यवहार में कैसे प्रकट होते हैं? अकेले निर्णय लेना, दूसरों की न सुनना, दूसरों के साथ परामर्श न करना, सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग न करना और हमेशा चीज़ों के बारे में अंतिम निर्णय लेने की चाहत रखना। भले ही कुछ अच्छे भाई और बहनें किसी विशेष कर्तव्य का पालन करने के लिए सहयोग कर रहे हों, किंतु उनमें से हरेक अपना कार्य भी कर रहा होता है, समूह का अगुआ अथवा प्रभारी व्यक्ति हमेशा अंतिम निर्णय लेना चाहता है; वे जो भी कर रहे होते हैं, वे सामंजस्यपूर्ण ढंग से दूसरों के साथ सहयोग नहीं करते और संगति में संलग्न नहीं होते, और वे दूसरों के साथ सर्वसम्मति पर पहुँचने से पहले ही बिना सोचे-विचारे काम करना शुरू कर देते हैं। वे सबको केवल अपनी बात सुनने के लिए मजबूर करते हैं, और समस्या इसी में है। इतना ही नहीं, दूसरे जब समस्या को देख लेते हैं, और फिर भी वे प्रभारी व्यक्ति को रोकने के लिए आगे नहीं आते, तो अंततः यह ऐसी स्थिति में परिणत हो जाता है, जहाँ इसमें शामिल हरेक व्यक्ति को अपना कार्य फिर से करना पड़ता है, और उस प्रक्रिया में स्वयं को थकाना पड़ता है। तो क्या दूसरे लोगों की भी कोई ज़िम्मेदारी है? (हाँ।) एक तरफ़, प्रभारी व्यक्ति अकेले और मनमाने ढंग से काम करता है, अपने तरीके से चीज़ों को करने पर ज़ोर देता है, और दूसरे उसे रोकने के लिए कुछ नहीं करते, और इससे भी गंभीर बात यह है कि वे उसके साथ चलते भी हैं; क्या यह उन्हें सह-अपराधी नहीं बनाता? यदि तुम इस व्यक्ति को नहीं रोकते, टोकते या उसकी असलियत सामने नहीं लाते, बल्कि इसके बजाय उसका अनुसरण करते हो और उसे स्वयं को बहकाने देते हो, तो क्या तुम उसे शैतान के उत्पीड़न-कार्य की खुली छूट नहीं दे रहे? यह निश्चित रूप से तुम्हारी समस्या है। दूसरी तरफ़, जब तुम किसी समस्या को देखते हो, लेकिन उसकी शिकायत नहीं करते, बल्कि उसकी हाँ में हाँ मिलाने की भूमिका निभाते हो, तो क्या यह निष्ठाहीनता की अभिव्यक्ति नहीं है? हाँ, ठीक यही है—परमेश्वर के प्रति निष्ठाहीनता की अभिव्यक्ति। इस समस्या को जो बात और गंभीर बनाती है, वो यह है कि तुम हमेशा शैतान के साथी के रूप में कार्य करते हो, तुम उसके नौकर और अनुयायी के रूप में सेवा करते हो, और तुममें अपने कर्तव्य और ज़िम्मेदारी के प्रति थोड़ी-सी भी निष्ठा नहीं है, लेकिन तुम शैतान के प्रति काफी निष्ठावान हो। जहाँ तक व्यावसायिक अयोग्यता की बात है, यह संभव है कि काम करने के दौरान निरंतर सीखना और अपने अनुभवों को एक-साथ लाना संभव है। ऐसी समस्याओं को आसानी से हल किया जा सकता है। परंतु जिस चीज़ का हल निकालना सबसे कठिन है, वह है मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव। यदि उसका हल न निकाला जाए, यदि तुम लोग सत्य की तलाश नहीं करते, बल्कि हमेशा पीछे हटते और दूसरों की हाँ में हाँ मिलाते रहते हो; और यदि तुम अपने कंधों पर ज़िम्मेदारी नहीं लेते, और किसी के द्वारा कुछ अनुचित कर देने पर भी तुम उस पर प्रकाश नहीं डालते या उसका पर्दाफाश नहीं करते और तुम उससे निपटते नहीं हो; और यदि तुम परमेश्वर के घर के कार्य को मज़ाक या खेल की तरह लेते हो; और यदि तुम अपने कर्तव्य और अपनी ज़िम्मेदारी का पालन नहीं करते, तब कार्य की प्रगति में बार-बार देर होती रहेगी। कर्तव्य का ऐसा निर्वहन निष्ठाहीन है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'उचित कर्तव्यपालन के लिए आवश्यक है सामंजस्यपूर्ण सहयोग' से उद्धृत

