48. सच्‍चे पश्‍चाताप के सिद्धान्‍त

(1) परमेश्‍वर के न्‍याय और ताड़ना को स्‍वीकार करो और उसके प्रति समर्पण करो। अपनी भ्रष्‍टता के सत्‍य को जानो, अपने भ्रष्‍ट स्‍वभाव का शुद्ध करो, और मनुष्‍य की तरह जियो;

(2) जब तुमने कोई अपराध किया हो, तो आत्‍म–चिन्‍तन के माध्‍यम से खुद को जानने में सक्षम बनो, और सत्‍य को तलाशने तथा सिद्धान्‍तों के मुताबिक़ आचरण करने के योग्‍य बनो। असल परिवर्तन अर्जित करो, और इस तरह परमेश्‍वर के प्रति सच्‍चा समर्पण करने वाले व्‍यक्ति बनो।

(3) परमेश्‍वर के वचनों का अभ्‍यास करने और उन्‍हें अनुभव करने के योग्‍य बनो, मिथ्‍या और छद्म आवरणों को उतार फेंको, और फिर कभी झूठ मत बोलो और छल मत करो; इसकी बजाय निष्‍ठापूर्वक अपने कर्तव्‍यों का पालन करो और ईमानदार व्‍यक्ति बन जाओ।

(4) परमेश्‍वर के न्‍याय, प्रताड़ना, परीक्षणों और शोधन को अनुभव करो, उसके धार्मिक स्‍वभाव को जानो, और परमेश्‍वर से डरने, बुराई को त्‍यागने, और उसके समक्ष जीने के योग्‍य बनो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

हर इंसान ने कभी न कभी परमेश्वर का विरोध किया होगा और हर इंसान ने कभी न कभी परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया होगा। लेकिन, यदि तुम अपनी खुशी से देहधारी परमेश्वर की आज्ञा मानते हो, और उसके बाद से परमेश्वर के हृदय को अपनी सत्यनिष्ठा द्वारा संतुष्ट करते हो, अपेक्षित सत्य का अभ्यास करते हो, अपेक्षित कर्तव्य का निर्वहन करते हो, और अपेक्षित नियमों को मानते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने विद्रोह को दूर करना चाहते हो, और ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जा सकता है। यदि तुम अपनी गलतियाँ मानने से ढिठाई से इनकार करते हो, और तुम्हारी नीयत पश्चाताप करने की नहीं है, यदि तुम अपने विद्रोही आचरण पर अड़े रहते हो, और परमेश्वर के साथ ज़रा-सा भी सहयोग करने और उसे संतुष्ट करने का भाव नहीं रखते, तब तुम्हारे जैसे दुराग्रही और न सुधरने वाले व्यक्ति को निश्चित रूप से दण्ड दिया जाएगा, और परमेश्वर तुम्हें कभी पूर्ण नहीं बनाएगा। यदि ऐसा है, तो तुम आज परमेश्वर के शत्रु हो और कल भी परमेश्वर के शत्रु रहोगे और उसके बाद के दिनों में भी तुम परमेश्वर के शत्रु बने रहोगे; तुम सदैव परमेश्वर के विरोधी और परमेश्वर के शत्रु रहोगे। ऐसी स्थिति में, परमेश्वर तुम्हें कैसे क्षमा कर सकता है? परमेश्वर का विरोध करना इंसान की प्रकृति है, लेकिन इंसान को महज़ इसलिए जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने के "रहस्य" को पाने का प्रयास नहीं करना चाहिए क्योंकि अपनी प्रकृति बदलना दुर्गम कार्य है। यदि ऐसी बात है, तो बेहतर होगा, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए तुम चले जाओ, ऐसा न हो कि भविष्य में तुम्हारी ताड़ना अधिक कठोर हो जाए, और तुम्हारी क्रूर प्रकृति उभर आए और उच्छृंखल हो जाए, जब तक कि अंत में परमेश्वर द्वारा तुम्हारे भौतिक शरीर को समाप्त न कर दिया जाए। तुम आशीष पाने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हो; लेकिन अगर अंत में, तुम पर दुर्भाग्य आ पड़े, तो क्या यह शर्मिंदगी की बात नहीं होगी। मैं तुम लोगों से आग्रह करता हूँ कि बेहतर होगा कि तुम कोई अन्य योजना बनाओ। तुम जो भी करो, वो परमेश्वर में आस्था रखने से बेहतर होगा : यकीनन ऐसा तो नहीं हो सकता कि यही एक मार्ग है। अगर तुमने सत्य की खोज नहीं की तो क्या तुम जीवित नहीं रहोगे? तुम क्यों इस प्रकार से परमेश्वर के साथ असहमत हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

हर व्यक्ति ने अपने जीवन में परमेश्वर में आस्था के दौरान किसी न किसी स्तर पर परमेश्वर का प्रतिरोध किया है, उसे धोखा दिया है। कुछ गलत कामों को अपराध के रूप में दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन कुछ अक्षम्य होते हैं; क्योंकि बहुत से कर्म ऐसे होते हैं जिनसे प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन होता है, जो परमेश्वर के स्वभाव के प्रति अपराध होते हैं। भाग्य को लेकर चिंतित बहुत से लोग पूछ सकते हैं कि ये कर्म कौनसे हैं। तुम लोगों को यह पता होना चाहिए कि तुम प्रकृति से ही अहंकारी और अकड़बाज हो, और सत्य के प्रति समर्पित होने के इच्छुक नहीं हो। इसलिए जब तुम लोग आत्म-चिंतन कर लोगे, तो मैं थोड़ा-थोड़ा करके तुम लोगों को बताँऊगा। मैं तुम लोगों से प्रशासनिक आज्ञाओं के विषय की बेहतर समझ हासिल करने और परमेश्वर के स्वभाव को जानने का प्रयास करने का आग्रह करता हूँ। अन्यथा, तुम लोग अपनी जबान बंद नहीं रख पाओगे और बड़ी-बड़ी बातें करोगे, तुम अनजाने में परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करके अंधकार में जा गिरोगे और पवित्र आत्मा एवं प्रकाश की उपस्थिति को गँवा दोगे। चूँकि तुम्हारे काम के कोई सिद्धांत नहीं हैं, तुम्हें जो नहीं करना चाहिए वह करते हो, जो नहीं बोलना चाहिए वह बोलते हो, इसलिए तुम्हें यथोचित दंड मिलेगा। तुम्हें पता होना चाहिए कि, हालाँकि कथन और कर्म में तुम्हारे कोई सिद्धांत नहीं हैं, लेकिन परमेश्वर इन दोनों बातों में अत्यंत सिद्धांतवादी है। तुम्हें दंड मिलने का कारण यह है कि तुमने परमेश्वर का अपमान किया है, किसी इंसान का नहीं। यदि जीवन में बार-बार तुम परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध अपराध करते हो, तो तुम नरक की संतान ही बनोगे। इंसान को ऐसा प्रतीत हो सकता है कि तुमने कुछ ही कर्म तो ऐसे किए हैं जो सत्य के अनुरूप नहीं हैं, और इससे अधिक कुछ नहीं। लेकिन क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर की निगाह में, तुम पहले ही एक ऐसे इंसान हो जिसके लिए अब पाप करने की कोई और छूट नहीं बची है? क्योंकि तुमने एक से अधिक बार परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन किया है और फिर तुममें पश्चाताप के कोई लक्षण भी नहीं दिखते, इसलिए तुम्हारे पास नरक में जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, जहाँ परमेश्वर इंसान को दंड देता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

