2. नियम-पालन क्या है और नियम-पालन और सत्य के अभ्यास में क्या अंतर है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

आज मनुष्य को जो हासिल करना है, वह मनुष्य की आज की वास्तविक दशा के अनुसार है, वर्तमान-दिन के मनुष्य की क्षमता और वास्तविक आध्यात्मिक कद के अनुसार है, और इसके लिए जरूरी नहीं है कि तुम नियमों का पालन करो। ऐसा इसलिए है कि तुम्हारी पुरानी प्रकृति में परिवर्तन हासिल किया जा सके, और ताकि तुम अपनी धारणाओं को त्याग सको। क्या तुम्हें लगता है कि आज्ञाएं नियम हैं? यह कहा जा सकता है कि, वे इंसान की आम आवश्यकताएं हैं। वे नियम नहीं हैं जिनका तुम्हें पालन करना चाहिए। उदाहरण के लिए-धूम्रपान पर रोक लगाने को लो-क्या यह नियम है? यह नियम नहीं है! यह सामान्य मानव-जाति से अपेक्षित है; यह नियम नहीं है, बल्कि कुछ ऐसा है जो पूरी मानव-जाति के लिए निर्धारित किया गया है। आज, निर्धारित की गई लगभग दर्जन या उससे कुछ अधिक आज्ञाएं भी नियम नहीं हैं, बल्कि वे वही हैं जो सामान्य मानवता को हासिल करने के लिए आवश्यक है। अतीत में लोगों के पास ऐसी चीजें नहीं थीं या उन्हें इसके बारे में पता नहीं था, और इसलिए लोगों से यह अपेक्षित है कि वे उन्हें आज प्राप्त करें, और ऐसी चीज़ों की गिनती नियमों में नहीं की जाती। व्यवस्थाएँ और नियम एकसमान नहीं हैं। जिस नियम के बारे में मैं बोलता हूँ वे, औपचारिकताओं या मनुष्यों के त्रुटिपूर्ण और विकृत व्यवहारों के संदर्भ में है; ये वे नियम और विनियम हैं जो मनुष्यों के किसी काम के नहीं हैं, उन्हें इससे कोई लाभ नहीं है, और वे ऐसी क्रियाविधि बनाते हैं जिसका कोई अर्थ नहीं होता। यह नियमों का निचोड़ है, और इस तरह के नियमों को त्याग देना चाहिए, क्योंकि ये मनुष्य को कोई लाभ नहीं पहुँचाते। जो मनुष्य के लिए लाभकारी है उसे व्यवहार में लाया जाना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (1)' से उद्धृत

अधिकांश लोगों का मानना है कि एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में आवश्यक रूप से प्रार्थना करना, भजन गाना, परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना या उसके वचनों पर मनन-चिंतन करना शामिल है, भले ही ऐसे अभ्यासों का वास्तव में कोई प्रभाव हो या न हो, चाहे वे सच्ची समझ तक ले जाएँ या न ले जाएँ। ये लोग सतही प्रक्रियाओं के परिणामों के बारे में सोचे बिना उन पर ध्यान केंद्रित करते हैं; वे ऐसे लोग हैं जो धार्मिक अनुष्ठानों में जीते हैं, वे ऐसे लोग नहीं हैं जो कलीसिया के भीतर रहते हैं, वे राज्य के लोग तो बिलकुल नहीं हैं। उनकी प्रार्थनाएँ, भजन-गायन और परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, सभी सिर्फ नियम-पालन हैं, जो प्रचलन में है उसके साथ बने रहने के लिए मजबूरी में किए जाने वाले काम हैं। ये अपनी इच्छा से या हृदय से नहीं किए जाते हैं। ये लोग कितनी भी प्रार्थना करें या गाएँ, उनके प्रयास निष्फल होंगे, क्योंकि वे जिनका अभ्यास करते हैं, वे केवल धर्म के नियम और अनुष्ठान हैं; वे वास्तव में परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं कर रहे हैं। वे अभ्यास किस तरह करते हैं, इस बात का बतंगड़ बनाने में ही उनका ध्यान लगा होता है और वे परमेश्वर के वचनों के साथ उन नियमों जैसा व्यवहार करते हैं जिनका पालन किया ही जाना चाहिए। