1. सत्य का अभ्यास करना क्या है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

इंसान के लिए आवश्यक सत्य परमेश्वर के वचनों में निहित है, और सत्य ही इंसान के लिए अत्यंत लाभदायक और सहायक होता है। तुम लोगों के शरीर को इस टॉनिक और पोषण की आवश्यकता है, इससे इंसान को अपनी सामान्य मानवीयता को फिर से प्राप्त करने में सहायता मिलती है। यह ऐसा सत्य है जो इंसान के अंदर होना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के वचनों का जितना अधिक अभ्यास करोगे, उतनी ही तेज़ी से तुम लोगों का जीवन विकसित होगा, और सत्य उतना ही अधिक स्पष्ट होता जाएगा। जैसे-जैसे तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बढ़ेगा, तुम आध्यात्मिक जगत की चीज़ों को उतनी ही स्पष्टता से देखोगे, और शैतान पर विजय पाने के लिए तुम्हारे अंदर उतनी ही ज़्यादा शक्ति होगी। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों पर अमल करोगे, तो तुम लोग ऐसा बहुत-सा सत्य समझ जाओगे जो तुम लोग समझते नहीं हो। अधिकतर लोग अमल में अपने अनुभव को गहरा करने के बजाय महज़ परमेश्वर के वचनों के पाठ को समझकर और सिद्धांतों से लैस होकर ध्यान केंद्रित करके ही संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन क्या यह फरीसियों का तरीका नहीं है? तो उनके लिए यह कहावत "परमेश्वर के वचन जीवन हैं" वास्तविक कैसे हो सकती है? किसी इंसान का जीवन मात्र परमेश्वर के वचनों को पढ़कर विकसित नहीं हो सकता, बल्कि परमेश्वर के वचनों को अमल में लाने से ही होता है। अगर तुम्हारी सोच यह है कि जीवन और आध्यात्मिक कद पाने के लिए परमेश्वर के वचनों को समझना ही पर्याप्त है, तो तुम्हारी समझ विकृत है। परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ तब पैदा होती है जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, और तुम्हें यह समझ लेना चाहिए कि "इसे हमेशा सत्य पर अमल करके ही समझा जा सकता है।" आज, परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, तुम केवल यह कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के वचनों को जानते हो, लेकिन यह नहीं कह सकते कि तुम इन्हें समझते हो। कुछ लोगों का कहना है कि सत्य पर अमल करने का एकमात्र तरीका यह है कि पहले इसे समझा जाए, लेकिन यह बात आंशिक रूप से ही सही है, निश्चय ही यह पूरे तौर पर सही तो नहीं है। सत्य का ज्ञान प्राप्त करने से पहले, तुमने उस सत्य का अनुभव नहीं किया है। किसी उपदेश में कोई बात सुनकर यह मान लेना कि तुम समझ गए हो, सच्ची समझ नहीं होती—इसे महज़ सत्य को शाब्दिक रूप में समझना कहते हैं, यह उसमें छिपे सच्चे अर्थ को समझने के समान नहीं है। सत्य का सतही ज्ञान होने का अर्थ यह नहीं है कि तुम वास्तव में इसे समझते हो या तुम्हें इसका ज्ञान है; सत्य का सच्चा अर्थ इसका अनुभव करके आता है। इसलिए, जब तुम सत्य का अनुभव कर लेते हो, तो तुम इसे समझ सकते हो, और तभी तुम इसके छिपे हुए हिस्सों को समझ सकते हो। संकेतार्थों को और सत्य के सार को समझने के लिए तुम्हारा अपने अनुभव को गहरा करना की एकमात्र तरीका है। इसलिए, तुम सत्य के साथ हर जगह जा सकते हो, लेकिन अगर तुम्हारे अंदर कोई सत्य नहीं है, तो फिर धार्मिक लोगों की तो छोड़ो, तुम अपने परिवारजनों तक को आश्वस्त करने का भी प्रयास करने की मत सोचना। सत्य के बिना तुम हवा में तैरते हिमकणों की तरह हो, लेकिन सत्य के साथ तुम प्रसन्न और मुक्त रह सकते हो, और कोई तुम पर आक्रमण नहीं कर सकता। कोई सिद्धांत कितना ही सशक्त क्यों न हो, लेकिन वह सत्य को परास्त नहीं कर सकता। सत्य के साथ, दुनिया को झुकाया जा सकता है और पर्वतों-समुद्रों को हिलाया जा सकता है, जबकि सत्य के अभाव में कीड़े-मकौड़े भी शहर की मज़बूत दीवारों को मिट्टी में मिला सकते हैं। यह एक स्पष्ट तथ्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

