66. अगुआओं और कार्यकर्ताओं में बदलाव के सिद्धांत

(1) अगर कोई चुना हुआ अगुआ या कार्यकर्ता व्‍यावहारिक कार्य करने में या व्‍यावहारिक समस्‍याओं को सुलझाने में असमर्थ रहता है, तो उसे तुरंत बदल देना चाहिए और उसकी जगह किसी अन्‍य को रख लेना चाहिए।

(2) अगर कोई झूठे अगुआ या कार्यकर्ता सत्‍य को स्‍वीकार नहीं करते, उनके पास पवित्र आत्‍मा का कार्य नहीं है, और वे व्‍यावहारिक कार्य नहीं कर सकते, तो दूसरों को उनकी जगह रखा जाना चाहिए, और उनके लिए कहीं अन्‍यत्र इंतजाम किए जाने चाहिए।

(3) किसी अगुआ या कार्यकर्ता की अनुपयुक्त नियुक्ति को—वे लोग जिनकी योग्‍यता उन्हें सौंपे गए कार्य के लिहाज से बहुत अधिक या बहुत कम है—उपयुक्त ढंग से और उनके कद और सामर्थ्‍य के मुताबिक़ बदल दिया जाना चाहिए।

(4) जब किसी अगुआ या कार्यकर्ता को उसका कार्य सौंप दिया जाता है, तो उसके कार्य का निरीक्षण, परीक्षण, पर्यवेक्षण किया जाना चाहिए; अगर उसके और उसके कार्य के बीच ठीक मेल नहीं बैठता है तो उसे वहाँ से हटाकर उपयुक्‍त जगह पर नियुक्‍त कर देना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

जो लोग कलीसिया की अगुवाई कर सकते हैं, लोगों को जीवन प्रदान कर सकते हैं, और लोगों के लिए एक प्रेरित हो सकते हैं, उनके पास वास्तविक अनुभव होने ही चाहिए; उन्हें आध्यात्मिक चीज़ों की सही समझ, सत्य की सही समझ और अनुभव होना चाहिए। ऐसे ही लोग कलीसिया की अगुवाई करने वाले कर्मी या प्रेरित होने के योग्य हैं। अन्यथा, वे न्यूनतम रूप में केवल अनुसरण ही कर सकते हैं, अगुवाई नहीं कर सकते, वे लोगों को जीवन प्रदान करने में समर्थ प्रेरित तो बिलकुल भी नहीं हो सकते। क्योंकि प्रेरित का कार्य भाग-दौड़ करना या लड़ना नही है; बल्कि जीवन की सेवकाई का कार्य करना और लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए उनकी अगुवाई करना है। इस कार्य को करने वालों को बड़ा दायित्व दिया जाता है जिसे हर कोई नहीं कर सकता है। इस प्रकार के कार्य का बीड़ा केवल ऐसे लोगों द्वारा ही उठाया जा सकता है जिन्हें जीवन की समझ है, अर्थात जिन्हें सत्य का अनुभव है। इसे बस यों ही ऐसा कोई व्यक्ति नहीं कर सकता है जो त्याग कर सकता हो, भाग-दौड़ कर सकता हो या जो खुद को खपाने की इच्छा रखता हो; जिन्हें सत्य का कोई अनुभव नहीं है, जिनकी काट-छाँट या जिनका न्याय नहीं किया गया है, वे इस प्रकार का कार्य करने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग जिनके पास कोई अनुभव नहीं है, लोग जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है, वे वास्तविकता को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते, क्योंकि उनके पास ऐसा अस्तित्व नहीं होता। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति न केवल अगुवाई का कार्य नहीं कर पाता, बल्कि यदि उसमें लम्बी अवधि तक कोई सत्य न हो, तो वह निष्कासन की वस्तु बन जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