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं ला रहे हैं; वे सिर्फ देह को तृप्त कर रहे हैं और दूसरे लोगों को दिखाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। धर्म के ये नियम और अनुष्ठान सभी मूल रूप से मानवीय हैं; वे परमेश्वर से नहीं आते हैं। परमेश्वर नियमों का पालन नहीं करता है, न ही वह किसी व्यवस्था के अधीन है। बल्कि, वह हर दिन नई चीज़ें करता है, व्यवहारिक काम पूरा करता है। थ्री-सेल्फ कलीसिया के लोग, हर दिन सुबह की प्रार्थना सभा में शामिल होने, शाम की प्रार्थना और भोजन से पहले आभार की प्रार्थना अर्पित करने, सभी चीज़ों में धन्यवाद देने जैसे अभ्यासों तक सीमित रहते हैं—वे इस तरह जितना भी कार्य करें और चाहे जितने लंबे समय तक ऐसा करें, उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। जब लोग नियमों के बीच रहते हैं और अपने हृदय अभ्यास के तरीकों में ही उलझाए रखते हैं, तो पवित्र आत्मा काम नहीं कर सकता, क्योंकि उनके हृदयों पर नियमों और मानवीय धारणाओं का कब्जा है। इस प्रकार, परमेश्वर हस्तक्षेप करने और उन पर काम करने में असमर्थ है, और वे केवल व्यवस्थाओं के नियंत्रण में जीते रह सकते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करने में सदा के लिए असमर्थ होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के विषय में' से उद्धृत

तुम कितनी धार्मिक परम्पराओं का पालन करते हो? कितनी बार तुमने परमेश्वर के वचन के खिलाफ विद्रोह किया है और अपने तरीके से चले हो? कितनी बार तुम परमेश्वर के वचनों को इसलिए अभ्यास में लाए हो क्योंकि तुम उसके भार के बारे में सच में विचारशील हो और उसकी इच्छा पूरी करना चाहते हो? तुम्हें परमेश्वर के वचन को समझना और उसे अभ्यास में लाना चाहिए। अपने सारे कामकाज में सिद्धांतवादी बनो, इसका अर्थ नियम में बंधना या बेमन से बस दिखावे के लिए काम करना नहीं है; बल्कि, इसका अर्थ सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन व्यतीत करना है। केवल इस प्रकार का अभ्यास ही परमेश्वर को संतुष्ट करता है। परमेश्वर जिस काम से प्रसन्न होता है, वह कोई नियम नहीं बल्कि सत्य का अभ्यास है। कुछ लोगों में अपनी ओर ध्यान खींचने की प्रवृत्ति होती है। अपने भाई-बहनों की उपस्थिति में वे भले ही कहें कि वे परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हैं, परंतु उनकी पीठ पीछे वे सत्य का अभ्यास नहीं करते और बिल्कुल अलग ही व्यवहार करते हैं। क्या वे धार्मिक फरीसी नहीं हैं? एक ऐसा व्यक्ति जो सच में परमेश्वर से प्यार करता है और जिसमें सत्य है, वह परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होता है, परंतु वह बाहर से इसका दिखावा नहीं करता। जैसे भी हालात बनें, वह सत्य का अभ्यास करने को तैयार रहता है और अपने विवेक के विरुद्ध न तो बोलता है, न ही कार्य करता है। चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, जब