सत्य के अभ्यास में सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है? क्या यह महत्वपूर्ण नहीं कि तुम सबसे पहले इसके सिद्धांतों को समझो? सिद्धांत क्या हैं? सिद्धांत सत्य का व्यावहारिक पहलू हैं। जब तुम परमेश्वर के वचनों का एक वाक्य पढ़ते हो, तो तुम्हें लगता है कि यह सत्य है, पर तुम इसके भीतर के सिद्धांतों को नहीं समझ पाते हो; तुम्हें लगता है कि वाक्य सही है, पर तुम्हें यह नहीं मालूम होता कि यह किस तरह से व्यावहारिक है, या यह किस अवस्था को संबोधित करने के लिए है। तुम इसके सिद्धांतों या इसके अभ्यास के मार्ग को नहीं समझ पाते। तुम्हारे लिए तुम्हारे द्वारा महसूस किया गया यह सत्य केवल मत है। परंतु एक बार जब तुम उस वाक्य की सत्य-वास्तविकता को समझ लेते हो और परमेश्वर की अपेक्षाओं को भी जान लेते हो—अगर तुम सचमुच इन चीजों को समझते हो, मूल्य चुकाने और इन्हें अभ्यास में लाने में सक्षम हो जाते हो—तो तुम उस सत्य को प्राप्त कर लोगे। जब तुम थोड़ा-थोड़ा करके उस सत्य को प्राप्त कर लेते हो तो तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव खत्म हो जाता है और वह सत्य तुम्हारे भीतर काम करने लगता है। जब तुम सत्य की वास्तविकता को अभ्यास में लाने में सक्षम हो जाते हो और जब एक व्यक्ति के रूप में अपने कर्तव्य का पालन, तुम्हारा हर कृत्य और तुम्हारा आचरण इस सत्य के अभ्यास के सिद्धांतों पर आधारित हो जाता है, तो क्या तुममें एक बदलाव नहीं आ जाता? सबसे बढ़कर, तुम एक ऐसे व्यक्ति बन जाते हो जिसके अंदर सत्य-वास्तविकता होती है। क्या जिस व्यक्ति में सत्य-वास्तविकता होती है, वह उस व्यक्ति के समान नहीं है जो सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करता है? और क्या जो व्यक्ति सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करता है वह उस व्यक्ति के समान नहीं है जिसमें सत्य है? क्या जिस व्यक्ति में सत्य है वह भी परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप आचरण करने में सक्षम नहीं है? इस तरह ये चीजें आपस में जुड़ी हुई हैं।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

सत्य का अभ्यास करना खोखले शब्द बोलना और निर्धारित वाक्यांशों का पाठ करना नहीं है। बल्कि, इसका अर्थ यह है कि जीवन में तुम्हारा सामना चाहे किसी भी चीज से हो, यदि इसमें इंसानी आचरण के सिद्धांत, घटनाओं पर दृष्टिकोण, परमेश्वर में विश्वास के मामले, सत्य-सिद्धांत या वह रवैया जिससे कोई अपना कर्तव्य निभाता है, शामिल हैं, तो सभी को अपना विकल्प चुनना होगा—सभी के पास अभ्यास का कोई मार्ग होना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि तुम्हारा मूल दृष्टिकोण यह है कि तुम्हें किसी को ठेस नहीं पहुंचानी चाहिए, बल्कि शांति बनाए रखनी चाहिए और किसी को भी शर्मिंदा करने से बचना चाहिए, ताकि भविष्य में, हर कोई साथ मिलकर