कुछ लोग हमेशा इस बात डरे रहते हैं कि दूसरे लोग उनकी प्रसिद्धि को चुरा लेंगे और उनसे आगे निकल जाएंगे, अपनी पहचान बना लेंगे जबकि उनको अनदेखा कर दिया जाएगा। इसी वजह से वे दूसरों पर हमला करते हैं और उन्हें अलग कर देते हैं। क्या यह अपने से ज़्यादा सक्षम लोगों से ईर्ष्या करने का मामला नहीं है? क्या ऐसा व्यवहार स्वार्थी और घिनौना नहीं है? यह किस तरह का स्वभाव है? यह दुर्भावनापूर्ण है! सिर्फ़ खुद के बारे में सोचना, सिर्फ़ अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करना, दूसरों के कर्तव्यों पर कोई ध्यान नहीं देना, और सिर्फ़ अपने हितों के बारे में सोचना और परमेश्वर के घर के हितों के बारे में नहीं सोचना—इस तरह के लोग बुरे स्वभाव वाले होते हैं, और परमेश्वर के पास उनके लिये कोई प्रेम नहीं है। अगर तुम वाकई परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखने में सक्षम हो, तो तुम दूसरे लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार कर पाने में सक्षम होगे। अगर तुम किसी व्यक्ति की सिफ़ारिश करते हो, और वह व्यक्ति एक प्रतिभाशाली इंसान बन जाता है, जिससे परमेश्वर के घर में एक और प्रतिभाशाली व्यक्ति का प्रवेश होता है, तो क्या ऐसा नहीं है कि तुमने अपना काम अच्छी तरह पूरा किया है? तब क्या तुम अपने कर्तव्य के निर्वहन में वफ़ादार नहीं रहे हो? यह परमेश्वर के समक्ष एक अच्छा कर्म है, यह एक तरह का विवेक और सूझ-बूझ है जो इंसानों में होनी चाहिए। जो लोग सत्य को व्यवहार में लाने में सक्षम हैं, वे अपने कार्यों में परमेश्वर की जाँच को स्वीकार कर सकते हैं। जब तुम परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करते हो, तो तुम्हें गलती का एहसास होता है। यदि तुम हमेशा दूसरों को दिखाने के लिए ही काम करते हो और परमेश्वर की जाँच को स्वीकार नहीं करते, तो क्या तुम्हारे हृदय में परमेश्वर है? इस तरह के लोगों के हृदय में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं होती। हमेशा अपने लिए कार्य मत कर, हमेशा अपने हितों की मत सोच, और अपनी स्वयं की हैसियत, प्रतिष्ठा और साख पर विचार मत कर। इंसान के हितों पर गौर मत कर। तुझे सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार करना चाहिए और उसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए। तुझे परमेश्वर की इच्छा के बारे में मननशील होना चाहिए, इस पर चिंतन करने के द्वारा आरंभ कर कि तू अपने कर्तव्य को पूरा करने में अशुद्ध रहा है या नहीं, क्या तूने वफादार होने के लिए अपना अधिकतम किया है, क्या अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास किया है और अपना सर्वस्व दिया है, साथ ही क्या तूने अपने कर्तव्य, और परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार किया है। तुझे इन चीज़ों के बारे में विचार करने की आवश्यकता है। इन चीज़ों पर बार-बार विचार कर, और तू आसानी से अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभा पाएगा। जब तेरी क्षमता कमज़ोर होती है, तेरा अनुभव उथला होता है, या जब तू अपने पेशे में दक्ष नहीं होता है, तब सारी ताकत लगा देने के बावजूद तेरे कार्य में कुछ गलतियाँ या कमियाँ हो सकती हैं, और परिणाम बहुत अच्छे नहीं हो सकते हैं। जब तू कार्यों को करते हुए अपनी स्वयं की स्वार्थी इच्छाओं या अपने स्वयं के हितों के बारे में विचार नहीं करता है, और इसके बजाय हर समय परमेश्वर के घर के कार्य पर विचार करता है, परमेश्वर के घर के हितों के बारे में लगातार सोचता रहता है, और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाता है, तब तू परमेश्वर के समक्ष अच्छे कर्मों का संचय करेगा। जो लोग ये अच्छे कर्म करते हैं, ये वे लोग हैं जिनमें सत्य-वास्तविकता होती है; इन्होंने गवाही दी है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो' से उद्धृत

अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें हमेशा खुद को जांच कर देखना चाहिए कि क्या तुम सिद्धांत के अनुसार काम कर रहे हो, तुम्हारा कर्तव्य निर्वाह सही स्तर का है या नहीं, कहीं तुम इसे सतही तौर पर तो नहीं कर रहे हो, कहीं तुमने अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने से जी चुराने की कोशिश तो नहीं की है, कहीं तुम्हारे रवैये और तुम्हारे सोचने के तरीके में कोई खोट तो नहीं। एक बार तुम्हारे आत्मचिंतन कर लेने और तुम्हारे सामने इन चीज़ों के स्पष्ट हो जाने से, अपना कर्तव्य निभाने में तुम्हें आसानी होगी। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हारा किसी भी चीज़ से सामना हो—नकारात्मकता और कमज़ोरी, या निपटान के बाद बुरी मन:स्थिति में होना—तुम्हें कर्तव्य के साथ ठीक से पेश आना चाहिए, और तुम्हें साथ ही सत्य को खोजना और परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए। ये काम करने से तुम्हारे पास अभ्यास करने का मार्ग होगा। अगर तुम अपना कर्तव्य निर्वाह बहुत अच्छे ढंग से करना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी मन:स्थिति से बिल्कुल प्रभावित नहीं होना चाहिए। तुम्हें चाहे जितनी निराशा या कमज़ोरी महसूस हो रही हो, तुम्हें अपने हर काम में पूरी सख्ती के साथ सत्य का अभ्यास करना चाहिए, और सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए। अगर तुम ऐसा करोगे, तो न सिर्फ दूसरे लोग तुम्हें स्वीकार करेंगे, बल्कि परमेश्वर भी तुम्हें पसंद करेगा। इस तरह, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे, जो ज़िम्मेदार है और दायित्व का निर्वहन करता है; तुम सचमुच में एक अच्छे व्यक्ति होगे, जो अपने कर्तव्य को सही स्तर पर निभाता है और जो पूरी तरह से एक सच्चे इंसान की तरह जीता है। ऐसे लोगों का शुद्धिकरण किया जाता है और वे अपना कर्तव्य निभाते समय वास्तविक बदलाव हासिल करते हैं, उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में ईमानदार कहा जा सकता है। केवल ईमानदार लोग ही सत्य का अभ्यास करने में डटे रह सकते हैं और सिद्धांत के साथ कर्म करने में सफल हो सकते हैं, और मानक स्तर के अनुसार कर्तव्य निभा सकते हैं। सिद्धांत पर चलकर कर्म करने वाले लोग अच्छी मन:स्थिति में होने पर अपना कर्तव्य ध्यान से निभाते हैं; वे सतही ढंग से कार्य नहीं करते, वे अहंकारी नहीं होते और दूसरे उनके बारे में ऊंचा सोचें इसके लिए दिखावा नहीं करते। बुरी मन:स्थिति में होने पर भी वे अपने रोज़मर्रा के काम को उतनी ही ईमानदारी और ज़िम्मेदारी से पूरा करते हैं और उनके कर्तव्य निर्वाह के लिए नुकसानदेह या उन पर दबाव डालने वाली या उनके काम में बाधा पहुँचाने वाली किसी चीज़ से सामना होने पर भी वे परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत रख पाते हैं और यह कहते हुए प्रार्थना करते हैं, "मेरे सामने चाहे जितनी बड़ी समस्या खड़ी हो जाए—भले ही आसमान फट कर गिर पड़े—जब तक परमेश्वर मुझे जीने देगा, अपना कर्तव्य निभाने की भरसक कोशिश करने का मैं दृढ़ संकल्प लेता