कोई बात होती है तो वह अपनी बुद्धि से कार्य करता है और अपने कर्मों में सिद्धांतों पर टिका रहता है। इस तरह का व्यक्ति सच्ची सेवा कर सकता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो बस जुबान से परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं; वे अपने दिन चिंता में भौंहें चढ़ाए गुजारते हैं, अच्छा व्यक्ति होने का नाटक करते हैं, और दया के पात्र होने का दिखावा करते हैं। कितनी घिनौनी हरकत है! यदि तुम उनसे पूछते, "क्या तुम बता सकते हो कि तुम परमेश्वर के ऋणी कैसे हो?" तो वे निरुत्तर हो जाते। यदि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो, तो इस बारे में बातें मत करो; बल्कि परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम वास्तविक अभ्यास से दर्शाओ और सच्चे हृदय से उससे प्रार्थना करो। जो लोग परमेश्वर से केवल मौखिक रूप से और बेमन से व्यवहार करते हैं वे सभी पाखंडी हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इंसान को अपनी आस्था में, वास्तविकता पर ध्यान देना चाहिए—धार्मिक रीति-रिवाजों में लिप्त रहना आस्था नहीं है' से उद्धृत

पहले, लोग जिस तरीके से अनुभव करते थे, उसमें बहुत सारे भटकाव और बेतुकापन था। उन्हें परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों की समझ थी ही नहीं, इसलिए ऐसे बहुत से क्षेत्र थे जिनमें लोगों के अनुभव उलट-पलट हो जाते थे। परमेश्वर इंसान से यह अपेक्षा करता है कि वह सामान्य मानवीयता को जिए। मिसाल के तौर पर, लोगों का खाने-कपड़ों के मामलों में आधुनिक रीति-रिवाजों को अपनाना, सूट या टाई पहनना, आधुनिक कला के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी हासिल कर लेना और खाली समय में कला, संस्कृति और मनोरंजन का आनंद लेना, ठीक है। वे कुछ यादगार तस्वीरें खींच सकते हैं, पढ़कर कुछ उपयोगी ज्ञान हासिल कर सकते हैं और अपेक्षाकृत अच्छे परिवेश में रह सकते हैं। ये सारी ऐसी बातें हैं जो सामान्य मानवीयता के अनुकूल हैं, फिर भी लोग इन्हें परमेश्वर द्वारा घृणा की जाने वाली चीज़ों के रूप में देखते हैं और वे इन कामों को करने से स्वयं को दूर रखते हैं। उनके अभ्यास में मात्र नियमों का पालन करना शामिल होता है, जिसके कारण उनका जीवन निहायत ही नीरस और एकदम निरर्थक हो जाता है। दरअसल, परमेश्वर ने कभी नहीं चाहा कि लोग इस तरह से कार्य करें। लोग स्वयं ही अपने स्वभावों को कम करना चाहते हैं, परमेश्वर के अधिक निकट आने के लिए निरंतर अपनी आत्माओं में प्रार्थना करते रहते हैं, उनके मन में लगातार उधेड़-बुन चलती रहती है कि परमेश्वर क्या चाहता है, उनकी आँखें सतत किसी न किसी बात पर टिकी रहती हैं, इस भयानक डर में कि किसी कारण से परमेश्वर से उनका संबंध-विच्छेद हो जाएगा। ये तमाम निष्कर्ष लोगों ने अपने आप ही निकाल लिए हैं; लोगों ने स्वयं ही ये नियम अपने लिए तय कर लिए हैं। अगर तुम खुद ही अपनी प्रकृति और सार के बारे में नहीं जानते और इस बात को नहीं समझते कि तुम्हारे अभ्यास का स्तर कहाँ तक पहुँच सकता है, तो तुम्हारे पास इस बात के लिए निश्चित होने का कोई रास्ता