139. झूठे अगुवाओं और झूठे कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार के सिद्धांत

(1) झूठे नेता और हीन मानवता वाले झूठे कार्यकर्ताओं को जो बुराई करने में सक्षम हैं और जो सत्य को बिल्कुल ही स्वीकार नहीं करते हैं, प्रतिस्थापित कर देना चाहिए, (या) उन्हें पदच्युत कर देना चाहिए, और हटा देना चाहिए;

(2) झूठे नेता और झूठे कार्यकर्ताओं को जो अपनी निम्न योग्यता के कारण व्यावहारिक कार्य नहीं कर सकते हैं, उन्हें प्रतिस्थापित कर कोई अन्य कर्तव्य सौंपे जाने चाहिए;

(3) झूठे नेता और झूठे कार्यकर्ताओं को जिनके पास अपेक्षाकृत अच्छी मानवता है, लेकिन जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, जिनके पास पवित्र आत्मा का काम नहीं हैं, और जो व्यावहारिक कार्य नहीं कर सकते हैं, प्रतिस्थापित कर कोई अन्य कर्तव्य सौंपे जाने चाहिए;

(4) झूठे नेता और झूठे कार्यकर्ताओं को जिनके पास योग्यता तो है और जो थोड़ा व्यावहारिक काम करने की क्षमता भी रखते हैं, फिर भी जिनके पास अनुभव की कमी है और जो व्यावहारिक समस्याओं को हल नहीं कर सकते हैं, फिर भी उपयोग के लिए विकसित किया जा सकता है।

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

झूठे अगुआ और कार्यकर्ता वास्तव में ऐसे लोग हैं जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होता है और जो व्यावहारिक काम करने में असमर्थ हैं। अगर अगुआओं और कार्यकर्ताओं के पास लंबे समय तक पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होता है, तो इससे पता चलता है कि वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं हैं। यह एक संपूर्ण तथ्य है। परमेश्वर के चुने हुए लोग यह जानते हैं कि जो सत्य की खोज किए बिना ही परमेश्वर में विश्वास करने लगते हैं, वे वास्तव में ऐसे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर कभी स्वीकार नहीं करेगा, इसलिए उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होता है। ऐसे लोग सत्य को समझने और वास्तविकता में प्रवेश करने में असमर्थ होते हैं और इन्हें बचाया नहीं जा सकता। यह एक गंभीर समस्या है। ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, परमेश्वर उन्हें कभी स्वीकार नहीं करेगा और उनका इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं करेगा; इसलिए उन्हें झूठे अगुआ और कार्यकर्ता कहा जाता है। ये झूठे अगुआ और कार्यकर्ता जो सत्य की खोज नहीं करते, उन सभी को विभिन्न परिस्थितियों, पदों, रुतबों और हितों के माध्यम से प्रकाशित किया जाता है। जैसी कि कहावत है "जिस प्रकार दूरी से एक घोड़े की शक्ति की परीक्षा होती है, उसी प्रकार समय एक इंसान के दिल में छिपे सत्य को बाहर लाता है।" जिन लोगों के पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है वे कभी भी परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए सिंचन और पोषण का काम नहीं कर पाते, ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोग सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकें। वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों की किसी भी व्यावहारिक समस्या को हल करने के लिए सत्य पर सहभागिता करने का काम नहीं कर पाते। वे कार्य व्यवस्थाओं के अनुसार आवश्यक कार्य को कभी भी पूरा नहीं कर पाते हैं। कई सालों के बाद, परमेश्वर के चुने हुए लोग इन लोगों को आसानी से समझ और पहचान सकेंगे। जब परमेश्वर के चुने हुए लोग इन झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं की पहचान कर लेते हैं, जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, तब उन लोगों को हटाया जाना या उन्हें दूसरे काम सौंपा जाना उचित और तर्कसंगत होने के साथ-साथ समय की माँग भी होती है। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों के साथ-साथ अगुआओं और कार्यकर्ताओं के लिए भी अच्छा है, नहीं तो वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान पहुँचाते रहेंगे। इसलिए, सभी झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं को बदला जाना पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है।