हूँ। मेरे जीवन का प्रत्येक दिन वह दिन होगा जब मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए कड़ी मेहनत करूंगा ताकि मैं परमेश्वर द्वारा मुझे दिये गये इस कर्तव्य, और उसके द्वारा मेरे शरीर में प्रवाहित इस सांस के योग्य बना रहूँ। चाहे जितनी भी मुश्किलों में रहूँ, मैं उन सबको परे रख दूंगा क्योंकि कर्तव्य निर्वाह करना मेरे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है!" जो लोग किसी व्यक्ति, घटना, चीज़ या माहौल से प्रभावित नहीं होते, जो किसी मन:स्थिति या बाहरी हालात से नियंत्रित नहीं होते, और जो परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गये कर्तव्यों और आदेशों को सबसे आगे रखते हैं—वही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं और सच्चाई के साथ उसके सामने समर्पण करते हैं। ऐसे लोगों ने जीवन-प्रवेश हासिल किया है और सत्य की वास्तविकता में प्रवेश किया है। यह सत्य को जीने की सबसे व्यावहारिक और सच्ची अभिव्यक्तियों में से एक है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए' से उद्धृत

जब लोग अपना कर्तव्य निभाते हैं तो वे दरअसल वही करते हैं जो उन्हें करना चाहिए। पर अगर तुम इसे परमेश्वर के सामने करते हो, अगर तुम अपना कर्तव्य दिल से और ईमानदारी की भावना से निभाते हो, तो क्या यह रवैया कहीं ज्यादा सही नहीं होगा? तो तुम इस रवैये को अपने दैनिक जीवन में कैसे व्यवहार में ला सकते हो? तुम्हें "दिल से और ईमानदारी से परमेश्वर की आराधना" को अपनी वास्तविकता बनाना होगा। जब कभी भी तुम शिथिल पड़ना चाहते हो और बस बिना रुचि के काम करना चाहते हो, जब कभी भी तुम आलसी बनना चाहते हो, और जब कभी भी तुम अपना ध्यान बँटने देते हो और बस मौज-मस्ती करना चाहते हो, तो तुम्हें इन बातों पर अच्छी तरह विचार करना चाहिए: इस तरह व्यवहार करने में, क्या मैं अविश्वास के लायक बन रहा हूँ? क्या यह कर्तव्य के निर्वहन में अपना मन लगाना है? क्या मैं ऐसा करके विश्वासघाती बन रहा हूँ? ऐसा करने में, क्या मैं उस विश्वास के अनुरूप रहने में विफल हो रहा हूँ, जो परमेश्वर ने मुझ पर दिखाया है? तुम्हें इसी तरह आत्म-मंथन करना चाहिए। तुम्हें सोचना चाहिये, "मैंने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया। उस समय, मैंने महसूस किया कि कुछ समस्या थी, लेकिन मैंने उस समस्या को गंभीर नहीं समझा; मैंने बस लापरवाही से उस पर लीपा-पोती कर दी। इस समस्या का अब तक कोई समाधान नहीं हुआ है। मैं किस तरह का व्यक्ति हूँ?" अब तुमने समस्या को पहचान लिया होगा और खुद को कुछ हद तक जान लिया होगा। थोड़ा ज्ञान हो जाने पर, क्या तुम्हें रुक जाना चाहिए? क्या अपने पापों को स्वीकार कर लेने से तुम्हारा काम पूरा हो गया है? तुम्हें पश्चाताप करना होगा और खुद में पूरी तरह बदलाव लाना होगा! और तुम अपने-आपमें बदलाव कैसे ला सकते हो? पहले अपने कर्तव्य को लेकर तुम्हारा रवैया और मानसिकता गलत थे, तुम्हारा दिल इसमें नहीं रहता था, और तुम कभी भी सही चीजों पर ध्यान नहीं देते थे। आज, तुम्हें अपने कर्तव्य को लेकर अपना रवैया ठीक करना है, तुम्हें परमेश्वर के आगे प्रार्थना करनी है, और जब भी तुम्हारे पिछले विचार और रवैये फिर से उभरें तो तुम्हें परमेश्वर से विनती करनी है कि वह तुम्हें अनुशासित करे और तुम्हें ताड़ना दे। जल्दी से उन क्षेत्रों की पहचान करो जहां तुम ढीलेपन और बेमन से अपने कर्तव्य निभाते थे। यह सोचो कि तुम इन्हें कैसे ठीक कर सकते हो, और