125. दूसरों के सामने अपना दिल खोलने के सिद्धांत

(1) सत्य से प्रेम करने वाले के साथ बात करते समय, व्यक्ति को दिल से बोलना चाहिए। अपनी वास्तविक स्थिति और अपनी कठिनाइयों को उघाड़ कर रख दो, और सत्य की तलाश करो, ताकि तुम प्रेमपूर्ण सहायता प्राप्त कर सको;

(2) दूसरों के साथ नेकी से पेश आना और उनके साथ प्रेम से बातचीत करना, और सच्चाई के अनुरूप बोलना आवश्यक है, जिससे कि दूसरों की मदद और उनका सुधार हो सके। लोगों पर कभी हमला न करो या उनके बारे में संदेह न रखो;

(3) व्यक्ति को दूसरों की कमज़ोरियों और कठिनाइयों को समझना चाहिए। उनके साथ बराबरी के स्तर पर खड़े होने और अपने दिल की बात कहकर उनकी मदद करने में सक्षम बनो, ताकि वे आश्वस्त और अबाधित महसूस कर सकें;

(4) दूसरों के साथ बातचीत में, व्यक्ति को परमेश्वर के वचनों के अपने अनुभव पर सहभागिता करनी चाहिए, ताकि दूसरों को उन्नत और लाभान्वित किया जा सके। दूसरों को परमेश्वर के प्रेम और उद्धार को महसूस करने में सहायता करो, और उन्हें जीवन के सही मार्ग पर चल पड़ने में मदद करो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