चल सके, फिर इसी दृष्टिकोण के दायरे में, जब तुम किसी को कुछ बुरा करते हुए देखो, गलती करते हुए देखो या कोई ऐसा कार्य करते हुए देखो जो सिद्धांतों के विरुद्ध हो, तो तुम उस व्यक्ति का सामना करने के बजाय, उस चीज को सही करने का दायित्व अपने ऊपर ले लोगे। अपने दृष्टिकोण से सीमित होकर, तुम किसी को ठेस नहीं पहुँचाना चाहते। तुम किसी की भी उपस्थिति में क्यों न हो, उस व्यक्ति के चेहरे को याद करके, भावनाओं और रिश्तों या बरसों के मेलमिलाप से विकसित हुए जज्बात के संकोच में आकर, तुम हमेशा उस व्यक्ति की गरिमा की रक्षा के लिए अच्छी-अच्छी बातें कहोगे। जहाँ तुम्हें कुछ चीजें असंतोषजनक लगती हैं, वहाँ तुम केवल अपना गुस्सा उनकी पीठ पीछे निकालते हो और उनकी इज्जत को ठेस पहुँचाने के बजाय तुम निजी तौर पर अभिकथन करते हो। ऐसे आचरण के बारे में तुम क्या सोचते हो? क्या ऐसा व्यक्ति जी-हुजूरी करने वाला चापलूस और धोखेबाज नहीं है? यह सिद्धांतों का उल्लंघन करता है; क्या इस तरह से कार्य करना नीचता नहीं है? ऐसा करने वाले न तो अच्छे लोग होते हैं और न ही नेक होते हैं। तुमने चाहे कितने भी कष्ट सहे हों, कोई भी कीमत चुकाई हो, यदि तुम्हारा आचरण सिद्धांतों से रहित है, तो तुम असफल हो गए हो और परमेश्वर के सामने तुम्हें कोई स्वीकृति नहीं मिलेगी, न तो परमेश्वर तुम्हें याद करेगा और न ही वह तुमसे प्रसन्न होगा। इस बात का एहसास होने पर, क्या तुम व्यथित हुए? (हाँ।) तुम्हारा व्यथा को महसूस करना इस बात का प्रमाण है कि तुम अभी भी सत्य से प्रेम करते हो, तुम्हारा हृदय सत्य से प्रेम करता है, तुम्हारे अंदर सत्य से प्रेम करने वाली इच्छा है, और तुम्हारा विवेक अभी भी अनुभव करने में सक्षम है। ... बोधगम्यता तुम्हें सही और गलत, सकारात्मक और नकारात्मक चीजों में अंतर करने की क्षमता प्रदान करती है। बोधगम्यता और विवेक का अभ्यास करने की क्षमता के साथ, ऐसी नकारात्मक चीजों से, गलत विचारों और भ्रष्ट स्वभाव से घृणा करना आसान हो जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि, कम से कम, तुम्हारे अंदर पहले से ही बेहद बुनियादी चीज, विवेक की भावना है। विवेक की यह भावना बहुत मूल्यवान है, जैसे कि सही और गलत में अंतर करने की क्षमता, साथ ही मानवता के उस अंग का होना जो धार्मिकता और सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है। ये बेहद कीमती चीजें हैं—ये तीन सबसे वांछनीय और मूल्यवान चीजें हैं जो किसी व्यक्ति में हो सकती हैं, और एक बार ये चीजें आ जाएँ तो सत्य को व्यवहार में लाया जा सकता है। चलो फिलहाल दूसरी चीज को अलग रख देते हैं। यदि तुम्हारे अंदर बोधगम्य विवेक है, तो क्या कोई दुष्ट व्यक्ति जो खुले तौर पर कोई बुरा कार्य करता है जो एक व्यवधान और अशांति है, तुममें भावनाओं और अभिमत को उभारेगा? (हाँ।) यदि तुम्हारे भीतर अभिमत और भावनाएँ हैं, तो तुमने सत्य का अभ्यास करने के लिए सबसे बुनियादी आवश्यकताओं में से एक को पूरा कर लिया है। यदि तुम देख सको और महसूस कर सको कि उन्होंने बुरा कार्य किया है, और तुम कोई कार्रवाई करते हो, तो क्या यह सत्य का अभ्यास करना नहीं है? सत्य का अभ्यास करना क्या है? (इन कृत्यों को उजागर करना, रिपोर्ट करना और रोकना।) हाँ। जब ऐसी चीजें सिर उठाती हैं, और तुम सिद्धांतों के अनुसार अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हो, तो यह सत्य का अभ्यास करना है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्य को अच्छी तरह निभाने के लिए कम से कम, एक जमीर का होना आवश्यक है' से उद्धृत

