69. कलीसिया को ए और बी समूहों में बाँटने के सिद्धान्‍त

(1) ऐसे कोई भी व्‍यक्ति जो सत्‍य को ज़रा भी स्‍वीकार नहीं करते, जो अपने कर्तव्‍य का पालन नहीं करना चाहते, और जो कलीसिया के जीवन को अस्‍तव्‍यस्‍त कर सकते हैं, उन्‍हें बी-समूह के समागम में निर्वासित कर दिया जाना चाहिए;

(2) ऐसे धोखेबाज़ लोग जो गपशप में आनन्‍द लेते हैं, जो अकर्मण्‍य ढंग से बैठे-बैठे चुग़लख़ोरी करते हुए लोगों के बीच फूट डालते रहते हैं, और कलह के बीज बोते रहते हैं, वे बहुत बुरे लोग हैं, और उन्‍हें बी-समूह के समागम में निर्वासित कर दिया जाना चाहिए;

(3) जो लोग ऐसी गम्‍भीर या ख़ास तरह की समस्‍याओं से ग्रस्‍त हैं, जो कुछ समय के लिए अस्‍पष्‍ट बनी रहती हैं और जिनके सार के बारे में कोई निश्‍चय नहीं किया जा सकता, उन्‍हें बी-समूह के समागम में रखना चाहिए;

(4) मसीह-विरोधियों, बुरे लोगों, और अविश्‍वासियों को हटा देना या निष्‍कासित कर देना चाहिए, वहीं समूह बी में निर्वासित कर दिये गये लोगों को पश्‍चाताप का अवसर दिया जाना चाहिए, और उन्‍हें वहाँ से मुक्‍त भी किया जा सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

कलीसिया में कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें ग्रुप बी में रखा गया है। यह उन्हें पश्चाताप करने का अवसर देने के लिए है। यदि वे कुछ आत्म-चिंतन में लगकर स्वयं को जान पाएँ, यदि वे सत्य तक पहुँच रहे हैं और पश्चाताप करना चाहते हैं, अगर वे अब उस तरह के बेकार इंसान नहीं हैं जैसे वे पहले थे, कलीसिया के कामों में रुकावट और बाधा पैदा नहीं कर रहे हैं और स्वयं को थोड़ा संयमित कर सकते हैं; यदि वे जैसा कहा जाता है, वैसा कर सकते हैं और समर्पण कर सकते हैं, अच्छा व्यवहार कर सकते हैं, जो कुछ भी थोड़ा-बहुत कर सकते हैं, करते हैं और इन सिद्धांतों को बनाए रख सकते हैं, तो फिर उन्हें ग्रुप बी में नहीं रखा जाएगा और उन्हें अपने कर्तव्य पूरे करने के लिए वापस ग्रुप ए में भर्ती किया जा सकता है। उनमें से अधिकांश को ग्रुप बी में स्थानांतरित क्यों किया गया था? (रुकावट और बाधा पैदा करने के कारण।) तो फिर उनके रुकावट और बाधाएँ पैदा करने की वजह क्या है? क्या वे जानबूझकर रुकावट और बाधा पैदा करते हैं? नहीं–शुरुआती तौर पर तो यह होता है कि वे लोग सत्य का थोड़ा-सा भी अभ्यास नहीं करते, न ही वे सत्य का अनुसरण करते हैं। उनकी मानवता बेहद घृणित होती है और अपने कर्तव्यों के निर्वहन की प्रक्रिया में, वे अक्सर परमेश्वर के घर के कार्य में रुकावट और बाधा उत्पन्न करते हैं और उसे नष्ट करते हैं, जिसके परिणाम घातक होते हैं; उन्हें ग्रुप बी में भेजने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। यही कारण है। यद्यपि वे कर्तव्य का अर्थ नहीं जानते, लेकिन कम से कम वे इतना तो जानते ही हैं कि व्यक्ति को अपना कर्तव्य पूरे करने चाहिए-और वे ऐसा करने के इच्छुक होते हैं। लेकिन, क्या कर्तव्य को पूरा करने की किसी की इच्छा का अर्थ है कि वह सत्य का अभ्यास कर रहा है? तुम्हारी इच्छा सत्य-वास्तविकता नहीं है; सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि तुम सत्य का अभ्यास करने की हार्दिक इच्छा रखते हो। इससे पहले कि तुम सत्य को व्यवहार में लाओ, तुम कह सकते हो कि तुम कितने आश्वस्त हो, कि तुम तैयार हो और इच्छुक हो या कि तुम अपने जीवन का बलिदान कर सकते हो और बिना किसी हिचकिचाहट के आग का दरिया पार कर सकते हो-लेकिन ये सब सिर्फ नारे हैं और बकवास है। तुम्हें अपनी इच्छा को अपना आधार बनाकर सत्य-सिद्धांत के अनुसार कार्य करना चाहिए। तुम कह सकते हो, "मुझे सत्य बहुत पसंद नहीं है और अपने कर्तव्य के निर्वहन के दौरान मेरे स्वभाव में वास्तव में कोई नहीं बदलाव नहीं आया है। मैंने सत्य का अनुसरण भी नहीं किया है। लेकिन मैंने एक चीज पकड़कर रखी है : तुम मुझे जो कुछ भी करने को कहोगे, मैं करूँगा; मैं रुकावट या बाधा नहीं डालूँगा। मैं समर्पण नहीं कर सकता, लेकिन जैसा मुझे जैसा कहा जाएगा, मैं वैसा करूँगा।" इसलिए तुम ग्रुप ए में रह सकते हो, रह सकते हो न? जबकि, ग्रुप बी के लोग इन न्यूनतम आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पाते और वे बाधाओं पैदा करते हैं। ऐसे लोगों को ग्रुप ए में नहीं रहना चाहिए। कोई भी समझदार और विवेकपूर्ण इंसान ऐसे व्यक्ति के साथ उसे त्यागने के दृष्टिकोण से ही पेश आएगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'कर्तव्‍य का समुचित निर्वहन क्‍या है?' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