नहीं होगा कि परमेश्वर को इंसान से किन मानकों की अपेक्षा है और न ही तुम्हारे पास अभ्यास का कोई सटीक मार्ग होगा। चूँकि तुम्हें इस बात की समझ ही नहीं है कि वास्तव में परमेश्वर को इंसान से क्या अपेक्षा है, तो तुम्हारा मन हमेशा मंथन करता रहता है, तुम परमेश्वर के इरादों का विश्लेषण करने में अपना दिमाग खपाते रहते हो और अनाड़ीपन से पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित और प्रबुद्ध किए जाने की राह ढूँढते हो। नतीजतन, तुम अभ्यास के कुछ ऐसे मार्ग विकसित कर लेते हो जिन्हें तुम उपयुक्त मानते हो। तुम्हें इस बात का पता ही नहीं कि परमेश्वर को इंसान से वास्तव में क्या अपेक्षाएँ हैं; तुम प्रसन्नतापूर्वक बस अपने तय किए हुए अभ्यासों को ही करते रहते हो, परिणाम की परवाह नहीं करते और इस बात की तो बिल्कुल भी चिंता नहीं करते कि तुम्हारे अभ्यास में कोई भटकाव या त्रुटियाँ तो नहीं हैं। इस तरह, तुम्हारे अभ्यास में स्वाभाविक तौर पर सटीकता की कमी होती है और वह सिद्धांतहीन होता है। विशेष रूप से उसमें उचित मानवीय विवेक और अंतरात्मा का अभाव होता है, साथ ही उसमें परमेश्वर की सराहना और पवित्र आत्मा की परिपुष्टि की कमी होती है। अपने ही बनाए रास्ते पर चलने में बहुत ज़्यादा आसानी होती है। इस तरह का अभ्यास महज़ नियमों का अनुसरण करना है या स्वयं को प्रतिबंधित और नियंत्रित करने के लिए जानबूझकर अधिक भार उठाना है। फिर भी तुम्हें लगता है कि तुम्हारा अभ्यास एकदम सही और सटीक है, इस बात से अनजान कि तुम्हारे अभ्यास का अधिकतर हिस्सा अनावश्यक प्रक्रियाओं और अनुपालनों से बना है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो मूलत: अपने स्वभावों में बिना कोई बदलाव लाए, बिना किसी नयी समझ के, बिना नए प्रवेश के, बरसों तक इसी तरह से अभ्यास करते हैं। वे अनजाने में वही गलती बार-बार करके अपनी पाशविक प्रकृतियों को खुली छूट देते हैं, ऐसा इस हद तक करते हैं जहाँ बहुत बार वे अविवेकी, अमानवीय कृत्य कर बैठते हैं और इस प्रकार व्यवहार करते हैं कि लोग अपना सिर खुजलाते और हक्के-बक्के रह जाते हैं। क्या ऐसे लोगों के बारे कहा जा सकता है कि उन्होंने स्वभावगत बदलाव का अनुभव कर लिया है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (1)' से उद्धृत

वह कौन-सा मानक है, जो यह निर्धारित करता है कि कोई व्यक्ति सत्य का अभ्यास कर रहा है या नहीं? वह ऐसा है कि उनमें सत्य-वास्तविकता आ गई होती है। वह कौन-सा मानक है, जो यह निर्धारित करता है कि किसी में सत्य-वास्तविकता है या नहीं? यह मुद्दों से सामना होने पर तुम्हारे हृदय में परमेश्वर के प्रति जो दृष्टिकोण है, उस पर और इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्हारे पास अपना सटीक या गहरा ज्ञान और पैमाना है या नहीं। कुछ लोग मुद्दों से सामना होने पर हमेशा सतही, सामान्य चीजों के बारे में बात करते हैं, जो दर्शाता है कि उनमें सत्य-वास्तविकता नहीं है। जिन लोगों में सत्य-वास्तविकता नहीं होती, क्या वे किसी मुद्दे से सामना होने पर सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होते हैं? नहीं, वे