यदि तुम सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हो, तो जीवन में तुम्हारे साथ जो कुछ भी होता है, जिस किसी के साथ भी तुम्हारा संपर्क है, और परमेश्वर तुम्हें जो भी कार्य सौंपता है, तुम्हें उसकी जाँच उन सत्यों के साथ करनी चाहिए जिन्हें तुम समझते हो और जिनका तुम अभ्यास करते हो। यानी, जब कुछ होता है, तो तुम्हें किस साधन से कार्य करना चाहिए, और तुम्हारी सैद्धांतिक बुनियाद और तुम्हारे अस्तित्व का आधार क्या होना चाहिए? परमेश्वर के वचन। मान लो, तुम्हें कोई कार्य दिया गया है : जिस तरह से तुम उसे करते हो, तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग होना चाहिए, जिसके लिए पहले सत्य के सिद्धांत में आधार की आवश्यकता होती है। परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होने के लिए इस कर्तव्य को कैसे निभाया जाना चाहिए? तुम्हें लापरवाह और अनमना नहीं होना चाहिए; निष्क्रिय पहलू के संदर्भ में, कम से कम इतना तो पूरा किया ही जाना चाहिए। मान लो, तुम बर्तन माँज रहे हो। यह एक कर्तव्य है, इसे तुमने स्वीकार किया है। तुम हर बर्तन को पानी से फटाफट धोते हो और फिर रुक जाते हो। क्या यह सत्य का अभ्यास करना है? तुम्हें लगता है कि तुमने सत्य का अभ्यास किया है। तुमने बर्तन धो दिए हैं; तुमने उन्हें अच्छी तरह से माँज दिया है। तो, तुम उन्हें माँजते समय क्या सोच रहे थे? बर्तन माँजने का तुम्हारा सिद्धांत क्या था? यदि तुम ऐसा करते समय किसी सिद्धांत का पालन करते हो, तो तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो। तो, सत्य का अभ्यास करने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए जब तुम्हें ऐसा कोई कार्य दिया जाता है जो तुम्हारा कर्तव्य है? क्या कोई सिद्धांत है? जिस सिद्धांत की बात की जा रही है वह सैद्धांतिक आधार है। सबसे पहले तो, तुम्हें लापरवाह या अनमना नहीं होना चाहिए; पहले, इस सिद्धांत का पालन करो। तुम्हें अपने मन में क्या सोचना चाहिए और तुम्हें क्या करना चाहिए ताकि तुम लापरवाह या अनमने न हो जाओ? इसमें कई चरण हैं। तुम देखते हो कि बर्तन गंदे और मैले हैं, बर्तन माँजना ही काफी नहीं है; उनमें बैक्टीरिया हो सकते हैं, इसलिए तुम्हें बैक्टीरिया को मारने के लिए बर्तन माँजने के पावडर का उपयोग करना चाहिए, बर्तनों को साफ करने करने के लिए उन्हें कई बार अच्छी तरह से धोना चाहिए, और बर्तनों को अच्छी तरह से जाँचना-परखना चाहिए। यह लापरवाह और अनमना होना नहीं है। यह दिमाग में सिद्धांत का होना है, और सिद्धांत के अनुसार काम करना है। तुम केवल इतना नहीं करते कि बर्तनों पर केवल एक सरसरी नज़र डाली, उन्हें धोया और काम वहीं छोड़ दिया, इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि उन पर चिकनाई या बैक्टीरिया तो नहीं चिपके हैं, और अपने मन में सोच लिया, "मुझे इस काम को करने के लिए कहा गया था, इसलिए मैं इसे करूँगा—अगर मैं काम करता हूँ तो मैं लापरवाह या अनमना नहीं हूँ।" यह सत्य का अभ्यास करना नहीं है, यह केवल थोड़ी-बहुत ऊर्जा का प्रयोग करना, सेवा करना, केवल शारीरिक श्रम में लिप्त होना है। तुमने बर्तन माँज दिए; यह कैसे हुआ कि तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर रहे थे? यह सिर्फ "थोड़ी-बहुत ऊर्जा का प्रयोग करना" कैसे बन गया? यदि तुम सिद्धांत के अनुसार कार्य नहीं करते हो, तो वह सत्य का अभ्यास करना नहीं है, और इसका अर्थ है कि कार्य सत्य-सिद्धांतों का पालन किए बिना किया गया था; तुम्हारे दिल में कोई सिद्धांत नहीं था, तुमने अपनी मर्जी, मनोदशा, भावनाओं, कल्पनाओं और विचारों के आधार पर कार्य किया। "मैं इन्हें फटाफट माँज दूँगा, बस—बर्तन माँजने के पावडर का उपयोग करने की क्या जरूरत है? बैक्टीरिया तो हैं नहीं। ऐसे ही इस्तेमाल कर लेना; कोई समस्या नहीं होगी।" क्या यह तुम्हारी अपनी राय नहीं है? तुम ऐसा सोचते हो, इसलिए तुम अपनी राय के अनुसार कार्य करते हो—यह सत्य का अभ्यास करना नहीं है। सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने के लिए, तुम्हें सोचना चाहिए, "मुझे लापरवाह या अनमना नहीं होना चाहिए, सिद्धांत यह होना चाहिए कि इसे साफ करना है और बैक्टीरिया मारने हैं, ताकि यह लोगों के उपयोग के लिए सुरक्षित और स्वास्थ्यकर हो।" यह सिद्धांत है, और यदि तुम इस सिद्धांत के आधार पर सब-कुछ करते हो, तो तुम लापरवाह या अनमने नहीं होगे, बल्कि कर्मठ होगे, अपना सर्वश्रेष्ठ करोगे, ऐसे में तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन पूरे दिलो-दिमाग से करोगे। यही सत्य का अभ्यास करना है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर में विश्वास करने का सबसे महत्वपूर्ण भाग सत्य को व्यवहार में लाना है' से उद्धृत

सही मायनों में सत्य को अमल में लाने के क्या मानदंड हैं? तुम सत्य को अमल में ला रहे हो या नहीं, इसे कैसे मापा और परिभाषित किया जाता है? परमेश्वर कैसे तय करता है कि तुम उसके वचनों को सुनकर उन्हें स्वीकार करने वाले इंसान हो? वह यह देखता है कि उसमें आस्था रखने और उसके उपदेशों को सुनने के दौरान तुम्हारी आंतरिक अवस्था में, उसके प्रति तुम्हारी अवज्ञा में और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव के विभिन्न आयामों के सार में कोई परिवर्तन आया है या नहीं। वह देखता है कि तुम्हारे अंदर उनका स्थान सत्य ने लिया है या नहीं और क्या तुम्हारे बाहरी बर्ताव और कार्यकलापों में या तुम्हारे दिल की गहराई में छिपे भ्रष्ट स्वभाव के सार में कोई बदलाव आया है या नहीं। परमेश्वर तुम्हें इन मानदंडों पर कसता है। इन तमाम वर्षों में उपदेश सुनकर और परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से तुम में आया बदलाव मात्र सतही है या आधारभूत? क्या तुम्हारे स्वभाव में बदलाव आए हैं? परमेश्वर के बारे में तुम्हारी गलतफहमियों में, परमेश्वर के प्रति तुम्हारी अवज्ञा में और परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपे गए आदेशों और कर्तव्यों के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण में बदलाव आए हैं या नहीं? परमेश्वर के विरुद्ध तुम्हारी अवज्ञा में कोई कमी आई है या नहीं? किसी घटना के घट जाने पर, जब तुम्हारी अवज्ञा उजागर हो जाती है, तो क्या तुम आत्म-चिंतन करते हो? क्या तुम अवज्ञाकारी हो? क्या परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपे जाने वाले आदेशों और कर्तव्यों के प्रति तुम और अधिक निष्ठावान हो गए हो और क्या यह निष्ठा शुद्ध है? उपदेश सुनने के दौरान, क्या तुम्हारी अभिप्रेरणाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, इच्छाएँ और इरादे शुद्ध हुए हैं? क्या ये मापने के पैमाने नहीं हैं? फिर, परमेश्वर के बारे में तुम्हारी गलतफहमियाँ भी हैं: क्या तुम अभी भी अपनी पुरानी धारणाओं, अज्ञात और अमूर्त कल्पनाओं और निष्कर्षों से चिपके रहते हो? क्या अब भी तुम्हारे अंदर शिकायतें और नकारात्मक भावनाएँ हैं? क्या इन चीज़ों को लेकर तुम में बदलाव आए हैं? यदि इन पहलुओं में कोई बदलाव नहीं आया है, तो फिर तुम किस प्रकार के इंसान हो? इससे एक बात तो सिद्ध होती है: तुम सत्य पर अमल करने वाले इंसान नहीं हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्‍वर के वचनों पर अमल कर के ही स्‍वभाव में बदलाव हो सकता है' से उद्धृत

कई लोगों के बाहरी व्यवहार निश्चित प्रकार के होते हैं, जैसे, अपने परिवार और काम-धंधे का त्याग करके अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर पाना, इसलिए वो मानते हैं कि वो सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। लेकिन परमेश्वर नहीं मानता कि वो सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। अगर तुम्हारे हर काम के पीछे व्यक्तिगत इरादे हों और यह दूषित हो, तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर रहे हो; तुम्हारा आचरण केवल बाहरी दिखावा है। सच कहें, तो परमेश्वर तुम्हारे आचरण की निंदा करेगा; वह इसकी प्रशंसा नहीं करेगा या इसे याद नहीं रखेगा। इसका आगे विश्लेषण करें तो, तुम दुष्टता कर रहे हो, तुम्हारा व्यवहार परमेश्वर के विरोध में है। बाहर से देखने पर तो तुम किसी चीज़ में अवरोध या व्यवधान नहीं डाल रहे हो और तुमने वास्तविक क्षति नहीं पहुंचाई है या किसी सत्य का उल्लंघन नहीं किया है। यह न्यायसंगत और उचित लगता है, मगर तुम्हारे कृत्यों का सार दुष्टता करने और परमेश्वर का विरोध करने से संबंधित है। इसलिए परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में अपने कृत्यों के पीछे के अभिप्रायों को देखकर तुम्हें निश्चित करना चाहिए कि क्या तुम्हारे स्वभाव में कोई परिवर्तन हुआ है, क्या तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो। यह इस इंसानी नज़रिए पर निर्भर नहीं करता कि तुम्हारे कृत्य इंसानी कल्पनाओं और इरादों के अनुरूप हैं या नहीं या वो तुम्हारी रुचि के उपयुक्त हैं या नहीं; ऐसी चीज़ें महत्वपूर्ण नहीं हैं। बल्कि, यह इस बात पर आधारित है कि परमेश्वर की नज़रों में तुम उसकी इच्छा के अनुरूप चल रहे हो या नहीं, तुम्हारे कृत्यों में सत्य-वास्तविकता है या नहीं, और वे उसकी अपेक्षाओं और मानकों को पूरा करते हैं या नहीं। केवल परमेश्वर की अपेक्षाओं से तुलना करके अपने आपको मापना ही सही है। स्वभाव में रूपांतरण और सत्य को अभ्यास में लाना उतना सहज और आसान नहीं है जैसा लोग सोचते हैं। क्या तुम लोग अब इस बात को समझ गए? क्या इसका तुम सबको कोई अनुभव है? जब समस्या के सार की बात आती है, तो शायद तुम लोग इसे नहीं समझ सकोगे; तुम्हारा प्रवेश बहुत ही उथला रहा है। तुम लोग सुबह से शाम तक भागते-दौड़ते हो, तुम लोग जल्दी उठते हो और देर से सोते हो, फिर भी तुम्हारा स्वभाव रूपांतरित नहीं हुआ है, और तुम इस बात को समझ नहीं सकते कि इस रूपांतरण में क्या-क्या चीज़ें शामिल हैं। इसका अर्थ है कि तुम्हारा प्रवेश बहुत ही उथला है, है न? भले ही तुम अधिक समय से परमेश्वर में आस्था रखते आ रहे