85. दान और भिक्षा देने के सिद्धांत

(1) कलीसिया किसी भी व्यक्ति को किसी भी कारण से दान माँगने से मना करती है। जो कोई भी ऐसा करता है उसके छिपे हुए उद्देश्य होते हैं, उन्हें उजागर करना चाहिए और उनकी रिपोर्ट करनी चाहिए।

(2) वे नवागंतुक जो अभी सत्य नहीं समझते हैं, उन्हें दान देने से मना किया जाता है। केवल परमेश्वर में सच्चा विश्वास रखने वाले ही दान कर सकते हैं।

(3) जब परमेश्वर के चुने हुए लोग दान या भिक्षा देते हैं, तो उन्हें तब तक बार-बार प्रार्थना करनी चाहिए जब तक कि वे दान या भिक्षा देने के लिए इच्छुक, उत्सुक और सक्षम न हो जाएँ या उन्हें कोई पछतावा या इसके बदले में कोई चाह न रहे। केवल ऐसे दान ही परमेश्वर द्वारा याद रखे जाएँगे।

(4) भिक्षा को सटीक रूप से लक्षित किया जाना चाहिए। मुख्य रूप से उन भाइयों और बहनों को दान देना परमेश्वर की इच्छा के अधिक करीब होता है जो लंबे समय से परमेश्वर के लिए खुद को खपाते रहे हैं और वित्तीय कठिनाई झेल रहे हैं।

(5) परमेश्वर को दान में दिया गया धन और सामान कलीसिया को सुरक्षित रखने के लिए दिया जाना चाहिए। कोई खुद भी इसकी देख-रेख कर सकता है, या इसकी सुरक्षा किसी ऐसे को सौंपी जा सकती है जो वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करता हो।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

"सावधान रहो! तुम मनुष्यों को दिखाने के लिये अपने धर्म के काम न करो, नहीं तो अपने स्वर्गीय पिता से कुछ भी फल न पाओगे। इसलिये जब तू दान करे, तो अपने आगे तुरही न बजवा, जैसे कपटी, सभाओं और गलियों में करते हैं, ताकि लोग उन की बड़ाई करें। मैं तुम से सच कहता हूँ कि वे अपना प्रतिफल पा चुके। परन्तु जब तू दान करे, तो जो तेरा दाहिना हाथ करता है, उसे तेरा बायाँ हाथ न जानने पाए। ताकि तेरा दान गुप्‍त रहे, और तब तेरा पिता जो गुप्‍त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा" (मत्ती 6:1-4)।

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा चढ़ावे और दान देने के सिद्धांत