"अनुभव साझा करने और संगति करने" का अर्थ है अपने हृदय के हर विचार, अपनी अवस्था, अपने अनुभवों और परमेश्वर के वचनों के ज्ञान, और साथ ही अपने भीतर के भ्रष्ट स्वभाव के बारे में बात करना और उसके बाद, अन्य लोग इन बातों को समझते हैं, और सकारात्मक को स्वीकार करते हैं और जो नकारात्मक है उसे पहचानते हैं। केवल यही साझा करना है, और केवल यही वास्तव में संगति करना है। इसका अर्थ सिर्फ परमेश्वर के वचनों में या भजन के किसी हिस्से में अंतर्दृष्टि का होना नहीं है, और अपनी इच्छानुसार संगति करना, फिर इसे आगे नहीं ले जाना, और अपने स्वयं के वास्तविक जीवन से संबंधित कुछ भी नहीं कहना नहीं है। हर कोई सिद्धांत संबंधी और सैद्धांतिक ज्ञान के बारे में बात करता है और वास्तविक अनुभवों से प्राप्त ज्ञान के बारे में कोई बात नहीं करता है। तुम सभी इस तरह की बातों के बारे में, अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में, अपने भाइयों और बहनों के साथ कलीसिया में अपने जीवन के बारे में, और अपनी खुद की आंतरिक दुनिया के बारे में बात करने से बचते हो। ऐसा करने से, लोगों के बीच सच्ची संगति कैसे हो सकती है? वास्तविक विश्वास कैसे हो सकता है? कोई विश्वास नहीं हो सकता है! अगर कोई पत्नी अपने हृदय की कोई बात अपने पति से कभी न कहे, तो क्या वे हमराज़ हैं? क्या वे एक दूसरे को मन की बात बताते हैं? मान लीजिए कि पूरे दिन वे कहते हैं, "मैं तुम्हें प्रेम करता/करती हूँ!" वे केवल यही कहते हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने कभी नहीं जाहिर किया है कि वे अपने हृदय में क्या सोच रहे हैं, वे एक-दूसरे से क्या चाहते हैं, या उन्हें क्या समस्याएँ हैं। उन्होंने कभी एक-दूसरे से ऐसी बातें नहीं बताई हैं, न उन्होंने कभी भी एक-दूसरे को अपने मन की बात बताई है—और अगर दोनों कभी भी एक दूसरे को मन की बात नहीं बताते हैं, तो क्या वे ऐसे दम्पति हैं जो एक दूसरे से प्रेम करते हैं? एक दूसरे के साथ रहते समय अगर उनके पास एक दूसरे के प्रति बड़ी बड़ी बातों के अलावा कुछ नहीं है, तो क्या वे वास्तविक पति और पत्नी हैं? बिल्कुल नहीं! यदि भाई-बहनों को एक-दूसरे में विश्वास करने में सक्षम होना है, एक-दूसरे की सहायता करनी है और जब साथ होने पर एक-दूसरे का भरण-पोषण करना है, तो प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य अपने स्वयं के वास्तविक अनुभवों के बारे में