झूठे अगुआ और कार्यकर्ता वे लोग हैं जो उस व्यावहारिक काम को करने में असमर्थ हैं जिसे कलीसिया के विभिन्न स्तरों पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा किया जाना चाहिए, क्योंकि उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होता है। हालाँकि, उन सभी झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के बीच, जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होता है, कुछ ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता भी होते हैं जिनके बुरे कर्मों की मात्रा और इंसानियत की गुणवत्ता दूसरों से अलग होती है, उनके साथ एक जैसा बर्ताव नहीं करना चाहिए। सभी झूठे अगुआ और कार्यकर्ता मुख्य रूप से इन तीन श्रेणियों के अंतर्गत आते हैं। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उनके बीच अंतर करना आना चाहिए। पहली श्रेणी में वे लोग आते हैं जिनके पास अपेक्षाकृत अच्छी इंसानियत होती है। ऐसे लोगों ने कम बुरे काम किये हैं और जनता को अधिक नाराज़ नहीं किया है। वे सत्य को इसलिए नहीं समझ पाते क्योंकि उन्हें परमेश्वर में विश्वास करते हुए ज़्यादा समय नहीं हुआ है या उनके पास सत्य को समझने वालों के सहयोग और आपूर्ति की कमी होती है। वे कुछ मामलों में उलझकर और उनके काबू में आकर, परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग पर चलने या सामान्य तरीके से सत्य की खोज करने में असमर्थ रहे हैं। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को इस श्रेणी में आने वाले अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ प्यार से बर्ताव करना चाहिए, उनकी अधिक सहायता करनी चाहिए और उन्हें अधिक सहारा देना चाहिए, ताकि सत्य की खोज करके उद्धार प्राप्त करने की उनकी उम्मीदें बनी रहे। दूसरी श्रेणी में ऐसे लोग आते हैं जिनकी प्रकृति धूर्त, बेईमान, स्वार्थी और नीच है; ये कमज़ोर इंसानियत वाले लोग होते हैं। ऐसे लोग ज़्यादा पाप करते और बुरा प्रभाव डालते हैं, ये ख़ासकर रुतबा पाने की लालसा रखते हैं और रुतबे के पीछे भागते हैं; वे ज़रा सा रुतबा हासिल करते ही कामयाबी, खान-पान और आमोद-प्रमोद में लिप्त होकर पथभ्रष्ट हो जाते हैं। वे हमेशा अपने कर्तव्य में गड़बड़ करते हैं और कभी कोई व्यावहारिक काम नहीं करते। वे अपने पद पर बने रहकर दूसरों को भाषण देना पसंद करते हैं। ऐसे लोगों के दिलों में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं होती है और ना ही उन्हें अपनी जिम्मेदारियों की कोई समझ होती है। वे बड़े लाल अजगर के उन अधिकारियों जैसे हैं जो ऊँचे पद पर बने रहकर दूसरों को खुद से नीचा समझते हैं। वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को लगातार आदेश देते और दबाते रहते हैं, वे कोई प्रतिरोध सहन नहीं करते। उनके मन में कोई स्नेह नहीं होता। वे कभी भी दूसरों के साथ सहानुभूति नहीं रखते, उनकी सहायता नहीं करते और ना ही भाई-बहनों को अपने आप अपनी व्यावहारिक कठिनाइयों को हल करने देते हैं। कलीसिया में, ऐसे लोगों को पुलिसवालों के समान माना जाता है; वे दूसरों के काम में हस्तक्षेप करने वाले और टांग अड़ाने वाले लोग हैं। चाहे वे किसी भी तरह का काम करें, उनसे भाई-बहनों को कोई शिक्षा नहीं मिलती; सत्य का पोषण तो उन्हें और भी नहीं मिलता है। इस तरह, ये ऐसे झूठे अगुआ और कार्यकर्ता हैं जिनसे परमेश्वर सबसे ज़्यादा नफ़रत करता है। उन्हें उनके कर्तव्य से हटा कर अलग कर देना चाहिए ताकि वे खुद पर विचार कर सकें। अगर वे इसका विरोध करते हुए परेशानियाँ खड़ी करते हैं, तो उन्हें निष्कासित कर दिया जाएगा। तीसरी श्रेणी में वे विशेष रूप से अभिमानी और असंवेदनशील लोग आते हैं जो तर्कहीन बनकर किसी की भी बात मानने से इनकार कर देते हैं। वे वाकई दुष्ट लोग हैं। ये लोग हर तरह की बुराई करते हैं, जनता में भारी आक्रोश पैदा करते हैं और उनके दिलों में परमेश्वर का कोई भय नहीं होता है। उनके पास ज़रा सी काबिलियत, कुछ खासियत और थोड़ा सा अनुभव होने के कारण, वे खुद को असाधारण समझने लगते हैं। वे किसी की बात नहीं मानते; परमेश्वर की भी नहीं। छोटा सा पद हासिल करके वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर अधिकार ज़माना चाहते हैं, ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे कि वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के मालिक हों, वे उन्हें अपनी निजी संपत्ति मानने लगते हैं। वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को अपने काबू में रखने के लिए बेवजह परमेश्वर से होड़ करने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों के दिलों में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं होती और वे परमेश्वर की आराधना नहीं करते। वे विपत्ति और पीड़ा में परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करते और ना ही वे कभी परमेश्वर के सामने अपने मन की बात कहते हैं। रुतबा हासिल करते ही वे खुद को सबसे ऊपर रखकर अधिकार जमाना शुरू कर देते हैं। वे ‘ऊपर’ की कार्य व्यवस्थाओं को अपना कर्तव्य समझकर नहीं निभाते हैं और ना ही परमेश्वर के कार्य का रत्ती भर भी पालन करते हैं। ये ऐसे दुष्ट लोग हैं जो मसीह विरोधियों की श्रेणी में आते हैं। वे आदेश देने को और कुछ सामान्य मामलों के आयोजन और प्रबंधन को इतना बड़ा समझने लगते हैं जैसे कि उन्होंने कोई ऐसा महान काम कर लिया हो जिसकी वजह से उनके साथ श्रेष्ठतर बर्ताव किया जाना चाहिए और उन्हें बड़ी दावत दी जानी चाहिए। वास्तव में, उन्होंने परमेश्वर की सेवा में कोई भी ज़रूरी काम नहीं किया है और ना ही कोई ऐसा व्यावहारिक काम किया है जिससे वास्तव में परमेश्वर के चुने हुए लोगों को पोषण मिला हो, ताकि वे जीवन में प्रवेश हासिल कर सकें। उन्होंने ना कभी परमेश्वर के चुने हुए लोगों की सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने के मार्ग में आने वाली कोई समस्या हल की है और ना ही कभी सत्य का एक भी पहलू समझने में परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुआई की है। उन्होंने बस आस-पास के लोगों पर अधिकार जमाने के लिए थोड़ा-बहुत प्रशासनिक काम किया है, जिसके बाद वे घमंड और श्रेष्ठता में इतने अँधे हो जाते हैं जैसे कि उन्होंने बहुत बड़ी योग्यता प्राप्त कर ली हो। आखिर उनके पास रुतबे के आशीष का आनंद लेने के लिए क्या योग्यता है? वे वाकई बेशर्म हैं! इन जैसे दुष्ट लोग ‘ऊपर’ की कार्य व्यवस्थाओं को कभी भी गंभीरता से नहीं लेते। अगर कार्य व्यवस्थाएं उनकी प्रतिष्ठा और रुतबे के अनुकूल नहीं हैं या उन पर ख़तरा मँडराता दिखेगा, तो वे उन कार्य व्यवस्थाओं को रोक देंगे, उनके मूल्य और महत्व की आलोचना करेंगे और उन्हें नीचा दिखाएंगे, और यहाँ तक कि यह भी दावा करेंगे कि वे परमेश्वर के नहीं बल्कि मनुष्य के आदेश हैं; फिर वे इसी को आधार बनाकर लोगों को भड़काएंगे ताकि लोग उन कार्य व्यवस्थाओं को छोड़ दें। क्या यह परमेश्वर विरोधी व्यवहार नहीं है? क्या यह उनकी प्रतिष्ठा और रुतबे को बनाए रखने के लिए बयानबाजी नहीं है? क्या यह उनकी मसीह विरोधी प्रकृति का खुलासा नहीं करता? ऐसे लोग परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को ठुकराते हैं। वे काँट-छाँट और निपटारे को भी स्वीकार नहीं करते; वे खुद को बाघ के कूल्हे की तरह अछूत मानते हैं। वे परमेश्वर के कार्य को अनुभव करने का दावा कैसे कर सकते हैं! ये दुष्ट लोग जिस मार्ग पर चल रहे हैं वह मसीह विरोधियों का मार्ग है। ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता जो कार्य व्यवस्थाओं का सही ढंग से पालन नहीं कर सकते और उन्हें सख्ती से लागू नहीं कर सकते, उनके इरादों को गलत माना जा सकता है। उनमें से कोई भी परमेश्वर के कार्य के प्रति आज्ञाकारी नहीं है। इसलिए, ऐसे झूठे अगुआओं या कार्यकर्ताओं को बदल दिया जाना चाहिए या अलग कर देना चाहिए जो कार्य व्यवस्थाओं पर उँगली उठाते हैं, उनकी अवज्ञा करते हैं या उन्हें रोकते हैं, ताकि वे आत्मचिंतन कर सकें। अगर इन दुष्टों के पास सत्ता बनी रही, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर आने वाली आपदाएँ और परिणाम अकल्पनीय होंगे। ऐसे झूठे अगुआओं या कार्यकर्ताओं को बिना किसी पछतावे के निष्कासित कर देना चाहिए क्योंकि ये सभी झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं में सबसे ज़्यादा शातिर हैं।