एक अरसे से, परमेश्वर में आस्था रखने वाले सभी लोग एक खूबसूरत मंज़िल की आशा कर रहे हैं, और परमेश्वर के सभी विश्वासियों को उम्मीद है कि सौभाग्य अचानक उनके पास आ जाएगा। उन्हें आशा है कि उन्हें पता भी नहीं चलेगा और वे शांति से स्वर्ग में किसी स्थान पर विराजमान होंगे। लेकिन मैं कहता हूँ कि प्यारे विचारों वाले इन लोगों ने कभी नहीं जाना कि वे स्वर्ग से आने वाले ऐसे सौभाग्य को पाने के या वहाँ किसी आसन पर बैठने तक के पात्र भी हैं या नहीं। आज तुम लोग अपनी स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ़ हो, फिर भी यह उम्मीद लगाए बैठे हो कि तुम लोग अंतिम दिनों की विपत्तियों और दुष्टों को दंडित करने वाले परमेश्वर के हाथों से बच जाओगे। ऐसा लगता है कि सुनहरे सपने देखना और चीज़ों के अपने मन-मुताबिक होने की अभिलाषा करना उन सभी लोगों की एक आम विशेषता है, जिन्हें शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है, और जिनमें से एक भी ज़रा भी प्रतिभाशाली नहीं है। फिर भी, मैं तुम लोगों की अनावश्यक इच्छाओं और साथ ही आशीष पाने की तुम्हारी उत्सुकता का अंत करना चाहता हूँ। यह देखते हुए कि तुम्हारे अपराध असंख्य हैं, और तुम्हारी विद्रोहशीलता का तथ्य हमेशा बढ़ता जा रहा है, ये चीज़ें तुम्हारी भविष्य की प्यारी योजनाओं में कैसे फबेंगी? यदि तुम मनमाने ढंग से चलते रहना चाहते हो, गलत मार्ग पर बने रहते हो और तुम्हें रोकने-टोकने वाला भी कोई नहीं है, और तुम फिर भी चाहते हो कि तुम्हारे सपने पूरे हों, तो मैं तुमसे गुज़ारिश करता हूँ कि अपनी जड़ता में बने रहो और कभी जागना मत, क्योंकि तुम्हारे सपने थोथे हैं, और धार्मिक परमेश्वर के होते हुए, वह तुम्हें कोई अपवाद नहीं बनाएगा। यदि तुम अपने सपने पूरे करना चाहते हो, तो कभी सपने मत देखो, बल्कि हमेशा सत्य और तथ्यों का सामना करो। ख़ुद को बचाने का यही एकमात्र तरीका है। ठोस रूप में, इस पद्धति के क्या चरण हैं?

पहला, अपने सभी अपराधों पर एक नज़र डालो, और जाँच करो कि तुम्हारे व्यवहार तथा विचारों में से कोई ऐसा तो नहीं है, जो सत्य के अनुरूप नहीं है।

यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे तुम आसानी से कर सकते हो, और मुझे विश्वास है कि सभी बुद्धिमान लोग यह कर सकते हैं। लेकिन जिन लोगों को यह नहीं पता कि अपराध और सत्य होते क्या हैं, वे अपवाद हैं, क्योंकि मूलत: ऐसे लोग बुद्धिमान नहीं होते। मैं उन लोगों से बात कर रहा हूँ, जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित हैं, ईमानदार हैं, जिन्होंने परमेश्वर के किसी प्रशासनिक आदेश का गंभीर उल्लंघन नहीं किया है, और जो सहजता से अपने अपराधों का पता लगा सकते हैं। हालाँकि यह एक ऐसी चीज़ है, जिसकी मुझे तुमसे अपेक्षा है, और जिसे तुम लोग आसानी से कर सकते हो, लेकिन यही एकमात्र चीज़ नहीं है, जो मैं तुम लोगों से चाहता हूँ। कुछ भी हो, मुझे आशा है कि तुम लोग अकेले में इस अपेक्षा पर हँसोगे नहीं, और खास तौर पर तुम इसे हिकारत से नहीं देखोगे या फिर हलके में नहीं लोगे। तुम्हें इसे गंभीरता से लेना चाहिए और ख़ारिज नहीं करना चाहिए।

दूसरे, अपने प्रत्येक अपराध और अवज्ञा के लिए तुम्हें एक तदनुरूप सत्य खोजना चाहिए, और फिर उन सत्यों का उपयोग उन मुद्दों को हल करने के लिए करना चाहिए। उसके बाद, अपने आपराधिक कृत्यों और अवज्ञाकारी विचारों व कृत्यों को सत्य के अभ्यास से बदल लो।

तीसरे, तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति बनना चाहिए, न कि एक ऐसा व्यक्ति, जो हमेशा चालबाज़ी या कपट करे। (यहाँ मैं तुम लोगों से पुन: ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए कह रहा हूँ।)

यदि तुम ये तीनों चीज़ें कर पाते हो, तो तुम ख़ुशकिस्मत हो—ऐसे व्यक्ति, जिसके सपने पूरे होते हैं और जो सौभाग्य प्राप्त करता है। शायद तुम इन तीन नीरस अपेक्षाओं को गंभीरता से लोगे या शायद तुम इन्हें गैर-ज़िम्मेदारी से लोगे। जो भी हो, मेरा उद्देश्य तुम्हारे सपने पूरा करना और तुम्हारे आदर्श अमल में लाना है, न कि तुम लोगों का उपहास करना या तुम लोगों को बेवकूफ़ बनाना।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएँगे' से उद्धृत