बात करनी चाहिए। यदि तू अपने स्वयं के सच्चे अनुभवों के बारे में बात नहीं करता है, और केवल आडंबर-पूर्ण बातें ही करता है, और ऐसे वचन बोलता है जो सिद्धांत संबंधी और सतही हैं, तो तू एक ईमानदार व्यक्ति नहीं है, और तू ईमानदार होने में असमर्थ है। उदाहरण के लिए, कई सालों तक साथ रहते हुए पति-पत्नी, कभी-कभी झगड़ा करते हुए, एक दूसरे के आदी होने की कोशिश करते हैं। लेकिन अगर तुम दोनों में सामान्य मानवता है, तो तुम हमेशा उसके साथ दिल से बात करोगी और वह तुमसे दिल से बात करेगा। जीवन में जो भी समस्याएँ तुम्हारे सामने आती हैं, तुम्हारे कार्य में जो भी समस्याएँ घटित होती हैं, दिल की गहराई में तुम जो भी सोच रहे होते हो, जिस भी तरह से तुम चीजों के समाधान की योजना बनाते हो, अपने बच्चों के लिए जो भी तुम्हारे विचार और योजनाएँ हैं—तुम अपने जीवनसाथी को हर चीज बताओगी। इस प्रकार, क्या तुम दोनों एक-दूसरे के विेशेष रूप से नजदीक और अंतरंग महसूस नहीं करोगे? अगर वह तुम्हें अपने अंतरतम विचार नहीं बताता, और घर में वेतन लाने के अलावा कुछ नहीं करता, और यदि तुम उसे अपने विचार कभी नहीं बतातीं और कभी उस पर भरोसा नहीं करतीं, तो क्या तुम दोनों के बीच भावनात्मक दूरी नहीं है? निश्चित रूप से है, तुम एक-दूसरे के विचारों या इरादों को नहीं समझते। अंततः, तुम नहीं बता सकतीं कि तुम्हारा जीवनसाथी किस तरह का व्यक्ति है, न ही वह बता सकता है कि तुम किस तरह की व्यक्ति हो; तुम उसकी जरूरतें नहीं समझतीं, न ही वह तुम्हारी जरूरतें समझता है। अगर लोगों में कोई मौखिक या आध्यात्मिक संवाद नहीं है, तो उनके बीच अंतरंगता की कोई संभावना नहीं है, और वे एक-दूसरे का पोषण या एक-दूसरे की मदद नहीं कर सकते। तुम लोगों ने इसका पहले अनुभव किया है, है ना? यदि तुम्हारा मित्र तुम्हें हर चीज बताता है, जो भी वह सोच रहा है उसे जाहिर करता है, और अपनी हर पीड़ा या खुशी साझा करता है, तो क्या तुम उसके साथ विशेष अंतरंगता महसूस नहीं करतीं? उसके इन चीजों को तुम्हें बताने के लिए तैयार होने का कारण यह है कि तुमने भी अपने अंतरतम विचार उसे बताए है; तुम विशेष रूप से निकट हो, और यही कारण है कि तुम एक-दूसरे से निभाने और एक-दूसरे की मदद करने में सक्षम हो। कलीसिया में भाई-बहनों के बीच इस तरह के संवाद और विचार-विनिमय के बिना सामंजस्य स्थापित नहीं हो सकता।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