परमेश्वर द्वारा मानवजाति का उद्धार केवल वचनों की अभिव्यक्ति से ही नहीं है। इसमें कार्य की एक बड़ी मात्रा भी सम्मिलित है, जिसमें शामिल है : सुसमाचार का प्रचार करना, कलीसियाओं का सिंचन करना, दृश्य-श्रव्य परियोजनाएँ, कलात्मक परियोजनाएँ, तथा वीडियो और पाठ्य कार्यों की एक श्रृंखला। इस कार्य के लिए मानवीय, वित्तीय और भौतिक संसाधनों की एक उल्लेखनीय राशि की आवश्यकता होती है, इसलिए सभी परमेश्वर के चुने हुए लोगों को स्वयं को समर्पित करना चाहिए, स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना चाहिए, और सुसमाचार को फैलाने के कार्य के लिए परमेश्वर के सृजित प्राणियों के कर्तव्यों और दायित्वों को निभाना चाहिए। तभी वे परमेश्वर के दिल के अनुरूप होंगे। मनुष्य जो आनंद का भोगता है, वह सब परमेश्वर द्वारा दिया गया है, इसलिए परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उनके द्वारा अर्जित समस्त धन के एक अंश का दान करना चाहिए जिसका उपयोग परमेश्वर के सुसमाचार को फैलाने के काम में किया जा सके। यह स्वर्ग का आदेश है और पृथ्वी द्वारा स्वीकृत है, और एक बाध्य दायित्व है। यदि लोगों ने कई वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद कुछ भी दान नहीं किया है, तो यह दर्शाता है कि उनके पास सच्चे विश्वास की कमी है, और वे सत्य को नहीं समझते हैं, उनके पास कोई विवेक या समझ नहीं है, और वे परमेश्वर के सामने रहने के योग्य नहीं हैं। इसलिए, हर कोई जो परमेश्वर में विश्वास करता है, उसे परमेश्वर के कार्य में अपने अंश का योगदान करना चाहिए। योगदान करने के साधन को व्यक्ति की अपनी समझ के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए। कुछ लोग अपनी हर आय का दस प्रतिशत दान करने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं; कुछ लोग अपना पूरा जीवन परमेश्वर को समर्पित कर देते हैं और खुद को परमेश्वर के लिए खपाते हैं। चाहे वे योगदान कैसे भी करें, यदि वे खुशी से ऐसा करते हैं, तो यह परमेश्वर द्वारा अनुमोदित किया जाएगा। प्रत्येक कलीसिया को चढ़ावे का एक बॉक्स स्थापित करना चाहिए ताकि जो लोग वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं और परमेश्वर में सच्ची आस्था रखते हैं, वे स्वेच्छा से दान कर सकें। परमेश्वर के घर ने पहले से ही इस नियम को स्पष्ट किया है कि नए विश्वासियों को जो सत्य को नहीं समझते हैं, और गरीब लोगों को चढ़ावे देने की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा दिए गए चढ़ावे व्यक्ति के विश्वास के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं; यदि ये योगदान बहुत प्रार्थना के बाद किये जाते हैं, स्वेच्छा से दिए जाते हैं, और वह व्यक्ति बदले में कुछ नहीं माँगता है, तो वे पूरी तरह से परमेश्वर के दिल के अनुरूप होते हैं। कलीसिया नए विश्वासियों द्वारा अति उत्साहपूर्वक किए गए दान को, या उस दान को जिससे परिवार में विवाद होने की संभावना होती है, स्वीकार नहीं करती है। कलीसिया किसी को भी किसी भी कारण से दान माँगने की अनुमति नहीं देती है। उन सभी लोगों के जो चढ़ावे माँगने का प्रयास करते हैं, उनके छिपे हुए स्वार्थ होते हैं, जिन्हें उजागर और रिपोर्ट किया जाना चाहिए। परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि वे जो दान करते हैं वह परमेश्वर को दिया जाता है, किसी कलीसिया या व्यक्ति को नहीं। किसी कलीसिया या व्यक्ति को दान देना बिल्कुल गलत होता है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को दान देने के अर्थ और सिद्धांतों की समझ की नींव पर ही दान करना चाहिए; केवल ऐसा करने से वे परमेश्वर द्वारा याद किए जाएँगे और धन्य होंगे।

अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु ने कहा, "मैं तुम से सच कहता हूँ कि तुमने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया" (मत्ती 25:40)। उन भाइयों और बहनों की मदद करने के लिए प्रेम से दान देना, जो निष्ठा से बलिदान करते हैं और खुद को परमेश्वर के लिए खपाते हैं और जो अपने जीवन में आर्थिक कठिनाई का सामना कर रहे हैं, अच्छे कर्म हैं, और ऐसा करना पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के अनुरूप होता है। बहरहाल, कुछ लोग केवल अगुवाओं के लिए महँगे उपहार खरीदते हैं। इस तरह के उपहार प्रेमपूर्वक दिए गए चढ़ावे नहीं हैं; वे जीवन जीने के एक ऐसे चाटुकार दर्शन के अलावा और कुछ नहीं जो व्यक्तिगत प्रेरणाओं और उद्देश्यों से कलंकित होते हैं, और वे परमेश्वर द्वारा याद नहीं रखे जाते हैं। दान देना सिद्धांतों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए और सही प्राप्तकर्ताओं के प्रति होना चाहिए। दुष्टों, झूठे अगुवाओं, या मसीह-विरोधियों को दान नहीं दिया जाना चाहिए; ऐसा करना बुराई की मदद करना है, और यह स्पष्ट, सीधा कुकर्म होता है। वास्तव में प्रेम से दान देने का अर्थ है, उन लोगों को देना जो ईमानदारी से खुद को परमेश्वर के लिए खपाते हैं, जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों का सिंचन करने और उन्हें सहारा देने में सक्षम हैं, और जो कलीसिया के काम और चुने गए लोगों के जीवन-विकास में सबसे बड़ा योगदान देते हैं। ऐसे लोगों के लिए दान देना—जो परमेश्वर के प्रिय हैं और परमेश्वर द्वारा धन्य हैं—पूरी तरह से परमेश्वर के हृदय के अनुरूप होता है। किसी व्यक्ति से अपना मतलब निकलवाने और किसी व्यक्तिगत उद्देश्य को पूरा करने के लिए दान या उपहार देना सत्य के बिल्कुल विपरीत होता है। अगुवाओं और कार्यकर्ताओं का यह एक और भी बड़ा दायित्व होता है कि वे परमेश्वर के घर के काम का विचार करें, अपना कर्तव्य ठीक से निभाएँ, परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करें, और ओहदे के आशीर्वादों की कामना न करें। इस संबंध में उनकी देखरेख करना परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों की जिम्मेदारी है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा धन या सामग्री का कोई भी दान सिद्धांतों के अनुसार किया जाना चाहिए। पहला, वे तब तक दान नहीं कर सकते जब तक कि उन्हें विश्वासी बने एक-दो वर्ष न हो चुके हों और उन्होंने कुछ सत्यों को समझ न लिया हो। दूसरा, यह सच्चे दिल से किया गया हो और वे पहले से कई बार इसके लिए प्रार्थना कर चुके हों; इसमें किसी तरह की हिचकिचाहट का तत्व नहीं होना चाहिए। अगर यह कोई बड़ी राशि है तो उन्हें एक गारंटी पत्र लिखना होगा, जिसमें उन्हें यह घोषणा करनी होगी कि इस धन का स्रोत क्या है और क्या इसमें कोई गुप्त खतरा या जोखिम शामिल है, और यह भी कि वे अपनी इच्छा से यह दान कर रहे हैं और उन्हें इसके लिए कोई पछतावा नहीं होगा। इसके बाद ही कलीसिया इसे स्वीकार कर सकता है। कलीसिया नए विश्वासियों से दान स्वीकार नहीं कर सकता, जो अभी सत्य को नहीं समझते और सिर्फ उत्साही हैं। अतीत में, ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता रहे हैं जिन्होंने परमेश्वर के लोगों से दान देने का आह्वान किया—यह परमेश्वर की इच्छा के और भी विरुद्ध है। इस तरह की चीज धार्मिक दुनिया में बहुत आम है; परमेश्वर के घर में किसी भी अगुआ या कार्यकर्ता को लोगों को किसी कर्तव्य का निर्वाह करने के लिए या दान देने के लिए अपील करने की अनुमति नहीं है। अगर इस तरह का कोई झूठा अगुआ सामने आता है तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उसे उजागर करना चाहिए और उसकी रिपोर्ट करनी चाहिए। साथ ही, परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा परमेश्वर को दिया गया दान चढ़ावा है जो परमेश्वर का है, यह किसी व्यक्ति या कलीसिया का नहीं है। कलीसिया कोई परोपकारी संस्था नहीं है, इसलिए यह परमेश्वर के चढ़ावे को खैरात की तरह गरीबों को नहीं दे सकती। परमेश्वर के चढ़ावे का प्रयोग मुख्य तौर पर सुसमाचार के प्रसार के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए और पूर्णकालिक कर्तव्य निर्वाह करने वालों की गुजर-बसर के लिए जरूरी खर्च के रूप में किया जाता है। कोई भी ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के चढ़ावे में हेराफेरी करके उसे खुद अपने लिए प्रयोग करता है, चढ़ावा चुराने वाले यहूदा के समान है, और ऐसे लोगों के साथ कड़ाई से निपटना चाहिए। गंभीर मामलों में उन्हें परिष्कृत और निष्कासित किया जा सकता है। कोई भी व्यक्ति जो चढ़ावे को खो देता है या उसका गलत ढंग से इस्तेमाल करता है, परमेश्वर के घर को नुकसान पहुंचाता है, और उसे उस राशि के बराबर हर्जाना भरना पड़ेगा।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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