तथ्‍य यह है कि हर व्‍यक्ति ने, कमोबेश, पाप किया है। जब तुम किसी चीज़ के बारे में यह नहीं जानते कि वह पाप है, तो तुम उसके बारे में धुँधले-से ढंग से सोचते हो या शायद तुम अपनी धारणाओं, आदतों और समझने के तौर-तरीक़ों से चिपके रहते हो—लेकिन एक दिन, चाहे अपने भाइयों और बहनों के साथ संगति के माध्‍यम से या परमेश्‍वर के प्रकाशन के माध्‍यम से, तुम जान जाते हो कि यह एक पाप है, परमेश्‍वर का अपमान है। तब तुम्‍हारा रवैया क्‍या होगा? क्‍या तुम तब भी, इस विश्‍वास के साथ कि तुम जो कुछ भी कर रहे हो वह सत्‍य के अनुरूप है, अपनी ज़ि‍द पर अड़े रहते हुए तर्क देते रहोगे, बहस करते रहोगे, अपने विचारों का अनुसरण करते रहोगे, यह मानते हुए कि जो तुम कर रहे हो वह सत्य के साथ तालमेल में है? यह चीज़ परमेश्‍वर के साथ तुम्‍हारे रवैये से संबंध रखती है। डेविड ने अपने पाप के प्रति किस तरह का रवैया अपनाया था? (पश्‍चाताप।) पश्‍चाताप–मैं अब यह पाप नहीं करूँगा। तब उसने क्‍या किया था? उसने परमेश्‍वर से प्रार्थना की थी कि वह उसे दंड दे : ‘‘अगर मैं यह ग़लती फिर से करूँ, तो परमेश्‍वर मुझे दंड दे और मेरी मृत्‍यु का कारण बने!’’ यह था उसका संकल्‍प; वह सच्‍चा पश्‍चाताप था। क्‍या साधारण लोग इसे हासिल कर सकते हैं? साधारण लोगों के लिए यही अच्‍छा है कि वे बहस करने की कोशिश नहीं करते या चुपचाप जवाबदेही स्‍वीकार कर लेते हैं और मन-ही-मन यह सोचते हैं : ‘‘उम्‍मीद है अब फिर से यह मुद्दा कोई नहीं उठाएगा। मुझे अपमानित होना पड़ेगा।” क्‍या यह सच्‍चा पश्‍चाताप है? सच्‍चे पश्‍चाताप के लिए अनिवार्य है कि तुम अतीत की अपनी बुराई को त्‍याग दो, उसे ख़त्‍म कर दो और भविष्‍य में उसे न दोहराओ। तब फिर क्‍या किया जाए? क्‍या मात्र बुराई को त्‍याग देने से और वह कृत्‍य न करने तथा उसके बारे में न सोचने से काम चल जाएगा? परमेश्‍वर के प्रति तुम्‍हारा क्‍या रवैया है? अब तुम स्‍वयं को परमेश्‍वर के समक्ष उजागर करते हुए उसके प्रति क्‍या दृष्टिकोण अपनाओगे? (हम परमेश्‍वर का दंड स्‍वीकार करेंगे।) परमेश्‍वर के दंड को, उसके न्‍याय और ताड़ना को स्‍वीकार करना–यह उसका एक हिस्‍सा है। दूसरा हिस्‍सा है परेमश्‍वर के दंड को स्‍वीकार करते हुए उसकी पड़ताल को स्‍वीकार करना। जब तुम इन दोनों हिस्‍सों को स्‍वीकार कर लोगे, तब तुम्‍हारे संकल्‍प का रूप क्‍या होगा? जब भविष्‍य में इस तरह की परिस्थितियों और मसलों से तुम्‍हारा सामना होगा, तब तुम क्‍या करोगे? सच्‍चे पश्‍चाताप के बिना व्‍यक्ति अपनी बुराई को नहीं त्‍याग सकता और वे कहीं भी, कभी भी, अपने पुराने तौर-तरीक़ों पर वापस लौट सकते हैं और बार-बार उसी बुरे काम को, उसी पाप को, उसी भूल को दोहरा सकते हैं। क्‍या सत्‍य के प्रति लोगों का रवैया यही नहीं है? इससे सत्‍य और परमेश्‍वर के प्रति मनुष्‍य का रवैया ज़ाहिर होता है। तब फिर पाप से पूरी तरह छुटकारा पाने के लिए क्‍या कर सकते हैं? सत्‍य का अभ्‍यास? सत्‍य के प्रति लोगों का रवैया सही होना चाहिए। और सत्‍य के प्रति लोगों को क्‍या रवैया अपनाना चाहिए तथा सत्‍य के प्रति उनका रवैया सही है यह दर्शाने के लिए उन्‍हें किस तरह का अभ्‍यास करना चाहिए? अगर इस तरह के मसले से आपका दोबारा सामना होने पर आप प्रलोभन के शिकार हो जाते हैं, तब आप क्‍या करेंगे? दो शब्‍द : ‘‘दूर रहो!’’ इसी के साथ-साथ अगर लोग फिर-से वैसी ही ग़लती करते हैं, तो लोगों को परमेश्‍वर द्वारा दंडित किए जाने के संकल्‍प पर भी अडिग रहना चाहिए। ऐसा करना उस बुराई से सच्‍चे हृदय से घृणा करना है, उसे दुनिया की सबसे ज्‍़यादा घृणित, पापपूर्ण, परमेश्‍वर को अपमानित करने वाली चीज़ के रूप में देखना है, उसे शाश्‍वत कलंक के रूप में देखना है। बाइबल कहती है : "चतुर मनुष्य विपत्ति को आते देखकर छिप जाता है; परन्तु भोले लोग आगे बढ़कर दण्ड भोगते हैं" (नीतिवचन 22:3)। यह सरलता नहीं है—यह स्‍पष्‍ट और सीधे तौर पर बेवकूफ़ी है। "दूर रहो"—यह अभ्‍यास करने का ढंग कैसे है? (यह अच्‍छा है।) क्‍या ऐसा वक्‍़त नहीं आता जब लोग दूर नहीं रह पाते? तब तुम क्‍या करोगे? तुम्‍हें सच्‍चे मन से परमेश्‍वर से प्रार्थना करनी होगी और उससे स्थितियों के आयोजन का अनुरोध करना होगा। कुछ परीक्षाएं भी प्रलोभनकारी होती हैं। आख़ि‍र परमेश्‍वर ऐसी स्थितियों को तुम्‍हारे साथ घटित होने की गुंजाइश ही क्‍यों देता है? ये संयोग से घटित नहीं होतीं; इनके माध्‍यम से परमेश्‍वर तुम्‍हें आज़मा रहा है, तुम्‍हारी परीक्षा ले रहा है। अगर तुम परमेश्‍वर द्वारा ली जा रही परीक्षा को स्‍वीकार नहीं करते और उसकी उपेक्षा करने की कोशिश करते हो, तो क्‍या इससे परमेश्‍वर के प्रति तुम्‍हारा रवैया ज़ाहिर नहीं होता? जब तुम परमेश्‍वर द्वारा तुम्‍हारे लिए निश्चित की गई परिस्थितियों से और उन परीक्षणों से अपना मुँह फेर लेते हो, जिन्‍हें वह तुम्‍हारे सामने पेश करता है और उद्दंड रवैया अपना लेते हो और न प्रार्थना करते हो न याचना करते हो, न ही उन परिस्थितियों और परीक्षणों के दौरान अभ्‍यास के मार्ग की खोज करते हो, तब क्‍या यह चीज़ परमेश्‍वर के प्रति मनुष्‍य के रवैये के बारे में नहीं बताती? ऐसे लोग हैं, जो कहते हैं : ‘‘मेरे ऐसे विचार नहीं रहे हैं, और मेरा वह उद्देश्‍य नहीं था।” अगर तुम उद्देश्‍य-रहित हो, तब परमेश्‍वर के प्रति तुम्‍हारा रवैया क्‍या है? कुछ रवैये सुविचारित और सोद्देश्‍य होते हैं, जबकि कुछ के पीछे कोई उद्देश्‍य नहीं होता–तुम्‍हारा रवैया कैसा है? क्‍या ऐसा व्‍यक्ति सत्‍य से प्रेम करता है, जो उद्दंड होता है और परमेश्‍वर को गंभीरता से नहीं लेता? यह बात सिद्ध हो चुकी है कि जो व्‍यक्ति सत्‍य और परमेश्‍वर को बच्‍चों का खेल समझता है, उन्‍हें मूल्‍यहीन समझता है, वह सत्‍य को प्रेम करने वाला व्‍यक्ति नहीं होता।

—परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

कुछ लोग कार्य करते समय अपनी इच्छा के अनुसार चलते हैं। वे सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं और केवल यह स्वीकार करते हैं कि वे अभिमानी हैं, उन्होंने केवल इसलिए भूल की क्योंकि वे सत्य से अनभिज्ञ हैं। अपने दिलों में, वे शिकायत भी करते हैं, "कोई और ज़िम्मेदारी उठाने आगे नहीं आता है, बस मैं ही ऐसा करता हूँ, और अंत में, मैं ज़िम्मेदारी में फँस जाता हूँ। यह मेरी बेवकूफ़ी है। मैं अगली बार ऐसा नहीं करूँगा, मैं आगे नहीं आऊँगा। हमेशा आगे आने वाले ही मारे जाते हैं!" इस रवैये के बारे में तुम क्या सोचते हो? क्या यह पश्चाताप का रवैया है? (नहीं)। यह कैसा रवैया है? अपनी गलती के चलते वे धूर्त और धोखेबाज़ बन जाते हैं—गलतियाँ इंसान को बहुत कुछ सिखाती हैं, इसे यूँ भी कहा जा सकता है। "मैं भाग्यशाली हूँ कि उसके कारण कोई आपदा नहीं आई। अगर मेरी वजह से कोई आपदा आई होती, तो मैं नरक में जाता और नष्ट कर दिया जाता। मुझे भविष्य में और अधिक सावधान रहना होगा।" वे सत्य की तलाश नहीं करते, बल्कि मामले को संभालने और उससे निपटने के लिए अपने ओछेपन और धूर्त योजनाओं का प्रयोग करते हैं। क्या वे इस तरह से सत्य को हासिल कर सकते हैं? वे ऐसा नहीं कर सकते—वे पश्चाताप करना नहीं जानते। पश्चाताप करते समय सबसे पहले यह जानना होता है कि तुमने क्या किया है और यह समझना होता है कि तुमने कहाँ भूल की है, समस्या का सार क्या है, और तुमने कैसा स्वभाव प्रकट किया है; इन बातों पर आत्म-चिंतन करो और उन्हें स्वीकार करो, फिर सत्य के अनुसार अभ्यास करो। यही पश्चाताप का रवैया है। दूसरी ओर, यदि समस्या पर विचार करने का तुम्हारा तरीका पहले की तुलना में अधिक धूर्ततापूर्ण होता है, और तुम्हारी तरकीबें और भी अधिक चालाकी भरी और गुप्त हैं, और तुम्हारे पास इससे निपटने के और भी तरीके हैं, तो समस्या सिर्फ़ धोखेबाज़ होने भर की नहीं है। तुम छलपूर्ण साधनों का उपयोग कर रहे हो और तुम्हारे पास ऐसे रहस्य हैं जिन्हें तुम प्रकट नहीं करोगे, और जो तुम कर रहे हो वह बुराई है। परमेश्वर तुम्हें अत्यधिक कठोर और दुष्ट समझता है, एक ऐसा व्यक्ति जो सतही रूप से तो यह मानता है कि उसने भूल की है और वह काट-छाँट और निपटने को स्वीकार करता है, फिर भी जिसमें पश्चाताप के रवैये का लेशमात्र भी नहीं होता है। ऐसा इसलिए है कि घटना के बाद या उसके दौरान, तुम सत्य के अनुसार कतई अभ्यास नहीं करते, और न ही तुम उसकी तलाश करते हो। तुम्हारा रवैया, समस्या को हल करने या उससे बच निकलने के लिए, शैतान के तरीकों, तरकीबों और फलसफे का उपयोग करने का होता है, इसे सफ़ाई से एक पुलिंदे में लपेट लेने का होता है, ताकि दूसरों को समस्या का कोई नामोनिशान न मिले, और न ही पुलिंदे से कोई सुराग़ मिले—और अंततः तुम्हें लगता है कि तुम बहुत सयाने हो। ये वे चीज़ें हैं जो परमेश्वर को नज़र आती हैं, बजाय इसके कि तुम वास्तव में आत्म-चिंतन करो, पश्चाताप करो और उस मामले के सामने ही, जो आ पड़ा है, अपने पाप को स्वीकार कर लो, फिर सत्य की तलाश करो और सत्य के अनुसार अभ्यास करो। तुम्हारा रवैया सत्य की तलाश या उसका अभ्यास करने का नहीं है, न ही यह परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करने का है, बल्कि समस्या को हल करने के लिए शैतान की तरकीबों और तरीकों का उपयोग करने का है। तुम दूसरों को अपने बारे में एक ग़लत धारणा देते हो और परमेश्वर द्वारा उजागर किए जाने का विरोध करते हो, और परमेश्वर ने तुम्हारे लिए जिन परिस्थितियों का आयोजन किया है, उनके प्रति तुम टकरावपूर्ण और रक्षात्मक होते हो। इसका मतलब है, तुम्हारा दिल पहले से ज्यादा अवरुद्ध है। यदि तुम परमेश्वर के प्रति ज्यादा अवरुद्ध हो, तो क्या तुम तब भी शांति और आनंद के साथ प्रकाश में रह सकते हो? अब और नहीं—तुमने सत्य और परमेश्वर को नकार दिया है। क्या ऐसी स्थिति लोगों में व्याप्त है? "इस बार मेरे साथ निपटा गया था। अगली बार, मुझे अधिक सावधान, और अधिक सयाना बनना होगा। सयाना बनना जीवन की नींव होती है—और जो लोग सयाने नहीं होते हैं, वे बेवकूफ़ होते हैं।" यदि तुम इस तरह से खुद का मार्गदर्शन कर रहे हो और खुद को आगे बढ़ा रहे हो, तो क्या तुम कभी भी, कहीं भी पहुँच पाओगे? क्या तुम सत्य को हासिल कर पाओगे? यदि कोई समस्या तुम पर आ पड़ती है और तुम सत्य की तलाश कर सकते हो, तो तुम सत्य के एक पहलू को समझ सकते हो और सत्य के उस पहलू को प्राप्त कर सकते हो। सत्य को समझने से क्या हासिल हो सकता है? जब तुम सत्य के एक पहलू को समझते हो, तो तुम परमेश्वर की इच्छा के एक पहलू को समझ लेते हो, और तुम यह समझ लेते हो कि परमेश्वर ने तुम्हारे पास इस चीज़ को क्यों आने दिया, क्यों वह तुमसे ऐसी माँग करेगा, क्यों वह तुम्हें इस तरह से ताड़ना देने और अनुशासित करने के लिए परिस्थितियों का आयोजन करेगा, क्यों वह तुम्हें अनुशासित करने के लिए इस मामले का उपयोग करेगा, और क्यों तुम इस मामले में गिरे, असफल हुए, और उजागर किए गए हो। यदि तुम इन चीज़ों को समझ सकते हो, तो तुम सत्य की तलाश करने में सक्षम होंगे और जीवन-प्रवेश हासिल करोगे। यदि तुम इन चीज़ों को नहीं समझ सकते और इन तथ्यों को स्वीकार नहीं करते, बल्कि विरोध और प्रतिरोध पर, खुद की गलतियों पर पर्दा डालने के लिए अपनी ही तरकीबों का उपयोग करने पर, एक झूठे चेहरे के साथ अन्य सभी का और परमेश्वर का सामना करने पर, ज़ोर देते हो, तो तुम सत्य को हासिल करने में हमेशा असमर्थ रहोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज से ही परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है' से उद्धृत