प्रत्येक कलीसिया में विभिन्न प्रकार के लोग होते हैं : ऐसे लोग होते हैं जो प्रेम करते हैं और सत्य को स्वीकार कर सकते हैं, ऐसे भी लोग होते हैं जो सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, जो इसका विरोध करते हैं; ऐसे लोग होते हैं जो ख़ुशी-ख़ुशी अपना कर्तव्य निभाते हैं, और कुछ ऐसे जो अपना कर्तव्य बिल्कुल नहीं निभाते; ऐसे लोग होते हैं जिनकी परमेश्वर के वचनों की समझ शुद्ध होती है और उनकी क्षमता अच्छी होती है, और ऐसे भी लोग होते हैं जिनकी परमेश्वर के वचनों की समझ हास्यास्पद होती है, और उनमें कोई क्षमता नहीं होती; अच्छी मानवता वाले लोग भी होते हैं जो अपेक्षाकृत गुणी और सभ्य हैं, और तुच्छ मानवता के लोग होते हैं जो कुटिल और धोखेबाज हैं और अपने उचित काम में ध्यान नहीं देते; यहाँ ऐसे लोग हैं जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं और धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, और ऐसे लोग भी हैं जो आशीर्वाद पाने का इरादा रखते हैं, जो सिर्फ ऊपरी दिलचस्पी दिखाने के लिए कलीसिया में घुस आते हैं; यहाँ ऐसे लोग हैं जो सही मायने में सत्य की खोज करते हैं और परमेश्वर के कार्य का पालन करते हैं, और ऐसे लोग होते हैं जो सत्य से नफ़रत और घृणा करते हैं, जो हर मोड़ पर परमेश्वर के खिलाफ खड़े रहते हैं। ऐसी वास्तविक परिस्थितियाँ हर कलीसिया में आम है। अगर ये विभिन्न प्रकार के लोग सभा का आयोजन करें और साथ मिलकर कलीसिया के जीवन की अगुआई करें, तो बहुत संभव है कि कलीसियाई जीवन में अव्यवस्था फैल जाये; इससे कुछ भी अच्छा प्राप्त नहीं हो सकता। यह सुनिश्चित करने के लिए वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करने और सत्य से प्रेम करने वाले सभी लोग, एक सामान्य कलीसियाई जीवन का आनंद ले सकें, और सामान्य रूप से परमेश्वर के वचनों को खा और पी सकें, परमेश्वर के वचनों पर विचार कर सकें, परमेश्वर के वचनों के बारे में संगति कर सकें और सत्य को समझ सकें और वास्तविकता में प्रवेश कर सकें, परमेश्वर के घर ने फैसला किया है कि सभा को दो समूहों, समूह क और ख में विभाजित किया जाना चाहिए। इससे कलीसियाई जीवन का सामान्य रूप से जारी रहना और ठोस परिणाम मिलना सुनिश्चित होगा, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों का जल्द से जल्द परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग पर कदम रखना, बचाया और पूर्ण किए जाना भी सुनिश्चित होगा। स्पष्ट है कि सभा का समूह क और ख में विभाजित किया जाना पूरी तरह से आवश्यक है।

परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों को यह स्पष्ट है कि परमेश्वर का कार्य केवल उन लोगों को बचाता है जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, सत्य से प्रेम करते हैं, और जिनमें मानवता है; यह तथ्य है। इस प्रकार, प्रत्येक कलीसिया में केवल कुछ लोगों को ही बचाया जा सकता है। जिन लोगों में सत्य के प्रति कोई प्रेम नहीं है, और जो अपना कर्तव्य स्वेच्छा से नहीं निभाते हैं, उन्हें बिल्कुल भी बचाया नहीं जाएगा। इस तरह इन दो प्रकार के लोगों को सभा के दौरान एक साथ रखना उपयुक्त नहीं होगा। चूँकि वे अलग-अलग मार्गों पर चलते हैं, और उनकी भाषाएँ अलग हैं, इसलिए उनके बीच टकराव और संघर्ष होना निश्चित है, जो कलीसिया के जीवन को प्रभावित करेगा और इससे किसी को कोई फायदा नहीं होगा; अगर इन दो प्रकार के लोगों को समूह क और ख में विभाजित किया जाये, तो ही इनका एक दूसरे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। ये ऐसे तथ्य हैं, जिन्हें कोई नकार नहीं सकता। समूह क और ख में विभाजन के मुख्य सिद्धांत और मानदंड नीचे बताए गए हैं :

1. वे सभी जो कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन परमेश्वर के वचनों को उचित ढंग से खाना-पीना नहीं जानते, जिन्होंने कभी सत्य का अनुसरण या इसके बारे में संगति नहीं की है, जिनकी सत्य में थोड़ी भी रुचि नहीं है, जो किसी भी तरह सत्य नहीं समझ पाते चाहे इस पर जैसे भी संगति की जाये, जिनके पास समझने कोई शक्ति नहीं है और जो अक्सर रुकावट और गड़बड़ी पैदा करते हैं, जो दुष्टों के साथ मिलकर उपद्रव मचाते हैं—उन्हें समूह ख में रखा जाना चाहिए।

2. वे सभी जो अपना कर्तव्य निभाने के लिए कभी तैयार नहीं हुए हैं, और जब वे कर्तव्य निभाते भी हैं तो आज्ञाकारी नहीं होते, जो सभी तरह के आवारा काम करते हैं, और अक्सर कलीसिया के लिए समस्याएँ खड़ी करते हैं, और योगदान से अधिक नुकसान करते हैं—उन्हें समूह ख में रखा जाना चाहिए।

3. जिनकी मानवता तुच्छ है, जो विशेष रूप से कुटिल, धोखेबाज़, स्वार्थी और अज्ञानी हैं, जो खुलकर किसी के सामने नहीं आते, जो दुष्टों के साथ मेलजोल रखते हैं, जो दूसरों के साथ लड़ना पसंद करते हैं, जो निर्दोष लोगों को धमकाते हैं—ये दुष्ट हैं, ऐसे घोड़े हैं जो पूरे झुंड को खराब करते हैं। इन्हें समूह ख में रखा जाना चाहिए।

4. वे सभी जो विशेष रूप से अभिमानी और दंभी हैं, जिनमें कोई समझ नहीं है और जो किसी की नहीं सुनते, जो सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते, व्यवहार और काट-छाँट की तो बात ही दूर है, जिन पर तर्क का भी असर नहीं पड़ता, जो परमेश्वर के घर के कार्य के संबंध में निरंतर धारणाएँ रखते हैं, जो पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति के प्रति शत्रुता रखते हैं और उस पर अपनी राय देते हैं, और जो मसीह-विरोधियों के ही समान हैं—इन लोगों को बिना देरी किए सीधे निष्कासित कर देना चाहिए। जो लोग आसानी से पहचान में नहीं आते, उन्हें समूह ख में रखा जाना चाहिए; एक बार जब सुनिश्चित हो जाए, तो उन्हें निष्कासित कर दिया जाएगा।

