66. अगुआओं और कार्यकर्ताओं में बदलाव के सिद्धान्‍त

(1) अगर कोई चुना हुआ अगुआ या कार्यकर्ता व्‍यावहारिक कार्य करने में या व्‍यावहारिक समस्‍याओं को सुलझाने में असमर्थ होता है, तो उसका तुरन्‍त बदल देना चाहिए और उसकी जगह किसी अन्‍य को रख लेना चाहिए;

(2) अगर कोई छद्म अगुआ या कार्यकर्ता सत्‍य को स्‍वीकार नहीं करते, उनके पास पवित्र आत्‍मा का कार्य नहीं है, और वे व्‍यावहारिक कार्य नहीं कर सकते, तो किन्‍हीं और को उनकी जगह रखा जाना चाहिए, और उनके लिए कहीं अन्‍यत्र इन्‍तज़ाम किये जाने चाहिए;

(3) अगर कोई अगुआ या कार्यकर्ता उपयुक्‍त ढंग से नियोजित नहीं है (यानी, अगर उसकी योग्‍यता उसके लिए सौंपे गये कार्य के लिहाज़ से बहुत अधिक या बहुत कम है), तो उसे उसके कद और सामर्थ्‍य के मुताबिक़ उपयुक्‍त जगह पर भेज देना चाहिए;

(4) जैसे ही किसी अगुआ या कार्यकर्ता को कार्य सौंप दिया जाता है, उसका निरीक्षण, परीक्षण, पर्यवेक्षण किया जाना चाहिए; अगर उसके और उसके कार्य के बीच ठीक संगति नहीं बैठती, तो उसे वहाँ से हटाकर उपयुक्‍त जगह पर नियुक्‍त कर देना चाहिए।

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

ऐसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं की भूमिकाएं बदल देनी चाहिए, जो व्यावहारिक कार्य कर पाने में असमर्थ हैं। उनकी परिस्थितियों के आधार पर उन्हें अपेक्षाकृत कम जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं या उनके हिसाब से सही कर्तव्य सौंपे जा सकते हैं। उसके बाद, उनकी जगह काम करने के लिए उपयुक्त व्यक्ति को चुना जा सकता है। परमेश्वर का घर लोगों के चयन और नियुक्ति में किसी खास नियम का पालन नहीं करता है। किसी कर्तव्य के लिए चुने जाने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति हमेशा के लिए वही भूमिका निभाएगा। चुने गए लोग वास्तविक काम करने में सक्षम होने चाहिए। अगर वे वास्तविक काम नहीं कर सकते हैं और उस काम के लिए उपयुक्त नहीं हैं, तो उनकी भूमिकाओं में बदलाव किया जाना चाहिए और उनकी जगह दूसरों को वह जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। क्योंकि परमेश्वर के चुने हुए ज्यादातर लोग वास्तव में सत्य को नहीं समझते हैं, इसलिए किसी भी स्तर पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं के विवेक के अनुसार प्रोन्नत किये जाने के बजाय ज़्यादातर लोगों को चुना जाना ही बेहतर और उचित है। अगर हर स्तर पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं को उनके विवेक के अनुसार लोगों को प्रोन्नत करने की अनुमति दी गई, तो काम के लिए उपयुक्त लोगों का अनुपात और भी कम यानी साठ या सत्तर प्रतिशत ही होगा। इसके बजाय, अगर लोकतांत्रिक तरीके से अगुआओं और कार्यकर्ताओं का चयन किया जाता है, तो उनमें से सत्तर या अस्सी प्रतिशत लोग इसके योग्य हो सकते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि चुने गए लोग बिल्कुल सही विकल्प हैं और उन्हें परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप चुना गया है। इसका यह मतलब क्यों नहीं है? पहला, परमेश्वर के चुने हुए ज्यादातर लोगों का आध्यात्मिक कद सीमित है और वे सत्य को समझ नहीं पाये हैं। दूसरा, भाई-बहन सिर्फ़ कलीसिया जीवन में एक दूसरे के संपर्क में आते हैं और वे एक साथ जो समय बिताते हैं वह ज़्यादातर अन्य लोगों के बारे में स्पष्ट राय बनाने के लिए बहुत कम होता है, नतीजतन यह ज़रूरी नहीं है कि चुने गए लोग सौ फीसदी उपयुक्त हों। उनमें से ज़्यादातर लोग योग्य होते हैं, जबकि कुछ लोग योग्य नहीं होते हैं। तीसरा, लोगों के पास रुतबा होने या न होने के हिसाब से, वे अलग-अलग तरह का व्यवहार करते हैं। रुतबा हासिल करने के बाद कुछ लोग, उनका प्रकृति सार, चीज़ों को करने के उनके तरीके, जिस मार्ग पर वे चलते हैं, और जिस तरह वे दूसरों से व्यवहार करते हैं, सभी का ख़ुलासा हो जाता है। जब उनके पास रुतबा नहीं होता है, तब ये चीज़ें अभिव्यक्त नहीं होती हैं और क्योंकि उन्हें ऐसा काम करने की ज़रूरत नहीं होती है, ये विशेषताएं छिपी रहती हैं और वे शांत रहते हैं, वे अपने ऑफिस के अलावा दूसरों के मामलों में दखल नहीं देते हैं। इसलिए, यह ज़रूरी नहीं है कि चुने हुए सभी लोग योग्य होंगे। अगर यह पता चलता है कि वे किसी व्यावहारिक कार्य को करने में असमर्थ हैं, तो उनको उस जिम्मेदारी से निकालकर उनकी जगह दूसरों को रखा जाना चाहिए, किसी दूसरे व्यक्ति को चुना जाना चाहिए।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