कुछ लोगों ने अतीत में, एक मसीह-विरोधी के कुछ स्वभावों को प्रकट किया था: वे आवारा और स्वेछाचारी थे, वे जो कहें हमेशा वही होता था या फिर परिणाम झेलना पड़ता था। लेकिन निपटारे और काट-छाँट से गुज़र कर, भाई-बहनों के द्वारा उनके साथ की गई संगति के माध्यम से, पुनर्निर्दिष्ट या प्रतिस्थापित होकर, कुछ बड़ी असफलताओं को झेलकर, एक समय के लिए नकारात्मक होने और फिर यह सोचते हुए, “कोई बात नहीं, मुझे अभी भी अपने कर्तव्य को ठीक से निभाने की अपनी प्राथमिकता को पूरा करना है। मैं मसीह-विरोधी के मार्ग पर चल रहा हूँ, लेकिन मुझे इस रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है, इसलिए मुझे अपने विश्वास में अच्छा होना चाहिए, मुझे ईमानदारी से तलाश करनी चाहिए। सत्य की तलाश करने के मार्ग में कुछ भी ग़लत नहीं होता है,”—धीरे-धीरे, वे खुद को वापस मोड़ लेते हैं, और फिर वे पश्चाताप करते हैं। उनमें अच्छी संभावनाएँ दिखाई पड़ती हैं, वे अपने कर्तव्यों का पालन करते समय सत्य-सिद्धांतों की तलाश करते हैं, और दूसरों के साथ कार्य करते हुए भी वे सत्य-सिद्धांतों की तलाश करते हैं। हर लिहाज से वे एक बेहतर दिशा में बढ़ रहे होते हैं। तब क्या वे बदले नहीं हैं? यह मसीह-विरोधी के मार्ग से हटना और सत्य के अभ्यास और उसकी तलाश के मार्ग पर चलना है। उन लोगों के लिए आशा है, उनके पास एक मौका है, वे खुद को वापस मोड़ सकते हैं। क्या तुम ऐसे लोगों को इसलिए मसीह-विरोधी के रूप में वर्गीकृत कर सकते हो, कि उन्होंने एक बार मसीह-विरोधी के कुछ लक्षण प्रदर्शित किए थे, या वे मसीह-विरोधी के मार्ग पर चले थे? नहीं। मसीह-विरोधी पश्चाताप नहीं करते हैं, उनके पास कोई शर्म नहीं होती, और इसके अलावा, उनके स्वभाव उग्र और बुरे होते हैं, तथा वे सच्चाई से एक चरम सीमा तक घृणा करते हैं। उनकी अतिशय घृणा क्या निर्धारित करती है? यह कि वे कभी पश्चाताप नहीं कर सकते। यदि वे इस हद तक सत्य से घृणा करते हैं, तो क्या वे सत्य का अभ्यास कर सकते हैं, और क्या वे पश्चाताप करने में सक्षम हैं? असंभव। यदि उन लोगों के बारे में जो पश्चाताप करने में सक्षम होते हैं, कोई एक बात निश्चित हो, तो वह यह है कि उन्होंने भूलें तो की होती हैं, लेकिन परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करने में वे सक्षम होते हैं, परमेश्वर द्वारा कही गई सच्चाइयों को स्वीकार करने में सक्षम होते हैं, और परमेश्वर के वचनों को अपनी व्यक्तिगत सूक्तिओं के रूप में लेकर, और परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन की वास्तविकता बनाकर, वे सहयोग देने का यथाशक्ति प्रयास करने में सक्षम होते हैं। वे सत्य को स्वीकार करते हैं, और अपनी गहराई में, वे इससे घृणा नहीं करते हैं। क्या यह अंतर नहीं है? दूसरी ओर, मसीह-विरोधी किसी की भी बात नहीं सुनते हैं, वे भरोसा नहीं करते कि सत्य ही सत्य है, और वे यह स्वीकार नहीं करते कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (8)' से उद्धृत

क्यों कई लोग अपनी दैहिक प्राथमिकताओं का अनुसरण करते हैं? क्योंकि वे स्वयं को बहुत अच्छा मानते हैं, उन्हें लगता है कि उनके कार्यकलाप सही और न्यायोचित हैं, कि उनमें कोई दोष नहीं है, और यहाँ तक कि वे पूरी तरह से सही हैं, इसलिए वे इस धारणा के साथ कार्य करने में समर्थ हैं कि न्याय उनके पक्ष में है। जब कोई यह जान लेता है कि उसकी असली प्रकृति क्या है—कितना कुरूप, कितना घृणित और कितना दयनीय है—तो फिर वह स्वयं पर बहुत गर्व नहीं करता है, उतना बेतहाशा अहंकारी नहीं होता है, और स्वयं से उतना प्रसन्न नहीं होता है जितना वह पहले होता था। ऐसा व्यक्ति महसूस करता है, कि "मुझे ईमानदार और व्यवहारिक होना चाहिए, और परमेश्वर के कुछ वचनों का अभ्यास करना चाहिए। यदि नहीं, तो मैं इंसान होने के स्तर के बराबर नहीं होऊँगा, और परमेश्वर की उपस्थिति में रहने में शर्मिंदा होऊँगा।" तब कोई वास्तव में अपने आपको क्षुद्र के रूप में, वास्तव में महत्वहीन के रूप में देखता है। इस समय, उसके लिए सच्चाई का पालन करना आसान होता है, और वह थोड़ा-थोड़ा ऐसा दिखाई देता है जैसा कि किसी इंसान को होना चाहिए। जब लोग वास्तव में स्वयं से घृणा करते हैं केवल तभी वे शरीर को त्याग पाते हैं। यदि वे स्वयं से घृणा नहीं करते हैं, तो वे देह को नहीं त्याग पाएँगे। स्वयं से घृणा करने में कुछ चीजों का समावेश है: सबसे पहले, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना; और दूसरा, स्वयं को अभावग्रस्त और दयनीय के रूप में समझना, स्वयं को अति तुच्छ और महत्वहीन समझना, और स्वयं की दयनीय और गंदी आत्मा को समझना। जब कोई पूरी तरह से देखता है कि वह वास्तव में क्या है, और यह परिणाम प्राप्त हो जाता है, तब वह स्वयं के बारे में वास्तव में ज्ञान प्राप्त करता है, और ऐसा कहा जा सकता है कि किसी ने अपने आपको पूरी तरह से जान लिया है। केवल तभी कोई स्वयं से वास्तव में घृणा कर सकता है, इतना कि स्वयं को शाप दे, और वास्तव में महसूस करे कि उसे शैतान के द्वारा अत्यधिक गहराई तक भ्रष्ट किया गया है इस तरह से कि वह अब इंसान के समान नहीं है। तब एक दिन, जब मृत्यु का भय दिखाई देगा, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, "यह परमेश्वर की धार्मिक सजा है; परमेश्वर वास्तव में धार्मिक है; मुझे वास्तव में मर जाना चाहिए!" इस बिन्दु पर, वह कोई शिकायत दर्ज नहीं करेगा, परमेश्वर को दोष देने की तो बात ही दूर है, वह बस यही महसूस करेगा कि वह बहुत ज़रूरतमंद और दयनीय है, वो इतना गंदा है कि उसे परमेश्वर द्वारा मिटा दिया जाना चाहिए, और उसके जैसी आत्मा पृथ्वी पर रहने के योग्य नहीं है। इस बिन्दु पर, यह व्यक्ति परमेश्वर का विरोध नहीं करेगा, परमेश्वर के साथ विश्वासघात तो बिल्कुल नहीं करेगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानना मुख्यतः मानवीय प्रकृति को जानना है' से उद्धृत