जो लोग उपरोक्त चार अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं, उन सभी को समूह ख में रखा जाना चाहिए। साथ ही, उन झूठे अगुआओं और झूठे कार्यकर्ताओं को भी समूह ख में रखना चाहिए जो सत्य का अनुसरण बिलकुल नहीं करते, और मसीह-विरोधियों के रास्ते पर चलने पर अड़े रहते हैं। जो लोग गिरफ़्तार होने पर यहूदा बन गए या जिन्होंने चढ़ावा चुराया है और पश्चात्ताप नहीं किया, उन्हें भी आधिकारिक निपटारे से पहले परामर्श अवधि के दौरान समूह ख में रखा जाना चाहिए। ये परमेश्वर के घर की स्पष्ट प्रशासनिक आज्ञाएँ और व्यवस्थाएँ हैं, और किसी भी व्यक्ति द्वारा उनका उल्लंघन निषिद्ध है।

जैसे-जैसे राज्य का सुसमाचार फैलता है, कलीसिया में नए लोग निरंतर आते रहते हैं, जिनमें से कुछ का समूह क के लिए अनुपयुक्त होना निश्चित है। इससे पहले कि इन लोगों को उनकी अभिव्यक्तियों के आधार पर एक समूह में रखा जाये, उन्हें अवलोकन-अवधि से गुज़रना चाहिए। जिन लोगों की मानवता तुच्छ है और जो सत्य से बिल्कुल प्रेम नहीं करते, जिनकी परमेश्वर के वचनों की समझ हास्यास्पद है, और जो कलीसिया में व्यवधान और गड़बड़ी पैदा करते हैं, उन्हें समूह ख में रखना चाहिए और पश्चात्ताप करने का मौका देना चाहिए। यह न केवल कलीसिया के कार्य के लिए, बल्कि इसके सदस्यों के लिए भी लाभकारी है। निस्संदेह, समूह ख के अधिकांश लोगों को बचाया नहीं जा सकता है, जिसका मुख्य कारण है कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते, सत्य का अनुसरण नहीं करते, और उन सभी की मानवता तुच्छ है और वे दूसरों के साथ मिलजुलकर चलने में असमर्थ हैं। लेकिन, उनमें से कुछ लोग ऐसे हैं जो भविष्य में जाग सकते हैं और सत्य का अनुसरण करना शुरू कर सकते हैं, और कुछ अच्छे काम तैयार कर सकते हैं; इन लोगों के पास अभी भी उद्धार का मौका है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