हो, लेकिन हो सकता है कि तुम लोग स्वभाव में रूपांतरण हासिल करने के सार और उसकी गहराई को महसूस न कर सको। क्या यह कहा जा सकता है कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है? तुम कैसे जानते हो कि परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा करता है या नहीं? कम से कम, तुम अपने हर काम में ज़बर्दस्त दृढ़ता महसूस करोगे और तुम महसूस करोगे कि जब तुम अपने कर्तव्यों को पूरा कर रहे हो, परमेश्वर के घर में कोई काम कर रहे हो, या सामान्य तौर पर भी, पवित्र आत्मा तुम्हारा मार्गदर्शन और प्रबोधन कर रहा है और तुममें कार्य कर रहा है। तुम्हारा आचरण परमेश्वर के वचनों के अनुरूप होगा, और जब तुम्हारे पास कुछ हद तक अनुभव हो जाएगा, तो तुम महसूस करोगे कि अतीत में तुमने जो कुछ किया वह अपेक्षाकृत उपयुक्त था। लेकिन अगर कुछ समय तक अनुभव प्राप्त करने के बाद, तुम महसूस करो कि अतीत में तुम्हारे द्वारा किए गए कुछ काम उपयुक्त नहीं थे, तुम उनसे असंतुष्ट हो, और वास्तव में तुम्हारे द्वारा किए गए कार्यों में कोई सत्यता नहीं थी, तो इससे यह साबित होता है कि तुमने जो कुछ भी किया, वह परमेश्वर के विरोध में था। यह साबित करता है कि तुम्हारी सेवा विद्रोह, प्रतिरोध और मानवीय व्यवहार से भरी हुई थी।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो दस साल तक विश्वास कर सकते हो लेकिन तुम्हें किसी बदलाव का अनुभव नहीं होगा। अंत में, तुम सोचोगे कि परमेश्वर में विश्वास करने का ठीक यही मतलब है; तुम सोचोगे कि यह बहुत हद तक वैसा ही है जैसे तुम पहले दुनिया में रहते थे, और जीवित रहना अर्थहीन है। यह वास्तव में दिखाता है कि सत्य के बिना जीवन खोखला है। तुम कुछ सैद्धांतिक शब्द बोलने में सक्षम हो सकते हो, लेकिन तुम अभी भी असहज और बेचैन महसूस करोगे। यदि लोगों को परमेश्वर के बारे में कुछ जानकारी है, वे जानते हैं कि एक सार्थक जीवन कैसे जीना है, और वे परमेश्वर को संतुष्ट करने वाली कुछ चीजें कर सकते हैं, तो वे महसूस करेंगे कि यही वास्तविक जीवन है, केवल इसी तरह से रहने से उनके जीवन का अर्थ होगा, और परमेश्वर को थोड़ी संतुष्टि प्रदान करने और कृतज्ञ महसूस करने के लिए उन्हें इसी तरह से रहना होगा। यदि वे सजगतापूर्वक परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, सत्य को व्यवहार में ला सकते हैं, स्वयं को त्याग सकते हैं, अपने विचारों को छोड़ सकते हैं, और परमेश्वर की इच्छा के प्रति आज्ञाकारी और विचारशील हो सकते हैं—यदि वे इन सभी चीजों को सजगतापूर्वक करने में सक्षम हैं—तो सत्य को सटीक रूप से व्यवहार में लाने, और सत्य को वास्तव में व्यवहार में लाने का यही अर्थ है, और यह उनकी कल्पनाओं पर उनकी पिछली निर्भरता और सिद्धांतों और नियमों से चिपके रहने से बिलकुल भिन्न है। वास्तव में, जब वे सत्य को नहीं समझते तो उनका कुछ भी करना थकाऊ है, सिद्धांतों और नियमों से चिपके रहना थकाऊ है, और कोई लक्ष्य न होना और चीज़ों को आँखें मूँदकर करते रहना थकाऊ है। केवल सत्य के साथ ही वे मुक्त हो सकते हैं—यह कोई झूठ नहीं है—और उसके साथ वे चीज़ों को आसानी से और खुशी से कर सकते हैं। ऐसी स्थिति वाले लोग वे लोग हैं, जिनके पास सत्य है; वे ही हैं जिनके स्वभाव बदल दिए गए हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

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