उपरोक्त तीन श्रेणी के अंतर्गत आने वाले झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं को अच्छी तरह से पहचान कर उनके साथ अलग तरह का बर्ताव करना चाहिए। पहली श्रेणी के लोगों में कुछ हद तक इंसानियत बची होती है। वे उन भाई-बहनों में से हैं जिनके साथ हमें प्यार से पेश आना चाहिए। उन्हें विभिन्न प्रकार के कर्तव्य निभाने के लिए दिए जा सकते हैं, मगर उन्हें मुख्य कर्तव्य नहीं सौंपने चाहिए; वे केवल सहायक के रूप में काम करने या अन्य कर्तव्य निभाने के लिए उपयुक्त हैं। दूसरी श्रेणी के लोगों की इंसानियत बुरी होती है, इसलिए उन्हें बदल दिया जाना चाहिए और अलग कर देना चाहिए, ताकि वे खुद पर विचार कर सकें। उन्हें पश्चाताप के एक अवसर के रूप में, सुसमाचार फैलाकर अपने कर्तव्य निभाने की अनुमति दी जा सकती है। तीसरी श्रेणी में ऐसे दुष्ट लोग आते हैं जो मसीह विरोधी हैं, विशेष रूप से अभिमानी हैं और अपने मन की करते हैं, और जो हमेशा परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर काबू करना चाहते हैं। हालाँकि वे एक स्वतंत्र राज्य बनाने में शामिल नहीं रहे हैं, मगर ऐसा सिर्फ़ अवसर ना मिल पाने के कारण है। उनके प्रकृति सार के आधार पर कहा जाए तो वह समय दूर नहीं जब वे अपने स्वतंत्र राज्य का निर्माण करना शुरू कर देंगे। इसलिए, इस तरह के शातिर, अभिमानी और बेहद अवज्ञाकारी लोगों को उनके कर्तव्य से हटाना और अलग कर देना चाहिए, ताकि वे खुद पर विचार कर सकें। अगर वे अपना कर्तव्य निभाना चाहते हैं तो उन्हें केवल सुसमाचार के प्रचार का काम सौंपा जा सकता है। उन्होंने व्यावहारिक काम करने के बजाय, बहुत से बुरे काम किये हैं और दूसरों को बहुत अधिक नुकसान पहुँचाया है; इसलिए, उन्हें अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए सुसमाचार का प्रचार करके लोगों का दिल जीतना होगा। सुसमाचार फैलाना उनके लिए सबसे उपयुक्त कर्तव्य है। अगर वे कोई भी कर्तव्य नहीं निभाते हैं, तो कलीसिया उन्हें निष्कासित कर सकती है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