क्या तुम लोगों ने उस खाके को समझ लिया है जिसमें पवित्र आत्मा कार्य करता है? पवित्र आत्मा आम तौर पर उन लोगों पर कार्य करता है जिनके दिल ईमानदार हैं, वह तभी कार्य करता है जब लोग मुश्किल में होते हैं और सत्य की खोज करते हैं। परमेश्वर उन लोगों पर ध्यान नहीं देगा जिनके पास इंसानी तर्क या चेतना का ज़रा सा भी अंश नहीं है। अगर कोई व्यक्ति बहुत ईमानदार है, पर कुछ समय के लिए उसका मन परमेश्वर से हट गया है, उसकी सुधरने की इच्छा नहीं रहती, वह नकारात्मक दशा में चला जाता है और इससे बाहर नहीं निकल पाता, जब वह अपनी दशा से उबरने के लिए प्रार्थना नहीं करता या सत्य की खोज नहीं करता और सहयोग नहीं करता, तो पवित्र आत्मा उसकी इस सामयिक कालिमायुक्त दशा के दौरान या उसकी अस्थायी पतनशीलता के दौरान उसके भीतर कार्य नहीं करेगा। तो फिर मानवता की चेतना से विहीन ऐसे व्यक्ति पर पवित्र आत्मा द्वारा कैसे कार्य किया जा सकता है? यह तो और भी असंभव है। फिर ऐसे लोगों को क्या करना चाहिए? उन्हें सच्चे दिल से पश्चाताप करना चाहिए। सबसे पहले, तुम्हारा हृदय परमेश्वर के लिए खुला होना चाहिए और तुम्हें परमेश्वर के सत्य की खोज करनी चाहिए; जब तुम सत्य को समझ लोगे, तब तुम इसका अभ्यास कर पाओगे। फिर तुम परमेश्वर की व्यवस्था के प्रति समर्पित हो जाओगे और परमेश्वर को अपना नियंत्रण लेने दोगे। सिर्फ़ इसी तरीके से तुम परमेश्वर की प्रशंसा पा सकोगे। सबसे पहले तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा और दंभ को अलग रखना होगा और अपने हितों को त्यागना होगा। इसके बाद, अपने पूरे शरीर और आत्मा को अपना दायित्व पूरा करने और परमेश्वर के लिए गवाही देने के काम में लगाना होगा। तुम्हें पहले आत्म-समर्पण करना होगा, परमेश्वर के लिए अपने हृदय को खोलना होगा और उन चीजों को अलग करना होगा जिन्हें तुम प्रेम करते हो और संजो कर रखते हो। अगर तुम परमेश्वर से अनुरोध करते समय उन चीजों से चिपके रहते हो, तो क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर पाओगे? पवित्र आत्मा का कार्य सशर्त है, और परमेश्वर वह परमेश्वर है जो दुष्टों से नफरत करता है और जो स्वयं पवित्र है। अगर लोग हमेशा इन चीजों से चिपके रहते हैं, लगातार अपने आपको परमेश्वर से दूर करते हैं और परमेश्वर के कार्य एवं मार्गदर्शन को अस्वीकार करते हैं, तो परमेश्वर उन पर कार्य करना बंद कर देगा। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर को हर व्यक्ति के भीतर कार्य करना चाहिए या वह तुम्हें ऐसा-वैसा कुछ करने के लिए बाध्य करेगा। वह तुम्हारे साथ जबर्दस्ती नहीं करता। मनुष्यों को ऐसा-वैसा करने के लिए बाध्य करना दुष्ट आत्माओं का काम होता है, बल्कि लोगों पर कब्जा करके उन्हें नियंत्रित करना भी। पवित्र आत्मा तो बहुत शालीनता के साथ कार्य करता है; वह तुम्हें प्रेरित करता है और तुम्हें महसूस भी नहीं होता। तुम्हें ऐसा लगता है जैसे तुम्हें अनजाने में ही कुछ समझ में आ गया है या उसका अहसास हो गया है। पवित्र आत्मा इसी तरीके से लोगों को प्रेरित करता है और अगर वे समर्पण करते हैं तो वे प्रायश्चित करने की स्थित होते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर का अनुसरण करते हुए, अपनी मूर्खता और अज्ञानता के कारण और अपने विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों के कारण, लोग अक्सर खुद को अवज्ञाकारी के रूप में उजागर कर देते हैं और वे परमेश्वर को गलत समझते हैं या उससे चिढ़ जाते हैं। वे भटक जाते हैं, कुछ निराश होकर अपने काम में शिथिल हो जाते हैं और परमेश्वर से नाराज होकर विश्वास खो देते हैं। जीवन के विभिन्न चरणों में अक्सर लोगों का व्यवहार अवज्ञाकारी हो जाता है। उनके दिल में परमेश्वर होता है और वे जानते हैं कि वह कार्यरत है, फिर भी कभी-कभी वे उस तथ्य को समझ नहीं पाते। हालांकि वे सतही रूप से तो समर्पण कर देते हैं, लेकिन उसे गहराई से स्वीकार नहीं कर पाते। किस बात से यह स्पष्ट होता है कि वे इसे स्वीकार नहीं कर पाते? एक तो अभिव्यक्त करने का तरीका यह है कि सब कुछ जानने के बावजूद, जो कुछ उन्होंने किया है, वे उसे दरकिनार करके परमेश्वर के सामने आकर अपनी गलतियों को स्वीकार करके, यह नहीं कह पाते, "परमेश्वर, मैं गलत था। मैं अब ऐसा नहीं करूँगा। मैं तेरी इच्छा का पता लगाऊँगा और वैसा ही करूँगा जैसा तू चाहता है। मैं तेरी बातों पर ध्यान नहीं देता था; मैं अपरिपक्व, अवज्ञाकारी और मूर्ख था। अब मुझे इसका पता है।" लोग किस प्रवृत्ति से अपनी गलतियाँ स्वीकार करते हैं? (वे एक बदलाव लाना चाहते हैं।) यदि लोगों में विवेक और तर्क-शक्ति है और सत्य के लिए तरसते हैं, फिर भी वे अपनी गलतियों को सुधारना नहीं जानते और मानते हैं कि अतीत अतीत है और उन्हें यकीन है कि वे कभी गलत नहीं होते, तो इससे किस तरह के स्वभाव का पता चलता है? यह किस तरह का व्यवहार है? इस तरह के व्यवहार का सार क्या है? ऐसे लोग कठोर होते हैं, चाहे जो हो जाए, वे इसी मार्ग का अनुसरण करेंगे। परमेश्वर ऐसे लोगों को पसंद नहीं करता। जब योना ने पहली बार नीनवे को परमेश्वर के वचन सुनाए, तो उसने क्या कहा? ("अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा" (योना 3:4)।) नीनवे ने इन वचनों पर क्या प्रतिक्रिया दी? जैसे ही उन्होंने देखा कि परमेश्वर उन्हें नष्ट करने जा रहा है, उन्होंने बोरी और राख ले ली और जल्दी से अपने पाप स्वीकार कर लिए। पश्चाताप करने का यही अर्थ है। ऐसा पश्चाताप मनुष्य को एक बड़ा अवसर प्रदान करता है। वह क्या अवसर है? यह जीवित रहने का अवसर है। इस तरह के पश्चाताप के बिना, तुम्हारे लिए आगे बढ़ते रहना कठिन होगा, चाहे वह तुम्हारे कर्तव्य का निर्वहन हो या उद्धार के लिए तुम्हारी खोज। प्रत्येक चरण में-जब परमेश्वर तुम्हें अनुशासित कर रहा हो या ताड़ना दे रहा हो, या जब वह तुम्हें याद दिला रहा हो और तुम्हें उपदेश दे रहा हो–अगर तुम्हारे और परमेश्वर के बीच टकराव हुआ है, फिर भी तुम अपने विचारों, दृष्टिकोण और प्रवृत्ति से चिपके रहते हो, उस समय भले ही तुम्हारे कदम आगे बढ़ रहे हों, तुम्हारे और परमेश्वर के बीच संघर्ष, उसके प्रति तुम्हारी गलतफहमी, नाराजगी और विद्रोह में कोई सुधार नहीं आएगा और यदि तुम्हारे अंदर बदलाव नहीं आया, तो परमेश्वर अपने स्तर पर तुम्हें हटा देगा। यद्यपि तुमने अपने कर्तव्य का त्याग नहीं किया है, उसे बरकरार रखा है, यद्यपि तुमने परमेश्वर के आदेश को स्वीकार कर लिया है और तुम उसके प्रति वफादार हो, लेकिन तुम्हारे और परमेश्वर के बीच तुम्हारे द्वारा पैदा की गयी विवाद की गाँठ हमेशा रहेगी। यदि तुमने यह गाँठ नहीं खोली या इसे नहीं भुलाया और तुम परमेश्वर को ही गलत मानते रहे कि तुम पर अन्याय किया गया है, तो फिर इसका मतलब है कि तुममें कोई बदलाव नहीं आया है। परमेश्वर लोगों के बदलाव लाने पर इतना महत्व क्यों देता है? एक सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता को किस प्रवृत्ति से देखे? उसे इस प्रवृत्ति से देखना चाहिए कि सृष्टिकर्ता चाहे कुछ भी करे, वह सही है। यदि तुम इस बात को स्वीकार नहीं करते हो कि सृष्टिकर्ता सत्य, मार्ग और जीवन है, तो फिर तुम्हारे लिए ये शब्द खोखले हैं, और यदि ये शब्द तुम्हारे लिए खोखले हैं, तो क्या परमेश्वर फिर भी तुम्हें बचा पाएगा? वो नहीं बचा पाएगा। तुम पात्र नहीं होगे; परमेश्वर तुम जैसे लोगों को नहीं बचाता। कुछ लोग कहते हैं, "परमेश्वर चाहता है कि लोग पश्चाताप करें और वे बदलाव लाना जान लें। खैर, बहुत-सी चीजों में, मैंने कोई बदलाव नहीं किया। क्या मेरे पास अभी भी ऐसा करने का समय है?" हां, अभी भी समय है। इसके अतिरिक्त, कुछ लोग कहते हैं, "मुझे किन चीजों में बदलाव करना है? अतीत की बातें भूली-बिसरी हैं।" यदि एक दिन के लिए भी तुम्हारे स्वभाव में बदलाव न आए, अगर एक भी दिन ऐसा चला जाए जब तुम यह न जान सको कि तुम्हारा कौन-सा काम सत्य के अनुरूप नहीं है और कौन-सा काम परमेश्वर के अनुरूप नहीं हो सकता, फिर वह गाँठ जो तुम्हारे और परमेश्वर के बीच मौजूद है, वह अभी खुली नहीं है; मामला अभी न तो सुलझा, न ही समाप्त हुआ है। यह स्वभाव तुम्हारे अंदर ही है; यह विचार, दृष्टिकोण और प्रवृत्ति तुम्हारे अंदर ही है। जैसे ही सही परिस्थितियां सामने आएँगी, तुम्हारा यह दृष्टिकोण एक बार फिर से उभर आएगा और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संघर्ष भड़क उठेगा। इस प्रकार, हालांकि तुम अतीत को तो सुधार नहीं सकते, लेकिन तुम्हें भविष्य में होने वाली चीजों को सुधारना होगा। उन्हें कैसे सुधारोगे? तुम्हें बदलाव लाकर अपने विचारों और इरादों को अलग रखना चाहिए। जब तुम्हारा यह इरादा होगा, तो सहज ही तुम्हारी प्रवृत्ति भी समर्पण की होगी। हालाँकि, थोड़ा और अधिक सटीक रूप से बात करें तो, वास्तव में यह ऐसे लोगों से संबंधित है जो परमेश्वर, यानी सृष्टिकर्ता के प्रति अपनी प्रवृत्ति में बदलाव लाते हैं; यह इस तथ्य की मान्यता और पुष्टि है कि सृष्टिकर्ता सत्य, मार्ग और जीवन है। यदि तुम अपने अंदर बदलाव ले आते हो, तो इससे ज़ाहिर होता है कि तुम उन चीजों को अलग रख सकते हो जिन्हें तुम सही समझते हो, या जिन चीजों को भ्रष्ट मानवजाति सामूहिक रूप से सही समझती है; जबकि तुम मानते हो कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और सकारात्मक बातें हैं। यदि तुम ऐसी प्रवृत्ति रख सको, तो इससे यह सिद्ध होता है कि तुम सृष्टिकर्ता की पहचान को मान्यता देते हो। परमेश्वर मामले को इसी ढंग से देखता है और इसलिए वह इसे विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (3)' से उद्धृत