ऐसा क्यों है कि परमेश्वर के घर में सभी स्तरों पर अगुआ और कार्यकर्ता अपनी भूमिकाओं में बदलाव करते हैं? इसका उद्देश्य परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों की परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के साथ-साथ उन्हें सामान्य तरीके से अनुभव करने की क्षमता को बचाना और उन्हें उस स्तर तक पहुँचाना है जहाँ वे सत्य को समझ सकें और वास्तविकता में प्रवेश कर सकें। यही वह वास्तविक परिणाम है जो अगुआओं और कार्यकर्ताओं को परमेश्वर की सेवा में हासिल करना चाहिए। अगर उनकी भूमिकाएं ठीक से तय नहीं की जाती हैं या किसी झूठे कार्यकर्ता या झूठे प्रेरित को अगुआ या कार्यकर्ता की भूमिका मिला जाती है, तो क्या इसके परिणाम स्वरूप परमेश्वर के चुने हुए लोगों को पीड़ा नहीं झेलनी होगी? इससे न केवल एक व्यक्ति को नुकसान होगा या वह जाल में फंस जाएगा, न ही अगुआ या कार्यकर्ता के साथ ऐसा होगा, बल्कि सबसे पहले, इससे एक पूरे क्षेत्र में परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान होगा और वे जाल में फंस जाएंगे। अगर किसी कलीसिया अगुआ को सही तरीके से नहीं चुना जाता है, तो यह तीस से चालीस लोगों को नुकसान पहुंचाएगा। अगर किसी जिला अगुआ को सही तरीके से नहीं चुना जाता है, तो यह तीन सौ, पाँच सौ और यहां तक कि सात या आठ सौ लोगों को नुकसान पहुंचाएगा। अगर किसी पादरी के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र के अगुआ को सही तरीके से नहीं चुना जाता है, तो इससे लाखों लोगों के जीवन प्रवेश में देरी हो जाएगी, जिसका परिणाम बेहद गंभीर होगा! अगर अगुआओं और कार्यकर्ताओं की भूमिकाएं ठीक से तय नहीं की गईं, तो बहुत बड़ी संख्या में परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान झेलना होगा और वे बरबाद हो जाएंगे। इसलिए अगुआओं और कार्यकर्ताओं की भूमिकाओं में बदलाव करना बेहद ज़रूरी है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