उन्हें ठीक करने के बाद, फिर से खोजो और प्रार्थना करो, और फिर अपने भाई-बहनों से पूछो कि क्या उनके कुछ सुझाव और सिफारिशें हैं, जब तक कि हर कोई यह न कहे कि तुमने सही किया है। सिर्फ तभी तुम्हें वैधता मिलेगी। तुम ऐसा महसूस करोगे कि तुमने मापदंडों के अनुरूप अपना कर्तव्य निभाया है, और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है, पूरे दिल से किया है, और अपना सब कुछ अर्पित किया है; तुम महसूस करोगे कि तुमने अपना सर्वस्व झोंक दिया है, और तुम्हारे दिल में कोई पछतावा नहीं है। परमेश्वर के सामने अपना हिसाब देते समय तुम्हारी चेतना निर्मल और शुद्ध होगी, और तुम कहोगे, "भले ही परमेश्वर मुझे अपना कर्तव्य निभाने के 60% अंक दे, पर मैंने अपने शरीर की शक्ति का हर कतरा इसमें झोंक दिया है, मैंने इसे पूरे दिल से किया है, मैंने न कोई सुस्ती दिखाई न ढीलापन बरता, और मैंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी है।" क्या यह अपने पूरे दिल, अपने पूरे दिमाग और अपनी पूरी ताकत को अपने कर्तव्य में लगाने की वास्तविकताओं को व्यवहार में लाना और उन्हें अपने दैनिक जीवन में लागू करना नहीं हुआ? क्या यह सत्य की इन वास्तविकताओं को जीना नहीं है? और जब तुम सत्य की इन वास्तविकताओं को जीते हो तो अपने दिल में तुम कैसा महसूस करते हो? क्या तुम्हें ऐसा महसूस नहीं होता कि तुम एक मनुष्य के समान जी रहे हो, न कि किसी चलते-फिरते शव के समान?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्‍य के बारम्‍बार चिन्‍तन से ही आपको आगे का मार्ग मिल सकता है' से उद्धृत

कर्तव्य के निर्वहन में पर्याप्तता लाने के लिए, सबसे पहले इसके निर्वहन में सामंजस्यपूर्ण सहयोग आवश्यक है। कुछ लोग ऐसे हैं जो वर्तमान में इस दिशा में अभ्यास कर रहे हैं, जिसका अर्थ है कि सत्य सुनकर, उन्होंने इस सिद्धांत के अनुसार काम करना शुरू कर दिया है, हालाँकि वे सत्य को पूरी तरह से, सौ प्रतिशत व्यवहार में लाने में असमर्थ हैं। इस प्रक्रिया में, वे असफल हो सकते हैं या कमज़ोर पड़ सकते हैं, भटक सकते हैं और बार-बार गलतियां कर सकते हैं, फिर भी वे जिस रास्ते पर चलते हैं, वह इस सिद्धांत के अनुसार कार्य करने में सक्षम होने के लिए एक प्रयास है। उदाहरण के लिए, यद्यपि, तुम कभी-कभी महसूस कर सकते हो कि कुछ करने का तुम्हारा तरीका सही है, यदि तुम ऐसी स्थिति में हो, जिससे जो काम तुम अब कर रहे हो, उसमें देरी नहीं होगी, तो तुम्हें इस पर चर्चा करने के लिए सहकर्मी या टोली के सदस्य भी मिल सकते हैं। तब तक सहभागिता करो, जब तक तुम इस मामले पर स्पष्ट नहीं हो जाते, जब तक तुम यह सोचकर आम सहमति तक नहीं पहुँच जाते कि इसे एक निश्चित तरीके से करने से सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त हो सकते हैं, जब तक यह सिद्धांत के दायरे से आगे नहीं बढ़ जाता, परमेश्वर के घर के फायदे के लिए न हो, परमेश्वर के घर के हितों की अधिकतम सुरक्षा न करे। हालाँकि, हो सकता है कि अंतिम परिणाम कभी-कभी इच्छानुसार न हो, लेकिन तुम्हारे काम का तरीका, दिशा और लक्ष्य सही हैं। फिर परमेश्वर इसे किस ढंग से देखेगा? वह इस मामले को कैसे परिभाषित करेगा? वह कहेगा कि तुम इस कर्तव्य को पर्याप्त रूप से पूरा कर रहे हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'कर्तव्‍य का समुचित निर्वहन क्‍या है?' से उद्धृत