नीनवे के राजा का पश्चात्ताप यहोवा परमेश्वर की प्रशंसा पाता है

जब नीनवे के राजा ने यह समाचार सुना, तो वह अपने सिंहासन से उठा खड़ा हुआ, उसने अपने वस्त्र उतार डाले और टाट पहनकर राख में बैठ गया। तब उसने घोषणा की कि नगर में किसी को भी कुछ भी चखने की अनुमति नहीं दी जाएगी, और किसी भेड़, बैल या अन्य मवेशी को घास-पानी नहीं दिया जाएगा। मनुष्य और पशु दोनों को एक-समान टाट ओढ़ना था, और लोगों को बड़ी लगन से परमेश्वर से विनती करनी थी। राजा ने यह घोषणा भी की कि उनमें से प्रत्येक अपने बुरे मार्ग को छोड़ देगा और हिंसा का त्याग कर देगा। उसके द्वारा लगातार किए गए इन कार्यों को देखते हुए, नीनवे के राजा के हृदय में सच्चा पश्चात्ताप था। उसके द्वारा किए गए ये कार्य—अपने सिंहासन से उठ खड़ा होना, अपने राजकीय वस्त्र उतार देना, टाट ओढ़ना और राख में बैठ जाना—लोगों को बताता है कि नीनवे का राजा अपने शाही रुतबे को छोड़ रहा था और आम लोगों के साथ टाट ओढ़ रहा था। कहने का तात्पर्य है कि नीनवे का राजा यहोवा परमेश्वर से आई घोषणा सुनने के बाद अपने बुरे मार्ग पर चलते रहने या अपने हाथों से हिंसा जारी रखने के लिए अपने शाही पद पर जमा नहीं रहा; बल्कि उसने अपने अधिकार को दरकिनार कर यहोवा परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप किया। इस समय नीनवे का राजा एक राजा के रूप में पश्चात्ताप नहीं कर रहा था; बल्कि वह परमेश्वर की एक सामान्य प्रजा के रूप में अपने पाप स्वीकार करने और पश्चात्ताप करने के लिए परमेश्वर के सामने आया था। इतना ही नहीं, उसने पूरे शहर से भी उसी तरह यहोवा परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप करने और अपने पाप स्वीकार करने के लिए कहा, जिस तरह उसने किया था; इसके अलावा, उसके पास एक विशिष्ट योजना भी थी कि ऐसा कैसे किया जाए, जैसा कि पवित्रशास्त्र में देखने को मिलता है : "क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाए; वे न खाएँ और न पानी पीएँ। ... और वे परमेश्‍वर की दोहाई चिल्‍ला-चिल्‍ला कर दें; और अपने कुमार्ग से फिरें; और उस उपद्रव से, जो वे करते हैं, पश्‍चाताप करें।" नगर का शासक होने के नाते, नीनवे का राजा उच्चतम हैसियत और सामर्थ्य रखता था और जो चाहता, कर सकता था। यहोवा परमेश्वर की घोषणा सामने आने पर वह उस मामले को नज़रअंदाज़ कर सकता था या बस यों ही अकेले अपने पापों का प्रायश्चित कर सकता था और उन्हें स्वीकार कर सकता था; नगर के लोग पश्चात्ताप करें या न करे, वह इस मामले को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर सकता था। किंतु नीनवे के राजा ने ऐसा बिलकुल नहीं किया। उसने न केवल अपने सिंहासन से उठकर टाट ओढ़कर और रख मलकर यहोवा परमेश्वर के सामने अपने पाप स्वीकार किए और पश्चात्ताप किया, बल्कि उसने अपने नगर के सभी लोगों और पशुओं को भी ऐसा करने का आदेश दिया। यहाँ तक कि उसने लोगों को आदेश दिया कि "परमेश्वर की दोहाई चिल्ला चिल्लाकर दो।" कार्यों की इस शृंखला के जरिये नीनवे के राजा ने सच में वह किया, जो एक शासक को करना चाहिए। उसके द्वारा किए गए कार्यों की शृंखला ऐसी है, जिसे करना मानव-इतिहास में किसी भी राजा के लिए कठिन था, और निस्संदेह, कोई अन्य राजा ये कार्य नहीं कर पाया। ये कार्य मानव-इतिहास में अभूतपूर्व कहे जा सकते हैं, और ये मानवजाति द्वारा स्मरण और अनुकरण दोनों के योग्य हैं। मनुष्य की उत्पत्ति के समय से ही, प्रत्येक राजा ने परमेश्वर का प्रतिरोध और विरोध करने में अपनी प्रजा की अगुआई की है। किसी ने भी कभी अपनी दुष्टता से छुटकारा पाने, यहोवा परमेश्वर से क्षमा पाने और आने वाले दंड से बचने के लिए परमेश्वर से विनती करने हेतु अपनी प्रजा की अगुआई नहीं की। किंतु नीनवे का राजा परमेश्वर की ओर मुड़ने, कुमार्ग त्यागने और अपने हाथों के उपद्रव का त्याग करने में अपनी प्रजा की अगुआई कर पाया। इतना ही नहीं, वह अपने सिंहासन को भी छोड़ पाया, और बदले में, यहोवा परमेश्वर का मन बदल गया और उसे अफ़सोस हुआ, उसने अपना कोप त्याग दिया, नगर के लोगों को जीवित रहने दिया और उन्हें सर्वनाश से बचा लिया। राजा के कार्यों को मानव-इतिहास में केवल एक दुर्लभ चमत्कार ही कहा जा सकता है, यहाँ तक कि उन्हें भ्रष्ट मनुष्यों का आदर्श भी कहा जा सकता है, जो परमेश्वर के सामने अपने पाप स्वीकार करते हैं और पश्चात्ताप करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