जहां तक ऐसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं की बात है जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, उनको सबसे पहले बदला जाना चाहिए, ताकि इसकी वजह से परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश में होने वाले नुकसान से बचा जा सके। इसका कारण यह है कि जिन लोगों के पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है वे ऐसे लोग हैं जिनका पहले ही ख़ुलासा किया जा चुका है और परमेश्वर ने उन्हें छाँट कर निकाल दिया है। अगर कोई उन्हें अब भी बनाये रखता है तो इससे परमेश्वर के कार्य में रुकावट आती है। इतना ही नहीं, यह चीज़ों को करने का ऐसा तरीका है जो परमेश्वर को अपमानित करता है। जो अगुआ और कार्यकर्ता पवित्र आत्मा के कार्य से रहित हैं, वे निस्संदेह झूठे अगुआ और झूठे कार्यकर्ता हैं। वे चाहे किसी भी स्तर के अगुआ और कार्यकर्ता हों, अगर किसी के बारे में पता चलता है कि उसके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, तो उसे तुरंत बदल दिया जाना चाहिए और उसे पद में बिल्कुल भी नहीं बनाये रखना चाहिए, भले ही उसमें कितनी भी अच्छी इंसानियत हो। जिन लोगों के पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, उनका ख़ुलासा पहले ही परमेश्वर ने ऐसे लोगों के तौर पर कर दिया है जिन्हें अवश्य बदल दिया जाना चाहिए। जो लोग परमेश्वर के लिए किसी काम के नहीं हैं उनका इस्तेमाल करते रहना क्या परमेश्वर का विरोध करना नहीं है? बेशक, जिन लोगों के पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, उनकी स्थितियों में फ़र्क होता है, लेकिन यह पक्का है कि उनमें से ज़्यादातर लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते और उनमें अच्छी इंसानियत नहीं होती है। कुछ गिने-चुने लोग ऐसे भी होते हैं जिनके पास बहुत कम काबिलियत होती है, काम करने की क्षमता नहीं होती है या जिनका अनुभव सतही होता है और जो सत्य को नहीं समझते हैं। वे हमेशा अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के भरोसे पर काम करते हैं, वे अक्सर परमेश्वर के घर के कार्य में रुकावट डालते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप पवित्र आत्मा उन पर कार्य नहीं करता है। परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है उन सभी लोगों को बदल दिया जाना चाहिए। यह पक्का है और कोई भी इस नियम का उल्लंघन नहीं कर सकता।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

किसी अगुआ को बनाये रखा जाना चाहिए या नहीं, इसका निर्णय लेने में सबसे महत्वपूर्ण बात है यह देखना कि जो कार्य उनको सौंपा गया था उसमें उनका प्रदर्शन कितना अच्छा रहा। अगर उनको सौंपे गये कार्य में उनका प्रदर्शन प्रभावशाली नहीं रहा है, तो उनका व्यवहार चाहे कितना भी अच्छा हो, वे दूसरों पर चाहे कैसा भी सकारात्मक असर डालते हों, इसका कोई महत्व नहीं है। हालांकि, अगर उनको सौंपे गये कार्य में उनका प्रदर्शन उत्कृष्ट है, फिर भी उनमें कुछ व्यवहार संबंधी समस्याएं हैं और उन्होंने अपराध किये हैं, तो यह सिद्धांत की बात नहीं है, और उन्हें अब भी बनाये रखा जाना चाहिये। अगर कोई ऐसा अगुआ है जिसमें परमेश्वर के वचनों की समझ ठीक नहीं है, जो अपनी सहभागिता में सिर्फ़ शब्दों और सिद्धांतों की बात करता है, और जिनके भाई-बहन उनकी अगुआई में एक साल बिताने के बाद भी न तो अपने जीवन प्रवेश में कोई प्रगति कर पाये हैं और न ही परमेश्वर के वचनों के बारे में उनकी समझ विकसित हुई है, क्या आपको लगता है कि ऐसा व्यक्ति सेवा करने के लिए योग्य है? ऐसे अगुआ को बदल दिया जाना चाहिए, चाहे वह कितना भी लोकप्रिय हो और चाहे अनुसरण को लेकर उनका बाहरी उत्साह या स्वरूप कैसा भी हो। बदल दिये जाने के बाद, उन्हें दूसरी भूमिका सौंपी जा सकती है, वे अगुवा की भूमिका निभाने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। इसके बजाय, अगर वे कुछ पेशेवर काम या दूसरे काम करने के लायक हैं, तो उनके लिए ऐसे कर्तव्यों की व्यवस्था की जा सकती है। यही किसी व्यक्ति को परमेश्वर के घर में नियुक्त किये जाने का सिद्धांत है। हर व्यक्ति की अपनी खूबियाँ और खामियां होती हैं। परमेश्वर के घर में, लोगों को उनकी खूबियों के आधार पर और उनके लिए उपयुक्त कर्तव्य सौंपे जाने चाहिये। इससे वे अपनी व्यक्तिगत भूमिकाओं को बेहतर ढंग से विकसित कर पाते हैं।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