मेरी पीठ पीछे बहुत-से लोग हैसियत के लाभों की अभिलाषा करते हैं, वे ठूँस-ठूँसकर खाना खाते हैं, सोना पसंद करते हैं तथा देह की इच्छाओं पर पूरा ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह से बाहर कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना उपयुक्त कार्य नहीं करते, पर मुफ़्त में कलीसिया से खाते हैं, या फिर मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों की भर्त्सना करते हैं, और अधिकार के पदों से दूसरों के ऊपर आधिपत्य जताते हैं। ये लोग निरंतर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा पूरी कर रहे हैं और हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारे इरादे सही हैं, पर तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्ख हो; किंतु यदि तुम्हारे इरादे सही नहीं हैं, और फिर भी तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ़्तखोरी करते हैं, हमेशा देह के आराम का लोभ करते हैं, और परमेश्वर की इच्छाओं का कोई विचार नहीं करते; वे हमेशा उसकी खोज करते हैं जो उनके लिए अच्छा है, और परमेश्वर की इच्छा पर कोई ध्यान नहीं देते। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें परमेश्वर के आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते। वे अपने भाई-बहनों के साथ हमेशा छल करते हैं और उन्हें धोखा देते रहते हैं, और दो-मुँहे होकर वे, अंगूर के बाग़ में घुसी लोमड़ी के समान, हमेशा अंगूर चुराते हैं और अंगूर के बाग़ को रौंदते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने लायक़ हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते, क्या तुम परमेश्वर का आदेश लेने के लायक़ हो? तुम जैसे व्यक्ति पर कौन भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें कोई बड़ा काम सौंपने की जुर्रत कर सकता है? क्या इससे कार्य में विलंब नहीं होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से उद्धृत