जब तुम सत्य पर संगति करते हो, और स्पष्ट और आसान तरीके से किसी बात का वर्णन करते हो जिससे वह दूसरों को सिखा और लाभान्वित कर सके, उन्हें परमेश्वर की इच्छा समझा सके और गलतफ़हमियों और भ्रांतियों से बचने में उनकी मदद कर सके, तो क्या दूसरों को नीचा दिखाने की कोई ज़रूरत है? क्या भाषण देने वाले लहज़े का उपयोग करना ज़रूरी है? तुम्हें उन्हें डांटने की ज़रूरत नहीं है, न ही तुम्हें ऊँची आवाज़ में बोलने की ज़रूरत है, और कड़े शब्दों, लहज़े, या स्वर की तो बिल्कुल ज़रूरत नहीं है। तुम्हें बस यह सीखने की ज़रूरत है कि कैसे सामान्य स्वर का उपयोग करें, दूसरों के साथ बराबरी की स्थिति में रहकर सहभागिता करें, शांति से बात करें, अपने मन की बात कहें, और कैसे इस बारे में स्पष्ट और आसान तरीके से बोलने का प्रयास करें कि तुम क्या समझते हो और दूसरों को क्या समझने की ज़रूरत है। जब तुम आसानी से समझ आने वाले तरीके से बात करते हो, तो अन्य लोग तुम्हारा मतलब समझ जाएँगे, तुम्हारे ऊपर से बोझ हट जाएगा, वे गलत अर्थ नहीं निकालेंगे, और तुम जो अधिक स्पष्ट रूप से संचार कर रहे होगे। क्या इससे तुम दोनों की उन्नति नहीं होती? क्या उन्हें उग्रता से भाषण देने की कोई ज़रूरत है? कई मामलों में, इसे उन पर थोपने की कोई ज़रूरत नहीं होती। अगर तुम उन पर कोई उपदेश न थोपो, फिर भी वे तुम्हारी बात मानने से इनकार कर दें, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हारी कुछ बातें सत्य हैं, और तथ्य हैं, लेकिन क्या लोग तुम्हारे बोलते ही तुम्हारे शब्दों को स्वीकार कर सकते हैं? उन शब्दों को स्वीकार करने और खुद को बदलने के लिए उन्हें किस चीज़ की ज़रूरत है? उन्हें एक प्रक्रिया की ज़रूरत है; तुम्हें उन्हें एक प्रक्रिया देनी होगी जिसके माध्यम से वे बदलें। ... खुलकर मन की बात कहने का उद्देश्य है कि लोगों के बीच सामान्य इंसानी बोलचाल हो और विचारों का आदान-प्रदान हो। यह इस बात को कहने का एक संकीर्ण तरीका है। विस्तार से कहें तो, आशय यह है कि लोग एक-दूसरे की स्थितियों को समझें, एक-दूसरे की कमियों को दूर करने के लिए एक-दूसरे के गुणों का लाभ उठाएँ, एक-दूसरे का साथ दें, एक-दूसरे की मदद करें। यह इसका असर है। क्या इससे लोगों के बीच सामान्य संवाद नहीं होता?

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

हर बार जब तुम कुछ करना समाप्त करते हो, तो उसके जो अंश तुम सोचते हो कि तुमने ठीक किए हैं, उन्हें जाँच के लिए रखना होगा—और, इससे भी बढ़कर, जो अंश तुम सोचते हो कि तुमने गलत किए हैं, उन्हें भी जाँच के लिए रखना होगा। इसके लिए यह आवश्यक है कि भाई और बहनें मिलकर संगति करने, खोजने और एक-दूसरे की सहायता करने में अधिक समय लगाएँ। जितना अधिक हम संगति करते हैं, उतना ही अधिक प्रकाश हमारे हृदय में प्रवेश करता है; तब परमेश्वर हमारी सभी समस्याओं के संबंध में हमें प्रबुद्ध करेगा। अगर हम में से कोई नहीं बोलता, और हम सब बस अच्छे दिखने के लिए खुद पर आवरण चढ़ाकर दूसरों के मन पर एक अच्छी छाप छोड़ने की उम्मीद करते हैं और चाहते हैं कि वे हमारे बारे में ऊँचा सोचें और हमारा उपहास न करें, तो हमारे पास विकास करने का कोई साधन नहीं होगा। अगर तुम हमेशा अच्छा दिखने के लिए खुद पर आवरण चढ़ा लेते हो, तो तुम विकास नहीं करोगे, और तुम हमेशा अधंकार में ही जियोगे। तुम रूपांतरित होने में भी असमर्थ रहोगे। अगर तुम बदलना चाहते हो, तो तुम्हें मूल्य चुकाना होगा, अपने आपको उजागर करना होगा, और अपना हृदय दूसरों के लिए खोलना होगा, और ऐसा करके तुम अपने को भी लाभान्वित करोगे और दूसरे लोगों को भी। जब कोई कहता है, “तुम हाल के अपने अनुभवों के बारे में कुछ बातें क्यों नहीं कहते?” तो कोई भी सार के मुद्दों के बारे में बात नहीं करता, कोई अपना विश्लेषण नहीं करता, या कोई अपने आपको उजागर नहीं करता। जब लोग शब्दों और सिद्धांतों के बारे में बात करते हैं, तो किसी को कोई समस्या नहीं होती, परंतु जब वे स्वयं को जानने के बारे में बोलते हैं, तो कोई कुछ नहीं कहता। जिन्हें अपने बारे में थोड़ा पता भी होता है, वे भी स्वयं को उजाकर करने की हिम्मत नहीं करते—उनके पास ऐसा करने का साहस नहीं होता। मामला कहाँ समाप्त होता है? जब लोग इकट्ठे होते हैं, तो वे परस्पर चापलूसी करके एक-दूसरे को मूर्ख बनाते हैं : कोई भी हर एक के द्वारा विश्लेषण किए जाने और जान लिए जाने के लिए अपना असली चेहरा दिखाने का इच्छुक नहीं होता। जब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तो क्या सच्चा कलीसियाई जीवन हो सकता है? नहीं हो सकता।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