नीनवे के लोगों ने अपने हृदय के सच्चे पश्चात्ताप से परमेश्वर की दया प्राप्त की और अपना परिणाम बदल लिया

क्या परमेश्वर के हृदय के बदलाव और उसके कोप में कोई विरोध था? बिलकुल नहीं! ऐसा इसलिए है, क्योंकि उस समय-विशेष पर परमेश्वर की सहनशीलता का अपना कारण था। वह कारण क्या हो सकता है? वह कारण बाइबल में दिया गया है : "प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कुमार्ग से फिर गया," और "अपने हाथों के उपद्रवी कार्यों को तज दिया।"

यह "कुमार्ग" मुटठीभर बुरे कार्यों को संदर्भित नहीं करता, बल्कि उस बुरे स्रोत को संदर्भित करता है, जिससे लोगों का व्यवहार उत्पन्न होता है। "अपने कुमार्ग से फिर जाने" का अर्थ है कि ऐसे लोग ये कार्य दोबारा कभी नहीं करेंगे। दूसरे शब्दों में, वे दोबारा कभी इस बुरे तरीके से व्यवहार नहीं करेंगे; उनके कार्यों का तरीका, स्रोत, उद्देश्य, इरादा और सिद्धांत सब बदल चुके हैं; वे अपने मन को आनंदित और प्रसन्न करने के लिए दोबारा कभी उन तरीकों और सिद्धांतों का उपयोग नहीं करेंगे। "हाथों के उपद्रव को त्याग देना" में "त्याग देना" का अर्थ है छोड़ देना या दूर करना, अतीत से पूरी तरह से नाता तोड़ लेना और कभी वापस न मुड़ना। जब नीनवे के लोगों ने हिंसा त्याग दी, तो इससे उनका सच्चा पश्चात्ताप सिद्ध हो गया। परमेश्वर लोगों के बाहरी रूप के साथ-साथ उनका हृदय भी देखता है। जब परमेश्वर ने नीनवे के लोगों का हृदय सच्चा पश्चात्ताप देखा जिसमें कोई सवाल नहीं थे, और यह भी देखा कि वे अपने कुमार्गों से फिर गए हैं और उन्होंने हिंसा त्याग दी है, तो उसने अपना मन बदल लिया। कहने का तात्पर्य है कि इन लोगों के आचरण, व्यवहार और कार्य करने के विभिन्न तरीकों ने, और साथ ही उनके हृदय में पापों की सच्ची स्वीकृति और पश्चात्ताप ने परमेश्वर को अपना मन बदलने, अपने इरादे बदलने, अपना निर्णय वापस लेने, और उन्हें दंड न देने या नष्ट न करने के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार, नीनवे के लोगों ने अपने लिए एक अलग परिणाम प्राप्त किया। उन्होंने अपने जीवन को छुड़ाया और साथ ही परमेश्वर की दया और सहनशीलता प्राप्त कर ली, और इस मुकाम पर परमेश्वर ने भी अपना कोप वापस ले लिया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर की करुणा और सहनशीलता दुर्लभ नहीं है—बल्कि मनुष्य का सच्चा पश्चात्ताप दुर्लभ है

परमेश्वर नीनवे के लोगों से चाहे जितना भी क्रोधित रहा हो, लेकिन जैसे ही उन्होंने उपवास की घोषणा की और टाट ओढ़कर राख पर बैठ गए, वैसे ही उसका हृदय नरम होने लगा, और उसने अपना मन बदलना शुरू कर दिया। जब उसने घोषणा की कि वह उनके नगर को नष्ट कर देगा—उनके द्वारा अपने पाप स्वीकार करने और पश्चात्ताप करने से पहले के क्षण तक भी—परमेश्वर उनसे क्रोधित था। लेकिन जब वो लोग लगातार पश्चात्ताप के कार्य करते रहे, तो नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर का कोप धीरे-धीरे उनके प्रति दया और सहनशीलता में बदल गया। एक ही घटना में परमेश्वर के स्वभाव के इन दो पहलुओं के एक-साथ प्रकाशन में कोई विरोध नहीं है। तो विरोध के न होने को कैसे समझना और जानना चाहिए? नीनवे के लोगों द्वारा पश्चात्ताप करने पर परमेश्वर ने एक के बाद एक ये दो एकदम विपरीत सार व्यक्त और प्रकाशित किए, जिससे लोगों को परमेश्वर के सार की वास्तविकता और अनुल्लंघनीयता देखी। परमेश्वर ने लोगों को निम्नलिखित बातें बताने के लिए अपने रवैये का उपयोग किया : ऐसा नहीं है कि परमेश्वर लोगों को बरदाश्त नहीं करता, या वह उन पर दया नहीं दिखाना चाहता; बल्कि वे कभी परमेश्वर के सामने सच्चा पश्चात्ताप नहीं करते, और उनका सच में अपने कुमार्ग को छोड़ना और हिंसा त्यागना बहुत मुश्किल है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर मनुष्य से क्रोधित होता है, तो वह आशा करता है कि मनुष्य सच में पश्चात्ताप करेगा, दरअसल वह मनुष्य का सच्चा पश्चात्ताप देखना चाहता है, और उस दशा में वह मनुष्य पर उदारता से अपनी दया और सहनशीलता बरसाता रहेगा। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य का बुरा आचरण परमेश्वर के कोप को जन्म देता है, जबकि परमेश्वर की दया और सहनशीलता उन लोगों पर बरसती है, जो परमेश्वर की बात सुनते हैं और उसके सम्मुख वास्तव में पश्चात्ताप करते हैं, जो कुमार्ग छोड़कर हिंसा त्याग देते हैं। नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर के व्यवहार में उसका रवैया बहुत साफ तौर पर प्रकट हुआ था : परमेश्वर की दया और सहनशीलता प्राप्त करना बिलकुल भी कठिन नहीं है; और वह इंसान से सच्चा पश्चात्ताप चाहता है। यदि लोग कुमार्ग छोड़कर हैं हिंसा त्याग देते हैं, तो परमेश्वर उनके प्रति अपना हृदय और रवैया बदल लेता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

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