कुछ झूठे अगुआ और कार्यकर्ता बुरी इंसानियत के नहीं होते। बात सिर्फ़ इतनी है कि उनके भ्रष्ट स्वभाव के कारण, और क्योंकि वे सत्य को नहीं समझते, इसलिए जब भी किसी समस्या से उनका सामना होता है तो वे अपने काम को सही समझकर दूसरों का अनुसरण करते हुए वही करते हैं जो दूसरे लोग करते हैं—आखिर में उन्हें सच का एहसास तभी होता है जब ‘ऊपर’ द्वारा उन्हें उजागर किया जाता है, उनकी काँट-छाँट करके निपटारा किया जाता है। सिर्फ़ तभी उन्हें यह एहसास होता है कि उनका व्यवहार गलत और सत्य सिद्धांतों के विपरीत है। अगर ये लोग सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं और परमेश्वर के वचनों के आधार पर आत्मचिंतन करते हैं, अगर वे यह जानने में सक्षम होते हैं कि वे कलीसिया अगुआओं और कार्यकर्ताओं की ज़िम्मेदारियाँ निभाने के बजाय वास्तव में शैतान की शक्तियों से मजबूर होकर लापरवाही से और बुरे काम कर रहे हैं, और वे परमेश्वर के वचनों में अभ्यास करके खुद को बदलने का मार्ग ढूंढ सकते हैं, अगर वे परमेश्वर के वचन सत्य को समझने में सक्षम होते हैं और सच्चा पश्चाताप कर पाते हैं तो इसे उनकी प्रगति माना जाएगा। परमेश्वर के घर को इन झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए? उन्हें परमेश्वर के घर में रहने की इजाज़त सिर्फ़ तभी दी जा सकती है अगर वे वास्तव में सत्य की खोज करते हैं। अगर वे पोषण पाने के योग्य हैं तो उनका पोषण जारी रह सकता है। लेकिन अगर उनकी काबिलियत बहुत कम है, अगर वे अब भी खुद को नहीं पहचानते, उन्होंने अब तक कुछ भी प्राप्त नहीं किया और ना ही कोई पश्चाताप किया है, तो उन्हें निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। इस तरह के लोगों के साथ ऐसा व्यवहार करना बिल्कुल सही और तर्कपूर्ण है। परमेश्वर की इच्छा और उसके कार्य का सिद्धांत है ज़्यादा से ज़्यादा मनुष्यों की रक्षा करना। परमेश्वर के घर के कार्य सही और वास्तविकता से जुड़े होने चाहिए, जो पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर के वचनों के अनुरूप है। आज, कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अगुआओं और कार्यकर्ताओं की समस्याओं को छोड़ने के बजाय उनका हल ढूंढने की कोशिश करेंगे। एक बार उन्हें उजागर करने के बाद, वे बार-बार उन्हें उजागर करने की कोशिश करते रहेंगे। क्या इसे लोगों को उकसाने की कोशिश और उन पर सख्ती दिखाना नहीं कहा जाएगा? अगर तुमने उनकी समस्या को उजागर किया और वे अपनी ग़लती का एहसास करके पश्चाताप कर लेते हैं, तो तुम इस मुद्दे को छोड़ क्यों नहीं सकते? क्या यह ऐसा व्यक्ति है जो सिद्धांतों के आधार पर सभी काम करता है? क्या अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ इस तरह पेश आना सही है? कार्य व्यवस्थाओं में सभी स्तरों के अगुआओं और कार्यकर्ताओं, ख़ासकर झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत दिये गए हैं, इसलिए उनके साथ कार्य व्यवस्थाओं के अनुसार व्यवहार करना चाहिए: जो लोग सत्य की खोज करते और सच्चा पश्चाताप कर सकते हैं उनका इस्तेमाल किया जा सकता है; जो लोग खुद को पहचानते हैं और पश्चाताप करते हैं, मगर अपनी कमज़ोर काबिलियत के कारण वास्तविक कार्य कर पाने में असमर्थ होते हैं, उन्हें दूसरे काम सौंपे जाने चाहिए; जो लोग बुरे हैं, जिनके पास कमज़ोर इंसानियत है और जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, उन्हें बिना कुछ सोचे-समझे बदला या निष्कासित किया जा सकता है। ये बहुत आसान है। कुछ झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं ने परमेश्वर के घर को दी गयी भेंटों की चोरी की है और उनका गलत इस्तेमाल किया है। ये लोग जो हर तरह की दुष्टता करते हैं और मसीह विरोधियों से संबंध रखते हैं, उनकी पूरी जाँच-पड़ताल होनी चाहिए। उन्होंने परमेश्वर की जितनी भी भेंटों की चोरी की है, परमेश्वर के घर के जितने भी पैसों का ग़बन किया है उनके बारे में पता लगाना चाहिए और इन खातों को एक-एक करके निपटाया जाना चाहिए। इसके अलावा, अगर वे कई सालों से अगुआ और कार्यकर्ता रहे हैं, तो एक-एक करके यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उन्होंने ऐसे कितने लोगों को सिद्धांतों के विपरीत निष्कासित किया है, निष्कासित किये गए लोगों को वापस लाया गया है या नहीं, उन्होंने कितने लोगों को उद्धार प्राप्त करने से रोका है और भाई-बहनों के जीवन को कितना नुकसान पहुँचाया है। परमेश्वर के कार्य का आरंभ है तो उसका अंत भी है; परमेश्वर ने अपना कार्य आरंभ किया है तो वह उसका अंत भी करेगा, और जब वह समय आएगा तब जो लोग हर प्रकार की दुष्टता करते हैं वे रोएंगे और अपने दांत पीसेंगे, उनमें से एक भी बचकर निकाल पाने में कामयाब नहीं हो पाएगा!