किसी भी व्यक्ति को बदलना या उनकी भूमिकाओं में बदलाव किया जाना इसी सिद्धांत पर आधारित होना चाहिये। यह इस आधार पर तय किया जाना चाहिए कि वह व्यक्ति सत्य का अनुसरण कर रहा है या नहीं, उसकी इंसानियत का चरित्र कैसा है और उसने अपने कर्तव्य को प्रभावशाली ढंग से पूरा किया है या नहीं। अगर कोई व्यक्ति छह महीने या एक साल से अपना कर्तव्य निभा रहा है, तो उसकी काबिलियत और चरित्र का ख़ुलासा ज़रूर हो गया होगा। अगर उनकी इंसानियत कमज़ोर है, वे सत्य को पसंद नहीं करते हैं और इसके करीब आने में नाकाम रहते हैं, तो उनकी काबिलियत अच्छी नहीं है और वे अपने कर्तव्य को अच्छे से निभाने में विफल रहे हैं, तो ऐसे व्यक्ति की प्रकृति स्पष्ट हो गयी है, और ऐसे व्यक्ति को बदल दिया जाना चाहिए या उनकी भूमिका में बदलाव किया जाना चाहिए। खर-पतवार को हटाने का समय कब होता है? जब गेंहूं परिपक्व हो जाता है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर के चुने हुए लोग विचार करके यह पहचान पाते हैं कि कौन से लोग सत्य का अनुसरण कर रहे हैं, कौन से लोग सत्य का अनुसरण नहीं कर रहे हैं, कौन से लोग वफ़ादारी के साथ अपने कर्तव्य निभा रहे हैं, कौन से लोग अपने कर्तव्यों में लगातार लापरवाह, असावधान और ढीले बने हुए हैं, कौन से लोग अपने कर्तव्यों के लिए उपयुक्त हैं और कौन से लोग उपयुक्त नहीं हैं। ये सभी चीज़ें आसानी से पहचानी जा सकती हैं। इसलिए, यही वह समय है जब ऐसे लोगों को हटा दिया जाना सबसे उचित है जो कार्य के लिए उपयुक्त नहीं हैं या फिर उनके लिए अन्य व्यवस्थाएं की जानी चाहिए। इतना ही नहीं, कार्यकर्ताओं को बदलने और उनकी भूमिकाओं में बदलाव करने के लिए दूसरा सिद्धांत भी है: इसके लिए उनकी काबिलियत को देखना और यह जानना ज़रूरी है वे इस काम को पूरा कर सकते हैं या नहीं। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि किसी खास काम को पूरा करने के लिए अच्छी काबिलियत और इंसानियत वाले व्यक्ति की ज़रूरत हो। अगर कोई व्यक्ति किसी खास काबिलियत तक पहुंच चुका है, भले ही उसका स्वभाव भ्रष्ट हो, अगर कांट-छांट और निपटारा किये जाने के बाद वह पश्चाताप कर सकता है, तो वह बिना किसी समस्या के वह कर्तव्य पूरा कर सकता है। अगर उनके पास अच्छी आबिलियत नहीं है, तो दूसरों के लिए ऐसे की मदद करने का कोई मतलब नहीं है और ऐसे व्यक्ति की भूमिका बदल दी जानी चाहिए। अगर कोई व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है और उसके पास इंसानियत है, लेकिन वह पेशवर कार्य करने में निपुण नहीं है, तो भले ही वह सही व्यक्ति हो, मगर उसके द्वारा उस कार्य को पूरा किया जाना उचित नहीं है और उसकी भूमिका में बदलाव किया जाना ज़रूरी है। इसलिए, भूमिकाओं में बदलाव इस आधार पर किया जाना चाहिए कि कौन सा व्यक्ति किस कार्य को पूरा करने के लिए सबसे उपयुक्त है, जिसका मतलब है ऐसा कार्य जिसमें वह पक्के तौर पर प्रभावशाली साबित होगा—उसे ऐसे ही कर्तव्य पूरे करने चाहिए। कुछ लोग, जिनमें अच्छी इंसानियत नहीं होती और जो अपने कार्य के प्रति गंभीर नहीं होते और जो अपने कर्तव्यों के निर्वहन में लगातार लापरवाह, असावधान और ढीले बने रहते हैं, उन्हें बदल दिया जाना चाहिए और हटा दिया जाना चाहिए। आने वाले समय में, कर्तव्य के निर्वहन से उनको कोई मतलब नहीं होगा। कुछ लोग कहते हैं, "क्या उनमें से कुछ लोग ऐसे नहीं हैं जिनकी हम मदद करने और नज़र रखने की कोशिश कर सकते हैं?" हो सकता है कि दूसरों की मदद और पर्यवेक्षण से ऐसा व्यक्ति ज़्यादा असरदार साबित हो। हालांकि, यह उस कर्तव्य की परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाना चाहिए जिसका निर्वहन वह व्यक्ति कर रहा है। अगर ऐसे व्यक्ति ने सिर्फ़ छह महीने ही अपने कर्तव्य का निर्वहन किया है या वह अब भी सत्य की ओर बढ़ रहा है, कांट-छांट और निपटान के माध्यम से वह अपने कर्तव्य के निर्वहन में नाकाम रहने का कारण पता लगा सकता है, और इतना ही नहीं, अगर उसने सचमुच पश्चाताप करके अभ्यास का मार्ग ढूंढ लिया है, तो उसे ज़्यादा मदद की पेशकश करना स्वीकार्य है। कुछ समय में, वे अपने कर्तव्यों के निर्वहन में असरदार साबित हो सकते हैं। अगर वे अपने कर्तव्यों के निर्वहन में लगातार ढीले और असावधान बने रहते हैं, और बार-बार फटकार लगाये जाने के बाद भी अपनी गलतियों को सुधारने से इनकार कर देते हैं, चाहे कोई भी सहभागिता करे उसकी बात पर ध्यान नहीं देते हैं और अपनी जिद पर अड़े रहते हैं, वे सत्य को कभी स्वीकार नहीं करते या उसका अभ्यास नहीं करते और बस इधर-उधर की बातें करते रहते है, तो अब ऐसे व्यक्ति की मदद करने या उस पर नज़र रखने की कोई ज़रूरत नहीं है। यही लोगों को बदलने और उनकी भूमिकाओं में बदलाव करने के सिद्धांत हैं।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