अपने कर्तव्य को पर्याप्त रूप से निभाने के लिए, चाहे तुमने कितने ही वर्ष परमेश्वर पर विश्वास किया हो, तुमने अपने कर्तव्य के निर्वहन में कितना ही काम किया हो और चाहे तुमने परमेश्वर के घर में कितना ही योगदान दिया हो, तुम अपने कार्य में कितने अनुभवी हो। परमेश्वर मुख्यत: यह देखता है उस व्यक्ति ने किस मार्ग का अनुसरण किया है। दूसरे शब्दों में, वह किसी भी व्यक्ति के कार्यों के पीछे सत्य, सिद्धांतों, दिशा और मूल के प्रति उसका रवैया देखता है। परमेश्वर इन बातों पर ध्यान देता है; यही बातें तुम्हारे मार्ग का निर्धारण करती हैं। तुम्हारे कर्तव्य-निर्वहन की प्रक्रिया में, यदि तुम्हारे अंदर ये बातें बिल्कुल न दिखायी दें और तुम्हारे कार्य के मूल में तुम्हारे अपने ही विचार हों, तुम्हारा सारा ध्यान अपने ही हितों की रक्षा करना, अपनी प्रतिष्ठा और ओहदे की रक्षा करना हो, तुम्हारी कार्य-प्रणाली निर्णय लेना, अकेले काम करना और अपनी बात को ही सर्वोपरि मानना हो, कभी दूसरों के साथ किसी चीज़ पर विचार-विमर्श करना या सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करना न हो, अकेले सत्य की तलाश करने की तो बात ही छोड़ दो, तो परमेश्वर तुम्हें कैसे देखेगा? अगर तुम अपना कर्तव्य इस ढंग से निभाते हो तो तुम अभी तक उस मानक तक नहीं पहुँचे हो; तुमने सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर कदम नहीं रखा है, क्योंकि काम करते समय, तुम सत्य-सिद्धांत की तलाश नहीं करते, हमेशा अपनी इच्छानुसार ही कार्य करते हो। यही कारण है कि ज़्यादातर लोग अपने कर्तव्यों का संतोषजनक ढंग से पालन क्यों नहीं कर पाते। अब इसे देखते हुए, क्या किसी के लिए अपने कर्तव्य को पर्याप्त रूप से पूरा करना मुश्किल होता है? वास्तव में, ऐसा नहीं है; लोगों को केवल विनम्रता का एक भाव रखने में सक्षम होना होगा, थोड़ी समझ रखनी होगी और एक उपयुक्त स्थिति अपनानी होगी। चाहे तुम अपने आप को कितना भी शिक्षित मानो, चाहे तुमने कोई भी पुरस्कार जीते हों, या तुम्हारी कितनी भी उपलब्धियाँ हों, और चाहे तुम अपनी योग्यता और दर्जे को कितना भी ऊँचा मानते हो, तुम्हें इन सभी चीज़ों को छोड़ने से शुरुआत करनी होगी, क्योंकि उनका कोई मोल नहीं है। चाहे वे चीज़ें कितनी भी महान और अच्छी हों, परमेश्वर के घर में वे सत्य से अधिक नहीं हो सकती हैं; वे चीज़ें सत्य नहीं हैं, और उसकी जगह नहीं ले सकती हैं। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि तुम्हारे पास समझ नाम की चीज़ होनी चाहिए। यदि तुम कहते हो, "मैं बहुत प्रतिभाशाली हूँ, मेरे पास एक बहुत तेज़ दिमाग है, मेरे पास त्वरित सजगता है, मैं शीघ्रता से सीखता हूँ, और मेरे पास एक बहुत अच्छी स्मरण-शक्ति है," और तुम हमेशा इन चीज़ों का पूंजी की तरह उपयोग करते रहते हो, तो यह परेशानी खड़ी करेगा। यदि तुम इन चीज़ों को सत्य के रूप में, या सत्य से अधिक मानते हो, तो तुम्हारे लिए सत्य को स्वीकार करना और इसे व्यवहार में लाना कठिन होगा। दम्भी, घमंडी लोगों के लिए जो हमेशा श्रेष्ठतर होने का अभिनय करते हैं, सत्य को स्वीकार करना सबसे कठिन होता है और उनके गिर पड़ने का खतरा सबसे अधिक होता है। यदि कोई अपने अहंकार के मुद्दे को हल कर सकता है, तो सत्य को व्यवहार में लाना आसान हो जाता है। इस प्रकार, तुम्हें सबसे पहले उन चीज़ों को नकारना और उनसे इनकार करना होगा जो सतह पर अच्छी और बुलंद लगती हैं और जो दूसरों की ईर्ष्या को उकसाती हैं। वे बातें सत्य नहीं हैं; बल्कि, वे तुम्हें सत्य में प्रवेश करने से रोक सकती