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

झूठे अगुआओं, झूठे कार्यकर्ताओं और मसीह विरोधियों को पहचान कर उनके साथ निबटना मुख्य रूप से इन चार सिद्धांतों पर आधारित है।

पहला, जिनके बारे में ज़्यादातर लोग यह मानते हैं कि उनके पास अपेक्षाकृत अच्छी इंसानियत है, उन्होंने कम बुरे काम किये हैं, जो अब भी कुछ वास्तविक काम करने और सच्चा पश्चाताप करने में सक्षम हैं, वे अपने पद पर बने रहकर काम करना जारी रख सकते हैं।

दूसरा, जिनके बारे में ज़्यादातर लोग यह मानते हैं कि उनके पास अपेक्षाकृत अच्छी इंसानियत है और उन्होंने कम बुरे काम किये हैं, लेकिन वे वास्तविक काम नहीं कर पाते क्योंकि उन्होंने सिर्फ़ कुछ ही समय तक परमेश्वर में विश्वास किया है और वे सत्य को नहीं समझ पाते: अगर उनकी काबिलियत अच्छी है और उनके पास पोषण पाने की योग्यता है, तो उन्हें पहले कार्यकर्ता का काम सौंपकर उनका पोषण किया जा सकता है, लेकिन इस दौरान उन्हें अगुआ नहीं बनाया जा सकता; अगर उनमें कम काबिलियत है और उनके पास पोषण पाने की योग्यता नहीं है, तो फिर उन्हें बदल दिया जाना चाहिए और उनके लिए अन्य कर्तव्यों की व्यवस्था की जानी चाहिए।