अगर तुम सत्‍य की खोज करना चाहते हो, अगर तुम अपने ग़लत उद्देश्‍यों, अवस्‍थाओं, या मनोदशाओं में बड़े पैमाने का बदलाव लाना चाहते हो, तो सबसे पहले तुम्‍हें अपना दिल खोलकर रखना और संवाद करना सीखना होगा। स्‍वाभाविक ही, यह चुनाव तुम पर है कि तुम्‍हें किसके सामने अपना दिल खोलना है और किससे संवाद करना है। सामान्‍य लोग निश्‍चय ही किसी ऐसे व्‍यक्ति का चुनाव नहीं करेंगे जो उनपर हँसता हो, उनको नीचा दिखाता हो, उनका मखौल उड़ाता हो, उनकी कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाता हो, जो उनके दिल खोल कर रखते ही उनकी स्थिति को और भी बदतर बनाने की कोशिश करता हो; वे निस्‍सन्‍देह किन्‍हीं ऐसे लोगों की तलाश करेंगे जो सत्‍य की खोज करने के मामले में बेहतर हों, ऐसे लोग जिनमें बेहतर मानवीय गुण हों, जो अधिक ईमानदार और नैतिक रूप से खरे हों, ऐसे लोग जो उनके साथ संवाद करने के बाद उनकी मदद कर सकें। अपना दिल खोलकर रखने और संवाद करने के लिए, अपनी समस्‍याओं को सुलझाने में मदद के लिए, वे ऐसे ही लोगों की तलाश करते हैं। अपना दिल खोलकर रख देना और अपने अन्‍दर की सचाई को उजागर करना, सबसे पहले, वह रवैया है जो हम परमेश्‍वर के समक्ष अपनाते हैं, और यह रवैया निर्णायक महत्त्व रखता है। चीज़ों को अपने अन्‍दर दबाकर रखते हुए यह मत कहो कि "ये मेरे उद्देश्‍य हैं, ये मेरी मुश्किलें हैं, मेरी अन्‍दरूनी अवस्‍था बहुत बुरी है, मैं नकारात्‍मक हूँ, लेकिन तब भी ये बातें मैं किसी से कहूँगा नहीं, यह सब मैं अपने तक ही सीमित रखूँगा।" अगर तुम चीज़ों को अपने मन में ही छुपाये रखते हो, तो कुछ समय बाद प्रार्थना करने की भी तुम्‍हारी इच्‍छा नहीं रह जाएगी, तुम्‍हारी हालत में उत्तरोत्तर गिरावट आती जाएगी, और स्थितियों में बदलाव लाना मुश्किल हो जाएगा। और इसलिए, तुम्‍हारी हालत कैसी भी क्‍यों न हो, चाहे तुम नकारात्‍मक हो, या मुश्किल में हो, तुम्‍हारे अपने उद्देश्‍य या योजनाएँ जो भी हों, परीक्षा के दौरान तुमने कुछ भी क्‍यों न जाना या समझा हो, तुम्‍हें दिल खोलकर रखना और संवाद करना सीखना ही होगा, और जैसे ही तुम संवाद करते हो वैसे ही पवित्र आत्‍मा अपना काम करने लगता है। और पवित्र आत्‍मा अपना काम कैसे करता है? वह तुम्‍हें समस्‍या की गम्‍भीरता को समझने की गुंजाइश देता है, वह तुम्‍हें समस्‍या की जड़ और सार-तत्त्व के प्रति जागरूक करता है, और फिर, धीरे-धीरे, वह तुम्‍हें सत्‍य को समझने की, सत्‍य की वास्‍तविकता में प्रवेश करने की, और परमेश्‍वर की इच्‍छा को समझने की गुंजाइश देता है। जब लोग अपना दिल खोलकर रखने और संवाद करने में सक्षम होते हैं, तो सबसे पहले यह सत्‍य के प्रति एक ख़ास तरह के रवैये को, एक ईमानदार रवैये को दर्शाता है, और इससे स्‍पष्‍ट हो जाता है कि तुम्‍हारा हृदय निश्‍छल है या नहीं। जब निश्‍छल लोग मुसीबतों और निराशा से घिर जाते हैं, तो वे हमेशा किसी ऐसे व्‍यक्ति की तलाश करते हैं जिसके साथ वे संवाद कर सकें, वे समाधान का मार्ग खोजते हैं, और वे परमेश्‍वर की इच्‍छा को पूरा करने और इस समस्‍या या कठिनाई को हल करने का रास्‍ता खोजते हैं। वे अपना भार हल्‍का करने के लिए किसी की तलाश इसलिए नहीं करते कि वे कठिन दौर से गुज़र रहे होते हैं, बल्कि वे समाधान के उपाय खोज रहे होते हैं, ताकि वे सत्‍य की असलियत में प्रवेश पा सकें; इस तरह वे अपनी मुश्किल को हल करते हैं, और उससे हमेशा के लिए छुटकारा पा लेते हैं। अगर ये चीज़ें लम्‍बे समय तक लोगों के अन्‍दर छिपी रहती हैं, तो वे बीमारी बन जाती हैं! जो लोग निश्‍छल नहीं होते वे चाहे मुश्किलों और समस्‍याओं से घिरे हों या न घिरे हों, हमेशा वैसे-के-वैसे दिखते रहते हैं; उनके अन्‍दर की निराशा असह्य होती जाती है, लेकिन तुम उसे देख नहीं सकते। इसी तरह जब वे अपने अन्‍दर अन्‍याय का बोध, ग़लतफ़हमी, और निजी उद्देश्‍य लिये होते हैं, तो वे भी ज़ाहिर नहीं होते। वे तो सिर्फ़ चीज़ों को अपने अन्‍दर छिपाये रहते हैं और उन्‍हें अपने तक ही सीमित रखते हैं। हालाँकि सम्‍भव है कि वे अपने कर्तव्‍यों का निर्वाह कर रहे हों, तब भी जीवन में उनका प्रवेश नहीं होता, और उनके किसी भी कर्म के पीछे कोई उसूल नहीं होता, और बाहर से वे निरुद्देश्‍य और उत्‍साहहीन दिखायी देते रहते हैं। यह एक समस्‍या है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के समक्ष समर्पण से संबंधित अभ्यास के सिद्धांत' से उद्धृत