अगुआओं और कार्यकर्ताओं के हर स्तर पर, बदले और हटाये जाने वालों में मुख्यतः इस तरह के लोग शामिल होते हैं: जिन्होंने बुरी भावना के साथ काम किया; जिनमें अच्छी इंसानियत नहीं है; धोखेबाज़ लोग; बेतुके लोग; ऐसे लोग जो सिर्फ़ शब्दों और सिद्धांतों पर ध्यान देते हैं लेकिन आध्यात्मिक बातों को नहीं समझते; जो विचार करने में असमर्थ हैं; जो व्यावहारिक कार्य करने में असमर्थ हैं; जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को सिंचन और पोषण देने में असमर्थ हैं; जिनके कार्य परमेश्वर के चुने हुए लोगों को आश्वस्त नहीं कर सकते हैं या उनके द्वारा स्वीकार नहीं किये जाते हैं; जिनके पास हमेशा परमेश्वर और पवित्र आत्मा के द्वारा इस्तेमाल किये जा रहे लोगों के संबंध में धारणाएं होती हैं। इन सभी लोगों को पूरी तरह से हटा दिया जाना चाहिए। उन्हें किसी भी स्तर पर फिर कभी अगुआओं के रूप में कार्य नहीं करने देना चाहिए। परमेश्वर का घर जिन लोगों को प्रोन्नत करता है और जिनका इस्तेमाल करता है उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य अवश्य होना चाहिए और उन्हें अपने कर्तव्य में अच्छे परिणाम दिखाने चाहिए, वे ऐसे लोग होने चाहिए जो चीज़ों को ठीक से पूरा करा सकें। जिन लोगों को परमेश्वर के चुने हुए लोगों ने स्वीकार नहीं किया है, जो व्यावहारिक कार्य नहीं कर सकते या जिनके कार्य में दक्षता का अभाव है, वे सभी ऐसे परजीवी हैं जिन्होंने पद तो पा लिया है लेकिन व्यावहारिक कार्य कर पाने में असमर्थ हैं और जिन्हें रुतबे का लालच है। ऐसे सभी लोगों को, ऐसे हर एक व्यक्ति को हटा दिया जाना चाहिए। यह नीति पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। यही नीति परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग में प्रवेश करने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण है।