तीसरा, जिनके पास अच्छी इंसानियत नहीं है, जो ज़्यादा बुरे काम करते हैं, जो अपने उचित कर्तव्यों पर ध्यान नहीं देते, लापरवाही करते हैं और कभी भी सत्य का अभ्यास या सत्य से प्रेम नहीं करते, बल्कि केवल रुतबे, प्रसिद्धि और फ़ायदे के पीछे भागते हैं, जिनके पास सत्य वास्तविकता नहीं होती है—ऐसे लोग चाहे पश्चाताप करना चाहते हों या नहीं, उन्हें हर हाल में बदल देना चाहिए और दूसरों से अलग कर देना चाहिए, ताकि वे आत्मचिंतन कर सकें; इन लोगों को केवल सुसमाचार के प्रचार का कर्तव्य सौंपा जाना चाहिए।

चौथा, ऐसे मसीह विरोधी प्रकार के लोग जो शातिर, घमंडी और विवेकहीन हैं, जिनके पास कोई सत्य वास्तविकता नहीं है, जो केवल परमेश्वर के चुने हुए लोगों को काबू में करना चाहते हैं, जो अपनी ग़लतियों को मानने से इनकार करते हैं, अड़ियल बनकर काँट-छाँट और निपटारे का आख़िरी दम तक विरोध करते हैं, उन्हें हर हाल में बदल देना चाहिए और दूसरों से अलग कर देना चाहिए, ताकि वे खुद पर विचार कर सकें, चाहे वे पश्चाताप करना चाहें या नहीं; उन्हें केवल सुसमाचार के प्रचार का ही कर्तव्य सौंपा जा सकता है। अगर वे समर्पण करने और अपने कर्तव्यों को निभाने से इनकार करते हैं, तो फ़िर इससे और भी स्पष्ट हो जाता है कि वे मसीह विरोधी ही हैं। मसीह विरोधी माने जाने वाले राक्षसों को हर हाल में निष्कासित किया जाना चाहिए।

झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, ये उनके चार सिद्धांत हैं। कलीसिया के सभी स्तरों के अगुआओं को इन चार सिद्धांतों के अनुसार ही झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार करना चाहिए। इस तरह से अभ्यास करना बिलकुल भी गलत नहीं होगा। अगर कलीसिया के ज़्यादातर सदस्यों के विचारों के आधार पर यह निर्धारित किया जा सकता है कि ऐसे लोगों में इंसानियत है या नहीं और उन्होंने कितने बुरे कर्म किये हैं, तो फ़िर उन लोगों को अलग-अलग श्रेणियों में अलग करना आसान हो जाएगा और यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि वे अच्छे हैं या बुरे। ख़ास तौर से, अगर किसी व्यक्ति के अच्छे होने की पुष्टि होती है तो उसे एक मौक़ा देकर प्यार से उसकी सहायता करनी चाहिए। अगर किसी व्यक्ति की पुष्टि बुरी इंसानियत वाले व्यक्ति या दुष्ट व्यक्ति के तौर पर की जाती है, तो उसे बदल देना चाहिए या हटा देना चाहिए। यह झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ निपटने का मूल सिद्धांत है। परमेश्वर के घर को बुरी इंसानियत वाले और दुष्ट लोगों को कलीसिया के किसी भी स्तर पर अगुआ या कार्यकर्ता बनने का मौका नहीं देना चाहिए। जो कोई भी बुरी इंसानियत वाले या दुष्ट लोगों को बढ़ावा देता या उनका इस्तेमाल करता है उनके साथ भी दुष्ट लोगों जैसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए। झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ निपटने के लिए परमेश्वर के घर का सिद्धांत है अच्छे लोगों को बढ़ावा देना और दुष्टों पर प्रतिबंध लगाना। केवल अच्छे लोगों को ही बचाया जा सकता है, उनके ही बचाये जाने और पूर्ण किये जाने की उम्मीद बची है। बुरी इंसानियत वाला व्यक्ति, जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करता है, उसे अभी भी बचाया जा सकता है, मगर एक दुष्ट व्यक्ति वह है जिसका उद्धार मुमकिन नहीं है। तुम्हें इन शब्दों को मजबूती से अपने दिल में बिठा लेना चाहिए। अगर तुम इन सिद्धांतों के अनुसार लोगों के साथ व्यवहार करते हो, तो तुम कभी कोई ग़लती नहीं करोगे।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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