नकली अगुआ कम क्षमता वाला अगुआ होता है, जो किसी समस्या की सूचना देते समय केवल बकवास करता और भ्रम की स्थिति पैदा करता है। वो इस पर ऐसा विचार रखता है : "देखो, मैंने तुम्हें पर्याप्त जानकारी दी है, मैंने बीते और आने वाले वर्षों के बारे में बार-बार बात की है, और लगभग हर संभव चीज के बारे में कहा है, तो क्या तुम समझ पाए हो कि मैं क्या कहने की कोशिश कर रहा हूँ?" चाहे तुम ऐसे लोगों का कैसे भी मार्गदर्शन करो, चाहे उनसे कुछ भी पूछो, चाहे कैसे भी उनकी जाँच करो, वे कभी नहीं जान पाते कि क्या कहना है, कभी भी मामले की तह तक नहीं पहुँच पाते। उनके पास शब्दों की कमी नहीं होती, वे असंस्कृत नहीं होते, लेकिन निम्न क्षमता के होते हैं, बुद्धिहीन होते हैं, उनमें अभिव्यक्ति की शक्ति की कमी होती है, उनके दिल में भ्रम होता है, और वे स्पष्टता के साथ कुछ भी समझाने में असमर्थ होते हैं। उनके पास कुछ दायित्व होते हैं और वे समय के साथ कुछ मामलों के बारे में कुछ समझ हासिल कर लेते हैं, लेकिन वे यह नहीं जानते कि उसे कैसे व्यक्त किया जाए, और मामले के सार तक पहुँचने में विफल रहते हैं, चीजों को व्यापक बनाना और उनका सारांश निकालना तो दूर की बात है। क्या अगुआई की इतनी खराब क्षमता वाला व्यक्ति वास्तव में थोड़ा-भी काम कर सकता है? क्या ऐसे लोग एक अगुआ या कार्यकर्ता के दायित्व पूरे कर सकते हैं? नहीं, वे नहीं कर सकते। उन्हें कुछ समय दो, उन्हें किसी समस्या की सूचना देने का अवसर दो, उन्हें इसे समझाने दो, लेकिन वे फिर भी काम नहीं कर पाएंगे। क्या तुम ऐसे व्यक्ति से संवाद कर सकते हो? क्या तुम उनका उपयोग कर सकते हो? (नहीं।) तुम उनका उपयोग क्यों नहीं कर सकते? वे ठीक से बोल भी नहीं सकते, तो काम क्या कर सकते हैं? उनमें कुछ खूबियाँ हो सकती हैं, वे ईमानदार हो सकते हैं, उनमें एक निश्चित मात्रा में वफादारी, जिम्मेदारी की भावना और अच्छे इरादे हो सकते हैं, लेकिन उनकी समग्र क्षमता औसत रूप से खराब नहीं, बल्कि बहुत कम होती है, और उन्हें सिखाया नहीं जा सकता। जब तुम उन्हें सिखाने की कोशिश करते हो, तो तुम तुरंत चिड़चिड़े और क्रोधित हो जाते हो, और जब तुम उन्हें बोलते हुए सुनते हो, तो तुम चिंता करते हो और व्याकुल और भ्रमित हो जाते हो, और तुम समझ नहीं पाते कि वे क्या कह रहे हैं या क्या कहना चाहते हैं, और तुम उनके साथ संवाद करने में असमर्थ रहते हो। उनमें भाव, विचार और दृष्टिकोण व्यक्त करने के लिए भाषा की न्यूनतम अंतर्निहित निपुणता भी नहीं होती, तो वे काम कैसे कर सकते हैं? लेकिन वे फिर भी सोचते हैं कि उनमें कुछ क्षमता है, कुछ कौशल हैं, वे काम करने में सक्षम हैं, वे महसूस करते हैं कि वे सही हैं, वफादार और आध्यात्मिक हैं, खुद को खपाना चाहते हैं, कीमत चुकाना चाहते हैं, और अपना कर्तव्य निभाने में कठिनाई सहन करना चाहते हैं। क्या ये सभी गुण प्रदर्शित करते हैं कि उनमें अगुआ या कार्यकर्ता होने के लिए आवश्यक चीज है? यद्यपि परमेश्वर के घर में सत्य राज करता है, और वहाँ परमेश्वर के वचन का बोलबाला है, फिर भी बहुत-से विशिष्ट कार्यों से निपटने और उनका समन्वय करने के लिए लोगों की आवश्यकता होती है; काम को आगे बढ़ाने और उन्हें हल करने के लिए लोगों की आवश्यकता होती है। ये मामले किसी के केवल "मैं तैयार हूँ" या "मैं सहमत हूँ" कह देने भर से हल नहीं किए जा सकते; वे केवल अच्छे इरादों या कठिनाई सहने की इच्छा से हल नहीं होते। लोग शून्य में नहीं रहते, इसलिए वे अपना काम या कर्तव्य भी शून्य में नहीं करते। अगर कोई व्यक्ति अगुआ या कार्यकर्ता बन जाता है, लेकिन उसकी क्षमता इतनी कम है कि वह बोलकर भी खुद को व्यक्त नहीं कर सकता, तो क्या वह वास्तव में सक्षम हो पाएगा? (नहीं हो पाएगा।) अक्षम होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि अच्छे समय में काम में आने वाली कठिनाइयों और समस्याओं की पहचान न कर पाना, और निश्चित रूप से इसका यह भी मतलब है कि काम के दौरान जो भी समस्या आती है, वे उसे तुरंत हल नहीं कर पाएँगे। अगर वे इसे तुरंत हल नहीं कर सकते, तो क्या वे तुरंत इसकी सूचना दे सकते हैं और तुरंत मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं? जहाँ तक कम क्षमता वाले लोगों का संबंध है, यह कार्य केवल उनकी कठिनाइयाँ बढ़ाता है, और पूरी तरह से उनकी क्षमताओं से परे है, जंगलियों को शिष्टाचार सिखाने की तरह इसमें भी बहुत अधिक श्रम करना पड़ता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (8)' से उद्धृत