ऐसा क्यों है कि परमेश्वर के घर को ऐसे सभी लोगों को बदल देना चाहिए जिनके पास परमेश्वर और पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किये जा रहे व्यक्ति के बारे में हमेशा धारणाएं होती हैं, जो असल में आज्ञाकारी नहीं होते हैं? इसके बारे में हमारी एक समझ होनी चाहिए। जिन लोगों ने पाँच वर्षों से भी ज़्यादा समय तक परमेश्वर में विशवास किया है, मगर फिर भी परमेश्वर और पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किये जा रहे व्यक्ति के बारे में धारणाएं हैं, वे यकीनन ऐसे लोग नहीं हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं। अगर ऐसे लोग किसी भी स्तर पर अगुआ बन जाते हैं, तो वे निश्चित रूप से मसीह-विरोधी, चाकर और शैतान के अपराध में भागीदार बन जाएंगे। इसलिए, ऐसे लोगों को, ऐसे हर एक व्यक्ति को हटा दिया जाना चाहिए। परमेश्वर का घर मसीह और पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किये जा रहे व्यक्ति के शत्रुओं को परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुआई करने की अनुमति बिल्कुल भी नहीं देगा। अगर कोई ऐसे लोगों को अगुआ के तौर पर इस्तेमाल करता है जिससे मसीह और पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा व्यक्ति नफ़रत करता है, तो वह भी परमेश्वर का शत्रु और परमेश्वर द्वारा चुने गए लोगों का शत्रु है। परमेश्वर के घर द्वारा इस्तेमाल किये गए लोगों का मन और परमेश्वर का मन एक समान होना चाहिए, वे ऐसे लोग होने चाहिए जो परमेश्वर के घर के कार्य के साथ अच्छी तरह समन्वय बनाकर चल सकें। वे ऐसे लोग होने चाहिए जो मसीह के प्रति वफ़ादार हैं और जो मसीह की आज्ञा का पालन करते हैं। अन्यथा, वे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किये गए लोग होने के लायक नहीं हैं। जो लोग परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, जो परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हैं, जो मसीह के लिए गवाही नहीं देते हैं बल्कि इसके बजाय अपने लिए गवाही देते हैं, जो सत्ता और रुतबे की चाह रखते हैं, वे सभी ऐसे तलछट (मेल) हैं जिनके पास न तो विवेक है और न ही समझ, वे सभी मसीह-विरोधी हैं। वे परमेश्वर की सेवा करने के लिए उपयुक्त नहीं हैं और उन्हें हटा दिया जाना चाहिए। इसलिए, परमेश्वर के घर की यह अपेक्षा रहती है कि सभी स्तरों के अगुआ ऐसे लोग हों जो परमेश्वर के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं, उन्हें सत्य का अनुसरण करना चाहिए और तहे दिल से परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम होना चाहिए। उन्हें परमेश्वर के घर के कार्य के साथ अच्छी तरह समन्वय बनाकर चलना चाहिए। अगर वे इन अपेक्षाओं को पूरा नहीं करते हैं, तो उनका इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं किया जा सकता। जो लोग कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं और परमेश्वर की सेवा करते हैं, लेकिन उनका मन और परमेश्वर का मन एक समान नहीं है, इसके बजाय वे बस अपने ही मामलों को प्रबंधित करने में लगे रहते हैं, अपने रुतबे और सत्ता को बनाये रखने के लिए काम करते हैं, क्या ऐसे लोग मसीह-विरोधी नहीं हैं? वे सभी लोग जो मसीह का उत्कर्ष नहीं करते हैं और उसके लिए गवाही नहीं देते हैं, इसके बजाय खुद के लिए गवाही देते हैं और दिखावा करते हैं, वे सभी मसीह के शत्रु हैं। जो लोग सभाओं में सहभागिता करते समय खुद के भ्रष्ट सार को जानने के बारे में चर्चा नहीं करते या यह नहीं बताते कि उन्होंने परमेश्वर के वचनों का अनुभव और वास्तविकता में प्रवेश कैसे किया, वे सभी परमेश्वर के चुने हुए लोगों को धोखा देते हैं और उनके शत्रु हैं। जिन लोगों ने मसीह को जानने और मसीह के प्रति समर्पित होने में परमेश्वर के चुने हुए लोगों की मदद किये बिना कई वर्षों तक कार्य का निर्वहन किया है, जो परमेश्वर के वचन, सत्य, में प्रवेश करने में परमेश्वर के चुने हुए लोगों की मदद करने में असमर्थ रहे, वे सभी ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर की सेवा करते हैं मगर उसका विरोध भी करते हैं। ऐसे सभी लोगों से परमेश्वsर नफ़रत और घृणा करता है। ये सभी लोग ऐसे परजीवी हैं जो जोंक की तरह परमेश्वर के घर का खून चूसते हैं। उनमें रुतबा पाने का लालच होता है, फिर भी वे व्यावहारिक कार्य नहीं करते। वे सभी ऐसे दुष्ट सेवक हैं जिनमें कोई विवेक या समझ नहीं है, वे स्वार्थी, नीच, निर्लज्ज और बेशर्म लोग हैं।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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