सभी झूठे अगुआ और झूठे कार्यकर्ता जो हर तरह के दुष्ट कर्म करते हैं और कलीसिया के कार्य में गंभीर गड़बड़ी पैदा करते हैं—जो भले ही अपने दोषों को स्वीकार करते और पश्चात्ताप करते हुए प्रतीत हों, लेकिन उनके सच्चे पश्चात्ताप की पुष्टि नहीं की जा सकती है—उन्हें समूह ख में रखा जाना चाहिए। जिन झूठे अगुआओं और झूठे कार्यकर्ताओं को उनके असंख्य बुरे कर्मों और कलीसिया के काम में उत्पन्न की गयी गड़बड़ियों के कारण प्रतिस्थापित कर दिया गया है, उन्हें भी समूह ख में रखा जाना चाहिए। बशर्ते कि वे किसी भी तरह का अत्यधिक बुरा व्यवहार नहीं करेंगे, लोगों के क्रोध को तो बिल्कुल भी नहीं भड़कायेंगे, जिन अगुआओं और कार्यकर्ताओं का हटा दिया गया था या जिन्हें पवित्र आत्मा के कार्य से रहित होने के कारण इस्तीफा देना पड़ा था और जो वास्तविक कार्य करने में असमर्थ थे, और जो अपेक्षाकृत अच्छी मानवता के थे, उन्हें सभा के दौरान समूह क में रखा जाना चाहिए; यह उचित और विवेकपूर्ण है। जिनकी मानवता तुच्छ है और अक्सर कलीसिया के जीवन में व्यवधान पैदा करते हैं, जो भ्रांति, नकारात्मकता, धारणा और अफवाह फैलाते हैं, जो परेशानी के कारण पैदा करने में और ऐसी घटनाओं से जुड़ने में कुशल हैं—उन्हें समूह ख में रखा जाना चाहिए। अन्य विशेष मामलों सहित जो लोग पुलिस में सूचित किए जाने के संभावित खतरे में हैं, या निगरानी में हैं, ऐसे लोगों को सुरक्षा कारणों से अकेले, या समान परिस्थितियों के अन्य लोगों के साथ (समूह क में रहते हुए) सभा करनी चाहिए। यह आशा है कि लोग समझेंगे कि यह कलीसिया के लाभ के लिए है। यदि, सभा करने के एक या दो साल बाद, समूह ख में लोग वास्तव में पश्चात्ताप करते हैं, और सत्य-वास्तविकता के बारे में संगति कर पाते हैं, तो उन्हें समूह क में प्रवेश दिया जा सकता है। चुनाव के दौरान, समूह ख के लोग केवल समूह ख के टीम के अगुआ और सुसमाचार-प्रचारक अगुआ के चयन में भाग ले सकते हैं। वे कलीसिया के अगुआ और उपयाजक बनने की वोटिंग में प्रवेश के हकदार नहीं हैं। समूह ख के सदस्यों द्वारा आगे किसी भी तरह की गड़बड़ी या अनुचित व्यवधान पैदा करने पर, उन्हें निष्काषित कर दिया जाएगा। समूह क और समूह ख को एक साथ सभा नहीं करनी चाहिए। यह एक मान्य तथ्य है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को कभी भी शांति नहीं मिलेगी, न ही कलीसिया का जीवन सकारात्मक होगा। असामान्य मुद्दे वाले लोग जो आसानी से पहचाने नहीं जा सकते, उनका समूह आवंटन इस बात पर आधारित होना चाहिए कि क्या वे अच्छी मानवता के हैं और क्या वे सत्य से प्रेम करते हैं। यदि यह स्पष्ट नहीं है कि उनमें दुष्ट आत्माओं का काम है या नहीं या वे राक्षसों के वश में हैं या नहीं, तो उन्हें निष्कासित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि केवल समूह ख में रखा जाना चाहिए जब तक अवलोकन से स्थिति स्पष्ट न हो जाए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

प्रत्येक कलीसिया को समूह क और ख में विभाजित किया जाना चाहिए, और इसे सभी कलीसियाओं द्वारा लागू किया जाना चाहिए। यह विभाजन कार्य व्यवस्था द्वारा शासित सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। यदि समूह ख के लोग वास्तव में पश्चात्ताप करते हैं, बिना किसी शिकायत के सक्रिय रूप से अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम हैं, और परमेश्वर के कार्य का पालन कर सकते हैं, तो उन्हें समूह क में फिर से रखा जा सकता है। यदि समूह क के लोग अक्सर कलीसिया के जीवन में व्यवधान पैदा करते हों और अनुचित रूप से परेशानी खड़ी करते हों, तो उन्हें किसी भी समय समूह ख में डाला जा सकता है—लेकिन यह कलीसिया के आधे से अधिक सदस्यों द्वारा स्वीकृत होना चाहिए। कलीसिया द्वारा स्वीकृत किए जाने से पहले, समूह क और ख में विभाजन का कार्य कलीसिया के अगुआओं और उपयाजकों के बीच की संगति द्वारा निर्धारित किया जाना चाहिए। जब उल्लाखित समस्याएं तुरंत स्पष्ट न हों और समस्या का सार निर्धारित न किया गया हो तो गंभीर या अनोखी समस्याओं वाले सभी लोगों को समूह ख में रखा जाना चाहिए। जिन लोगों को कलीसिया के अगुआओं, उपयाजकों या एक विशेष कर्तव्य निभाने वाले के रूप में चुना गया है, उनकी मानवता अच्छी हो या बुरी, उन्हें समूह क में ही रखा जाना चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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