अगुआओं और कार्यकर्ताओं के दायित्वों का एक हिस्सा यह जानना है कि महत्वपूर्ण कार्य के लिए जिम्मेदार विभिन्न कार्य-निरीक्षकों और कर्मचारियों के साथ क्या हो रहा है। तो ये कर्मचारी कौन हैं? सबसे आधारभूत कर्मचारी हैं कलीसिया के अगुआ, और उनके बाद समूह-निरीक्षक और दलों के अगुआ। कुछ कर्मचारी विशिष्ट कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं, और कुछ अन्य चीजों के लिए। महत्वपूर्ण कार्य के लिए जिम्मेदार विभिन्न कार्य-निरीक्षक और कर्मचारी : क्या परमेश्वर के घर के कार्य पर उनका प्रभाव गंभीर और बहुत महत्वपूर्ण होता है? (हाँ।) तो, क्या इसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के दायित्वों में शामिल करना उचित है? (हाँ।) विभिन्न कार्यों के प्रभारी मुख्य निरीक्षकों की स्थिति की सटीक समझ प्राप्त करना और उपयुक्त समायोजन करना प्रत्येक कार्य के कार्यक्रम पर पहरा देने जैसा है। यह अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य पूरा करने के बराबर है। लेकिन अगर इन कर्मियों को सही ढंग से व्यवस्थित नहीं किया जाता और कोई समस्या उत्पन्न होती है, तो कलीसिया का कार्य बहुत प्रभावित होगा। अगर ये कर्मचारी अच्छी मानवता वाले और भरोसेमंद हों, और इससे भी अच्छा हो अगर वे सत्य का अनुसरण करने में सक्षम हों और एक आधार रखते हों, तो उन्हें प्रभारी बनाकर, यह कार्य सौंपना चीजों को बहुत आसान बना देगा। महत्वपूर्ण यह है कि इससे कार्य सुचारु रूप से आगे बढ़ सकता है और अत्यधिक प्रभावी और कुशल हो सकता है। लेकिन अगर निरीक्षक भरोसेमंद न हों, और खराब चरित्र और तुच्छ मानवता वाले हों—और इतना ही नहीं, सत्य का अनुसरण न करते हों, और उनके द्वारा गड़बड़ी किए जाने की संभावना हो—तो केवल उन्हीं को नुकसान नहीं होगा। चूँकि वे प्रभारी हैं, इसलिए उनके कार्यक्षेत्र के भीतर के कर्मचारी और वह कार्य भी ज्यादा या कम मात्रा में प्रभावित होगा। अगर वे अपने दायित्वों के प्रति केवल अगंभीर या लापरवाह हैं, तो इससे कार्य में विलंब हो सकता है; प्रगति की रफ्तार कुछ धीमी होगी, और कार्य कुछ कम कुशल होगा। लेकिन अगर वे मसीह-विरोधी हैं, तो समस्या गंभीर है : यह कार्य के थोड़े अकुशल और अप्रभावी होने की समस्या नहीं है—वे समग्र रूप से कार्य को क्षतिग्रस्त, अस्तव्यस्त और पंगु कर देंगे। और इसलिए, यह कार्य कोई ऐसा दायित्व नहीं है, जिससे अगुआ और कार्यकर्ता कतरा सकते हैं—यह बहुत गंभीर और महत्वपूर्ण कार्य है। अगर अगुआ और कार्यकर्ता विभिन्न निरीक्षकों और प्रमुख कर्मचारियों की मानवता, और सत्य के प्रति उनके दृष्टिकोण के साथ-साथ हर चरण में उनकी अवस्था और स्थिति की अद्यतन जानकारी रख सकें और परिस्थितियों के अनुसार इन चीजों का तुरंत समायोजन या समाधान कर सकें, तो काम व्यवस्थित रूप से चल सकता है। इसके विपरीत, अगर ये लोग उन्मत्त होकर कार्य करते हैं और वास्तविक कार्य नहीं करते, और अगुआ इसे पहचानने और समायोजन करने में तत्परता नहीं दिखाते, और तब तक प्रतीक्षा करते हैं, जब तक कि काम गंभीर रूप से बिगड़ नहीं जाता और सभी तरह की स्पष्ट समस्याएँ पहचाने जाने और धीरे-धीरे स्थिति को समायोजित करने, सुधारने और बचाने की कोशिश करने से पहले ही सामने आ चुकी होती हैं, तो ऐसे अगुआ अपने दायित्वों में पूरी तरह विफल हो गए हैं। वे नकली अगुआ हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (3)' से उद्धृत