अगर दो व्यक्ति आपसी सद्भाव के साथ रहना चाहते हैं तो दोनों को एक-दूसरे के सामने अपना दिल खुला रखना होगा; यह उन लोगों के बीच और भी जरूरी है जो एक साथ सामंजस्य में काम करते हैं। कभी-कभी दो लोगों के आपसी व्यवहार के दौरान, उनके व्यक्तित्व टकराते हैं, या उनके पारिवारिक परिवेश, पृष्ठभूमि या उनकी आर्थिक स्थितियां मेल नहीं खातीं। लेकिन अगर वे दो लोग एक-दूसरे के सामने अपने दिल खोल कर रख सकते हैं, और अपने मुद्दों के प्रति बिल्कुल स्पष्ट हो सकें, तथा बिना झूठ और धोखे के अपनी बात रख सकें, तो इस तरह वे सच्चे मित्र बन सकेंगे, जिसका मतलब है अंतरंग मित्र बनना। संभवतः, जब दूसरा व्यक्ति किसी परेशानी में होगा तो वह किसी और की नहीं, तुम्हारी तलाश करेगा। तुम अगर उसे फटकार देते हो तो भी उसे पता होगा कि तुम सच्चे हो, क्योंकि वो जानता है कि तुम एक सच्चे हृदय वाले ईमानदार व्यक्ति हो। क्या तुम ऐसा व्यक्ति बन सकते हो? क्या तुम ऐसे हो? अगर नहीं, तो तुम ईमानदार नहीं हो। जब तुम दूसरों के साथ बातचीत करते हो तब सबसे पहले तुम्हें अपना दिल और अपनी सच्चाई उन्हें दिखानी होगी। यदि बातचीत या संपर्क करने में और दूसरों के साथ कार्य करने में, किसी के शब्द लापरवाह, आडंबरपूर्ण, मजाकिया, चापलूसी करने वाले, गैर-जिम्मेदाराना, और मनगढंत हैं, या उसकी बातें केवल सामने वाले से अपना काम निकालने के लिए हैं, तो उसके शब्द विश्वसनीय नहीं हैं, और वह थोड़ा भी ईमानदार नहीं है। दूसरे किसी भी व्यक्ति के साथ उनके पेश आने का यही तरीका है, चाहे वो व्यक्ति जो भी हो। क्या ऐसे व्यक्ति का दिल सच्चा है? यह व्यक्ति ईमानदार नहीं है। मान लो किसी व्यक्ति में कमियां हैं, और वह सच्चाई और ईमानदारी से तुमसे कहता है : "सही में बताओ मैं क्यों इतना नकारात्मक हूँ। मैं बिल्कुल समझ नहीं पाता।" और मान लो तुम उसकी समस्या को वास्तव में जानते हो, लेकिन उसे बताते नहीं हो, बल्कि उससे कहते हो : "कोई बात नहीं। मैं भी अक्सर नकारात्मक हो जाता हूँ।" ये शब्द सुनने वाले के लिए बहुत बड़ी सांत्वना हैं, लेकिन क्या तुम्हारा रवैया सच्चा है? नहीं, यह सच्चा नहीं है। तुम दूसरे व्यक्ति के साथ लापरवाह हो रहे, तुम उसे सांत्वना दे रहे कि वह अच्छा और मानसिक रूप से सहज महसूस करे, और वह तुमसे अलग नहीं महसूस करे, कोई विवाद न हो, इसके लिए तुमने उसके साथ ईमानदारी नहीं बरती। तुम उसकी सहायता करना नहीं चाहते, और उसकी सहायता के लिए तुम अपनी ईमानदारी का उपयोग नहीं करते हो, जिससे कि वह अपनी नकारात्मकता को छोड़ सके। तुमने वह नहीं किया है जो एक ईमानदार व्यक्ति को करना चाहिए। एक ईमानदार व्यक्ति होना ऐसा नहीं होता। अतः, इस तरह की परिस्थिति का सामना होने पर एक ईमानदार व्यक्ति को क्या करना चाहिए? तुम्हें सच्चे हृदय से बताना चाहिए कि तुमने सचमुच क्या देखा है : "मैं तुम्हें बताऊंगा कि मैंने क्या देखा और अनुभव किया है। यह तुम फैसला करो कि मैं जो कह रहा वह सही है या गलत। अगर गलत है, तो तुम्हें इसे स्वीकार करने की जरूरत नहीं है। अगर सही है तो मैं आशा करता हूँ कि तुम इसे स्वीकार करोगे। अगर मेरी बातों को सुनना तुम्हारे लिए कठिन है और तुम उससे आहत होते हो, तो मुझे उम्मीद है तुम परमेश्वर से स्वीकार कर पाओगे। मेरा इरादा और उद्देश्य तुम्हारी सहायता करना है। मुझे तुम्हारी समस्या स्पष्ट दिखती है : तुम्हारी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा आहत हुई है। तुम्हारे अहम को कोई बढ़ावा नहीं देता, और तुम सोचते हो कि सभी लोग तुम्हें तुच्छ समझते हैं, तुम पर प्रहार किया जा रहा, कि तुम्हारे साथ इतना गलत कभी नहीं हुआ। तुम इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते और नकारात्मक हो जाते हो। तुम्हें क्या लगता—क्या वास्तव में यही बात है?" यह सुन कर वह महसूस करता है कि वास्तव में मामला यही है। यही बात वास्तव में तुम्हारे दिल में है, लेकिन तुम अगर ईमानदार नहीं हो, तो यह बात कहोगे नहीं। तुम कहोगे, "मैं भी अक्सर नकारात्मक हो जाता हूँ," और जब दूसरा व्यक्ति यह सुनता है कि सभी लोग नकारात्मक हो जाते हैं, उसे लगता है कि यह सामान्य बात है, और अंततः, वह अपनी नकारात्मकता नहीं छोड़ता है। यदि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो और सच्चे भाव और हृदय से उसकी सहायता करते हो, तो तुम सच्चाई को समझने में उसकी मदद कर सकते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है' से उद्धृत

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