सक्षम नहीं होते। वे शायद कह सकते हैं : "मैंने इस मुद्दे का सामना किया है और मैं केवल परमेश्वर का आज्ञापालन करूँगा।" तो तुम्हें इस मामले में परमेश्वर का आज्ञापालन क्यों करना है? तुम जिस सिद्धांत का पालन करते हो, वह सही है, किंतु शायद तुम अपनी भावनाओं के अनुसार व्यवहार कर सकते हो, जो उन चीजों को करने का एक तरीका है, जिन्हें तुमने खुद मापा और निर्धारित किया है। तुम कहते हो, "मैं केवल परमेश्वर का आज्ञापालन करता हूँ; मैं कुछ और नहीं कहता या करता," किंतु अपने हृदय में तुम हमेशा सोच रहे हो, "यह सब क्या है? परमेश्वर ने जो किया, वह गलत है।" तुम्हें यह समझ में नहीं आता कि परमेश्वर ने इस तरह से कार्य क्यों किया है, फिर भी तुम अपने आपसे आज्ञापालन करने के लिए कहते रहते हो, जबकि वास्तव में तुम्हारे हृदय में कोई सच्ची आज्ञाकारिता नहीं होती। तुम केवल बाहर से कुछ नहीं कहते या करते प्रतीत होते, मानो तुम आज्ञाकारी हो, जबकि वास्तव में ऐसा आज्ञापालन केवल नियम-पालन है, सत्य का अभ्यास करना नहीं। तुम्हें अपने भीतर उस अवज्ञाकारी भ्रष्ट स्वभाव का क्रम उलट देना चाहिए और कहना चाहिए : "मैं इस मुद्दे को देखता और समझता हूँ। मैं परमेश्वर के हृदय को समझता हूँ। मुझे पता है कि परमेश्वर ऐसा क्यों करना चाहता है। चाहे मैं पीड़ित हूँ या मैं कमजोर हूँ या मैं गिरता हूँ और उठ नहीं सकता या मैं दुखी हूँ, मैं परमेश्वर का आज्ञापालन करूँगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि परमेश्वर जो करता है, वह अच्छा होता है, कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है, वह सही होता है और कि परमेश्वर कुछ भी गलत नहीं कर सकता।" यह वास्तव में वैसा करने का इरादा न रखते हुए भी "मैं केवल परमेश्वर का आज्ञापालन करूँगा" कहने से अलग है। सतह पर यह "आज्ञाकारिता" किसी भी अवज्ञाकारी तरीके से व्यक्त नहीं की जाती—किंतु तुम्हारे हृदय के भीतर उग्र तूफान होते हैं और परमेश्वर के बारे में गलतफहमियों और उसके खिलाफ शिकायतों का एक ढेर होता है। यह वास्तव में तुम्हारे भीतर छिपा हुआ एक फोड़ा है—हालाँकि तुम्हारी त्वचा बाहर से ठीक है, किंतु उसके भीतर एक बीमारी है जो देर-सवेर फट जाएगी। चाहे तुमने कितने भी वर्ष आज्ञापालन किया हो या कितनी भी बार इस तरह से आज्ञापालन किया हो; अंत में तुम्हें फिर भी परमेश्वर पर सच्चा विश्वास नहीं होता, न ही तुम्हें उसके बारे में सच्ची समझ होती है। और इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि तुम नियमों का पालन करते हुए आज्ञापालन करते हो और भले ही तुम कितनी भी बार आज्ञापालन करो, तुम केवल नियमों का पालन कर रहे हो; तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव बदला नहीं है या हल नहीं हुआ है। अपने सामने आने वाले मुद्दों के माध्यम से तुम्हें अपने भ्रष्ट स्वभाव का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए और परमेश्वर जो भी करता है, तुम्हें उसकी समझ, ज्ञान और उसके प्रति विचारशीलता होनी चाहिए, ताकि तुम वास्तविक आज्ञाकारिता प्राप्त कर सको, अर्थात स्वैच्छिक आज्ञाकारिता। केवल इस स्तर तक पहुँचने पर ही तुम्हारे स्वभाव में सही बदलाव आएगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्‍य का अभ्‍यास करना क्‍या है?' से उद्धृत