इस प्रकार का व्यक्ति, जो नकली अगुआ होता है, वास्तविक कार्य नहीं करता, और वह वास्तविक कार्य करने में असमर्थ होता है। उसकी क्षमता खराब होती है, उसकी आँख और दिल अंधा होता है, वह समस्याओं का पता लगाने में असमर्थ होता है, और वह विभिन्न प्रकार के लोगों की असलियत नहीं देख पाता, इसलिए वह विभिन्न प्रकार की सक्षम प्रतिभाओं को उन्नत और विकसित करने का महत्वपूर्ण कार्य करने में असमर्थ होता है, जो परमेश्वर के घर के काम को उल्लेखनीय नुकसान पहुँचाता है, और उसका विभिन्न लोगों के जीवन में प्रवेश पर प्रभाव पड़ता है, जिससे उनके प्रवेश में बाधा उत्पन्न होती है। नकली अगुआ इस काम को करने के लिए स्पष्ट रूप से अयोग्य होते हैं। कुछ ऐसे नकली अगुआ भी होते हैं, जो विशिष्ट कार्य में शामिल नहीं होते, जो विशिष्ट कार्य के प्रभारी लोगों से दूरी बनाए रखते हैं, और इस प्रकार यह नहीं जानते कि विभिन्न प्रकार के लोग कौन-सा कार्य कर सकते हैं, और वे विभिन्न कार्य ठीक से और सिद्धांत के अनुसार करते हैं या नहीं। आंशिक रूप से यह आलस्य है, और आंशिक रूप से यह खराब क्षमता है, जिसके कारण नकली अगुआ वास्तविक कार्य करने में असमर्थ होते हैं। उनके साथ विशिष्ट कार्य आगे नहीं बढ़ सकता; वह ठहराव और गतिरोध में फँस जाता है, जो खराब कार्य-कुशलता में परिणत होता है। यह सब सीधे नकली अगुआओं द्वारा गलत लोगों को उन्नत और विकसित करने से जुड़ा है। पिछले कई वर्षों से परमेश्वर के घर ने इस बात पर बार-बार जोर दिया है कि दुष्ट और गैर-विश्वासी लोगों को हटाया जाना चाहिए और नकली अगुआओं और नकली कार्यकर्ताओं को बदला जाना चाहिए। विभिन्न दुष्ट लोगों और गैर-विश्वासियों को हटाया क्यों जाना चाहिए? क्योंकि वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद भी ये लोग सत्य को बिलकुल भी स्वीकार नहीं करते, और अब उनके उद्धार की कोई आशा नहीं है। और सभी नकली अगुआओं और नकली कार्यकर्ताओं को बदला क्यों जाना चाहिए? क्योंकि वे वास्तविक कार्य नहीं करते, और सत्य का अनुसरण करने वालों को कभी उन्नत या विकसित नहीं करते, जिससे कलीसिया का कार्य अस्तव्यस्त हो जाता है, क्योंकि बहुत लोग गड़बड़ी और बाधा उत्पन्न करते हैं, यहाँ तक कि वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों का जीवन-प्रवेश भी धीमा कर देते हैं। जब इन गैर--विश्वासियों और दुष्ट लोगों को हटा दिया जाता है, और नकली अगुआओं और नकली कार्यकर्ताओं को बदल दिया जाता है, तो कलीसिया का जीवन बहुत बेहतर हो जाता है, परमेश्वर के चुने हुए लोग सामान्य रूप से परमेश्वर के वचनों को खा और पी सकते हैं, अपना कर्तव्य निभा सकते हैं, और परमेश्वर में विश्वास के सही रास्ते पर कदम रख सकते हैं। परमेश्वर यही देखना चाहता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (5)' से उद्धृत

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