हैं। अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सत्य की तलाश करो, सत्य के अनुसार अभ्यास करो और पर्याप्त रूप से अपने कर्तव्य का निर्वहन करो, क्योंकि कर्तव्य का पर्याप्त निर्वहन ही जीवन प्रवेश के मार्ग पर एकमात्र पहला कदम है, जिसका अर्थ है कि यह एक शुरुआत है। हर मामले में, एक सबसे आधारभूत, बुनियादी चीज होती है, एक ऐसी चीज होती है जो तुम्हें किसी लक्ष्य की ओर पहला कदम रखने को प्रेरित करती है, और अपने कर्तव्य को पर्याप्त रूप से निभाना एक ऐसा मार्ग है जो तुम्हें जीवन प्रवेश के द्वार से ले जाता है। यदि तुम्हारे कर्तव्य-निर्वहन में यह "पर्याप्तता" शामिल नहीं है, तो तुम्हें मेहनत करने की आवश्यकता है। तुम्हें कैसे मेहनत करनी चाहिए? ऐसा नहीं है कि तुम्हें चरित्र में बदलाव लाना है या अपने हुनर और पेशेवर क्षमताओं को त्यागना है; अपने कर्तव्य-निर्वहन के दौरान, सत्य की तलाश करते हुए और सत्य-सिद्धांत के अनुसार काम करते हुए, तुम इन क्षमताओं को और सीखी हुई चीज़ों को अपने साथ ले जा सकते हो। यदि तुम कर्तव्य-निर्वहनके साथ जीवन प्रवेश कर लेते हो, तो तुम पर्याप्त रूप से अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'कर्तव्‍य का समुचित निर्वहन क्‍या है?' से उद्धृत

आज तुम लोगों से जो कुछ हासिल करने की अपेक्षा की जाती है, वे अतिरिक्त माँगें नहीं, बल्कि मनुष्य का कर्तव्य है, जिसे सभी लोगों द्वारा किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अपना कर्तव्य तक निभाने में या उसे भली-भाँति करने में असमर्थ हो, तो क्या तुम लोग अपने ऊपर मुसीबतें नहीं ला रहे हो? क्या तुम लोग मृत्यु को आमंत्रित नहीं कर रहे हो? कैसे तुम लोग अभी भी भविष्य और संभावनाओं की आशा कर सकते हो? परमेश्वर का कार्य मानवजाति के लिए किया जाता है, और मनुष्य का सहयोग परमेश्वर के प्रबंधन के लिए दिया जाता है। जब परमेश्वर वह सब कर लेता है जो उसे करना चाहिए, तो मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने अभ्यास में उदार हो और परमेश्वर के साथ सहयोग करे। परमेश्वर के कार्य में मनुष्य को कोई कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए, उसे अपनी वफादारी प्रदान करनी चाहिए, और अनगिनत धारणाओं में सलंग्न नहीं होना चाहिए, या निष्क्रिय बैठकर मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। परमेश्वर मनुष्य के लिए स्वयं को बलिदान कर सकता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर को अपनी वफादारी प्रदान नहीं कर सकता? परमेश्वर मनुष्य के प्रति एक हृदय और मन वाला है, तो क्यों मनुष्य थोड़ा-सा सहयोग प्रदान नहीं कर सकता? परमेश्वर मानवजाति के लिए कार्य करता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के लिए अपना कुछ कर्तव्य पूरा नहीं कर सकता? परमेश्वर का कार्य इतनी दूर तक आ गया है, पर तुम लोग अभी भी देखते ही हो किंतु करते नहीं, सुनते ही हो किंतु हिलते नहीं। क्या ऐसे लोग तबाही के लक्ष्य नहीं हैं? परमेश्वर पहले ही अपना सर्वस्व मनुष्य को अर्पित कर चुका है, तो क्यों आज मनुष्य ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ है? परमेश्वर के लिए उसका कार्य उसकी पहली प्राथमिकता है, और उसके प्रबंधन का कार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करना उसकी पहली प्राथमिकता है। इसे तुम सभी लोगों को समझ लेना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

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