सत्य का अभ्यास करना क्या है? जब तुम कोई निश्चित काम करते हो—जब तुम कोई काम पूरा करते हो या किसी कर्तव्य का निर्वाह करते हो—तो खुद उस चीज़ की बात करें तो, उसे उस तरह कैसे किया जाता है जैसे सत्य का अभ्यास करना हो और उसे उस तरह कैसे किया जाता है जैसे सत्य का अभ्यास न करना हो? सत्य का अभ्यास न करने का सत्य से कोई संबंध नहीं है। तुम अपना कर्तव्य निभा रहे होगे, लेकिन इसका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है; यह केवल एक प्रकार का अच्छा व्यवहार है और इसे एक सत्कर्म भी कहा जा सकता है, किंतु इसके और सत्य का अभ्यास करने के बीच अभी भी कुछ दूरी है। वे अलग हैं। तो उन्हें किस आधार पर अलग किया जा सकता है? जब तुम यह काम कर रहे होते हो, तो तुम एक निश्चित दायरा बनाए रखते हो और कुछ नियमों का पालन करते हो। उनमें से एक यह है कि तुम परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान नहीं पहुँचाते; दूसरा यह है कि तुम थोड़ा और दौड़-भाग करते हो और नियमित समय पर खाने और सोने में असफल रहते हुए थोड़ा पीड़ित होते हो। तुमने ये सब चीज़ें पूरी कर ली हैं और यदि तुम पर कोई सख्त मापदंड लागू नहीं किए जाते, तो तुम्हारा कर्तव्य अभी भी संतोषजनक ढंग से पूरा हो सकता है। किंतु एक चीज़ और है : क्या तुमने पता लगाया और खोजा है कि जब तुम यह काम करते हो, तो तुम्हारे भीतर कौन-से भ्रष्ट स्वभाव होते हैं? अर्थात्, क्या तुमने पता लगाया और खोजा है कि जब यह मुद्दा तुम्हारे सामने आता है, तो तुम्हारे पास ऐसे कौन-से विचार होते हैं और तुम्हारे भीतर ऐसी कौन-सी चीज़ें होती हैं, जिनसे परमेश्वर असंतुष्ट होता है? इस कर्तव्य को निभाकर और इस काम को करके क्या तुम अपने बारे में एक नई समझ प्राप्त करते हो और क्या तुमने कोई ऐसा सत्य पाया है, जिसे तुम्हें अभ्यास में लाना चाहिए और प्रवेश करना चाहिए? (यह शायद ही कभी होता है। कभी-कभी मुझे अपने अहंकार की केवल एक सतही समझ प्राप्त होती है और फिर मैं उसे आगे नहीं बढ़ाता।) तब अधिकांश समय तुम्हारे पास एक सूत्रबद्ध और सैद्धांतिक समझ ही होती है, कोई वास्तविक समझ नहीं। यदि तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो भले ही तुमने कोई भयंकर गलती या बुराई न की हो और भले ही तुमने मुख्य सिद्धांतों का उल्लंघन न किया हो और बाहरी तौर पर तुम कुछ मानवता से युक्त एक अच्छे व्यक्ति की तरह लगते हो, किंतु अभी भी तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर रहे हो, न ही तुमने कोई सत्य प्राप्त किया है। तुम्हारे द्वारा "कुछ भी गलत न किया होना" और बाहरी तौर पर तुम्हारा मानवता से युक्त व्यक्ति दिखाई देना सत्य के अनुसार होने या सत्य का अभ्यास करने के बराबर नहीं है। इसके और सत्य का अभ्यास करने के बीच एक अंतराल है, एक अंतर है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्‍य का अभ्‍यास करना क्‍या है?' से उद्धृत

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